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Saturday, December 25, 2010

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कांग्रेस, भ्रष्टाचार और मनमोहन
एक ईमानदार प्रधानमंत्री के कार्यकाल में आज तक के सबसे बड़े २ जी स्पैट्रम घोटाले के उजागर होने के बाद, उन्हीं की सरकार के पूर्व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ए.राजा ने संसद में खड़े होकर इस आशय की बात कही थी कि ''मैंने जो कुछ भी किया प्रधानमंत्री की जानकारी में लाकर किया।ÓÓ इसके बाद भी उनका मौन भंग नहीं हुआ। इससे डॉ.सिंह की ईमानदारी का संदेह के घेरे में आ जाना लाजिमी है। इसके अलावा कॉमनवैल्थ घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला भी डॉ. सिंह के कार्यकाल में ही हुए। हालांकि, इससे यह सिद्ध नहीं होता कि इह्व तीनों घोटालों में डॉ. सिंह की कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका रही होगी, लेकिन कार्यपालिका के शीर्ष पर होने से वे इस बात से तो नहीं बच सकते कि वे भ्रष्टाचार पर नकेल डालने में नाकाम रहे।
जैनेन्द्र कुमार
जयपुर। इन दिनों तीन बातों की सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है। काँग्रेस पार्टी का 83 वाँ महाधिवेशन, डॉ. मनमोहन सिंह की ईमानदारी और 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला। सबसे पहले बात काँग्रेस पार्टी की। काँग्रेस पार्टी के 125 साल पूरे होने पर इसके इतिहास पर भी नज़र डालना लाजि़मी हो जाता है। स्वतंत्रता के साथ ही काँग्रेस पार्टी ने प्रशासनिक कुशलता, निरंतरता, शहरी-ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संतुलन, उत्पादन में वृद्धि वाली राजनीतिक व्यवस्था कायम करने का $फैसला लिया था। पार्टी का उद्देश्य तब न्याय पर आधारित सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्था की स्थापना और अहिंसात्मक एवं शांतिपूर्ण तरीके से वर्गविहीन लोकतंत्रीय समाज की स्थापना करना था। संसदीय जनतंत्र पर आधारित व्यवस्था में अधिकारों की समानता और विश्वशांति एंव विश्व-बंधुत्व स्थापित करना था। इससे इतर काँगे्रस पार्टी के 83वें तीन दिवसीय महाधिवेशन के अंतिम दिन सोमवार दिसंबर 20 को कई महत्वपूर्ण बातें समाने आईं। मसलन भ्रष्टाचार महामारी की तरह समाज के हर स्तर पर फैल चुका है। साम्प्रदायिकता बहुसंख्य और अल्पसंख्यक आतंकवाद दोनों ही देश के लिए $खतरा हैं। दृढ़-संकल्प में शक की गुंजाइश न होने के बावजूद सीमापार आतंकवाद जारी है। जम्मू-कश्मीर मसले पर कई द$फा वार्ता होने के बाद भी समस्या जस की तस है। पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति के लिए समझौते का विकल्प खुला रखना ज़रूरी है। नक्सलवाद देश के लिए गंभीर समस्या बन गया है। पार्टी को चिंतन समूह गठित कर उनकी सलाह माननी होगी। इससे सा$फ हो जाता है, कि आ$िखर पार्टी अपने उद्देश्यों को पूरा करने में कितना सफल हो पाई। उसे आगे कहाँ सुधार करने व कितनी मेहनत करने की दरकार और है।
अब डॉ. मनमोहन सिंह के मुद्दे पर आते हैं। देश के प्रधानमंत्री और ख्यात अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने हाल ही काँग्रेस पार्टी के 83 वें महाधिवेशन में कहा-मेरा यही मानना है कि जूलियस सीज़र की पत्नी की भांति प्रधानमंत्री को भी संदेह से परे रहना चाहिए। यही कारण है कि मैं पीएसी के समक्ष उपस्थित होने को तैयार हूँ।
यह बात अलग है कि इससे पहले इस तरह का कोई वाकया नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, इस महान देश के प्रधानमंत्री के तौर पर साढ़े छह वर्षों के अपने कार्यकाल के दौरान हो सकता है कि मैंने गलतियां की हों। हालांकि, मैंने अपनी काबिलियत के अनुरूप इस देश की सेवा करने की भरसक कोशिश की है।
मेरे पास छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है। कार्यपालिका के सर्वोच्च शिखर पर आसीन व्यक्ति के लिए स्वयं को सवाल-जवाब के लिए प्रस्तुत करना आसान नहीं होता। उनका यह कहना कि हो सकता है कि मैंने $गलतियां की हों... उनकी प्रशंसनीय विनम्रता और ईमानदारी का अद्वितीय उदाहरण माना जा सकता है।
इसमें कोई दो राय नहीं, कि वे जितने अच्छे अर्थशास्त्री हैं, उतने ही अच्छे इंसान भी हैं। उनकी सा$फगोई की जितनी तारी$फ की जाए उतनी कम है, लेकिन 1 लाख 76 हज़ार करोड़ रुपए के 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले पर उनकी लंबे समय तक जारी रही चुप्पी को क्या समझा जाए। एक ईमानदार प्रधानमंत्री के कार्यकाल में आज तक के सबसे बड़े 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले के उजागर होने के बाद उन्हीं की सरकार के पूर्व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ए.राजा ने संसद में खड़े होकर इस आशय की बात कही थी, कि मैंने जो कुछ भी किया प्रधानमंत्री की जानकारी में लाकर किया। इसके बाद भी उनका मौन भंग नहीं हुआ। इससे डॉ. सिंह की ईमानदारी का संदेह के घेरे में आ जाना लाज़मी है। इसके अलावा कॉमनवैल्थ घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला भी डॉ. सिंह के कार्यकाल में ही हुए। हालांकि, इससे यह सिद्ध नहीं होता, कि इन तीनों घोटालों में डॉ. सिंह की कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका रही होगी, लेकिन कार्यपालिका के शीर्ष पर होने से वे इस बात से तो नहीं बच सकते, कि वे भ्रष्टाचार पर नकेल कसने में नाकाम रहे। उनकी शालीनता, सौम्यता और गंभीरता को उनकी ही सरकार के लोगों ने उनकी कमज़ोरी समझा और जो मन में आया वही किया, इस बात पर विचार किए ब$गैर कि वो जो कर रहे हैं, वह भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है, और इसके लिए देर-सवेर उन्हें तो सजा मिलेगी ही, उनके साथ ही पूरी पार्टी को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे अथवा पूरे संगठन के लोगों की ईमानदारी पर उंगलियाँ उठ सकती हैं।
इसके अलावा एक बात और जो आम जनता के मन को लगातार मथ रही है, वह है, उनका संयुक्त संसदीय समिति यानी जॉइंट पार्लियामेंट कमेटी-जेपीसी के लिए स्वीकृति ना देना। डॉ. सिंह लोक लेखा समिति, पीएसी के सामने पेश होने को तैयार हैं, लेकिन संयुक्त संसदीय समिति, जेपीसी की माँग को उन्होंने ठुकरा दिया। हालांकि, लोक लेखा समिति के अध्यक्ष संसदीय प्रणाली में प्रमुख विपक्षी दल के नेता होते हैं, और $िफलवक्त भाजपा के डॉ. मुरली मनोहर जोशी इसके अध्यक्ष हैं। इस समिति में संसद के लगभग सभी प्रमुख दलों के चुने हुए सांसदों को शामिल किया जाता है। इसका अधिकार क्षेत्र सरकार के $खर्च और प्राप्ति के बहीखातों की तकनीकी जाँच करना है। 2 जी स्पैक्ट्रम करीब-करीब इसके अधिकार क्षेत्र में आता है। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा, कि लाइसैंस देने में गड़बड़ी होने से सरकार को एक लाख 76 हज़ार करोड़ रुपए का घाटा हो चुका है। इसके बाद देश की राजनीति और विशेषतौर से भारतीय संसद में तू$फान सा उठ खड़ा हुआ। जिस संसद की कार्यवाही पर लाखों-करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जाते हैं, वही संसद विपक्षी पार्टी के सांसदों ने यह कहकर नहीं चलने दी, कि 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले की जाँच जेपीसी से कराई जाए, लेकिन सरकार नहीं मानी और गतिरोध दूर न हो सका।
इसका नतीजा यह निकला कि संसद के शीतकालीन सत्र में कोई उल्लेखनीय कार्रवाई ही नहीं हो पाई। इतना सब होने के बावजूद डॉ. सिंह जेपीसी की जाँच के लिए सहमत नहीं हैं। जब सिंह पीएसी के हर सवाल का जवाब देने को तैयार हैं, तो जेपीसी को हरी झंडी देने में क्या अड़चन आ रही है, यह आम जनता की समझ से परे है। बहरहाल सरकार के शीर्ष पर बैठे मुखिया के पास सबसे ज़्यादा अधिकार होते हैं, तो सबसे ज़्यादा जि़म्मेदारियां भी, और उनकी मजबूरियों को भी हर कोई समझ ले, ऐसा नहीं हो सकता। आज के परिदृश्य में भारतीय राजनीति और कांग्रेस पार्टी का विश्लेषण किया जाए, तो दोनों ही तमाम दुविधाओं और समस्याओं से घिरी नज़र आती हैं। रही बात डॉ. सिंह की, तो जनता उनसे यही उम्मीद करती है कि वे शांत और चुप्पी साधने की अपनी सामान्य छवि के विपरीत, अब आक्रामक तेवर दिखाएंगे, और भ्रष्टाचारियों-दोषियों को कठोर दंड देने के लिए हर संभव कदम उठाएँगे।



मैं प्रभात झा से बेहतर हिन्दू हूं
भोपाल। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा है कि वह मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष प्रभात झा से कहीं बेहतर हिन्दू हैं। अपने निवास पर मंगलवार दिसंबर 21 को उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि वे झा से बेहतर हिन्दू हैं, और इसके लिए उनको झा से किसी भी प्रमाण-पत्र की ज़रूरत नहींं हैं।
जब उनसे यह कहा गया कि विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने उन्हें 'पा$गलÓ करार दिया है, तो उन्होंने कहा कि ऐसा आरोप लगाने के पहले सिंघल को $खुद अपने दिमा$ग की जांच करानी चाहिये। यह पूछे जाने पर कि उनके संघ के बारे में क्या विचार हैं, तो उन्होंने कहा कि वह संघ के बारे में इतना कह चुके हैं, कि उन्हें उसके बारे में कुछ भी और कहने की ज़रूरत नहीं है। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि संघ ऐसी संस्था है, जो चोरों से चोरी करने के लिए कहती है, और कोतवाल से उन्हें पकडऩे की बात करती है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने मांग की है, कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस्ती$फा दे देना चाहिए, क्योंकि वह यहां पर किसानों के आंदोलन को रोकने में पूरी तरह विफल रहे हैं। कांग्रेस महासचिव ने अपने निवास पर पत्रकारों से चर्चा में कहा कि चौहान झूठ बोलते हैं, ये बात वह $खुद नहींं, बल्कि वे किसान कह रहे हैं, जो भाजपा द्वारा चलाये गये संगठन का हिस्सा हैं। सिंह ने कहा कि वह दस साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे लेकिन उस दौरान इस तरह का कोई भी आंदोलन प्रदेश में कहीं पर भी नहींं हुआ। उन्होंने कहा कि भाजपा के पिछले सात सालों के शासन में खाद की कालाबाज़ारी बढ़ी है और किसानों के $िखला$फ कठोर कदम उठाये गये हैं। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि अगर चौहान में वाकई दम है तो उन्हें उन लोगों के $िखला$फ कदम उठाने चाहिए, जो लोग खाद जैसी चीज़ों की कालाबाज़ारी में लगे हुये हैं।

Tuesday, December 21, 2010

Monday, December 20, 2010

Saturday, December 18, 2010






अर्जुन के बाण भी तुणीर से बाहर आने को आतुर
अर्जुन के तीर अभी भी लक्ष्य भेदी हैं
हृ लिमटी खरे नई दिल्ली। ख़्ामोश अर्जुन भी आज कुछ कहना चाहते हैं। उनके करीबी कह रहे हैं, कि उनकी $खामोशी जल्द ही टूटने वाली है। भ्रष्टाचार, घोटालों और अव्यवस्था से घिरी कांग्रेस गठबंधन सरकार में इस समय जिस तरह रहस्योद्घाटनों की झड़ी लगी है, उसमें एक कड़ी अर्जुन सिंह की भी जुडऩे वाली है, और वे जो बोलेंगे तो एक बार कांग्रेस में भूचाल ज़रूर आएगा। यह अलग बात है, कि कांग्रेस भी इस वक्त गैंडे की खाल ओढ़े हुए है, और सब हमलों को झेलती आ रही है। यूं तो कांग्रेस के चतुरसुजान कुंवर अर्जुन सिंह, कांग्रेस गठबंधन सरकार की दूसरी पारी में अपनी प्रासंगिता खो चुके हैं। कांग्रेस के छत्रपों में शुमार और राजीव गांधी के ज़माने में कई बार अपनी राजनीतिक एवं प्रशासनिक उपयोगिता सिद्ध करने वाले अर्जुन आज बेबस हैं, और का$फी पहले एक तरह से कांग्रेस से दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर किए जा चुके हैं, तथापि इस वक्त उनका मुंह खुल जाना राजनीतिक रूप से नए विवाद खड़े कर सकता है।
इशारों ही इशारों में तीर चलाकर अर्जुन सिंह को अपने विरोधियों का मर्दन करने में महारथ हासिल रही है। संप्रग की दूसरी पारी में उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया था। उस वक्त भी उम्मीद जताई जा रही थी कि वे अपनी उपेक्षा से कुपित होकर कोई न कोई धमाका अवश्य ही करेंगे, लेकिन यह आश्चर्य हुआ कि अर्जुन ने धैर्य नहीं खोया। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने अर्जुन सिंह को किनारे करने के लिए कोई जतन नहीं छोड़े। उनकी पुत्री वीणा सिंह को कांग्रेस का टिकट भी नहीं दिया गया। यहां तक कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव प्रचार में जाने के लिए उनके लिए निर्धारित विमान भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के एक करीबी गुजरात की यात्रा पर निकल गए और मजबूरी में अर्जुन सिंह को महाकौशल एक्सप्रेस से सतना पहुंचना पड़ा।
इसके उपरांत अर्जुन सिंह की पत्नी ने परोक्ष तौर पर सोनिया गांधी पर आरोप लगाकर ठहरे हुए पानी में कंकर मार दिया, जिससे उनके राज्यपाल बनने की $खबरें अ$फवाह में बदल गईं। अर्जुन सिंह से सोनिया गांधी की नाराज़गी का आलम यह पाया गया कि सोनिया गांधी ने अपने परिवार अर्थात जवाहर लाल नेहरू ट्रस्ट से भी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इसके बावजूद अर्जुन सिंह ने धैर्य नहीं खोया और ख़ामोशी को ही राजनीतिक प्रतिक्रिया बनने दिया। उनके राजनैतिक तौर पर किनारे होने की आशंका को भांपकर उनके अनुयाईयों ने भी नया ठौर ठिकाना ढूंढकर अपने आका बदल लिए हैं। लगभग डेढ़ साल से अर्जुन सिंह के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में सन्नाटा ही पसरा हुआ था, लेकिन इधर कुछ विशिष्ट आवाजाही बढ़ती दिख रही है। पिछले दिनों जब वे मध्यप्रदेश की यात्रा पर गए तो पत्रकारों से चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था, कि वे राजनैतिक जीवन के अर्जित अवकाश का आनंद उठा रहे हैं। अर्जुन सिंह के $करीबियों का कहना है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दूसरे कार्यकाल में घोटाले दर घोटाले सामने आने के बाद अब अर्जुन सक्रिय होते नजऱ आ रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है, कि जल्द ही अर्जुन सिंह मीडिया से रूबरू होने वाले हैं, जिसमें वे घोटालों के कारण धूमिल होती कांग्रेस की छवि को ध्यान में रखकर, समस्त मंत्रियों को यह भी मशविरा दे सकते हैं कि सभी अपने अपने त्यागपत्र सौंप दें, और फिर से नए सिरे से मंत्रिमण्डल का गठन किया जाए। इन बातों में सच्चाई कितनी है यह तो कुंवर अर्जुन सिंह ही ज्य़ादा बताएंगे किन्तु उनके आवास की बढ़ती चहल पहल से लगने लगा है, कि जल्द ही कांग्रेस के गुज़रे ज़माने के नेता की $खामोशी टूटने वाली है।
मनमोहन सिंह की सरकार में एक के बाद एक घोटाले जिस तरह से सामने आ रहे हैं, उससे कांग्रेस का भारी नुकसान हो रहा है। धर्मनिर्पेक्षता के चक्कर में भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस को उछालकर कांग्रेस ने अपने को बुरा फंसा लिया है। इस कार्ड का कांग्रेस को नुकसान ज्य़ादा हुआ है, जिसका परिणाम बिहार चुनाव में सामने आया है। यहां कांग्रेस का जो हाल हुआ है, वह कांग्रेस हाईकमान की रणनीतिक विफलताओं को प्रकट करता है। सोनिया गांधी आज जिन सलाहकारों के दम पर कांग्रेस को चलाना चाहती हैं उनके अपने एजेंडे हैं और वे कांग्रेस के लिए नहीं बल्कि अपने लिए काम करते हैं।
लोकसभा में पारित कई विधेयक ऐसे हैं, जिनके परिणाम पूरी तरह कांग्रेस के खिलाफ जाते हैं और जिनके कारण भाजपा को लाभ पहुंचा है। इनमें शत्रु संपत्ति कानून ने कांग्रेस का भारी नुकसान किया है, कश्मीर के मौजूदा हालात से निपटने में सरकार का बोदापन सामने आया, स्पेक्ट्रम घोटाले ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देश का बुरी तरह से विफल प्रधानमंत्री साबित कर दिया है, जबकि अर्जुन सिंह ने एक समय अपने राजनीतिक कौशल से अशांत पंजाब के राज्यपाल के रूप में पंजाब को देश की मुख्यधारा में लौटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर अपने महत्व को सिद्ध किया था। वही अर्जुन सिंह आज उस समय की प्रतीक्षा में बताए जाते हैं, जिसमें वे कांग्रेस की विफलताएं गिनाकर कुछ ऐसे रहस्योद्घाटन, करें जिनसे यह सिद्ध होता हो, कि अर्जुन के तीर अभी भी लक्ष्यभेदी हैं।



