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Friday, February 25, 2011







कांग्रेस की प्रयोगशाला बने राजा दिग्विजय सिंह
भारतीय जनता पार्टी ने भी कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बयानों की तीखी निंदा करते हुए उन्हें देशद्रोही ताकतों के हाथों की कठपुतली बताया है। भाजपा ने कहा कि हिंदू, हिंदुत्व, भगवा और संघ परिवार को बदनाम कर कांग्रेस महासचिव एक वर्ग विशेष को खुश करना चाहते हैं, वे आगामी चुनावों में वोटों की तुष्टिकरण की नीति के चलते ही अर्नगल बयान दे रहे हैं।
हृ लिमटी खरे
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और राघोगढ़ के राजा दिग्विजय सिंह की ज़़ुबान फिसल रही है या वे किसी योजना के तहत ऐसी बयानबाज़ी पर उतर आए हैं, जैसी हर एक राजनीतिक दल में कुछ सड़कछाप नेता करते रहते हैं? वे अपने ही दल में किसी उकसाऊ राजनीति के शिकार तो नहीं हो रहे हैं? या वे कांग्रेस में ऊब गए हैं, जिसके बाद कोई नेता मैं नहीं तो तू नहीं की रणनीति पर उतर आता है? वे अपने ही दल में मुंह फेरकर हंसी के पात्र तो बन ही चुके हैं साथ ही वह उस हाशिये पर भी पहुंच चुके हैं जहां उनकी न हिंदुओं में उपयोगिता बची है और न ही कांग्रेस को उनकी कार्यशैली से मुसलमान वोटों का कोई लाभ मिलने वाला है। इन दोनों वर्गों में दिग्विजय सिंह की छटपटाहट भरी राजनीतिक चाल को आसानी से पकड़ लिया गया है, इसीलिए उनसे सवाल पूछा जा रहा है कि आ$िखर राजनीति में वे कहां खड़े हैं, और वे जो कर रहे हैं उसमें उनके लिए राजनीतिक संकट आने पर क्या कांग्रेस उनके साथ खड़ी रह पाएगी? यदि कांग्रेस का इतिहास उठाकर देखा जाए, तो इस प्रकार के अनेक नेता गुमनामी में जा चुके हैं। कांग्रेस ने पहले उनका भरपूर इस्तेमाल किया और जब उसकी लपटें कांग्रेस की तर$फ आर्इं तो अपने बचाव में कांग्रेस ने सबसे पहले उसी को उन लपटों के हवाले कर दिया, यानि न बांस रहा और न बांसुरी। कई दृष्टांत ऐसे हैं जो कांग्रेस की इस राजनीति को सहजता से स्थापित करते हैं। इसके शिकार कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह भी हो चुके हैं, किंतु वे एक कदम चलते थे तो बीस कदम आगे की सोच लेते थे। उन्होंने इसी राजनीतिक चतुराई से अपने को लंबे समय तक बचाए रखा, और जब उनकी उपयोगिता शून्य की ओर बढ़ी, तो अर्जुन सिंह को भी सड़क दिखा दी गई। वैसे भी अर्जुन सिंह की भी उपयोगिता उस समय $खतम हो गई थी, जब उनको बसपा के एक मामूली कार्यकर्ता ने लोकसभा चुनाव में उन्हें पराजित कर दिया था, इसमें यह अलग बात है कि वहीं के कांग्रेसियों ने भी उस बसपाई को जिताने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। दिग्विजय सिंह और अर्जुन सिंह की राजनीति में $फर्क इतना है कि काफी समय तक उनके हर बयान के साथ समूची कांग्रेस खड़ी दिखाई देती थी, किंतु दिग्विजय सिंह के साथ ऐसा होता नहीं दिख रहा है। अनेक आशंकाएं दिग्विजय सिंह पर मंडरा रही हैं,क्योंकि वे अपने बयानों के बाद अकेले ही नजऱ आ रहे हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव बनने के बाद से वे लगातार विवादस्पद बयान देते और फिर उनसे पलटते आ रहे हैं?
मुंबई में ताज होटल के हमलावरों से मोर्चा लेते हुए शहीद हुए एटीएस ची$फ हेमंत करकरे का ही मामला लिया जाए। दिग्विजय सिंह का पहले कहना था कि करकरे ने उन्हें $फोन किया था, और कॉल रिकार्ड पेश करते वक्त $फरमा रहे हैं कि उन्होंने ही करकरे को पहले कॉल लगाई थी। आश्चर्य तो तब होता है जब उनका $फोन एटीएस के मुंबई स्थित मुख्यालय में शाम पांच बजकर 44 मिनट पर पहुंचता है, वह भी इंटरनेट पर एटीएस के पीबीएक्स नंबर पर। कॉल रिकार्ड बताता है कि इस नंबर पर 381 सेकेंड बात हुई है। सवाल उठता है कि जब उस दिन दोपहर को ही मुंबई में ताज होटल पर आतंकवादियों ने कब्जा जमा लिया था, तब क्या एटीएस ची$फ करकरे के पास आतंकियों से निपटने और रणनीति बनाते हुए इतना समय था कि वे मोबाइल या $फोन पर दिग्विजय सिंह से $खुद को हिंदूवादियों से मिलने वाली धमकियों का दुखड़ा रोएं? इसके अलावा दिग्विजय सिंह ख़्ाुद यह भी स्वीकार कर चुके हैं कि वे करकरे से कभी मिले भी नहीं थे, तब करकरे क्या पहली ही बातचीत में उनसे अपने मन की ऐसी बातें कह गए होंगे? दिग्विजय सिंह पहले तो कॉल रिकार्ड नहीं मिलने की बात कर रहे थे? उन्होंने कौन सी जादू की छड़ी से रिकार्ड तलब कर लिया?
इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र के गृह मंत्री आरआर पाटिल से माफी की मांग करने में भी देरी नहीं की। वे भूल गए कि इस मांग का असर कहां तक जाएगा। इसका एनसीपी और कांग्रेस के संबंधों पर तो कोई असर दिखाई नहीं दिया, अलबत्ता दिग्विजय सिंह ज़रूर अलग-थलग पड़ गए हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू के इस दावे में दम लगता है जिसमें उन्होंने कहा है कि कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को एक मिशन पर लगाया हुआ है जिसका मकसद भ्रष्टाचार से लोगों का ध्यान बांटना है। हिंदू आतंकवादियों वाले बयान से दिग्विजय सिंह क्या हिंदुस्तान के मुस्लिम समाज के हीरो बन गए हैं? देश-विदेश के किसी भी राजनेता ने या पाकिस्तान को छोड़कर किसी भी देश ने ऐसा बयान नहीं दिया। जैसाकि कुछ समय के पूर्व तक दिग्विजय सिंह की छवि कुछ और थी, क्योंकि उन जैसे नेताओं के व्यक्तित्व से ऐसे बयान और आरोप बिल्कुल भी मेल नहीं खाते हैं।
उल्लेखनीय है कि मुंबई आतंकी हमले के बाद शिवराज पाटिल को केंद्रीय गृहमंत्री की कुर्सी छोडऩी पड़ी थी। महाराष्ट्र में सियासत करने वाले अब्दुल रहमान अंतुले ने भी मुंबई हमले पर विवादस्पद बयान दिया था, जिससे कांग्रेस को अंतुले से किनारा करना पड़ा था। यदि आपको याद हो तो देश के बहुचर्चित शाहबानो तलाक मामले में इसी कांग्रेस ने राजीव गांधी मंत्रिमंडल में शामिल केंद्रीय मंत्री आरि$फ मोहम्मद $खान से पहले तो तलाक के $िखला$फ बयान दिलवा दिया, और जब इस पर तू$फान उठा तो कांग्रेस ने आरि$फमोहम्मद $खान के बयान से अपने को अलग कर लिया। यही नहीं केंद्रीय मंत्री आरि$फमोहम्मद $खान से इस्ती$फा ले लिया गया और शाहबानों मामले में सुप्रीम कोर्ट के $फैसले को संसद में संशोधन विधेयक के जरिए प्रभावहीन कर दिया गया। इस घटनाक्रम में आरि$फमोहम्मद $खान जैसा दिग्गज और योग्य लीडर निपट गया। वह दिन और आज का दिन है आरि$फमोहम्मद $खान देश तो छोडि़ए अपने राज्य उत्तर प्रदेश और अपने ही जि़ले बहराइच के राजनीतिक परिदृश्य से ही ओझल हो चुके हैं। कांग्रेस को इस बात का कोई पछतावा नहीं है कि उसने आरि$फमोहम्मद $खान को शाहबानो मामले में बलि का बकरा बनाया। कांग्रेस अब आरि$फमोहम्मद $खान का नाम भी लेने से डरती है, उन्हें कांग्रेस में वापस लेने की बात तो बहुत दूर है।
वे यह जानते हुए भी कि यह कांग्रेस है, जिसमें डूब जाने वाले या डुबो दिए जाने वाले का पता नहीं चल पाया, ऐसी राजनीतिक गलतियां करते जा रहे हैं, जिनका कांग्रेस साथ देने वाली नहीं है। अर्जुन सिंह का मध्य प्रदेश की चुरहट लाटरी जांच ने भी हर वक्त पीछा किया है और जब भी अर्जुन सिंह थोड़ा तेज़ चले, तुरंत इस लाटरी की $फाइल खोल दी गई। अनेक बार चुरहट लाटरी कांड को अर्जुन सिंह के $िखला$फ इस्तेमाल किया गया है। यूं तो जैन हवाला मामले में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को अपनी सरकारी कुर्सियों से हाथ धोना पड़ा था, किंतु वह भ्रष्टाचार से संबंधित मामला था जिसमें सामूहिक रूप से नेताओं की बलि हुई थी, लेकिन दिग्विजय सिंह और आरि$फमोहम्मद $खान का मामला इनसे भिन्न है। इसमें एक नेता मुसलमानों की नजऱों में सदा के लिए गिराया गया और दूसरा नेता हिंदुओं की नजऱों में नाहक ही विलेन बन रहा है, जिसे मुसलमान भी गले लगाने को तैयार नहीं हो सकते, क्योंकि वे समझते हैं कि दिग्विजय सिंह ने हेमंत करकरे या हिंदू संगठनों को लेकर ज़हरीले बयानों का क्या मकसद है।
इस तरह की राजनीति में पडऩे का $खामियाज़ा कांग्रेस भी बुरी तरह भुगत चुकी है तब भी दिग्विजय सिंह ने सबक नहीं लिया। पूरा देश जानता है कि अयोध्या में राम जन्म स्थान के विवादित स्थल पर पहले तो राजीव गांधी ने शिलान्यास करा दिया, जिससे देश का हिंदु रातों-रात हिंदू समाज भाजपा से किनारा कर कांग्रेस की तर$फ जा खड़ा हुआ, और मुसलमानों में इसे लेकर हुए विवाद से डरकर शिलान्यास रूकवा दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि शिलान्यास कराने से मुसलमान कांग्रेस से भाग गए और शिलान्यास रूकवाने से जो हिंदू समाज कांग्रेस की ओर झुका था, वह भी भाग गया। कांग्रेस को दोनों में कोई नहीं मिला। कांग्रेस ने इसका असर अपने लोकसभा चुनाव पर भी देखा। इसके बाद कांग्रेस अब दूसरे दलों की मोहताज बनकर रह गई है। आज भी मुसलमान अयोध्या मामले के लिए शिलान्यास को ही जिम्मेदार मानते हैं, जोकि राजीव गांधी ने कराया था। कांग्रेस के ये वो $फैसले हैं जिनसे कांग्रेस ने अपना ही बंटाधार किया है। राजनीतिक विशलेषणकर्ता कह रहे हैं कि दिग्विजय सिंह, आरि$फमोहम्मद $खान की तरह ही कांग्रेस की एक प्रयोगशाला बन रहे हैं, जो आने वाले समय में न घर के होंगे और न घाट के।
भारतीय जनता पार्टी ने भी कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बयानों की तीखी निंदा करते हुए उन्हें देशद्रोही ताकतों के हाथों की कठपुतली बताया है। भाजपा ने कहा कि हिंदू, हिंदुत्व, भगवा और संघ परिवार को बदनाम कर कांग्रेस महासचिव एक वर्ग विशेष को खुश करना चाहते हैं, वे आगामी चुनावों में वोटों की तुष्टिकरण की नीति के चलते ही अर्नगल बयान दे रहे हैं। भाजपा ने दिग्विजय सिंह को एक चुका हुआ नेता बताते हुए कहा है कि गुजरात, विकास के मामले में केवल कांग्रेस शासित राज्यों से ही नहीं अपितु विदेशों में ही प्रतिष्ठा हासिल कर चुका है। गुजरात को बदनाम करने के लिए दिग्विजय सिंह की बेतुकी बात नज़रअंदाज़ करने की बात कहते हुए भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि उन्होंने बटाला हाउस कांड पर भी संदेह ज़ाहिर कर सुरक्षा बलों के मनोबल को तोडऩे का काम किया है।


