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Friday, December 10, 2010






सही $फरमा रहे हैं असलम शेर$खान
चेत जाओ महारथियो
हृ चन्द्र शेखर सिंह मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान अपने शासनकाल के 5 साल पूरे होनेे की $खुशी में जो जश्न मना रहे हैं, उसके कोलाहल के बाद भी यदि मध्यप्रदेश के कांग्रेसी नेताओं की आंखें नहीं खुलतीं, तो फिर इसमें कोई संदेह नहीं, कि अगले चुनावों में मध्यप्रदेश एक और बिहार के रूप में खड़ा नज़र आएगा। ये आश्चर्यजनक है कि डंपर, भूमि......आदि घोटालों से घिरी शिवराज की सत्तायात्रा, बे$खौ$फ जारी है। कांग्रेस $खुद को सत्ता का दावेदार समझती है, पर सही मायने में वो आज की तारी$ख में एक दमदार विपक्षी पार्टी के रूप में भी नज़र नहीं आ रही है। हाल ही में मप्र कांग्रेस इकाई उपाध्यक्ष असलम शेर$खान ने इस तर$फ ध्यान खींचते हुए अपनी पार्टी के महारथियों को आपसी गुटबाज़ी छोड़कर एक साथ खड़े होने का आव्हान किया था, किंतु नहीं लगता कि सुभाष यादव, राहुल सिंह, सुरेश पचौरी, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह वगैरा अपने-अपने अहम भूलकर गले मिल पाएंगे। भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस की हालत अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा, दिग्विजय सिंह जैसे विशेष कद्दावर नेताओं के केन्द्र की राजनीति में सक्रिय हो जाने से लावारिस सी हो गई है। अभी कुछ माह पूर्व तक विधानसभा में विपक्ष की नेता जमुना देवी के निधन के बाद तो जैसे यतीमों की सी हालत में आ गई है। वह शासक पार्टी को अनेक मुद्दों पर कानूनी घेरों में लिए रखती थी, और किसी न किसी मामले में रैली, आंदोलन चलाकर कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व को जीवित रखे हुए थीे। दूसरे कद्दावर नेता सुभाष यादव बीमारी की वजह से पार्टी कार्यों में भाग नहीं ले पाते। प्रदेश पार्टी के अध्यक्ष श्री पचौरी अन्य ताकतवर नेताओं कार्यकर्ताओं को अपने साथ लेकर चलने में शायद अपना अनादर समझते हैं, जिसकी वजह से अजय सिंह (राहुल), असलम शेर $खान जैसे और भी कद्दावर नेता कार्यकर्ताओं का उन्हें सहयोग प्राप्त नहीं हो पाता। असलम शेर $खान ने ही बताया कि जिस मीडिया कमेटी और राजीव गांधी पंचायत राज संगठन की जि़म्मेदारी उन्हें सौंपी गई है, वह केवल नाम की ही है। उनके पास न कोई अधिकार हैं न काम। लगभग यही हालत रही अजय सिंह (राहुल) के प्रभार वाली समिति का जिसका प्रभारी उन्हें बना रखा था।
छुटपुट समाचार मिलते हैं, जब मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांतिलाल भूरिया, दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के दौरे पर आकर किसी हद तक कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार करते रहते हैं। मगर क्या अच्छा हो यदि पार्टी हित में वे अपने-अपने स्वार्थों व अहम को भूलकर एक स्थान पर, एकजुट होकर, एक मज़बूत संगठन के निर्माण की पहल करें।
वर्तमान मप्र सरकार जो लगभग 5-5 वर्षों की दो पारियां पूरी करने जा रही है, उसके भ्रष्ट कारनामों से मज़दूर, किसान, छोटे व्यापारी, कर्मचारी, आम जनता कितनी दुखी और त्रस्त है, उसका आंकलन कांग्रेसी कार्यकर्ता करें।
रेगिस्तान में पानी की झील के मा$िफक वायदों से त्रस्त लोग भटक रहे हैं। जनता की महंगाई के कारण कमर टूटी जा रही है, जबकि बड़े व्यापारियों के गोदामों में माल सड़ रहे हैं। जब मंत्री और अधिकारी ही बिना कमीशन के किसी की बात नहीं सुनते, तो जनता के दर्द का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। ऐसे में यदि बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस, आंदोलन रैली, पर्चे, प्रचार और जनसंपर्क कर के दुखी जनता का समर्थन नहीं जुटा सकती, तो दोष पार्टी मुखिया का ही माना जाएगा। गत वर्ष 2008 के निर्वाचन से पूर्व, यदि एकजुट संगठित होकर प्रयास किए जाते, तो प्रदेश का राजनैतिक नक्शा कुछ और होता, मगर अ$फसोस कि इन सब नेताओं की तोपों के रू$ख विभिन्न दिशाओं में हैं, जो एक-दूसरे को ही भेद रहे हैं। काश यह सब एकजुट होकर एक ही दिशा में प्रयास करते...

