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Friday, June 25, 2010





कब रुकेगा इज्ज़त की खातिर हत्याओं का सिलसिला

Justify Full राजेश सिंह
दिल्ली के अशोक विहार में कुलदीप और मोनिका की जघन्य हत्या कर दी गयी। इज्ज़्ात के $खातिर मौत देने का सिलसिला आ$इकहर कब रुकेगा? आ$िखर कब तक मान सम्मान के नाम पर युवाओं की हत्या होती रहेगी ? कौन है ! जो इस जघन्य कृत्य को चुनौती देने की हिम्मत करेगा ? इसका जवाब कानून नहीं है, इसका जवाब हम सभी को अपने आप से पूछना है, इस समाज से पूछना है, जिसके बीच हम रहते हंै। इज्ज़त के $खातिर मौत (ऑनर किलिंग) का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है। यह सब सम्मान के नाम पर हो रहा है। सम्मान के नाम पर प्रति वर्ष सैंकड़ों युवक और युवतियों को मौत के घाट उतारा जा रहा है। देश में हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान ऐसे राज्य हंै जहां से लगातार ऑनर किलिंग की घटनाएँ सामने आ रही हैं। बीते रविवार जून 20 को दो प्रेमी जोड़े को ऑनर किलिंग के भेट चढ़ा दिया गया यह घटना दिल्ली में कुलदीप और मोनिका के साथ तथा हरियाणा में रिंकू और मोनिका के साथ घटी। दिल्ली के अशोक विहार में कुलदीप और मोनिका की जघन्य हत्या कर दी गयी, वहीं हरियाणा के भिवानी में रिंकू और मोनिका की हत्या कर फाँसी पर लटका दिया गया।
इसी बीच महिलाओं और बच्चों के हितों के लिए काम करने वाले $गैर सरकारी संगठन [एनजीओ] शक्ति वाहिनी द्वारा दायर की गयी जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय नें का$फी सख़्त रूख अपनाते हुए केंद्र सरकार और 8 राज्य सरकारों को नोटिस भेजा है। उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा और न्यायाधीश ए.के. पटनायक ने केन्द्र तथा हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखण्ड, बिहार, हिमांचल प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारों को जवाब-तलब किया है। $गैर सरकारी संगठन शक्ती वाहिनी नें उक्त जनहित याचिका के माध्यम से आरोप लगाया था, कि केंद्र और राज्य सरकारें इस तरह के अपराधों के रोकथाम के लिए कोई कदम नहीं उठा रही हैं। और न ही ऐसे प्रेमी जोड़ों को सुरक्षा देने के लिए कोई पॉलिसी या मैकेनिज़्म तैयार कर रही हैं।
$गैर सरकारी संगठन नें जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य सरकारें इस अपराध को चुप्पी साधे मूक दर्शक की तरह देख रही हैं । इनके $िखला$फ कानून बनाये जाने के बारे में भी कोई कदम नहीं उठा रही हंै । याचिका के माध्यम से $गैर सरकारी संगठन के वकील रविकांत ने मांग की है कि सरकारें इस बाबत तैयार की गई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय योजना का खुलासा करें। साथ ही सरकारें ऑनर किलिंग के रोकथाम और इसे बढ़ावा देनें वालों (खाप पंचायतों तथा अन्य) के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने हेतु प्रभावित राज्यों के प्रत्येक जि़लों में एक स्पेशल सेल बनाएं जहां ऐसे नव विवाहित युवा जोड़े अपनी सुरक्षा के लिए गुहार कर सकें, तथा ऑनर किलिंग रोकनें में मदद मिल सके। इस याचिका में केंद्र सरकार की ओर से केंद्रीय गृह मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को पक्षकार बनाया गया है।
इस मामले पर पत्रकारों से बात करते हुए केन्द्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोईली नें बताया है कि केंद्र सरकार अगले माह संसद के मानसून सत्र में ऑनर किलिंग मामले पर एक विधेयक लाने पर विचार कर रही है। वीरप्पा मोईली नें बताया है कि इस विधेयक का प्रारूप तैयार कर लिया गया है। इस विधेयक में कई धाराओं को संशोधित कर दोषियों को उचित और आवश्यक सज़ा देनें के प्रावधान को उल्लेखित किया गया है। उन्होंने कहा है कि इस विधेयक के लागू हो जाने
पर ऑनर किलिंग को रोकने में का$फी मदद मिलेगी। ऑनर किलिंग के लिए पूरी पंचायत को दोषी ठहराने संबंधी कानून का समावेश इस विधेयक में होना लगभग तय माना जा रहा है।
ऑनर किलिंग केवल भारत की ही समस्या है, ऐसा नहीं है। यह एक वैश्विक समस्या है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ नें संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष नामक एक रिपोर्ट जारी की थी। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि विश्व में 5000 से भी अधिक प्रेमी जोड़े ऑनर किलिंग के शिकार हो जाते हंै। कई पश्चिमी देशों में ऑनर किलिंग की घटनाएँ देखने को मिल रही हैं। इसमें फ्ऱांस, जर्मनी, ब्रिटेन आदि देश शामिल हैं। यह बात दीगर है कि यहां दूसरे देशों से आने वाले समुदाय के लोग ही ऑनर किलिंग के शिकार होते हंै। भारत के आलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश, इजिप्ट, लेबनान, टर्की, सीरिया, मोरक्को, इक्वाडोर, युगांडा, स्वीडन, यमन, तथा खाड़ी के देशों में ऑनर किलिंग जैसे अपराध प्रचलन में हैं। दरसल सगोत्रीय और अंतरजातीय विवाह ही इस ऑनर किलिंग समस्या की जड़ में है। उत्तर भारत में सामाजिक मान्यता है कि सगोत्रीय और अंतरजातीय विवाह नहीं होने चाहिए। यहां समान गोत्र में विवाह परंपरा के विरुद्ध माना जाता है, तो अंतरजातीय विवाह अपराध. सवाल यह है कि अगर एक गोत्र के लड़कों को भाई-बहन माना जाय तो फिर अंतरजातीय विवाह से क्या समस्या है? समाज को दोनों से ही समस्या है।
अगर एक सगोत्रीय परिवार के युवा आपस में विवाह करते है तो पंचायतें उन युवाओं की हत्या का $फतवा जारी कर देती है, साथ ही उन युवाओं के परिवारों से सजातीय समाज द्वारा रोटी-बेटी का संबंध तोड़ लेने की चेतावनी दी जाती है। वहीं अंतरजातीय विवाह करने वाले युवाओं के परिवारों को क्रूर सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है । इस स्थिती में सामाजिक बहिष्कार का दंश झेल रहा परिवार (जिसमें परिवार के अन्य युवाओं की सजातीय विवाह रुक जाना भी शामिल है) इस स्थिती के लिए अपने ही बच्चे को दोषी मानने लगता है, और मौ$का मिलने पर ऑनर किलिंग जैसा जघन्य अपराध कर बैठता है । सगोत्रीय विवाह के बारे में कुछ लोगों का त$र्क है कि हिन्दू धर्म के लोगों की पहचान गोत्र से होती है। इसका मतलब यह निकाला जाता है कि एक गोत्र के सभी लोग एक परिवार के होते है । वे इस मामले में विज्ञान का हवाला देते हुए कहते हंै कि एक गोत्र का मतलब जेनिटिक्स समानता । अगर एक ही परिवार या गोत्र में विवाह होता है तो उनके बच्चों में जेनिटिक्स विकृतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। यह तर्क सगोत्रीय विवाह के विरोधियों का है किन्तु इस तरह का कोई वैज्ञानिक शोधपत्र अभी तक तो सामने नहीं आया है। दरसल ऑनर किलिंग समस्या का एक बड़ा कारण राजनैतिक है। अपने वोट बैंक को मज़बूत करने के $खातिर राजनैतिक पार्टियों और राजनेताओं द्वारा देश में जातीयता को बढ़ावा दिया जा रहा है। सगोत्रीय विवाह के सवाल पर रोहतक में हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा खाप पंचायतों के साथ खड़े नज़र आते हंै और खाप पंचायतों को $गैर सरकारी संगठन साबित करते हंै। तो कहीं नवीन जिंदल हिन्दू विवाह कानून में संशोधन कर सगोत्रीय विवाह पर रोक लगाने जैसी खाप पंचायतों की मांग को पार्टी में उठाने का आश्वासन देते नज़र आते हैं। अगर यह सिलसिला रोकना है तो हमें अपने आप को बदलना होगा, रूढि़वादिता के चंगुल से स्वयं को और समाज को छुड़ाना होगा, जातिवाद के दलदल से बाहर आकर, ऊँच-नीच के भेद-भाव को ख़त्म करना होगा, और सबसे बड़ी बात तो यह है कि उन परिवारों को भरोसा देना होगा कि अगर तुम्हारे बच्चे सगोत्रीय या अंतरजातीय विवाह करते हैं तो तुम्हें अपने समाज में सामाजिक बहिष्कार का दंश नहीं झेलना होगा। परिवार के दूसरे बच्चे के विवाह को लेकर सजातीय बहिष्कार नहीं किया जायेगा। तुम्हें किसी तरह की छींटाकशी और तानाकशी का सामना नहीं करना पड़ेगा। अगर हम यह सब नहीं कर पाए तो शायद आने वाला विधेयक या कानून भी ऑनर किलिंग पर लगाम लगाने में सक्षम नहीं होंगे?