मध्य प्रदेश के बयानबाज़ नेता
हृ अशोक त्रिपाठी भोपाल। इतिहास की धरोहर सहेजने वाले मध्य प्रदेश में राजा-रजवाड़े और उनके द्वारा किए गये निर्माण कार्य जिनमें खजुराहों जैसे मंदिर विश्व प्रसिद्ध हैं, तब की राजनीति भी बहुत ऊंचे दर्जे की हुआ करती थी। कांग्रेस के इस गढ़ को राज परिवार की महारानी विजय राजे सिन्धियां ने तोड़ा था, जबकि उनके बेटे माधव राव सिन्धियां ने कांग्रेस का दामन थामा। श्यामा चरण शुक्ल और विद्या चरण शुक्ल की जोड़ी ने इस राज्य में ब्राह्मण राज को मज़बूत किया, तो अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह ने क्षत्रियों के वर्चस्व को बढ़ाया लेकिन इन सभी की बेतुकी बयानबाज़ी उनकी पार्टी को ही डुबोती चली गयी। वर्तमान में भी इससे कोई सीख नहीं ले रहा है। हाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बयान दोनों ही पार्टियों के लिए मुसीबत का कारण बने हैं। अभी भाजपा ने सुश्री उमा भारती को औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल नहीं किया, लेकिन उन्हें उत्तर प्रदेश में पार्टी का काम देखने का सिग्नल दे दिया गया है, और यह उनकी गृह वापसी का स्पष्ट संकेत भी है। इसके बावजूद वे अपने गृहराज्य मध्य प्रदेश को लेकर कोई टिप्पणी नहीं करेंगी, यह कहना मुश्किल है। श्री चौहान ने यह भाषण दे तो दिया, लेकिन थोड़ी ही देर बाद उन्हें अपनी $गलती का एहसास हो गया और उन्होंने कहा कि मेरी बातों को अगर अन्यथा लिया गया है, तो मैं क्षमाप्रार्थी हूं। दरअसल श्री चौहान ने जाने-अनजाने भाजपा की भी खिल्ली उड़ाई। केंद्र में भाजपा की भी सरकार रह चुकी है और उद्योगपतियों की तो वह पार्टी ही कही जाती है। प्रमोद महाजन जैसे नेता जाने-माने उद्योगपति ही थे। राज्य सभा में भाजपा का बहुमत है और महिला आरक्षण बिल पर इसीलिए केंद्र सरकार को भाजपा की मदद लेनी पड़ी थी। इधर, शिवराज सिंह दो मामलों में परेशान थे। एक तो यह कि उद्योगपति रतन टाटा ने पहले तो फोनटेपिंग के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को दोषी ठहराया, लेकिन विमानन कम्पनी के लिए रिश्वत देने के मामले में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार को भी कठघरे में खड़ा कर दिया। तत्कालीन विमानन मंत्री ने तो इस बात की जांच कराने की मांग ही कर दी थी, लेकिन राहुल बजाज ने यह कहकर मामला ठंडा कर दिया कि बिना रिश्वत के कोई काम ही नहीं होता।
बहरहाल, श्री शिवराज सिंह चौहान अपनी ज़ुबान पर नियंत्रण नहीं रख सके और उद्योगपतियों के बहाने राज्यसभा पर ही अपना $गुस्सा उतार दिया। वे सुश्री उमाभारती की गृह वापसी से भी परेशान दिख रहे हैं। उन्हें लगता है कि सुश्री उमा भारती भाजपा में शामिल होने के बाद कोई न कोई बखेड़ा खड़ा करेंगी। इसीलिए नितिन गडकरी की इच्छा के बावजूद सुश्री उमा भारती को अभी तक पार्टी में शामिल नहीं किया गया था। अब उन्हें हरी झण्डी तब मिली है, जब उनसे वादा ले लिया गया कि वे (उमा भारती) मध्य प्रदेश में द$खलंदाज़ी के बजाय उत्तर प्रदेश को संभालेंगी। उत्तर प्रदेश में ही राम मंदिर का मुद्दा भी जमकर उछाला जाना हैं, इसलिए उमा भारती मान गयीं, लेकिन श्री चौहान का $गुबार बाहर आकर भाजपा के लिए मुसीबत बन गया। इससे पूर्व कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मुंबई हमले में मारे गये वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे की हत्या पर सवाल उठाया। यह सवाल तब उठाया गया जब संसद पर आतंकी हमले की वर्षगांठ (१३ दिसम्बर) नज़दीक थी। इसलिए श्री दिग्विजय सिंह को यह मामला इस तरह नहीं उठाना था। वैसे ही अ$फज़ल गुरू की फांसी का मामला लटकाने का आरोप कांग्रेस पर लग रहा है।
श्री दिग्विजय सिंह अभी भी अपनी बात पर अड़े हैं। वे कहते हैं कि हेमंत करकरे की जि़न्दगी को हिन्दू कट्टरवादी ताकतों से $खतरा था। श्री दिग्विजय सिंह ने स$फाई देते हुए कहा कि उन्होंने मुंबई पर आतंकी हमले में पाकिस्तान की भूमिका होने पर कभी संदेह नहीं किया, लेकिन आडवाणी जी और राजनाथ सिंह को जवाब देना होगा कि माले गांव विस्फोट के बाद जब साध्वी प्रज्ञा भारती को गिर$फ्तार किया गाया था, तब वे प्रधानमंत्री से मिलने क्यों गये थे? शिवराज सिंह चौहान ने इसका जवाब भी श्री दिग्विजय सिंह को दिया है। उन्होंने कहा कि दिग्विजय सिंह मानसिक रूप से बीमार हैं। इससे पूर्व वे दिल्ली के बटाला हाउस मुठभेड़ का भी इसी तरह विरोध कर चुके हैं और नक्सली समस्या से निपट रहे गृहमंत्री पी- चिदम्बरम से भी ऊल-जलूल सवाल पूछ चुके हैं। राजनीति की विडम्बना देखिए कि वही काम शिवराज सिंह चौहान भी कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश का बंटवारा होने के समय यह समझा जा रहा था कि नक्सलवाद से प्रभावित सि$र्फ एक जि़ला बालाघाट-ही बचा है। राजनीति के झगड़े ने प्रदेश के सात और जिलों को नक्सलियों के हाथों दे दिया है। नक्सल प्रभावित जि़लों में अब बालाघाट के अलावा मंडला, डिंडोरी, सिवनी, सीधी, अनूपपुर, उमरिया और शहडोल भी शामिल हैं। केंद्र सरकार ने इनके विकास के लिए २५ लाख रुपये दिये हैं, लेकिन बेतुकी की बयानबाज़ी से फुर्सत मिले, तभी तो राज्य में विकास कार्य होंगे।
(हिफी)

Friday, December 10, 2010






सही $फरमा रहे हैं असलम शेर$खान
चेत जाओ महारथियो
हृ चन्द्र शेखर सिंह मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान अपने शासनकाल के 5 साल पूरे होनेे की $खुशी में जो जश्न मना रहे हैं, उसके कोलाहल के बाद भी यदि मध्यप्रदेश के कांग्रेसी नेताओं की आंखें नहीं खुलतीं, तो फिर इसमें कोई संदेह नहीं, कि अगले चुनावों में मध्यप्रदेश एक और बिहार के रूप में खड़ा नज़र आएगा। ये आश्चर्यजनक है कि डंपर, भूमि......आदि घोटालों से घिरी शिवराज की सत्तायात्रा, बे$खौ$फ जारी है। कांग्रेस $खुद को सत्ता का दावेदार समझती है, पर सही मायने में वो आज की तारी$ख में एक दमदार विपक्षी पार्टी के रूप में भी नज़र नहीं आ रही है। हाल ही में मप्र कांग्रेस इकाई उपाध्यक्ष असलम शेर$खान ने इस तर$फ ध्यान खींचते हुए अपनी पार्टी के महारथियों को आपसी गुटबाज़ी छोड़कर एक साथ खड़े होने का आव्हान किया था, किंतु नहीं लगता कि सुभाष यादव, राहुल सिंह, सुरेश पचौरी, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह वगैरा अपने-अपने अहम भूलकर गले मिल पाएंगे। भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस की हालत अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा, दिग्विजय सिंह जैसे विशेष कद्दावर नेताओं के केन्द्र की राजनीति में सक्रिय हो जाने से लावारिस सी हो गई है। अभी कुछ माह पूर्व तक विधानसभा में विपक्ष की नेता जमुना देवी के निधन के बाद तो जैसे यतीमों की सी हालत में आ गई है। वह शासक पार्टी को अनेक मुद्दों पर कानूनी घेरों में लिए रखती थी, और किसी न किसी मामले में रैली, आंदोलन चलाकर कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व को जीवित रखे हुए थीे। दूसरे कद्दावर नेता सुभाष यादव बीमारी की वजह से पार्टी कार्यों में भाग नहीं ले पाते। प्रदेश पार्टी के अध्यक्ष श्री पचौरी अन्य ताकतवर नेताओं कार्यकर्ताओं को अपने साथ लेकर चलने में शायद अपना अनादर समझते हैं, जिसकी वजह से अजय सिंह (राहुल), असलम शेर $खान जैसे और भी कद्दावर नेता कार्यकर्ताओं का उन्हें सहयोग प्राप्त नहीं हो पाता। असलम शेर $खान ने ही बताया कि जिस मीडिया कमेटी और राजीव गांधी पंचायत राज संगठन की जि़म्मेदारी उन्हें सौंपी गई है, वह केवल नाम की ही है। उनके पास न कोई अधिकार हैं न काम। लगभग यही हालत रही अजय सिंह (राहुल) के प्रभार वाली समिति का जिसका प्रभारी उन्हें बना रखा था।
छुटपुट समाचार मिलते हैं, जब मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांतिलाल भूरिया, दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के दौरे पर आकर किसी हद तक कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार करते रहते हैं। मगर क्या अच्छा हो यदि पार्टी हित में वे अपने-अपने स्वार्थों व अहम को भूलकर एक स्थान पर, एकजुट होकर, एक मज़बूत संगठन के निर्माण की पहल करें।
वर्तमान मप्र सरकार जो लगभग 5-5 वर्षों की दो पारियां पूरी करने जा रही है, उसके भ्रष्ट कारनामों से मज़दूर, किसान, छोटे व्यापारी, कर्मचारी, आम जनता कितनी दुखी और त्रस्त है, उसका आंकलन कांग्रेसी कार्यकर्ता करें।
रेगिस्तान में पानी की झील के मा$िफक वायदों से त्रस्त लोग भटक रहे हैं। जनता की महंगाई के कारण कमर टूटी जा रही है, जबकि बड़े व्यापारियों के गोदामों में माल सड़ रहे हैं। जब मंत्री और अधिकारी ही बिना कमीशन के किसी की बात नहीं सुनते, तो जनता के दर्द का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। ऐसे में यदि बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस, आंदोलन रैली, पर्चे, प्रचार और जनसंपर्क कर के दुखी जनता का समर्थन नहीं जुटा सकती, तो दोष पार्टी मुखिया का ही माना जाएगा। गत वर्ष 2008 के निर्वाचन से पूर्व, यदि एकजुट संगठित होकर प्रयास किए जाते, तो प्रदेश का राजनैतिक नक्शा कुछ और होता, मगर अ$फसोस कि इन सब नेताओं की तोपों के रू$ख विभिन्न दिशाओं में हैं, जो एक-दूसरे को ही भेद रहे हैं। काश यह सब एकजुट होकर एक ही दिशा में प्रयास करते...

