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Friday, July 30, 2010


फंदे में शाह, संकट में मोदी
विधि का विधान देखिए कि जो पुलिस महकमा जिस गृहमंत्री को सलाम करते नहीं थकता था, उसी महकमे को उसे सलाख़ों के पीछे पहुंचाना पड़ा... उषा चांदना
सोहराबुद्दीन और कौसरबी की $फजऱ्ी मुठभेड़ अब मोदी के गले की ऐसी हड्डी बन चुकी है, जो भाजपा को ना निगलते बन रही है, और न उगलते, क्योंकि इसी $फजऱ्ी मुठभेड़ को मोदी ने आतंकवाद करार देकर मौत के सौदागर का नाम कमाया था, और उसी नाम की बदनामी के भरोसे 2007 का विधानसभा का चुनाव लड़ा था। लेकिन कितने ताज्जुब की बात है कि बाद मे गुजरात सरकार ने ही सुप्रीम कोर्ट में इसे $फजऱ्ी मुठभेड़ करार दिया। अमित शाह की गिरफ़्तारी से सवाल इस बात का भी उठ रहा है, कि मोदी के राज्य में सही मायने में आतंकवाद की परिभाषा क्या है ?
भाजपा कह रही है कि उसने बड़े मकसद के लिए अमित शाह का मुद्दा छोड़ दिया है। अपने बड़े मकसद के लिए भले ही शीर्ष स्तर पर बैठे नेताओं ने गुजरात के भूतपूर्व गृहमंत्री अमित शाह का मुद्दा छोड़ दिया हो, लेकिन सीबीआई के शिकंजे में फंसे अमित शाह की पूछताछ से सच्चाई की परतें जिस तरह से एक एक कर उभरकर सामने आ रही हंै, उससे गुजरात राज्य के सामने एक सवाल यह आकर खड़ा हो गया है, कि क्या सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर के $खूनी छीटे मोदीत्व पर भी पड़ेंगे? पूछताछ के दौरान कहीं अमित शाह उस कहावत को चरितार्थ तो नहीं करेंगे कि सनम हम तो डूबेंगे, लेकिन तुम्हें भी ले डूबेंगे? देश में यह ऐसा पहला ऐतिहासिक मामला है, जब किसी राज्य के गृहमंत्री पर हत्या, हफ़्ता उगाहने जैसे संगीन आरोप लगाए गए हैं, और उस मंत्री पर जिसके गॉड$फादर $खुद मोदी हैं। अमित शाह की गिरफ़्तारी से क्या मोदी की उल्टी गिनती शुरू हो सकती है? क्या इस मामले से राज्य की राजनीति के समीकरण बदलेंगे?
विधि का विधान देखिए कि जो पुलिस महकमा जिस गृहमंत्री को सलाम करते नहीं थकता था, उसी महकमे को उसे सलाख़ों के पीछे पहुंचाना पड़ा। 2002 में प्रदेश में गोरधन झड़पिया के त्यागपत्र देने के बाद उन्हें यह विभाग सौंपा गया था। 2007 में अहमदाबाद के सर$खेज़ विधानसभा से वे चुनाव जीते थे, और गृहमंत्री का स्वतंत्र कार्यभार संभाला था। पूरे कार्यकाल के दौरान अमित शाह प्रदेश के गृहमंत्री होने की बजाय नरेन्द्र मोदी के सबसे विश्वस्त मंत्री के बतौर काम करते रहे। भाजपा में रहे बा$गी नेता अब यह भी कहने लगे हैं, कि अमित शाह ने जितने काम किए वह अपने लिए कम, मोदी के लिए ही ज्य़ादा किए, वह चाहे सहकारी बैंक हों या क्रिकेट का मैदान। गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर मोदी को और $खुद को उपाध्यक्ष पद पर आसीन अमित शाह पर डुबाए गए माधोपुरा सहकारी बैंक में उन पर वैसे भी 2.5 करोड़ की रिश्वत लेने का आरोप है।
राज्य में अमित शाह का प्रभुत्व कितना था, इसका अंदाज़ इसी से लग सकता है कि जब भी कैबिनेट की मीटिंग में किसी विभाग को लेकर महत्वपूर्ण कमेटी बनाई जाती थी, तो केबिनेट में चार महत्वपूर्ण मंत्री होने के बावजूद भी राज्यमंत्री होते हुए भी अमित शाह 100 कमेटियों में से 90 कमेटियों में शामिल होते थे। अमित शाह जिस कैबिनेट मीटिंग को सम्बोधित करते थे, सब जानते थे कि यह गृहमंत्री अमित शाह नहीं मोदी बोल रहे हैं, लेकिन सीबीआई के फँदे में फंसने के बाद अब पुराने भाजपाई रहे शामिल सुनील ओझा का कहते हंै कि भाजपा अब भारतीय जनता पार्टी नहीं रही क्रिमिनल पार्टी हो गई है। वे कहते हैं कि भाजपा अब कैडर बेस्ड पार्टी नहीं रही। सभी महत्वपूर्ण $फैसले गान्धीनगर में होते हैं। गुजरात में संघ के जितने महत्वपूर्ण शाखा किसान संघ थीं, उसको मोदी ने तोड़ दिया। गुजरात में विहिप और बजरंग दल को निष्किय कर दिया, लेकिन इस मामले में मोदी की उल्टी गिनती ज़रुर शुरू होगी।
सच्चाई की परतों में मोदी का एक ऐसा सच भी सामने आया है, जो मोदी को भारी पड़ सकता है। वह है संजय जोशी सीडी कांड। सीबीआई की जांच के दौरान पुलिस विभाग के पीआई बालमुकुन्द चौबे ने जांच में बताया है, कि संजय जोशी की सीडी एटीएस ने ही बनाई थी। सवाल इस बात का है कि क्या इन सब मुद्दों को लेकर भाजपा के $िखला$फ ब$गावत होगी? कांग्रेस के वरिष्ट नेता अर्जुन मोडवडिय़ा का कहना है कि यह कहना असम्भव है। क्योंकि गुजरात में मोदी का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। लेकिन गुजरात में साइड ट्रेक किए गए नेता कहते हैं, कि पार्टी अगर झारखंड जैसी भूल करती है, तो पार्टी का वही हश्र होगा। लेकिन सवाल इस बात का भी उठ खड़ा हुआ है कि सोहराबुद्दीन मामले में सज़ा भोग रहे जब आईपीएस अधिकारियों को ज़मानत नहीं मिली, तो अमित शाह को कैसे मिलेगी, भले ही राम जेठमलानी जितनी कोशिश कर लें। मोदी को मालूम था कि सोहराबुद्दीन का केस उनके गले की हड्डी बना हुआ है, इसीलिए उन्होंने ही रामजेठमलानी को राज्यसभा का सदस्य बनाया। अब देखना यह है कि न्यायिक प्रक्रिया के चलते क्या आने वाले दिनों में मोदी की उल्टी गिनती शुरु होती है या मोदी बेदा$ग साबित होते है ?


