VISITORS

Saturday, June 18, 2011


‘दिग्गी राजा’ आज भी ‘तुरुप ·ा इक्·ा’
हृ जैनेन्द्र ·ुमार
राजनेताओं ·े बारे में आम राय यही है ·ि इन·े ‘खाने ·े दांत और दिखाने ·े दांत और’ होते हैं, यानी ये ·हते ·ुछ हैं और ·रते ·ुछ और हैं, ले·िन आज भी देश में ·ुछ ऐसे नेता मौजूद हैं, जो पूरी मुस्तैदी से अपनी जि़म्मेदारियों ·ो निभा रहे हैं। वे जो ·हते हैं वही ·रने ·ा दम भी रखते हैं। हम बात ·र रहे हैं ·ांग्रेस पार्टी ·े महासचिव दिग्गी राजा ·े नाम से विख्यात दिग्विजय सिंह ·ी। उन·ी ·ुशलता और बुद्धिमत्ता ·ा लोहा ·ांग्रेस पार्टी में ही नहीं, देश ·ी सभी पार्टियां ए· मत से स्वी·ार ·रती हैं। दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश ·े मुख्यमंत्री पद से हटने ·े बाद १० साल त· ·िसी भी प्र·ार ·ा चुनाव न लडऩे और मंत्री पद न लेने ·ा ऐलान ·िया था, और उस·ा पालन वे आज भी ·र रहे हैं। हालां·ि अब वे यूपीए नीत सर·ार में ·िसी मंत्री पद पर नहीं हैं, इस·े बावजूद जब भी ·िसी भी तरह ·ा हमला सर·ार पर ·िया जाता है, तो उस·े डिफेंस में वे ही सबसे पहले प्रति·्रिया जताते और पार्टी ·ी रीति-नीतियों ·ो पु$ख्ता ·रने ·ी मुहिम में लगे नज़र आते हैं। इसे देखते हुए यह ·हा जा स·ता है ·ि मध्य प्रदेश ·े दिग्गी राजा जो ·हते हैं वैसा ही ·रने ·ी ·ुव्वत भी रखते हैं, उन्हें न सत्ता ·ा लालच है और न ही सुर्खियों में छाए रहने ·ी परवाह। इस·े बाद भी हाल ·े महीनों पर नज़र डालें तो सा$फ हो जाता है ·ि यूपीए सर·ार पर या इस·े ·िसी राजनेता पर विरोधी पार्टी या नेता ·िसी भी तरह ·ा वार ·रता है, तो दिग्गी राजा पलटवार ·र उस·ी बोलती बंद ·रने में पीछे नहीं रहते। तटस्थता से देखा जाए तो नज़र आता है ·ि मौनी बाबा ·े नाम से मशहूर रहे देश ·े भूतपूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव ·े बाद ·िसी ने मौन साधने में महारत हासिल ·ी है तो वे हैं वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। इन·े बारे में तो अब यहां त· ·हा जाने लगा है ·ि जब त· सुप्रीम ·ोर्ट डांट-फट·ार न ·रे तब त· मनमोहन अपना मौन भंग ·रने ·ी ज़हमत नहीं उठाते। सोनिया गांधी ·ी बात ·रें तो वे भी ज़्यादा ज़ुबानी जमा$खर्च ·रने में य·ीन नहीं रखतीं। ·ांग्रेस सर·ार ·े वरिष्ठ मंत्री ·पिल सिब्बल, पी. चिदमबरम त· ·िसी घपले-घोटाले ·ी बात छिड़ते ही मौन साध लेते हैं। ऐसे हालात में दिग्गी राजा ही विरोधियों ·ो ·ाबू में रखने ·ा ·ाम ·रते हैं। अब यह बात सा$फ हो चली है ·ि दिग्गी राजा ने ही सर·ार ·ा हर मोर्चे पर बचाव ·रने ·ी जि़म्मेदारी उठा रखी है। बाबा रामदेव ·े अनशन ·े मामले में जहां ए· ओर सर·ार ·े चार-चार ·ेन्द्रीय मंत्री बाबा ·े स्वागत में बिछे नज़र आए। हालां·ि, इस·े बाद भी वे अपने निहितार्थों में सफलीभूत न हो स·े और उन्हीं में से ए· ·ी जल्दबाजी ·े चलते ४ जून ·ो अनशन·ारियों पर पुलिस ·ार्रवाई ·ो अंजाम दिया गया और अब सुप्रीम ·ोर्ट ने इस·े लिए जवाब-तलब ·िया है। वहीं इससे इतर दिग्गी राजा ने डं·े ·ी चोट पर योग गुरु बाबा रामदेव ·ी ·ड़ी आलोचना ·ी, यहां त· ·ि बाबा ·ो ‘ठग’ त· ·हने ·ी हिम्मत दिखाई। हाल ही बाबा रामदेव ·े अनशन तोडऩे ·े बाद दिग्गी राजा यह ·हने से नहीं चू·े ·ि रामदेव ·ी ‘नौटं·ी’ समाप्त हो गई है। $गौरतलब यह भी है ·ि ऐसा नहीं है ·ि दिग्विजय सिंह ·ी तल्ख टिप्पणियां महज़ सुर्खियां बटोरने ·े लिए होती हैं। सच तो यह है ·ि ·ांग्रेस ·े दिग्गज नेताओं में शुमार ·िए जाने वाले दिग्गी राजा सरीखा दमखम अब पार्टी ·े अन्य नेताओं में ·म ही नज़र आता है, जो विरोध ·े वक्त, विपरीत हालात में भी पार्टी और सर·ार ·ो बचाने ·े लिए ढाल ·ी तरह खड़े नज़र आते हैं। जब-जब भी पार्टी पर आंच आई या विपक्ष ने ·ुछ $गलत ·िया तो उन्होंने टी·ा-टिप्पणी ·र उन्हें राजनीति ·ी शालीनता ·े दायरे में रखने वाली बातें (चाहे वे चुभने वाली ही क्यों न हों) बेझिझ· ·हीं। रामदेव ·े ४ जून ·े अनशन ·े दौरान देर रात पुलिस ·ार्रवाई ·ो भुनाने ·े चक्·र में भाजपा ने राजघाट पर ए· दिन ·ा अनशन ·िया। हद तो तब हो गई जब पार्टी ·ार्य·र्ताओं ·ा मनोबल बढ़ाने ·े नाम पर बीजेपी नेत्री सुषमा स्वराज ने जम·र ठुम·े लगाए और उसपर तुर्रा यह ·ि हम तो देशभक्ति गीत पर नाच रहे थे। $खैर, ह·ी·त ·ुछ भी हो, ले·िन जिन दर्श·ों ने सुषमा स्वराज ·ो जिस अंदाज़ में न्यूज़ चैनलों ·े ज़रिए अपने टीवी सैट्स पर लाइव नाचते देखा, उसे देख·र ऐसा लगाता तो नहीं था ·ि वे ‘मनोरंजन’ ·े लिए नहीं ‘मनोबल’ बढ़ाने ·े लिए नाच रहीं हैं। इस पर ·ड़ी आपत्ति जताते हुए दिग्विजय सिंह ने भाजपा ·े नेताओं से राजघाट पर महात्मा गाँधी ·ी समाधि ·ा अपमान ·रने ·े लिए नैति·ता ·े आधार पर त्यागपत्र देने त· आग्रह ·िया और भाजपा ·ो ‘नचनियों ·ी पार्टी’ घोषित ·र दिया। आज बीजेपी ·ी हालत देखें तो वह शीर्षविहीन नज़र आती है, अटलबिहारी वाजपेयी ·े बाद लाल·ृष्ण अडवाणी प्रधानमंत्री बनने ·ा सपना देखने लगे थे, ले·िन देखते ही देखते पार्टी ·े अन्य नेताओं ने उन्हें हाशिए पर ला दिया है।
भाजपा ·े अन्य नेताओं में भी आपसी खींचतान जारी है, ऐसे में पार्टी ·ा भविष्य अधर में है, इसी ·ो देखते हुए दिग्गी राजा बीजेपी पर ·ोई भी वार ·रने से चू·ते नहीं हैं। ·हने ·ो तो ·ांग्रेस पार्टी में दिग्गज नेताओं ·े नाम पर लंबी फेहरिस्त सहज ही बनाई जा स·ती है, ले·िन ·ोई भी ·ठोर ·दम लेने ·े वक्त या सर·ार पर ·ोई गंभीर आसन्न सं·ट ·े समय ·ांग्रेस भी शीर्षविहीन सरीखी ही नज़र आती है, क्यों·ि सर·ार से ·ोई $गलती होने पर उस·ा ठी·रा ·ोई भी अपने सिर नहीं फोडऩा चाहता, इसी तहर पार्टी में अनुशासन बनाए रखने और ·ठोर निर्णय लेने ·े वक्त भी सभी चुप्पी साध लेते हैं। ऐसे में ·ांग्रेस ·े तारणहार दिग्गी राजा ही पहल ·रते हैं और विरोधियों ·ो ·ाबू ·रने ·ा ·ाम ·रने ·े साथ ही पार्टी ·े अंदर भी अनुशासन ·ो ·ायम रखने ·े लिए पहल ·रते नज़र आते हैं। इस तरह से वर्तमान राजनीति· परिदृश्य ·ो देखते हुए ·हा जा स·ता है ·ि ·ांग्रेस पार्टी ·े लिए दिग्विजय सिंह आज भी तुरुप ·ा पत्ता साबित हो रहे हैं। और इस बात ·ो मानने में ·िसी ·ो ·ोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए ·ि अपनी घोषणा ·े अनुसार यदि १० साल बाद दिग्गी राजा चुनाव लड़ते हैं तो न ·ेवल वे अपने बूते चुनाव जीत·र मध्य प्रदेश ·े मुख्यमंत्री ·े पद ·ो सुशोभित ·रेंगे, वरन ·ेन्द्र ·ी राजनीति में ही दमदार भूमि·ा पर खरा उतरेंगे।