संसद को बौना करते बड़े नेता
हृ रामबहादुर राय
एक पखवाड़े से अधिक का समय बीत गया दुनिया के सबसे बड़े देश की संसद ठप पड़ी हुई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में संयुक्त संसदीय जांच दल के नाम पर अपनी अपनी राजनीतिक गोटियां $िफट कर रहे हैं, जिसके कारण संसद ठप पड़ी हुई है. रामबहादुर राय मानते हैं कि असल में संयुक्त संसदीय जांच दल की विपक्ष की मांग एक ऐसी राजनीतिक मांग है जिसका सत्ता पक्ष और विपक्ष में बैठे कुछ नेताओं को राजनीतिक लाभ पहुंचाती है, इसीलिए इस मामले में पीएसी की जांच को कमतर बताकर जेपीसी की मांग के नाम पर संसद को ठप कर दिया गया है। संसद के सामने पिछले 17 दिनों से एक सवाल है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मामले की जांच जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) करे, या पीएसी (लोक लेखा समिति)। अभी सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता जो कर रहे हैं, उससे या तो उनका अहंकार झलकता है, या नासमझी, या फिर अज्ञानता। जसवंत सिंह ने लेख लिखा, लालकृष्ण आडवाणी, प्रणव मुखर्जी और सुषमा स्वराज ने बयान दिए, चारों के बयान तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। संसद जनता का मंच है, संविधान का मंच है, लेकिन ये नेता उसे नकार रहे हैं। इनसे सवाल पूछा जाना चाहिए कि आप संसद में क्यों हैं। अगर इन नेताओं में संसदीय मर्यादा होती और संसद के प्रति प्रतिबद्धता होती, तो ये कोई न कोई रास्ता निकाल लेते। लेकिन दोनों पक्ष वर्ष 2014 की चुनावी राजनीति पर उतर आए हैं, और ऐसा एक बार पहले भी हो चुका है। जब अप्रेल 1987 में बो$फोर्स का मामला उछला, तब चुनाव को दो साल ही रह गए थे। विपक्ष ने ऐसी परिस्थिति बनाई कि राजीव गांधी को मध्यावघि चुनाव में जाना पड़ा। नेता बो$फोर्स मामले को खींचते रहे, संसद की कार्यवाही बाघित होती रही। फिर संसद में कार्यवाही लगातार बाघित हो रही है। दो-तीन तरह के भ्रम हैं। कहा जा रहा है, जेपीसी ताकतवर होगी, पीएसी कमज़ोर होगी। विशेषज्ञों का कहना है, यह वाहियात बात है। पीएसी संसद की आर्थिक मामलों की स्थायी समिति है। पीएसी को वही अघिकार हैं, जो आप जेपीसी को बनाकर देंगे। विपक्ष द्वारा जेपीसी की मांग हो रही है, जबकि जेपीसी का अनुभव अच्छा नहीं रहा है। सबसे पहले जेपीसी की मांग 1989 में उठी थी और ह$फ्ते भर के राजनीतिक दंगल के बाद तत्कालीन सरकार जेपीसी के लिए तैयार हो गई थी। बी. शंकरानंद की अध्यक्षता में जेपीसी बनी। मालूम होना चाहिए कि शंकरानंद की जांच रिपोर्ट एस.के. भटनागर की देखरेख में बनी थी। बो$फोर्स में जो 100 लोग आरोपी थे, उनमें भटनागर भी शमिल थे। जो व्यक्ति शंकरानंद समिति का सचिव था, उसने रिटायर होने के बाद इस राज़ को खोल दिया है। संसद में जो लोग रूचि लेते हैं, वे जान गए हैं कि राजीव गांधी के इशारे पर शंकरानंद की रिपोर्ट संसद मे नहीं, बल्कि रक्षा मंत्रालय में बनी और इसीलिए उस जेपीसी से कुछ नहीं निकला। 1993 में राव सरकार के समय दूसरी बार रामनिवास मिर्धा की अध्यक्षता में जेपीसी बनी, जब हर्षद मेहता कांड हुआ। 1993 में भी संसद 17 दिन तक नहीं चली थी। तीसरी बार जेपीसी 1999 में वाजपेयी सरकार के समय बनी, प्रकाश मणि त्रिपाठी की अध्यक्षता में, केतन पारेख प्रतिभूति घोटाले का मामला था। चौथी जेपीसी बनी मनमोहन सिंह की सरकार के समय 2005 में, इसमें शीतलपेय में जहरीले रसायन की जांच का काम होना था, इस जेपीसी के अध्यक्ष शरद पवार बनाए गए। अब तक चार बार जेपीसी बन चुकी है और सत्ता पक्ष का व्यक्ति ही जेपीसी का अध्यक्ष होता है। जेपीसी के लिए सबसे पहले लोकसभा में प्रस्ताव आता है। तीन बातें तय होती हैं, जेपीसी के सदस्य कौन होंगे, वह किन मामलों की जांच करेगी और कितने दिनों में जांच पूरी कर ली जाएगी। लोकसभा अध्यक्ष प्रधानमंत्री से सलाह करके जेपीसी के अध्यक्ष को मनोनीत करता है और इसलिए पिछले चार जेपीसी के अध्यक्ष सत्ता पक्ष के ही हुए हैं। हैरानी की बात है कि विपक्ष जेपीसी की मांग क्यों कर रहा है। अभी पीएसी में ज्य़ादा ताकत है, उसके अध्यक्ष भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी हैं। उनकी एक छवि है, वे अध्यक्ष के रूप में किसी को भी बुला सकते हैं और किसी को भी सख़्त छानबीन में लपेट सकते हैं। $गलत बयानी हो रही है कि पीएसी प्रधानमंत्री को नहीं बुला सकती। लगता है, भाजपा के नेता मुरली मनोहर जोशी से डरे हुए हैं, जबकि पीएसी जांच जैसा सुनहरा मौका विपक्ष के हाथ नहीं आएगा। बताया जाता है, विपक्ष के दो नेताओं की दस जनपथ के साथ मिलीभगत है। ध्यान देने की बात है, पीएसी बाकायदा निर्वाचित होती है और अभी पीएसी एकमत से चाहती है कि 2जी स्पेक्ट्रम की जांच उसे सौंपी जाए, ताकि संसद की इस समिति को वाजिब मर्यादा मिले।
दरअसल, विपक्ष भी जल्दी निपटारा नहीं चाहता है। जल्दी निपटारा हो जाएगा, तो इसको चुनावी मुद्दा नहीं बना सकेंगे। अगर ये जल्दी निपटारा चाहते हैं, तो एक बीच का रास्ता भी हो सकता है, सरकार जेपीसी की मांग मान ले और विपक्ष समिति के सदस्यों के नामों पर सहमत हो जाए। लेकिन अभी दोनों तर$फ राजनीति सिर चढ़कर बोल रही है, इनको ख्य़ाल नहीं है कि संसद का क्या होगा। सबसे बड़ा नुकसान यह कि लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों ने हाशिये पर खड़ा कर दिया है। लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका होनी चाहिए, लेकिन नहीं है। इससे संसदीय मर्यादाओं का खुलकर उल्लंघन हो रहा है और इसके लिए एक तरह से विपक्ष और सत्ता पक्ष, दोनों ने ही सहमति बना ली है।
यह तो सामान्य बहस से तय होने वाली चीज़ है। 9 नवंबर से शीतकालीन सत्र शुरू हुआ। उसे 13 दिसम्बर तक चलना है, इसमें कुल पांच-छह दिन बचे हैं और अब तक संसद में कोई कामकाज नहीं हुआ है। इसमें दो बातें हैं, पहली बात, संसद में जो बहस होती रही है, उसकी अवघि घटाई जा रही है। इंदिरा गांधी से पहले तक संसद में बजट सत्र तीन महीने का मानसून और शीतकालीन सत्र छह-छह ह$फ्ते के होते थे। अब सरकार की भी दिलचस्पी इसमे नहीं है कि संसद में बहस हो और बहस से चीज़ें तय हों। छह ह$फ्ते मे से दो ह$फ्ते निकाल दिए गए।
कुल मिलाकर 20-22 दिन का सत्र हो गया है। चालू सत्र में 17 दिन बिना काम के निकल चुके हैं। दूसरी बात, लोगों की जेब से जो पैसा सरकारी $खज़ाने में जाता है, उसका एक आंकलन बजट में होता है। शीतकालीन सत्र में सरकार पूरक अनुदान मांग का प्रस्ताव रखती है और उस पर बहस होती है। इस बार बिना बहस कराए पूरक मांगें मान ली गई हैं। उससे भी गंभीर बात है, एक्सेस बजट भी पारित करवा लिया गया है। विपक्ष और पक्ष संसद को अपनी मनमजऱ्ी से चलवा रहे हैं। जहां सहमति होती है, जैसे अपने वेतन-भत्ते पर, वहां एक मिनट में सहमति का ठप्पा लगा देते हैं। संसद में चालू हंगामे के पीछे दलीय राजनीति काम कर रही है, और देश की सबसे बड़ी पंचायत को केवल अपनी मनमानी पर ठप्पा लगाने वाली मशीनरी के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
सवाल है, आ$िखर यूपीए सरकार जेपीसी के लिए क्यों तैयार नहीं है? राजनीतिक रूप से उसे कोई नुकसान नहीं है, लेकिन यूपीए नेतृत्व ने जेपीसी जांच को $खारिज करने का निर्णय बिना ज्य़ादा विचार के लिया था और अब उनका यह निर्णय अहंकार का विषय बन गया है। एक संभावना यह भी है कि 2जी स्पेक्ट्रम की जांच होगी, तो आंच कांग्रेस नेतृत्व तक भी पहुंच सकती है। अत: सत्ता पक्ष इसमें अपनी भलाई समझ रहा है, कि मामले को उलझाए रखा जाए, और इसमें उसे विपक्ष का भी साथ मिल रहा है।