कॉमनवेल्थ स्टेडियमों में कंडोम क्यों बंटेंगे ? आलोक तोमर नई दिल्ली। कांग्रेसी सांसद मणिशंकर अय्यर ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा है, कि खेल पंडाल में कंडोम बांटने वाली 150 मशीनों का क्या काम है। उन्होंने इन मशीनों के लगाए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा, कि ये मशीनें किस लिए लगाई जा रही हैं। उन्होंने सवाल किया कि आखिर कॉमनवेल्थ गेम में लोग कौन-सा खेल खेलने आ रहे है?
अय्यर ने कहा कि प्राथमिकता क्या है, एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का खेल का आयोजन करना, या बेहतर खेल सुविधाएं मुहैया कराना? यह विकृत प्राथमिकता है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रमंडल खेलों को बढ़ाचढ़ा कर पेश करना घिनौना है। भारत में बड़ी संख्या में युवाओं की आबादी होने के बावजूद देश खेल संपन्न राष्ट्र नहीं बन सका है। अगर हम 30,000 करोड़ रुपये राष्ट्रमंडल खेलों पर खर्च करने के बदले बेहतर खेल सुविधाएं मुहैया कराने में लगाए जाते, तो भारत पांच वर्षों में चीन की स्थिति में आ सकता था। अय्यर ने सरकार पर हमला करते हुए कहा कि जहां सरकार को भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़तों के लिए 1,500 करोड़ रुपये का मुआवजा घोषित करने में 25 साल लग गए, वहीं सरकार ने खेल के लिए कलमाड़ी को झट से 1,620 करोड़ रुपये दे दिए हैं। खेल गांव और पूरी दिल्ली में 3 से 14 अक्टूबर के आयोजन के लिए कंडोम की मशीनें लगाए जाने की आलोचना की। उन्होंने कहा कि मैं इन दिनों हो रही बारिश से बहुत $खुश हूं। इसकी पहली वजह यह है कि बारिश खेती के लिए अच्छी है। दूसरी बात यह कि इससे राष्ट्रमंडल खेलों का बेड़ा $गर्क हो जाएगा।
यूपीए की पिछली सरकार में मंत्री रहे अय्यर ने कहा कि अगर राष्ट्रमंडल खेल सफल हुए तो ये लोग एशियाई खेल और अन्य दूसरे खेल भी आयोजित करेंगे। इसलिए इस खेल का बेड़ा $गर्क हो जाए तो मुझे $खुशी होगी। दूसरी ओर कलमाडी ने अय्यर को राष्ट्रविरोधी करार दिया। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अगर अय्यर खेल मंत्री बने रह गए होते, तो भारत कभी भी खेल का आयोजन नहीं कर पाता। कलमाड़ी $खुद कांग्रेसी नेता हैं। कलमाड़ी ने जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के उद्घाटन के मौके पर कहा कि खेल इसलिए संभव हो पा रहे हैं, क्योंकि एम.एस.गिल खेल मंत्री हैं। वहीं बीजेपी ने कहा है कि वह खेल संबंधी परियोजनाओं के निर्माण कार्य में हो रही देरी के मुद्दे को संसद में उठाएंगी।

Saturday, July 24, 2010





क्या हाईजैक हो गई थी उत्तरबंगा एक्सप्रेस

हृ पुष्यमित्र
बीरभूम के सैंथिया स्टेशन पर वनांचल एक्सप्रेस में उत्तरबंगा एक्सप्रेस की टक्कर क्या महज एक एक्सीडेंट है या फिर इसके पीछे कोई षणयंत्र है? दुर्घटना के बाद अगर आप परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर नजर दौड़ाएं तो बिना किसी सरकारी जांच पड़ताल के यह आशंका उभरने लगती है कि क्या ट्रेन को हाईजैक कर लिया गया था?
क्योंकि अगर ऐसा नहीं था तो इसके इतर इस हादसे की एक ही वजह हो सकती है और वह यह कि ट्रेन का ड्राइवर और दोनों सहायक ड्राइवर या तो एक साथ सो गये हों, नशा खुरानी के शिकार हो गये हों या पीकर टुन्न हों। फिलहाल एक साथ इतने सारी संभावनाएं नहीं हो सकती। शुरूआती स्तर पर अगर हम तथ्यों पर नजऱ डालें तो इस दुर्घटना के पीछे छिपा षडयंत्र साफ़ तौर पर सामने आने लगता है। अब आइये जरा रेलवे से मिले तथ्यों के आधार पर इस खबर को परखा जाये-
८ उत्तरबंगा एक्सप्रेस को होम सिग्नल नहीं था, इसके बावजूद ट्रेन प्लेटफ़ार्म पर आ गई।
८ जब उत्तरबंगा एक्सप्रेस प्लेटफ़ार्म पर पहुंची तो उसकी स्पीड 90 किमी प्रतिघंटा थी, जबकि स्टेशन परिसर में उसकी स्पीड 30 किमी प्रति घंटा से अधिक नहीं होनी चाहिये थी।
८ हादसे में चालक दल के तीनों सदस्य मारे गये।
८ हादसा सामने देख ड्राइवर ने इमरजेंसी ब्रेक नहीं लगाए।
८ ट्रेन का ड्राइवर ए कैटिगरी वाला एक्सपीरियंस्ड स्टाफ था।
८ जब ट्रेन अंदर आ गई तो लाउडस्पीकर से ड्राइवर को चेतावनी भी दी गई थी।
क्या इन तथ्यों के बाद इस घटना को हादसा माना जा सकता है? ऐसे में इस तथ्य को लेकर कोई संदेह नहीं बचता है कि यह घटना किसी संभवत: किसी चरमपंथी दल ने चालकों को किडनैप कर जानबूझ कर कराई ताकि ममता बंगाल की कुर्सी पर काबिज नहीं हो सके। यह नब्बे लोगों की लाश और 150 लोगों के जख्म पर रची गई एक घिनौनी साजिश है। तो आइए इससे पहले कि सैंथिया का सच जमींदोज हो जाए, तफ़्तीश करते हैं कि आखिर इस घटना के पीछे किसका हाथ हो सकता है। सबसे पहले इस आंकड़े पर गौर करें- 15 महीने में 11 हादसे 250 मरे। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में आंकड़े अक्सर बड़े सशक्त हथियार साबित होते हैं। उन्हें अक्सर अंतिम सत्य मान लिया जाता है। लेकिन अगर इन्हीं आंकड़ों को दूसरी निगाह से देखा जाये तो नतीजे बदले हुए भी नजर आ सकते हैं। जैसे इन्हीं आंकड़ों पर गौर करें। 15 महीने में 11 हादसे 250 मरे के बदले अगर यह कहा जाये कि दो महीने में बंगाल में दो रेल हादसे 200 से अधिक मरे तो इसका अर्थ कुछ अलग भी हो सकता है।
13 हादसों में 50 लोग मरे जो बंगाल में नहीं हुए और दो हादसे में 200 से अधिक लोग मरे जो बंगाल में हुए। उनमें से एक ज्ञानेश्वरी हादसा विशुद्ध रूप से अतिवादी गतिविधि का नतीजा थीं। गौर करें मैं यहां माओवादी शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं, क्योंकि पीसीपीए और उसके मुखिया बापी महतो माओवादी नहीं हैं। माओवादियों ने खुद इस तथ्य से इनकार किया है। इस घटना के बाद माओवादियों ने बापी महतो को किडनेप कर लिया था और उसे संभवत: पुलिस हिरासत में जाकर यह कबूल करने के लिये कहा गया कि वह बताये ज्ञानेश्वरी हादसा माओवादियों की गतिविधि नहीं है ताकि उनकी छवि से यह बदनुमा दाग हट सके कि माओवादी आम लोगों के खून से होली खेलते हैं।
अब महज दो माह के अंदर सैंथिया में यह भीषण हादसा हुआ है। पाठकों की जानकारी बढ़ाने के उद्देश्य से यह सूचना दे दूं कि सैंथिया ममता बनर्जी का ननिहाल है। जाहिर सी बात है एक ओर इस हादसे ने बंगाल चुनाव से ऐन पहले ममता बनर्जी की छवि पर करारा प्रहार किया है, वहीं उसके दिल पर भी चोट की गई है क्योंकि सैंथिया को लेकर उनके मन में गहरा लगाव है। वनांचल एक्सप्रेस का रूट सैंथिया होकर उन्हीं के प्रभाव में करवाया गया था।