ऐसे बनेगा स्वर्णिम मध्यप्रदेश
भगवान दुबे बालाघाट। मध्यप्रदेश शासन के मुख्यमंत्री भी शिवराज सिंह चौहान द्वारा मध्यप्रदेश को स्वर्णिंम म.प्र. बनाने का जो सपना देखा जा रहा है वह तभी संभव होगा जब वारासिवनी में इस प्रदेश की समस्या और आवश्यकता को ध्यान में रखकर कार्य किया जाये। आज हम अपने प्रदेश की समस्या की बात करें तो सबसे बड़ी समस्या जो कि बिजली की है सबसे पहले प्रदेश के लोगों को बिजली पर्याप्त मात्रा मेें उपलब्ध कराये क्योंकि बिजली के कारण उद्योग धंधे, कृषि एवं बच्चों की शिक्षा पूरी तरह से प्रभावित हो रही है। साथ में अंधेरे में अपराध भी बढ़ते हैं तो सबसे पहले हमारी सरकार को बिजली की पर्याप्त आपूर्ति प्रदान करें। फिर बात करे पानी जो कि मनुष्य के जीवन के लिए नितांत आवश्यकता है। आज प्रदेश के अंदर पानी की इतनी बदतर स्थिति है कि आये दिन लोगों के सर फूट रहे हंै, जान जा रही है अत: प्रदेश सरकार यहां की जनता को पानी उपलब्ध कराये। अब हम सड़क की बात करें तो प्रदेश के अंदर सड़कों का कार्य बहुत तेज़ी से हो रहा है एवं आज प्रदेश के लगभग सभी गांव सड़कों से जुडऩे लगे हैं, किंतु होता ये है कि साल छह महीने के अंदर रोड खुद जाती है, गढ्डे पड़ जाते हैं, जिसके कारण रोडों की स्थिति फिर से वैसी ही हो जाती है अत: प्रदेश सरकार ठेकेदारों पर शिकंजा कसे एवं गुणवत्ता को ध्यान में रखकर रोडों के कार्य हों, जिससे सड़कें लम्बे समय तक काम आयें। एवं भ्रष्टाचार पर पूर्णत: प्रदेश सरकार शिकंजा कसे, ताकि कार्य सही ढंग से ईमानदारी के साथ हो सकें। अब हम आवश्यकता की बात करें तो सबसे पहले प्रदेश सरकार किसानों की आवश्यकताओं को पूरा करें। हमारा पूरा मध्यप्रदेश कृषि पर निर्भर है अगर कृषि ही सही ढंग से नहीं होगी किसानों की दशा ठीक नहीं होगी तो हमारे प्रदेश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से लडख़ड़ा जायेगी, अत: प्रदेश सरकार किसानों को पूरा सहयोग करे, जिसके लिए किसानों को ऋण आसानी से कम ब्याज पर उपलब्ध हो, सिंचाई के लिए पर्याप्त बिजली मिले, किसानों को मज़दूरों की समस्याओं को देखते हुए कृषि यंत्र टे्रक्टर से लेकर धान कटाई रोपा लगाई, गहाई, ट्यूबवेल, कुंआ, पम्प, बीज, खाद पौधे, खेतों की फेंसिंग हेतु पोल, तार, खेतों तक लाईट, जो कि पूरी तरह से किसानी को बढ़ावा देने में सहायक है पचास प्रतिशत अनुदान पर समय पर उपलब्ध कराये, ताकि आज जो किसान किसानी से मन हटाता जा रहा है वह फिर से खेती के प्रति रूची ले उद्योग धंधे चाहे वो छोटे हों या हों बड़े प्रदेश में इसका विस्तार करें। यहां के बेरोज़गारों को ज्य़ादा से ज्य़ादा रोज़गार देने का प्रयास करें। शिक्षा के लिए शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक विस्तार करें। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ संबंधी सेवाओं को बेहतर ढंग से प्रदान करें एवं भ्रष्टाचार जो कि आज हर एक क्षेत्र में तेज़ी से बढ़ रहा है उस पर अंकुश लगाये। आज ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतों में सरपंच/सचिव एवं अधिकारी जो कि रोज़गार गारंटी को दाल-रोटी नहीं, बल्कि खीर पूड़ी समझ रहे हैं, उनकी पंचायत में आने से पहले उनकी संपत्ति एवं उसके बाद उनकी की जांच कराये, ताकि जनता के विकास के लिए जो पैसा आ रहा है उसका सदुपयोग हो। इन सब बातों को जब हमारे प्रदेश के मुखिया ध्यान में रखकर कार्य करेंगे तब जाकर उन्होंने जो ''स्वर्णिम मध्यप्रदेशÓÓ का सपना देखा है वह तभी साकार होगा।