क्रिकेट वल्र्डकप की चपेट में हमारे नौनिहाल
हृ जैनेन्द्र कुमार
क्रिकेट दुनियाभर में का$फी लोकप्रिय खेल बन गया है। इसी के चलते क्रिकेट प्रेमियों को हर चार वर्षों के अंतराल पर होने वाले वल्र्ड कप क्रिकेट के मैचों को देखने का बेसब्री से इंतज़ार रहता है। भारत की बात करें तो यहाँ क्रिकेट एक महोत्सव की तरह है, एक संस्कृति की तरह है, एक उन्माद की तरह है, एक पैशन की तरह है। भारत में हर खास और आम के लिए, हर उम्र के लोगों के लिए क्रिकेट राष्ट्रीय शगल सरीखा है। क्रिकेट की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है, कि एक बार शास्त्रीय गायन के आधार स्तंभ माने जाने वाले पं.भीमसेन जोशी ने सचिन को देखा तो अपने को रोक नहीं सके। वे लपक कर सचिन के पास पहुंचे और बाल सुलभ उत्सुकता के साथ कहा, मैं पंडित भीमसेन जोशी...आपका बहुत बड़ा $फैन हूँ। ऐसे में क्रिकेट वल्र्ड कप इंडिया में होने वाला है। वल्र्ड कप क्रिकेट १९ फरवरी से २ अप्रैल तक चलेगा। ज़ाहिर है ऐसे में हर भारतीय, $खासकर युवा और किशोर वर्ग वल्र्ड कप क्रिकेट के मैचों को देखने और उसका आनंद लेना चाहेगा। क्रिकेट वल्र्डकप की चपेट में...
यहाँ $गौर करने की बात यह है कि यही वक्त १०वीं और १२वीं के स्टूडेंट्स के लिए सालाना परीक्षाओं का भी होता है। बड़ी कक्षाओं में पढऩे वाले विद्यार्थी इसी समय सालाना परीक्षाओं के साथ ही नेट, स्लेट जैसी करिअर को तय करने वाली परीक्षाओं की भी तैयारी करते हैं। ऐसे में भारतीय छात्रों के सामने वल्र्ड कप मैच का आनंद बनाम करिअर, एग्ज़ाम की तैयारी का संकट खड़ा हो जाएगा। विद्यार्थी चाहकर भी परीक्षाओं की तैयारी एकाग्रचित्त होकर नहीं कर पाएंगे, उनका मन तो वल्र्ड कप क्रिकेट के मैचों में ही लगा रहेगा। कई विद्यार्थी परीक्षा की तैयारी के दौरान बीच-बीच में क्रिकेट मैच की हाईलाट्स देखने से $खुद को नहीं रोक पाएंगे। परीक्षा का पर्चा देने के बाद आते समय सहपाठियों से कौनसा सवाल किया ? और कौनसा नहीं? जैसी चर्चा के साथ ही मैच में किस बैट्समैन ने सैंचुरी, हा$फ सैंचुरी लगाई, कौन मैन ऑ$फ द मैच रहा, कौन चौकों और छक्कों के लिए लाइमलाइट में रहा? जैसी बातें भी होंगी। इसका विपरीत असर छात्रों के परीक्षा परिणामों पर पड़ेगा। प्रतियोगी परीक्षाएं देने वाले भी क्रिकेट मैनिया का शिकार हो प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे। इससे इनकार नहीं किया जा सकता। वल्र्ड कप क्रिकेट के कर्ता-धर्ताओं को इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि वल्र्ड कप के मैच ऐसे समय पर करवाए जाएँ जब विद्यार्थियों की सालाना परीक्षाएँ न हों। उचित तो यह होगा कि वल्र्ड कप क्रिकेट का समय निर्धारित करने के लिए सभी देशों के क्रिकेट बोर्ड और इंटरनेशनल क्रिकेट बोर्ड मिलकर ऐसी गाइडलाइंस तैयार करें, जिसके अनुसार सभी देशों में विद्यार्थियों की तिमाही, छमाही या सालाना परीक्षाओं के दौरान क्रिकेट का वल्र्ड कप तो दूर कोई भी टूर्नामेंट आयोजित न किया जाए। $फुटबॉल और अन्य खेलों के लिए भी इसी तरह की गाइडलाइंस जारी की जानी चाहिए, जिससे विद्यार्थियों के सामने खेल बनाम करिअर का संकट खड़ा न हो।
ऐसे तु$गलकी $फरमान क्यों-
वल्र्ड कप क्रिकेट में खेलने वाले खिलाड़ी वल्र्ड कप की आयोजक कंपनियों की प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के विज्ञापन नहीं कर सकते। इस $फरमान को न मानने वाले खिलाडिय़ों को वल्र्ड कप से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। यह नियम वल्र्ड कप के दौरान ही लागू होगा। अब सवाल यह उठता है कि जो क्रिकेटर किसी भी कंपनी का विज्ञापन करने का १ साल का या ५ साल का या किसी निश्चित अवधि का अनुबंध कर चुके है, और अनुबंध का समय वल्र्ड कप क्रिकेट से पहले $खत्म नहीं होता है, और वह कंपनी वल्र्ड कप का आयोजन करने वाली किसी कंपनी की प्रतिद्वंद्वी या विरोधी कंपनी है, तो विज्ञापन करने के लिए अनुबंधित खिलाड़ी संबंधित कंपनी का अनुबंध तोड़ कर अपनी सा$ख पर बट्टा लगा लें, या फिर अपनी सा$ख को बचाने के लिए वल्र्ड कप क्रिकेट से बाहर हो जाएं। इस नियम को खिलाडिय़ों की समस्या के नज़रिये से देखा जाए तो यह न तो उचित है और न ही इस नियम को व्यावहारिक कहा जा सकता है।
इस नियम को एक और परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए- मसलन मान लीजिए सहारा कंपनी ने खेलों और खिलाडिय़ों के विकास के लिए का$फी कुछ किया है, अमूमन ज्य़ादातर यह क्रिकेट के मामले में टीम इंडिया की स्पॉन्सर कंपनी रही है। इसने पिछले वल्र्ड कप के दौरान अपने विज्ञापन से का$फी पैसा कमाया और ईमादारी से टैक्स भी भरा। इससे देश की कंपनी को $फायदा होने के साथ ही देश को भी $फायदा ही हुआ और खेल और खिलाडिय़ों को भी पैसे के साथ ही प्रोत्साहन भी मिला। इसके साथ ही किसी वल्र्ड कप में खिलाडिय़ों ने उस की आयोजक न रही किसी भारतीय कंपनी के विज्ञापन का वल्र्ड कप के दौरान प्रचार किया और इससे संबंधित कंपनी का मुना$फा कई गुना बढ़ा, तो राजस्व के रूप में सरकार को भी तो $फायदा ही हुआ। इससे संबंधित खेल और खिलाडिय़ों को $फायदा ही हुआ। ऐसे में क्रिकेट के वल्र्ड कप के दौरान उक्त नियम लागू करने से खिलाडिय़ों के साथ ही देश की आय पर भी विपरीत असर पड़ेगा।
खिलाडिय़ों के लिए वल्र्ड कप के दौरान पत्नी और प्रेमिका को ले जाने पर रोक-
जब कोई खिलाड़ी बेहतर क्रिकेट खेलता है, तो चाहता है कि उसका परिवार भी उसे ऐसा करते हुए देखे, इससे जहाँ खिलाड़ी को हौसला मिलता है, वहीं खिलाडिय़ों के बच्चे भी बेहतरीन खेलने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। इस बात से किसी को गुरेज़ नहीं होगा कि खेल के दौरान $खासकर वल्र्ड कप जैसे हर खिलाड़ी के करिअर और सा$ख से जुड़े मौके के दौरान बेहतर से बेहतर खिलाड़ी अगर किसी मैच में अच्छा नहीं कर पाता तो वह तनाव और दबाव का शिकार हो ही जाता है। इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए पत्नी या प्रेमिका से बेहतर साथी और कोई हो ही नहीं सकता। ऐसे मुश्किल वक्त में अगर पति से पत्नी दूर होगी, तो संबंधित खिलाड़ी की क्रिकेट पर विपरीत असर पडऩे की आशंका कई गुना बढ़ जाएगी। इससे एक और समस्या होगी-अगर खिलाड़ी पत्नी को नहीं ले जाते और उनके बच्चे अपने पापा को ग्राउंड में बेहतर क्रिकेट खेलते हुए देखना चाहते हैं, तो खिलाड़ी उन्हें अपने साथ ले तो जाएंगे, लेकिन उनका ध्यान बच्चों को संभालने और बेहतर क्रिकेट खेलने के बीच संतुलन बनाने का ही रह जाएगा।

