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Friday, March 25, 2011






भाजपाई स्टिंग
नोट फॉर वोट

यह भी कहा जाता है कि इस मामले के तार भोपाल से भी जुड़े हैं, जहां से ले जाकर नोटों की गडिढ़यां संसद में उछाली गई थीं। एक भाजपाई कालोनाईज़र ठेकेदार के सहयोग से भाजपाई राज्य सरकार के कुछ $खास मंत्रियों द्वारा ऐसा प्रबंध किया गया था। मामले की वास्तविकता और उसकी तह तक पहुंचने हेतु, इस की गहराई तक जांच करना ज़रूरी होगा।
जानी-मानी पत्रिका तहलका मेंं छपी एक रिपोर्ट बता रही है, कि कैश $फार वोट का पूरा मामला बीजेपी ने सरकार को फंसाने के लिए $खु़द खड़ा किया। लोकसभा में बहस के दौरान कपिल सिब्बल और पवन कुमार बंसल ने भी यही आरोप लगाये। 22 जुलाई, 2008 की शाम संसद में इस शर्मनाक नज़ारे के पीछे की हकीकत क्या है। क्या बीजेपी के इन तीन सांसदों-अशोक अर्गल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा को यूपीए ने $खरीदने की कोशिश की या $खुद बीजेपी ने इन तीनों के ज़रिए जाल बिछाकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को वोट के लिए नोट के मामले में फंसाया और एक चैनल की मदद से स्टिंग ऑपरेशन की कोशिश की। तहलका का कहना है कि स्टिंग का ये जाल बीजेपी ने बिछाया, समाजवादी पार्टी इसमें फंस गई, और कांग्रेस ने इसे र$फाद$फा करने की कोशिश की। तहलकाडॉटकॉम पर आए ताज़ा खुलासे यही बता रहे हैं। इन खु़लासों के मुताबिक इस ङ्क्षस्टग ऑपरेशन में अरूण जेटली और सुधींद्र कुलकर्णी जैसे बड़े नेताओं की भूमिका रही। 21 जुलाई की रात एक दलाल के मा$र्फत बीजेपी के इन सांसदों ने अहमद पटेल से मिलने की कोशिश की। नाकाम रहने पर वो अपने लिए $खरीददार खोजते रहे। तहलका के पास इन सांसदों के $फोन कॉल के टेप भी हैं। ङ्क्षस्टग ऑपरेशन के बाद जेटली और आडवाणी जैसे नेताओं ने रिपोर्टर को बधाई दी। संसदीय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल ने लोकसभा में विपक्ष के हमलों से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का बचाव करते हुए एक मैगज़ीन के हवाले से कहा कि सांसद की $खरीद $फरोख्त संबंधी स्टिंग ऑपरेशन में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, सुधीन्द्र कुलकर्णी और अरूण जेटली का हाथ था। इनकी सहमति से ही एक न्यूज़ चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया था। बंसल ने कहा कि भाजपा नेताओं ने यूपीए सरकार को बदनाम करने के लिए यह स्टिंग करवाया था। $गौरतलब है कि सांसदों की $खरीद $फरोख़्त पर स्टिंग करने वाले चैनल ने हालांकि कुछ कारणों से यह स्टिंग नहीं दिखाया था, जिसके बाद भाजपा के सांसद कथित रूप से रिश्वत की राशि लेकर संसद चले गए थे। तहलका मैगज़ीन ने खुलासा किया है, कि केवल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ही सांसदों को खरीदने की कोशिश में नहीं थी, बल्कि भाजपा ने ही यह साजि़श रची थी, कि तीन भाजपा सांसदों को या तो कांग्रेस या समाजवादी पार्टी $खरीद ले, और वह इस स्ंिटग के ज़रिए राजनीतिक $फायदा उठा ले। 2008 में स्ंिटग करने वाले एक रिपोर्टर ने तहलका को बताया।
यह भी कहा जाता है कि इस मामले के तार भोपाल से भी जुड़े हैं, जहां से ले जाकर नोटों की गडिढ़यां संसद में उछाली गई थीं। एक भाजपाई कालोनाईज़र ठेकेदार के सहयोग से भाजपाई राज्य सरकार के कुछ $खास मंत्रियों द्वारा ऐसा प्रबंध किया गया था। मामले की वास्तविकता और उसकी तह तक पहुंचने हेतु, इस की गहराई तक जांच करना ज़रूरी होगा।


भोपाल पंजाबी समाज के अध्यक्ष बने जसबीर सिंह
भोपाल।
भोपाल पंजाबी समाज क आगामी दो वर्ष की अवधि 2011-12 व 2012-13 हेतु निर्वाचन गत बुधवार मार्च 23 को हुये, जिस में जसबीर सिंह भिमराह को सर्वसमित से अध्यक्ष चुन लिया गया। बुधवार 23 मार्च को सब्ज़ी मण्डी स्थित राम मंन्दिर परिसर में समाज की आम सभा की बैठक हुई, जिस में समाज के वरिष्ठ सदस्य पूर्व पुलिस अधीक्षक श्री गुरूबीर सिंह नन्दा चुनाव अधिकारी की देख रेख में निर्वाचन प्रक्रिया प्रारंभ हुई। अध्यक्ष पद हेतु दो नामों का प्रस्ताव आने पर, इस पद के एक दावेदार कैप्टिन के.के. अहूजा द्वारा अपना नाम वापिस ले लिया गया और इस तरह दूसरे दावेदार श्री जसबीर सिंह भिमराह को सर्वसमिति से अध्यक्ष पद हेतु चुन लिजया गया।
भोपाल पंजाबी समाज की स्थापना भोपाल में पंजाबी समाज के वरिष्ठ समाज सेवी वृद्ध सज्जन पुरूष ईश्वर दास ग्रोवर ने वर्ष 1990 में की थी। वे अब 78 वर्ष आयु के हैं और इसके बावजूद भी सामाजिक दायत्वों के निर्वहन हेतु अपना अमूल्य मार्गदर्शन व आशीर्वाद बनाये रखते हैं। तब से अब तक इस संस्थान के अध्यक्ष पद पर ईश्वर दास ग्रोवर, जगन्नाथ डंग, कुलदीप सिंह गुलाटी, वी.के. ग्रोवर, एवं दीपक कुमार कपूर रहे।
मध्यप्रदेश में विशेषत: भोपाल में पंजाबी समाज के लोगों की हर तरह के सामाजिक कार्यों में परस्पर सहयोग, दिन त्यौहारों को मनाने में आपसी भाईचारे के माध्यम से लोगों में प्रेम भाव व सौहार्द बनाये रखने में इस संस्था की बड़ी महती भूमिका रहती है। इस संस्था द्वारा पंजाबी त्यौहार लोहड़ी व बैसाखी बड़े पैमाने पर बड़ी धूमधाम से प्राय: हर वर्ष ही मनाये जाते हैं। इस संस्था की एक विशेष शाखा मैरिज ब्यौरो है जिस के माध्यम से पंजाबी समाज के सभी वर्गों को (सिक्ख एवं $गैर सिक्ख) शादी विवाह योग्य बच्चे बच्चियों के रिश्ते संबंध करने में पूर्ण सहयोग दिया जाता है। इस संस्था के इस प्रकार के कल्याण कारी कार्यों को देखते हुये केवल मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ के पंजाबी ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र एवं राजस्थान के पंजाबी लोग भी इस से लाभांवित होते हैं।