कितना कारगर होगा मुलायम का मा$फीनामा
हृ दिनेश शाक्य
जैसे तलाक देने के लिये तलाक को तीन बार बोला जाता है, बिल्कुल इसी अंदाज़ में सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह से अपने संबंधों को लेकर मा$फी मांग कर मुसलमानों को रिझाने के लिये फिर से ट्रांपकार्ड फेंका है। अब देखना है कि मुलायम का यह ट्रांपकार्ड क्या ह$की$कत मे मुसलमानों को रिझाने में कामयाब होगा।
लोकसभा चुनाव से ऐन पहले भाजपा को देश में शीर्ष पर ले जाने में अहम भूमिका अदा करने वाले कल्याण सिंह से दोस्ती के कारण खफ़़ा हुये मुसलमानों को फिर से समाजवादी पार्टी में वापसी के लिए सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों से जहां माफ़ी मांगी, वहीं कल्याण सिंह और दूसरे अन्य नेताओं ने इसे मुलायम की अवसरवादिता करार देकर मुलायम की इस माफ़ी को मुसलमानों को गुमराह करने वाला करार दिया है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की छवि कभी देश मे मुल्ला मुलायम वाली रही है, लेकिन अयोध्या में छह दिसम्बर 1992 की घटना के आरोपी और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से दोस्ती के बाद श्री यादव से उनके परम्परागत मतदाता रहे मुसलमानों ने कन्नी काट ली थी। 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में सपा को कल्याण की दोस्ती की वजह से करारी हार का सामना करना पड़ा था । हालात इतने $खराब रहे हंै कि फिऱोज़ाबाद लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मुलायम की पुत्र बधू डिम्पल यादव तक चुनाव हार गयी थी। विधानसभा उपचुनाव में भी मुलायम पार्टी को लगातार हार झेलनी पड़ रही थी। इतना ही नहीं, मुस्लिम प्रत्याशी होने के बावजूद डुमरियागंज विधानसभा सीट के उपचुनाव में सपा चौथे नम्बर पर खिसक कर दूसरे दलों के मुकाबले चारों खाने चित्त हो गयी। इन परिणामों से परेशान मुलायम सिंह यादव ने मुसलमान मतदाताओं को फिर से अपनी पार्टी में वापसी के लिए मुसलमानों से सार्वजनिक रुप से माफ़ी मांगी और वादा किया कि भविष्य में मस्जिद गिराने के जि़म्मेदार लोगों से कभी भी हाथ नहीं मिलाऊंगा। कल्याण सिंह से राजनीतिक गठबंधन की वजह से मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक ज़मीन ही खिसकती जा रही थी और इसी वजह से मुलायम समेत उनकी पूरी पार्टी के लोग इससे विचलित नजऱ आ रहे थे। कभी मुलायम के हनुमान रहे सपा से निष्कासित अमर सिंह ने भी राज्य के पूर्वी क्षेत्र में सक्रिय पीसपार्टी जैसे दलों से हाथ मिलाकर मुलायम सिंह यादव की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। माना जा रहा है कि इस सबसे निबटने और विधानसभा के 2012 में प्रस्तावित चुनाव को देखते हुए मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों से माफ़ी मांग कर, दूर की कौड़ी खेली है। हालांकि माफ़ीनामे के पत्र में उन्होंने एक बार भी कल्याण सिंह का नाम नहीं लिया है।
मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों के नाम जारी अपने बयान में कहा है-मेरा जीवन साम्प्रदायिक शक्तियों के विरद्ध संघर्ष करने की खुली किताब रहा है। मैंने सदैव साम्प्रदायिक ताकतों को नाकाम करने में पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य निभाया है। सन 1990 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुये अपने संवैधानिक दायित्व का पालन करते हुए मैंने बाबरी मस्जिद को बचाने का काम किया। अपने बयान में मुलायम ने छह दिसम्बर 1992 को उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार रहते हुये बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामलें में मस्जिद गिराने के जि़म्मेदार तत्कालीन मुख्यमंत्री को एक दिन के कारावास की सज़ा भी दी। उन्होंने कहा कि 2009 लोकसभा चुनाव में साम्प्रदायिक शक्तियों की सरकार को केन्द्र में सत्तारूढ़ होने से रोकने में उन्हें कुछ ग़लत तत्वों को साथ लेना पड़ा जिससे भ्रमित होकर सभी धर्मनिरपेक्ष विशेषकर मुसलमान भाईयों को मानसिक कष्ट हुआ और उनकी भावनाओं को ठेस पहुंची। उन्होंने कहा मैं इसे अपनी ग़लती स्वीकार करता हूं और इसलिए मस्जिद गिराने के जि़म्मेदार लोगों को भविष्य में कभी साथ ना लेने की सार्वजनिक घोषणा भी कर चुका हूं। मैं इस घटना के लिए देश के सभी विशेषकर अपने मुसलमान भाइयों से माफ़ी मांगता हूं और उन्हें आश्वस्त करना चाहता हूं कि भविष्य में उनके हितों को सर्वोपरि मानते हुए उनके सम्मान की रक्षा के लिए पूरी निष्ठा से कार्य करता रहूंगा। बार बार मुसलमानोंं से माफ़ी मांग चुके मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर से मुसलमानों से किस इरादे से माफ़ी मांगी है, यह तो साफ़ तौर पर समझ नहीं आ रहा है, लेकिन अनुमान लगाया जा रहा है कि कांग्रेस की ओर जा रहे मुसलमान मतदाताओं को रोकने के लिये मुलायम ने जो माफ़ी मांगी है, अब वो कितनी कारगर होती है, यह देखने वाली बात होगी।
मुलायम ने लिखा है कि मेरा जीवन साम्प्रदायिक शक्तियों के विरद्ध संघर्ष करने की खुली किताब रहा है। मैंने सदैव साम्प्रदायिक ताकतों को नाकाम करने में पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य निभाया है। वर्ष 1990 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुये अपने संवैधानिक दायित्व का पालन करते हुए मैंने बाबरी मस्जिद को बचाने का काम किया। अपने बयान में श्री यादव ने छह दिसम्बर 1992 को उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार रहते हुये बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामलें में मस्जिद गिराने के जि़म्मेदार तत्कालीन मुख्यमंत्री को दोषी मानते हुये अदालत उठने तक की सज़ा भी दी। उन्होंने कहा कि गत लोकसभा चुनाव में साम्प्रदायिक शक्तियों की सरकार को केन्द्र में सत्तारूढ़ होने से रोकने में उन्हें कुछ ग़लत तत्वों को साथ लेना पड़ा जिससे भ्रमित होकर सभी धर्मनिरपेक्ष विशेषकर मुसलमान भाईयों को मानसिक कष्ट हुआ और उनकी भावनाओं को ठेस पहुंची। उन्होंने कहा मैं इसे अपनी ग़लती स्वीकार करता हूं और इसलिए मस्जिद गिराने के जि़म्मेदार लोगों को भविष्य में कभी साथ ना लेने की सार्वजनिक घोषणा भी कर चुका हूं। मैं इस घटना के लिए देश के सभी विशेषकर अपने मुसलमान भाइयों से माफ़ी मांगता हूं और उन्हें आश्वस्त करना चाहता हूं कि भविष्य में उनके हितों को सर्वोपरि मानते हुए उनके सम्मान की रक्षा के लिए पूरी निष्ठा से कार्य करता रहूंगा।
