
बिहार में नीतीश के विकास की जय
नीतिश कुमार के विकास ने आ$िखरकार चमत्कार दिखा ही दिया। लालू इसे 'जादूÓ कह ही रहे हैं। पर ये जादू या चमत्कार नहीं है। यदि ईमानदारी से प्रदेश के हित में काम किया जाए, लोगों के विकास की बात हो, तो जातिवाद, साम्प्रदायिकता जैसे $फैक्टर नगण्य हो जाते हैं।
हृ चन्द्र शे$खर सिंह
बिहार में नीतीश कुमार की बम्पर जीत ने लालू-पासवान और कंाग्रेस को ज़रूर ये सोचने को मजबूर कर दिया होगा, कि अब मतदाता को नारों-वादों से बेवकू$फ नहीं बनाया जा सकता। वो जागरूक हो गया है, जान गया है कि जातिवाद और मुस्लिम तुष्टिकरण का जाल फैलाकर लालू एंड पार्टी उसे सदा से मूर्ख बनाती रही है। हम पूर्व में भी लिख चुके हंै कि बिहार का मतदाता इस बार किसे चुनने वाला है। (देखें $खबरयार अंक 41 दिनांक 29-10-2010) बिहार चुनाव के अखाड़े में इस बार लालू, पासवान ओर कंाग्रेस थे, तो दूसरी तरफ नीतिश और भाजपा थी। लालू को बिहारी मतदाता बहुत अच्छी तरह से जान गया है। उन्होंने बहुत लम्बे समय तक बिहार पर राज किया है। पर बिहार के विकास के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। विकास किया तो $खुद का, $खुद के परिवार का, $खुद के रिश्तेदारों का वे केन्द्र में भी पावर$फुल रहे, पर वहाँ रहकर भी उन्होंने बिहार के लिए शायद ही कुछ किया हो। हाँ, कुछ रेले ज़रूर बिहार को दीं, पर ये बिहार के लिए एक सुविधा हो सकती है, विकास नहीं। पासवान का चरित्र कोई नहीं समझ पाया। वे $िफल्मों के चंकी पाण्डे की तरह हो गये हैं। उनका अकेले कोई वजूद नहीं है, सो बेचारे लालू के साथ हो लिए पर ज़ीरो, ज़ीरो, मिलकर ज़ीरो ही रहे। $िफल्म तो हीरो से चलती है, उनकी $िफल्म $फ्लाँप हो गई है। कंाग्रेस के साथ ज़रूर यहाँ कुछ ज्य़ादती हुई है। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इस बार बिहार में नई शुरूआत की थी। उनको इस बार पहले से अपेक्षाकृत अधिक सीटें मिलने की उम्मीद थी। पर उन्हें शायद उनकी पिछली $गलतियों ने हराया है। बिहारी मतदाता कांग्रेसी चेहरे को भी अच्छी तरह से पढ़ चुके हैं। कंाग्रेस भले ही अकेले चुनाव लड़कर एक नई शुरूआत करने का दावा कर रही थी, किन्तु मतदाता को कांग्रेस लालू, पासवान के साथ ही खड़ी नज़र आती थी। लालू, पासवान और कांग्रेस इतने लम्बे समय तक साथ-साथ रहे हैं, कि वे अलग अलग होने के बाद भी साथ में खड़े दिखते हैं। यही बात कांग्रेस को ले डूबी। नीतिश कुमार के विकास ने आ$िखरकार चमत्कार दिखा ही दिया। लालू इसे 'जादूÓ कह ही रहे हैं। पर ये जादू या चमत्कार नहीं है। यदि ईमानदारी से प्रदेश के हित में काम किया जाए, लोगों के विकास की बात हो, तो जातिवाद, साम्प्रदायिकता जैसे $फैक्टर नगण्य हो जाते हैं। हां ये चमत्कार है कि बिहार के 29 वें मुख्यमंत्री के रूप में वे विश्वासमत भी हासिल नहीं कर पाए थे, 31 वें मुख्यमंत्री के रूप में न केवल उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया है, बल्कि 32 वें मुख्यमंत्री के रूप में भी एक ताकतवर संख्याबल लेकर उभरे हैं।
जेपीसी पर जाम संसद
दूरसंचार घोटाले में जेपीसी की मांग पर गुरुवार नवंबर 25 को भी संसद जाम रही। मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी जहां एक ओर जेपीसी की मांग पर अड़ी रही, वहीं कांग्रेस थोड़ी तल्$ख हुई और कहा कि जेपीसी जांच की मांग नहीं मानी जाएगी, विपक्ष चाहे तो सरकार के $िखला$फ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है। संसदीय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा कि पहले भी ऐसे दो मौके आये हैं, जब विपक्ष में रहते हुए हमने जेपीसी की मांग की थी, लेकिन उस वक्त एनडीए सरकार ने जेपीसी मांग को मान्य नहीं किया था। बंसल ने कहा कि तहलका और ताबूत घोटाले में हमने जेपीसी की मांग की थी, लेकिन उस वक्त आज की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा सत्ता में थी और उसने इस मांग को स्वीकार नहीं किया था। अब विपक्ष को चाहिए कि वह संसद को चलने दे, और संसद में किसी भी मुद्दे पर चर्चा के ज़रिए हम समस्याओं को सुलझाएंगे। अगर जेपीसी के नाम पर विपक्ष सि$र्फ प्रधानमंत्री और मंत्री के नाम सम्मन भेजने की इच्छा रखता है, तो इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। इससे पहले राज्यसभा सभापति हामिद अंसारी ने सुबह राज्यसभा के नेताओं की एक बैठक बुलाई थी जिसमें कोई समाधान नहीं निकल सका था। बैठक में शामिल रहे भाजपा के एसएस अहलूवालिया ने कहा कि सरकार पब्लिक अकाउण्ट कमेटी से जांच का हवाला दे रही है, लेकिन पब्लिक एकाउण्ट कमेटी मंत्री से इस बारे में पूछताछ का अधिकार ही नहीं रखती है। भाजपा के राज्यसभा सांसद तरूण विजय ने भी संसद में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि जेपीसी जांच ज़रूरी है। बिना इसके हम संसद को सामान्य नहीं होने देंगे। विपक्ष की जेपीसी की जांच की मांग का समर्थन करते हुए सीपीआई सचिव ए राजा ने कहा कि अगर विपक्ष स्पेक्ट्रम घोटाले के मसले पर जेपीसी की मांग कर रहा है, और संसद की कार्यवाही बाधित है, तो सरकार को इस बारे में ज़रूर सोचना चाहिए। सरकार एवं विपक्ष का आपसी विवाद दो ताकतवर सांडों जैसा है जिसमें नुकसान तो $गरीब पड़ोसी का ही होगा जिसकी दीवार ढह ढेरी हो रही है। भारी भरकम वेतन भत्ते व करोड़ों के $खर्चे करके संसद का काम काज ठप्प करके $गरीब जनता का ही उत्पीडऩ किया जा रहा है। न सांसदों को कोई घाटा है और न सरकार को। इस पर विचार करने की किसे चिंता है।

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