बढ़ती अर्थव्यवस्थ्ज्ञा, घटते किसान

हृ जैनेन्द्र कुमार
मध्य प्रदेश की बात करें या महाराष्ट्र की, वहां किसानों की आत्महत्या करने की $खबरें आएदिन देश के किसी न किसी अ$खबार में प्रकाशित होती ही रहती हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसा देश के सि$र्फ दो ही राज्यों में हो रहा है, सच तो यह है कि पूरे देश में किसानों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। सच तो यह है कि तकनीक और अर्थव्यवस्था के जटिल गणित के बीच किसानों की अनदेखी लगातार होती रही है और अब स्थिति इतनी $खराब हो चुकी है कि किसानों का आत्महत्या करना आम बात होती जा रही है। किसानों के देश में, कृषि प्रधान देश में अगर ऐसा हो रहा है तो इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है। बम्पर आवक के बावजूद विदेशी निर्यात पर रोक लगा दी जाती है, जबकि इससे इतर १७ हजार करोड़ रुपए का अनाज खुले में सड़ता रहता है। दूसरी ओर लचर प्रशासन के बावजूद भारत दुनिया की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गया है। ऊंची विकास दर, गतिशीलता और युवाशक्ति के बूते जल्दी वैश्विक आकांक्षाओं से भरे भारतीय उन लोगों से आगे निकल जाएंगे, जो स्वयं को किसी न किसी परिस्थिति का शिकार मानते हैं। सच तो यह है कि उदारीकरण की अर्थव्यवस्था के चलते बढ़ते औद्योगीकरण के काल में काम-धंधा करने वाले लोगों की आय में इजाफा हुआ है, लेकिन आज भी किसान $गरीबी की चक्की में पिसने को मज़बूर है। किसानों की बेहाली की जड़ में जाएं तो सामने आता है कि उन्हें उपज का उचित दाम नहीं दिया जाता।
किसान को मामूली रकम देकर बड़े आढ़तिए उसकी उपज $खरीद लेते हैं, उनसे छोटे आढ़तिये खरीदारी करते हैं, जहां से फुटकर विक्रेता खरीदी करते हैं। इस तरह किसान की उपज आम आदमी के हाथों में आते आते कई दलालों के बीच से गुजरती है और हर दलाल उससे मोटा मुना$फा बनाता है। यही तबका वक्त वेवक्त कालाबाज़ारी को भी अंजाम देता है। यही वर्ग अपने हित साधने के लिए, अपने $फायदे के कानून-कायदे बनवाने के लिए दबे-छिपे राजनीतिक दलों को पैसा पहुंचाता है। इस तरह राजनीतिज्ञों और दलालों के गठबंधन का तंत्र चलता है। इस तंत्र में किसानों के हितों की पूर्णतया अनदेखी की जाती है।
कैसे बढ़ती हैं कीमतें
किसान अपनी उपज बड़े आढ़तियों को बेचता है, उससे छोटे आढ़तिए फसल खरीदते हैं और उनसे फुटकर दुकानदार खरीदारी करते हैं। ये लोग हर स्तर पर फसल का भाड़ा, फसल बिक्री के दौरान फसल में होने वाले अनुमानित $खराबे की राशि, अपना मुनाफा और इसके अलावा $गैर-हिसाबी उगाही करने वालों को दी जाने वाली राशि को क्रेता से वसूलते हैं। ऐसे में किसान द्वारा एक रुपए प्रतिकिलो बेची गई वस्तु ग्राहक को अनुमानत १० रुपए किलो मिलती है, जबकि कई वस्तुओं में यह राशि इससे भी ज्य़ादा हो सकती है। मसलन मान लें किसान अपनी मटर की उपज को बड़े या थोक आढ़तियों को एक से डेढ़ रुपए प्रतिकिलो के हिसाब से बेचता है। ये आढ़तिये उसी मटर को दो या तीन रुपए प्रति किलो के हिसाब से हाथोंहाथ दूसरे सब्ज़ी विक्रेताओं को बेच देते हैं। अगले चरण में से विक्रेता उसी मटर को पांच से सात रुपए प्रतिकिलो में फुटकर विक्रताओं को बेचता है। ये फुटकर विक्रता उसी मटर को २० रुपए प्रतिकिलो में उपभोक्ता को बेच देते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में ऊपर बताई गई वस्तु के खराबे, उसके भाड़े, गैर-हिसाबी वसूली की भरपाई और विक्रेता का स्वयं का $फायदा शामिल होता है। यह प्रक्रिया नकदी $फसलों यानी सब्जियों, फलों में ही नहीं होती खाद्यान्न जिंसों में बेचान के दौरान भी लागू होती है। यहां तक कि अपैरल इंडस्ट्री और दूसरी इंडस्ट्रीज़ में भी यही नियम लागू होता है। हां, यहां इतना जरूर होता है कि वैट के नाम पर सरकार की जेब में जाने वाले पैसे का भी भार उपभोक्ता पर ही पड़ता है। अगर सरकार एक ऐसा व्यापार तंत्र विकसित करे, जिसमें किसान या इंडस्ट्रीज अपनी $फसल / उत्पाद सीधे उपभोक्ता को बेचें तो किसान को तो भारी मुना$फा मिलेगा ही उपभोक्ता की जेब पर पडऩे वाला भार भी चमत्कारिक रूप से घट जाएगा।
कैसे बदलेगी व्यापार तंत्र की सूरत-सीरत
सरकार को चाहिए कि वह पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत किसानों को बाज़ार उपलब्ध करवाए। इसमें सरकार खाद्य पदार्थों के भ्ंाडारण के लिए उच्च तकनीक से युक्त कोल्ड स्टोरेज, शो-रूम्स और दुकानों का निर्माण करे। इन कोल्ड स्टोरेज, शो-रूम्स और दुकानों पर मैनेजर से लेकर सबसे निचले स्तर तक किसानों के शिक्षित बच्चों को ही लगाया जाए। ऐसा होने से किसान अपनी $फसल सीधे उपभोक्ताओं को बेच पाएंगे और मुनाफाखोर दलालों का अंत होगा। इससे किसानों को अपनी मेहनत से तैयार की $फसल का उचित दाम मिल पाएगा और उपभोक्ताओं को भी कम कीमत पर खाद्य सामग्री मिलेगी। कोल्ड स्टोरेज, शोरूम्स और दुकानों के रख-रखाव में आने वाले $खर्च यानी मेंटीनेंस चार्ज को घटाकर शेष मुनाफा उपज से संबंधित किसान को दिया जाए। ऐसा करना संभव है, क्योंकि रिलायंश फ्रेश जैसी कंपनियां सब्जि़यों को सीधे किसान से लेकर बेचने लगी हैं। अगर ऐसे स्टोर्स पर बिकने वाले फल-सब्जि़यों के दामों और खुले बाज़ार में बिकने वाली फल-सब्जि़यों की कीमतों का अध्ययन किया जाए तो सामने आता है कि कीमतें लगभग बराबर ही होती हैं और क्वालिटी के मामले में स्टोर्स पर बिकने वाला समान ज्यादा बेहतर होता है। इसमें से कंपनी अपने स्टोर के रख-रखाव, विज्ञापन पर होने वाले $खर्च और स्टा$फ की सैलरी भी निकालती है और मुना$फा भी कमाती ही है। अगर रिलायंस जैसी निजी कंपनी ऐसा कर सकती है तो सरकार अगर चाहे तो किसानों का बाजार, किसानों के लिए बाज़ार क्यों नहीं खड़ा कर सकती। अगर ऐसा होता है तो तय है कि $गरीबी में जीवन यापन करने वाले किसानों की दशा तो सुधरेगी ही, साथ ही किसानों की आत्महत्या का सिलसिला भी रुक जाएगा। अब देखना यह है कि क्या अर्थशास्त्र के जटिल गणित और आंकड़ों में उलझी सरकार सि$र्फ का$गजी कार्रवाई और बौद्धिक जुगाली ही करती रहेगी या किसानों की दशा सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने का साहस भी करेगी।


Thursday, February 17, 2011











धृतराष्ट्र प्रधानमंत्री की प्रेस कांफ्रेस
प्रधानमंत्री के पास कोई बहाना नहीं था। भाजपा को निशाने पर लिया। पर निशाने पर लेते हुए बेहूदा तर्क दे गए। कहा भाजपा का हंगामा के पीछे गुजरात के एक मंत्री है। ये मंत्री बेचारे अमित शाह हैं, जो जेल चले गए थे। प्रधानमंत्री का कहना था कि अमित शाह को लेकर भाजपा ने कांग्रेस की सरकार को घेर लिया। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री का कहना था कि अगर अमित शाह पर कार्रवाई नहीं होती, तो भाजपा यूपीए सरकार की डकैती पर चुप रहती। यानि कि इस देश के प्रधानमंत्री अब चाहते हैं कि विपक्ष अपनी भूमिका भी अदा नहीं करे। वो चुप रहे और सरकार की डकैती देखते रहे। भाजपा को भ्रष्टाचार को लेकर कोई क्लिन चिट नहीं मिल रही है। भ्रष्ट तो भाजपा के लोग भी हंै। लेकिन अगर भाजपा ने भ्रष्टाचार के $िखला$फ आवाज़ उठायी तो कोई $गलत नहीं किया। हृ संजीव पांडेय
लगता है हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, बहादुर शाह जफर और मोहम्मद शाहरगीला को भी मात दे गए। ऊपर बैठे मु$गल साम्राज्य के अंतिम दिनों के कमज़ोर शासक इस बात की राहत मना रहेंगे होंगे कि चलो हमसे भी कायर दिल और कमजोर प्रधानमंत्री भारत को मिला। आज़ादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद लंबे शासन का दंभ भरने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की प्रेस कांफ्रेंस का नज़ारा दिलचस्प था। इस बार प्रधानमंत्री सि$र्फ बुझे ही नहीं थे, बल्कि उनकी आवाज़ भी लडख़ड़ा रही थी।
जवाब प्रधानमंत्री ठीक से नहीं दे पा रहे थे। 2 जी स्पेक्ट्रम के घोटाले की आवाज जब उनकी प्रेस कांफ्रेंस में सुनाई दी, तो बहुत दयनीय तरीके से प्रधानमंत्री ने कह दिया, क्या करें गठबंधन धर्म में ये होता है। उन्होंने अप्रत्यक्ष रुप से यह भी स्वीकार किया कि उन्हें नियंत्रित करने का चैनल सि$र्फ एक नहीं, कई हैं। ये चैनल उनपर लगातार दबाव बनाए हुए हैं, और वे प्रधानमंत्री पद के इतने लालची हंै कि वे सारे कुकर्मों को देखने के बाद भी इस्ती$फा नहीं देंगे। कम से कम प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने इस्ती$फा देने से तो इंकार ही कर दिया। हालांकि उनके ऑ$फर कोई मतलब भी नहीं बनता, क्योंकि जिस दिन रिमोट कंट्रोल ने इस्ती$फा मांगा, उस दिन उनके पास कोई चारा भी नहीं होगा।
प्रधानमंत्री जी उस कौम से संबंध रखते है, जिन्होंने भ्रष्टाचार तो छोड़, दुनिया के हर पाखंडवाद के $िखला$फ लड़ाई लड़ी। इस कौम ने हर तरह की बुराई से लड़ाई लड़ी, इस कौम ने रणजीत सिंह जैसा एक बहादुर शासक भी दिया, जिसका राज्य लाहौर से आगे पेशावर तक था। लेकिन बेचारे मनमोहन सिंह को क्या हो गया। उन्होंने जो बातें कही, जो दलीलें दीं, तो वो इस देश के अनपढ़ को भी स्वीकार नहीं हैं। गठबंधन की क्या मजबूरी होती है। भाजपा पर जो पलटवार किया वो कितना बेतुका था। गुजरात के एक मंत्री के $िखला$फ अगर कार्रवाई हुई तो क्या भाजपा के लिए इतना बड़ा मुद्दा था कि वो कांग्रेस की सरकार को संसद में ही ठप करवा दे। निश्चित तौर पर नहीं। प्रधानमंत्री ने कहा कि हमने ए. राजा को पत्र लिखा था। लेकिन 'पहले आओ, पहले पाओÓ की नीति पर मुझसे उनकी बात नहीं हुई।Ó साथ ही बोल दिया कि गठबंधन के राजा को मंत्री बनाना पड़ा। यह भी स्वीकार किया कि राजा के $िखला$फ पहले भी शिकायत आयी थी। दिलचस्प बात है कि सारा कुछ जानते हुए भी प्रधानमंत्री न गठबंधन धर्म का पालन करते हुए, दबाव में सारा कुछ किया। राजा को पहले मंत्री बना दिया। बाद में उसे टेलीकॉम भी दे दिया। यानि कि राजा की आदतों की जानकारी प्रधानमंत्री को थी। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने राजा के भरोसे पर भरोसा किया। राजा ने उन्हें भरोसा दिया कि वे नियमों का पालन करेंगे और हमारे भोले प्रधानमंत्री ने मान लिया। मतलब कि प्रधानमंत्री मानते हैं कि राजा भोले नहीं थे। लेकिन वे $खुद इतने भोले हैं कि गठबंधन धर्म का पालन करते हुए 1 लाख 76 हज़ार करोड़ रुपये के घोटाले को देखते रहे।
प्रधानमंत्री के पास कोई बहाना नहीं था। भाजपा को निशाने पर लिया। पर निशाने पर लेते हुए बेहूदा तर्क दे गए। कहा भाजपा का हंगामा के पीछे गुजरात के एक मंत्री है। ये मंत्री बेचारे अमित शाह हैं, जो जेल चले गए थे। प्रधानमंत्री का कहना था कि अमित शाह को लेकर भाजपा ने कांग्रेस की सरकार को घेर लिया। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री का कहना था कि अगर अमित शाह पर कार्रवाई नहीं होती, तो भाजपा यूपीए सरकार की डकैती पर चुप रहती। यानि कि इस देश के प्रधानमंत्री अब चाहते हैं कि विपक्ष अपनी भूमिका भी अदा नहीं करे। वो चुप रहे और सरकार की डकैती देखते रहे। भाजपा को भ्रष्टाचार को लेकर कोई क्लिन चिट नहीं मिल रही है। भ्रष्ट तो भाजपा के लोग भी हंै। लेकिन अगर भाजपा ने भ्रष्टाचार के $िखला$फ आवाज़ उठायी तो कोई $गलत नहीं किया। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के दौरान जब भ्रष्टाचार के कई मसले सामने आए तो कांग्रेस चुप नहीं थी। कांग्रेस ने भी विपक्ष की भूमिका निभायी थी। मनमोहन सिंह तो भ्रष्टाचार को इस कदर प्रोटेक्ट कर रहे है कि विपक्ष की जायज़ आवाज़ भी उन्हें पसंद नहीं है। उन्हें जायज़ आवाज़ के पीछे अमित शाह नज़र आ रहे हंै। जबकि प्रधानमंत्री को बखूबी पता है कि जिस अमित शाह को भाजपा विरोध का कारण बता रहे हंै, उसी अमित शाह के बहाने भाजपा के एलके आडवाणी का खेमा नरेंद्र मोदी को निपटाने में लगा है। इसमें क्या अरुण जेतली, क्या सुष्मा स्वराज सारे शामिल हंै। अमित शाह की गिरफ्तार से कांग्रेस के लोग उतने $खुश नहीं हुए होंगे जितने 2014 में प्रधानमंत्री पद के दावेदार भाजपा के नेता हुए होंगे। क्योंकि इससे भाजपा नहीं, नरेंद्र मोदी निपटते हैं।
हमारे प्रधानमंत्री या तो भ्रष्टाचारियों के घोर संरक्षक हैं या धृतराष्ट्र हैं। वे चाहते सही हंै, लेकिन धृतराष्ट्र की तरह देख नही सकते। उन्हें दुर्योधन और दुशासन की $गलतियां नज़र नहीं आ रही है। वे मजबूर है। बस धृतराष्ट्र की नीति और उनकी नीति में अंतर यही है कि मनमोहन सिंह धृतराष्ट्र की तरह पारिवारिक मोह का नहीं वे गठबंधन धर्म का पालन कर रहे है। इसमें चाहे ए राजा लूटे, या सी राजा। लेकिन प्रधानमंत्री इतने भोले नहीं कि सिर्फ ए राजा के सर पर ठीकरा फोड़, निकल जाए। ए राजा ने अकेले कुछ नहीं किया है। इसमें खिलाड़ी कई शामिल हंै। इन खिलाडिय़ों के नाम प्रधानमंत्री जानते हंै। ये खिलाड़ी इतने खतरनाक है कि प्रधानमंत्री की नौकरी भी खतरे में डाल सकते है। इसलिए प्रधानमंत्री क्या करें। मुहम्मद शाह और बहादुरशाह की तरह कमज़ोर बन गठबंधन धर्म का पालन करने की दुहाई दे रहे है।
प्रधानमंत्री ने बेहद लचर और बचकाना तरीके से कई लाख करोड़ रुपये की लूट से अपना पल्ला झाड़ लिया है। हालांकि उन्हें पता है कि उनकी वो इज्ज़त अब नहीं है, जो इज्जत यूपीए के पहले के कार्यकाल में थी। अब वे बेनकाब हो गए हैं। अपने मातहतों पर बेईमानीं का ठीकरा फोड़ वे $खुद ईमानदार नहीं हो सकते है। कहीं न कहीं आज नहीं तो कल उन पर भी छींटे पड़ेंगे। बस समय का इंतज़ार है। यही कारण तो था कि मीडिया से भी उन्होंने आग्रह किया, नेगेटिव प्रचार न करें, उनका ख्य़ाल रखें। अरे माननीय प्रधानमंत्री जी मीडिया ने तो पहले ही आपका $खासा ख्य़ाल किया था। नीरा राडिया और मीडिया की लॉबिंग का नतीजा था कि आप सारा कुछ जानते हुए सारा कुछ कर गए। क्योंकि इसी मीडिया ने आपका आगे ख्य़ाल रखना था। उन्होंने $खूब रखा आपका ख्य़ाल। आज के प्रेस कांफ्रेंस में मीडिया के वे खिलाड़ी भी शामिल थे, जिनके उपर 2 जी स्पेक्ट्रम के छींटे पड़े हैं। मीडिया तो आगे भी आपका ख्य़ाल रखेगा। क्योंकि मीडिया को भ्रष्टाचार की कमाई का कुछ हिस्सा चाहिए। लेकिन जनता का तो इस मीडिया से भी विश्वास उठ गया है। अगर इसके बाद भी जनता विद्रोह पर उतर गई, तो आप क्या करेंगे। उन्होंने न आपकी सुननी, न भाजपा की न अन्य विपक्ष की।