Saturday, June 19, 2010




अब चैन से सो नहीं
पाएंगे शिवराज

गडकरी को यूपी के लिये सेनापति के रूप में उमाभारती ही उपयुक्त केन्डीडेट नज़र आती हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती दलित नेता हैं, लेकिन अब वो राजनीति कर रही हैं, उसमें उन्होंने सर्वणों को भी शामिल कर लिया है, ऊपर से अपनी मूर्तियां बनवाकर जगह-जगह स्थापित कर रही हैं और मंचों समारोहों में नोटों की मालायें धारण कर रही हैं। इसके कारण उनका दलित प्रेम अब लोगों को 'दौलत प्रेमÓ दिखने लगा है, जबकि उमा भारती शुरू से ही दलितों के ह$क के लिये लड़ती रही हैं।

चंद्रशेखर सिंह
उमा भारती की भाजपा में वापसी तय मानी जा रही है। हालांकि मध्यप्रदेश भाजपा के महारथी उनके प्रवेश में अड़चनें डाल रहे हैं, किंतु भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को इस वक्त सि$र्फ यूपी के आगामी चुनाव ही दिखाई दे रहे हैं। दरअसल यूपी में जिस तरह से बसपा सुप्रीमो मायावती और कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटे हुए हैं, भाजपा के पास कोई ऐसा पत्ता नहीं है, जिसे वो 'तुरूपÓ की चाल के रूप में चल सके। यूपी में भले ही कलराज मिश्र, लालजी टंडन, वरूण गांधी और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह जैसे कद्दावर सिपाही हों, पर गडकरी केवल उनके बलबूते आने वाले विधानसभा चुनाव का रण नहीं लडऩा चाहते। गडकरी जानते हैं कि वरूण गांधी को छोड़कर बाकी नेता भले ही राजनीति के धुरंधर हों, पर इनमें से कोई भी चुनाव जिताऊ नहीं है। वरूण गांधी को ज़रूर राहुल गांधी के $िखला$फ प्रोजेक्ट किया जा सकता है। वे भीड़ भी जुटा लेते हैं। पर अक्सर वे अनर्गल व भड़काऊ बयानबाज़ी कर बैठते हैं जिसकी वजह से कई बार भाजपा को बैकफुट पर आना पड़ता है।
इसलिये गडकरी को यूपी के लिये सेनापति के रूप में उमा भारती ही उपयुक्त केन्डीडेट नज़र आती हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती दलित नेता हैं, लेकिन अब वो राजनीति कर रही हैं, उसमें उन्होंने सर्वणों को भी शामिल कर लिया है, ऊपर से अपनी मूर्तियां बनवाकर जगह-जगह स्थापित कर रही हैं और मंचों समारोह में नोटों की मालाएं धारण कर रही हैं। इसके कारण उनका दलित प्रेम अब लोगों को 'दौलत प्रेमÓ दिखने लगा है, जबकि उमा भारती शुरू से ही दलितों के ह$क के लिये लड़ती रही हैं। यूपी में बुंदेलखंड की मांग ज़ोरों से उठ रही है, ऐसे में उमा भारती को बुंदेलखंडी होने का अवश्य $फायदा मिलेगा। $कयास लगाया जा रहा है कि यदि गडकरी उमा को यूपी चुनाव की कमान सौंपते हैं, तो उमा बुंदेलखंड के संभावित नये राज्य को लेकर अवश्य ही कोई बड़ा अभियान चलायेंगी। भाजपा के विधानसभा चुनावी घोषण-पत्र में भी बुंदेलखंड को स्थान मिल सकता है। इसका $फायदा यकीनन भाजपा को मिलेगा। यही सब गणित लगाकर शिवराज सिंह चौहान और प्रभात झा के विरोध के बावजूद गडकरी उमा के लिये 'वेलकमÓ कह रहे हैं।
गडकरी ने शिवराज से कह दिया है कि यदि उमा वापस आती हैं, तो उनका कार्य क्षेत्र मध्यप्रदेश में नहीं होगा। वे राष्ट्रीय राजनीति के परिदृश्य में ही दिखाई देंगी। यूपी चुनाव के कारण पार्टी हित में अंतत: शिवराज और प्रभात झा सहित प्रदेश के भाजपा दिग्गजों की गडकरी की बात माननी ही पड़ेगी।
विश्लेषण करें तो पक्का है कि यदि उमा यूपी चुनाव में भाजपा की बागडोर संभालती हैं तो भाजपा, बसपा और कांग्रेस में मुकाबला दिलचस्प हो जायेगा। भाजपा दौड़ में वापस आ जायेगी, चूंकि सपा का लगभग सफाया हो गया, और जो बचा है उसे अमर सिंह खत्म करने का अभियान चलाये हुए हैं। यूपी में कांग्रेस के पास केवल एक राहुल गांधी मुख्य योद्धा हैं, पर सब जानते हैं कि वे सि$र्फ यूपी में कांग्रेस को बचाने के लिये ही इतनी कवायद कर रहे हैं, क्योंकि उनका लक्ष्य तो राष्ट्रीय राजनीति में सर्वोपरि पद पर विराजमान होना है।
उनके अलावा ऐसा कोई नेता नहीं है, जो दम दिखा सके। वैसे यूपी में महिला नेताओं की जंग होती दिख रही है। ऐसे में कांग्रेस के पास रीता बहुगुणा जोशी दमदार नेता मानी जाती हैं, किंतु वरूण गांधी स्टाईल में वो भी कुछ का कुछ बोल हमेशा मुसीबतें मोल लेती रहती हैं। ऐसे में मुख्य रूप से मायावती के आगे यदि कोई टिकता है, तो वो यकीनन उमा भारती हो सकती हैं और यदि उमा भारती भाजपा के रथ में सवार होकर मायावती पर $फतह पाती हैं, तो निश्चित रूप से उनका कद बढ़ेगा। उमा भारती जि़द्दी हैं और विरोधी उन्हें घायल शेरनी तक की उपमा देते हैं। उमा को जानने वाले कहते है कि यदि वे यूपी में भाजपा को सरकार बनाने की स्थिति में भी ले आती हैं, तो भी वे वहां कभी मुख्यमंत्री नहीं बनेंगी। उनकी नज़र हमेशा मध्यप्रदेश पर रहेगी। जब भी उनका कद बढ़ेगा, वे ताकतवर होकर उभरेंगी, वे ज़रूर मध्यप्रदेश लौटेंगी और अपने विरोधियों से चुन-चुन कर बदला लेंगी, जो उनके लिये मुसीबतें खड़ी करते रहे हैं, कर रहे हैं। शिवराज भी यह बात जानते हैं और इसीलिये वे उमा की वापसी की $िखला$फत किये जा रहे हैं। जिस दिन उमा भारती विधिवत रूप से भाजपा में शामिल हो जायेंगी, उसी दिन से शिवराज की आंखों से नींद उड़ जायेगी।