Friday, March 18, 2011





स्वयंभू बाबा रामदेव
उ$र्फ रामकिशन यादव

हृ लिमटी खरे
इक्कीसवीं सदी में स्वयंभू योग गुरू बनकर उभरे रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने बीमारियों के सटीक इलाज के लिए योग को ही सर्वोपरि बताते हैं। आरंभ में तो लोग इनकी ओर आकर्षित नहीं हुए किन्तु कालांतर में कुछ चुनिंदा धार्मिक चैनल्स के स्लाट $खरीदकर बाबा रामदेव ने लोगों को इसका आदी बना दिया। इसके बाद रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव का जादू सर चढ़कर बोलने लगा। लेकिन योग के इस विस्तार की आड़ में बाबा रामदेव ने दवाओं का लंबा चौड़ा कारोबार खड़ा कर लिया है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि छोटे से जि़ले में बाबा रामदेव की दवाओं की फ्रेंचाईज़ी लेने के लिए आठ लाख रूपयों की दवाएं एक साथ $खरीदनी होती है, जिसमें आठ से बारह $फीसदी ही कमीशन मिलता है।
रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव को जैसे ही लोकप्रियता मिलना आरंभ हुई उन्होंने कसम खाई कि जब तक देश के हर आदमी को वे निरोग न कर देंगे तब तक देश की धरा के बाहर कदम न रखेंगे। बाबा को उनके अनुयाईयों ने समझाया कि आ$िखर क्या कह गए बाबा। न कभी ऐसा वक्त आएगा और न ही बाबा विदेशी वादियों की सैर कर पाएंगे। फिर अचानक बाबा ने विदेश की ओर रू$ख कर लिया। इसके बाद बाबा के लग्गू भग्गुओं ने उन्हें राजनीति का ककहरा पढ़ाना आरंभ किया। बाबा ने सियासतदानों की कालर ही खीचना आरंभ कर दिया। बाबा ने एक और बयान सियासी हवा में उछाला कि विदेशों में जमा काले धन को भारत लाने वे सड़कों पर उतरेंगे। समय बीतता गया और दो साल पूरे होने को हैं, देश की सड़कें आज भी रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव का इंतज़ार कर रही हैं।
रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव के इस कदम से कांग्रेस में बौखलाहट बढ़ गई है। इसका कारण यह है कि वर्तमान में काला धन ही कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के लिए गले की फांस बना हुआ है। कांग्रेस के इक्कीसवीं सदी के चाणक्य एवं महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव के $िखला$फ मोर्चा संभाल लिया है, अब तय मान लीजिए कि बाबा रामदेव की लोकप्रियता का ग्रा$फ तेज़ी से नीचे आना सुनिश्चित ही है। दिग्गी राजा ने बाबा रामदेव से पूछा है कि वे पता कर लें, कि कहीं उन्हें चंदा देने वाले ने तो काला धन उन्हें नहीं दिया है।उधर रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने दिग्गी राजा के आरोपों के बाद तलवार पजाते हुए कहा है कि उन्होंने अपने ट्रस्ट को मिलने वाले धन का हिसाब आना पाई से सरकार को दे दिया है अब समय है कांग्रेस का कांग्रेस को चाहिए कि वह भी अपने से जुड़े सारे ट्रस्ट के हिसाब किताब को सरकार को दे दे। राजा दिग्विजय सिंह के तीर कहां जाकर किसे और कितने समय बाद घायल करते हैं इस बात के बारे में इस नश्वर दुनिया में सिर्फ और सिर्फ एक ही आदमी जानता है और वह है $खुद राजा दिग्विजय सिंह। $गौरतलब होगा कि 2008 में रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने $खुद ही स्वीकार किया था, कि उनका सालाना करोबार एक लाख करोड़ रूपयों का होने वाला है। बाबा रामदेव ने स्वीकारा था कि पतांजली योग के साम्राज्य में अप्रत्याशित तौर पर बढ़ोत्तरी दर्ज की गई थी। इसकी शाखाएं ब्रिटेन, अमेरिका, थाईलेण्ड, नेपाल, उत्तर और दक्षिण अफ्रीका, दुबई आदि में खुल चुकीं हैं।
उत्तराखण्ड में कनखल के दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट से आरंभ हुई रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव की छोटी सी दुकान आज लाखों करोड़ रूपयों की हो चुकी है। $गौरतलब है कि 2003 में बाबा रामदेव और उनके सखा आचार्य बाल कृष्ण इसी ट्रस्ट के तीन कमरों में मरीज़ों का उपचार किया करते थे। यक्ष प्रश्न तो यह है कि रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव के हाथों में आ$िखर कौन सा जादुई जिन्न आ गया, जिसे रगड़कर महज़ आठ सालों में ही उन्होंने कई सौ करोड़ का साम्राज्य स्थापित कर लिया है?
वर्तमान मे रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव के पतंजलि योग ग्राम का रकबा दस बीस बीघा नहीं वरन आठ सौ बीघा है, जहां हर प्रकार की सुविधाओं के साथ $फाईव स्टार संस्कृति वाला पंचकर्म सेंटर शोभायमान है। इतना ही नहीं यहां अत्याधुनिक शहर की स्थापना भी की गई है। इसके कनखल में ही अलावा सर्वप्रिय विहार कालोनी में तीन बड़ी अट्टालिकाएं हैं, जिनमें इनके रिश्तेदार निवास करते हैं, और गोदामों की जगह भी यहीं बनाई गई है।
धंधे में रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव किसी पर विश्वास नहीं करते हैं। उन्होंने अपने परिवार के लोगों को ही प्रशासनिक पदों पर बिठा रखा है अपने साम्राज्य में। कनखल में दिव्य योग ट्रस्ट मंदिर में दस बीघे में बाबा के भाई रामभरत का प्रशासनिक कार्यालय और गोदाम स्थापित है। इसके अलावा पतंजलि की अन्य इकाईयों में पतंजली आयुर्वेद लिमिटेड का साम्राज्य हरिद्वार में फैला हुआ है। यहां हरिद्वार के पुराने औद्योगिक क्षेत्र में बी 38 और ए 1 में दो कारखाने हैं, जिनमें ढाई सौ से ज्य़ादा आयुर्वेदिक उत्पाद बनाए जाते हैं। इन दोनों का सालाना कारोबार कितने अरब का है पता नहीं। इसके अलावा पतंजलि $फूड और हर्बल पार्क के लिए रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने यहीं पचास एकड़ का रकबा $खरीद रखा है। इसमें दस इकाईयां अभी चालू हैं, बाकी आरंभ होने की बाट जोह रहीं हैं। कहते हैं इस पूरी इकाई का प्रारंभिक निवेश ढाई सौ करोड़ रूपयों से ज्य़ादा है।