मुलायम सिंह यादव के माफ़ीनामे से तिलमिलाये पूर्व मुख्यमंत्री और अयोध्या में छह दिसम्बर 1992 की घटना के आरोपी कल्याण सिंह ने समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम के मुसलमानों से माफ़ी मांगने को हताशा भरा कदम बताते हुए कहा है कि यदि माफ़ी ही मांगनी है तो उन्हें पिछड़ों से मांगनी चाहिए। कल्याण सिंह बंहद तल्ख शब्दों में कहते है कि मुलायम ने हिन्दुओं की भावनाओं को हमेशा आघात पहुंचाया है और हमेशा तुष्टिकरण की राजनीति की है। उन्होंने कहा कि मुलायम से हाथ मिलाते समय उनके समर्थकों ने उन्हें आगाह किया था कि वह धोखेबाज़ हैं। फऱेब उनकी फि़तरत है, लेकिन अपने सरल स्वभाव के कारण पिछड़ों की लडाई लडऩे के लिए उन्हें समर्थन दिया गया। श्री सिंह का कहना था कि श्री यादव ने केवल उनसे ही नहीं बल्कि करोड़ों पिछड़ों के साथ विश्वासघात किया है। वास्तव में उन्हें पिछड़ों को धोखा देने के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए । मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह के बीच दोस्ती का ख़मियाज़ा सबसे ज्य़ादा मुलायम सिंह यादव को ही भुगतना पड़ा है। कल्याण सिंह कभी भारतीय जनता पार्टी के शिखर पुरूष राजनेता हुआ करते थे, लेकिन वक्त की मार ने कल्याण सिंह को शून्य पर लाकर खड़ा कर दिया। संसदीय चुनाव से पूर्व कल्याण सिंह का सहयोग अचानक समाजवादी पार्टी ने लेने की घोषणा से राजनैतिक हलकों में खलबली मचा दी, ख़ासकर मुस्लिम तबके में कल्याण सिंह की मुलायम सिंह से करीबी के चलते नाराजग़ी देखी गई। इतना ही नहीं समाजवादी पार्टी के किले को ढहने में सपा मुखिया द्वारा की गई धुर विरोधी कल्याण सिंह की दोस्ती भी कयामत ढहा गई। सब जानते हैं कि कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि विवादित स्थल को ढहा दिया गया, जिसकी हिन्दुओं के मुकाबले मुसलमानों को ख़ासी टीस हुई और मुसलमानों का $गुस्सा सातवें आसमान पर था। मुसलमान कल्याण सिंह को बाबरी मस्जिद का हत्यारा करार देते हैं, ऐसे नारे बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद लगाने वाले मुसलमान इस बात को कैसे बर्दाश्त कर लेते कि मुसलमानों के हितों की बात करने वाले मुलायम सिंह यादव कल्याण सिंह को गले मिलते हुये कैसे देख लेते? कल्याण सिंह से दूरी बनाने की कोशिश में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के बाद उनकी पार्टी के दूसरे सांसद भी उन पर विभीषण कह कर उगुंली उठाने लगे हैं। रामपुर की सपा सांसद जयाप्रदा ने मुलायम सिंह यादव की हां में हां मिलाते हुये कल्याण सिंह को विभीषण करार दे डाला है। संसदीय चुनाव से पहले भाजपा और लोधी वोट को अपनी ओर खींचने के इरादे से सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कल्याण सिंह को अपने दल में कथित तौर पर शामिल कर लिया और उनके बेटे राजवीर को सपा का राष्ट्रीय महासचिव बना कर वोट पर कब्ज़ा करने की कोशिश की, लेकिन नाकायाब रहे.संसदीय चुनाव के नतीजे आने के बाद साफ़ हो गया कि कल्याण के शामिल होने का कोई फ़ायदा सपा को हासिल नहीं हुआ दूसरे सपा का परंपरागत मुसलमान मत सपा से दूरी बना गया। सपा को कल्याण से एक फ़ायदा ज़रूर हुआ कि सपा को एक संसदीय सीट ज़रूर बढ़ गई। असल में कल्याण सिंह ने एटा जि़ले से लोकसभा सीट के लिये निर्दलीय किस्मत आज़माई जिसमें सपा ने कल्याण का दिल से सर्मथन किया और अपना कोई भी प्रत्याशी कल्याण सिंह के मुकाबले खड़ा नहीं किया। मुलायम सिंह यादव सोच रहे थे कि भाजपा से अलग हट चुके कल्याण का बाबरी विध्वंस वाला चेहरा मुसलमान भूल गया होगा लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। कल्याण की मुलायम से नजदीकी मुसलमानों को शूल की तरह से चुभ गई। और नतीजा संसदीय चुनाव के बाद उप चुनाव में सपा को भुगतने को मिल गया है। भले ही कहा गया हो सपा से मुसलमान और लोध अभी कटा नहीं है लेकिन हककीत में सपा से मुसलमान और लोध तो कटा ही दूसरी और कई जातियों ने भी सपा से दूरी बना ली। सबसे ज्य़ादा दुख तो मुलायम को अपनी बहू के हारने पर हुआ क्यों की फिऱोज़ाबाद सीट के समीकरण के अनुसार वहां पर लोधी, यादव और मुसलमानों के बाहुल्यता को देखते हुये ही डिंपल यादव को सपा ने चुनाव मैदान में उतार था। लेकिन चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया कि सपा को उसका परंपरागत वोट मिला ही नहीं है। ऐसा ही कुछ मुलायम के गृह नगर इटावा की भी सीट पर हुआ जहां सपा के कब्जे वाली सीट बसपा के हाथों में जा पहुंची, इस सीट पर भी लोधी और मुसलमान निर्णायक भूमिका में है। जिसने सपा के बजाये बसपा में वोट देना जरूरी समझा।
इटावा में जहां पर कल्याण का जादू चलने की उम्मीद की गई थी और वे मतदान केंद्र लोधी प्रभाव वाले थे वहां पर सपा को मुहं की खानी पड़ी। इनमें नमला छंद में बसपा को 192 और सपा को 146, जसोहन बगिया में बसपा को 675 और सपा को 234, सकौआ में बसपा को 233 और सपा को 96, जैनपुर नागर में बसपा को 455 और सपा को 134, दतावली में बसपा को 386 और सपा को 233, खादर में बसपा को 533 और सपा को 24,बमनपुर में बसपा को 204 और सपा को 12,सुदंरपुर में बसपा को 501 और सपा को 106,कुनैरा में बसपा को 538 और सपा को 350,डूंगरी में बसपा को 576 और सपा को 60,विचारपुरा में बसपा को 367 और सपा को 157,सरायदयानत में बसपा को 545 और सपा को 90,नगलाउदय में बसपा को 207 और सपा को 23,काधंनी में बसपा को 514 और सपा को 74,पूठनसकरौली में बसपा को 494 और सपा को 67,हरदासपुर में बसपा को 537 और सपा को 26,रूरा में बसपा को 311 और सपा को 47,लुहन्ना में बसपा को 717 और सपा को 132,कुरट मे बसपा को 408 और सपा को 15,फूफई में बसपा को 441 और सपा को 97,बीलमपुरा में बसपा को 395 और सपा को 31,कल्याणपुर में बसपा को 377 और सपा को 73,सूखाताल में बसपा को 981 और सपा को 200,नेवरपुर में बसपा को 262 और सपा को 9, इसके अलावा अनगिनत ना जाने कितने ऐसे मतदान केंद्र हंै जहां पर कल्याण सिंह का कोई असर नहीं हुआ। फिर भी मुलामय सिंह को ऐसा क्यों लगा कि कल्याण सिंह के कारण मुसलमान सपा से दूर हो रहे हैं, यह तो वे ही जाने. लेकिन कल्याण सिंह को खलनायक साबित करके प्रदेशभर में घटते मुस्लिम जनाधार को बढ़ाने की उनकी कोशिश साफ दिख रही है।