जि़ला भाजपा ·े वन मैन शो गौरीशं·र बिसेन
हृ रहीम खान
भरवेली (बालाघाट)। राज्य सर·ार में सह·ारिता एवं पी.एच.ई विभाग ·े मंत्री गौरीशं·र बिसेन जबसे प्रदेश मंत्री मण्डल में शामिल हुए उन्होंने अपनी ·ार्यप्रणाली से मीडिया में ज़्यादा से ज़्यादा जगह हासिल ·ी है साथ ही जि़ले ·ी राजनीति में भी उन्होंने अपने ·ार्यो से ए· नया परिवर्तन लाया और आयोजित होने वाले पार्टी ·े ·ार्य·्रम जिस भव्यता ·े साथ संपन्न होते है यह स्थितियां पहले ·भी जिले में नही देखी गई। यही ·ारण है ·ि उन·े बारे में ·हां जाता है ·ि बालाघाट जिला भारतीय जनता पार्टी में गौरीशं·र बिसेन, जिन्हें लोग प्यार से गौरी भाउ ·ह·र पु·ारते है ने जिले ·ी राजनीति ·ी दिशा बदल दी। इस वक्त वह पार्टी में वन मेन शो है। प्रदेश सर·ार ·ा प्रत्य· $फैसला चाहे वह ·लेक्टर ·ा तबादला हो एस.पी. ·ा या पार्टी से जुड़ा ·ोई भी निर्णय उसे तब त· हरी झण्डी नहीं मिलती जब त· ·ि उसे गौरी भाउ ओ·े न ·र दें। म.प्र. ·े मुख्यमंत्री शिवराज सिंह प्रदेश भर ·ा भ्रमण ·रते हैं, वहां उन·ा स्वागत सत्·ार भी होता है। परंतु जो भव्यता और ए· अलग तरह ·ा रोमांच बालाघाट जि़ले ·े भ्रमण में देखने ·ो मिलता है, वह अन्य प्रदेशों में नहीं। बेहद सहज भाव ·े साथ सह·ारिता मंत्री एवं पी.एच.ई. विभाग ·े मंत्री ·े रूप में अपनी उपलब्धियों ·ो गिनाने वाले गौरीभाउ ने विगत ए· माह ·े अंतराल में तपती धूप में गांव-गांव घूम·र जिले ·ी राजनीति में नई हलचल पैदा ·र दी है। गर्मी ·ी उमस में जब घर बैठना पंसद ·रते तब गौरीभाउ अपने ·ार्य·र्ताओं ·े साथ अधि·ारियों ·ी टोली ले·र ग्रामीण क्षेत्रों ·े चप्पे-चप्पे में घूम·र ए· तरह से जनता ·ी अदालत लगा रहे हैं और लोगो ·ी समस्याएं सुन·र उसे तत्·ाल समाधान ·रने ·ी ओर भी पहल ·र रहे हैं। इस स·्रियता ·े संबंध जब उनसे ·हां गया तो उन·ा उत्तर था, उन·े ·ार्य·ाल ·ो ढाई वर्ष हो चु·े है, इस अंतराल में हमने अपने ·ामों से जनता ·े दिल में ·ितनी जगह बनाई उन·ी समस्याओं ·ो ·ितना निरा·रण ·िया और ·ौन सी समस्या है, जिन·ा समाधान बा·ी है। साथ ही लोग हमारे और सर·ार ·े बारे में क्या सोच रहे हैं, इस·ा आ·लन ·रने ·े दृष्टि·ोण से ही यह सघन जनसंपर्· अभियान चलाया जा रहा है।
यह सब ·ार्य प्रदेश ·े मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ·े मार्गदर्शन में ·िया जा रहा है। ·ारण यह है ·ि जनता से जुड़े जितने बड़े ·ार्य अतीत में रही सर·ारों ने नहीं ·िये वह वर्तमान प्रदेश सर·ार ·र रही है। गौरीभाउ इस जनसंपर्· अभियान में अधि·ारियों ·ो फट·ारने में भी ·हीं पीछे नहीं है। साथ ही पुलिस से जुड़ी समस्याओं पर वह दो टू· उत्तर देते हैं, ·ि यदि पुलिस ·र्मचारी या अधि·ारी अपनी ·ार्यप्रणाली में सुधार नहीं ·रते, तो उन्हें तबादले ·े लिये तैयार रहना चाहिये। 18 दिवसीय विदेश यात्रा में 11 देशो ·े भ्रमण पर उन्होंने जो अनुभव प्राप्त ·िया उस·ो अमली जामा पहनाने ·े प्रयास भी वह मप्र में ·रना चाहते हैं, और इस बात ·ा विश्वास है ·ि आने वाले वर्षों में हेण्डपंप जैसी सुविधाओं से बेहतर सुविधा वह जनता ·ो उपलब्ध ·राएंगे। उन्होंने महसूस ·िया ·ि परिवार नियोजन ·ार्य·्रम ·ो शक्ति ·े साथ अमल में लाना चाहिये। बढ़ती जनसंख्या हमारे लिये निश्चित रूप से चिंता ·ा विषय है। विदेशी भ्रमण में उन्होंने महसूस ·िया ·म आबादी बेहतर वि·ास ·ा रास्ता प्रशस्त ·रती है। ढाई वर्ष ·े मंत्री·ाल में सफलता ·े साथ विवादों ·ा भी सामना उन्हें ·रना पड़ा, जिस·े चलते ·ुछ समय उन्हें खामोश रह·र विभागीय ·ार्यो में बिताना पड़ा। परन्तु ए· बार फिर जनता ·े बीच उन·ी स·्रियता इस बात ·ी ओर सं·ेत ·र रही है ·ि आने वाले चुनावों में वह ·िसी बड़े राजनीति· लक्ष्य ·ो प्राप्त ·रने ·ी ओर ·ार्य ·र रहे हैं। संभव है ·ि प्रदेश ·ी राजनीति में ·ुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं, उस·ा असर उन·े क्षेत्र या जिले में ना पड़े उस·े पहले ही वह अपनी ज़मीन मज़बूत रखना चाहते हैं। साथ ही बहुमुखी राजनीति· प्रतिभा ·ी धनी पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष उन·ी पत्नी श्रीमती रेखा बिसेन ·े लिए भी वह सुरक्षित चुनाव क्षेत्र ·ा आ·लन ·रने में लगे है। फिलहाल उन·ी स·्रियता यही ·ुछ अप्रत्यक्ष राजनीति· संदेश दे रही है।