गायों के लिए रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने पतंजलि गोशाला की स्थापना भी की है। बाबा के गायों के बाड़े में पांच सौ से भी अधिक गायें शोभा बढ़ा रही हैं, जिनमें से विदेशी नस्लों की गायों की तादाद बहुतायत में बताई जाती है। बाबा ने गायों के लिए सैकड़ों बीघा ज़मीन रख छोड़ी है। बाबा की संपत्ति में हिमाचल प्रदेश के सोलन का नाम भी जुड़ जाता है। कहते हैं रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने पिछले साल स्काटलैण्ड में एक द्व़ीप भी $खरीद लिया है।
पतंजली नर्सरी और कारखाने की स्थापना दिल्ली राजमार्ग पर दो सौ बीघा ज़मीन में की गई है। यहां औषधीय पुष्पों और पौधों की खेती की जाती है। यहां नर्सरी के साथ ही साथ च्यवनप्राश और साबुन बनाने का कारखाना स्थापति है। दिल्ली राजमार्ग पर ही रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने पतंजली योगपीठ चरण एक में अत्याधुनिक चिकित्सालय, विशाल देखने योग्य भव्य भवन और पतंजली विश्विद्यालय की प्रस्तावना देखते ही बनती है। यह पूरा इलाका डेढ़ सौ एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। इसी के दूसरे चरण में साढ़े चार सौ एकड़ भूमि को आरक्षित रखा गया है। इसमें दस हज़ार लोगो को एक साथ ठहराने और योग करने की अत्याधुनिक सुविधा की व्यवस्था की गई है। यहां भवन देखते ही बनता है , और तो और अत्याधुनिक अनुसंधान केंद्र भी यहां पर है।
रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव अब घिरते नज़र आ रहे हैं। धर्मार्थ काम की आड़ में बाबा रामदेव ने जो झाड़ काटे हैं, वे अब कांग्रेस की नज़रों में गडऩे लगे हैं। कल तक मलाई खाने वाले बाबा को अब कांग्रेस के प्रबंधक ज़मीन चटवाकर ही मानेंगे, क्योंकि बाबा ने काले धन की बात को फैलाकर उसकी दुखती रग पर हाथ रख ही दिया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बयान के बाद अब आयकर विभाग ने भी अपनी नज़रें तिरछी करना आरंभ कर दिया है। यह सच है कि रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव आयकर विवरणिका दाखिल करते हैं, किन्तु धर्मार्थ संस्था को दर्शाकर बाबा करोड़ों रूपयों के आयकर जमा करने से $खुद को बचाते फिर रहे हैं। $गौरतलब होगा कि रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव के शिविर में शामिल होने और आर्युवेदिक दवाओं को $खरीदने के लिए आम आदमी को $खासी रकम चुकानी पड़ती है। इतना ही नहीं रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव की संस्था विदेशों से भी मोटा चंदा काट रही है।
लोगों की धारणा बन चुकी है कि रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव अब $गरीबों के लिए काम करने के बजाए राजवैद्य बन चुके हैं जिनके पास पहुंचना $गरीब $गुरबों के बस की बात नहीं रही। बाबा अब अमीरों के हाथों का खिलौना बन चुके हैं। वैसे भी किसी धर्मार्थ संस्था के सर्वेसर्वा का महज़ आठ सालों में जीरो से हीरो बनना और जनसेवा का काम करने वाली संस्था के पास इतनी कम अवधि में लाखों करोड़ रूपयों की संपत्ति का होना अपने आप में एक अजूबे से कम नहीं माना जा सकता है। वैसे भी रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव का विवादों से बड़ा पुराना और गहरा नाता है। बाबा ने 2003 में अपना काम आरंभ किया और 2005 में ही दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट के मातहत कर्मचारियों में से 113 कर्मचारियों ने न्यूनतम मज़दूरी मिलने का मामला सार्वजनिक किया था। इसके बाद 2006 में वाम नेता सीपीआईएम की वृंदा करात ने रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव के ऊपर यह आरोप लगाकर सनसनी फैला दी थी, कि दिव्य योग मंदिर में बनने वाली दवाओं में मनुष्य और जनवरों की हड्डियों का प्रयोग किया जाता है। बाद में उत्ताखण्ड सरकार की क्लीन चिट के बाद मामला शांत हो पाया था।
रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने न्यायालयों को भी आड़े हाथों लेने से गुरेज़ नहीं किया। जुलाई 2009 में जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिक सेक्स को जायज़ ठहराया था तब बाबा ने इसका कड़ा विरोध दर्ज कराया था। बाबा ने चुनिंदा ब्रांड के कोल्ड ड्रिंक्स के $िखला$फ सार्वजनिक तौर पर अभियान छेड़ रखा है। इतना ही नहीं बाबा के द्वारा कैंसर और एड्स जैसी बीमारी के योग से इलाज के मामले में भी बाबा पर सवाल उठे, जिनका जवाब बाबा ने आज तक नहीं दिया है। अब ऊंट पहाड़ के नीचे आ चुका है। बाबा रामदेव अब सियासी गोदे (अखाड़े) में उतरे हैं। बाबा को सपने में उम्मीद नहीं होगी कि उनकी पहली भिड़ंत ही दिग्विजय सिंह जैसे घाघ पहलवान से हो जाएगी। या तो बाबा चारों $खाने चित्त मिलेंगे, या फिर दस जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) में पूंछ हिलाते नज़र आएंगे।