Friday, December 3, 2010





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जश्न में दबे प्रश्न
पांच साल की पारी: गौरव दिवस के जश्न
शिवराज इन दिनों अपनी उपलब्धियों का जश्न मना रहे हैं। वे अपनी उपलब्धियां गिना रहे हैं, इतरा रहे हैं। जानकार मानते हैं कि उनकी सि$र्फ एक उपलब्धि है, कि उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया है, और चुनाव जीतने के बाद फिर एक नए कार्यकाल को पूरा करने की तर$फ अग्रसर हैं। उनका जश्न मनाना जायज़ है, मध्यप्रदेश में भाजपा के एकमात्र वही मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने ये रिकार्ड बनाया है, उनको हमारी भी बधाई और शुभकामनाएं। इस जश्न में यदि उनके साथ प्रदेश की जनता भी खड़ी नज़र आती तो यकीनन यही शिवराज की सबसे बड़ी उपलब्धि होती। पर सच तो ये है कि शिवराज अपनी जितनी योजनाएं गिनकर बता रहे हैं, उनसे ज़्यादा गिनती तो उनके शासनकाल में हुए घपले-घोटालों की है, जिनमें वे $खुद भी कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं। उनकी कामयाब सत्तायात्रा के लिए कांग्रेस का भी योगदान रहा है, जो अपनी आपसी खींचतान में ही अपनी सारी ऊर्जा झोंक रही है। शिवराज सिंह चौहान के शासनकाल की पोस्टमार्टम करती सरिता अरगरे की रपट -
मध्य प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी के पाँच साल निर्विघ्न पूरे होने की $खुशी में भाजपा राजधानी में पूरे जोशो$खरोश के साथ जश्न मनाने में जुटी है। केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की तजऱ् पर राज्य में शिवराज सिंह प्रदेश की $गैैर काँग्रेसी सरकार के पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं , जो पाँच साल की लम्बी पारी खेलने में कामयाब रहे हैं। इससे पहले तक बीजेपी की सरकारों में आयाराम-गयाराम का दौर ही देखा गया है। ऐसे में बीजेपी का जश्न मनाना तो ह$क बनता है ! लेकिन बीजेपी शिवराजसिंह को जिस तरह से सिर माथे पर बिठाकर गौरव दिवस मनाने में लगी है,वो पार्टी नेतृत्व की सोच,समझ और क्षमताओं पर ही सवाल खड़े करता है । सरकार के जश्न में डूबने से ज्य़ादा बेहतर है कि पार्टी यह विचार करे कि शिवराजसिंह के नेतृत्व में प्रदेश ने क्या पाया और क्या खोया?
घोषणायें, दौरे, व वायदों के पिटारे
शिवराज सिंह के अब तक के कामकाज,घोषणाओं, दौरों और वायदों के पिटारों को खोल कर देखा जाये , तो वे राजनीति की राखी सावंत से इतर नज़र नहीं आते । वही तेवर और वही लटके-झटके । क्वींस बैटन से लेकर ओबामा, और स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मसलों पर त्वरित बयान देने की उनकी अदा पर मीडिया भी $िफदा है । पिछले पाँच वर्षों में उनके द्वारा की गई घोषणाओं पर सरसरी निगाह डालें, तो चंद चाटुकार अधिकारियों की मदद से मीडिया को $खरीद कर बनाई गई छबि पल भर में छिन्न-भिन्न होती दिखाई देती है। घोषणाओं के भूसे में योजनाओं की ज़मीनी ह$की$कत सुई की मानिंद हो चुकी है । मीठा-मीठा गप्प कर $खामियों का ठीकरा केन्द्र के सिर फोडऩे की राजनीति के चलते शिवराजसिंह लगातार केन्द्र के $िखला$फ सत्याग्रह, धरने, प्रदर्शन कर जनता को भरमाने की कोशिश करते रहे हैं। दरअसल वे अब तक ना तो सूबे के मुखिया की भूमिका को ठीक तरह से समझ सके हैं, और ना ही आत्मसात करने का प्रयास करते नजऱ आते हैं। वे अब भी प्रदेश के विकास के लिये समग्र दृष्टिकोण विकसित कर सकारात्मक राजनीति को अपनाने में नाकाम हैं। वास्तव में शिवराज अपनी काबिलियत के बूते नहीं, बीजेपी की अँदरुनी कलह और शीर्ष नेतृत्व में मचे घमासान के बीच प्रदेश में अँधों में काना राजा की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं । दिल्ली में बैठे सूरमाओं की ताल पर थिरकते शिवराज सिंह प्रदेश में बीजेपी मज़बूरी बन गये हैं।
कमज़ोर विपक्ष
शिवराजसिंह की पाँच साल की इस निर्बाध पारी का श्रेय का$फी हद तक काँग्रेस के प्रादेशिक नेताओं को भी जाता है, जिन्होंने गंभीर मुद्दों को जनता के बीच नहीं ले जाकर एक तरह से मुख्यमंत्री का ही साथ दिया। जब-जब शिवराज की कुर्सी पर किन्हीं कारणों से संकट के बादल मँडराये,विपक्षी पार्टी ने हमेशा पर्दे के पीछे से अपना मित्र धर्म ब$खूबी निभाया। शिवराजसिंह ने कुर्सी सम्हालते ही अपनी विशिष्ट प्रवचनकारी शैली में जनता के बीच जाकर यह स्वीकार किया था, कि प्रदेश में सात तरह के मा$िफयाओं का राज है और वे जनता को इससे मुक्ति दिला कर ही दम लेंगे। लेकिन राजधानी भोपाल से लेकर दूरदराज़ के इलाकों में हो रही आपराधिक घटनाएँ प्रदेश मे $फैले गुंडाराज की कहानी $खुद बयान करती है। आज आलम ये है कि मा$िफयाओं के खिला$फ कार्रवाई की हुँकार भरने वाली सरकार ज़मीन के सौदागरों के $फायदों को ध्यान में रखकर ही नीतियाँ बना रही है।
बुनियादी सुविधायें ढंूढते रह जाओगे
भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति का नारा बुलंद करने वाली भाजपा आज $खुद इन्हीं व्याधियों से बुरी तरह घिर चुकी है। बिजली, पानी और सड़क के मुद्दे पर सत्ता में आई भाजपा के सात साल के शासनकाल में ये बुनियादी सुविधाएँ ढूँढ़ते रह जाओगे के हालात में पहुँच गई है। केन्द्र से मिलने वाले कोयले को घटिया क्वालिटी का ठहराकर गाँधीजी की दाँडी यात्रा(नमक सत्याग्रह) की तजऱ् पर कोयला सत्याग्रह का चोंचला कर सुर्खियाँ बटोरने वाली सरकार बिजली संकट से निपटने का कोई तोड़ नहीं ढूँढ पाई है। राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा के लिये केन्द्र को कठघरे में खड़ा करने वाली सरकार शहरों की सड़कों की बदहाली के लिये किसे जि़़म्मेदार ठहराएगी ? प्रदेश में लोगों को पीने का पानी भले ही मय्यसर नहीं हो, मगर हर दस कदम पर शराब मिलना तय है। पूरे प्रदेश में भूजल स्तर में गिरावट की स्थिति आने वाले वक्त की भयावह तस्वीर पेश करती है,मगर टेंडर,करारनामों और सरकारी ज़मीनों की बँदरबाँट से तर सरकार आम जनता की परेशानियों से बे$खबर है।
पंचायत लगाने के शौकीन
पंचायत लगाने के शौकीन मुख्यमंत्री किस्म-किस्म की महापंचायतों के माध्यम से अब तक करीब एक दर्जन से ज़्यादा मर्तबा भोपाल में मजमा जुटा चुके हैं। सरकारी योजनाओं के मद की राशि से लगाई गई इन पंचायतों का शायद ही किसी को कोई $फायदा मिला हो। आगे पाठ पीछे सपाट के $फार्मूले पर अमल कर आगे बढ़ रहे शिवराजसिंह $खुद भी भूल चुके हैं कि इन पंचायतों में की गई घोषणाओं पर अमल हुआ भी या नहीं ? पंचायत प्रेम के अलावा तरह-तरह की यात्राओं की शिगू$फेबाज़ी से भी जनता को बरगलाने में मुख्यमंत्री का कोई सानी नहीं है। कभी साइकल, तो कभी मोटरसाइकल की सवारी कर आम जनता से नाता जोडऩे की कवायद के बाद शिवराज ने स्वर्णिम मध्यप्रदेश का शोशा छोड़ा । 1 नवम्बर 1956 को गठित मध्यप्रदेश के विभाजन को भी एक दशक गुज़र चुका है लेकिन मुख्यमंत्री ने आओ बनायें अपना मध्यप्रदेश की मुहिम छेड़ रखी है। मध्यप्रदेश कितना और कैसा बना कह पाना मुश्किल है मगर प्रादेशिक अ$खबार, न्यूज़ चैनल और विज्ञापन एजेंसियों के साथ अधिकारियों और नेताओं की ज़रुर बन आई है। मंत्रियों से लेकर छुटभैये नेताओं की शानोशौकत देखकर एक बारगी यकीन करने को जी चाहता है कि वाकई मध्यप्रदेश स्वर्णिम बन रहा है । जनता कुछ समझ पाती, इसके पहले ही वे इन दिनों शिवराज मामा जी वनवासी सम्मान यात्रा के बहाने जगह-जगह स्वयं का सम्मान कराते घूम रहे हैं।
बच्चों के बीच पंडित जवाहरलाल नेहरु की चाचाजी वाली लोकप्रिय छबि से प्रेरित शिवराज मामाजी के तौर पर म$कबूल होने की हर मुमकिन कोशिश में जुटे हैं । मगर पौराणिक गाथाओं की मानें और भारतीय संस्कृति पर $गौर करें तो मामाओं का घर-परिवार में ज़्यादा दखल कभी भी सुखद नहीं माना गया है। नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ $खुद को प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार साबित करने की जुगत में जुटे तेज़ र$फ्तार शिवराज ने हाल ही में बाल दिवस पर भोपाल के मॉडल स्कूल में आयोजित समारोह में बच्चों से प्रधानमंत्री कब बनोगे सवाल पुछवा कर अपनी दावेदारी ठोक दी है । उनकी आसमान छूती परवाज़ और मंजि़ल तक पहुँचने की जल्दबाज़ी देखकर तो यही लगता है कि आने वाले सालों में मौका मिलने पर वे विश्व की चौधराहट का दावा पेश करने से भी नहीं चूकेंगे।
पूंजी पतियों को उपकृत करने की प्रवृति
छोटे किसान के घर से मुख्यमंत्री निवास तक पहुँचने के स$फर में शिवराज सिंह चौहान का एक ही सपना था कि प्रदेश का किसान खुशहाल हो। सत्ता हाथ में आते ही उन्हें कुछ बड़े घरानों ने अपने मोहपाश में ऐसा फांस लिया है कि वे उन पर ज़रूरत से ज्य़ादा मेहरबान हैं। एक तर$फ सरकार वन भूमि को कुछ बड़े घरानों को विकास के नाम पर बाँट रही है, वहीं पूँजीपतियों को उपकृत करने की $खातिर संरक्षित वन्य क्षेत्रों और अभयारण्यों से जुड़े तमाम नियम-कायदों को ताक पर रख दिया गया है। जिस सरकार पर राज्य की संपत्ति बचाने और बढ़ाने की जि़म्मेदारी है, वही राज्य की संपत्ति लुटाने में जुटी है। प्रदेश भर की सैकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन के मुकदमे हार कर भी सरकार बे$िफक्र है। वोट बैंक की $खातिर विभिन्न सामाजिक संगठनों को खुले हाथों से सरकारी ज़मीन लुटाने में भी कोई गुरेज़ नहीं है। राजधानी भोपाल की ऐतिहासिक इमारत मिंटो हॉल सहित प्रदेश की कई ऐतिहासिक धरोहरों को औने-पौने में व्यापारिक घरानों को देने की पहल भी सरकार के मंसूबों को सा$फ करती है।
हर $खामी का दोष केन्द्र सरकार पर मढऩा
किसान खाद,पानी,बिजली और बीज के लिये परेशान है और खेती को लाभ का धंधा बनाने का नारा देने वाली सरकार हर खामी का दोष केन्द्र सरकार के सिर मढ़कर अपनी ही धुन में मदमस्त है। अवैधखनन के ज़रिये प्राकृतिक संसाधनों की लूट करने वालों की तो जैसे पौ-बारह हो गई है। वन मंत्री ने हाल ही में बयान दिया था कि मुख्यमंत्री के गृह जि़ले सीहोर और बुधनी में सागौन की अवैधकटाई तथा रेत खनन का काम तेज़ी से $फलफ़ूल रहा है।
यू. पी. बिहार से बदतर हालत
दोबारा सत्ता में आते ही पचमढ़ी में कॉर्पोरेट कल्चर की सीख का असर मंत्रियों पर कुछ ऐसा तारी हुआ कि कमोबेश सभी ने औद्योगिक घरानों के रंग-ढंग अपनाना शुरु कर दिया। अब प्रदेश के ज़्यादातर महकमों के मंत्री और नौकरशाह किसी व्यापारिक घराने से कमतर नहीं हैं । हाल के सालों में बच्चों की शिक्षा,स्वास्थ्य, पोषण, दलितों और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे गौण हो चुके हैं । आँकड़ों की ज़ुबान समझने वालों का कहना है कि विकास के पैमाने पर प्रदेश की हालत उत्तरप्रदेश और बिहार से भी बदतर हो चली है, जबकि दलित अत्याचार, महिला उत्पीडऩ, अपहरण, हत्या, लूट, चोरी, डकैती, फिरौती जैसी आपराधिक गतिविधियों का ग्रा$फ लगातार कुलाँचे मार रहा है। प्रदेश में बने अराजकता के माहौल में उच्च शिक्षा का हाल भी बुरा है । ज़्यादातर विश्वविद्यालय राजनीति का अखाड़ा बन गये हैं और अधिकांश कुलपतियों को लेकर कैंपस में घमासान मचा है । बेरोज़गारी का ग्रा$फ र$फ्तार पकड़ रहा है,मगर इन्वेस्टर मीटस की रेलमपेल के बीच आत्ममुग्ध मुख्यमंत्री करारनामों पर हस्ताक्षरों को ही स$फलता का पैमाना मान बैठे हैं । इन सबके बीच रातोंरात कंपनियाँ बनाकर सस्ती ज़मीन हथियाने और एमओयू के नाम पर बैंकों से कजऱ् लेकर दूसरे धंधों में लगाने का कारोबार ज़़ोरों पर है।
अरबों रूपयों के कारनामों की हकीकत
तीन करोड़ रुपये की होली जलाकर अक्टूबर में खजुराहो में की गई ग्लोबल इन्वेस्टर मीट में हुए अरबों रुपयों के करारनामों की ह$की$कत तो गुज़रते वक्त के साथ ही सामने आ सकेगी । बहरहाल विधानसभा में उद्योगमंत्री द्वारा दिये गये आँकड़े अब तक के सरकारी प्रयासों की कलई खोलने के लिये काफ़ी हैं । बीते पांच वर्षो में चार विदेश यात्राएं, 20 करारनामों (एमओयू) पर हस्ताक्षर, नौ करारनामों का क्रियान्वयन नहीं, करार करने वाली एक कंपनी की परियोजना में रुचि ही नहीं, सि$र्फ दो पर काम शुरू। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पिछले पांच वर्षों में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए प्रयासों के ये नतीजे सामने आए हैं। कांग्रेस विधायक गोविंद सिंह द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बताया कि मुख्यमंत्री ने वर्ष 2005 में दो, 2007 एवं 2008 में एक-एक विदेश यात्रा की । इन यात्राओं के दौरान विदेशी कारोबारियों के साथ कुल 20 करारनामों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से 2005 में ग्यारह, 2007 में चार और 2008 में पांच करारनामों पर मध्य प्रदेश सरकार तथा विदेशी कंपनियों के बीच हस्ताक्षर हुए थे।
उद्योग मंत्री के मुताबिक वर्ष 2005 से 2009 के बीच हुईं विदेश यात्राओं पर कुल दो करोड़ चार लाख रुपये खर्च हुए हैं। मध्य प्रदेश में निवेश के लिए विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने सहित अन्य मसलों को लेकर मुख्यमत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में 19 सदस्यीय दल ने 13 से 23 जून 2010 तक जर्मनी, नीदरलैण्ड और इटली की यात्रा की, जिस पर 1 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च हुए। श्री विजयवर्गीय के अनुसार इस यात्रा का मकसद सि$र्फ विदेशी निवेशकों को पूंजी निवेश के लिए आकर्षित करना ही नहीं था, बल्कि प्रौद्योगिकी अवलोकन और हस्तांतरण, व्यावसायिक सहयोग, प्रदेश की ब्रांडिंग तथा विदेश से निवेशकों को खजुराहो ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट 2010 के लिये आमंत्रित करना भी था।
बढ़ती $गरीबी-पिसते $गरीब
प्रदेश में $गरीबी मिटाने के सरकार चाहे जितने दावे करे, लेकिन हकीकत कुछ और है। $गरीबी यहाँ तेज़ी से पैर पसार रही है। इसके गवाह आठ जि़लों के लोग हैं, जिनकी प्रतिदिन आय मात्र 27 रुपये है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भिंड, श्योपुर कलां, शिवपुरी, टीकमगढ़, रीवा, पन्ना, बड़वानी और मंडला वे जि़ले हैं, जहां प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 10 हज़ार रुपये से भी कम है। इन इलाकों के लोगों की औसत आय प्रतिमाह 833 रुपये है। हालांकि, सरकार $गरीबी दूर करने के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन $गरीबी कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। $गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओ में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रदेश में $गरीबी बढऩे की मूल वजह है। वहीं प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच लड़ाई में भी $गरीब पिस रहे हैं। कर्मचारियों को छठे वेतनमान देने के मुद्दे पर पैसे की तंगी का रोना रोने वाली राज्य सरकार विधायकों और मंत्रियों के ऐशो आराम पर दिल खोलकर $खर्च रही है।
मुखिया की ऊँची उड़ानें
भाजपा के पुरोधा और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जैसी सर्वमान्य छबि गढऩे के फेर में शिवराजसिंह इन दिनों मुख्यमंत्री निवास को धार्मिक समारोहों का आयोजन स्थल बनाने पर तुले हैं । एक दौर वो भी था जब शिवराज सार्वजनिक मंचों पर कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिलाकर पुराने न$गमे गुनगुनाया करते थे । लेकिन लागा चुनरी में दा$ग गाकर मह$िफल लूटने वाले कैलाश विजयवर्गीय से दामन छुड़ाकर अब वे रंजना बघेल, गोपाल भार्गव और लक्ष्मीकांत शर्मा की मंडली के साथ जि़लों के दौरों के वक्त भजन-कीर्तन करते नज़र आने लगे हैं। वैसे विजय शाह के साथ गले में ढोल लटका कर लोकधुनों पर झूमने का शौक भी इन दिनों परवान चढ़ रहा है । पेंशन और ज़मीन घोटाले के आरोप में $फँसे कैलाश विजयवर्गीय की राह में काँटे बोकर शिवराज एक मशहूर वाशिंग पाउडर के विज्ञापन तो दा$ग अच्छे हैं की तरह अपने दामन पर लगे डंपर कांड के दाग को भी जस्टिफ़ाई कर रहे हैं। वास्तव में सूबे के मुखिया के तौर पर शिवराजसिंह का कार्यकाल अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल पर भारी पड़ रहा है। उनकी पाँच साल की गौरवगाथा का बखान करने में कई साल लग सकते हैं।


कलमाड़ी की गिर$फ्तारी में भी अब देर नहीं
हृ सुप्रिया रॉय
नई दिल्ली। सुरेश कलमाड़ी के साथी चमचे और सह-अभियुक्त लगातार घेरे में आते जा रहे हैं, और उनके बयानों के आधार पर कलमाड़ी के $िखला$फ चार्जशीट तैयार होती जा रही है। अभी तक सीबीआई ने 77 अभियोगों के सिलसिले में एक ऐसी चार्जशीट तैयार की है जिसमें मुख्य अभियुक्त कलमाड़ी हैं और बाकी उनके सह अभियुक्त हैं।
कलमाड़ी कभी भी पहले पूछताछ के लिए गिर$फ्त में लिए जा सकते हैं, और फिर उन्हें बाकायदा कैद कर के उनके बाकी साथियों के साथ तिहाड़ जेल पहुंचाया जा सकता है। सीबीआई के अधिकारी जृरूरी मान रहे हैं कि कलमाड़ी को बाकी लोगों के साथ बिठा कर उनसे पूछताछ की जाए। अभी तक तो कलमाड़ी यही कहते घूम रहे हैं, कि उनको किसी बात का डर नहीं है। उन्होंने जो किया, नियमों के अनुसार किया, मगर फिर भी अगर जांच करनी है, तो सीबीआई से ले कर अदालत तक जांच कर ले, उन पर कोई आंच नहीं आएगी।
उधर सीबीआई के अधिकारियों को साफ निर्देश दिए गए हैं, कि सुरेश कलमाड़ी के $िखला$फ बयानों के ज़रिए सबूतो की जो $फाइल बन रही हैं, उसे अलग रखा जाए, ताकि बाद में न्याय प्रक्रिया में उसका इस्तेमाल किया जा सके। आ$िखर सुरेश कलमाड़ी पर हज़ारों करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप है, और ये घोटाले करने के लिए कलमाड़ी ने एक पूरी साथी मंडली बनाई थी। यह मंडली सबसे ज़्यादा जानती है, कि असल में क्या हुआ था और कौन सा पैसा कहां से होते हुए कहां तक पहुंचा? कई मामलों की तो खुलेआम पड़ताल हो चुकी है, और उनमें अब भी एक के बाद एक रहस्य निकल कर सामने आ रहे हैं। सुरेश कलमाड़ी ने वे शुरूआती सतर्कताएं ज़रूर बरती जिनके आधार पर उनका मानना था कि उन्हें कोई नहीं फंसा सकता। बहुत सारे काम तो मौखिक आदेशों के बहाने किए और बहुत से लोगों को $फायदा पहुंचाने के लिए नियम कानून भी बदल डाले।
दिलचस्प बात तो यह है कि कलमाड़ी ने दूसरी पार्टियों के और विरोध कर सकने वाले लोगों को भी साथ लेने की कोशिश की। नितिन गडकरी के करीबी संचेती परिवार को भी मोटे ठेके दिए गए और भाजपा नेता सुद्वांशु मित्तल की पारिवारिक कंपनी को भी ढाई सौ करोड़ का $फायदा पहुंचाया गया। इस बीच भूतपूर्व खेल मंत्री और कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य मणिशंकर अय्यर लगातार आरोप लगाते रहे, लेकिन कलमाड़ी ने तो देर होने का बहाना बना कर $खुद अय्यर को फंसा दिया और कहा कि बहुत सारी देर तो उनकी वजह से ही हुई थी। अब सुरेश कलमाड़ी को गिरफ्तार होने से कोई नहीं बचा सकता। कांग्रेस ने पहले से ही कलमाड़ी से दूरियां बनानी शुरू कर दी है। उन्हें पार्टी के सचिव पद से हटा दिया गया है और हालत यहां तक पहुंच गई है कि कॉमनवेल्थ खेलों के बाद जो समारोह हुए उनमें से किसी मेें भी कलमाड़ी को नहीं बुलाया गया। उन्होंने सोनिया गांधी से मिलने की कोशिश की मगर वह भी असफल रही। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ज़रूर उन्हेें दो बार मिलने का समय दिया और एक बार बहुत थोड़े समय के लिए मिले, मगर सि$र्फ इतना कहा कि श्रीमती सोनिया गांधी उनसे बहुत नाराज़ हैं, और उन्हें बहुत सारे स्पष्टीकरण देने पड़ेंगे। सुरेश कलमाड़ी अच्छे $खासे खिलाड़ी रहे हैं। मगर खेल के मैदान के नहीं, राजनीति के। सारे पदक उन्हें राजनीति में ही मिले है। ललित भनोट नाम का एक राजस्थानी कारोबारी उन्होंने पाल रखा था और खेल से कोई $खास वास्ता नहीं होने के बावजूद ललित भनोट कॉमनवेल्थ आयोजन समिति का महासचिव था। सबसे ज़्यादा मुखर हो कर वही बोलता था और हालत घमंड की यहां तक पहुंच गई थी कि अधिकारियों के खाने में एक बार जब कोई कीड़ा निकला तो ललित भनोट ने बहुत परिहास बुद्धि का परिचय देते हुए कहा कि हम आपको शाकाहारी के $खर्चे में मांसाहारी खाना खिला रहे है। यह मज़ाक जाहिर है कि ज़्यादा लोगों को पसंद नहीं आया होगा, लेकिन ललित भनोट दो ही चीज़ों के लिए जाने जाते रहे हैं। एक तो खोटी अंग्रेजी बोलने के लिए और दूसरे मेज पर रखा अपना पासपोर्ट सबको दिखाने के लिए कि वे कितने देश घूम आए है, लेकिन जब उनके यहां छापा पड़ा तो कलमाड़ी के दस्तावेज ही नहीं, बल्कि बनियान और अंडरवीयर भी उसके घर से बरामद हुए। अंतरंगता का अंदाजा लगाया जा सकता है। भनोट के गैराज में तीन महंगी गाडिय़ां भी मिलीं और सीबीआई वालों को भनोट की कलाकारी मालूम थी, इसलिए उन्होंने गाडिय़ों के इंजन सीटों के नीचे तक तलाशी ली। कमेटी के महानिदेशक वी के वर्मा के घर और ऑफिस में छापा मारा गया। वर्मा बैडमिंटन एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं, और अचानक उनके परिवार में भी एक कंपनी उगाई थी, जो कॉमनवेल्थ के ज़रिए अपना कल्याण कर रही थी। जब छापा पड़ा तो वर्मा साहब बैडिमिंटन संघ के $खर्चे पर मलेशिया में मौजूद थे। इतना ही नहीं, सीबीआई ने जो सूची बनाई है उसमें जांच के दायरे में दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के अधिकारी भी शामिल है। सीबीआई तो दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से बात करना चाहती है, और उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना से भी इसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति की आवश्यकता पड़ेगी। शीला दीक्षित और कलमाड़ी दोनों एक दूसरे को सारे घोटालों के लिए जि़म्मेदार ठहराते रहे हैं। सबसे ज़्यादा मगन मणिशंकर अय्यर है। लगभग 73 साल की उम्र में राजनयिक से राजनेता बने मणिशंकर अय्यर का$फी वाचाल माने जाते हैं और एक ज़माने में तो वे एक साप्ताहिक कॉलम भी लिखा करते थे, जिसे विषय से ज़्यादा गालियां देने की साहित्यिक प्रतिभा के लिए पढ़ा जाता था। यह कॉलम छापने वाले वीर सांघवी $िफलहाल नीरा राडिया के साथ फंसे हुए हैं। लेकिन अय्यर का कहना यही है, जांच-पड़ताल अगर तरीके से हो तो इसमें बड़े-बड़े नाम सामने आएंगे, और ये ऐसे नाम होंगे जिनकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। मणिशंकर अय्यर का सुरेश कलमाड़ी के साथ कभी कोई राजनैतिक बैर नहीं रहा मगर लगता है कि ये दोनों एक दूसरे को ले डूबने को तैयार है।