Friday, June 11, 2010




भोपाल को चाहिए अर्जुन सिंह से जवाब

हजारों लोगो के इस कातिल को हवालात में नहीं रखा गया बल्कि गेस्ट हाउस में वातानुकूलित और शानदार माहौल में वह आराम करता रहा। सिर्फ 25 हजार रुपए की जमानत पर उसे छोड़ दिया गया जबकि उस समय तक उस पर धारा 304 ही लगी थी जिसमें उम्र कैद तक का प्रावधान हैं। ऐसे मामलों में आसानी से ज़मानत नहीं मिलती। सवाल यही हेै कि अर्जुन सिंह के पास दिल्ली से जो $फोन आया था वह किसका था?
सुप्रिया रॉय
वीरप्पा मोइली चाहे जितने वीरोचित बयान देते रहे मगर सच यही है कि वारेन एंडरसन को भारत नहीं लाया जाएगा। एंडरसन अगर भारत आ गया तो सबसे पहले तो यही पोल खुलेगी कि भोपाल में ज़मानत मिलने के बाद उसे अमेरिका जाने कैसे दिया गया? अमेरिका सरकार तो पहले ही इनकार कर चुकी है और कह चुकी है, कि एंडरसन एक सम्मानित अमेरिकी नागरिक हैं और उन्हें प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता।
कहानी में एक नया मोड़ आया है और यह मोड़ एक सवाल है। इस सवाल का जवाब सि$र्फ कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह दे सकते हैं, जो गैस हादसे के समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। खुलासा किया गया है कि अर्जुन सिंह एक सभा को संबोधित कर रहे थे और तभी मंच के पास मुख्यमंत्री के लिए लगाए गए $फोन पर दिल्ली से एक $फोन आया और इसके तीन घंटे के भीतर एंडरसन को रिहा करने के आदेश भी दे दिए गए, और उसे दिल्ली पहुंचाने के लिए एक विशेष विमान का इंतज़ाम भी कर दिया गया।
भोपाल में भी 7 से 11 दिसंबर 1984 तक एंडरसन सि$र्फ तकनीकी रूप से गिरफ़्तार था। हज़ारों लोगों के इस $कातिल को हवालात में नहीं रखा गया, बल्कि गेस्ट हाउस में वातानुकूलित और शानदार माहौल में वह आराम करता रहा। सि$र्फ 25 हज़ार रुपए की ज़मानत पर उसे छोड़ दिया गया, जबकि उस समय तक उस पर धारा 304 ही लगी थी, जिसमें उम्र कैद तक का प्रावधान हैं। ऐसे मामलों में आसानी से ज़मानत नहीं मिलती। सवाल यही है कि अर्जुन सिंह के पास दिल्ली से जो $फोन आया था वह किसका था? शायद अर्जुन सिंह अपनी जो आत्मकथा लिख रहे हैं, उसमें इस सवाल का जवाब भी मिल जाए।
भोपाल में हुई 25 हज़ार मौतों और लाखों लोगों की जि़ंदगी को नरक बनाने का असली गुनहगार वारेन एंडरसन गैस त्रासदी के केस में सरकार की मेहरबानी से बचा था। इस केस की जांच करने वाले सीबीआई अ$फसर ने $खुद ये खुलासा किया है कि सरकार नहीं चाहती थी कि सीबीआई एंडरसन पर शिकंजा कसे। इसके लिए बाकायदा उन्हें चि_ी लिखकर निर्देशित किया गया था।
सीबीआई के तात्कालीन ज्वाइंट डायरेक्टर बी आर लाल के मुताबिक विदेश मंत्रालय की तर$फ से उन्हें चि_ी मिली थी, जिसमें कहा गया था कि वारेन एंडरसन को भारत लाने की कोशिशों पर ज़ोर न दिया जाए। लाल ने बताया कि विदेश मंत्रालय ने अपनी चि_ी में ये नहीं लिखा था कि वारेन एंडरसन पर मेहरबानी क्यों की जा रही है। लाल ने आरोप लगाया कि बड़ी मछलियों के $िखला$फ सीबीआई कार्रवाई नहीं कर पाती है। अप्रैल 1994 से जुलाई 1995 के बीच बीआर लाल भोपाल गैस कांड मामले के मुख्य जांच अधिकारी थे। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने ये दबाव मानने से इनकार किया तो कुछ दिन बाद ही उनका तबादला कर दिया गया और उसके बाद क्या हुआ उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं है। 25 साल बाद भोपाल गैस त्रासदी का $फैसला आया और 7 आरोपियों को दो-दो साल की सज़ा भी सुना दी गई लेकिन इस त्रासदी का असली गुनहगार वॉरेन एंडरसन अब भी कानून के हाथ से दूर ऐशोआराम की जि़ंदगी व्यतीत कर रहा है। भोपाल गैस केस फाइल में वॉरेन एंडरसन भगोड़ा है और 18 साल से $फरार है। उसके $िखला$फ गिरफ्तारी के वारंट निकले लेकिन उसे कानून के शिकंजे में नहीं जकड़ा जा सका। वो न्यूयॉर्क के लांग आईलैंड के एक लक्ज़री घर में चैन की सांस ले रहा है। जिस शख़्स की जानबूझकर की गई लापरवाही ने 25 हज़ार लोगों की जान ले ली। जिसके चलते लाखों लोग आज भी त्रासदी का दंश झेल रहे हैं उसके गोल्$फक्लब की सालाना $फीस गैस पीडि़तों को दिए गए औसत मुआवज़े का चार गुना है। वॉरेन एंडरसन को 1984 में ही मध्य प्रदेश पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था लेकिन उसे तुरंत ज़मानत मिल गई और वो भारत से अपने प्राइवेट विमान से उडऩछू हो गया। उसके बाद से आज तक उसे गिरफ़्तार करने के लिए न ही सीबीआई और न ही भारत सरकार ने ज़रा सी भी ईमानदार कोशिश की। सीबीआई और इंटरपोल के मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में होने के बावजूद भारतीय और अमेरिकी एजेंसियां निष्क्रिय रहीं। अमेरिकी जांच एजेंसियों ने कहा कि उन्हें एंडरसन का पता नहीं मिल रहा और भारत सरकार ने एंडरसन के प्रत्यर्पण की कोई कोशिश इस डर से नहीं की कि इससे भारत में अमेरिकी निवेश और व्यापार पर असर पड़ेगा। यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन और सीईओ होने के नाते वॉरेन एंडरसन को 1982 में ही पता चल गया था कि भोपाल प्लांट में एक-दो नहीं 30 $खामियां हैं। ऐसी ही खामियां अमेरिका के यूनियन कार्बाइड प्लांट में भी थीं लेकिन एंडरसन ने भोपाल प्लांट को नज़रअंदाज़ करते हुए सि$र्फ अमेरिका में मौजूद प्लांट की $खामियों को ठीक किया। सा$फ था एंडरसन ने जानबूझकर ऐसा किया। ऐसे मुजरिम को भारत सरकार, भारत तक नहीं ला सकी। वो खुला घूम रहा है और शायद घूमता रहेगा।