भारत की अनेकता में एकता का सबूत पेश करते साईकिल सवार अमनदीप सिंह
हृ गुरूबचन सिंह सोच
भोपाल।
आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री आदरणीय पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ''भारत की खोजÓÓ में लिखा था कि हमारा भारत एक महान देश है, जहां विभिन्न प्रकार की जातियां, विभिन्न स्थानों के निवासियों की विभिन्न भाषायें, उनके विभिन्न प्रकार के रीतिरिवाज, तीज त्यौहार हंै, परन्तु फिर भी वे एक हैं। यही है अनेकता में एकता। बाल अवस्था में उस समय हम इस अनेकता में एकता का भाव अर्थ नहीं समझ पाते थे, मगर अब साक्षात प्रमाण पाकर हमें पता लगा कि हमारे इस भारत देश का सीना इतना विशाल है, जो इस में अनेकानेक विभिन्नताओं को समेटे हुये है, परन्तु यह सब एक ही सूत्र में मणी मनकों की भांति पिरोये हुये हैं। श्रीमान पाठकों की सेवा में इस एकता में अनेकता और अनेकता में एकता का प्रमाण प्रस्तुत करते हुये एक ऐसी शख़्सीयत को पेश किया जा रहा है, जो अपनी मिसाल वह $खुद ही है। वह है अमन शान्ति साईकिल यात्री अमनदीप सिंह। अमनदीप सिंह का जन्म 13/08/1960 को बैंगलोर के निकट ग्राम सिकतिरूपल्ली में श्रीराम रैड्डी के घर हुआ जो हिन्दू तैलुगू हैं। वालदैन ने उसका नाम महादेव रैड्डी रखा और वह कन्नड़ में ही दसवीं जमात तक पढ़ पाये। जागरूक धार्मिक विचारों के महादेव को सुसंगत मिल जाने पर वह 13/04/1975 बैसाखी पर्व पर $खालसा सज कर $खालसा पंथ में शामिल हो गया। उसके परिवार वालों को यह अच्छा न लगा, जिस से वह घर परिवार को छोड़ कर बाहिर रहने लगा और उस ने पंजाबी और गुरूवाणी का अध्ययन कर लिया। वह अपने गांव नगर छोड़ पंजाब चला गया और वहां श्री आनन्दपुर साहिब में जा कर रहने लगा। उसने सिक्ख मिश्नरी कालेज से फिर (पंजाबी में) दसवीं पास की और अकाल अकादमी से 3 वर्षीय कोर्स कर के लैक्चरार बन गया। वहीं पर जांलधर जि़ले के ग्राम ''ग्रांवांÓÓ की एक पंजाबी मूल की सिक्ख परिवार की लड़की रणजीत कौर से उसका आनन्द कारज सम्पन्न हुआ। रणजीत कौर बी.ए.पास है।
वर्ष 1993 में वे बैंगलोर चले गये और वह दोनों पति पत्नि गुरूनानक मिशन, लाल बाग, सिद्धपुरम बैंगलोर में अध्यापन कार्य करने लगे। $खास बात यह कि तेलुगू मूल का अमनदीप सिंह वहां प्राईमरी क्लासों के बच्चों को पंजाबी पढ़ाता है ,और पंजाबी मूल की रणजीत कौर मिडिल स्कूल के बच्चों को कन्नड़ पढ़ाती है। कालान्तर में अमन दीप सिंह के वालदैन और भाईयों ने अपने $खून को पहचान लिया और अपने मु$गालते को जान लिया 1 उन्हों ने न केवल उससे मुलाकात की बल्कि उसको परिवार की सम्पत्ति में से का$फी कुछ दिया और ज़मीन आदि दे कर साधन सम्पन्न बना दिया। अमनदीप सिंह के 2 बच्चे हंै, एक, बेटा है जो चिकित्सा शिक्षा गृहण कर रहा है, और दूसरी, बेटी जो पढ़ाई समाप्त करने उपरान्त उसकी शादी कर दी गर्ह है, और पंजाब में अपने ससुराली परिवार में रहती है। श्री गुरूनानक देव जी ने इस वन्दना, भ्रात्रिभाव, सद्चरित्र, सज्जनता, एकईश्वरवाद का सन्देश संसार में प्रचरित करने हेतु अपने जीवन में चार लम्बी यात्रायें (उदासीयां) की थी। अमनदीप सिंह जी उन के नकशे कदम पर चलने का प्रयास करते हुये गत 01-01-2008 को अपने घर से साईकिल पर निकले भारत भ्रमण हेतु। साईकिल पर पीछे छोटे तीन थैलों में अपना सामान, पहनने ओढऩे के वस्त्र, खाना बनाने हेतु ज़रूरी बर्तन स्टोव कुकर आदि, साईकिल मुरम्मत पंचर हवा हेतु सामान, सुरक्षा दृष्टि से कृपाण,पानी हेतु डोल बाल्टी आदि मिला कर 35 किल्लो वजन के साथ चल दिये। उनका जनता के नाम सन्देश है ''नशा मुक्त समाज का निर्माणÓÓ वह जहां भी जाते हैं, केवल 3 दिन रूकते हैं और वहां के स्कूलों के प्रबंधकों से मिल कर समय आदि तय कर के स्कूलों के बच्चों को सद्विचारों से अवगत करा कर सम्बाकू शराब आदि नशे की वस्तुओं से दूर रहने की शिक्षा देते हैं। अमनदीप सिंह अब तक करीब एक लाख किलो मीटर की यात्रा कर चुके हैं, जिस में उन्हें 4 साईकिल बदलने पड़े और 12 टायर $खराब हो चुके हैं, और 6 टयूबें बदलवानी पड़ी हैं। अब तक वह 24000 स्कूलों में अपने प्रवचन दे कर इसी विषय के इश्तहार बांट चुके हैं। यह अपने साईकिल यात्रा से भारत के विभिन्न नगरों कस्बों प्रान्तों में दौरा कर चुके हैं जिन में ये उल्लेखनीय हैं:-
केरल, तमिलनाडू, पांडिचेरी, करनाटक, गोवा, दमन दीव, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, आन्ध्राप्रदेश, मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तरखण्ड, उत्तरप्रदेश बिहार, झारखण्ड, ओड़ीसा, पश्चिमीबंगाल। इस लम्बे दौरे से वापिस जाते समय वह भोपाल में रूके हैं, और अब इन्दौर, ओंकारेश्वर, बुरहानपुर, हज़ूर साहिब (नान्देड़) के रास्ते वह वापिस बंैगलोर अपने घर जांएगे।
उनके बताने अनुसार वह हौटल पर खाना नहीं खाते और लाज आदि जगहों पर नहीं रूकते । वह मन्दिर गुरूद्वारा, सराय, धर्मशाला, या रेल्वे प्लेट$फार्म आदि जगहों पर रूक लेते हैं और मन्दिर गुरूद्वारा आदि स्थानों से गुरूका लंगार मिले तो छक कर पेट भर लेते हैं वरना स्वंय खाना बना कर ही खाते हैं। उनसे साक्षात्कार करने जब मैं गया, तो वह आडियो वीडियो पर गुरूवाणी के कीर्तन का आनंद लेते हुये, अपने लिये भोजन ही तैयार कर रहे थे।
श्रीअमनदीप सिंह जी को तमिल भाषा केवल बोलने व समझने का अभियास है, जबकि निम्रलिखत पांच भाषायें वह बोलना, समझना, लिखना ,पढऩा भी जानते हैं। इसी लिये वह हर कहीं किसी भी प्रदेश में जाकर स्कूली बच्चों को मु$खातिब हो कर उन्हें नशों की बुराईयां बताकर इनसे दूर रहने की सीख दे पाते हैं :-
कन्नड़, तेलगू, अंग्रेज़ी, पंजाबी, हिन्दी
एक $खास बात जो हमारे सामने आई, वह है कि वह किसी से किसी प्रकार का चन्दा, डोनेशन आदि नहीं लेते और ईश्वर के सहारे ही अपने मिशन पर आगे बढ़ते जा रहे हैं। ईश्वर की कृपा से ही इस मिशन की पवित्रता और इस के गुणों के ग्राहक उनकी ज़रूरतों को पूरा कर देते हैं।