सविनय आग्रह उपवास नौटंकी अचानक स्थगित भोपाल। संभवत: सबसे छोटा उपवास। या यूं कहें कि शुरू होने के पहले ही तय हो गया स्थगन। किसानों को मुआवज़े और मध्यप्रदेश के साथ केंद्र के भेदभावपूर्ण रवैये को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 'सविनय आग्रह उपवासÓ स्थगित कर दिया है। कारण? शिवराज ने बताया कि प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने सभी मुद्दों पर उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया है। इसकी घोषणा $खुद उन्होंने भेल दशहरा मैदान स्थित उपवास स्थल पर की। हैरत की बात यह है कि इसकी जानकारी प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं को भी नहीं थी। पाला प्रभावित किसानों को राहत देने सहित केंद्रीय सहायता में भेदभाव से जुड़े अन्य मसलों को लेकर रविवार $फरवरी 13 से उपवास आरंभ करने की घोषणा की गई थी।
अहलूवालिया करेंगे चर्चा, 18 को दिल्ली में बैठक
मुख्यमंत्री ने घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर का संदेश उन्हें मिला था, कि प्रधानमंत्री उनसे बात करना चाहते हैं। आज सुबह उनकी राजभवन में राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर की मौजूदगी में टेलीफोन पर प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह से बातचीत हुई। डॉ सिंह ने कहा कि वे उपवास न करें। केंद्र ने उनसे बातचीत के लिए योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोटेंकसिंह अहलूवालिया को अधिकृत किया है। 18 $फरवरी को इस संबंध में दिल्ली में बैठक बुलाई गई है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आप (शिवराज) मेरे छोटे भाई हैं। अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। जो भी विषय हैं, उन्हें हम चर्चा से हल करने का पूरा प्रयास करेंगे। प्रधानमंत्री का इस आशय का पत्र भी कुछ ही देर बाद राजभवन $फैक्स कर दिया गया।
वरिष्ठ नेताओं से की चर्चा
इस घटनाक्रम के बाद उन्होंने पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी, लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और महासचिव एवं प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार से बातचीत की। वरिष्ठ नेताओं का यही मत था, कि उपवास स्थगित किया जाना चाहिए। इसके बाद उन्होंने यह $फैसला किया। मुख्यमंत्री ने मंच से ही कहा कि वे प्रदेश भाजपा अध्यक्ष झा से उपवास रद्द करने की अनुमति लेते हैं।
अ$फवाहों का दौर
माननीय मुख्यमंत्री द्वारा किसानों को राहत हेतु उपवास की नौटंकी हेतु प्रचार व मंच एवं स्थल के निर्माण व प्रबंध हेतु जहां लाखों करोड़ों रूपये स्वाह कर दिये, वही जनता में अनेक प्रकार की भ्रांतियां व अपवाहों ने भी जन्म ले लिया। भाजपा नेतृत्व में बिखराव महा महिम राज्यपाल द्वारा प्रदेश में राष्ट्रपतिशासन की अनुशंसा, प्रशासनिक अधिकारियों के $िखला$फ अनुशासनत्मिक कार्यवाही आदि। अब माननीय मुख्यमंत्री जी को इन अ$फवाहों के खण्डन हेतु प्रचार व $खर्चा एवं समय बरबाद करना पड़ रहा है।
लाखों करोड़ों का अपव्यय
उपवास की तैयारी के लिए लाखों खर्च का अनुमान है। 30,000 रुपए प्रतिदिन का किराया तो भेल के दशहरा मैदान का ही था। उपवास स्थल पर अस्थाई कैबिनेट कक्ष,सचिवालय,शयन कक्ष और टॉयलेट बनाए गए थे। मीडिया सेंटर और एक प्रदर्शनी भी लगाई गई थी।
कार्यकर्ताओं में था उत्साह
राजभवन होते हुए मुख्यमंत्री ठीक 12.55 बजे उपवास स्थल पर पहुंचे। सारे वरिष्ठ नेता मंच पर आसीन हो चुके थे। कार्यकर्ता नारे लगा रहे थे कि 'शिवराज तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं।Ó भोपाल सहित पांच जि़लों के हज़ारों कार्यकर्ता भी उपवास पर बैठने वाले थे।
झा ने दिया जोशीला भाषण
भाषण के लिए सबसे पहले प्रदेश भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा आमंत्रित किए गए। उन्होंने कहा केंद्र ने बार-बार हमारी अनसुनी की,इसलिए मुख्यमंत्री को उपवास का गांधीवादी रास्ता अपनाने के लिए मज़बूर होना पड़ा। ललकारने वाले अंदाज़ में झा ने कहा यह उपवास मप्र में हिलोरें पैदा करेगा और जनसैलाब उमड़ पड़ेगा। एक-एक किसान यहां आकर खड़ा होगा, अब $फैसला होकर रहेगा।
..और ठंडा पड़ गया सबका जोश
तिलक के बाद शिवराज का भाषण शुरू हुआ। उन्होंने कहा उपवास का $फैसला उन्होंने भारी मन से लिया है। भाषण $खत्म करने से पहले उन्होंने अचानक राजभवन में प्रधानमंत्री से टेलीफोन पर हुई चर्चा का उल्लेख कर उपवास स्थगित करने की घोषणा कर दी। मंच पर बैठे कई भाजपा नेताओं के चेहरे पर इसे लेकर आश्चर्य के भाव देखे गए।
मुख्यमंत्री के वेतन-भत्तों से वसूली हो
प्रस्तावित उपवास जनता के पैसों की बरबादी है। इसकी वसूली मुख्यमंत्री के वेतन एवं भत्तों के भुगतान से करनी चाहिए।
दिग्विजय सिंह, कांग्रेस महासचिव

Friday, February 11, 2011










नोट उगलती तिजोरियां और जान देते किसान

प्रदेश के किसान कजऱ् से लदे हुए हैं, और पाले से $खराब हुई $फसल को देखकर उसके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। लगभग रोज़ दो चार किसान ज़हर पीकर अथवा $फांसी लगाकर आत्महत्या कर रहे हैं। नोट गिनने की मशीनों से चिपके नेताओं को इन किसानों के अंासू पोंछने की $फुर्सत नहीं है। आ$िखर यह कब तक चलेगा?
हृ
रवीन्द्र जैन

मप्र में किसान पुत्र की सरकार में यह क्या हो रहा है? कजऱ् से लदे किसान आत्महत्या कर रहे हैं और नेताओं अ$फसरों और उनके रिश्तेदारों की तिजोरियां नोट और सोना उगल रहीं हैं। राम के आदर्श और पं.दीनदयाल उपाध्याय के संदेश को लेकर सत्ता में आई भाजपा के शासनकाल में भ्रष्टाचार की सभी हदें पार हो चुकी हैं। मप्र में आयकर विभाग के ताज़े छापों से संकेत मिल रहा है कि संवैधानिक पद पर बैंठे व्यक्ति और इंदौर की अति ईमानदार सांसद की छत्रछाया में पले नेता भी कंबल ओढ़कर घी पीने में पीछे नहीं हैं। भ्रष्टाचार की इस गंगोत्री में अ$फसर भी जमकर डुबकी लगा रहे हैं।
गुरूवार $फरवरी 3 को तड़के पहली $खबर जबलपुर से आई, जहां एक साथ कई स्थानों पर आयकर के छापे पड़े हैं। जिनके यहां छापे पड़े वे कौन हैं, और पिछले छह सालों में किस नेता के संरक्षण में फले फूले हैं, यह किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है। मप्र विधानसभा के स्पीकर ईश्वरदास रोहाणी ने स्वीकार किया है, कि उनके पुत्र अशोक रोहाणी वर्ष 2008 में शुभम मोटर्स में पार्टनर थे, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण तीन महिने बाद ही यह पार्टनरशिप टूट गई। रोहाणी संवैधानिक पद पर हैं और उनकी बात पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है, लेकिन इस बात पर किसी को यकीन नहीं है, कि बिना राजनीतिक संरक्षण के जबलपुर में दवाईयों के यह व्यापारी रातों रात तीन सौ करोड़ से अधिक की सम्पत्ति के मालिक कैसे बन गए? आयकर विभाग के अधिकारी इशारों इशारों में संकेत कर रहे हैं, कि इन छापों में उन्हें जो दस्तावेज़ मिले हैं, वे आने वाले दिनों में किसी बड़े राजनेता के चेहरे से नकाब उठा दे, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
जबलुपर में इससे पहले तत्कालीन स्वास्थ मंत्री अजय विशनोई के भाई के घर पड़े छापे के बाद उनका मंत्री पद छीन लिया गया था। मज़ेदार बात यह है कि आयकर विभाग ने विश्नोई के बारे में सप्रमाण लिखा है कि यह मंत्री कमीशन$खोर है, फिर भी विश्रोई शिवराज केबिनेट में बने हुए हैं। आयकर विभाग पिछले दो दिनों से इंदौर में भाजपा नेता चंदू माखीजा का घर खंगालने में लगा है। इंदौर सांसद के अति करीबी माखीजा का एक परिचय यह भी है कि वे प्रदेश भाजपा महिला मोर्चा की निवृत्तमान अध्यक्ष अंजू माखीजा के पति हैं। भाजपा के सात साल के कार्यकाल में चंदू माखीजा की आर्थिक स्थिति में तेज़ी से सुधार किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने आयकर विभाग के सामने डेढ़ करोड़ सरेन्डर करने का प्रस्ताव भी रखा है। लेकिन $िफलहाल आयकर विभाग उनके घर से कई बोरे भरकर का$गजात ले गया है। गुरूवार $फरवरी 3 को ही लोकायुक्त ने दो सरकारी इंजीनियरों के घरों में छापा मारकर करोड़ों की अनुपातहीन सम्पत्ति का पता लगाया है। मप्र का यह एक चेहरा है। लेकिन दूसरा चेहरा भोलेभाले $गरीब किसानों का भी है, जिसकी सेवा का संदेश पं. दीनदयाल उपाध्याय ने दिया था और प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के भाषणों में भी इनके कल्याण की बात सुनाई देती है। लेकिन वास्तविकता यह है कि प्रदेश के किसान कजऱ् से लदे हुए हैं, और पाले से $खराब हुई $फसल को देखकर उसके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। लगभग रोज़ दो चार किसान ज़हर पीकर अथवा $फांसी लगाकर आत्महत्या कर रहे हैं। नोट गिनने की मशीनों से चिपके नेताओं को इन किसानों के अंासू पोंछने की $फुर्सत नहीं है। आ$िखर यह कब तक चलेगा? किसान पुत्र मुख्यमंत्री शिव भ्रष्टाचार के $िखला$फ अपना तीसरा नेत्र कब खोलेंगे? क्या मप्र में भ्रष्टाचार मिटाने की बात केवल भाषणों में होगी।