विशेष टिप्पणी
अखबारी समाचारों की अनदेखी

केन्द्र सरकार ने व म.प्र. शासन द्वारा यह माना गया कि ज़हरीली गैस लीकेज में किसी व्यक्ति की $गलती का नतीजा नहीं था। इसी तरह भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एम. अहमदी ने भी यह मानते हुए कि इस भयंकर प्रलयकारी हादसे के जि़म्मेदार व्यक्तियों को यह बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ऐसा हादसा हो सकता है और इतनी जानें जा सकती हैं। 13 सितंबर 1996 में इसीलिये उन्होंने पूर्व में लगाई गई धारा 304 को बदल कर प्रकरण में धारा 304 ए कर दी, जिसके तहत अभियुक्तों को अधिकतम 2 वर्ष की सज़ा दी गई। बड़े $खेद का विषय है कि न सरकारें और न ही माननीय अदालतें अ$खबारों व संचार माध्यमों में प्रकाशित की गई ऐसी $खबरों पर संजीदगी से विचार करती हैं, जिससे इस प्रकार के भावी $खतरों से सावधानी बरती जा सके। इस विनाशकारी 2 दिसंबर 1984 के हादसे से का$फी पहले अ$खबारों में इस $खतरे की चेतावनी दी जाती रही। उदाहरण के तौर पर निम्नलिखित $खबरों में इस हादसे की चेतावनी देते हुये सावधान किया गया था, मगर प्रशासन में से किसी ने भी ध्यान नहीं दिया:-
(1) पत्रकार श्री राजकुमार केसवानी द्वारा साप्ताहिक 'रपटÓ में दिसंबर 1982 में इस ओर ध्यानाकर्षण किया गया। (2) साप्ताहिक '$खबरयारÓ में 04 मई 1984 को हमने भी इस ओर ध्यान आकर्षित किया था। (3) श्री राजकुमार केसवानी द्वारा पुन: जून 1984 में 'जनसत्ताÓ के माध्यम से ध्यानाकर्षण किया गया। गुरूबचन सिंह 'सोचÓ