Friday, July 16, 2010






भंवर में भाजपा

चन्द्र
शेखर
सिंह
भोपाल।
जैसा कि हम $खबरयार के तारीख 18 जून 2010 के अंक में ही बता चुके हैं, कि उमा भारती की भाजपा में वापसी तय होती देख मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ गया है, वो अब सच होता सामने आ रहा है। शिवराज उमा से इतना भयभीत है, कि यदि कोई उमा का नाम भी लेता है तो इस भीषण गर्मी में भी उन्हें कंपकपी छूट जाती है। जैसा कि हमने पहले भी लिखा है कि उमा भारती का एक अपना महिमा मंडल है। भाजपा छोडऩे के बाद भी भाजपा में कई नेता उनके समर्थक हैं, जो पार्टी अनुशासन की तलवार से डरकर अब तक चुप बैठै थे, पर अब, जबकि पार्टी हाईकमान स्तर पर उमा की वापसी की सुगबुगाहट शुरू हो गई है, तो उनके समर्थकों में जोश आना व जोश में बयानबाज़ी करना लाजि़मी है।
उमा समर्थकों की इस बयानबाज़ीयों से शिवराज सक्ते में आ गए हैं। उन्होंने मंत्री नरोत्तम मिश्रा के ज़रिए पार्टी के वरिष्ठ नेता बाबूलाल सहित कई दिग्गजों को मुंह बंद रखने की नसीहत दिलवाई। बाबूलाल गौर का इससे $खफा होना जायज़ है। नसीहत देने वाले नरोत्तम मिश्रा ही नहीं, नसीहत दिलवाने वाले $खुद शिवराज सिंह चौहान भी अनुभव, लियाकत और उम्र के लिहाज़ से बाबूलाल गौर के मुकाबले दूध पीते बच्चे हैं।
उमा को लेकर शिवराज के माथे पर चिंता की जो लम्बी-लम्बी लकीरें खींची हुई नज़र आ रही हैं, उसका कारण है कि शिवराज $खुद में जानते हैं, कि उनके शासनकाल में जनता ही नहीं, $खुद भाजपा के शीर्ष नेता भी $खुश नहीं हैं। भाजपा के शासनकाल में शिवराज काल ही ऐसा है जब भ्रष्टाचार की गंगा पूरे वेग से बह रही है। शिवराज के कितने भ्रष्ट मंत्री इस गंगा में अठखेलियां लगा रहे हैं, उनकी गिनती उंगलियों पर करना मुश्किल है। किसी सरकार में किसी मंत्री का भ्रष्ट होना बड़ी बात नहीं है, पर जिस तरह मुख्यमंत्री $खुद अपने भ्रष्ट मंत्रियों को बचा रहे हैं, उससे कई सवाल खड़े होते हैं।
क्या इन दा$गी मंत्रियों के भ्रष्टाचार में उनकी भी पार्टनरशिप है?
क्या वे $खुद भी सीधे तौर पर किसी घपले घोटाले में इनवाल्व हैं, जैसे कि उन पर जे.पी. व डम्पर घोटाले आदि के आरोप लगे हुए हैं।
आ$िखर दा$गी साथी मंत्रियों को बचाने में मुख्यमंत्री इतनी शिद्दत से क्यों जुटे हैं?
शिवराज शासन के इस भ्रष्टाचार काल से भाजपा हाईकमान भी अनभिज्ञ नहीं है। दैनिक अ$खबार पत्रिका ने जब भूमि घोटाले का मामला उठाया, तो इन्दौर में पत्रिका पर ज़मीन घोटाले से जुड़े कैलाश विजयवर्गीय ने अपने गुंडई भाजपाई साथियों की मदद से जो ज़ुल्म ढाया, उसकी आवाज़ संसद तक पहुंची थी। मीडिया संबंधी सरकारी विभाग भी इन भ्रष्ट मंत्रियों की शह पर राष्ट्रीय विचारधारा वाले निष्पक्ष अ$खबारों, पत्र-पत्रिकाओं को सताने में लगे हैं। भाजपा जैसी राष्ट्रीय पार्टी के लिए ये शर्म की बात है। इतना कुछ होने के बाद भी यदि शिवराज दा$िगयों को बचा रहे हैं, तो मौसेरे भाई होने की रिश्तेदारी स्पष्ट नज़र आती है।
दूसरी तर$फ उमा भारती का कार्यकाल देखें तो उसमें कोई दा$ग दिखाई नहीं देता। उमा भारती मुंह फट है, जो दिल में आता है, स्पष्ट बोल देती हैं, लेकिन भ्रष्ट नहीं है। उनको भाजपा से हटाया गया तो, उसका कारण उनका बेलाग सच बोलना ही था, जो किसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता। तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड शिवराज शासन में ही टूटे हैं। कुल मिलाकर भाजपा हाईकमान के नथुनों में भी इस भ्रष्टाचार की दुर्गंध पहुंचना शुरू हो गई है, और वो इस कचरे को सा$फ करने के लिए कोई सख़्त कदम शीघ्र उठाने को तत्पर लगता है। जैसा कि कहा जा रहा है, उमा भारती को यूपी चुनाव की कमान सौंपी जा सकती है। ऐसे में म.प्र. से 'कचराÓ सा$फ किए जाने की स्थिति में उमा भारती एक बार फिर म.प्र. की बागडोर अनुभवी वरिष्ठ भाजपा नेता बाबूलाल गौर को दिलवा सकती हैं। उमा ने अपनी कुर्सी छोड़ी थी, तब भी उन्होंने बाबूलाल गौर पर भरोसा किया था। गौर ने अपने मुख्यमंत्री काल में काम भी अच्छा किया। उनका शासनकाल भी बेदा$ग ही रहा।
सारी परिस्थिति से अवगत शिवराज इसीलिए उनका भ्रष्टशासन अब और ज्य़ादा दूर नहीं चल सकता है। उमा भारती की भाजपा में 'वापसीÓ के साथ ही शिवराज की 6-श्यामला हिल्स से विदाई तय है। बस सबसे बड़ा सवाल ये है, कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा:-उमा भारती या बाबूलाल गौर।








