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Saturday, December 18, 2010






अर्जुन के बाण भी तुणीर से बाहर आने को आतुर
अर्जुन के तीर अभी भी लक्ष्य भेदी हैं
हृ लिमटी खरे नई दिल्ली। ख़्ामोश अर्जुन भी आज कुछ कहना चाहते हैं। उनके करीबी कह रहे हैं, कि उनकी $खामोशी जल्द ही टूटने वाली है। भ्रष्टाचार, घोटालों और अव्यवस्था से घिरी कांग्रेस गठबंधन सरकार में इस समय जिस तरह रहस्योद्घाटनों की झड़ी लगी है, उसमें एक कड़ी अर्जुन सिंह की भी जुडऩे वाली है, और वे जो बोलेंगे तो एक बार कांग्रेस में भूचाल ज़रूर आएगा। यह अलग बात है, कि कांग्रेस भी इस वक्त गैंडे की खाल ओढ़े हुए है, और सब हमलों को झेलती आ रही है। यूं तो कांग्रेस के चतुरसुजान कुंवर अर्जुन सिंह, कांग्रेस गठबंधन सरकार की दूसरी पारी में अपनी प्रासंगिता खो चुके हैं। कांग्रेस के छत्रपों में शुमार और राजीव गांधी के ज़माने में कई बार अपनी राजनीतिक एवं प्रशासनिक उपयोगिता सिद्ध करने वाले अर्जुन आज बेबस हैं, और का$फी पहले एक तरह से कांग्रेस से दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर किए जा चुके हैं, तथापि इस वक्त उनका मुंह खुल जाना राजनीतिक रूप से नए विवाद खड़े कर सकता है।
इशारों ही इशारों में तीर चलाकर अर्जुन सिंह को अपने विरोधियों का मर्दन करने में महारथ हासिल रही है। संप्रग की दूसरी पारी में उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया था। उस वक्त भी उम्मीद जताई जा रही थी कि वे अपनी उपेक्षा से कुपित होकर कोई न कोई धमाका अवश्य ही करेंगे, लेकिन यह आश्चर्य हुआ कि अर्जुन ने धैर्य नहीं खोया। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने अर्जुन सिंह को किनारे करने के लिए कोई जतन नहीं छोड़े। उनकी पुत्री वीणा सिंह को कांग्रेस का टिकट भी नहीं दिया गया। यहां तक कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव प्रचार में जाने के लिए उनके लिए निर्धारित विमान भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के एक करीबी गुजरात की यात्रा पर निकल गए और मजबूरी में अर्जुन सिंह को महाकौशल एक्सप्रेस से सतना पहुंचना पड़ा।
इसके उपरांत अर्जुन सिंह की पत्नी ने परोक्ष तौर पर सोनिया गांधी पर आरोप लगाकर ठहरे हुए पानी में कंकर मार दिया, जिससे उनके राज्यपाल बनने की $खबरें अ$फवाह में बदल गईं। अर्जुन सिंह से सोनिया गांधी की नाराज़गी का आलम यह पाया गया कि सोनिया गांधी ने अपने परिवार अर्थात जवाहर लाल नेहरू ट्रस्ट से भी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इसके बावजूद अर्जुन सिंह ने धैर्य नहीं खोया और ख़ामोशी को ही राजनीतिक प्रतिक्रिया बनने दिया। उनके राजनैतिक तौर पर किनारे होने की आशंका को भांपकर उनके अनुयाईयों ने भी नया ठौर ठिकाना ढूंढकर अपने आका बदल लिए हैं। लगभग डेढ़ साल से अर्जुन सिंह के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में सन्नाटा ही पसरा हुआ था, लेकिन इधर कुछ विशिष्ट आवाजाही बढ़ती दिख रही है। पिछले दिनों जब वे मध्यप्रदेश की यात्रा पर गए तो पत्रकारों से चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था, कि वे राजनैतिक जीवन के अर्जित अवकाश का आनंद उठा रहे हैं। अर्जुन सिंह के $करीबियों का कहना है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दूसरे कार्यकाल में घोटाले दर घोटाले सामने आने के बाद अब अर्जुन सक्रिय होते नजऱ आ रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है, कि जल्द ही अर्जुन सिंह मीडिया से रूबरू होने वाले हैं, जिसमें वे घोटालों के कारण धूमिल होती कांग्रेस की छवि को ध्यान में रखकर, समस्त मंत्रियों को यह भी मशविरा दे सकते हैं कि सभी अपने अपने त्यागपत्र सौंप दें, और फिर से नए सिरे से मंत्रिमण्डल का गठन किया जाए। इन बातों में सच्चाई कितनी है यह तो कुंवर अर्जुन सिंह ही ज्य़ादा बताएंगे किन्तु उनके आवास की बढ़ती चहल पहल से लगने लगा है, कि जल्द ही कांग्रेस के गुज़रे ज़माने के नेता की $खामोशी टूटने वाली है।