क्या हैं तलवार दंपती को फंसाने वाले सवाल?
हृ
जैनेन्द्र कुमार

नोएडा।
आरुषि हत्याकांड में शक की सूई पूरा चक्कर लगाते हुए एक बार फिर तलवार दंपती के सामने आकर रुक गई है। सवाल है कि आ$िखर ऐसी कौन सी बातें हैं जिसकी वजह से अदालत ने तलवार दंपती पर हत्या का मुकदमा चलाने का आदेश दे दिया। यहां हम पेश कर रहे हैं वे सवाल जिनकी वजह से तलवार दंपती शक के घेरे में हैं।
आरुषि के कमरे का दरवाज़ा कैसे खुला ?
- ए$फएसएल गांधीनगर में साइंटि$िफक टेस्ट से पहले तलवार दंपती ने अपने बयान में कहा था कि रात को सोते समय वह आरुषि का कमरा लॉक करते थे। इस कमरे को बाहर से लॉक करने के बाद चाबी $खुद नूपुर तलवार अपने पास रखती थीं। आरुषि का कमरा बाहर से चाबी से खुल सकता था, या आरुषि अंदर से बिना चाबी के खोल सकती थी। लेकिन घटना के बाद चाबी लॉबी के पास मिली थी। आरुषि का दरवाज़ा सुबह खुला हुआ था। आरुषि के शरीर को सा$फ कर दिया गया था। सीबीआई के इस सवाल पर भी तलवार दंपती के पास जवाब नहीं था कि आरुषि का दरवाज़ा कैसे खुला? सीबीआई का कहना है कि या तो कमरा पैरंट्स ने खोला, या आरुषि ने $खुद खोला था।
आरुषि के मोबाइल रिकॉर्ड किसने डिलीट किए?
- आरुषि के मोबाइल से तमाम डेटा डिलीट किया जा चुका था। सीबीआई के इस सवाल का भी कोई जवाब नहीं मिल सका है, कि यह काम किसने किया? ऐसा कोई आम अपराधी नहीं कर सकता।
गला काटने वाला शख़्स उतना स्किल्ड कैसे?
- आरुषि का गला तेज़धार वाले हथियार से काटा गया था। जिस सधे अंदाज में यह काम किया गया, उससे लगता है कि गला काटने वाले शख़्स बेहद स्किल्ड था। सवाल है कि अगर नौकरों में से किसी ने यह काम किया, तो सर्जन जैसी स्किल उसके पास कैसे आई?
रेप का जि़क्र क्यों हटवाना चाहते थे तलवार?
- राजेश तलवार के भाई ने डॉक्टर से कहा कि वह पोस्टमॉर्टम में रेप का जि़क्र न करें। शुरुआत में $गायब गोल्$फ स्टिक मिलने के बाद तलवार ने इस बारे में सीबीआई को नहीं बताया। सीबीआई के मुताबिक आरुषि और हेमराज को गोल्$फ स्टिक से मारा गया और फिर गले को काटा गया। गोल्$फ स्टिक से दोनों को मारा गया। इससे ज़ाहिर होता है कि यह कृत्य एकाएक गुस्से और उत्तेजना में हुआ होगा।
हेमराज पर ही क्यों जताया शक?
- सुबह जब नौकरानी घर आई तो दरवाज़ा बाहर से लॉक था। तब तक नूपुर तलवार नॉर्मल थीं। उन्होंने घर की चाबी बालकनी से बाहर फेंकी। इसके बाद नौकरानी घर में दा$िखल हुई। तभी तलवार दंपती को पता चला कि आरुषि की हत्या कर दी गई है, और हेमराज $गायब है। उन दोनों ने नौकरों से कहा, देखो हेमराज क्या कर गया? इसके बाद तलवार दंपती ने अपने दोस्त को $फोन किया और फिर पुलिस को इत्तला दी गई।
कानूनी जानकार डी.बी. गोस्वामी का कहना है, कि एविडेंस एक्ट-8 में घटना के पहले और घटना के बाद आरोपी के आचरण को देखा जाता है। इस घटना के बारे में जब तलवार दंपती को नौकरानी के आने के बाद पता चला तो, नूपुर ने कहा कि देखो हेमराज क्या कर गया? ऐसे में यह सवाल उठता है कि नूपुर को कैसे पता चला, कि हेमराज ने ही मर्डर किया है?
उन्हें कैसे नहीं पता घटना के बारे में?
- एविडेंस एक्ट के तहत यह प्रावधान है कि अगर किसी का मर्डर होता है, तो उसके साथ रहने वाले शख़्स की जि़म्मेदारी बनती है कि वह बताए कि उसे कैसे नहीं पता चला। इस मामले में दूसरे तमाम साक्ष्य हैं जिनसे तलवार दंपती की संलिप्तता सामने आ रही है।
छत की तर$ से क्यों हटाना चाहते थे पुलिस का ध्यान?
- सुबह 7.15 बजे पुलिस मौके पर पहुंची। इसी दौरान डॉ. राजेश तलवार ने बताया कि हेमराज ने हत्या की है, और वह $गायब है। पुलिस ने आरुषि की बॉडी को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया। तभी तलवार के दोस्तों ने कहा कि सीढिय़ों पर $खून के धब्बे हैं, लेकिन छत का दरवाज़ा लॉक है। तलवार को छत की चाबी देने को कहा गया, लेकिन उन्होंने बात अनसुनी कर दी। पुलिस ने भी देखा कि $खून के धब्बे हैं, लेकिन उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला। तभी तलवार ने पुलिस से कहा कि वह अपना समय बर्बाद न करें और हेमराज की तलाश करें।
हेमराज को पहचाना क्यों नहीं?
- आरुषि की लाश पोस्टमॉर्टम के बाद वापस लाई गई, और फिर उसका अंतिम संस्कार हुआ। उसके बाद तलवार के नौकरों ने घर को सा$फ किया और साथ ही तमाम दीवारों को भी सा$फ किया गया। अगले दिन तलवार दंपती आरुषि की अस्थियां लेकर जब हरिद्वार गए तब वहां रिटायर्ड डीएसपी मौके पर पहुंचे और उन्होंने सीढिय़ों पर लगे $खून के निशान के आधार पर शक ज़ाहिर किया। फिर नोएडा पुलिस ने छत का दरवाज़ा तोड़ा और हेमराज का शव बरामद किया गया। लेकिन डॉ. राजेश तलवार ने हेमराज के शव को पहचानने तक से इनकार किया। सीबीआई का कहना है कि ये तमाम $फैक्ट्स इस मामले में राजेश तलवार की संलिप्तता की ओर इशारा करते हैं।

Monday, February 7, 2011








राजा का बज गया
हृ संजय तिवारी
बुधवार 2 $फरवरी को जब पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा सीबीआई द्वारा पूछताछ के लिए सीबीआई मुख्यालय पहुंचे तो उन्हें भले ही आशंका रही हो, या न रही हो, लेकिन मीडिया के एक खित्ते ने आशंका ज़ाहिर कर दी थी, कि आज राजा की गिर$फ्तारी हो सकती है। मीडिया में जिन लोगों ने इस खबर को लीक किया था, उनके सीबीआई में अपने सूत्र होंगे ,जिनके हवाले से उन्होंने यह आशंका ज़ाहिर की थी। लेकिन इस लीक हुई $खबर का एक संदेश यह भी है, कि राजा की गिर$फ्तारी का रंगमंच पहले ही तैयार किया जा चुका था। इसीलिए पार्टी स्तर पर गठित शिवराज पाटिल ने अपनी रिपोर्ट में भी जब राजा को दोषी करार दिया, तो ह्वील चेयर पर बैठे बैठे एक बार फिर करुणानिधि दिल्ली पहुंच गये, और प्रधानमंत्री तथा सोनिया गांधी से मिलकर राज्य में होनेवाले चुनावों के लिए सीटों के तालमेल की बात करने लगे।
करुणानिधि ने सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से क्या बात की होगी, अब राजा की गिरफ्तारी के बाद स्पष्ट हो गया है। याद करिए श्रीलंका में प्रभाकरण की मौत को, ऐसा कहा जाता है कि उस पूरे अभियान को भारत सरकार ने परोक्ष रूप से मदद की थी। फिर भी सोनिया गांधी से मेल मुलाकात के बाद करुणानिधि ने मंत्रीपद पर समझौता कर लिया था. आज राजा की गिर$फ्तारी से पहले भी दिल्ली दरबार में पहुंचकर करुणानिधि ने सहमति पत्र पर मौन हस्ताक्षर कर दिया था, इसमें कोई दो राय नहीं। करुणानिधि राज्य में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लडऩे में अपना $फायदा देख रहे हैं। राज्य में डीएमके और एआईडीएमके के बीच सीधी लड़ाई में पलड़ा उसी का भारी होगा, जिसके पाले में कांग्रेस बैठेगी। ऐसे में अगर कांग्रेस का साथ छूटता है, तो डीएमके को राजनीतिक नुकसान होने की पूरी आशंका है. इसलिए राजा की बलि लेकर डीएमके प्रमुख करुणानिधि ने ह्वील चेयर पर बैठे बैठे एक और मुख्यमंत्रित्व काल के लिए अपनी योजना को अंजाम दे दिया। लोकतंत्र के सबसे बड़े संचार घोटाले को अंजाम देनेवाले ए राजा को लेकर न केवल केन्द्र सरकार सांसत में है, बल्कि सीबीआई की भी सुप्रीम कोर्ट में शामत आई हुई है। सुप्रीम कोर्ट में सुब्रमण्यम स्वामी ने जनहित याचिका के ज़रिए इस मामले को सार्वजनिक कर रखा है। सुप्रीम कोर्ट के सामने सीबीआई ने वादा किया है, कि वह संचार घोटाले में 31 मार्च तक सारी जांच पड़ताल पूरी कर लेगी। कोई भी गिर$फ्तारी करने के 60 दिन के भीतर सीबीआई को चार्जशीट तैयार करना होता है। अगर 60 दिन के भीतर सीबीआई चार्जशीट तैयार नहीं कर पाती है, तो ऐसी स्थिति में आरोपी को ज़मानत मिलने का पूरा हक बनता है। अब सीबीआई के पास सुप्रीम कोर्ट में वादे के अनुसार करीब साठ दिन ही बचे हैं। ऐसे में वह ए राजा की गिर$फ्तारी में और अधिक देर नहीं कर सकती थी। इस बीच सोमवार को शिवराज पाटिल समिति ने भी अपनी रिपोर्ट संचार मंत्री कपिल सिब्बल को सौंप दी थी। ऐसा समझा जाता है कि न्यायमूर्ति शिवराज पाटिल ने भी संचार मंत्री ए राजा सहित सिद्धार्थ बेहुरिया और आर के चंदोलिया को दोषी माना है। संचार मंत्री को सौंपी गयी रिपोर्ट के बाद इतना तो सा$फ हो गया कि सरकार के स्तर पर अब सीबीआई के सामने कोई रोक टोक नहीं लगाई जाएगी। इसका कारण सिर्फ प्रशासनिक या फिर भ्रष्टाचार से लडऩे की इच्छाशक्ति ही नहीं ,बल्कि राजनीतिक मजबूरियां भी हैं।
डॉ मुरली मनोहर जोशी की पीएसी को भरपूर प्रश्रय देने के बाद भी विपक्ष के जेपीसी मांग कम नहीं हुई। विपक्ष के हमले के मध्य में सीधे तौर पर प्रधानमंत्री और कांग्रेस है। ए राजा के इस्तीफे के बाद सीबीआई जांच और फिर अब गिर$फ्तारी से एक बार फिर कांग्रेस की कोशिश है, कि सि$र्फ राजा की बलि लेकर स्पेक्ट्रम घोटाले की आंच को ठंडा कर दिया जाए. लेकिन नवंबर 2007 में ए राजा ने प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा है उसमें भी इस बात का उल्लेख है कि वे जो भी कर रहे हैं,उसमें कई केन्द्रीय मंत्रियों की सहमति और अनुमति शामिल है। सहमति और अनुमति देनेवाले इन मंत्रियों में प्रणव मुखर्जी और गुलाम नबी आज़ाद के नामों का जिक्र है। कांग्रेस कभी नहीं चाहेगी कि यह मामला और तूल पकड़े तथा उसके अन्य मंत्रियों के नाम भी इस घोटाले के साथ जुड़े। ऐसे में राजनीतिक प्रबंधकों के लिए सबसे अधिक मु$फीद सौदा यही था, कि करुणानिधि को विश्वास में लेकर राजा पर सीबीआई की कार्रवाई होने दी जाए। इससे जहां केन्द्र सरकार को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि वह भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है, वहीं आगामी बजट सत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार को मौका मिल जाएगा। यह समझना हमारी भूल होगी कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए राजा की गिर$फ्तारी की गयी है या फिर सीबीआई कोई ऐसी स्वायत्त जांच एजंसी है जो काम करने के लिए इस कदर स्वतंत्र है कि अपनी जांच के दौरान वह किसी ऐसे पूर्व संचार मंत्री को भी गिर$फ्तार कर ले जिसकी पार्टी के सपोर्ट से सरकार चल रही है। सीबीआई के कई पूर्व डायरेक्टर भी यह मानते हैं कि सीबीआई के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप होता ही है।
फिर भी पूर्व संचार मंत्री राजा की गिर$फ्तारी से न तो कांग्रेस को कोई $खास $फायदा होनेवाला है, न भाजपा को। कांग्रेस भले ही यह दावा कर रही हो कि उसके शासनकाल में ही यह संभव हुआ है, कि उसने सीबीआई को खुलकर काम करने दिया, जिसके कारण कानून अपने अंजाम तक पहुंच सका है ,लेकिन भाजपा ने पलटवार करते हुए सा$फ कर दिया है कि राजा तो पकड़ में आये हैं, बारातियों को क्यों छोड़ रहे हो? यानी आगामी बजट सत्र में भी स्पेक्ट्रम घोटाले की गूंज कमज़ोर भले पड़ जाए, दबने वाली बिल्कुल नहीं है।