Saturday, November 27, 2010



बिहार में नीतीश के विकास की जय
नीतिश कुमार के विकास ने आ$िखरकार चमत्कार दिखा ही दिया। लालू इसे 'जादूÓ कह ही रहे हैं। पर ये जादू या चमत्कार नहीं है। यदि ईमानदारी से प्रदेश के हित में काम किया जाए, लोगों के विकास की बात हो, तो जातिवाद, साम्प्रदायिकता जैसे $फैक्टर नगण्य हो जाते हैं।
हृ चन्द्र शे$खर सिंह
बिहार में नीतीश कुमार की बम्पर जीत ने लालू-पासवान और कंाग्रेस को ज़रूर ये सोचने को मजबूर कर दिया होगा, कि अब मतदाता को नारों-वादों से बेवकू$फ नहीं बनाया जा सकता। वो जागरूक हो गया है, जान गया है कि जातिवाद और मुस्लिम तुष्टिकरण का जाल फैलाकर लालू एंड पार्टी उसे सदा से मूर्ख बनाती रही है। हम पूर्व में भी लिख चुके हंै कि बिहार का मतदाता इस बार किसे चुनने वाला है। (देखें $खबरयार अंक 41 दिनांक 29-10-2010) बिहार चुनाव के अखाड़े में इस बार लालू, पासवान ओर कंाग्रेस थे, तो दूसरी तरफ नीतिश और भाजपा थी। लालू को बिहारी मतदाता बहुत अच्छी तरह से जान गया है। उन्होंने बहुत लम्बे समय तक बिहार पर राज किया है। पर बिहार के विकास के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। विकास किया तो $खुद का, $खुद के परिवार का, $खुद के रिश्तेदारों का वे केन्द्र में भी पावर$फुल रहे, पर वहाँ रहकर भी उन्होंने बिहार के लिए शायद ही कुछ किया हो। हाँ, कुछ रेले ज़रूर बिहार को दीं, पर ये बिहार के लिए एक सुविधा हो सकती है, विकास नहीं। पासवान का चरित्र कोई नहीं समझ पाया। वे $िफल्मों के चंकी पाण्डे की तरह हो गये हैं। उनका अकेले कोई वजूद नहीं है, सो बेचारे लालू के साथ हो लिए पर ज़ीरो, ज़ीरो, मिलकर ज़ीरो ही रहे। $िफल्म तो हीरो से चलती है, उनकी $िफल्म $फ्लाँप हो गई है। कंाग्रेस के साथ ज़रूर यहाँ कुछ ज्य़ादती हुई है। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इस बार बिहार में नई शुरूआत की थी। उनको इस बार पहले से अपेक्षाकृत अधिक सीटें मिलने की उम्मीद थी। पर उन्हें शायद उनकी पिछली $गलतियों ने हराया है। बिहारी मतदाता कांग्रेसी चेहरे को भी अच्छी तरह से पढ़ चुके हैं। कंाग्रेस भले ही अकेले चुनाव लड़कर एक नई शुरूआत करने का दावा कर रही थी, किन्तु मतदाता को कांग्रेस लालू, पासवान के साथ ही खड़ी नज़र आती थी। लालू, पासवान और कांग्रेस इतने लम्बे समय तक साथ-साथ रहे हैं, कि वे अलग अलग होने के बाद भी साथ में खड़े दिखते हैं। यही बात कांग्रेस को ले डूबी। नीतिश कुमार के विकास ने आ$िखरकार चमत्कार दिखा ही दिया। लालू इसे 'जादूÓ कह ही रहे हैं। पर ये जादू या चमत्कार नहीं है। यदि ईमानदारी से प्रदेश के हित में काम किया जाए, लोगों के विकास की बात हो, तो जातिवाद, साम्प्रदायिकता जैसे $फैक्टर नगण्य हो जाते हैं। हां ये चमत्कार है कि बिहार के 29 वें मुख्यमंत्री के रूप में वे विश्वासमत भी हासिल नहीं कर पाए थे, 31 वें मुख्यमंत्री के रूप में न केवल उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया है, बल्कि 32 वें मुख्यमंत्री के रूप में भी एक ताकतवर संख्याबल लेकर उभरे हैं।


जेपीसी पर जाम संसद
दूरसंचार घोटाले में जेपीसी की मांग पर गुरुवार नवंबर 25 को भी संसद जाम रही। मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी जहां एक ओर जेपीसी की मांग पर अड़ी रही, वहीं कांग्रेस थोड़ी तल्$ख हुई और कहा कि जेपीसी जांच की मांग नहीं मानी जाएगी, विपक्ष चाहे तो सरकार के $िखला$फ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है। संसदीय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा कि पहले भी ऐसे दो मौके आये हैं, जब विपक्ष में रहते हुए हमने जेपीसी की मांग की थी, लेकिन उस वक्त एनडीए सरकार ने जेपीसी मांग को मान्य नहीं किया था। बंसल ने कहा कि तहलका और ताबूत घोटाले में हमने जेपीसी की मांग की थी, लेकिन उस वक्त आज की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा सत्ता में थी और उसने इस मांग को स्वीकार नहीं किया था। अब विपक्ष को चाहिए कि वह संसद को चलने दे, और संसद में किसी भी मुद्दे पर चर्चा के ज़रिए हम समस्याओं को सुलझाएंगे। अगर जेपीसी के नाम पर विपक्ष सि$र्फ प्रधानमंत्री और मंत्री के नाम सम्मन भेजने की इच्छा रखता है, तो इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। इससे पहले राज्यसभा सभापति हामिद अंसारी ने सुबह राज्यसभा के नेताओं की एक बैठक बुलाई थी जिसमें कोई समाधान नहीं निकल सका था। बैठक में शामिल रहे भाजपा के एसएस अहलूवालिया ने कहा कि सरकार पब्लिक अकाउण्ट कमेटी से जांच का हवाला दे रही है, लेकिन पब्लिक एकाउण्ट कमेटी मंत्री से इस बारे में पूछताछ का अधिकार ही नहीं रखती है। भाजपा के राज्यसभा सांसद तरूण विजय ने भी संसद में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि जेपीसी जांच ज़रूरी है। बिना इसके हम संसद को सामान्य नहीं होने देंगे। विपक्ष की जेपीसी की जांच की मांग का समर्थन करते हुए सीपीआई सचिव ए राजा ने कहा कि अगर विपक्ष स्पेक्ट्रम घोटाले के मसले पर जेपीसी की मांग कर रहा है, और संसद की कार्यवाही बाधित है, तो सरकार को इस बारे में ज़रूर सोचना चाहिए। सरकार एवं विपक्ष का आपसी विवाद दो ताकतवर सांडों जैसा है जिसमें नुकसान तो $गरीब पड़ोसी का ही होगा जिसकी दीवार ढह ढेरी हो रही है। भारी भरकम वेतन भत्ते व करोड़ों के $खर्चे करके संसद का काम काज ठप्प करके $गरीब जनता का ही उत्पीडऩ किया जा रहा है। न सांसदों को कोई घाटा है और न सरकार को। इस पर विचार करने की किसे चिंता है।

Friday, November 19, 2010

Monday, November 15, 2010





खिसियाने सुदर्शन ने खम्बा नोंचा
अब संघ ही संग नहीं
भाजपा हुई दीन-हीन, मुद्दा विहीन
हृ चंद्रशेखर सिंह
भोपाल। सुदर्शन ने भोपाल में सोनिया गांधी पर जो टिप्पणियां की हैं, उसके बाद कांग्रेस में जो उबाल आया है, संघ और भाजपा के $िखला$फ जो प्रदर्शन शुरू हुए हैं, वो काई आश्चर्यजनक बात नहीं है। बयान के बाद सुदर्शन तो चुप हो ही गए हैं उन्होंने साथ-साथ संघ और भाजपा की बोलती भी बंद कर दी है। दरअसल सुदर्शन ने जितनी घटिया टिप्पणियां सोनिया गांधी पर की हैं, उन्हें कोई भी जायज़ नहीं ठहरा सकता। भाजपा और संघ के सि$र्फ मौन रहने, या सि$र्फ यह कह देने से, कि यह सुदर्शन की निजी राय है, संघ या भाजपा का इससे कोई लेना-देना नहीं है, काम चलने वाला नहीं है। सुदर्शन संघ से जुड़े हुए हैं, और संघ का भाजपा से चोली-दामन का साथ है। सुदर्शन ने जो आरोप लगाए हैं, वो संघ के धरना-प्रदर्शन के दौरान, यानि संघ के प्लेटफार्म पर ही लगाए हैं। इसलिए भाजपा और संघ दोनों को ही खुलकर सामने आना ज़रूरी है। यदि सोनिया गांधी पर लगाए गए आरोपों में रत्ती भर भी सच्चाई है, तो संघ और भाजपा को खुलकर सुदर्शन के समर्थन में खड़ा होना चाहिए और यदि वो इन आरोपों को सही नहीं मानते, तो सुदर्शन पर अविलंब कड़ी कार्रवाई कर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। संघ और भाजपा दोनों ही हिन्दुत्व के नाम पर संगठित हैं, और हिन्दू धर्म में नारी के सम्मान को सर्वोपरि माना गया है, ऐसे में उन्हीं के संगठन का एक पूर्व संघ सरसंचालक यदि किसी नारी पर यूं भद्दी टिप्पणियां करता है, तो उसे इसका $खमियाज़ा भुगतना ही चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है, कि आ$िखर सुदर्शन को इस तरह की घटिया टिप्पणी करने की ज़रूरत क्यों पड़ गई। अगर बीते माह पर नज़र डालें तो लगता है कि हालात कुछ ऐसे बन पड़े, कि खिसियानी बिल्ली खंबा नोंचे वाली कहावत चरितार्थ हो गई।
बीते माह तक भाजपा मज़बूत स्थिति में थी। कॉमनवेल्थ गेम्स में जिस तरह से भ्रष्टाचार की $खबरें आईं, उससे बेजान होती भाजपा में जान आ गई। ए. राजा का मुद्दा उनके पास पहले से ही था। उसके बाद ही मुंबई का आदर्श सोसायटी फ्लैट वितरण घोटाले में महाराष्ट्र के सीएम का नाम आने के बाद, तो भाजपा लगभग पावर में आ गई थी। कांग्रेस की यूपीए सरकार के $िखला$फ विस्फोट करने के लिए उसके पास भरपूर मात्रा में बारूद इकट्ठा था। संघ पर लगे आतंकवाद के आरोपों का मुंहतोड़ जवाब होता ये, किंतु तीन दिन पहले ही कांग्रेस ने कलमाड़ी और महाराष्ट्र सीएम की कुर्सी से अशोक चव्हाण को विदा करके, भाजपा संघ के थोक में जमा बारूद को गीला कर दिया। संघ का कांग्रेस के $िखला$फ धरना-प्रदर्शन पूर्व नियोजित था। उसी कार्यक्रम में बौखलाए संघ के सुदर्शन ने उक्त बयान देकर अपनी भड़ास निकाल ली, लेकिन उक्त बयान उन्हीं के लिए गले की हड्डी बनकर दर्दनाक हो गया है। संघ ही उनके संग नहीं है।
भाजपा भी उनके बयान के बाद और दीन हीन हो गई है। कहां वो भ्रष्टाचार के $िखला$फ आंदोलन चलाना मनमोहन सोनिया के पुतले जलाने की जुगत भिड़ा रही थी। कहां आज उनके $खुद के नेताओं के पुतले उनके द$फ्तरों के सामने फुंक रहे हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स और मुंबई $फ्लैट घोटाले में जो जन समर्थन भाजपा को मिलने की उम्मीद थी, वो भी सुदर्शन के बयानों से उससे छिटक गया है। सोनिया गांधी पर लगाए बेहूदे आरोपों ने आम जनता को भी अपने $िखला$फ खड़ा कर लिया है।
अभी व$क्त है, भाजपा और संघ यदि अभी भी सुदर्शन के प्रति उदार रवैया नहीं छोड़ते, तो उनकी हालत भी महाभारत के धृतराष्ट्र जैसी होनी तय है, जो पुत्रमोह में अपना कुल ही गंवा बैठा था।