मनमोहन सिंह की सरकार में एक के बाद एक घोटाले जिस तरह से सामने आ रहे हैं, उससे कांग्रेस का भारी नुकसान हो रहा है। धर्मनिर्पेक्षता के चक्कर में भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस को उछालकर कांग्रेस ने अपने को बुरा फंसा लिया है। इस कार्ड का कांग्रेस को नुकसान ज्य़ादा हुआ है, जिसका परिणाम बिहार चुनाव में सामने आया है। यहां कांग्रेस का जो हाल हुआ है, वह कांग्रेस हाईकमान की रणनीतिक विफलताओं को प्रकट करता है। सोनिया गांधी आज जिन सलाहकारों के दम पर कांग्रेस को चलाना चाहती हैं उनके अपने एजेंडे हैं और वे कांग्रेस के लिए नहीं बल्कि अपने लिए काम करते हैं।
लोकसभा में पारित कई विधेयक ऐसे हैं, जिनके परिणाम पूरी तरह कांग्रेस के खिलाफ जाते हैं और जिनके कारण भाजपा को लाभ पहुंचा है। इनमें शत्रु संपत्ति कानून ने कांग्रेस का भारी नुकसान किया है, कश्मीर के मौजूदा हालात से निपटने में सरकार का बोदापन सामने आया, स्पेक्ट्रम घोटाले ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देश का बुरी तरह से विफल प्रधानमंत्री साबित कर दिया है, जबकि अर्जुन सिंह ने एक समय अपने राजनीतिक कौशल से अशांत पंजाब के राज्यपाल के रूप में पंजाब को देश की मुख्यधारा में लौटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर अपने महत्व को सिद्ध किया था। वही अर्जुन सिंह आज उस समय की प्रतीक्षा में बताए जाते हैं, जिसमें वे कांग्रेस की विफलताएं गिनाकर कुछ ऐसे रहस्योद्घाटन, करें जिनसे यह सिद्ध होता हो, कि अर्जुन के तीर अभी भी लक्ष्यभेदी हैं।



मध्य प्रदेश के बयानबाज़ नेता
हृ अशोक त्रिपाठी भोपाल। इतिहास की धरोहर सहेजने वाले मध्य प्रदेश में राजा-रजवाड़े और उनके द्वारा किए गये निर्माण कार्य जिनमें खजुराहों जैसे मंदिर विश्व प्रसिद्ध हैं, तब की राजनीति भी बहुत ऊंचे दर्जे की हुआ करती थी। कांग्रेस के इस गढ़ को राज परिवार की महारानी विजय राजे सिन्धियां ने तोड़ा था, जबकि उनके बेटे माधव राव सिन्धियां ने कांग्रेस का दामन थामा। श्यामा चरण शुक्ल और विद्या चरण शुक्ल की जोड़ी ने इस राज्य में ब्राह्मण राज को मज़बूत किया, तो अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह ने क्षत्रियों के वर्चस्व को बढ़ाया लेकिन इन सभी की बेतुकी बयानबाज़ी उनकी पार्टी को ही डुबोती चली गयी। वर्तमान में भी इससे कोई सीख नहीं ले रहा है। हाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बयान दोनों ही पार्टियों के लिए मुसीबत का कारण बने हैं। अभी भाजपा ने सुश्री उमा भारती को औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल नहीं किया, लेकिन उन्हें उत्तर प्रदेश में पार्टी का काम देखने का सिग्नल दे दिया गया है, और यह उनकी गृह वापसी का स्पष्ट संकेत भी है। इसके बावजूद वे अपने गृहराज्य मध्य प्रदेश को लेकर कोई टिप्पणी नहीं करेंगी, यह कहना मुश्किल है। श्री चौहान ने यह भाषण दे तो दिया, लेकिन थोड़ी ही देर बाद उन्हें अपनी $गलती का एहसास हो गया और उन्होंने कहा कि मेरी बातों को अगर अन्यथा लिया गया है, तो मैं क्षमाप्रार्थी हूं। दरअसल श्री चौहान ने जाने-अनजाने भाजपा की भी खिल्ली उड़ाई। केंद्र में भाजपा की भी