संसद को बौना करते बड़े नेता
हृ रामबहादुर राय
एक पखवाड़े से अधिक का समय बीत गया दुनिया के सबसे बड़े देश की संसद ठप पड़ी हुई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में संयुक्त संसदीय जांच दल के नाम पर अपनी अपनी राजनीतिक गोटियां $िफट कर रहे हैं, जिसके कारण संसद ठप पड़ी हुई है. रामबहादुर राय मानते हैं कि असल में संयुक्त संसदीय जांच दल की विपक्ष की मांग एक ऐसी राजनीतिक मांग है जिसका सत्ता पक्ष और विपक्ष में बैठे कुछ नेताओं को राजनीतिक लाभ पहुंचाती है, इसीलिए इस मामले में पीएसी की जांच को कमतर बताकर जेपीसी की मांग के नाम पर संसद को ठप कर दिया गया है। संसद के सामने पिछले 17 दिनों से एक सवाल है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मामले की जांच जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) करे, या पीएसी (लोक लेखा समिति)। अभी सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता जो कर रहे हैं, उससे या तो उनका अहंकार झलकता है, या नासमझी, या फिर अज्ञानता। जसवंत सिंह ने लेख लिखा, लालकृष्ण आडवाणी, प्रणव मुखर्जी और सुषमा स्वराज ने बयान दिए, चारों के बयान तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। संसद जनता का मंच है, संविधान का मंच है, लेकिन ये नेता उसे नकार रहे हैं। इनसे सवाल पूछा जाना चाहिए कि आप संसद में क्यों हैं। अगर इन नेताओं में संसदीय मर्यादा होती और संसद के प्रति प्रतिबद्धता होती, तो ये कोई न कोई रास्ता निकाल लेते। लेकिन दोनों पक्ष वर्ष 2014 की चुनावी राजनीति पर उतर आए हैं, और ऐसा एक बार पहले भी हो चुका है। जब अप्रेल 1987 में बो$फोर्स का मामला उछला, तब चुनाव को दो साल ही रह गए थे। विपक्ष ने ऐसी परिस्थिति बनाई कि राजीव गांधी को मध्यावघि चुनाव में जाना पड़ा। नेता बो$फोर्स मामले को खींचते रहे, संसद की कार्यवाही बाघित होती रही। फिर संसद में कार्यवाही लगातार बाघित हो रही है। दो-तीन तरह के भ्रम हैं। कहा जा रहा है, जेपीसी ताकतवर होगी, पीएसी कमज़ोर होगी। विशेषज्ञों का कहना है, यह वाहियात बात है। पीएसी संसद की आर्थिक मामलों की स्थायी समिति है। पीएसी को वही अघिकार हैं, जो आप जेपीसी को बनाकर देंगे। विपक्ष द्वारा जेपीसी की मांग हो रही है, जबकि जेपीसी का अनुभव अच्छा नहीं रहा है। सबसे पहले जेपीसी की मांग 1989 में उठी थी और ह$फ्ते भर के राजनीतिक दंगल के बाद तत्कालीन सरकार जेपीसी के लिए तैयार हो गई थी। बी. शंकरानंद की अध्यक्षता में जेपीसी बनी। मालूम होना चाहिए कि शंकरानंद की जांच रिपोर्ट एस.के. भटनागर की देखरेख में बनी थी। बो$फोर्स में जो 100 लोग आरोपी थे, उनमें भटनागर भी शमिल थे। जो व्यक्ति शंकरानंद समिति का सचिव था, उसने रिटायर होने के बाद इस राज़ को खोल दिया है। संसद में जो लोग रूचि लेते हैं, वे जान गए हैं कि राजीव गांधी के इशारे पर शंकरानंद की रिपोर्ट संसद मे नहीं, बल्कि रक्षा मंत्रालय में बनी और इसीलिए उस जेपीसी से कुछ नहीं निकला। 1993 में राव सरकार के समय दूसरी बार रामनिवास मिर्धा की अध्यक्षता में जेपीसी बनी, जब हर्षद मेहता कांड हुआ। 1993 में भी संसद 17 दिन तक नहीं चली थी। तीसरी बार जेपीसी 1999 में वाजपेयी सरकार के समय बनी, प्रकाश मणि त्रिपाठी की अध्यक्षता में, केतन पारेख प्रतिभूति घोटाले का मामला था। चौथी जेपीसी बनी मनमोहन सिंह की सरकार के समय 2005 में, इसमें शीतलपेय में जहरीले रसायन की जांच का काम होना था, इस जेपीसी के अध्यक्ष शरद पवार बनाए गए। अब तक चार बार जेपीसी बन चुकी है और सत्ता पक्ष का व्यक्ति ही जेपीसी का अध्यक्ष होता है। जेपीसी के लिए सबसे पहले लोकसभा में प्रस्ताव आता है। तीन बातें तय होती हैं, जेपीसी के सदस्य कौन होंगे, वह किन मामलों की जांच करेगी और कितने दिनों में जांच पूरी कर ली