नये निज़ाम के दामन पर हैं ज़्यादा दा$ग
हृ निरंजन परिहार
मुंबई। महाराष्ट्र के नए निज़ाम भी कोई दूध के धुले नहीं हैं। कांग्रेस आलाकमान ने अशोक चव्हाण को $फजऱ्ीवाड़े से $फ्लैट पाने के आरोप में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की गद्दी से हटा दिया। लेकिन नए मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण भी उसी तरह के $फजऱ्ीवाड़े में गले तक डूबे हुए हैं। उन्होंने जितने बड़े बड़े झूठ बोलकर सरकार से $फ्लैट हथियाए हैं, वे कांग्रेस के लिए ज़्यादा दागदार हैं।
पृथ्वीराज चव्हाण के चेहरे पर भ्रष्टाचार की कालिख नई नहीं है। सात साल पहले का मामला है। पृथ्वीराज चव्हाण ने 2003 में सरकार से सस्ते $फ्लैट लेने के लिए सरकार के सामने गलत दस्तावेज सौंपे थे। मुंबई के वड़ाला स्थित भक्ति पार्क में उनका $फ्लैट है, जो उन्होंने $फजऱ्ी दस्तावेज के आधार पर ही लिया है। अर्बन लैंड सीलिंग एक्ट के तहत महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने 2003 में ये $फ्लैट पृथ्वीराज चव्हाण को अलॉट किया था। और सबूत के जो का$गज़ात सामने आए हैं, उनके मुताबिक जो इस $फ्लैट को पाने के लिए पृथ्वीराज ने जो कई तरह के झूठ बोले। उनमें से एक झूठ यह भी है कि चव्हाण ने $फ्लैट लेने के लिए $खुद को आमदार यानि महाराष्ट्र का एमएलए बताया था, जबकि उस वक्त पृथ्वीराज चव्हाण मध्यप्रदेश में थे। इसके अलावा एक झूठ यह भी है कि चव्हाण ने यह $फ्लैट पाने के लिए तब अपनी सालाना कमाई सिर्फ 76 हज़ार रुपए ही बताई थी। जबकि तब वे सांसद थे और भारत के किसी भी सांसद को साल भर में कितनी सैलरी मिलती है यह किसी से भी छुपा हुआ नहीं है। दरअसल, कहानी ये है कि महाराष्ट्र अर्बन लैंड सीलींग एक्ट के तहत अपने विशेष कोटा में से पांच $फीसदी $फ्लैट बहुत ही कम कीमत पर मुख्यमंत्री किसी को भी अलॉट कर सकते हैं । लेकिन स्कीम के तहत पिछले सोलह सालों में करीब 85 $फीसदी $फ्लैट नेताओं या उनके रिश्तेदारों को ही बांटे गए।
यही नहीं, ईमानदार और बेदाग छवि बताकर कांग्रेस ने जिन पृथ्वीराज चव्हाण को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाकर भेजा है, उन पर चुनाव लडऩे के लिए दिए गए संपत्ति के घोषणापत्र में भी अपनी बहुत सारी संपत्ति छुपाने का आरोप है। पृथ्वीराज चव्हाण ने सासंद का चुनाव लडऩे के वक्त जो शपथपत्र दिया, उसमें अपनी सतारा की खेती की ज़मीन का कोई जि़क्र ही नहीं किया। कांग्रेस ने पृथ्वीराज चव्हाण के बारे में ईमानदारी के बड़े - बड़े दावों और पाक सा$फ दामन की सोच-समझ के साथ महाराष्ट्र की गद्दी के लिए उनके नाम का एलान किया। पृथ्वीराज चव्हाण को गद्दी सैंपने के पीछे यह सोच भी रही, कि अशोक चव्हाण की वजह से भ्रष्टाचार के जो दा$ग कांग्रेस के दामन पर लगे हैं, उनको ये नए चव्हाण धो देंगे। लेकिन सियासत के जंगल में जब गड़े मुर्दे उखड़ते हैं, तो अच्छे-अच्छों के चेहरों पर कालिख पुती नज़र आती है। पृथ्वीराज चव्हाण के चेहरे पर भी भ्रष्टाचार, $फजऱ्ीवाड़े और झूठे हल$फनामे देने के कलंक की जो कालिख पुती नज़र आ रही है, उससे सा$फ लगता है कि कांग्रेस के ज़्यादातर लोगों के दामन दा$गदार ही हैं।
कुल मिलाकर कांग्रेस भले ही कितना प्रचार करे और पृथ्वीराज चव्हाण को भले ही कितना भी ईमानदार और सा$फ छवि का घोष्त कहे, लेकिन $फ्लैट आवंटन के साथ साथ चुनाव आयोग के सामने दिए गए संपत्ति के शपथ पत्र की जांच करने के लिए मामले की तह में जाएं और सारी बातों को ध्यान से देखें, तो पृथ्वीराज चव्हाण का दामन भी कोई कम दा$गदार नहीं है। $फ्लैट आवंटन में अशोक चव्हाण के तो रिश्तेदारों के ही नाम थे, लेकिन पृथ्वीराज चव्हाण तो $खुद $फजऱ्ीवाड़ा करके $फ्लैट पाने में कामयाब रहे हैं। भ्रष्टाचार का दलदल यहां भी है और अशोक चव्हाण पर तो कीचड़ के कुछ छींटे ही उड़े हैं, पृथ्वीराज चव्हाण तो $खुद उसके दलदल में गले तक डूबे हैं। इसीलिए कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र के नए निज़ाम भी कोई दूध के धुले नहीं हैं।

Friday, November 5, 2010



दीवाली पर दीवाला

अशोक चव्हान आह$िखर कब तक?
सेना के चंद बड़े अधिकारियों के संग प्रदेश व जि़ले के अनेक अधिकारी निशाने पर
दीपावली से ठीक पहले कुर्सी पर छाए संकट से हताश चह्वाण ने मुख्यमंत्री पद के दावेदारों को भी आदर्श सोसाइटी घोटाले में लपेटने की कोशिश की। इससे आलाकमान की रही-सही सहानुभूति भी उनके प्रति $खत्म होने के संकेत हैं। चह्वाण की मुख्य ताकत माने जाने वाले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने भी उन्हें मिलने का समय नहीं दिया। चह्वाण मामले की जांच कर रहे एके एंटनी ने रविवार को सा$फ कहा कि श्मामले की जांच में वक्त लगेगा, लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं।
हृ चन्द्रशेखर सिंह
मुंबई (महाराष्ट्र)। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण के बचने की उम्मीदें क्षीण होती जा रही हैं। वैसे, कांग्रेस नेतृत्व के सामने भी उनका उत्तराधिकारी चुनने का संकट कम नहीं है। शनिवार अक्टूबर 30 को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस्ती$फे की पेशकश करने के बाद चह्वाण रविवार को सारा दिन इस विवाद से उबरने की कोशिश करते रहे। हालांकि उनका हर प्रयास दलदल में हाथ-पैर मारने जैसा रहा। दीपावली से ठीक पहले कुर्सी पर छाए संकट से हताश चह्वाण ने मुख्यमंत्री पद के दावेदारों को भी आदर्श सोसाइटी घोटाले में लपेटने की कोशिश की। इससे आलाकमान की रही-सही सहानुभूति भी उनके प्रति $खत्म होने के संकेत हैं। चह्वाण की मुख्य ताकत माने जाने वाले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने भी रविवार अक्टूबर 31 को उन्हें मिलने का समय नहीं दिया। चह्वाण मामले की जांच कर रहे एके एंटनी ने रविवार को सा$फ कहा कि मामले की जांच में वक्त लगेगा, लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं। एंटनी के बयान के निहितार्थ यही निकाले जा रहे हैं कि यह ज़रूरी नहीं है कि चह्वाण के बारे में अंतिम $फैसले के लिए दीपावली या ओबामा के भारत दौरे तक का इंतज़ार किया जाए। हालांकि, इस $फैसले में सबसे बड़ी बाधा चह्वाण के नए उत्तराधिकारी को चुनने की चुनौती ही है।
पुराने चेहरे ही आज़माए जाएं या फिर किसी नए पर भरोसा जताया जाए तो वह कौन हो? बहरहाल, रविवार रात ही कोलकाता से लौटे प्रणब मुखर्जी और एंटनी के बीच इस मसले पर विचार के लिए बैठक हुई। इन दोनों नेताओं कीे इस मसले का हल निकालने की जि़म्मेदारी दी गई है। चह्वाण ने भी मुखर्जी से मिलने का समय मांगा हुआ है।
माना जा रहा है कि दो नवंबर को कांग्रेस की कार्यसमिति के बाद भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के बारे में $फैसला लिया जा सकता है। हालांकि, प्रणब और एंटनी के सामने नए चेहरे को चुनने की चुनौती होगी। मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को हटाने के बाद इन्हीं दोनों ने अशोक चह्वाण का नाम तय किया था। विधानसभा चुनाव के बाद जब फिर महाराष्ट्र में सरकार बनी तो राहुल ने चह्वाण के सिर पर हाथ रख दिया। इसके बाद सारी दावेदारी $खत्म हो गई। दिक्कत यह है कि गांधी परिवार के साथ-साथ प्रणब व एंटनी भी चह्वाण के प्रति अच्छी राय रखते रहे हैं। लेकिन, करगिल की विधवाओं के नाम पर बनी आदर्श हाउसिंग सोसाइटी में चह्वाण के परिवार के नाम से चार $फ्लैट आने के बाद कांग्रेस नेतृत्व मान रहा है कि इस मामले में अब कोई स$फाई जनता के सामने काम नहीं करेगी। लिहाज़ा, चह्वाण को बचाने का संदेश जनता में बहुत $खराब जाएगा। हालांकि, चह्वाण से पहले मुख्यमंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे और विलासराव देशमुख समेत महाराष्ट्र के कई बड़े नाम भी इस घोटाले में जुड़ रहे हैं। वहीं दिल्ली में महाराष्ट्र के चेहरों का कद और रुतबा इतना नहीं है कि वे राज्य में सहयोगी व एनसीपी नेता शरद पवार के सामने खड़े हो सकें। यही कारण है कि चह्वाण ने दिल्ली में अपने प्रवास के दौरान इन नेताओं के $िखला$फ भी मीडिया में $खबरें दीं। इसे आलाकमान ने और गंभीरता से लिया है। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री देशमुख ने तो उल्टे चह्वाण पर ही हमला बोल दिया। उन्होंने कहा कि मेरी इसमें कोई भूमिका नहीं। जब यह मामला मेरे सामने आया था तो मैंने इसे राजस्व विभाग उस समय राजस्व मंत्री भी सुरेश चह्वाण ही थे, के सुपुर्द कर दिया था। आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले में कांग्रेस और राकांपा के और नेताओं के जुड़े होने की खबरों के बीच महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे, सुशील कुमार शिंदे और राकांपा के अजीत पवार ने सभी आरोपों का खंडन किया है। इन नेताओं ने रविवार को दावा किया कि उन्होंने श्सदस्यता के लिए किसी भी व्यक्ति की सि$फारिश नहीं की थी। वर्तमान में केंद्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने इस मामले में कहा, आदर्श मोर्चे पर दिल्ली में बहुत कुछ नहीं हो रहा है। यह सि$र्फ समाचार पत्र हैं जो हो-हल्ला मचा रहे हैं।श राज्य के एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने कहा, मुझे ऐसा एक भी व्यक्ति दिखाएं, जो मेरा रिश्तेदार हो या जिसे मैं जानता हूं, जो सोसाइटी का सदस्य हो। जबकि राकांपा के मुखिया शरद पवार के भतीजे और इस वक्त महाराष्ट्र सरकार में मंत्री अजीत पवार ने कहा, मैंने सदस्यता के लिए किसी के भी नाम की अनुशंसा नहीं की है। इन नेताओं के बयान टेलीविजन चौनलों की उन रपटों के मद्देनज़र आया है जिसमें कहा गया है कि महाराष्ट्र के कांग्रेस-राकांपा के कुछ शीर्ष नेताओं ने आदर्श सोसाइटी में अपने सहयोगियों और जान-पहचान के लोगों को $फ्लैट दिलाने के लिए उनके नामों की सिफारिश की थी। इन नेताओं ने ऐसी खबरों को $खुद को बदनाम करने की साजिश बताया है। पूर्व मुख्यमंत्री व केन्द्रीय मंत्री विलास राव देशमुख से जुड़े 3 लोगों को आदर्श हाउसिंग सोसाइटी में $फ्लैट मिला है जिनके नाम हैं-अमोल वी.खरभरी, किरन भदंगे,उत्ताम घकरे। पूर्व मुख्यमंत्री व केन्द्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे से जुड़े डव्लू खनखोजे को $फ्लैट मिला है। मंत्री नारायण राणे के परिजन रूपाली रावराणे, गिरिश प्रवीणचन्द्र मेहता को $फ्लैट मिला है। उर्जा मंत्री अजीत पवार से जुड़े कृष्णराव भेगड़े और शिवाजी राव काले को $फ्लैट मिला है। गृहमंत्री आरआर पाटिल के परिजन चन्द्रशेखर गयकवाड़ को मिला है। ग्रामीण विकास मंत्री जयंत पाटिल के रिश्तेदार आदित्य पाटिल को मिला है। पूर्व मंत्री शिवाजी निलंगेकर के सहयोगी अरूण डावले और सम्पत खिड्से को मिला है। खाद्य आपूर्ति मंत्री अनिल देशमुख से जुड़े मुकुन्द राव मांकड़ को $फ्लैट मिला है। मंत्री पतंगराव कदम से जुड़े बालासाहब सावंत को $फ्लैट मिला है। सूत्रों के मुताबिक कारगिल के शहिदों के परिजनों के लिए बने इस आदर्श हाउसिंग सोसाइटी में बिल्डर के साथमिलकर घोटाला करने में कांग्रेसी और राकापा के नेता तो गले तक डूबे ही हैं, शिव सेना और भाजपा के भी कई नेताओं और उनके लग्गूओं-भग्गूओं ने भी बहती गंगा में डुबकी लगाई है।
जहां $फाईल पहुंची उसी ने मारा हाथ
सपनों के शहर मुंबई के मुंह पर ऐसी कालिख शायद ही कभी लगी हो। मुंबई के कोलाबा स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी की जैसी कहानी सामने आ रही है, वह दिल दहला देनेवाली है। जिस शहर में इंच-सेन्टीमीटर में भी रहने की जगह का हिसाब रखा जाता हो, वहां एक 31 मंजि़ला बिल्डिंग अवैध ज़मीन पर, अवैध तरीके से खड़ी कर दी गयी। भवन को खड़ा करने का यह भ्रष्टाचार उतना संगीन नहीं है, जितना संगीन है यह समाचार कि यह भवन 1999 में कारगिल में शहीद जवानों की विधवाओं को आवासीय सुविधा देने के लिए तैयार किया जानेवाला था। कोलाबा के पास जिस स्थान पर यह भवन सीना तान खड़ा हुआ है उसकी हकीकत इतनी गंदी है, कि किसी भी स्वाभिमानी नागरिक का सिर शर्म से झुक जाएगा।
इस भ्रष्टाचार की तह में जाने से पहले यह जान लें कि कोलाबा के जिस ब्लाक-4 पर यह भवन बना है, वह सेना के लिए रिज़र्व रखी गयी ज़मीन है, जिसे महाराष्ट्र सरकार को सांताक्रूज में वेस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे के लिए ली गयी ज़मीन के बदले में देना था। कोलाबा के ब्लाक-4 में ज़मीन का यह टुकड़ा सेना को इसलिए दिया जाना था, क्योंकि यहां पहले से नेवी का पश्चिमी कमान का आ$िफस और आवासीय परिसर विकसित हो रहा था। भूमि की इस अदला बदली के प्रस्ताव में यह बात भी कही गयी थी, अगर राज्य सरकार बदले में ज़मीन नहीं दे पाती है तो वह सेना को पैसा अदा करेगी। 1973 में इसी ब्लाक-4 पर बेस्ट को बस स्टैण्ड बनाने के लिए 5। 14 एकड़ ज़मीन दे दी गयी। क्योंकि सड़क का विस्तार होना था, इसलिए 200 फुट की सड़क के लिए जगह छोड़कर बेस्ट ने बस डिपो बना लिया। लेकिन मुश्किल वही, कि $खाली जगह और वह भी दक्षिण मुंबई के अति सिमटे हुए कोलाबा इलाके में, भला खाली कैसे बची रह सकती थी? इन्क्रोचमेन्ट होना शुरू हो गया, जिसे रोकने के लिए पेड़ पौधे लगाने का काम शुरू कर दिया गया। यहां यह याद रखिए अभी तक सेना को यह ज़मीन आधिकारिक तौर पर सौंपी नहीं गयी थी। 27 अक्टूबर 1996 को मेजर जनरल बी ए करियप्पा ने इस पार्क का उद्घाटन भी कर दिया। असली खेल इसके चार साल बाद शुरू हुआ।
2000 में राज्य सरकार ने एक प्रस्ताव पारित करके कोलाबा ज़ोन-4 में परेड ग्राउण्ड, हैलीपैड, बेस्ट बस डिपो और रहिवासी कालोनी को स्वीकृति दे दी। साथ ही 200 $फीट जगह का उपयोग करने के लिए प्रस्तावित सड़क को घटाकर 60 फुट का घोषित कर दिया। बस आदर्श हाउसिंग सोसायटी के लिए सरकार के आला अधिकारियों ने आदर्श स्थिति पैदा कर दी थी। अब सवाल यह है कि इसे किसका भ्रष्टाचार कहें? जब सेना को सरकार ने अभी तक ज़मीन सौंपी ही नहीं थी, तो भला सेना ने किस हैसियत से वहां हाउसिंग कालोनी बनाने का प्रस्ताव पेश कर दिया? राज्य सरकार ने भी जब ज़मीन सेना को देने के लिए सुरक्षित रखा था तो फिर सेना को देने की बजाय वहां हाउसिंग कालोनी के प्रस्ताव को स्वीकार कैसे कर लिया? क्या सेना के उच्चाधिकारियों, अ$फसरों और रक्षा मंत्री ने ज़मीन के इस टुकड़े के लिए भ्रष्टाचार किया? या फिर राज्य सरकार के अधिकारियों और नेताओं ने भ्रष्ट तरीके से अपने लिए प्राइम लोकेशन पर एक आशियाना तैयार कर लिया? आप $गौर से अगर पूरे घटनाक्रम पर नज़र दौड़ाएंगे तो पायेंगे, कि ज़मीन के इस टुकड़े पर बिल्डिंग खड़ी करने के लिए सेना और राज्य सरकार दोनों की ओर से भ्रष्टाचार किया गया। इस ज़मीन पर भवन बनाने के लिए जिसके पास से $फाइल गुज़री, उसने अपनी रात गुज़ारने की व्यवस्था कर ली। 2001 में जब सोसायटी बनाने के लिए आवेदन किया गया, तबसे लेकर सोसायटी को मंज़ूरी मिलने तक जहां जहां से $फाइल गुज़री उसके किसी न किसी रिश्तेदार, नातेदार का नाम बन रही बिल्डिंग में $फ्लैट पाने के लिए जुड़ गया।
इस बिल्डिंग को छह मंजि़ल से अधिक ऊंची उठने की परमीशन नहीं मिल सकती थी लेकिन यह बिल्डिंग 31 मंजि़ल तक उठती चली गयी। कोई भी जानना चाहेगा कि ऐसा क्यों और कैसे हो गया? मुंबई में भवन निर्माण के लिए जिस जादुई ए$फएसआई ($फ्लोर स्पेश इंडेक्स) की ज़रूरत है उसे बेस्ट की खाली पड़ी ज़मीन से लेकर पूरा कर लिया गया और भवन को 30 मीटर की जगह 100 मीटर से भी ऊंचा बना दिया गया। अब जरा देखिए कि कहां कहां किसने अपने नाम इस भवन में अपने लिए $फ्लैट सुरक्षित करवाया। पश्चिमी नेवल कमान के प्रमुख संजय भसीन ने नेवी ची$फ को लिखे जिस पत्र से इस भ्रष्टाचार की परतें उघडऩी शुरू हुई, ने अपनी चि_ियों में लिखा है कि सेना के सर्वोच्च सेनानायकों ने भी संसद को गुमराह किया है। 2003 में जब इस ज़मीन के मालिकाना हक के लिए संसद में तारांकित सवाल उठाया गया तब भी आला सैन्य अधिकारियों ने संसद को गुमराह किया था। गुमराह करने का परिणाम यह हुआ सेना के दो पूर्व आर्मी ची$फ एनसी विज और दीपक कपूर को इस सोसायटी में $फ्लैट मिल गया। संभवत: सेना को इसलिए उपकृत किया गया क्योंकि कानूनन यह ज़मीन सेना की नहीं थी, लेकिन सेना चाहती तो इस ज़मीन के आवंटन को रोकने के लिए सवाल उठा सकती, क्योंकि किसी भी सैनिक प्रतिष्ठान या हैलीपैड के आस पास इस तरह के भवन निर्माण को भी कानूनन इज़ाजत नहीं दी जा सकती। फिर भी सेना न सि$र्फ मौन रही, बल्कि उसने शहीद सेनानायकों की विधवाओं को $फ्लैट देने के नाम पर प्रस्ताव को मंज़ूर कर दिया। इसके बाद नगर विकास मंत्रालय के सचिव ने इस प्लान को मंज़ूर कर लिया, तो तत्कालीन सचिव पीवी देशमुख और रामानंद तिवारी के परिजनों का नाम भी इस सूची में जुड़ गया। जैसे-जैसे विभिन्न विभागों से मंज़ूरी मिल रही थी अ$फसर सोसायटी में सदस्यता ग्रहण करके अपनी चौथ वसूल रहे थे। मूल रूप से 40 $फ्लैट की इस सोसायटी में जब भ्रष्ट अधिकारियों के लिए जगह कम पडऩे लगी तो ए$फएसआई बढ़ाने की ज़रूरत महसूस हुई। इसके लिए बेस्ट की ए$फएसआई को इस्तेमाल करके भवन में 95 $फ्लैटों को मंज़ूरी मिल गयी। इसका पुरस्कार तत्कालीन बेस्ट जीएम उत्तम खोब्रागडे की बेटी देवयानी का नाम बतौर सदस्य इस सोसायटी में जुड़ गया। इसके आगे जब कोआपरेटिव हाउसिंग सोसाटयी को मंज़ूरी के लिए तत्कालीन कलेक्टर प्रदीप व्यास के पास भेजा गया तो उनकी आईएएस पत्नी सीमा व्यास का नाम जुड़ गया। सोसायटी को शैक्षणिक संस्था से जोडऩे के लिए तत्कालीन शिक्षा निदेशक जेएम अभ्यंकर के पास $फाइल पहुंची तो सोसायटी में बतौर सदस्य उनका भी नाम जुड़ गया। कोआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी थी इसलिए तत्कालीन सहकारिता मंत्री बाबा साहेब कुपेकर के लिए भी इस सोसायटी में एक $फ्लैट आरक्षित हो गया। हालांकि इस समय सारी चर्चा मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण के रिश्तेदारों के नाम आरक्षित $फ्लैट पर केन्द्रित हो गयी है और सीबीआई पता लगाएगी कि ज़मीन का मालिकाना हक आ$िखरकार किसके पास है और यहां जो भवन निर्माण हुआ है, उसके लिए कौन कौन कितनी मात्रा में जि़म्मेदार है? सवाल यह है कि सेना और सरकार के उच्च अधिकारियों की मिलीभगत से मुंबई के इस प्राइम लोकेशन पर जगह पाने के लिए जो भ्रष्टाचार किया गया, क्या केवल इसकी जांच करने मात्र से सेना और सरकार के अधिकारियों के पाप धुल जाते हैं? अगर ऐसा नहीं है, तो फिर उन दोषियों के लिए क्या सज़ा निर्धारित की जाएगी जो इस भ्रष्टाचार में शामिल पाये जाएंगे?
सीबीआई से भी झूठ बोला सरकार ने
महाराष्ट्र सरकार के असहयोग के कारण आदर्श सोसाइटी घोटाले की जांच शुरू नहीं हो पा रही है। सीर्बीआई ने लगभग एक महीने पहले महाराष्ट्र सरकार से आदर्श सोसाइटी के लिए सेना के ज़मीन के आवंटन से संबंधित का$गज़ात मांगे थे, लेकिन अब तक वे सीबीआई को नहीं दिए गए हैं। सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इन का$गज़ात के मिलने के बाद ही जांच शुरू हो पाएगी। इस घोटाले में $खुद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण का नाम सामने आया है। सीबीआई के मुंबई ब्रांच के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि आदर्श सोसाइटी घोटाले की जांच के लिए सेना की ओर से अनुरोध आ चुका है। इसके बाद सीबीआई ने महाराष्ट्र सरकार के संबंधित विभागों से इस सोसाइटी को मंज़ूरी दिए जाने संबंधित सभी का$गज़ात मांगे थे, जिससे आरोपों की पड़ताल कर दोषी अधिकारियों के $िखला$फ ए$फआइआर दर्ज की जा सके लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने अभी तक सीबीआई को ये का$गज़ात नहीं सौंपे। सीबीआई के उक्त वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार से का$गज़ात मिलते ही जांच शुरू कर दी जाएगी। उनके अनुसार इस मामले में जांच शुरू करने के लिए राज्य सरकार की अनुशंसा की ज़रूरत भी नहीं है, क्योंकि यह ज़मीन सेना की थी और सेना से संबंधित मामलों की जांच सीबीआई के अधिकार क्षेत्र में आती है। सीबीआई अगले ह$फ्ते एक बार फिर राज्य सरकार को ये का$गज़ात जल्द उपलब्ध कराने के लिए कहेगी।
सलाम लेने वाले सलाखों के पीछे!
आदर्श सोसायटी के आदर्श घोटाले में कुल मिला कर बहुत सारी बहुएं और पत्नियां शामिल हैं और उन्हें अगर अभियुक्त का दर्जा दे दिया गया, तो देश के बहुत सारे वीआईपी अपनी पत्नियों के ज़मानत करवाते नज़र आएंगे। आदर्श सोसाइटी विवाद मामले में सेना के अ$फसरों पर लगे आरोप पर सेना ने कोर्ट ऑ$फ इंक्यारी का आदेश दे दिया है। अधिकारियों की आय की भी जांच की जाएगी। इस मामले में पूर्व सेनाअध्यक्ष दीपक कपूर, एन सी विज समेत सेना के कई बड़े ऑ$िफसर जांच के दायरे में होंगे। आदर्श सोसाइटी घोटाले में महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री के अलावा महाराष्ट्र के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के नाम भी सामने आए हैं। इस मामले में लगातार नए-नए खुलासे हो रहे हैं। महाराष्ट्र के तीन पूर्व मुख्यमंत्री और चार मंत्रियों ने करगिल के शहीदों के हक पर डाका डाला है। इन पर आरोप है कि शहीदों की ज़मीन पर तैयार $फ्लैट अपने चहेतों को दिलवा दिए। इसके अलावा महाराष्ट्र के पांच मंत्रियों ने भी करगिल के शहीदों के हक पर डाका डाला। शरद पवार के भतीजे और महाराष्ट्र सरकार में जल संसाधन मंत्री अजीत पवार पर अपने दो करीबियों को आदर्श सोसाइटी के $फ्लैट दिलाने का आरोप है। गृह मंत्री आर। आर। पाटिल, खाद्य और नागरिक आपूर्त मंत्री अनिल देशमुख, वन मंत्री पतंगराव कदम और तत्कालीन राजस्व मंत्री शिवाजी राव निलांगेकर भी आरोपों के घेरे में है। इस महाघोटाले में अब तक महाराष्ट्र के 8 बड़े राजनेताओं के नाम सामने आ चुके हैं। इसमे पहला नाम महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख का है। देशमुख ने अपने 3 करीबियों को $फ्लैट दिलाए।
उन्होंने उत्ताम घाकरे, किरण भडांगे, और अमोल करभानी को $फ्लैट दिलाने की सिफारिश की। देशमुख ने ही आदर्श सोसाइटी को पर्यावरण और दूसरी मंज़ूरी दी थी। दूसरा नाम महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे का है। राणे ने अपने 2 करीबियों को $फ्लैट दिलाए। राणे ने गिरीश मेहता और रुपाली राव राणे को $फ्लैट दिलवाए। राणे 1999 में मुख्यमंत्री थे। 1999 में उन्होंने आदर्श सोसाइटी को पहली मंज़ूरी दी। तीसरा नाम सुशील कुमार शिंदे का है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शिंदे पर अपने एक करीबी मेजर खानकोजे को $फ्लैट दिलाने का आरोप है। इसके अलावा 2004 में मुख्यमंत्री रहे शिंदे ने आदर्श सोसाइटी को अंतिम मंज़ूरी भी दी थी। आदर्श सोसाइटी घोटाले में $खुलासे के बाद दिल्ली में कांग्रेस कार्यालय में राजनीतिक और कुटनीतिक हलचले तेज़ हो गई हैं। सूत्रों का कहना है कि घोटाले में शामलि लोगों की $फेहरिस्त का$फी लंबी है। अब तो कांग्रेस में वैसे लोगों की खोज की जा रही है जो इस घोटाले में शामिल नहीं है। सूत्रों की मानें तो सोनिया गांधी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए ही दो लोगों की कमेटी जांच के लिए बनाई है। ये कमेटी सि$र्फ महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण की संलिप्त होने की ही जांच नहीं करेगी। बल्कि तीन पूर्व मुख्यमंत्री सहित 4 मंत्रियों के संलिप्त होने की जांच भी करेगी। सूत्रों की मानें तो वित्ता मंत्री प्रणब मुखर्जी और ए.के. एंटनी एक समग्र रिपोर्ट तैयार करेंगे। इस घोटाले के बाद सवाल उठने लगा है कि क्या विपक्ष चव्हाण को ही निशाने पर लेगी या पूरे घोटाले बाज़ों पर भी निशाना लगाएगी। वहीं अपने नज़दीकी को $फायदा दिलाने के सवाल पर महाराष्ट्र के वन मंत्री पंतग राव देशमुख ने कहा कि मेरा इस घोटाले से कोई लेना देना नहीं है। मैने किसी की भी सि$फारिश नहीं की। मैं सारे तथ्य सीबीआई के सामने रखूंगा।