Saturday, June 11, 2011






योग 'गुरुÓ राजनीति में है 'गुरु-घंटालÓ

कुल मिलाकर देखा जाए तो योग की दुनिया के दिग्गज गुरु स्वामी रामदेव राजनेताओं से गच्चा खा ही बैठे। उन्हें राजनीति में आना है तो उनका स्वागत है, लेकिन उन्हें
इससे पहले राजनीति के खेल को समझने के लिए किसी राजनीतिक गुरु की शरण लेकर राजनीति की एबीसीडी से शुरू करना होगा, तब जाकर उनकी मांगें और राजनीति में नाम कमाने का उनका सपना साकार हो सकेगा। बहरहाल गलतियां दोनो ओर से की गई हैं किसी एक पक्ष पर ही सारा दोष मढ़ देना सही नहीं है। हां, लोकतांत्रिक देश का नागरिक होने के नाते इतना ज़रूर कहना होगा कि 4 जून के दोषियों को कठोर से कठोर सज़ा दी जाए ताकि फिर से मानवता को शर्मसार करने की कोई दुर्घटना न हो। रामदेव को भी यह समझना होगा कि जनता जिसके साथ होती है, सत्ता उसी के हाथ में सौंपती है, इसके लिए अभी उन्हें राजनीति के दांव-पेंच को सीखने के साथ ही इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसी निडरता से काम लेना होगा। राजनीति में मुसीबत से भागने वाला नहीं, बल्कि मुसीबत का सामना करते करते प्राण-गंवाने वाले को ही सच्चा नेता माना जाता है। एक वाक्य में कहें तो, योग गुरू राजनीति में गुरु-घंटाल ही साबित हुए हैं। हृ जैनेन्द्र कुमार
$िफलवक्त योग गुरु बाबा रामदेव के सत्याग्रह के दौरान यानी 4 जून 2011 की देर रात को दिल्ली पुलिस की कार्रवाई देशभर में बहस का विषय बन गई है। जितने मुंह उतनी बातें, केन्द्र सरकार बाबा रामदेव को $गलत बताती है तो बाबा रामदेव केन्द्र सरकार को वादा $िखला$फी का दोषी मानते हैं। कुल मिलाकर पूरा देश दो धड़ों में बंटा नज़र आता है एक बाबा रामदेव के साथ है तो दूसरा केन्द्र सरकार के साथ, लेकिन सिलसिलेवार दोनों पक्षों पर नज़र डालें तो एक अलग ही तस्वीर नजर आती है केन्द्र सरकार और बाबा रामदेव दोनों ने ही $गल्तियां की हैं, कोई भी दूध का धुला हुआ नहीं है। सभी पक्षों पर नज़र डालती खोज परक रपट:-
योग गुरु बाबा रामदेव की ओर से की गई गलतियां
पहली- भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की ओर से 1 जून 2011 से 20 दिन तक के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में 5,000 लोगों की मौजूदगी में योग शिविर चलाने की अनुमति ली गई थी, लेकिन इससे इतर 3 जून की मध्यरात्रि तक ही रामलीला मैदान में 25,000 से ज्यादा लोग रामलीला मैदान में आ गए थे और 4 जून की बात करें तो यह संख्या लगभग 50,000 के करीब तक पहुंच गई थी। बाबा राम देव की ओर से की गई पहली चूक यह थी कि जब उन्हें इस बात का अंदाजा था कि देशभर में उनके लाखों भक्त-समर्थक हैं फिर क्यों उनके संरक्षण में चल रहे ट्रस्ट की ओर से महज 5,000 आदमियों के लिए अनुमति ली गई, क्या वे सरकार को धोखा देने के पक्ष में थे, क्या उनकी नीयत में खोट था।
दूसरी- $खास बात यह है कि भ्रष्टाचार व विदेशों में जमा भारतीयों के कालेधन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर उसे वापस देश में लाने। विदेशी भाषा में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों को भारतीय भाषाओं में पढ़ाने व भ्रष्टाचारियों को फांसी की सज़ा देने का प्रावधान किए जाने जैसी मांगों को लेकर सत्याग्रह करने का जब बाबा रामदेव पहले से ही ऐलान कर चुके थे, तब उनके ट्रस्ट ने दिल्ली के रामलीला मैदान पर सत्याग्रह करने की अनुमति लेने के बजाय, योग शिविर चलाए जाने की अनुमति क्यों ली? यह भी लाख टके का सवाल है जब आप सच्चाई की राह पर हैं और न्याय के लिए लड़ रहे हैं तो ऐसी लड़ाई डंके की चोट पर सा$फ नीयत से लडऩे के बजाय चोरी-छिपे या छल-कपट के सहारे लडऩे की कोशिश क्यों की गई?
तीसरी- सरकार ने जब 4 जून को रामलीला मैदान का जायज़ा लिया तो पाया कि वहां 5,000 से दस गुना ज़्यादा नागरिक एकत्र हैं और योग शिविर की अनुमति लेकर सत्याग्रह चलया जा रहा है। सरकार ने यह भी महसूस किया कि अगले दिन यानी 5 जून 2011 को उनके साथ प्रसिद्ध गाँधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे भी अपने समर्थकों के साथ शामिल हो सकते हैं, तब हालात हर हाल में काबू से बाहर हो जाएंगे और उसे किसी तरह से भी काबू कर पाना संभव नहीं होगा, तब तुरंत प्रभाव से प्रशासन की ओर से 4 जून की देर रात को ही ट्रस्ट को दी गई अनुमति रद्द कर दी गई। जब अनुमति रद्द करने के पत्र को लेकर सरकार के कारिंदे बाबा रामदेव के पास पहुंचे और उन्हें वह पत्र देना चाहा, तो बाबा और उनके समर्थकों ने पत्र लेने से इंकार कर दिया, इतना ही नहीं उन्होंने सरकार को ललकारते हुए कहा, कि हम किसी की नहीं सुनने वाले, सरकार से जो हो सके वह कर ले। जब सरकार ने भारत स्वाभिमान ट्रस्ट को योग शिविर के लिए अनुमति पत्र दिया तब तो उसने झट से ले लिया और अनुमति रद्द पत्र देना चाहा तो उसका सुर बदला नजर आया। क्या यह व्यवहार किसी सच्चे सत्याग्रही और उसके समर्थकों अथवा बाबा रामदेव और उनके अनुयायियों की गरिमा के अनुकूल था। कदाचित नहीं, बल्कि यही ऐसा कदम था जिसने सरकार को इस बात के लिए न केवल उकसाया, बल्कि मजबूर कर दिया कि वह सरकार और प्रशासन के आदेश को ठेंगा दिखाने वाली अभद्र जनता को काबू करने के लिए कठोर कदम उठाए।
चौथी- जब दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी बाबा रामदेव को गिर$फ्तार करने गए तो उन्होंने भीड़ को शांत रहने की बात तो कही लेकिन उन्होंने महात्मा गाँधी सरीखे सत्याग्रही की भाँति शांतिपूर्ण तरीके से गिर$फ्तारी देने के बजाय छद्म रूप धर पुलिस प्रशासन को चकमा देने की कोशिश की। वे मंच से देखते ही देखते कूद गए और भीड़ में घंटों छिपे रहे। करीब तीन घंटे तक रात में बाबा के समर्थकों को लगा कि बाबा को पुलिस ने गिर$फ्तार कर लिया है और वह उनके योग गुरु को किसी भी प्रकार की हानि पहुंचा सकती है, जबकि दूसरी तरफ पुलिस की पकड़ से बाबा रामदेव बाहर थे, पुलिस समझ गई थी कि लोग $गलत समझ रहे हैं और उन्हें लग रहा है कि पुलिस ने बाबा को पकड़ लिया है और वह उनके समर्थकों से झूठ बोल रही हैं। इस $गलतफहमी के कारण ही बाबा के कुछ समर्थक भाव आवेश में आकर पत्थर फेंकने लगे। फिर जैसा कि होता है एक हल्की सी आक्रोश की चिंगारी देखते ही देखते हिंसक बेकाबू