शिव के राज में हर हाथ में हथियार
देश के हृदय प्रदेश को शांति का टापू माना जाता रहा है। मध्य प्रदेश के रहवासी इस बात पर गर्व किया करते हैं, कि उनके सूबे में आपराधिक गतिविधियां अन्य राज्यों की तुलना में का$फी कम रही हैं। यह अलहदा बात है कि पिछले कुछ सालों से शासन प्रशासन की अनदेखी के चलते हृदय प्रदेश भी सुरक्षित राज्यों की $फेहरिस्त से बाहर हो गया है। एक तर$फ तो शासन प्रशासन द्वारा मेले ठेले, शादी ब्याह, जलसों त्योहारों में शस्त्रों विशेषकर फायरिंग का उपयोग रोकने के लिए सख़्ती बरती जाती है, वहीं दूसरी ओर हृदय प्रदेश के निज़ाम शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली चाल चरित्र और चेहरे को मूल मंत्र मानकर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार द्वारा ही सूबे में बंदूक और गोलियों की बिक्री बढ़ाने का तु$गलकी $फरमान सूबे की शांत $िफज़ा में ज़हर घोलने का काम कर रहा है। मध्य प्रदेश सरकार के गृह विभाग द्वारा मई 2010 में एक आदेश जारी कर सभी को चौंका दिया था। मज़े की बात तो यह है कि विपक्ष में सुसुप्तावस्था में बैठी कांग्रेस ने भी इसका विरोध करने की ज़हमत नहीं उठाई। मई में जारी इस आदेश का मज़मून कुछ इस तरह था कि प्रदेश के प्रत्येक लाईसेंसी हथियार विक्रेता को हर साल पच्चीस हथयार और ढाई हज़ार कारतूस बेचना अनिवार्य है, अन्यथा उसकी अनुज्ञा (लाईसेंस) का नवीनीकरण अगले साल नहीं किया जा सकेगा। एक तर$फ तो सरकार द्वारा हथियार की अनुज्ञा के नियम बेहद सख़्त बनाए गए हैं, जिससे हथियारों का लाईसेंस रसू$खदारों, पहुंच संपन्न, धनाड्य और राजनैतिक दम$खम वालों के घर की लौंडी बनकर रह गए हैं। आम ज़रूरतमंद को हथियार का लाईसेंस लेने में पसीने आ जाते हैं। प्रदेश की राजधानी भोपाल का ही उदहारण लिया जाए तो पिछले साल भोपाल में शस्त्रों के लिए 1916 आवेदन वैध पाए गए थे, जिसमें से 1603 लाईसेंस निरस्त कर दिए गए थे। बचे महज़ 313 नए शस्त्र लाईसेंस ही बनाए गए थे। भोपाल में असलाह की बिक्री के लिए सोलह दुकानों को लाईसेंस प्रदाय किया गया है। नए $फरमान के मुताबिक इन दुकानों को चार सैकड़ा बंदूकें और चालीस हज़ार कारतूस बेचना अनिवार्य है। इसके अलावा एक शस्त्र लाईसेंस पर साल भर में महज़ 25 कारतूस ही मिल सकते हैं। इस तरह 313 नए हथियारों के लाईसेंस पर सात हज़ार आठ सौ पच्चीस कारतूस ही चढ़ सकते हैं।
इन परिस्थितियों में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा शांति के टापू पर आग्नेय अस्त्रों का ज़$खीरा एकत्र करने के बेबुनियाद मार्ग प्रशस्त किए जा रहे हैं। इस तरह हथियार और कारतूस की बिक्री में प्रतिस्पर्धा पैदा करने की $गरज़ से लक्ष्य निर्धारित करना कहीं से भी तर्क संगत नहीं माना जा सकता है। प्रदेश सरकार का यह तर्क भी गले नहीं उतरता है कि इस तरह लक्ष्य निर्धारित करने से हथियार विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। साथ ही साथ आर्म्स डीलर की अनुज्ञा लेने वाले दुकानदार जो अपने प्रतिष्ठान बंद रखते हैं, वे भी अपनी दुकानें खोलकर हथियारों को बेचने में दिलचस्पी दिखाएंगे। शिवराज सिंह यह भूल गए, कि यह आदेश दूध मेवा प्रमोट करने के लिए नहीं, वरन् हथियारों का उपयोग करने को प्रोत्साहित करने के लिए है, जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।
इस आदेश के बाद अपने प्रतिष्ठान का आर्म्स डीलर लाईसेंस जि़ंदा रखने के लिए दुकानदार एक दूसरे के उपभोक्ताओं के नाम से $फजऱ्ी तरीके से कारतूस उसी तजऱ् पर बेचेंगे जिस तरह मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों के लक्ष्य को पूरा करने के लिए मोबाईल रिटेलर करता है। गौरतलब है कि मोबाईल की सिम के निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के लिए मोबाईल का छोटा रिटेलर $फजऱ्ी नामों से सिम $खुद ही खरीदकर लक्ष्य पूरा कर देता है। इसमें सिम खरीदी के लिए निर्धारित प्रपत्र और वेरी$िफकेशन भी नहीं हो पाता है। इसी तरह जीवन बीमा के निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के लिए भी एजेंट या विकास अधिकारी द्वारा छोटे छोटे बीमे $फजऱ्ी नामों से कर दिए जाते हैं, ताकि एजेंट की एजेंसी को बचाए जा रखा सके।
वैसे भी आम आदमी अपने घरों में आग्नेय शस्त्रों का रखना उचित नहीं मानता है, क्योंकि शांति के टापू में इन अस्त्रों का क्या काम। यह अलहदा बात है कि धनाड्य और पहुंच संपन्न लोग अपने रसूख को जतलाने के लिए छतों पर बैठकर फुल से दुनाली सा$फ कर समूचे मोहल्ले में अपना ज़लज़ला कायम रखना चाहते हैं। अब जिस भी नागरिक के घर पर उसे चौबीसों घंटे हथियार के दीदार होंगे, उसे देखकर उसका मन हिंसक होना लाजि़मी है। जिस तरह किसी को अगर बार बार मदिरा के इर्द गिर्द घुमाया जाए तो वह मदिरा का $गुलाम हो जाता है, इसी तरह हथियारों को देखकर हिंसा के बढऩे की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। वैसे भी हिंसक वीडियो गेम्स और सीआईडी जैसे सीरियल्स ने बच्चों के कोमल मन में बंदूक और हिंसा को स्थान दे ही दिया है। अगर शिवराज सिंह सरकार इस निर्णय पर अटल रहेगी, तो वह हिंसा को ही बढ़ाने के मार्ग प्रशस्त करेगी।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि आग्नेय अस्त्रों का उपयोग हमेशा से देश की रक्षा के लिए निर्धारित लोगों के द्वारा ही किया जाता रहा है। रसू$खदारों के घरों में हथियार शोभा की वस्तु हुआ करते रहे हैं। इसके अलावा डकैत, बदमाश, जरायम पेशा लोगों द्वारा अवैध तरीके से हथियार रखे जाते रहे हैं। मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार के इस तरह के तु$गलकी $फरमान के बाद मध्य प्रदेश के हर जि़ले, कस्बे में हथियारों से निकलने वाली गोलियां और शोर सुनाई दे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आश्चर्य तो तब होता है जब सूबे में विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी इस तरह के संवेदनशील मसले पर चुप्पी साध लेती है। मतलब सा$फ है कि कांग्रेस भी भाजपा के मध्य प्रदेश को बिहार बनाने के मिशन में अपना मौन समर्थन दे रही है।