जाएगी। लोकसभा अध्यक्ष प्रधानमंत्री से सलाह करके जेपीसी के अध्यक्ष को मनोनीत करता है और इसलिए पिछले चार जेपीसी के अध्यक्ष सत्ता पक्ष के ही हुए हैं। हैरानी की बात है कि विपक्ष जेपीसी की मांग क्यों कर रहा है। अभी पीएसी में ज्य़ादा ताकत है, उसके अध्यक्ष भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी हैं। उनकी एक छवि है, वे अध्यक्ष के रूप में किसी को भी बुला सकते हैं और किसी को भी सख़्त छानबीन में लपेट सकते हैं। $गलत बयानी हो रही है कि पीएसी प्रधानमंत्री को नहीं बुला सकती। लगता है, भाजपा के नेता मुरली मनोहर जोशी से डरे हुए हैं, जबकि पीएसी जांच जैसा सुनहरा मौका विपक्ष के हाथ नहीं आएगा। बताया जाता है, विपक्ष के दो नेताओं की दस जनपथ के साथ मिलीभगत है। ध्यान देने की बात है, पीएसी बाकायदा निर्वाचित होती है और अभी पीएसी एकमत से चाहती है कि 2जी स्पेक्ट्रम की जांच उसे सौंपी जाए, ताकि संसद की इस समिति को वाजिब मर्यादा मिले।
दरअसल, विपक्ष भी जल्दी निपटारा नहीं चाहता है। जल्दी निपटारा हो जाएगा, तो इसको चुनावी मुद्दा नहीं बना सकेंगे। अगर ये जल्दी निपटारा चाहते हैं, तो एक बीच का रास्ता भी हो सकता है, सरकार जेपीसी की मांग मान ले और विपक्ष समिति के सदस्यों के नामों पर सहमत हो जाए। लेकिन अभी दोनों तर$फ राजनीति सिर चढ़कर बोल रही है, इनको ख्य़ाल नहीं है कि संसद का क्या होगा। सबसे बड़ा नुकसान यह कि लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों ने हाशिये पर खड़ा कर दिया है। लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका होनी चाहिए, लेकिन नहीं है। इससे संसदीय मर्यादाओं का खुलकर उल्लंघन हो रहा है और इसके लिए एक तरह से विपक्ष और सत्ता पक्ष, दोनों ने ही सहमति बना ली है।
यह तो सामान्य बहस से तय होने वाली चीज़ है। 9 नवंबर से शीतकालीन सत्र शुरू हुआ। उसे 13 दिसम्बर तक चलना है, इसमें कुल पांच-छह दिन बचे हैं और अब तक संसद में कोई कामकाज नहीं हुआ है। इसमें दो बातें हैं, पहली बात, संसद में जो बहस होती रही है, उसकी अवघि घटाई जा रही है। इंदिरा गांधी से पहले तक संसद में बजट सत्र तीन महीने का मानसून और शीतकालीन सत्र छह-छह ह$फ्ते के होते थे। अब सरकार की भी दिलचस्पी इसमे नहीं है कि संसद में बहस हो और बहस से चीज़ें तय हों। छह ह$फ्ते मे से दो ह$फ्ते निकाल दिए गए।
कुल मिलाकर 20-22 दिन का सत्र हो गया है। चालू सत्र में 17 दिन बिना काम के निकल चुके हैं। दूसरी बात, लोगों की जेब से जो पैसा सरकारी $खज़ाने में जाता है, उसका एक आंकलन बजट में होता है। शीतकालीन सत्र में सरकार पूरक अनुदान मांग का प्रस्ताव रखती है और उस पर बहस होती है। इस बार बिना बहस कराए पूरक मांगें मान ली गई हैं। उससे भी गंभीर बात है, एक्सेस बजट भी पारित करवा लिया गया है। विपक्ष और पक्ष संसद को अपनी मनमजऱ्ी से चलवा रहे हैं। जहां सहमति होती है, जैसे अपने वेतन-भत्ते पर, वहां एक मिनट में सहमति का ठप्पा लगा देते हैं। संसद में चालू हंगामे के पीछे दलीय राजनीति काम कर रही है, और देश की सबसे बड़ी पंचायत को केवल अपनी मनमानी पर ठप्पा लगाने वाली मशीनरी के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
सवाल है, आ$िखर यूपीए सरकार जेपीसी के लिए क्यों तैयार नहीं है? राजनीतिक रूप से उसे कोई नुकसान नहीं है, लेकिन यूपीए नेतृत्व ने जेपीसी जांच को $खारिज करने का निर्णय बिना ज्य़ादा विचार के लिया था और अब उनका यह निर्णय अहंकार का विषय बन गया है। एक संभावना यह भी है कि 2जी स्पेक्ट्रम की जांच होगी, तो आंच कांग्रेस नेतृत्व तक भी पहुंच सकती है। अत: सत्ता पक्ष इसमें अपनी भलाई समझ रहा है, कि मामले को उलझाए रखा जाए, और इसमें उसे विपक्ष का भी साथ मिल रहा है।

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