भीड़ में तब्दील हो गई। आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि करीब आधा लाख लोग महज़ डेढ़ हज़ार पुलिसकर्मियों पर पत्थर बरसाने लगें तो हालात कैसे होंगे। यह वह स्थिति थी जिसमें मजबूरन हालात काबू में करने के लिए न चाहते हुए भी पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा। पचास हज़ार लोगों की आक्रोशित भीड़ के मुकाबले डेढ़ हज़ार पुलिसकर्मी क्या हैसियत रखते हैं, यह सहज ही समझा जा सकता है इसलिए हालात काबू करने के लिए सीआपीए$फ के जवान और रैपिड एक्शन $फोर्स के जवानों को भी रामलीला मैदान पर बुलाना पड़ा। तब करीब तीन घंटे लाठीचार्ज के बाद बेकाबू भीड़ को नियंत्रित किया गया। इस दौरान सैकड़ों बेगुनाह घायल हुए, तो हज़ारों को मामूली चोटें आईं। घायलों को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। यह सबसे बड़ी बाबा रामदेव की ओर से की गई $गलती थी, कि वे महिला का सलवार सूट पहन कर दीवार के सहारे छिप कर बैठे रहे और उनके बुलावे पर अपना घर-परिवार छोड़कर आए उनके भक्त लाठियों से पिटते रहे, वहीं पुलिसकर्मी पत्थरों का सामना करते रहे। और यह सब हुआ $गलत$फहमी के कारण। अगर बाबा रामदेव चाहते तो इन सब हालात से बचा जा सकता था, जब भीड़ को यह गलत$फहमी हुई कि पुलिस ने बाबा को पकड़ लिया है, और पत्थरबाज़ी शुरू हुई, तभी वे सामने आ जाते, तो मामाला सा$फ हो जाता कि बाबा गिर$फ्तार नहीं हुए हैं, और वे शांति की अपील करते तो भीड़-जिसमें ज़्यादातर उनके भक्त ही थे शांत हो जाते और लाठी चार्ज की नौबत ही न आती। यह कहां की बाबागीरी है या सत्याग्रह है कि जिस बाबा पर यकीन कर अपने घर-परिवार को छोड़कर आए लोग पिटते रहे, वही बाबा महिला के कपड़ों में उनके आसपास ही छिपा रहा और हद तो तब हो गई जब तीन घंटे बाद मामला कुछ ठंडा पडऩे पर उन्होंने अपनी महिला साथियों के साथ पुलिस की आंख में धूल झोंककर भागने की कोशिश की, हालांकि वे इस कोशिश में नाकम रहे और दिल्ली पुलिस ने उन्हें गिर$फ्तार कर लिया। यह भी गौरतलब है कि पुलिस सबसे पहले बाबा के मंच पर गई थी, उसी समय बाबा गिरफ्तारी दे देते, तो किसी प्रकार की गलत$फहमी नहीं फैलती, न जनाक्रोश फैलता, न इतनी हिंसा का नंगा नाच होता। ईमानदारी से देखा जाए तो इस सब के लिए परोक्ष रूप से बाबा रामदेव स्वयं भी जि़म्मेदार हैं।
पांचवीं- बाबा रामदेव ने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस रामलीला मैदान में उनकी हत्या करने और लाशें बिछाने के इरादे से आई थी, तब सवाल यह उठता है कि अगर वह इसी इरादे से आई थी और 4 जून को देर रात 2:00 से 4:00 बजे के बीच दिल्ली पुलिस, रैपिड एक्शन $फोर्स और सीआरपीएफ की संयुक्त कार्रवाई के दौरान उसने भीड़ पर पूरी तरह से काबू पा लिया था, तो उसने समर्थकों की लाशें क्यों नहीं बिछाईं और बाबा रामदेव को भी गिर$फ्तार कर लिया, तो उन्हें मारने के बजाय ससम्मान उनके हरिद्वार आश्रम में क्यों छोड़ आई? बाबा रामदेव का यह आरोप कि पुलिस उनको मारने के इरादे से आई थी, सरासर गलत और मिथ्यावचन हैं, क्योंकि बाबा रामदेव पब्लिक फिगर हैं, उनकी गिनती देश के हाई प्रो$फाइल योग गुरुओं में होती है, उनसे आम आदमी ही नहीं, नामी, रसूखदार, धनी और राजनेता तक आशीर्वाद लेने और योग के गुर सीखने जाते हैं, ऐसे में सरकार उन्हें किसी भी तरह की चोट पहुंचा कर क्यों अपने ही गले में घंटी बांधने का काम करेगी? यह बात गले नहीं उतरती।
छठी- बाबा रामदेव कहने को भ्रष्टाचार व विदेशों में जमा भारतीयों के कालेधन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर उसे वापस देश में लाने। विदेशी भाषा में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों को भारतीय भाषाओं में पढ़ाने व भ्रष्टाचारियों को फांसी की सज़ा देने का प्रावधान किए जाने जैसी गंभीर मांगों को लेकर सत्याग्रह कर रहे हैं, लेकिन वक्त-वेवक्त उनका मज़ाकिया अंदाज़ इस बात का परिचायक है, कि वे सही मायने में अभी इन मुद्दों और सत्याग्रह के प्रति न तो पूर्ण रूप से गंभीर हैं, न ही समर्पित।
सातवीं- सत्याग्रह के दौरान एक ही मंच से साध्वी ऋतम्भरा और अन्य साम्प्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर उन्होंने सत्याग्रह को रातनीति और साम्प्रदायिकता के रंग में रगने दिया, चाहिए तो था कि वे भी अन्ना हज़ारे की तरह किसी भी राजनीतिक या साम्प्रदायिक ताकत से हाथ मिलाने के बजाय अपने बूते और आम जनता के बूते अपनी मांगे मंगवाने के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ नज़र आते।
आठवीं- अन्ना हज़ारे ने बाबा रामदेव को सत्याग्रह शुरू करने से पहले ही आगाह किया था कि वे केन्द्र सरकार के नेताओं से सावधान रहें, लेकिन उन्होंने अन्ना हजारे की बात पर ध्यान नहीं दिया, और कांग्रेस सरकार के चार दिग्गज मंत्रियों के कहे-सुने में आकर पत्र लिख दिया और बाद में उन्हें पछतावे के सिवाय कुछ नहीं मिला। आम आदमी भी यह जानता है कि अगर एक तर$फ अन्ना हज़ारे सरीखा समाजसेवी हो और दूसरी ओर सरकार के घाघ मंत्री तो किस पर यकीन किया जाए, लेकिन बाबा रामदेव तो आम आदमी से भी अनाड़ी निकले और आ$िखरकार राजनीति के भंवर में फंस ही गए।
नवीं- बाबा रामदेव ने महिला के कपड़े पहनने पर सफाई दी कि शिवाजी ने भी औरंगजेब से बचने के लिए ऐसा किया था, लेकिन वैसे हालात 4 जून की रात को नहीं थे और वे अपने ही वेश में रहते तब भी उनकी जान को किसी तरह का कोई $खतरा नहीं था, उनके 4 जून की रात को किए गए व्यवहार से साफ हो जाता है कि भले ही वे योग की दुनिया के बेताज बादशाह हों, लेकिन राजनीति में वे सि$फर ही हैं।
दसवीं- बाबा रामदेव ने बार-बार आरोप लगाया कि सारी कार्रवाई के पीछे सोनिया गाँधी का हाथ है, मनमोहन सिंह का हाथ है। उन्होंने यह भी कहा कि सोनिया गाँधी विदेशी मूल की होकर राजनीति में हो सकती हैं, तो वे क्यों नहीं हो सकते। सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के मुद्दे को तूल देना बाबा को शोभा नहीं देता, क्योंकि अगर बाबा पूरी दुनिया के भक्तों से भेंट-चढ़ावा ले सकते हैं, तो उन्हें एक विदेशी से इस कदर परहेज़ क्यों है।