Saturday, March 12, 2011







निकला डीएमके का दम
समय-समय की बात है। तमिलनाडु में अभी तक दोनों क्षेत्रीय पार्टियों- द्रमुक और अन्नाद्रमुक का ही सिक्का चलता रहा। भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीयस्तर की बड़ी पार्टियों इनसे सीटों के लिए एक हद तक गिड़गिड़ाया करती थीं। इस बार कांग्रेस और द्रमुक गठबंधन में कांग्रेस का पलड़ा भारी नजर आ रहा है। 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले के चलते द्रमुक की स्थिति उतनी मजबूत नहीं है और वह दुबारा सत्ता में लौटना भी चाहती है। इसलिए कांग्रेस का साथ छोडऩे का तो सवाल ही नहीं उठता बल्कि कांग्रेस की शर्तें भी उसे माननी पड़ेगी।
हृ नारायण सिंह
नई दिल्ली।
तमिलनाडु की पार्टी, द्रविड़ मुन्नेत्र कणगम से पिंड छुड़ाने की कांग्रेस की कोशिश ने दिल्ली में राजनीतिक उथल पुथल पैदा कर दी है। शुरू में तो डीएमके वालों को लगा कि मामला आसानी से धमकी वगैरह देकर संभाला जा सकता है, लेकिन बात गंभीर थी और कांग्रेस ने डीएमके को अपनी शर्तें मानने के लिए मजबूर कर दिया। कांग्रेस को अब तमिलनाडु विधानसभा में 63 सीटों पर लडऩे का मौक़ा मिलेगा लेकिन कांग्रेस का रु$ख देख कर लगता है कि वह आगे भी डीएमके को दौन्दियाती रहेगी।
यूपीए 2 के गठन के साथ ही कांग्रेस ने डीएम को औकात बताना शुरू कर दिया था, लेकिन बात गठबंधन की थी, इसलिए खींच खांच कर संभाला गया, और किसी तरह सरकार चल निकली। लेकिन यूपीए के बाकी घटकों और कांग्रेसी मंत्रियों की तरह ही डीएमके वालों ने भी लूट खसोट शुरू कर दिया। बाकी लोग तो बच निकले लेकिन डीएमके के नेता और संचार मंत्री ए. राजा पकड़े गए। उनके चक्कर में बीजेपी और वामपंथी पार्टियों ने डॉ मनमोहन सिंह को ही घेरना शुरू कर दिया। डीएमके ने ऐसी मुसीबत खड़ी कर दी कि कांग्रेस भ्रष्टाचार की राजनीति की लड़ाई में हारती नजऱ आने लगी। राजा को हटाया गया ,लेकिन राजा बेचारा तो एक मोहरा था। भ्रष्टाचार के असली इंचार्ज तो करुणानिधि ही थे. उनकी दूसरी पत्नी और बेटी भी सीबीआई की पूछताछ के घेरे में आने लगे। तमिलनाडु में डीएमके की हालत बहुत $खराब है लेकिन करूणानिधि को मु$गालता है कि वे अभी राजनीतिक रूप से कमज़ोर नहीं हैं। लिहाज़ा उन्होंने कांग्रेस को विधानसभा चुनाव के नाम पर धमकाने की राजनीति खेल दी। कांग्रेस ने मौक़ा लपक लिया। कांग्रेस को मालूम है कि डीएमके के साथ मिलकर इस बार तमिलनाडु में कोई चुनावी लाभ नहीं होने वाला है, इसलिए उसने सीट के बँटवारे को मुद्दा बना कर डीएमके को रास्ता दिखाने का $फैसला कर लिया। लेकिन डीएमके को $गलती का अहसास हो गया, और अब फिर से सुलह की बात शुरू हो गयी। डीएमके के नेता अभी सोच रहे हैं, कि कुछ विधानसभा की अतिरिक्त सीटें देकर कांग्रेस से करूणानिधि के परिवार के लोगों के $िखला$फ सीबीआई का शिकंजा ढीला करवाया जा सकता है, लेकिन खेल इतना आसान नहीं है। कांग्रेस ने बहुत ही प्रभावी तरीके से करूणानिधि एंड कंपनी को औकात बोध करा दिया है। उत्तर प्रदेश के 22 संसद सदस्यों वाले दल के नेता मुलायम सिंह यादव ने ऐलान कर दिया है, कि वे कांग्रेस को अंदर से समर्थन करने को तैयार हैं। यह अलग बात है कि कांग्रेस को उनके समर्थन की न तो ज़रूरत है, और न ही उसने मुलायम सिंह यादव से समर्थन माँगा है, लेकिन मुलायम सिंह यादव को अपनी पार्टी एकजुट रखने के लिए कहीं भी सत्ता के करीब नज़र आना है। सो उन्होंने वक़्त का सही इस्तेमाल करने का $फैसला किया। कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार को 21 सदस्यों वाली बहुजन समाज पार्टी का समर्थन भी बाहर से मिल रहा है। जयललिता भी करूणानिधि को बेघर करने के लिए यूपीए को समर्थन देने को तैयार है। ऐसी हालत में कांग्रेस और डीएमके सम्बन्ध निश्चित रूप से राजनीति की चर्चा की सीमा पर कर गए हैं, और प्रहसन के मुकाम पर पंहुच गए हैं।



जेपीसी से हासिल क्या होगा
हृ अवधेश कुमार
नई दिल्ली। अंतत: संसद के दोनों सदनों में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के गठन की औपचारिक स्वीकृति मिल गई। अगर विपक्ष ने शीतकालीन सत्र में संसद का बहिष्कार नहीं किया होता, तो सरकार दबाव में नहीं आती। मगर सवाल है कि क्या जेपीसी के गठन से भ्रष्टाचार के $िखला$फ संघर्ष में किसी अन्य संस्था से ज्य़ादा प्रभावी परिणाम आएगा।
जेपीसी के गठन की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री ने जो कहा, उससे स्पष्ट है कि सरकार इसके पक्ष में नहीं थी, किंतु उसके पास कोई चारा नहीं है। उन्होंने कहा, 'मेरी सरकार को विश्वास था कि चूंकि सभी प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं, इसलिए हम विपक्ष को जेपीसी के गठन की मांग पर ज़ोर न देने के लिए मना लेंगे। हम अपने ईमानदार प्रयासों के बावजूद इसमें सफल नहीं हो सके। हम इस स्थिति को बनाए नहीं रख सकते, जिसमें बजट जैसे महत्वपूर्ण सत्र में संसद की कार्यवाही न चलने दी जाए। यही वे विशेष परिस्थितियां हैं, जिनमें हमारी सरकार जेपीसी के गठन को सहमत हुई है।Ó सोचने वाली बात है कि जो सरकार जेपीसी को ज़रूरी नहीं मानती, वह इसके प्रति कितनी गंभीर होगी। ठीक है कि जेपीसी का स्वरूप सर्वदलीय है, एवं इसे किसी को भी पूछताछ के लिए बुलाने का अधिकार है, परंतु जेपीसी कोई जांच एजेंसी नहीं है। इसकी सफलता सरकार की भूमिका पर निर्भर है। ब$गैर सरकार के सहयोग के यह जांच भी नहीं कर सकती। यानी सब कुछ सरकार की राजनीतिक ईमानदारी एवं इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगा। जो सरकार इसके गठन को राज़ी नहीं थी, उससे इच्छाशक्ति दिखाने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? वैसे भी इससे पहले चार बार जेपीसी का गठन हो चुका है, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर वह निरर्थक ही साबित हुआ है। राजनीतिक दल ईमानदारी बरतें, तो अपने विशेषाधिकारों के कारण यह समिति वाकई भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई में सर्वाधिक प्रभावी हो सकती है। लेकिन न पहले ऐसा हुआ है और न अब ऐसा होगा। सर्वदलीय समिति होने के कारण इसकी विश्वसनीयता तो होती है, लेकिन राजनीतिक खींचतान का शिकार होना भी इसकी नियति होती है।
जेपीसी गठन पर दोनों सदनों में बहस के दौरान बिलकुल दो विपरीत विचार सामने आए, जिससे लगता है कि दोनों पक्षों के बीच शायद ही सहमति हो। इसलिए इसके गतिरोध का शिकार होने की आशंका ज्य़ादा है। हमारी राजनीति जिस अवस्था में पहुंच गई है, उसमें दुर्भावना रहित भूमिका की संभावना लगभग क्षीण है, चाहे भ्रष्टाचार का ही मामला क्यों न हो। इसलिए जेपीसी से भ्रष्टाचार के $िखला$फ किसी ज़ोरदार पहल की उम्मीद बेमानी ही होगी। अगर जेपीसी से भ्रष्टाचार रोकने में मदद मिलती, तो यह बो$फोर्स घोटाले और हर्षद मेहता कांड के समय भी हो सकता था।
वास्तव में जेपीसी पर गतिरोध हमारी वर्तमान राजनीति के चरित्र को ही तो उद्घाटित कर रहा था। सरकार अपना गिरेबान बचाने के लिए इसे अस्वीकार कर रही थी, तो विपक्ष भी इसके माध्यम से राजनीतिक लक्ष्य साधता रहा। लेकिन किसी भी नज़रिये से जेपीसी न तो परम लक्ष्य हो सकता है और न बिलकुल त्याज्य। जेपीसी के गठन के बावजूद सीबीआई जांच एवं न्यायिक कार्रवाई भी चलती ही रहेगी और लोकलेखा समिति की जांच भी। क्या संभव है कि दोनों पक्षों के नेता यह $फैसला कर लें कि जब जेपीसी गठित हो ही गई है, तो शेष जांच रोक दिए जाएं एवं एक निश्चित समय-सीमा के अंदर रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई हो? जेपीसी की अनुशंसाओं के बाद भी तो प्राथमिकी दर्ज करके न्यायालय में ही कार्रवाई होगी। हां, यह समिति भ्रष्टाचार रोकने के लिए कुछ अनुशंसाएं कर सकती है, जिसके आधार पर संसद इससे संबंधित नियम-कानून बना सकती है। किंतु ऐसा तब होगा, जब समिति की कार्रवाई स्वाभाविक गति से लक्ष्य तक पहुंचेगी। यह भी असंभव नहीं कि कोई अपने राजनीतिक स्टैंड से अलग हट जाए, क्योंकि विपक्ष का रवैया भ्रष्टाचार रोकने से ज्य़ादा राजनीतिक लाभ उठाने वाला है। सही है कि 2 जी स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल, आदर्श सोसाइटी मामले में भ्रष्टाचार के $िखला$फ जो कार्रवाई हुई, उसके पीछे विपक्षी सक्रियता का महत्वपूर्ण योगदान है, पर इसमें भ्रष्टाचार रोकने के प्रति प्रतिबद्धता नहीं झलकती। सा$फ है कि विपक्ष सरकार को कठघरे में खड़ा कर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करेगा और सरकार अपनी खाल बचाना चाहेगी।