उन्हें भी पकड़ो जिन्होंने राजा को बनाया करप्शन किंग
हृ
आवेश तिवारी

राजा गिर$फ्तार हो गए ,संभावनाएं पहले से थी,मगर वो लोग अब भी बचे हुए हैं,जिन्होंने राजा को किंग आ$फ करप्शन बनाया। अगर गहराई से देखा जाए तो राजा भ्रष्टाचार के इस ब्रेन गेम में सिर्फ और सि$र्फ एक मोहरा थे, वो मोहरा जिसने अंधाधुंध पैसे कमाने के लालच में दिमा$ग का इस्तेमाल करना बंद कर दिया था ,वो मोहरा जिसका इस्तेमाल देश के उद्योगपतियों, मीडिया और कार्पोरेट जगत के दलालों ने अपनी झोली भरने के लिए किया और जब मामले खुला तो पहले गर्दन भी राजा की पकड़ी गयी।
मगर बरखा दत्त और बीर संघवी जैसे पत्रकारों एवं टेलीकाम कंपनियों के उन मालिकानों से अभी तक पूछताछ किये जाने को लेकर कोई चर्चा भी नहीं हो रही जिन्होंने राजा को संचार मंत्री बनाने के लिए सारी हदें पार कर दी। राजा की गिरफ्तारी भारतीय लोकतंत्र के नस - नस में समाये भ्रष्टाचार की अमर बेल को को उखाड़ फेंकने का काम नहीं कर सकती, इस पूरे मामले में ईमानदार कार्यवाही तभी मानी जाएगी, जब उनको भी सज़ा मिले, जिन्होंने इस महाघोटाले को अंजाम देने के लिए राजा की ताजपोशी का मार्ग प्रशस्त किया था। इस पूरे घोटाले ने एक बात तो साबित कर ही दी है कि देश में बिना मीडिया के सहयोग के किसी भी बड़े घोटाले को सरंजाम दिया जाना संभव नहीं है, ये बात दीगर है कि बेहद कमजोर आत्मबल वाली सरकार और पैसा कमाने के लिए नंगई पर उतर चुके कार्पोरेट अ$खबारों और चैनलों के लिए मीडिया के इन चौधरियों के $िखला$फ हल्ला बोलना बेहद कठिन है। अपनी करतूतों को ,अपने काम का हिस्सा बताने वाली बेशर्म बरखा दत्त के लिए राजा की गिरफ्तारी क्या एक सामान्य $खबर की तरह ही होगी ?क्या उनकी आँखों में आधी रात के वो मंज़र फिर से कौंधे होंगे, जब वो नीरा से राजा की ताजपोशी के लिए निश्चिंत रहने की बात कह रही थी। क्या वीर संघवी को अपने लिखे वो शब्द याद आये होंगे जब उन्होंने नीरा से कहा था कि जैसा तुमने कहा मैंने वैसा ही लिखा था न? शायद नहीं। इसकी वजह भी है बरखा दत्त और वीर संघवी समेत इस घोटाले की प्रस्तावना लिखने वाले मीडिया कर्मी और कार्पोरेट जगत के मठाधीश ये जानते थे कि इस लड़ाई में राजा अकेले भले पड़ जाए लेकिन वो अकेले नहीं पड़ेंगे, क्यूंकि उनके पीछे उस बड़े समूह की ताकत जुडी है जो देश में राजनेताओं और राजनैतिक दलों का भविष्य बनाने - बिगाडऩे का मुगालता पाल रखे हैं। राजा मंत्री थे, पद के दुरुपयोग का मामला उन पर ठोंक दिया गया ,निस्संदेह कांग्रेस इस एक कदम पर अपना सीना चौड़ा कर के कह सकेगी कि लीजिये हमने अपने ही मंत्री के $िखला$फ कार्यवाही कर दिया, लेकिन हमने क्या किया ?आज भी बरखा दत्त एनडीटीवी से जुड़ी हैं। कार्यक्रम प्रस्तुत कर रही है, ट्वीटिंग कर रही हैं और राजदीप सरदेसाई सरीखे अपने प्रसंशकों के साथ (अब इनमें बिना रीढ़ का हिंदी $िफल्म उद्योग भी शामिल है) आत्मसुख का बोध कर रही हैं। टेलीकाम घोटाले में मीडिया, महाजनों और माननीयों के गठजोड़ का जो चौंका देने वाला सच सामने आया था, उसका आदि और अंत यहीं नहीं होता ,संचार मंत्रालय आज ही नहीं लम्बे समय से आर्थिक अपराध का केंद्र बना रहा है ,लेकिन ऐसे छोटे बड़े घोटालों की $फेहरिस्त का$फी लम्बी है जो अभी तक सामने नहीं आये हैं और अगर आये भी हैं तो उनमे मीडिया की भूमिका के बारे में सोचा भी नहीं जाता ,लेकिन अब हमें अपनी आँखों पर बंधी पट्टी खोलनी होगी ,मीडिया भी मीडिया के ज़ेरे-$गौर होनी चाहिए, राजा की गिर$फ्तारी इस बात का प्रतीक है, कि चाहते न चाहते हुए भी राजनीति में $गलतियों की कोई माफ़ी नहीं होती ,सज़ा छोटी हो या बड़ी मिलती ज़रुर है। ठीक यही सिद्धांत पत्रकारिता पर भी लागू होता है ,हम लाख कोशिश करके भी अपने दा$गदार दामन को सा$फ नहीं कर सकते। वो बरखा जो एक व्यक्ति द्वारा बरखा दत्त डाट काम नामक वेबसाईट का रजिस्ट्रेशन कराने पर उसे अदालत में खिंच लेती है ,वही बरखा किसी गाँव कस्बे के आम पत्रकार के द्वारा गरियाये जाने पर भी होंठ सिले रखने को मजबूर है, वो वीर संघवी जिन्हें सुनना भी युवाओं के लिए फ$ख्र्र की बात होती थी, उनका जि़क्र छिड़ते ही आवाज़ आती है "मारो दलाल है सा..। स्पेक्ट्रम घोटालों के आरोपियों के $िखला$फ कार्यवाही देश में भ्रष्टाचार के उन्मूलन की प्रक्रिया का हिस्सा तभी बन सकती है ,जब हम उनको भी कानून के दरवाज़े पर ला खड़ा करें, जिनकी वजह से राजा जैसा धूर्त सिंहासन पर जा बैठा ,जनता के मन में $गुस्सा जितना राजा के $िखला$फ है,उससे ज्य़ादा इन कार्पोरेट पत्रकारों के $िखला$फ भी हैं, ये सच हमें जान लेना चाहिए।

Tuesday, February 1, 2011





तिरंगा फहराने पर बवाल ?