ग्यारहवीं- 7 जून को देर रात एक टीवी न्यूज़ चैनल के हवाले से बाबा रामदेव ने कहा कि वह दिल्ली सरकार को मा$फ करते हैं। सवाल उठता है कि जो सरकार महज़ चार दिन पहले जिस बाबा रामदेव और उनके समर्थकों की खून की प्यासी थी, उसे बाबा रामदेव ने इतनी आसानी से मा$फ कैसे कर दिया।
कांग्रेस सरकार की ओर से की गई गलतियां
पहली- सरकार की इस मामले में सबसे ज़्यादा भद्द इसी वजह से पिटी है कि उसने आधी रात को शांतिप्रिय ढंग से अनशन करने की मंशा से आए बाबा और उनके समर्थकों को डरा-धमका कर भगा दिया।
दूसरी- बाबा रामदेव के मंच से $गायब होने के बाद भीड़ जब नेतृत्वविहीन हो गई तो उसपर लाठीचार्ज करने की क्या तुक है। कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि महिलाओं के कपड़े फाड़ कर और लघुशंका के लिए गई महिलाओं को महिला शौचालय से खींच-खींच कर बाहर लाया गया। ऐसा कर दिल्ली पुलिस किस तरह की वीरता दिखाना चाहती थी।
तीसरी- जब सत्याग्रह में आए समर्थक हाथ जोड़ रहे थे, तब पुलिस को लाठियां भांजने या उन्हें डराने-धमकाने की क्या मजबूरी आ पड़ी।
चौथी- इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों के कैमरे क्यों बंद करवाए गए और न मानने पर उनके भी हाथ-पैर तोडऩे की धमकी क्यों दी गई। मीडियाकर्मियों से दुव्र्यवहार क्यों किया गया? मीडिया कर्मियों के कैमरे बंद क्यों करवाए गए, क्या पुलिसकर्मी, रैपिड एक्शन $फोर्स और सीआरपीए$फ के जवान कुछ ऐसा कर रहे थे जो मानवता को शर्मसार करने वाला था, बर्बर था, अमानुषिक था, जिसके दिखाए जाने पर जनता भड़क सकती थी, या सरकार के नुमांइदों की पोल खुलने का डर था।
पांचवां- बाबा रामदेव के दिल्ली पहुंचने पर सरकारी प्रोटोकॉल की अनदेखी करते हुए एक नहीं चार चार कैबिनेट मंत्री उनकी अगुवानी के लिए गए। उन्हें इतना वेटेज क्यों दिया गया। क्या इस सबके पीछे बाबा रामदेव को प्रसन्न कर सत्याग्रह न करने के लिए उन्हें मनाना था। इसी के तहत बाबा रामदेव और चारों कैबिनेट मंत्रियों की ओर से कई बार चर्चाओं के दौर चले और जब बात नहीं बनी, तो जैसा कि कहा जा रहा है, कपिल सिब्बल ने बदले की कार्रवाई का मन बना लिया। जिस बाबा रामदेव के स्वागत में चार कैबिनेट मंत्रियों ने पलक-पांवड़े बिछाए, बात बिगडऩे पर उन्हीं बाबा और उनके समर्थकों को सरकार की ताकत दिखाने में सरकार ने देर नहीं की। देर रात को ही योग शिविर की अनुमति रद्द कर दी गई, और कानून के डंडे निरीह लोगों पर बरसाए गए। महिला, बच्चों, बीमारों और वृद्धों तक को नहीं छोड़ा गया।
छठी- बाबा रामदेव के सत्याग्रह से पहले ही सरकार के वरिष्ठ मंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा कि बाबा ठग है। इसके पास काला धन है। अगर ऐसा ही था तो सरकार ने अब तक ऐसे (अपराधी) के $िखला$फ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। ऐसे बाबा के स्वागत के लिए सरकार ने चार वरिष्ठ मंत्रियों को क्यों भेजा गया?
सातवीं- सत्याग्रह से पहले दिग्विजय सिंह ने कहा था कि हम बाबा रामदेव से डरते नहीं हैं, इसीलिए हमने उन्हें गिर$फ्तार नहीं किया है। अगर हम बाबा रामदेव की ताकत से डरते तो कब का उन्हें पकड़ कर बंद कर दिया होता, फिर 4 जून को क्या सरकार बाबा रामदेव से डर गई थी कि उन्हें गिर$फ्तार करने के लिए रामलीला मैदान पहुंच गई। और फिर देखते ही देखते इतना डरी कि पुलिसकर्मियों से साथ ही उसे सीआपीएफ और आरएएफ को भी बुलाना पड़ा। आंसू गैस के गोले दागने पड़े। लाठी चार्ज करना पड़ा।
आठवीं- कुछ महीने पहले ही हुए गुर्जर आंदोलन के दौरान आरक्षण की मांग को लेकर ट्रेन की पटरियों पर कब्ज़ा कर लिया गया, सड़क मार्ग अवरुद्ध कर दिए गए, लाखों लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा, करोड़ों रुपए की सार्वजनिक सम्पत्ति का नुकसान किया गया। सैकड़ों व्यापारियों को रोज़ाना लाखों-करोड़ों का नुकसान सहना पड़ा। एक पुलिस चौकी तक आग के हवाले कर दी गई। इतना सब होने के बाद भी इसी कांग्रेस सरकार ने आंदोलनकारियों के $िखला$फ कोई कठोर कदम नहीं उठाया। इसके उलट बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के दिल्ली के रामलीला मैदान पर शांतिपूर्ण सत्याग्रह करने से किसी को कोई परेशानी नहीं हुई। आम जनता की बात की जाए तो उसे परेशानी तो दूर वह तो इस बात से $खुश थी, कि कोई तो है जो अन्ना हज़ारे के बाद भ्रटाचार के खात्मे, काले धन को देश में लाने के बारे में गंभीर है, और न्याय के लिए लड़ रहा है। इससे बावजूद कांग्रेस सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से आपतकाल सरीखी कार्रवाई की गई। इतनी स$ख्त कार्रवाई की गई और आम जनता से इतनी बर्बरता से पुलिस प्रशासन पेश आया कि सुप्रीम कोर्ट को जवाब तलब करना पड़ा है। यह दिखाता है कि कांग्रेस भी दोहरे मापदंड और पूर्वग्रह की शिकार है।
नवीं- सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मनमोहन सिंह ने कहा कि सरकार के पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था, क्या प्रधानमंत्रीजी आम आदमी को यह बताने का कष्ट करेंगे कि आ$िखर ऐसा उनकी क्या मजबूरी थी, कि उनके पास और कोई रास्ता ही नहीं रहा।
कुल मिलाकर देखा जाए तो योग की दुनिया के दिग्गज गुरु स्वामी रामदेव राजनेताओं से गच्चा खा ही बैठे। उन्हें राजनीति में आना है तो उनका स्वागत है, लेकिन उन्हें इससे पहले राजनीति के खेल को समझने के लिए किसी राजनीतिक गुरु की शरण लेकर राजनीति की एबीसीडी से शुरू करना होगा, तब जाकर उनकी मांगें और राजनीति में नाम कमाने का उनका सपना साकार हो सकेगा। बहरहाल गलतियां दोनो ओर से की गई हैं किसी एक पक्ष पर ही सार दोष मढ़ देना सही नहीं है। हां, लोकतांत्रिक देश का नागरिक होने के नाते इतना ज़रूर कहना होगा कि 4 जून के दोषियों को कठोर से कठोर सज़ा दी जाए ताकि फिर से मानवता को शर्मसार करने की कोई दुर्घटना न हो। रामदेव को भी यह समझना होगा कि जनता जिसके साथ होती है, सत्ता उसी के हाथ में सौंपती है, इसके लिए अभी उन्हें राजनीति के दांव-पेंच को सीखने के साथ ही इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसी निडरता से काम लेना होगा। राजनीति में मुसीबत से भागने वाला नहीं, बल्कि मुसीबत का सामना करते करते प्राण-गंवाने वाले को ही सच्चा नेता माना जाता है। एक वाक्य में कहें तो, योग गुरू राजनीति में गुरु-घंटाल ही साबित हुए।