सज़ा देनी है तो संविधान बदलो
हर्षवर्धन त्रिपाठी
भोपाल गैस त्रासदी पर $फैसले का विरोध करते आंदोलनकारी हज़ारों बेगुनाहों को मौत की नींद सुला देने वाले मामले पर आ$िखरकार 25 साल बाद भोपाल की सीजेएम कोर्ट ने $फैसला सुना ही दिया। पंद्रह हज़ार से ज्य़ादा लोग भोपाल की यूनियन कार्बाइड से निकली ज़हरीली गैस से मारे गए। जबकि, अभी भी कम से कम से कम छे लाख लोग ऐसे हैं जिनके भीतर यूनियन कार्बाइड से निकली ज़हरीली गैस अभी भी समाई है। और, इसके बुरे असर से सांस की बीमारी से लेकर कैंसर तक की बीमारी के शिकार ये लोग हो रहे हैं। लेकिन, 2 दिसंबर 1984 की रात हुए दुनिया के इस सबसे बड़े औद्योगिक हादसे की सुनवाई के बाद जब $फैसला आया तो, इसमें धारा 304 ्र लगाई गई, यानी ऐसी धारा जिसमें अधिकतम दो साल तक की सज़ा हो सकती है।
और तो और दोषी पाए सभी लोगों को निजी मुचलके पर ज़मानत पर भी छोड़ दिया गया। ये असाधारण मसला था लेकिन, इसकी पूरी जांच और सुनवाई भारतीय संविधान के उन कमज़ोर कडिय़ों का इस्तेमाल करके की गई कि ये एक साधारण लापरवाही भर का मामला बनकर रह गया। और, कमाल तो ये है कि उस समय यूनियन कार्बाइड के सीईओ रहे वॉरेन एंडरसन को आज भी दोषी नहीं बताया गया। जबकि, वो इसी मामले में करीब दो दशकों से भारत में भगोड़ा घोषित है। इसलिए ज़रूरी ये है कि भोपाल गैस त्रासदी जैसी असाधारण परिस्थितियों के लिए भारतीय संविधान में नए सिरे से बदलाव किया जाए।
मामला सि$र्फ भोपाल गैस त्रासदी का ही नहीं है। सच्चाई तो ये है कि ऐसे सभी असाधारण मसलों से निपटने में भारतीय संविधान और भारतीय दंड संहिता की बाबा-आदम के ज़माने की धाराएं, प्रावधान नाका$फी हैं। फिर चाहे वो भोपाल गैस त्रासदी हो या फिर देश पर हमला करने वाले अ$फज़ल गुरु की या कसाब की फांसी हो। एक ज़माने में संघ परिवार और उनके अनुषांगिक संगठनों ने ऐसे ही असाधारण मामलों पर संविधान में बदलाव की बात बड़े ज़ोर-शोर से उठाई थी लेकिन, पता नहीं क्यों जब बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार आई तो, कोई ठोस $फैसला नहीं लिया जा सका। शायद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े विचार परिवार की ये बड़ी कमी साबित हुई है, कि वो अच्छे मुद्दों को भी उठाकर उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा पाते। जिसकी वजह से उस विशेष मुद्दे की वजह से संघ परिवार से जुडऩे वाले लोग फिर उसकी बातों से सहमत होते हुए भी उससे जुडऩे में मुश्किल महसूस करते हैं।
आ$िखर भोपाल गैस त्रासदी हो, अ$फज़ल गुरु का संसद पर हमले में शामिल होना हो या फिर कसाब का मुंबई में गोलियां बरसाना, सब देश पर हमला ही तो हुआ ना। फिर देश पर हमले जैसे असाधारण मामले पर कार्रवाई की प्रक्रिया सामान्य चोरी चकारी करने वाले, किसी की हत्या करने किसी फैक्ट्री में थोड़ी लापरवाही जैसी घटनाओं जैसी कैसे हो सकती है। तर्क ये आता है कि मामला भोपाल गैस त्रासदी का हो या अ$फजल गुरु की फांसी का—हमारे संविधान में दोषियों को उचित और समय पर दंड देने की सारी व्यवस्था है लेकिन, राजनीतिक, कूटनीतिक दबाव मुश्किल करते हैं।
इसी तर्क पर ये और ज़रूरी हो जाता है कि असाधारण मामलों के लिए संविधान और न्याय प्रक्रिया में ऐसे बदलाव किए जाएं कि सीबीआई, राजनेताओं, सरकारों को भी उसे लटकाने का मौका न मिल सके। अभी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अ$फजल गुरु की फांसी की $फाइल लटकाने के मामले में किरकिरी झेल रहीं थीं। उस पर उन्होंने इस देरी के लिए तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटील के दबाव का इशारा करके इस बदलाव की ज़रूरत को और सही साबित किया है। सोचिए कि अगर संविधान समीक्षा एक बार हो गई होती और असाधारण मामलों में तुरंत दंड का प्रावधान होता तो, ऐसी जाने कितनी विसंगतियों से बचा जा सकता था। क्योंकि, गाड़ी की ट्यूब में भी 4-6 पंचर हो जाने के बाद ट्यूब बदलना ज़रूरी ही हो जाता है लेकिन, देश को चलाने वाले भारतीय संविधान में तो, जाने कितने पंचर होने के बाद भी पंचर बनाकर (छोटे-मोटे बदलाव करके) ही काम चलाया जा रहा है। अब लगभग हर दूसरे चौथे न्यायालयों से निकलने वाले आदेश संविधान की कई बातों को आज की प्रासंगिकता के लिहाज़ से सही नहीं पाते हैं। बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें भारतीय संविधान आज की परिस्थितियों के लिहाज़ से समय पर न्याय की प्रक्रिया में मददगार नहीं बनता है। आतंकवाद जैसी देश की सबसे बड़ी समस्या से निपटने के लिए तो, संविधान में अलग से कोई प्रावधान ही नहीं है। ये तो कसाब की फांसी सज़ा के बाद ये राज खुला कि अ$फज़ल गुरु की क्षमादान याचिका अभी तक राष्ट्रपति के पास पहुंची ही नहीं है। अभी तक $फाइल दिल्ली सरकार से लौटकर केंद्रीय गृह मंत्रालय पहुंची ही नहीं है। ये कांग्रेसी तरीका हो सकता है किसी भी मसले को टालमटोल करने का। लेकिन, दरअसल किसी भी अभियुक्त को फांसी की सज़ा और फांसी होने के बीच संविधान में जो व्यवस्था है वो, इस तरह की देरी का बहाना देती है। दरअसल, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 में इस बात की कोई समय सीमा तय ही नहीं की गई है कि राष्ट्रपति को कब तक किसी क्षमादान याचिका पर $फैसला लेना है वो, चाहे तो, दशकों तक उसे लटका सकता है। अ$फज़ल गुरु के मामले में तो, राष्ट्रपति के पास $फाइल पहुंचने से पहले ही लगभग एक दशक होने जा रहे हैं। आप ही देखिए कि आ$िखर किसी अभियुक्त को फांसी की सज़ा सुनाए जाने पर उसे फांसी के तख़्ते तक पहुंचाने की प्रक्रिया क्या है? सेशन कोर्ट या फिर स्पेशल कोर्ट अगर किसी को फांसी की सज़ा सुनाती है तो, उस $फैसले पर मुहर लगाने के लिए संबंधित हाईकोर्ट के पास भेजना होता है। अगर हाईकोर्ट भी फांसी की सज़ा सुना देता है तो, अभियुक्त के पास सर्वोच्च न्यायालय में अपील का मौका होता है। सर्वोच्च न्यायालय भी अगर अभियुक्त की फांसी की सज़ा बरकरार रखता है तो, अभियुक्त के पास आ$िखरी विकल्प बचता है कि वो, राष्ट्रपति से अभयदान मांगे। राष्ट्रपति के पास अभयदान के लिए की जाने वाली अपील राष्ट्रपति के पास जाने से पहले गृह मंत्रालय की जांच के लिए भेजी जाती है। संविधान में इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि राष्ट्रपति को कितने दिन में क्षमादान याचिका पर $फैसला लेना है। अब केंद्रीय गृह मंत्रालय उस राज्य से मामले की संपूर्ण जांच के लिए सारी जानकारी मांगता है। राज्य सरकार मामले की सारी जानकारी जुटाकर गृह मंत्रालय को भेजता है। गृह मंत्रालय सारे मामले की जांच करके उसे राष्ट्रपति सचिवालय भेज देता है। राष्ट्रपति सचिवालय आ$िखर में फाइल राष्ट्रपति के पास $फैसले के लिए भेजता है। अब ये व्यवस्था सामान्य फांसी की सज़ा पाए व्यक्ति के लिए, तो फिर भी ठीक कही जा सकती है लेकिन, देश पर हमला करने वाले आतंकवादियों के मामले में भी यही व्यवस्था भारतीय संविधान का मखौल उड़ाती दिखती है। विशेष अदालत के ज़रिए सुनवाई होने और अब तक की सबसे तेज़ सुनवाई होने पर भी कसाब को विशेष अदालत से फांसी की सज़ा मिलने में डेढ़ साल से ज्य़ादा लग गए जबकि, ये पहली प्रक्रिया है। आतंकवादियों को जेल में रखने और उनकी सुनवाई पर हम भारतीयों की गाढ़ी कमाई का जो, पैसा जाता है उस पर तो, बहस की गुंजाइश ही नहीं दिखती। कभी-कभार किसी चर्चा में उड़ते-उड़ते ये बात भले सामने आ जाती है। भोपाल गैस त्रासदी और आतंकवादी घटनाओं जैसी असाधारण घटनाओं के बाद इस बात की सख़्त ज़रूरत है कि भारतीय संविधान की समीक्षा करके एक बार नए सिरे से आज की ज़रूरतों के लिहाज़ से संविधान लिखा जाए। हमारी चुनौती हेडली जैसे आतंकवादी भी बन रहे हैं जो, अमेरिका में पल-बढ़कर भारत के $िखला$फ आतंकवादी साजि़श सोचते-करते हैं और वॉरेन एंडरसन जैसे विदेशी सीईओ भी जिनकी एक लापरवाही हज़ारों लोगों की जान ले लेती है और आने वाली कई पीढिय़ों की नसों में ज़हर भर देती है। इन असाधारण परिस्थितियों में पुराने संविधान, कानून के सहारे लड़ाई वैसी ही जैसे, पुलिस को ज़ंग लगी थ्री नॉट थ्री की बंदूक लेकर ए.के. 47 और दूसरे अत्याधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादियों से लडऩे भेज दिया जाए।