जिस तरह से भाजयुमो कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए उमर सरकार और केंद्र सरकार तत्परता दिखा रही हैं, और हर स्तर पर मुस्तैदी से कार्य कर रही हैं। अगर ऐसी ही मुस्तैदी और तत्परता के साथ उसने आतंकवादियों और अलगाववादियों को $खत्म करने के लिए मुहिम छेड़ी होती, तो शायद आज हिंदुस्तान के नक्शे से आतंकवाद का नापाक साया कब का छू-मंतर हो गया होता।
हृ जैनेन्द्र कुमारJustify Fullदेश को आज़ाद करने के लिए अपनी जान देने वाले देश के सच्चे सपूतों ने कभी सोचा नहीं होगा कि आज़ादी के बाद सरकारें राजनीतिक दांव-पेचों में इतना उलझ कर रह जाएंगी, कि उन्हें उचित और अनुचित में $फर्क करना भी नहीं आएगा। भारत में गणतंत्र दिवस पर झंडा फहराने के नाम पर दो पार्टियां आमने-सामने होंगी और दुनिया के सारे देश, भारत के नेताओं के इस विरोधाभासी और अजब चरित्र पर खिल्ली उड़ा रहे होंगे।
भारत आज़ाद देश है और देश के हर व्यक्ति को २६ जनवरी और १५ अगस्त को ही नहीं बल्कि साल के सभी दिनों के दौरान देश के किसी भी हिस्से में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार है, और इस पर राजनीति होती है, तो यह दो पार्टियों की राजनीति न रहकर भारत की सम्प्रभुता पर सवालिया निशान लगाने जैसा माना जाएगा।
कई बार ऐसा हुआ कि $फैशन के नाम पर राष्ट्रीय ध्वज- तिरंगे को डिज़ाइनर्स ने परिधान बना दिया और उसे पहन, इठलाती मॉडल रैम्प पर नज़र आईं। कई बार नामचीन लोगों ने देशप्रेम दिखाने के चक्कर में तिरंगे जैसा केक बनाया, काटा, खाया और मन गया जन्मदिन। ऐसी $खबरंे गाहे-बगाहे पढऩे को मिल जाती हैं। ऐसा करने वालों के विरुद्ध होता-जाता कुछ नहीं है। अबकी बार तिरंगे को लेकर जो बवाल शुरू हुआ, तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा। कुछ दिन पहले कुछ अलगाववादियों और तथाकथित गुमराह लोगों ने श्रीनगर के लाल चौक पर पाकिस्तान का झंडा फहराया। यह $खबर कुछ लोगों को लगी तो कुछ को नहीं, क्योंकि आमतौर पर ऐसी $खबरों को देशहित के नाम पर दबा दिया जाता है। लेकिन जिन लोगों ने ऐसा शर्मनाक कृत्य किया उनके $िखला$फ न तो जम्मू कश्मीर की सरकार ने और न ही केन्द्र सरकार ने कोई कार्रवाई की। भाजयुमो 26 जनवरी को उसी लाल चौक पर तिरंगा झंडा फहराने की तैयारी में लगी , इसके लिए भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर के नेतृत्व में कोलकाता से 12 जनवरी को तिरंगा यात्रा शुरू हुई थी। यह यात्रा 11 राज्यों से शांतिपूर्ण तरीके से गुज़र चुकी थी। देश के प्रिय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही अपील की है कि गणतंत्र दिवस को राजनीतिक $फायदा उठाने और विभाजनकारी एजेंडे को आगे बढ़ाने का मौका नहीं बनाया जाना चाहिए। हालांकि, अपील में मनमोहन ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा सा$फतौर पर भाजपा की ओर था, जिसके भाजयुमो का का$िफला श्रीनगर की ओर लगातार आगे बढ़ रहा था। उधर उमर सरकार ने भाजपा को चेतावनी दी है, कि वह लाल चौक पर तिरंगा फहराने की अपनी योजना पर आगे बढ़ी, तो सरकार बल प्रयोग करने पर मज़बूर होगी। इसके जवाब में भाजपा ने कहा है कि राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए भाजयुमो की राष्ट्रीय एकता यात्रा तय कार्यक्रम के अनुसार विधिवत जारी रहेगी। वहाँ के अलगाववादियों ने २६ जनवरी को ही श्रीनगर के लाल चौक पर भाजयुमो कार्यकर्ताओं के रैली निकालने और राष्ट्रीय ध्वज फहराने पर जवाबी रैली निकालने और काले झंडे फहराने की घोषणा की थी। भाजयुमो के कार्यकर्ताओं को लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोकने के लिए उमर सरकार और केन्द्र सरकार ने पूरी ताकत झोंक दी। श्रीनगर जाने वाले कार्यकर्ताओं की ट्रेनों को धोखे से वापस किया गया, तो कहीं बिना वजह रद्द किया गया। जम्मू-कश्मीर की सीमाएं सील कर दी गर्इं। और यह सब हुआ भारत के नागरिकों को श्रीनगर स्थित लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोकने के लिए।... और इसके पीछे की वजह सरकार यह बता रही है, कि ऐसा करने से देश की शांति को $खतरा है, हिंसा हो सकती है। आ$िखर २६ जनवरी गुज़र गई, केंद्र और जम्मू कश्मीर की सरकारों ने मिलकर भाजपा और भाजयुमो को लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहराने दिया।
आज अलगाववादी ताकतों के डर से सरकार भाजयुमो के कार्यकर्ताओं को लाल चौक में झंडा फहराने से रोकना चाहती है। ऐसा करने से अलगाववादी ताकतों का हौसला बुलंद होगा और इस बात को मानने से किसी को गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि अगर सरकार का रवैया यही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश के हर कोने से अलगाववादी ताकतें अपनी आवाज़ बुलंद करेंगी तब...तब सरकार क्या करेगी? क्या देश में राष्ट्रीय ध्वज फहराना ही बंद कर देगी? केंद्र और जम्मू कश्मीर की सरकार का कर्तव्य तो यह बनता है, कि वह लालचौक पर पाकिस्तान का झंडा फहराने वालों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाती और उन्हें सरेआम मौत के घाट उतार देती, ताकि भाविष्य में फिर कोई भारत की अस्मिता और अखंडता के साथ ऐसा भद्दा खिलवाड़ करने की हिम्मत नहीं करता। अब भी सरकार का यह दायित्व बनता है, कि यदि अलगाववादी २६ जनवरी को भाजयुमो की रैली के बाद जवाबी रैली निकालते हैं, और काले झंडे दिखाते हैं, या किसी प्रकार की हिंसा की कोशिश करते हैं, तो उन्हें देशद्रोही कारार देकर उन्हें मृत्युदंड दिया जाना चाहिए, जिससे भारत को खंड-खंड करने की साजि़श रचने वालों और इस देश की संप्रभुता को चुनौति देने का सपना देखने वालों को सबक सिखाया जा सके। लाल चौक पर झंडा फहराने की कार्रवाई को कांग्रेस पार्टी की हार और भाजपा की जीत मानने के नज़रिए से देखना $गलत है। यह दो पार्टीयों के बीच का विरोध नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की अस्मिता का सवाल है। यह मुद्दा है देश की अखंडता और संप्रभुता का, और इससे किसी भी कीमत पर समझौता करना उचित नहीं ठहराया जा सकता। जिस तरह से भाजयुमो कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए उमर सरकार और केंद्र सरकार तत्परता दिखा रही हैं, और हर स्तर पर मुस्तैदी से कार्य कर रही हैं। अगर ऐसी ही मुस्तैदी और तत्परता के साथ उसने आतंकवादियों और अलगाववादियों को $खत्म करने के लिए मुहिम छेड़ी होती, तो शायद आज हिंदुस्तान के नक्शे से आतंकवाद का नापाक साया कब का छू-मंतर हो गया होता।


गणतंत्र का उत्सव पर्व
हृ संजय तिवारी

तलवार पर तेज़ धार हथियार से हमला करके सबक सिखानेवाला युवक उत्सव शर्मा अब पुलिस हिरासत में है। बेटे को लेकर चिंतित बाप की गुहार है, कि वह मानसिक रूप से संतुलित नहीं है, इसलिए उसके साथ कोई बुरा बर्ताव न किया जाए। केएल शर्मा को डर है कि पुलिस उसके बेटे को हत्या के प्रयास में नामज़द कर सकती है। ऐसा हुआ तो उनके बेटे की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। उत्सव शर्मा बनारस के हैं। बिल्कुल ही नौजवान है। 20-22 की उम्र है। व्यवस्था से व्यथित उत्सव शर्मा न्याय और अन्याय के बीच उस पतली रेखा को पार कर गये हैं, जिसे हमारे गणतंत्र ने पिछले साठ सालों में भरसक मोटा करने का काम किया है। इस लिहाज़ से देखें तो उनके बाप की अपील सही नज़र आती है कि उत्सव शर्मा का मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है। अगर वे मानसिक रूप से संतुलित होते तो निश्चित रूप से सबकुछ बर्दाश्त करके बहस करते रहते। गणतंत्र के बासठवें साल की पूर्व संध्या पर जब महामहीम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने देश को संबोधित किया और देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर चिंता जताई तो उत्सव शर्मा पुलिस के हत्थे चढ़ चुका था। अभी भी वह पुलिस की हिरासत में है। कानून की दवाई खा खा कर बीमार हो चुके इस देश में अब किसी से भी उत्सव के बारे में पूछेंगे तो वह यही कहेगा कि कानून को अपना काम करना चाहिएद्ध। यह उत्सव उस देश में पैदा हो गया है, जिसकी लगभग आधी आबादी 25 साल से नीचे है। यह आधी आबादी कई तलों पर बंटी हुई है। बड़ी संख्या गांवों में है ,जो शहर आने को आतुर है। गांव इतने गये गुजरे हो गये हैं ,कि वे हमारे नौजवानों को थामें नहीं रख सकते। जिन परंपरागत उद्योगों और व्यवस्थाओं में ग्रामीण भारत जीवन पाता था उन्हें पूरी तरह से उजाड़ दिया गया है। ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था और समाज व्यवस्था ऐसे भ्रंस पर आ खड़ी हुई है कि नवप्रभात दूर दूर तक दिखाई नहीं देता। जैसे उद्योग में उत्पादन की लघु इकाई अनायास साबित कर दी गयी वैसे ही समाज व्यवस्था के लघु स्वरूप गांव को इतना अस्तित्वहीन बना दिया गया है कि उन्हें अपने होने की कोई ज़रूरत समझ में नहीं आ रही है। भविष्य का भारत शहरों में बसेगा। भविष्य के इस भारत में कई चरण और तल होंगे जिसमें टायर वन टायर टू के सिटीज़ तो हो सकते है,ं लेकिन स्वतंत्र अस्तित्व वाली ग्रामीण इकाई ा़त्म हो जाएगी. फिर नौजवान शहर न आयें तो जाएं कहां? हिन्दुस्तान टाइम्स ने गणतंत्र दिवस के पावन मौके पर सीएनएन-आईबीएन के साथ मिलकर एक सर्वे किया है. सर्वे नौजवानों पर ही केन्द्रित है। सर्वे उभरते भारत के उन नौजवानों पर केन्द्रित है जो शहर के मंहगे और पथरीले घरों में पैदा हुए हैं और उनकी सारी सोच कैरियर प्वाइंट आ$फ व्यू से ही निर्धारित होती है। किताबों के बोझ को पीठ पर लादे स्कूल के रास्ते जवानी की दहलीज़ पर पहुंचे इन नौजवानों का उत्सव शर्मा जैसा बिल्कुल ही नहीं है, जो न्याय अन्याय की मोटी रेखा को पतला करने के लिए आठ सौ हजार किलोमीटर की यात्रा करके दिल्ली पहुंच जाता है, और किसी राजेश तलवार या फिर एसपीएस राठौर के दा$गदार चेहरे का नकाब अपनी चाकू से उतार देता है। वह जान से तो नहीं मारता लेकिन इन दोनों के चेहरे पर उसने वह घाव ज़रूर दे दिया है कि वे जब भी आइना देखेंगे तो उन्हें अपने किये गये पाप की याद ज़रूर आयेगी। हिन्दुस्तान टाइम्स जिन नौजवानों का सर्वे हमें पढ़ा रहा है वे नौजवान $खुश रहना चाहते हैं। निश्चित रूप से उनकी $खुशी पैसे के रास्ते आती है। यह नौजवानों का वह वर्ग है जिसका दायरा व्यापक है। वह ग्लोबल गिरमिटिया है और सेवा करने दुनिया के किसी भी कोने में जा सकता है। ठीक वैसे ही जैसे गांव से उठा नौजवान गांव से उठकर किसी भी शहर में जा सकता है।
देश में नौजवानों के इन दो प्रकार के अलावा एक तीसरा प्रकार भी है जो राजनीतिक या सामाजिक रूप से सक्रिय है। चेन्ज की ख़्वाइश मन में लिए नौजवानों का एक बड़ा वर्ग गांव और शहर दोनों जगह है। लेकिन आज का मीडिया या व्यवस्था उस नौजवान की ओर नहीं देखना चाहती। उत्सव शर्मा नौजवानों की ऐसे ही वर्ग से आता है जिसे देश के संघीय ढांचे में पूरा विश्वास है और जो चाहते हैं एक नेशन के रूप में भारत सशक्त स्टेट बने। ये नौजवान हिन्दुस्तान टाइम्स के सर्वे वाले नौजवानों की तरह बहुत $खुश तो बिल्कुल ही नहीं है। वे नाराज हैं। उन्हें लगता है उनके आस पास सबकुछ ठीक नहीं हो रहा है। इसलिए वे जहां मौका मिलता है ठीक करने निकल पड़ते हैं। जवानी का यह स्वरूप पिछले दौर में जेलों तक जाकर क्रांति को अंजाम दिया करता था। विश्वविद्यालयों की राजनीति के रास्ते अपने आप को आगे लाता था और देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में अपने आपको स्थापित करता था। लेकिन कारपोरेट होते भारत में नौजवानों का जो कारपोरेट वर्ग पैदा हुआ उसने उस नौजवान को अर्थहीन साबित करने का काम किया है उनके सामने यक्ष प्रश्न पैदा कर दिया है कि अगर मेरा कैरियर है तो फिर तुम अपने कैरियर की चिंता क्यों नहीं करते? और आज के शहरी भारत में देश प्रेम, व्यवस्था के $िखला$फ लड़ाई या फिर कुशासन के $िखला$फ बेचैनी भरी कार्रवाई कैरियर तो क्या काम भी नहीं हो सकता।
साठ साल के बुढ़ाते गणतंत्र पर यहां के पचास प्रतिशत नौजवान हर प्रकार से बोझ साबित हो रहे हैं। इस बोझ से अगर कोई उत्सव शर्मा जैसी चिंगारी निकलती है तो उसे मानसिक रूप से बीमार बता दिया जाता है। हो सकता है उत्सव और उसके परिवार वाले कानून के कहर से बचने के लिए यह रास्ता अख़्ितयार कर रहे हों लेकिन इस देश के राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने उत्सव शर्मा के बारे एक शब्द भी क्यों नहीं बोला? जो लोग व्यवस्था से चिंतित है ,और राजनीतिक भ्रष्टाचार से आजिज आ चुके हैं उत्सव शर्मा ने उनकी चिंता दूर करने का रास्ता दिखा दिया है। उत्सव शर्मा को न तो अनुराग ठाकुर होने की तमन्ना है और न ही वे राहुल गांधी होना चाहेंगे। उत्सव इस देश के उस नौजवान का प्रतिनिधित्व करता है जो सीधे न्याय करने में यकीन रखते हैं। जिन्हें बौद्धिक जुगाली और कर्म के परिणाम की चिंता नहीं है। कोई शीलू या फिर कोई उत्सव शर्मा उभरेंगे तो यही व्यवस्था उन्हें दोषी बनाकर $खारिज करने का काम करेगी। लेकिन आप $खुद सोचिए ऐसे उत्सवों का अगर पर्व ही शुरू हो गया तो? न्याय का यह रास्ता व्यवस्था के लिए भले ही चिंता का विषय हो लेकिन साठ साल की नाकामी के बाद और कोई रास्ता बचा भी नहीं है। इस गणतंत्र पर उत्सव पर्व के आगे न अनुराग ठाकुर की तिरंगा यात्रा में दम नज़र आ रहा है और न राजपथ के सरकारी आयोजन आकर्षित कर पाये। सारे आयोजन फीके नज़र आये। आप क्या सोचते हैं?