गडकरी दिग्विजय से मा$फी मांगें : लक्ष्मण

भाजपा नेता और पूर्व सांसद लक्ष्मण सिंह ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी द्वारा दिग्विजय सिंह पर की गई टिप्प्णी से क्षुब्ध होकर भाजपा से त्यागपत्र देने का इरादा बना लिया है। श्री सिंह ने कहा कि गडकरी ने मा$फी नहीं मांगी तो वे भाजपा से त्यागपत्र दे देंगे। मा$फी का दो दिन तक इंतज़ार करेंगे। सिंह ने त्यागपत्र तैयार कर लिया है।
यह विवाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के एक बयान से उपजा है। श्री गडकरी ने 4 जुलाई को एक अंग्रेज़ी चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा था कि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह यह बताएं कि वे बार-बार आज़मगढ़ क्यों जाते हैं। क्या वे औरंगज़ेब की औलाद हैं। कांग्रेस महासचिव शिवाजी की औलाद तो नहीं हो सकते। इसी बयान पर कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने गडकरी पर तीखी नाराज़गी ज़ाहिर की है। इससे क्षुब्ध होकर भाजपा के पूर्व सांसद लक्ष्मण सिंह ने भाजपा पर तीखे प्रहार किए हैं।
भाजपा नेता और पूर्व सांसद लक्ष्मण सिंह ने भास्कर से मोबाइल पर चर्चा करते हुए कहा कि गडकरी ने हमारे परिवार पर टिप्पणी की है। ऐसी स्थिति में पार्टी के साथ काम करना नामुमकिन है। गडकरी विवेकहीन हो गए हैं। जब सांसद था, तब मेरा परिवार पार्टी को अच्छा लगता था। अब अचानक मेरे परिवार पर व्यक्तिगत टिप्पणियां की जा रही हैं, जो क्षुब्ध करने वाली हैं।

गडकरी और जेठमलानी के बीच क्या संबंध, स्पष्ट करे भाजपा : दिग्विजय
कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव व प्रदेश प्रभारी दिग्विजय सिंह ने कहा है कि भाजपा को वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी के साथ अपने रिश्तों का खुलासा करना चाहिये, जो न्यायालय में अ$फज़ल गुरू को बचाने के लिए उनका मुकदमा लड़ रहे हंै। उन्होंने भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के अ$फज़ल गुरू और कांग्रेस के संबध में दिये गये बयान पर पलटवार करते हुये कहा कि राम जेठमलानी को गडकरी के दस्तखत से ही राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया गया था। भाजपा अध्यक्ष गडकरी के बयान पर नाराज़गी व्यक्त करते हुए श्री सिंह ने कहा कि भाजपा अध्यक्ष नीतिन गडकरी कभी जीवन में चुनाव नहीं लड़े, लेकिन संघ प्रमुख मोहन भागवत के शहर में रहने के कारण उन्हें पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया है। इसीलिये विभिन्न दलों के नेताओं के बारे में उनके इस तरह के बयान आ रहे है। उन्होंने कहा कि भाजपा शासनकाल में छह साल तक लालकृष्ण आडवाणी गृह मंत्री रहे, लेकिन इस दौरान पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को सज़ा नहीं दी जा सकी। ऐसे में भाजपा यह बताये कि राजीव गांधी के हत्यारे आडवाणी और गडकरी के क्या लगते है। इसके अलावा श्री सिंह ने इलाहाबाद में माया सरकार के मंत्री नन्द गोपल नन्दी पर हुये जानलेवा हमले की निंदा करते हुये कहा कि यूपी में कानून-व्यवस्था चिंता का विषय बन गया है।

अपनी हद में रहें गडकरी : प्रणब
भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के द्वारा कांग्रेस के बारे में की गई अनुचित टिप्पणी के राजनैतिक क्षेत्र में दिवालियेपन के संकेत मिले हंै। लोगों मे यह धारणा बन रही है कि नेताओं का कोई वैचारिक स्तर नहीं है। अ$फज़ल गुरू को कांग्रेस का दामाद बताने की अपनी टिप्पणी को वापस लेने से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अध्यक्ष नितिन गडकरी के इनकार करने पर केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि राजनीतिक नेताओं से बयानबाज़ी में कुछ शालीनता की उम्मीद की ही जाती है। उनको बोलते समय मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिए। मुखर्जी ने कहा कि किसी मुद्दे पर बयान देते समय राजनीतिक नेताओं को कुछ शालीनता बरतनी चाहिए। हालांकि उन्होंने गडकरी का नाम नहीं लिया। गडकरी इससे पहले भी कई बार अनावश्यक बयान देते रहे हैं। गडकरी ने आठ जुलाई को देहरादून में भाजपा की एक रैली में कहा था कि क्या संसद हमले का अभियुक्त कांग्रेस का दामाद है। गडकरी ने फिर यह टिप्पणी दोहराई थी।


आलोचना में सही एवं सभ्य शब्दों का इस्तेमाल करें: जोशी

नितिन गडकरी को अपनी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से भी नसीहत मिल रही है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने भी गडकरी के बयानों को $गलत बताया और सिरे से नकार दिया। वाराणासी में जोशी ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि आलोचना में सही एवं सभ्य शब्दों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

गडकरी को थूक कर चाटने की बीमारी: अजय
कांग्रेस नेता अजय सिंह ने कहा कि भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी को कुछ भी कह देने और फिर माफी मांगने की आदत सी हो गई है। ऐसा लगता है कि उन्हें थूककर चाटने की बीमारी है, जिसका उन्हें इलाज कराना चाहिए। सिंह ने यहां कहा कि गडकरी को यह पूछने के पहले कि 'अ$फज़ल गुरु क्या कांग्रेस के जमाई हैंÓ, यह जान लेना चाहिए था कि इस आतंकवादी के वकील राम जेठमलानी रह चुके हैं, जो भाजपा के समर्थन से सांसद बने हैं। कांग्रेसी विधायक ने कहा कि यह पहली बार नहीं है, जब गडकरी ने ऐसे बयान दिए हैं, जो किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष की गरिमा के अनुरूप नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अगर गडकरी इसी तरह के बयान देते रहे, तो इससे आने वाले दिनों में न तो $खुद गडकरी का और न ही भाजपा का कोई फायदा होगा।
सिंह ने कहा कि कुछ समय पहले भाजपा अध्यक्ष ने लालू यादव और मुलायम सिंह यादव के $िखला$फ चंडीगढ़ में अभद्र बयान दिया था, जिसे बाद में उन्हें वापस लेना पड़ा था।
उन्होंने कहा कि गडकरी एक छोटे स्तर के नेता रहे है, जिन्हें अचानक राष्ट्रीय स्तर का काम सौंप दिया गया है, लेकिन लगता है कि अभी तक उनको यह समझ में नहीं आया है, कि उन्हें अपने पद की गरिमा के अनुरूप कब और क्या कहना है।