उमा भारती का वनवास $खत्म
उत्तर प्रदेश में करेंगीं पार्टी को मजबूत

नई दिल्ली।
मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की बीजेपी में वापसी हो गई है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने आज इस संबंध में घोषणा की। भारती 2005 में पार्टी से बाहर हो गई थीं। उन्हें उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी अध्यक्ष ने साफ कर दिया कि उनका कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश रहेगा और वे लखनऊ में अधिकांश समय देंगीं।
भारती ने कर्नाटक के हुबली के ईदगाह मैदान पर तिरंगा फहराने के एक आंदोलन में हिस्सा लिया था और उसी मुद्दे पर उनके $िखला$फ गिर$फ्तारी वारंट निकला था। वे उस समय मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री थीं, और वारंट के कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। पार्टी ने वरिष्ठ नेता बाबूलाल गौर को कमान सौंप दी थी।
इसके बाद पार्टी और उमा के बीच मतभेद बढ़ते गए और अंतत: पार्टी ने उमा को बाहर का रास्ता दिखा दिया।उसके बाद उमा भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी बनाई लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। अब वे फिर पार्टी में वापस आ गई हैं।
पार्टी अध्यक्ष गडकरी ने कहा कि उमा भारती ने पार्टी में शामिल होने की इच्छा जताई और इसके बाद उन्होंने पार्टी नेताओं से चर्चा की। भारती की संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पार्टी छोडऩे के पहले उमा के सुषमा स्वराज से विवाद पर उन्होंने कहा कि वह इतिहास है। उन्होंने सा$फ किया कि मध्य प्रदेश के नेताओं सहित सभी बड़े नेताओं से उनकी चर्चा हुई है और इसी के बाद यह निर्णय लिया गया।
उमा भारती ने कहा कि वे पिछले पांच साल भूलना चाहती हैं। वे उत्तर प्रदेश के अलावा गंगा नदी को साफ करने के भी अभियान में हिस्सा लेंगीं। उन्होंने कहा कि बीजेपी से अलग होकर भी उन्होंने विचारों से कभी भी समझौता नहीं किया।
इसी बीच भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि बीती बातें भूलकर, आगे की सुध लें। उमाजी का महत्व है तभी पार्टी ने उन्हें वापस लिया है। वे उन्हें घर जाकर बधाई देंगे।
उन्होंने बताया कि पार्टी ने सबकी सहमति से निर्णय लिया है, मुझसे भी बात की गई थी। उनसे पूछा गया कि क्या पार्टी अब भी 2013 का विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ेगी, शिवराज ने कहा कि मुझे पार्टी जो काम देती है, मैं वो करता हूं।
यूपी के महाभारत में उमा की एंट्री
तेज़ तर्रार महिला नेता उमा भारती की भारतीय जनता पार्टी में वापसी हो गई। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मंगलवार 14 जून को इसका औपचारिक ऐलान किया। उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा गया है। इसके साथ ही यह तय हो गया कि उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभी चुनाव में उमा भारती भाजपा की स्टार प्रचारक होंगी।
प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए नितिन गडकरी ने कहा कि उमा भारती पार्टी की तेज़ तर्रार नेता रही हैं। उन्होंने इच्छा जताई थी कि मेरी श्रद्धा इस पार्टी के साथ है और मैं दोबारा से पार्टी के लिए काम करना चाहती हूं। उनकी इस इच्छा का सम्मान करते हुए हमने उन्हें पार्टी में दोबारा लेने का फैसला किया है। नितिन गडकरी ने कहा कि उत्तर प्रदेश उनका कर्मक्षेत्र होगा और वह राज्य में मुख्य रूप से प्रचार का काम करेंगी। उन्होंने कहा कि पार्टी में आने से पहले ही वह हमारी पवित्र नदी गंगा बचाओ आंदोलन में शिरकत कर रही हैं। हमारी पार्टी की देश की सांस्कृतिक विरासत की रक्षा में पूरा विश्वास रहा है, और हमारी पार्टी इसके लिए उनके साथ लड़ेगी। पत्रकारों को संबोधित करते हुए उमा भारती ने कहा कि मेरे राजनीतिक जीवन की शुरुआत ही इस पार्टी से हुई। 15-20 सालों तक इस पार्टी में जुड़े रहने के बाद कुछ अप्रिय घटनाओं के कारण मैं पिछले पांच-छह सालों तक पार्टी से अलग रही, लेकिन इस दौरान भी मेरी विचारधारा पार्टी के साथ ही रही। उन्होंने कहा कि मुझे लगा कि अगर मुझे देश के लिए कुछ करना है, तो इसी पार्टी में रहकर कर सकती हूं। उन्होंने पार्टी में अपनी वापसी पर प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए कहा कि मेरी कोशिश रहेगी कि मैं पार्टी की सेवा तन्मयता से कर सकूं। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश गांवों का एवं राम का राज्य है। वहां राम राज्य लाने के लिए मैं पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलकर काम करूंगी। उन्होंने पार्टी के अधिकारियों और अध्यक्ष गडकरी को धन्यवाद दिया।
गौरतलब है कि उमा भारती ने सोमवार को इस बाबत संकेत दिए थे। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा था कि देश को ईमानदार नेता की ज़रूरत है और मैं ईमानदार हूं। राजनीति उनका कर्मक्षेत्र है।
उल्लेखनीय है कि नवंबर 2004 को भाजपा मुख्यालय में एक मीटिंग के दौरान उमा भारती ने ब$गावती तेवर दिखाते हुए लालकृष्ण आडवाणी पर खुला हमला बोल किया था, जिसके बाद 2005 में उन्हें भाजपा से निष्कासित कर दिया गया था। उमा भारती पिछले का$फी समय से उत्तर प्रदेश में गंगा बचाओ आंदोलन में शिरकत कर रही हैं। इस बात के कयास पहले से ही लगाए जा रहे थे कि उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी उमा भारती की पार्टी में वापसी का ऐलान कर देगी।