सरकार द्वारा अग्रिम कार्रवाई
इस नर-संहार के 25 वर्षों की लम्बी अवधि के बाद भी आयुक्त को एक दम सज़ा दिये जाने से सर्वत्र रोष को देखते हुये म.प्र. के माननीय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने प्रेस के समक्ष बयान देते हुये कहा कि संविधान एवं न्याय प्रक्रिया में ज़रूरी संशोधन शीघ्र किये जाने चाहियें, ताकि पीडि़तों को शीघ्र न्याय मिले व घोर अपराधियों को भरपूर सज़ा मिल सके। पीडि़त व्यक्तियों के पुनर्वास व इलाज आदि की जि़म्मेदारी केन्द्र सरकार की है, जबकि राज्य सरकार करोड़ों रूपये इस मद में $खर्च करती आ रही है। केन्द्र सरकार और अधिक राशि देने का प्रावधान करे और यहां के जल और वायु को ज़हरीली फिज़ाओं और प्रदूषण से बचाया जा सके।
म.प्र. शासन द्वारा श्री विवेक तनखा के नेतृत्व में 5 कानूनविदों की एक समिति का गठन कर मामले का पुनरीक्षण किया जा रहा है, जो शीघ्र ही अपनी रपट पेश करेगी। तत्पश्चात अदालत में आगे की कार्यवाही की जावेगी।
केन्द्र सरकार द्वारा केन्द्रीय मंत्रियों का एक समूह गृहमंत्री पी.चिदम्बरम् की अध्यक्षता में गठित किया गया है, जो मामले की शुरू से अब तक की परिस्थितियों की समीक्षा करके अपनी रपट सरकार को पेश करेगा।

Saturday, June 5, 2010





बुंदेलखंड: विकास कम, राजनीति ज़्यादा

आज कल बुंदेलखंड सुर्खियों में है। सुर्खियों में इसलिए है क्योंकि बुंदेलखंड के विकास की बातें कम, इस पर राजनीति ज़्यादा हो रही है। कैसी राजनीति हो रही है, इस पर प्रकाश डालने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि आ$िखर बुंदेलखंड है क्या चीज़ और इसका भौगोलिक और आर्थिक महत्व क्या है। बुंदेलखंड को भारत का दिल कहा जाता है। दरअसल बुंदेलखंड कुछ हिस्सा उत्तर प्रदेश और इसका एक बड़ा हिस्सा मध्यप्रदेश में। पन्ना में हीरे की खानें, खजुराहों के मंदिर, महोबा का पान, चित्रकूट के घने जंगल, ओरछा के महल और केन, बेतवा और चंबल जैसी नदियां इस इलाके की धरोहर हैं। वेद व्यास, तुलसीदास, आल्हा-ऊदल, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर मैथिलीशरण गुप्त और हॉकी के जादूगर या भगवान, मेजर ध्यानचंद तक कितनी ही श$िख्सयतों की जन्मस्थली यही क्षेत्र है। सभी मायनों में अनूठा ये इलाका आर्थिक मामलों में बेहद ही पिछड़ा हुआ है।
मौजूदा समय में करीब 5 करोड़ की जनसंख्या वाले इस इलाके को अलग राज्य बनाने की मांग लगभग 5 दशकों से चली आ रही है। इस अलग राज्य में यूपी के झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा, बांदा, चित्रकूट और मध्यप्रदेश के दतिया, टीकमगढ़, छत्तरपुर, पन्ना, दमोह और सागर जिलों को शामिल करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा कई बार मध्यप्रदेश के मुरैना, शिवपूरी, भिंड, ग्वालियर, शिवपुर, गुना और अशोकनगर को भी शामिल करने की मांग उठती रही है।
बात हो रही थी बुंदेलखंड सुर्खियों में रहने की। दरअसल कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के एजेंडे में बुंदेलखंड के विकास का एजेंडा का$फी समय से रहा है। इसी के मद्देनज़र उन्होंने पिछले साल का दौरा करने के बाद इस क्षेत्र के लिए विशेष आर्थिक पैकेज की मांग की थी। इस क्षेत्र के विकास के लिए ही पिछले महीने राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से मिलकर बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण बनाने की मांग की। फिर क्या था यूपी और मध्यप्रदेश के सत्तारूढ़ दलों को राहुल का प्रस्ताव नागवार गुज़रा। उत्तरप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार है। ज़ाहिर सी बात है कि यहां राजनीति के न$फा-नुकसान की बात तो आनी ही थी, इसलिए इनके प्रतिनिधियों ने लोक सभा में हंगामा मचाया और कहा कि केन्द्र सरकार संघीय ढांचे से छेड़छाड़ कर रही है। यहां राहुल ने बुंदेलखंड के विकास की बात तो सोची, लेकिन इनके पीछे भी दूरगामी राजनीतिक रणनीति है। रणनीति इसलिए भी की कांग्रेस का जनाधार इन दोनों राज्यों में बहुत ही कम है। हालांकि गत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को थोड़ी उम्मीद दोनों राज्यों से बढ़ी है। इसलिए कांगेस एक दूरगामी रणनीति पर आगे बढ़ रही है।
$गौरतलब है कि यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने बुंदेलखंड के सर्वांगीण विकास के लिए केन्द्र सरकार से 9 हज़ार करोड़ रूपए की मांग की थी, लेकिन केन्द्र सरकार ने नहीं दिया। जहां तक मध्यप्रदेश की सरकार का प्रश्न है तो दो साल पहले ही बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण बना चुकी है, लेकिन केन्द्र सरकार इसको आर्थिक मदद देने के बजाय, नया प्राधिकरण बनाने की बात कर रही है, जो दोनों राज्यों के सत्तारूढ़ दलों को नागवार गुज़र रही है। हो भी क्यों नहीं आखिर वोट बैंक का सवाल है भाई। जब बुंदेलखंड का विकास हो ही जाएगा तो फिर ये मुद्दा ही मर जाएगा। इसलिए सभी लोग, चाहे किसी भी पार्टी का क्यों न हो वे नहीं चाहते हैं कि बुंदेलखंड का विकास हो। बुंदेलखंड पर कुछ हो तो राजनीति और सिर्फ राजनीति। विकास की बातें कम राजनीति ज़्यादा। जब तक राजनीतिज्ञों में इच्छाशक्ति नहीं होगी, तब तक इस खंड मतलब बुंदेलखंड का विकास संभव नहीं है।