Saturday, March 5, 2011




पीएम देंगे इस्ती$फा ?
सुप्रीम कोर्ट ने दिया ज़ोर का झटका

नई दिल्ली।
भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद विवादों में रहे केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) पी जे थॉमस की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने $गैरकानूनी ठहराया है। कोर्ट ने मार्च 3 को इस मामले की सुनवाई करते हुए टिप्पणी की कि थॉमस को तत्काल सीवीसी का पद छोड़ देना चाहिए। सीवीसी के पद पर थॉमस की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह निर्णय सुनाया है। शीर्ष अदालत के इस $फैसले के बाद विपक्ष ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से नैतिक आधार पर इस्ती$फेकी मांग की है। सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा $फैसले के बाद थॉमस ने सीवीसी के पद से इस्ती$फा दे दिया है। इससे पहले थॉमस ने पद छोडऩे से लगातार इनकार किया था। उन्होंने यह दलील दी थी कि जब दा$गी नेता सांसद बने रह सकते हैं, तो वह क्यों नहीं? लेकिन सुप्रीम कोर्ट के $फैसले के बाद उनके पास कोई चारा नहीं रह गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की ओर से 3 सितंबर 2010 को की गई थॉमस की नियुक्ति को दरकिनार करते हुए भविष्य में सीवीसी के पद पर होने वाली नियुक्ति के लिए कड़े मानक भी तय कर दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि सीवीसी को नियुक्त करने वाली कमेटी की सि$फारिश का कानून में कोई वजूद ही नहीं है। अदालत ने सवालिया लहजे में कहा कि आ$िखर थॉमस के $िखला$फ आरोपों पर इस कमेटी ने $गौर क्यों नहीं किया? पीएम देंगे इस्ती$फा?
सीवीसी का काम भ्रष्टाचार पर नज़र रखना और उसे रोकना है, लेकिन सरकार ने यह जि़म्मेदारी भ्रष्टाचार के एक आरोपी व्यक्ति को ही सौंप दी। इसी आधार पर थॉमस की नियुक्ति का विरोध हुआ। पर सरकार यह कह कर उन्हें बचाती रही, कि उसे थॉमस पर लगे आरोपों की जानकारी नहीं थी।
पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने पॉमोलीन घोटाले में थॉमस के $िखला$फ मुकदमा चलाने पर लगाई गई रोक हटा ली थी। 1991 में केरल में हुए पॉमोलीन घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री के करुणाकरन और पीजे थॉमस समेत नौ लोगों पर मुकदमा चल रहा था। लेकिन 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी। पॉमोलीन घोटाले के दौरान पी जे थॉमस केरल के खाद्य एवं आपूर्ति विभाग सचिव थे।
सुप्रीम कोर्ट के $फैसले की $खास बातें
1. पीएम की अध्यक्षता वाली कमेटी द्वारा सीवीसी की नियुक्ति कानूनन आधार पर $गलत।
2. सीवीसी एक्ट 2003 के तहत थॉमस की नियुक्ति $गलत।
3. सि$र्फ बायोडाटा के आधार पर नियुक्ति $गलत।
4. सरकार को संस्थान की गरिमा और लोगों के हित का ध्यान रखना चाहिए था।
ची$फजस्टिस एसएच कपाडिय़ा जस्टिस केएस राधाकृष्णन और स्वतंत्र कुमार ने गत 10 $फरवरी को $फैसला बाद में सुनाने की घोषणा की थी। थॉमस पिछले साल 7 सितंबर को सीवीसी पद पर नियुक्त हुए थे। उनके $िखला$फ केरल में भ्रष्टाचार का मामला चल रहा है। एनजीओ सेंटर $फॉर पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन और कुछ अन्य ने थॉमस की सीवीसी पद पर नियुक्ति को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की हैं। याचिकाओं में केरल में पॉमोलीन ऑयल घोटाले के मामले को भी आधार बनाया गया था। इसके अलावा यह भी कहा गया कि वे दूरसंचार सचिव रह चुके हैं। आरोप है कि उन्होंने 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले को भी दबाने की कोशिश की।
दा$गी अ$फसर को कैसे बनाया सीवीसी?
सीवीसी पूरे देश में भ्रष्टाचार की किसी भी शिकायत की जांच कराने वाली सर्वोच्च एजेंसी है। इसके मुखिया पीजे थॉमस की नियुक्ति की प्रक्रिया अपने आप में कई राज़ खोलती है। थॉमस केरल के पामोलीन आयात घोटाले में फंसे थे। केंद्र सरकार में सचिव बनने के लिए ज़रूरी केंद्र में दो साल की प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) का अनुभव तक उनके पास नहीं था। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने उन्हें सचिव बनाया। उनकी नियुक्ति पर ज्य़ादा लोगों का ध्यान न जाए, इसलिए उन्हें कम महत्वपूर्ण माने जाने वाले संसदीय कार्य मंत्रालय में सचिव बनाया गया। फिर एक आम तबादले की तरह उन्हें हाई प्रो$फाइल टेलीकॉम विभाग में सचिव की कुर्सी मिली। उनकी तर$फलोगों का ध्यान तब गया, जब प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय कमेटी ने उन्हें सीवीसी नियुक्त किया। इस कमेटी में गृहमंत्री पी.चिदंबरम ने तो प्रधानमंत्री का समर्थन किया, लेकिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने कड़ी आपत्ति जताई।
इस मामले में एक याचिकाकर्ता और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंग्दोह ने कहा कि आज के सुप्रीम कोर्ट के $फैसले का असर देश में किसी भी संवैधानिक संस्था की नियुक्ति पर पड़ेगा और इन पदों पर पाक-सा$फ लोगों के नियुक्त होने की संभावना मज़बूत होगी। सुप्रीम कोर्ट के $फैसले का राजनीतिक असर भी पडऩा तय है। विपक्ष सरकार को यह कहते हुए घेरेगी कि उसने एक दा$गी शख़्स को किन परिस्थितियों में भ्रष्टाचार की निगरानी करने वाली संवैधानिक संस्था का अगुआ बना दिया।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
बीजेपी ने सुप्रीम कोर्ट के इस $फैसले का स्वागत किया है। भाजपा नेता राजीव प्रताप रुढ़ी ने कहा कि यह $फैसला प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ा झटका है। भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने ट्विटर के ज़रिये कहा कि कोर्ट के $फैसले से सीवीसी पद की गरीमा बहाल हुई। भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि अब नैतिक आधार पर प्रधानमंत्री को जि़म्मेदारी लेते हुए इस्ती$फा दे देना चाहिए।
माकपा नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि सीवीसी मामले पर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री जवाब दें। जनता दल अध्यक्ष शरद यादव ने कहा कि नैतिक आधार पर पी चिदंबरम को इस्ती$फा देना चाहिए। सीपीआई नेता डी राजा ने कहा, सुप्रीम कोर्ट का $फैसले यूपीए सरकार और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बड़ा झटका है। केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली ने सुप्रीम कोर्ट के $फैसलेे का स्वागत करते हुए कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने थॉमस की नियुक्ति को अवैध करार दिया है, तो नियुक्ति अवैध है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा $फैसले के मद्देनज़र भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों की कोर कमेटीटियों की आपात बैठकें 3 मार्च को ही दिल्ली में हो हुईं।
सीवीसी पद से पीजे थॉमस का इस्ती$फा
सुप्रीम कोर्ट के द्वारा केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) के रूप में पीजे थॉमस की नियुक्ति को $गैरकानूनी करार देने के कुछ समय बाद ही पीजे थॉमस ने अपना इस्ती$फा प्रधानमंत्री को भेज दिया। उनकी नियुक्ति के $िखला$फ दायर याचिकाओं पर गुरुवार मार्च 3 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए उनकी नियुक्ति को $गैरकानूनी करार दिया। $फैसले के बाद कानून मंत्री ने सीधे प्रधानमंत्री से जाकर मुलाकात की। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अगर नियुक्ति को अवैध कहा है तो इसे अवैध ही माना जाना चाहिए। सरकार ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए दोपहर कैबिनेट की आपातकालिन बैठक बुलाई है। $फैसले के बाद संसद के दोनों सदनों में विपक्ष ने जमकर हंगामा किया और प्रधानमंत्री से जवाब मांगा। प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी ने इसे प्रधानमंत्री को करारा जवाब करार देते हुए उनसे इस मामले में सदन में जवाब देने की मांग की।