Friday, July 9, 2010





सत्ता का द्वार खोलने के लिए करते हैं बंद
महाबंद के आव्हान से आमजन परेशान
हृ चन्द्रशेखर सिंह
महंगाई के $िखला$फ महाबंद रचकर समूचे विपक्ष ने जो एकजुटता दिखाई है, वो कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकती थी, यदि इस महाआयोजन में आम जनता ने भी भागीदारी की होती। पर महंगाई जैसे आमजन से जुड़े मुद्दे पर विपक्ष ने महज़ राजनीति की है, और अपने-अपने क्षेत्र में अपनी ताकत दिखा कर लोगों को बंद करने के लिए मजबूर किया है।
बंद कितना सफल रहा? सवाल ये नहीं है। सवाल ये है कि बंद से क्या महंगाई कम हो पाएगी। हमारी सर्व स मानित सुप्रीम कोर्ट तक ने बंद को $गैर ज़रूरी कहा हुआ है। एक तरह से इस तरह के आमजन की जि़ंदगी को प्रभावित, परेशान करने वाले कृत्यों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई हुई है। फिर क्यों यह महाबंद आयोजित किया गया? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अंग्रेज़ों को भारत से भगाने के लिए कभी बंद का सहारा क्यों नहीं लिया। विपक्ष को इस बंद का मनन करना चाहिए। दरअसल बंद एक सामूहिक जि़ ोदारी है और इससे का$फी सारे लोगों को परेशानी झेलनी पड़ सकती है। बंद यदि सांकेतिक हो, बिना किसी दबाव में किया जाएं तो ठीक है, परंतु आज इस तरह के बंद चाहता कौन है सिवाय इन राजनेताओं के, जिनके पेट इतने भरे हुए हैं, कि यदि ये चार दिन भी भूखे पेट रहें, तो भी इन पर $फर्क नहीं पड़ेगा?
लेकिन भूखे पेट रहना पड़ता है आम आदमी को। दरअसल का$फी सारे आमजन रोज़ मज़दूरी करते हैं तब कहीं जाकर उन्हें शाम का निवाला नसीब होता है। पर बंद उन्हें उनसे उस दिन का रोज़गार छीन लेता है। भूखे पेट करवटें बदलकर रात गुज़ारनी पड़ती है, इन लोगों को।
विपक्ष ने कभी सोचा है कि इस तरह के जबरन किए बंद से कितने लोगों को किचन बंद रखना पड़ा?
बंद आम जनता पसंद नहीं करती है। रोज़ किराने की दुकान, पान की गुमटी से लेकर चौराहे पर छतरी के नीचे जूते गांठ रहे मोची तक को सुबह से शाम तक ग्राहक का इंतज़ार कर कुछ पैसों की कमाई का आसरा होता है। ऐसे में कौन अपनी दुकान बंद रखना चाहेगा। पर गुंडई, राजनीतिज्ञों के डंडे के भय से सबको अपना शटर गिराना पड़ता है। रिक्शे वाला सवारियां लेकर जा रहा है, तो उसमें से सवारियां उतार ली जाती हैं। रिक्शेवाले को दो-चार थप्पड़ जड़ दिये, तो बड़ी बात नहीं। रेलवे स्टेशनों, बस स्टैण्डों पर परेशान होते यात्रियों की तस्वीरें बंद के अगले दिन अ$खबारों छपती हैं, तो उनमें उन स$फर करने वालों के चेहरे पर दर्द स्पष्ट देखा जा सकता है। किसी का कोई प्रिय दूर मर गया है, या किसी प्रियजन के यहां कोई शादी है, पर बेचारा नहीं जा सकता, क्योंकि यदि बस चली तो बंद असफल नहीं हो जाएगा? फिर हमारे विपक्षी भला बंद को क्यों असफल होने देंगे? बस यदि चलेगी तो फंूक दी जाएगी।
विपक्ष ने 6 जुलाई को अपनी ता$कत दि ााई। अकेले मु बई में 155 बसों में तोडफ़ोड़ कर दी। कई उड़ानें प्रभावित हुईं। करोड़ों रूपये की चपत लगा दी, एक ही दिन में। इस सारे नुकसान की भरपाई कौन करेगा। क्या हमेशा की तरह फिर सारा बोझ आम आदमी पर नहीं आएगा?
इस सारी कवायद के बाद विपक्ष इस मु$गालते में आ गया है, कि वो संसद में केन्द्र सरकार को पटकनी देने में कामयाब हो जाएगा। किंतु सड़क पर दिखी गुंडई एकजुटता, सदन में कितना दम दिखा पाएगी, ये आने वाला वक्त ही बताएगा।

Friday, July 2, 2010




श्री 420

दो अलग-अलग मामलों में
प्र$फल्ल पटेल और हरवंश सिंह फिट

धोखाधड़ी और चारसौबीसी प्राचीनकाल से चली आ रही है, पहले ये काम निचले स्तर के लोग ही करते थे और उनकी इस ठगी की रकम महज़ कुछ हज़ार हुआ करती थी, पर अब इस 'व्यवसायÓ में बड़े और इज्ज्ज़तदार लोग आ गए हैं, और आ रहे हैं। केंद्रीय उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल और मप्र विधानसभा उपाध्यक्ष और केवलारी से कांग्रेस विधायक हरवंश सिंह ऐसे ही समाननीय चेहरे हैं जिन पर हाल ही में दो अलग- अलग मामले दर्ज हुए हैं। ऐसे लोगों को सि$र्फ ४२० कहना बेइ़ज्ज़ती होगी, येे श्री ४२० या श्रीमान ४२० कहलाए जाने के ही ह$कदार हैं।
केन्द्रीय उड्डयन मंत्री ने एक ही ज़मीन दो लोगों को बेच दी
बैतूल। आईपीएल मामले से सुर्खियों में आए केंद्रीय उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल की परेशानियां कम नहीं हो रहीं। बैतूल जिला न्यायालय के प्रथम श्रेणी न्यायाधीश ने एक ज़मीन की दो लोगों के नाम रजिस्ट्री करने के मामले में प्रफुल्ल पटेल और कंपनी मेसर्स छोटा भाई जेठा भाई पटेल सहित 7 भागीदारों के $िखला$फ धारा 420 का मामला दर्ज किया है। कोर्ट ने उन्हें 19 जुलाई को न्यायालय में पेश होने के लिए समन जारी कर दिए हैं।
क्या है पूरा मामला
राष्ट्रीय राजमार्ग 69 पर ग्राम बडोरा में प्रफुल्ल पटेल की कंपनी में छोटा भाई जेठा भाई एंड कंपनी ने 17 हज़ार वर्ग फीट ज़मीन बैतूल के नवनीत गर्ग को बेची थी। इसकी रजिस्ट्री 19 मई 2003 को की गई। कंपनी ने यह ज़मीन 11 जून 2003 को बैतूल के ही अशोक दीक्षित को बेच दी। ज़मीन पर कब्ज़ा पाने के लिए नवनीत गर्ग करीब 6 वर्षों तक संघर्ष करते रहे।
क्या हुए हैं आदेश
परिवादी नवनीत गर्ग के परिवाद पर $फैसला सुनाते हुए न्यायिक मस्ट्रिेट प्रथम श्रेणी सिराज अली ने मे. छोटा भाई जेठा भाई एंड कंपनी, अरविंद भाई पटेल पिता छोटा भाई निवासी सागर, मोटापोर खेड़ा गुजरात निवासी हर्षद भाई पिता नटरवरलाल, दीपक पिता रमन भाई पटेल, किरन भाई पिता रमन भाई पटेल, शेलेश भाई पिता रमन भाई पटेल, गोंदिया महाराष्ट्र निवासी प्रफुल्ल भाई पिता मनोहर भाई पटेल, कौशल भाई पिता अरविंद भाई पटेल और ईश्वर भाई पटेल को छल और धोखाधड़ी का दोषी पाया। न्यायाधीश ने आदेश में कहा कि आरोपियों के विरुद्ध धारा 420 भादवि केअंतर्गत अपराध का संज्ञान लिया जाता है। परिवादी नवनीत गर्ग के वकील ने बताया कि यह दांडिक परिवाद है। इसमें 7 वर्ष तक की सज़ा का प्रवधान है।