हमारा कोहिनूर हमें वापस मिल पाएगा? सुप्रिया रॉय
भारत सरकार दुनिया के सबसे कीमती हीरे कोहिनूर को भारत वापस लाने की मुहिम में जुट गई है। भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने भी अब एक अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क बना कर ब्रिटिश राज के दौरान ले जाए गए कोहिनूर को वापस लाने के लिए पूरी दुनिया में अभियान छेडऩे का $फैसला किया है। इनमें उत्तर प्रदेश के सुल्तानगंज से लंदन ले जाकर संग्रहालय में रखी गौतम बुद्ध की मूर्ति भी है।
मगर असली $फोकस कोहिनूर पर है। यह हीरा जिसकी कीमत आज तक नहीं लगाई जा सकी, ब्रिटिश महारानी के मुकुट में जड़ा हुआ है। उधर बर्मिंघम में जहां बुद्ध की मूर्ति रखी हुई है, संग्रहालय की प्रमुख रीटा मैक्लीन ने कहा है कि अभी तक उन्हें इस बारे में कोई अनुरोध प्राप्त नहीं हुआ है और जब अनुरोध आएगा तब इस पर विचार किया जाएगा। इतिहासकारों के अनुसार कोहिनूर चार हज़ार साल पुराना हीरा है और सन 1300 में लिखे गए बाबरनामे में भी इसका वर्णन मिलता हैं।
बाबर को यह हीरा गुजरात या कर्नाटक में कहीं मिला था मगर कहानी यह भी है कि मई 1526 में बाबर ने आगरा में वहां के तत्कालीन शासक विक्रमादित्य से यह हीरा प्राप्त किया था। दो सौ साल तक इस हीरे का नाम बाबर का हीरा ही रहा। कोहिनूर का साठ साल का इतिहास का$फी $खूनी रहा है। इसके पहले भारतीय मालिक महाराजा दलीप सिंह थे जो महाराजा रंजीत सिंह के बेटे थे।
दलीप सिंह ब्रिटिश हुकुमत से पंजाब की लड़ाई हार गए थे और जब पंजाब का 29 मार्च 1849 को विलय किया गया, तो संधि मेंं यह भी लिखा गया कि कोहिनूर हीरा जिसे महाराजा रंजीत सिंह ने शाह शुजा उल मुल्क को हरा कर प्राप्त किया था। वह ब्रिटेन की महारानी को भेट किया जाता हैं। अंग्रेज़ अधिकारी सर जॉन लॉगिन कोहिनूर और तब काफी युवा रहे दलीप सिंह को इंग्लैंड ले कर चले गए। पंजाब के गर्वनर सर हेनरी लारेंस के भाई जॉन लारेंस भी उनके साथ गए थे।
कोहिनूर हीरा मुंबई से पानी के जहाज़ में गया और इसे एक मज़बूत लोहे के बक्से में रखा गया था। इस बक्से में क्या है इसकी जानकारी जहाज़ के कैप्टन तक को नहीं थी। यह जहाज़ जब मॉरीशस के पास पहुंचा तो जहाज़ पर हैज़ा फैल गया और मॉरीशस सरकार ने कहा कि जहाज़ वापस नहीं ले जाया गया तो उसे तोप से उड़ा दिया जाएगा। जहाज जब इंग्लैंड के प्लेमाउथ बंदरगाह के रास्ते में था तो बारह घंटे लंबे एक भयानक तू$फान से उसका सामना हुआ। प्लेमाउथ में सब उतर गए और सारा सामान भी उतार लिया गया, लेकिन कोहिनूर को पोट्र्समाउथ बंदरगाह ले जाया गया। ब्रिटेन में इस हीरे को तराशने में भी उस दौर आठ हज़ार पाउंड का खर्चा आया। 1853 में यह रानी के मुकुट में लगाया गया। 1947 में भी भारत सरकार ने कोहिनूर वापस करने की मांग की थी। मगर उस समय की उड़ीसा सरकार ने कहा था कि कोहिनूर असल में भगवान जगन्नाथ की संपत्ति है और महाराजा रंजीत सिंह की संपत्तियोंं की देख रेख करने वाले मेैनेजर ने कहा था कि यह राजपरिवार की संपत्ति हैं। पाकिस्तान और इरान ने भी इस पर दावा जताया था। कोहिनूर 213 साल मु$गल महाराजाओं के पास रहा।
66 साल अ$फगान सम्राटों के पास रहा और डेढ़ सौ साल से ब्रिटिश मुकुट का हिस्सा हैं। कोहिनूर की कहानी बहुत लंबी है। दुनिया के इस विश्वकीमती हीरे पर उड़ीसा या पंजाब के राजपरिवार का नहीं, भारत सरकार का हक है। यह पता नहीं कि ब्रिटेन पर कितना दबाव डालना पड़ेगा, कि यह हीरा हमें वापस मिल जाए।

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