सरकार रह चुकी है और उद्योगपतियों की तो वह पार्टी ही कही जाती है। प्रमोद महाजन जैसे नेता जाने-माने उद्योगपति ही थे। राज्य सभा में भाजपा का बहुमत है और महिला आरक्षण बिल पर इसीलिए केंद्र सरकार को भाजपा की मदद लेनी पड़ी थी। इधर, शिवराज सिंह दो मामलों में परेशान थे। एक तो यह कि उद्योगपति रतन टाटा ने पहले तो फोनटेपिंग के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को दोषी ठहराया, लेकिन विमानन कम्पनी के लिए रिश्वत देने के मामले में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार को भी कठघरे में खड़ा कर दिया। तत्कालीन विमानन मंत्री ने तो इस बात की जांच कराने की मांग ही कर दी थी, लेकिन राहुल बजाज ने यह कहकर मामला ठंडा कर दिया कि बिना रिश्वत के कोई काम ही नहीं होता।
बहरहाल, श्री शिवराज सिंह चौहान अपनी ज़ुबान पर नियंत्रण नहीं रख सके और उद्योगपतियों के बहाने राज्यसभा पर ही अपना $गुस्सा उतार दिया। वे सुश्री उमाभारती की गृह वापसी से भी परेशान दिख रहे हैं। उन्हें लगता है कि सुश्री उमा भारती भाजपा में शामिल होने के बाद कोई न कोई बखेड़ा खड़ा करेंगी। इसीलिए नितिन गडकरी की इच्छा के बावजूद सुश्री उमा भारती को अभी तक पार्टी में शामिल नहीं किया गया था। अब उन्हें हरी झण्डी तब मिली है, जब उनसे वादा ले लिया गया कि वे (उमा भारती) मध्य प्रदेश में द$खलंदाज़ी के बजाय उत्तर प्रदेश को संभालेंगी। उत्तर प्रदेश में ही राम मंदिर का मुद्दा भी जमकर उछाला जाना हैं, इसलिए उमा भारती मान गयीं, लेकिन श्री चौहान का $गुबार बाहर आकर भाजपा के लिए मुसीबत बन गया। इससे पूर्व कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मुंबई हमले में मारे गये वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे की हत्या पर सवाल उठाया। यह सवाल तब उठाया गया जब संसद पर आतंकी हमले की वर्षगांठ (१३ दिसम्बर) नज़दीक थी। इसलिए श्री दिग्विजय सिंह को यह मामला इस तरह नहीं उठाना था। वैसे ही अ$फज़ल गुरू की फांसी का मामला लटकाने का आरोप कांग्रेस पर लग रहा है।
श्री दिग्विजय सिंह अभी भी अपनी बात पर अड़े हैं। वे कहते हैं कि हेमंत करकरे की जि़न्दगी को हिन्दू कट्टरवादी ताकतों से $खतरा था। श्री दिग्विजय सिंह ने स$फाई देते हुए कहा कि उन्होंने मुंबई पर आतंकी हमले में पाकिस्तान की भूमिका होने पर कभी संदेह नहीं किया, लेकिन आडवाणी जी और राजनाथ सिंह को जवाब देना होगा कि माले गांव विस्फोट के बाद जब साध्वी प्रज्ञा भारती को गिर$फ्तार किया गाया था, तब वे प्रधानमंत्री से मिलने क्यों गये थे? शिवराज सिंह चौहान ने इसका जवाब भी श्री दिग्विजय सिंह को दिया है। उन्होंने कहा कि दिग्विजय सिंह मानसिक रूप से बीमार हैं। इससे पूर्व वे दिल्ली के बटाला हाउस मुठभेड़ का भी इसी तरह विरोध कर चुके हैं और नक्सली समस्या से निपट रहे गृहमंत्री पी- चिदम्बरम से भी ऊल-जलूल सवाल पूछ चुके हैं। राजनीति की विडम्बना देखिए कि वही काम शिवराज सिंह चौहान भी कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश का बंटवारा होने के समय यह समझा जा रहा था कि नक्सलवाद से प्रभावित सि$र्फ एक जि़ला बालाघाट-ही बचा है। राजनीति के झगड़े ने प्रदेश के सात और जिलों को नक्सलियों के हाथों दे दिया है। नक्सल प्रभावित जि़लों में अब बालाघाट के अलावा मंडला, डिंडोरी, सिवनी, सीधी, अनूपपुर, उमरिया और शहडोल भी शामिल हैं। केंद्र सरकार ने इनके विकास के लिए २५ लाख रुपये दिये हैं, लेकिन बेतुकी की बयानबाज़ी से फुर्सत मिले, तभी तो राज्य में विकास कार्य होंगे।
(हिफी)

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