विधानसभा उपाध्यक्ष द्वारा $खरीदी गई ज़मीन के स्वामी और निकले
उधर सिवनी से $खबर है कि म.प्र. विधानसभा उपाध्यक्ष और केवलारी से कांग्रेस विधायक हरवंश सिंह के $िखला$फ धनौरा थाने में ज़मीन $खरीदी मामले में धोखाधड़ी का केस दर्ज किया गया है। शिकायतकर्ता मोहम्मद शाह द्वारा लखनादौन के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में परिवाद-पत्र दायर करने के बाद कोर्ट के आदेश पर सोमवार जून 28 को एफआईआर दर्ज की गई। मामले में हरवंश सिंह, उनके पुत्र रजनीश सिंह, नियाज़ अली के विरुद्ध धारा-420, 506, 294, 120-बी का मामला दर्ज हुआ है। धनौरा थाना प्रभारी के अनुसार हरवंश सिंह और उनके बेटे ने आमानाला में संयुक्त खाते की ज़मीन नियाज अली से $खरीदी थी। इस संपत्ति में नियाज अली के अलावा मोहम्मद शाह एवं अन्य भाई बहनों का भी अधिकार था। परिवाद में कहा गया है कि पैतृक ज़मीन बिकने की भनक जब मो. शाह को लगी तो उसने अपने भाई नियाज़ अली, विस उपाध्यक्ष हरवंश सिंह व उनके पुत्र रजनीश सिंह के समक्ष विरोध जताया। इस पर परिवादी के साथ उन लोगों द्वारा मारपीट कर जान से मारने की धमकी दी गई। अदालत में प्रस्तुत परिवाद में कहा गया है कि ज़मीन $खरीदी मामले में लिप्त लोगों द्वारा पुलिस पर दबाव बनाकर न्यायिक जांच नहीं होने दी गई जिसके कारण परिवादी को राष्ट्रीय भ्रष्टाचार निरोधक मानव अधिकार संस्थान से मदद मांगनी पड़ी।
इस पर यह मामला लखनादौन न्यायालय में पहुंचा। लखनादौन के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट एएस सिसोदिया के समक्ष परिवाद में उन्होंने संज्ञान लेते हुए धनौरा पुलिस को हरवंश सिंह, रजनीश सिंह के विरुद्ध सीआरपीसी-156, 3 के तहत कार्रवाई कर धारा-420, 506, 294, 120 बी के तहत अभियोग प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं।


आंचलिक पत्रकार संघ की पहल रंग लायी
अनियमितताओं को
बढ़ावा दे रहे अधिकांश अधिकारी जि़ले से स्थानांतरित

अनूप सक्सेना
राजगढ़।
जि़ले में आंचलिक पत्रकार संघ के पदाधिकारियों द्वारा भ्रष्टाचार के विरूद्ध मिशन के रूप छेड़ा गया अभियान अब प्रभाव दिखाने लगा है। जिन अधिकारियों के विरूद्ध उनके द्वारा बरती जा रही गंभीर अनियमितताओं को लेकर अभियान चलाया गया था, उनमें जि़ले में पदस्थ जि़ला वन मण्डलाधिकारी (डी.ए.ओ.) एच.सी.गुप्ता का स्थानांतरण बालाघाट किया गया है। उनकी राजनैतिक जोड़तोड़ व प्रभावशाली राजनीतिज्ञों से सम्पर्क इस बार काम नहीं आ सके। इस क्रम में ग्रामीण विकास विभाग में पदस्थ कार्यपालन यंत्री वाय.एस.नेगी का स्थानांतरण झाबुआ किया गया है। उल्लेखनीय है कि श्री नेगी के विरूद्ध पानसेमल (बड़वानी)में पदस्थ रहते लाखों रूपयों की वित्तीय अनियमितता किये जाने के कारण शासन स्तर से मंत्रायल पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा आरोप पत्र जारी किया गया था, और उनसे वसूल की जाने वाली राशि 30 लाख रूपये तय की गयी थी। फिर भी उनकी पदस्थापना राजगढ़ जि़ले कार्यपालन यंत्री आर.ई.एस. पद पर कर दी गयी थी और 200 करोड़ की बारहमासी सड़कें निर्माण किये जाने का नियंत्रण पर्यवेक्षण का कार्य श्री नेगी जैसे गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आदी अधिकारी को सौंप दिये जाने के विरोध में आंचलिक पत्रकार संघ द्वारा आवाज़ बुलंद करते हुये ग्रामीण विकास विभाग केन्द्र के ग्रामीण विकास मंत्री सी.पी.जोशी को अवगत कराया था। इसी तजऱ् पर जि़ला वाणिज्यकर अधिकारी श्री बास्कले द्वारा जि़ले में पदस्थ रहते विभाग के बड़े बकायादारों से पांच करोड़ की राशि वसूल न करना इन व्यवसायियों से सांठगांठ कर $फजऱ्ी नीलामी दिवस प्रदर्शित कर इन सम्पत्तियों का $खरीदार न मिलना दस्तावेज़ों में दर्शाकर इन दोषी व्यवसायियों को सुरक्षित रखना। इन व्यवसायियों को उनके परिजनों के नाम से दूसरे पंजीयन नम्बर, टिन नं. एलाट करना, आदि आरोपों की शिकायत आंचलिक पत्रकार संघ द्वारा शासन स्तर पर प्रमाणित दस्तावेज़ों के साथ की जाने से वाणिज्यकर अधिकारी का स्थानांतरण इंदौर किया गया। इसी तजऱ् पर जि़ला आबकारी अधिकारी श्री घनोरा को भी राजगढ़ जि़ले से हटाया गया। उनके विरूद्ध भी विभागीय ठेकेदारों से दो करोड़ से अधिक राशि की वसूली न किये जाने का मामला था इन ठेकेदारों के विरूद्ध आर.आर.सी. जारी होने के बाद भी जि़ला आबकारी अधिकारी के संरक्षण में ये ठेकेदार अपने कर्मचारियों के नाम से अपना शराब का कारोबार बदस्तूर जारी रखे हुए थे। इन महकमों में नये अधिकारियों के पदस्थ होने के बाद निश्चित तौर पर उम्मीद की जाती है कि सुधार नज़र आयेगा।

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