शिवराज निपटाएंगे अपने गृह विभाग को
मुख्यमंत्री के निर्देशों को लंबे समय से दबाकर बैठे गृह विभाग की कार्यप्रणाली सोमवार को निशाने पर आ सकती है। मुख्यमंत्री एक नवंबर को पुलिस के कामकाज की समीक्षा करेंगे। इसकी तैयारी शुरू होते ही मंत्रालय से लेकर पुलिस मुख्यालय तक रविवार को भी गहमागहमी का माहौल बना रहा। साथ ही दिन भर लंबित मामलों को निपटाने के प्रयास चलते रहे। जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री श्री चौहान की सर्वाधिक नाराजगी का सामना गृह व वित्ता विभाग के अ$फसरों को करना पड़ सकता है। इसकी पहली वजह तो बनेगा प्रस्तावित सुरक्षा एक्ट। मुख्यमंत्री की प्राथमिकता के बावजूद प्रदेश के महत्वपूर्ण स्थलों की सुरक्षा से जुड़े इस एक्ट के मसौदे को गृह विभाग लंबे समय से दबाकर बैठा है। पुलिस मुख्यालय द्वारा तैयार इस एक्ट को विभाग अब तक सचिव स्तर की कमेटी के सामने ही नहीं रख पाया है। जबकि इसे अमली जामा पहनाते हुए जल्द से जल्द हाईपावर कमेटी के साथ ही केबिनेट के सामने रखा जाना था। इसके तहत हाईराइज़ बिल्डिंग, मॉल, बड़े-बड़े शोरूम व निजी द$फ्तरों की सुरक्षा की गारंटी इनके प्रबंधन को ही लेना होगी। विभाग में लगभग यही स्थिति मुख्यमंत्री के अधिकांश आदेश-निर्देशों की बनी हुई है। मुख्यमंत्री अब तक पुलिस से जुड़े मुद्दों पर डेढ़ दर्जन निर्देश दे चुके हैं। इनमें से महज़ तीन पर ही विभाग और पीएचक्यू अमल कर सका है। पदों की वृध्दि, केवल थानों के लिए पुलिस बल तथा भूतपूर्व सैनिकों की बटालियन के गठन के ही आदेश विभाग से निकले हैं। शेष पंद्रह पर विभाग को जवाब देना पड़ सकता है। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री द्वारा इस बैठक में मंथन के अलावा अब तक दिए गए सभी निर्देशों की समीक्षा की जाएगी। साथ ही पुलिस बल व सुविधाओं के युक्तियुक्तकरण तथा गंभीर अपराधों की भी समीक्षा की जाना है। इन सभी को लेकर मंत्रालय से ऊपर से नीचे तक अधिकारी अवकाश के दिन भी माथापच्ची में जुटे रहे। इसके चलते मंत्रालय और पुलिस मुख्यालय के बीच भी दौड़भाग बनी रही।