Friday, June 3, 2011









साधना, सुषमा और शिवराज का दांवहृ




विनोद उपाध्याय




भाजपा की बड़ी दीदी यानी सुषमा स्वराज का वर्तमान रेड्डी बंधुओं के कारण विवादों में फंसा हुआ है। यह विवाद क्या गुल खिलाएगा यह तो कुछ दिनों में पता चल ही जाएगा लेकिन उनके लिए सबसे चिन्तादायक $खबर यह है कि उनका भविष्य अधर में लटकने वाला है। भाजपा से प्रधानमंत्री पद की संभावित दावेदारों में से एक लोकसभा की नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज को भी इसका आभास हो गया है। उन्हें यह $खतरा दिख रहा है, उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की धर्मपत्नी साधना सिंह से।यायावर राजनेता रहीं सुषमा स्वराज को लगभग ढाई दशक बाद विदिशा संसदीय क्षेत्र के रूप में एक सुरक्षित ठिकाना मिला है। हरियाणा विधानसभा से 1977 में शुरू हुआ उनका राजनीतिक स$फर, अंबाला कैंट, करनाल, दिल्ली, बेल्लारी और उत्तराखंड होते हुए मप्र आकर विराम ले रहा है। श्रीमती स्वराज अब $खुद को मध्यप्रदेश निवासी साबित करने के साथ हमेशा उस विदिशा से ही जुड़े रहना चाहती हैं, जो भाजपा के लिए देश में सर्वाधिक सुरक्षित दो संसदीय क्षेत्रों में से एक है।शिवराज को विदिशा इतना प्यारा है कि उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद यहां से पार्टी की वरुण गांधी को लोकसभा भेजने की इच्छा को भी मान्य नहीं किया। वरुण की काट के तौर पर क्षेत्र की जनता ने मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी साधना सिंह का नाम आगे बढ़ाया। समझौता मुख्यमंत्री के $खास मित्र रामपाल सिंह के नाम पर हुआ, जिन्हें मंत्री पद से इस्ती$फा दिला कर शिवराज ने लोकसभा भेजा, तो केवल इसलिए कि विदिशा पर उनकी विरासत बरकरार रहे। उनके इसी विदिशा पर सुषमा की नज़र गड़ गई। हरियाणा में दो बार विधायक रहीं सुषमा स्वराज अपने गृह प्रांत में लोकसभा का एक भी चुनाव नहीं जीत पाईं। उन्होंने करनाल से 1980, 1984 और 1989 में लगातार तीन लोकसभा चुनाव लड़े और तीनों में पराजय हाथ लगी। ओजस्वी वक्ता और महिला होने के नाते भाजपा को उनकी संसद में ज़रूरत थी, तो उन्हें 1990 में राज्यसभा भेज दिया गया। इसके बाद हरियाणा के बजाए दिल्ली उनका मुकाम हो गया और उन्हें 1990 में राज्यसभा भेज दिया गया और उन्होंने 1996 तथा 1998 के चुनाव दक्षिण दिल्ली से लड़े। वे लगभग तीन माह दिल्ली की मुख्यमंत्री भी रहीं, लेकिन वहां के विधानसभा चुनाव में अपनी सरकार न बनवा पाईं।सुषमा को उनका कद बढ़ाने वाली पराजय मिली सोनिया गांधी के हाथों। 1999 में भाजपा ने उन्हें कर्नाटक के बेल्लारी से श्रीमती गांधी के $िखला$फ उतारा और इसके बाद वे भाजपा के लिए $खासम$खास हो गईं। श्रीमती स्वराज को पार्टी ने 2000 में उत्तराखंड से राज्यसभा भेजा। यह कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्हें 2006 में मध्यप्रदेश से उच्च सदन पहुंचाया गया। मध्यप्रदेश से जुड़ाव ने उन्हें यहां स्थायी डेरा जमाने की प्रेरणा दी और सुषमा ने मप्र में लोकसभा सीट पर दावा जता दिया। अंदरखाने की बातें हैं कि मुख्यमंत्री उन्हें विदिशा नहीं देना चाहते थे, इसलिए भोपाल संसदीय क्षेत्र की पेशकश की गई। सुषमा को यह जम भी गया, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री और भोपाल के सांसद कैलाश जोशी का वीटो भारी साबित हुआ। हारकर शिवराज को विदिशा से अपने मित्र रामपाल सिंह को होशंगाबाद भेजना पड़ा, जहां रामपाल को पराजय नसीब हुई और विदिशा में सुषमा को विजय। अब कभी भोपाल में मुख्यमंत्री का आवास रहा शानदार बंगला सुषमा स्वराज का है। यहीं से वे विदिशा का अपना साम्राज्य संभालती है। वे कह भी चुकी हैं कि अब अंतिम समय तक विदिशा से उनका नाता बना रहेगा। बताते हैं कि सुषमा के विदिशा प्रेम ने शिवराज सिंह को हरकत में ला दिया है और सुषमा का यह विदिशा प्रेम ही साधना को राजनीति में सक्रिय होने का मुख्य कारण बन गया है।अपने पति द्वारा सहेज कर रखे गए संसदीय क्षेत्र से बेदखल होने की पीड़ा ने उन्हें राजनीति की मुख्य धारा में ला दिया। प्रदेश भाजपा के अनुकूल माहौल में उन्होंने महिला मोर्चा का उपाध्यक्ष पद लिया है और उनकी सक्रियता पहले से कही अधिक है। वे हर बुधवार विदिशा में बनवाए गए मंदिर जाती हैं, तो वहां के लोगों की समस्याएं भी प्राथमिकता से हल करवाती हैं। कहना नहीं होगा कि विदिशा के लिए अब दो महिला नेत्रियां सक्रिय हैं, एक सांसद दूसरी सांसद बनने की संभावना को $खारिज कर चुकी हैं, लेकिन उनकी लोकप्रियता और क्षेत्र के प्रति समर्पण इस बात की चुगली कर रहा है, कि मौका मिला तो वे चुनाव ज़रूर लड़ेंगी। ऐसे में उनकी पहली प्राथमिकता विदिशा ही होगी। इसलिए अभी कहा नहीं जा सकती कि भाजपा के बड़े नेताओं का लांचिंग पैड रहा विदिशा अगली बार किसको संसद पहुंचाएगा। बताते हैं कि अभी तक अपने आपको मध्य प्रदेश की राजनीति तक ही सीमित रखने का मन बना चुकी साधना सिंह को केंद्रिय राजनीति का सपना दिखा रही हैं महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष स्मृति ईरानी। भाजपा के सूत्र बताते हैं, कि हमेशा अपने पति(शिवराज सिंह चौहान) के साथ साए की तरह रहने वाली साधना सिंह को राजनीति की पाठशाला के गुण-दोष सिखाने का जि़म्मा भी स्मृति ईरानी ने उठा रखा है। साधना सिंह के संभावित प्रयासों को भांप कर सुषमा स्वराज ने भी दिल्ली की अपनी व्यवस्तताओं में से विदिशा के लिए अधिक से अधिक समय निकालना शुरू कर दिया है। उनकी हरियाणवी टीम के लोग संसदीय क्षेत्र में घूम-घूम कर $फीडबैक लेते रहते हैं। एक तरह से क्षेत्र की पूरी कमान ही श्रीमती स्वराज के इन $खास लोगों के हाथों में है। स्थानीय नेतृत्व को किसी भी काम के लिए इन्हीं लोगों से संपर्क करना पड़ता है। श्रीमती स्वराज हर माह का एक सप्ताह विदिशा और भोपाल को देकर नब्ज टटोलती रहती है। क्षेत्र के लिए मोबाइल एंबुलेंस सहित कई सौगातें भी वे दे रही हैं। उधर विदिशा को अपना घर बना चुके शिवराज सिंह चौहान और उनकी धर्मपत्नी साधना सिंह विदिशा से किसी भी कीमत पर दूरी नहीं बनाना चाहते हैं। उनके लिए यह क्षेत्र उतना ही $खास है, जितना वर्तमान संसद के लिए है। शिवराज के प्रदेश भर में सक्रिय रहने को देखते हुए साधना सिंह ही विदिशा से संबंधित मामले देखती हैं। उनका गांव-गांव के कार्यकर्ताओं से नाता है और क्षेत्र में वेयर हाउस, मकान भी हैं। क्षेत्र के एक पूर्व विधायक कहते हैं कि शिवराज सिंह समूचा संसदीय क्षेत्र पैदल ही नाप लेते थे। वे ऐसे सांसद थे, जिनका जनता से सीधा जुड़ाव था, अगर भैया को $फुरसत नहीं मिलती थी तो भाभी (साधना सिंह) समस्याओं को हल करवा दिया करती थीं, मगर अब वो बात नहीं रही। इस लिए हम चाहते हैं कि भैया न सही भाभी तो अपने लोगों का प्रतिनिधित्व करें। वहीं शिवराज समर्थक संघ के एक नेता ने भी उन्हें चेताते हुए कहा है कि सुषमा की आदत है कि वह पहले उंगली पकड़ती हैं और मौका मिलते ही उस आदमी को धकेल कर उसकी जगह ले लेती हैं। वह कहते हैं कि हरियाणा की राजनीति से बेद$खल होने के बाद जब सुषमा राजनीति करने दिल्ली पहुंची तो पहले उन्होंने वहां के दबंग नेता मदन लाल खुराना की उंगली पकडऩी चाही, लेकिन खुराना ने सुषमा स्वराज को कोई विशेष महत्व नहीं दिया, सो वे उनकी सरकार के मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के साथ दिल्ली में अपनी पकड़ बनाने में जुट गईं। वर्मा के ही दम पर उन्होंने दक्षिण दिल्ली लोकसभा का चुनाव भी जीता। समय आने पर खुराना की जगह सज्जन सिंह वर्मा को $िफट करा दिया और बाद में स्वयं उस पद पर (दिल्ली की मुख्यमंत्री) बैठ गईं। 1998 में दिल्ली विधानसभा का चुनाव सुषमा स्वराज के नेतृत्व में लड़ा गया, जिसमें सरस्वती पुत्री को 84 के दंगों के दा$गी नेताओं ने मिलकर धूल चटा दी। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि भाजपा के टिकट वितरण में सबसे ज़्यादा सुषमा स्वराज की ही चली थी, और नतीजे आने पर दिल्ली से भाजपा का ऐसा स$फाया हुआ, कि आज तक उस सदमें से नहीं उभर पाई। ऐसे में मध्य प्रदेश में सत्ता और संगठन को इस विषय पर मंथन करने का अभी पर्याप्त समय है। अब देखना है की सुषमा स्वराज की $िखला$फत में मध्य प्रदेश की राजनीति में उठा बवंडर शांत होता है, या आंधी का रूप धारण करता है।