वाइब्रेंट गुजरात को रोकने के लिए लाल चौक का पाखंड
हृ संजीव पांडेय
पिछले तीन दिनों से भाजपा के तिरंगा अभियान ने देश में गर्मी ला दी थी। एकबारगी भाजपा के नेताओं ने महसूस करा दिया था, कि लाल चौक भारत के कब्ज़े में नहीं, पाकिस्तान के कब्ज़े में है। भाजपा का पाखंड और कांग्रेस के उदंड ने मीडिया को एक जोरदार मसला दे दिया था। तीन दिन तक $खूब कहानी चली, पर कहानी का पटाक्षेप साधारण तरीके से हो गया। न तो इस कहानी को भारी जनसमर्थन मिला, न कोई बड़ा हादसा हुआ, जो कांग्रेस और भाजपा के नेता चाहते थे।
घमंडियों और पाखंडियों के बीच पिछले छ महीनें से चल रही जंग समाप्त हो गई। जो लाभ भाजपा लेना चाहती थी, वो ले नहीं पायी। माधोपुर के पास भी भाजपा को कोई भारी जनसमर्थन नहीं मिला। लोगों को यह महसूस हो गया था, कि यह राष्ट्रभक्ति नहीं, बल्कि राजनीतिक फायदे को लेकर निकाली गई एक यात्रा थी, जिसके तार भाजपा की आतंरिक सत्ता संघर्ष से जुड़ा हुआ है। 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के नेताओं में नेतृत्व के जंग की एक तैयारी भर की यह यात्रा थी, जिसमें लाल चौक और तिरंगा का उपयोग किया गया। हाशिए पर गए नेताओं को भी एक बार लाइम लाइट में आने का मौका मिला। और तो और राहुल गांधी की तरह ही मुंह में चांदी के चम्मच लिए अनुराग ठाकुर को भी आज से दस साल बाद भाजपा में स्थापित करने की योजना को अंजाम दिया गया। हालांकि उस समय तक इन पाखंडियों का क्या होगा, यह पता नहीं।
जब भाजपा के युवा विंग ने तिरंगा यात्रा कोलकाता से शुरू की थी तो कोई बहुत ज्य़ादा उत्साह इस देश के लोगों के बीच नहीं था। भाजपा की इस तरह की यात्राओं का खेल लोग समझ चुके हैं और उनके इस पाखंड से लोग ऊब गए हैं। कोई भी भाजपा का नेता अपने आप को स्थापित करने के लिए कोई न कोई यात्रा निकालता है
इस यात्रा के पीछे एक राजनीतिक सोच होती है कि एल.के. आडवाणी की रथ यात्रा की तरह ही स्थापित होने में उन्हें मदद मिलेगी। लेकिन अब देश की जनता इस तरह की यात्राओं में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है। लेकिन भाजपा के नेता कहां मानने वाले थे। घमंडी कांग्रेसियों की मूर्खता ने पाखंडियों की भाजपा को अच्छा मौका दे दिया। पंजाब पहुंचते-पहुंचते भाजपा ने इस यात्रा को गर्मा दिया। मौके के इंतज़्ार में भाजपा के तीन मैनेजर शामिल थे। नीरा राडिया टेप में आरोपों को झेल रहे अनंत कुमार, बिहार में नरेंद्र मोदी का रास्ता रोकने वाले अरुण जेतली और 2014 में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार बनने की ख़्वाहिश रखने वाली सुष्मा स्वराज चार्टर प्लेन से जम्मू पहुंच गई। $गरीब देश की जनता को इंटरनेट पर ट्विट कर पल-पल की जानकारी सुष्मा स्वराज दे रही थी। उन्हें नहीं पता था कि उनके भाजपा के अस्सी प्रतिशत कार्यकर्ताओं को इंटरनेट का इस्तेमाल करना नहीं आता है। मीडिया के कुछ लोग जो भाजपा के $खास मेहरबानी से चलते है, तीनों नेताओं को हीरो बनाने में लग गए। जम्मू पुलिस ने इन्हें धकेल कर पंजाब में छोड़ दिया। वहां पर फिर आगे की रैली हुई। अरुण जेतली ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को $खूब याद किया। लेकिन उपर बैठे श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पता था कि उनका नाम लेने वाले इन ढोंगियों को कश्मीर और लाल चौक से कोई प्यार नहीं है। ये तो सत्ता के खेल में यह कर रहे है। नहीं तो अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में ये लाल चौक पर झंडा फहराने ज़रूर आते। और तो और राजनाथ सिंह को एकाएक बापू याद आ गए। जब उन्होंने अपने प्रबल विरोधी अरूण जेतली और सुष्मा स्वराज को यात्रा का सारा $फायदा लेते देखा, तो एकाएक भाजपा विचारधारा के घोर विरोधी महात्मा गांधी के शरण में पहुंच गए। राजघाट पर गांधी की समाधि के आगे धरना दे दिया। पूरी तरह से गांधी के सिद्वांत पर सत्याग्रह शुरू कर दिया और भूख हड़ताल शुरू कर दी। यह था भाजपा के शीर्ष नेताओं का सत्ता का खेल। उतर प्रदेश में भाजपा को हाशिए पर ले जाने वाले राजनाथ सिंह एका-एक गांधीवादी हो गए। क्योंकि पार्टी में हाशिए पर जाने के बाद दुबारा स्थापित होने की कोशिश कर रहे हंै। अब इसमें महात्मा गांधी से ज्य़ादा बड़ा सहयोगी उन्हें और कौन मिल सकता था। क्योंकि गांधी तो विरोधियों को भी दिल से लगाकर उन्हें स्थापित करते थे।
ये सारा खेल भाजपा के आंतरिक संघर्ष को दिखा रहा है। नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को कुंद करने के लिए भाजपा के कछ मैनेजरों ने इस यात्रा को गर्म कर दिया। ये तीनों नेता एकाएक राष्ट्रीय पटल पर आने के खेल में शामिल हो गए है। किसी भी तरह से नरेंद्र मोदी का प्रभाव कम हो और ये 2014 के चुनाव में भाजपा को लीड करे, यही अरुण जेतली और सुष्मा स्वराज का लक्ष्य है। भाजपा का यह खेल अभी नहीं एक साल पहले शुरू हो चुका है। बिहार चुनावों में नरेंद्र मोदी को रोकने की साजि़श भाजपा के बाहर से नहीं भाजपा के अंदर से हुई थी। इस खेल में अरूण जेतली और सुषमा शामिल थे। ज़मीनी आधार से विहीन दोनों नेता मोदी के प्रशासनिक क्षमता की सफलता से डर गए हंै। कारपोरेट दुनिया का समर्थन, गुजरात के विकास ने कांग्रेस से ज्य़ादा भाजपा नेताओं को डरा दिया है। क्योंकि मोदी ने अपने चाल-चरित्र और चेहरा को बदलने की कोशिश की है। लाल चौक पर कभी मुरली मनोहर जोशी के साथ झंडा फहराने वाले नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय नेता बनने के लिए अपने दंगाई चरित्र को विकासवादी चरित्र में बदलने में लगे है। देवबंद के कुलपति $गुलाम मोहम्मद वस्तानवी के नरेंद्र मोदी के संबंध में दिए गए एक ब्यान को इसी दिशा में देखा जा रहा है। मुसलमानों के आतंरिक दबाव में आए वस्तावनवी ने अपने पहले ब्यान में मोदी को क्लीन चिट देकर उनके विकास का गुणगाण किया था। निश्चित तौर पर इस ब्यान ने कांग्रेस से ज्य़ादा भाजपा के मैनेजर रूपी नेताओं को चिंता में डाल दिया था। अरूण जेतली और सुषमा स्वराज को तिरंगा के बहाने जो $फायदा मिलना था, वो नहीं मिला। उन्होंने पूरी कोशिश की कि लाल चौक को पाकिस्तान में दिखाया जाए। उन्होंने पूरी कोशिश की उमर अब्दुल्ला को आसिफ अली ज़रदारी और युसूफ रज़ा गिलानी का एजेंट ठहराया जाए। लेकिन देश की जनता इस सच्चाई को जानती है। कश्मीर में भारतीय सेना है, केंद्रीय पुलिस भी है। इनके कैंपों में भारतीय तिरंगा फहरा रहा है। देश की जनता इसे समझती है। फिर भाजपा के पाखंड को भी देश की जनता जानती है। इसलिए इस बार भाजपा के ये मैनेजर $फेल हो गए। हां भाजपा में वंशवाद की परंपरा को शुरू करने वाले नेताओं को आगे स्थापित होने के रास्ते खुल गए। कांग्रेस के वंशवाद का विरोध करने वाले भाजपाई अब अपनी पार्टी में वंशवाद की परंपरा को बो उन्हें स्थापित करने में लग गए है। चांदी का चम्मच मुंह में लिए अनुराग ठाकुर, जिन्होंने कहीं भी भाजपा में संगठन स्तर पर जि़ंदगी में संघर्ष नहीं किया, अब भाजपा के अग्रिम पंक्ति में स्थापित होने में सफल हो गए। उनके पास वो सारे संसाधन हंै, जो आम भाजपा के कार्यकर्ताओं के पास नहीं है। उनके पास करोड़ों रुपये हैं, उनके पिता जी मुख्यमंत्री है। यानि कि स्थापित होने के लिए जो दो ज़रूरी गुण भाजपा में चाहिए, वो अनुराग ठाकुर के पास हंै। फिर वे क्रिकेट की राजनीति करते रहे हंै। इसलिए क्रिकेट की राजनीति करने वाले अरूण जेतली भी उन्हें $खूब मदद कर रहे है। भाजपा के वर्तमान मैनेजरों ने यह तय करना शुरू कर दिया है, कि दस साल बाद भाजपा पर कौन से मैनेजरों का कब्ज़ा होगा। कुल मिलाकर आप कह सकते हंै मैनेजर संस्कृति के लोग तिरंगा के बहाने देश की जनता को बेवकू$फ बनाकर अपनी मज़बूती कर रहे हैं। तिरंगा से जो भाजपा की आतंरिक राजनीति नज़र आ रही है, वो आने वाले दिनों में और तेज़ होगी। मोदी के वाइब्रेंट गुजरात का मुकाबला दिल्ली के भाजपा नेताओं के पाखंडी राष्ट्रवाद ही दे सकता है। बेचारे नीतिन गडकरी को कुछ नहीं समझ में आ रहा क्या करें। वे दाव तो हर जगह खेल रहे हैं। लेकिन उन्हें समझ में नहीं आ रहा है। हर जगह अपना गुट बनाने के चक्कर में हैं। लेकिन उनके प्यादे मार खाते हंै। बिहार में सुशील मोदी को मारने के लिए जब सीपी ठाकुर को खड़ा किया तो सीपी ठाकुर की छोटी से लालच ने गडकरी की सारी योजना पर पानी फेर दिया। अब कुछ राज्यों में उनका और प्रयास चल रहा है। पर समझ में नहीं आता है, कैसे अपने प्रयासों को वे सफल करे। उधर संघ भी अब गडकरी से का$फी नाउम्मीद हो चुका है। व्यवसायी गडकरी संघ के काम भी नहीं आ रहे हंै। लेकिन इनसे अलग एल.के. आडवाणी अपने खेल में लगे हैं। एलके आडवाणी अभी भी अपने आप को पीएम इन वेटिंग मानते हंै। उन्हें उम्मीद है कि मध्याविधि चुनाव होंगे। फिर प्रधानमंत्री के उम्मीदवार तो वही होंगे। इसलिए वे चुप बैठ अपना खेल कर रहे हंै। लेकिन उनकी चिंता भी नरेंद्र मोदी है। कुछ दिन पहले आडवाणी से मिल नरेंद्र मोदी ने चेतावनी वाले अंदाज़ में कुछ कड़े शब्द उन्हें कहे हैं। नरेंद्र भाई ने आडवाणी को चेतावनी वाले लहजे में कह दिया है, कि वे अपने मैनेजरों से उनके $िखला$फ साजि़श न करवाएं, नहीं तो आने वाले दिनों में वे भी अपना खेल खेलने से बाज़ नहीं आएंगे। कुल मिलाकर संघर्ष तो अब वाइब्रेंट गुजरात से ही है। तिरंगा को तो इन पाखंडियों ने तार-तार कर दिया, अपने हितों के लिए।

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