Saturday, October 30, 2010


दिग्विजय सिंह ने कैसे निपटाया लालू को ?
हाल ही में बिहार विधानसभा चुनावों के जो सर्वे सामने रहे हैं, उससे साफ़ होने लगा है कि इस बार भी लालू प्रसाद यादव का चमत्कार चलने नहीं वाला है। एक सर्वेक्षण के अनुसार इस बार जो परिदृश्य सामने रहा है, उसमें चौंकाने वाले नतीजे ही सामने रहे हैं। सभी सर्वेक्षणों को मिला लिया जाए तो जो स्थिति बनती है, उसके अनुसार इस बार जनता दल यूनाईटेड और भारतीय जनता पार्टी की जुगलबंदी वापस लौट सकती है।
हृ लिमटी खरे
देश के हृदय प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री रहे सुंदर लाल पटवा ने कांग्रेस के वर्तमान महासचिव और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री के बारे में कहा था, कि दिग्विजय शोध का विषय हैं। भाजपा के वयोवृध्द और अनुभवी नेता सुंदर लाल पटवा की बात आज भी अक्षरश: सत्य ही साबित होती दिखती है। कहा जाता है कि राजा दिग्विजय सिंह जिसके कंधे पर हाथ रख दें, उसका विनाश सुनिश्चित है। कांग्रेस आलाकमान ने राजा दिग्विजय सिंह को बिहार की कमान सौंपी और बिहार से लालू प्रसाद यादव का सफ़ाया हो गया। साल दर साल बिहार पर राज करने वाले लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल का बिहार में अब नामलेवा नहीं बचा है। कल तक स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव को तो केंद्र में और ही अपने सूबे में ही आधार मिल पा रहा है। बिहार में वैसे भी बाहुबलियों का राज रहा है। कांग्रेस ने ही इन बाहुबली, धनपति, अपराधियों को प्रश्रय देकर बिहार की राजनति को प्रदूषित कर दिया है। क्षेत्रवाद, भाषावाद की राजनीति के चलते बिहार के लोगों को महाराष्ट्र विशेषकर मुंबई से वापस भागने पर मजबूर होना पड़ रहा है। केंद्र और मध्य प्रदेश में कांग्रेसनीत सरकारें सत्ताारूढ हैं, फिर भी बिहार के लोगों को संरक्षण मिल पाना निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए डूब मरने की बात है, क्योंकि बिहार ही एसा प्रदेश है जिसने देश के पहले राष्ट्रपति डॉ। राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण जैसी विभूतियां दी हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के पहले चरण में कांग्रेस को केंद्र में सरकार बनाने में पसीना गया था। उस वक्त कांग्रेस ने चारा घोटाला के प्रमुख आरोपी लालू प्रसाद यादव को अपने साथ मिलाकर नैतिकता की समस्त वर्जनाएं तोड दी थीं। संप्रग के पहले कार्यकाल में लालू प्रसाद यादव ने रेल्वे मंत्रालय लेकर कांग्रेस पर ख़ासा दवाब बनाया था। इस कार्यकाल में लालू प्रसाद यादव ने रेल्वे को फ़ायदे में लाने की बात कहकर $खुद को स्वयंभू प्रबंधन गुरू के तौर पर स्थापित कर लिया था। इस कार्यकाल में लालू यादव ने देश विदेश के आला दर्जे के मेनेजमेंट कालेजों में जाकर व्याख्यान भी दिए थे। लालू यादव ने दबाव बनाकर कांग्रेस को बहुत ही हलाकान कर दिया था। यहां तक कि लालू के ऊपर चारा घोटाले के आरोप में जब भी सीबीआई का दबाव कांग्रेस ने बनाया तब तब लालू यादव और अधिक ताकतवर होकर उभरे थे। आलम यह था कि कांग्रेस के हर हथकंडे पूरी तरह से फ़्लाप ही साबित हुए। थक हारकर जब आलाकमान ने बीसवीं सदी में कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह को लालू यादव को साईज़ में लाने का काम सौंपा, तब जाकर कांग्रेस को चैन आया। राजा दिग्विजय सिंह ने अपने सधे कदमों से बिहार में कांग्रेस का ग्राफ़ उंचा करने और लालू प्रसाद यादव के कद को कम करने के प्रयास आरंभ कर दिए। पिछले विधानसभा चुनावों के बाद लोकसभा चुनावों में भी लालू यादव को गहरा झटका लगा। इसके बाद संप्रग की दूसरी पारी में कांग्रेस ने लाल यादव के कुशल प्रबंधन को दर किनार करते हुए मंत्रीमण्डल से बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब लालू यादव अर्श से उतरकर फ़र्श पर गए हैं। कल तक कांग्रेस की कालर पकड़कर धमकाने वाले लालू यादव आज कांग्रेस के साथ बातचीत करने की स्थिति तक में नहीं रह गए हैं, यह सब राजा दिग्विजय सिंह की नीतियों का पुण्य प्रताप ही माना जा सकता है। हाल ही में बिहार विधानसभा चुनावों के जो सर्वे सामने रहे हैं, उससे साफ़ होने लगा है कि इस बार भी लालू प्रसाद यादव का चमत्कार चलने नहीं वाला है। एक सर्वेक्षण के अनुसार इस बार जो परिदृश्य सामने रहा है, उसमें चौंकाने वाले नतीजे ही सामने रहे हैं। सभी सर्वेक्षणों को मिला लिया जाए तो जो स्थिति बनती है, उसके अनुसार इस बार जनता दल यूनाईटेड और भारतीय जनता पार्टी की जुगलबंदी वापस लौट सकती है। बिहार की 243 सीटों में से जदयू और भाजपा की सरकार को पिछले बार की 143 के मुकाबले 27 सीटें ज्य़ादा मिल सकती हैं। इसका आंकड़ा 170 को पार करने की उम्मीद जताई जा रही है। दूसरे नंबर पर लालू यादव की राजद और राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी है, जिसे पिछली बार मिली 64 के मुकाबले 34 सीटें ही मिलने की उम्मीद है। कांग्रेस इस बार कुछ फ़ायदे में दिख रही है। कांग्रेस को इस बार 09 के स्थान पर 22 सीटें मिलने की आशा है। चौथे स्थान पर अन्य दलों के रहने की संभावना है। पिछली बार 13 के मुकाबले इस बार इसका आंकड़ा नौ तक सिमट सकता है। बसपा इस बार 04 के स्थान पर महज 02 सीट ही पा सकती है। निर्दलीयों की संख्या भी इस बार कम होने की उम्मीद है। पिछली मर्तबा निर्दलीय की संख्या 10 थी जो घटकर 06 हो सकती है। बिहार चुनाव 24 नवंबर को पूरे हो जाएंगे। सुरक्षा और निष्पक्षता को ध्यान में रखकर बिहार में चुनाव : चरणों में कराने का फ़ैसला लिया गया है। वैसे भी बिहार में धनबल और बाहूबल (मस्सल पावर) का ज़लज़ला सदा से ही रहा है। इस बार के चुनावों में राजद के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव बहुत ज्य़ादा अपसेट दिखे वे अपने ही कार्यकर्ताओं को गरियाते पाए गए। इससे साफ हो जाता है, कि लालू यादव को कांग्रेस विशेषकर राजा दिग्विजय सिंह ने इस कदर हलाकान कर रखा है, कि वे अपना आपा खोते जा रहे हैं। उधर सधी राजनीतिक पायदानों को चलते हुए राजा दिग्विजय सिंह द्वारा कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का आभा मण्डल बिहार में भी बिखेरने का प्रयास किया जा रहा है। नेशनल मीडिया को भी इसके लिए पूरी तरह मैनेज करने की तैयारी की जा रही है। कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की बिहार यात्राओं के कवरेज के लिए कांग्रेस ने पूरा पूरा सकारात्मक एंगल भी सुनियोजित कर लिया है, ताकि राहुल गांधी को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित किया जा सके। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी ने भी बिहार को अब तक केंद्र सरकार द्वारा दी गई करोड़ों अरबों रूपयों की इमदाद के बारे में पूछकर थमे हुए पानी में कंकर मार दिया है, जिसकी प्रतिक्रिया बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। उधर बिहार मूल के मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष प्रभात झा ने कहा है कि बिहार को मिली केंद्रीय मदद कांग्रेस की बपौती नहीं, बिहार का हक था। लोगों का मानना है कि बिहार को अब तक पांच सालों में दी गई राशि का हिसाब किताब पूछने की ज़हमत कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी अब क्यों उठा रही हैं। क्या पिछले पांच सालों में उन्हें इस बारे में मालूमात करने की $फुर्सत नहीं मिली? अब, जब चुनाव सर पर हैं तब आना पाई से हिसाब किताब करने का क्या औचित्य? क्या यह पूछ परख राजनैतिक षडय़ंत्र का हिस्सा नहीं है? बिहार का पिछड़ापन किसी से छिपा नहीं है। बिहार में अब तक जंगलराज की स्थापना ही हुई है। पिछले पांच सालों में इस जंगल राज को पटरी पर लाने में नितीश कुमार की सरकार बहुत ज्य़ादा नहीं, पर कुछ हद तक तो कामयाब रही है। बिहार के लोगों को लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी के राज के कुशासन और नितीश कुमार के राज में सुशासन का अंतर अवश्य ही समझ में आया होगा। बिहार में जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के अग्रणी नेता रहे शरद यादव, लालू प्रसाद यादव, नितीश कुमार, राम विलास पासवान, सुबोध कांत सहाय आदि ही एक मतेन नहीं हो पा रहे हों, तो किस पर दोषारोपण किया जाए। उधर महाराष्ट्र और दिल्ली में रोज़ी रोटी कमाने गए बिहार के बाशिंदों को दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित तो महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे और शिवसैनिकों के कोप का भाजन होना पड़ा। राज ठाकरे के फऱमान के आगे बिहार के बाशिंदे डरे सहमे रहे, किन्तु भारत गणराज्य में कांग्रेस नीत प्रदेश और केंद्र सरकार राज ठाकरे के आगे पूरी तरह बेबस नजऱ आई। तो प्रधानमंत्री, ही सोनिया गांधी और ही सूबे की सरकार ने राज ठाकरे की मुश्कें कसने का उपक्रम किया। कुल मिलाकर बिहार के लोगों के घाव रिसते रहे और कांग्रेस ने उनके घावों पर मरहम लगाने के बजाए चुप्पी साधकर नमक छिड़कने का ही काम किया। बिहार में जातिवाद बहुत अधिक हावी है। यहां ठाकुर, भूमिहार ब्राम्हण, लाला, कुर्मी आदि अनेक जातियों के बीच रार किसी से छिपी नहीं है। राजनैतिक दल भी जातिवाद को हवा देकर उसी जात के उम्मीदवार को मैदान में उतारती है, जिस जाति के लोगों का उस निर्वाचन क्षेत्र में आधिक्य होता है। बिहार तपोभूमि कही जाती रही है। यहां गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी की अनमोल वाणियां गुंजायमान होती रही हैं, विडम्बना ही कही जाएगी कि आज इन अनमोल वाणियों के बजाए लोगों के बीच _, गालियों, गोलियों की आवाज़ें गूंज रही हैं। दुख तो तब होता है जब सच्चाई सामने आती है कि देश पर आधी सदी से ज्य़ादा समय तक शासन करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस ने केंद्र में सत्ता की मलाई चखने की गऱज़ से बिहार को आताताईयों, सांप्रदायिक उन्माद फैलाने वाली जातिवाद की पोषक ताकतों के हवाले कर दिया। बिहार में कांग्रेस का ग्राफ भले ही चंद फीसदी उठता दिख रहा हो, किन्तु यह भी सच है कि बिहार में कांग्रेस का नामलेवा अब नहीं बचा है।
चुनाव के दरम्यान आरोप प्रत्यारोप नेताओं का पुराना शगल रहा है। युवराज राहुल गांधी, विदेश मूल की भारतीय बहू सोनिया गांधी आदि के आकर्षण और चुनावी धुन तरानों के बीच भीड़ तो इक_ की जा सकती है, किन्तु इस भीड़ को वोट में तब्दील करना बहुत ही दुष्कर काम है। सोनिया, राहुल या सुषमा स्वराज अपने उद्बोधनों में एकाध लाईन बिहारी में बोलकर तालियों की गडग़ड़ाहट तो बटोर सकतीं हैं, किन्तु यह वोट में तब्दील हो, यह बात मुश्किल ही लगती है। बिहार के लोग परिश्रमी होते हैं, समझदार होते हैं, वे जानते हैं कि रोज़ी रोटी के जुगाड़ में जब वे मुंबई दिल्ली जाते हैं तो उन्हें बिहारी कहकर बेईज्जत किया जाता है। उनके साथ मारपीट की जाती है। उन्हें जबरन धकियाकर भगाया जाता है, पर यह सब कुछ देखने सुनने के बाद भी राजनैतिक दल और उनके राजनेताओं के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। चुनाव सर पर हैं, बिहार के लोगों का अपना आंकलन होगा, किसकी सरकार बने या बने, यह फ़ैसला बिहार की जनता को ही करना है, किन्तु राजनेताओं को चाहिए कि भारत के संविधान के अनुरूप देश की एकता अखण्डता बनी रहे, इस दिशा में अवश्य ही प्रयास करें, अन्यथा आने वाली पीढ़ी उन्हें शायद ही माफ कर पाए।


कारगिल के शहीदों को शानदार श्रद्धांजलि ?
कारगिल के नाम पर महाघोटाला

हृ सुप्रिया रॉय
नई दिल्ली/ मुम्बई। कारगिल में ऑपरेशन विजय के सफल होने के ग्यारह साल बाद कारगिल के शहीदों के नाम पर हुआ एक बहुत बड़ा घोटाला सामने आया है। ये घोटाला मुंबई से पकड़ में आया है, जहां सबसे महंगे इलाके दक्षिण मुंबई के कोलाबा में कारगिल के शहीदों के लिए एक मल्टी स्टोरी इमारत बनाई गई थी, ताकि उनका सम्मान किया जा सके, और उनके परिवारों को एक इज्ज़तदार जगह मिल सके। इस सोसायटी का नाम भी आदर्श कॉपोरेरिट हाउंसिंग सोसायटी रखा गया था। कांग्रेस के दो मुख्यमंत्रियों ने विशेष तौर पर ज़मीन आवंटित करने का ऐलान किया था और अनुमति दी थी और यह वह इलाका है जहां हज़ार वर्ग फ़ीट का घर पांच करोड़ रुपए में आता है। मुंबई के इस महंगे इलाके में कारगिल के शहीदों के सम्मान के लिए कोलाबा के सैनिक कॉम्पलेक्स से छह हज़ार चार सौ पचास वर्ग मीटर जमीन ली गई। वैसे इस जमीन का असली मालिक कौन है, इसको ले कर भी असली झगड़ा है। नौसेना और राज्य सरकार दोनों अपनी अपनी दावेदारी पेश करती हंै। मगर शहीदों के नाम पर यह ज़मीन आसानी से मिल गई और इसके बाद शर्मनाक घपला शुरू हुआ। आज 104 सदस्य इस सोसायटी के हैं, इसके सदस्यो में भूतपूर्व नगर निगम आयुक्त जयराज पाठक के बेटे कनिष्क खाद्य और दवा आयुक्त सीमा ब्यास जो भारत के वित्त सचिव प्रदीप ब्यास की पत्नी भी है, मुंबई के कलेक्टर इदेज कुंदन और शहरी विकास मंत्रालय के भूतपूर्व उप सचिव पीवी देशमुख शामिल थे। नेताओं ने भी शहीदों के नाम पर घास काटे। जिनके नाम सामने आए हैं उनमें कांग्रेस के विधायक कन्हाई लाल गिडवानी, एनसीपी के विधायक जितेंद्र अवहद, विधानसभा के भूतपूर्व अध्यक्ष बाब साहब कूपेकर, सुरेश प्रभु और एनसीपी के सांसद श्रीनिवास पाटिल शामिल हैं। बाज़ार भाव से बहुत कम यानी दस करोड़ रुपए में यह प्लॉट सोसायटी को मिल गया और इलाके के भूमि उपयोग के सारे नियम बदल दिए गए। रक्षा मंत्रालय जांच करवाने पर पाया गया कि एक $फ्लेट महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री अशोक चव्हान की सवर्गीय सास भगवती मोहनलाल शर्मा के नाम पर है। कारगिल के शहीदों को इससे शानदार श्रध्दांजलि क्या हो सकती थी? जिनमें भूतपूर्व नौ सेनाअध्यक्ष एडमिरल माधवेंद्र सिंह, भूतपूर्व उर्जा मंत्री और शिवसेना के सांसद सुरेश प्रभु, एक भूतपूर्व पर्यावरण मंत्री, कई सांसद और कई बड़े अफ़सर हंै, जिन्होंने कारगिल की लड़ाई सिफऱ् टीवी पर देखी होगी। सबके पास अपने अपने तर्क हैं और नौसेना और मुंबई महानगर क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण ने इस इमारत को अपनी अंतिम अनुमति दे दी है। पिछले छह वर्षों में सोसायटी की कमेटी वाले कारगिल के नाम पर वे सारी अनुमतियां ले गए, जिन्हें पैसा खिला कर भी बिल्डरों को कम से कम दस साल लग जाते हैं। सोसायटी को अनुमति विलास राव देशमुख और सुशील कुमार शिंदे दोनों ने दी थी।

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