भाजपा विधायक-सरपंच पर $फौजदारी




मुकदमामामला नवलपुरा में सिक्ख समाज के धार्मिक स्थल पर तोडफ़ोड़ का, सिक्खसमाज की भावनाओं को भड़काने संबंधी प्रकरण
15 जून को कोर्ट में पेश होंगे विधायक होना होगा, सरपंच की ज़मानत मंज़ूर
हृ मनीष मडहारखरगोन।
खरगोन जि़ले के भगवानपुरा क्षेत्र के विधायक जमना सिह सोलंकी को इंदौर के निजी चिकित्सालय सुयश में भर्ती कराया गया। उन्हें अंनिद्रा के चलते तकली$फ हो रही थी। विधायक के करीबी सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार स्थानीय डाक्टरों की सलाह के बाद उन्हें इंदौर रै$फर किया गया है। जि़ले के नवलपुरा में सिख समाज के सदस्यों से अभद्रता करने पर उनके $िखला$फ प्रथम न्यायायिक दंण्डाधिकारी न्यायालय में आपराधिक प्रकरण दर्ज किया है शहर और राजनैतिक तबके में चर्चा ज़ोरों पर है, भगवानपुरा क्षेत्र के विधायक जमना सिह सोलंकी को 30 मई को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना था, जहां उनकी ज़मानत पर फैसला होना था नवलपुरा के सिख समाज के लोगों द्वारा लगाये गये मुकदमे के कारण क्षेत्र के विधायक की रातों की नींद हराम हो गई है। सोमवार को विधायक जमना सिह सोलंकी न्यायालय के समक्ष हाजि़र नहीं हुये। उनके अभिभाषक ने स्वास्थ कारणों का हवाला देकर राहत की मंाग की न्यायालय ने परिवाद के अधिवक्ताओं की मंाग पर दोबारा समन जारी कर दिया है।प्रथम श्रेणी न्याययिक दण्डाधिकारी न्यायालय में सोमवार मई 30 को $खासी चहल-पहल रही सिक्ख समाज के सरदार महेन्द्र सिह ओर उनके साथी एवं परिवार के सदस्य परिवाद पर मुकदमे का सामना कर रहे भाजपा के विधायक जमना सिह सोलंकी और धुलकोट के सरपंच जगदीश सोलकी को सोमवार को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होना था न्यायालय ने इन्हें प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुये स्वत: ही प्रकरण दर्ज कर समन जारी किये थे, परन्तु विधायक न्यायालय के समक्ष हाजि़र नहीं हुये। उनके अभिभाषक ने न्यायालय के समक्ष स्वास्थ कारणों का हवाला दिया व उपस्थित नहीं होने संबंधी आवेदन के साथ पुलिस दस्तावेज़ भी पेश किये न्यायालय ने विधायक के स्वास्थ कारणों पर अस्पताल के दस्तावेज़ो की मांग स्वीकारते हुये उन्हे 15 जून को उपस्थित होने का समन जारी किया गया है।न्यायलय ने सोमवार को भाजपा विधायक जमना सिंह सोलकी के स्वास्थ कारणों के हवाले पर दस्तावेज़ की मंाग की है, $गौरतलब है कि सोलंकी इंदौर के निजी अस्पताल सुयश में दाखिल है, और पिछले तीन दिनों से अपना इलाज करवा रहे हैं, पुलिस ने भी सुयश हास्पिटल में विधायक के होने की पुष्टि की है, वहीं सिक्ख समाज के लोगों ने विधायक के अस्पताल में दाखिल होने पर तल्ख टिप्पणी ज़ाहिर की है समाज के लोगों ने कहा कि समन जारी होने के बाद ही विधायक की बीमारी सामने आई है। अक्सर राजनैतिक नेता किसी मामले में फंसने के बाद ही बीमार होकर अस्पताल में भर्ती होते हैं। मामले से जुड़े सरपंच को सोमवार को न्यायालय के समक्ष पेश हुये उन्हे 10000 रू के मुचलके और इतनी ही राशि पर ज़मानत दे दी गई। इसी मामले में विधायक को जारी समन पर अब दोबारा तारीख तय की गई है, बहरहाल परिवाद के अभिभाषक की मंाग पर न्यायालय ने विधायक को दोबारा समन जारी किया है और सिक्ख समाज के सदस्यों ने इसका स्वागत किया है ।

KHABARYAAR HINDI WEEKLY

खबरयार

खबरयार हिन्दी साप्ताहिक भोपाल
रंगीन पृष्ठ 16 रूपये 8 फी प्रति
शुल्क : वार्षिक रूपये 400/-
विज्ञापन दर प्रति वर्ग से. मी. : रूपये 20/- रंगीन रूपये 24/-

चिट्ठाजगत

चिट्ठाजगत

Followers