30 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति गठन की प्रक्रिया पूरी
नई दिल्ली।
2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में हुए करोड़ों रुपए के घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) गठित करने के सिलसिले में केंद्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने मंगलवार मार्च 1 को राज्यसभा में प्रस्ताव पेश किया। तीस सदस्यीय जेपीसी में 20 सदस्य लोकसभा से और 10 सदस्य राज्यसभा से होंगे। लोकसभा सदस्यों की घोषणा पहले ही की जा चुकी है।
इस संबंध में प्रस्ताव पेश करते हुए सिब्बल ने कहा कि 30 सदस्यीय जेपीसी वर्ष 1998 से 2009 की अवधि के दौरान दूरसंचार लाइसेंसों और स्पेक्ट्रम आवंटन में यदि कोई अनियमितता बरती गई तो उसकी जांच करेगी। समिति सरकार के निर्णयों और दूरसंचार नीतियों को लागू करने पर प्राप्त परिणामों को भी देखेगी।
इस समिति में राज्यसभा से कांग्रेस के पी.जे. कुरियन, जयंती नटराजन और प्रवीण राष्ट्रपाल, द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (डीएमके) के तिरुचि सिवा, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के योगेन्द्र पी. त्रिवेदी, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एस. एस. अहलूवालिया और रविशंकर प्रसाद, जनता दल (युनाइटेड) के रामचंद्र प्रसाद सिंह, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सतीश चंद्र मिश्रा, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के सीताराम येचुरी होंगे।
कांग्रेस की ओर से इस सूची में अभिषेक मनु सिंघवी का नाम शामिल किया गया था लेकिन उन्होंने एक दूरसंचार कम्पनी के लिए बतौर वकील वकालत करने का हवाला देते हुए अंतिम समय में अपना नाम वापस ले लिया। उनकी जगह जयंती नटराजन को कांग्रेस की ओर से नामित किया गया।समिति में कांग्रेस के लोकसभा से आठ सदस्य हैं। इनमें पी.सी. चाको, मनीष तिवारी, जयप्रकाश अग्रवाल, अधीर रंजन चौधरी, वी. किशोरचंद्र देव, दीपेंद्र सिंह हुड्डा, निर्मल खत्री और प्रबण सिंह घाटोवर शामिल हैं। समिति में भाजपा के लोकसभा सदस्य जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, हरीन पाठक और गोपीनाथ मुंडे शामिल हैं।
लोकसभा से अन्य सदस्यों में डीएमके के टी.आर. बालू, तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी, जनता दल (युनाइटेड) के शरद यादव, बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के दारा सिंह चौहान, समाजवादी पार्टी (सपा) के अखिलेश यादव, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के गुरुदास दासगुप्ता, बीजू जनता दल (बीजद) के अर्जुन चरण सेठी और ऑल इंडिया अन्ना द्रमुक मुनेत्र कडग़म (एआईएडीएमके) के एम. थम्बी दुरई शामिल हैं।
लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार इन सदस्यों में से किसी एक सदस्य को समिति का अध्यक्ष मनोनीत करेंगी।



बाबा रामदेव की ऐतिहासिक रैली
योग गुरू की राजनीतिक महत्वाकांक्षा

हृ गुरूबचन सिंह बग्गा सोच

भोपाल।
दिल्ली के रामलीला मैदान में काले धन के $िखला$फ आयोजित बाबा रामदेव की रैली में जहां एक ओर बाबा रामदेव ने उनके विरोधियों, $खासकर कांग्रेस के नष्ट होने की धमकी दी, वहीं अपनी जान को $खतरा भी बताया। रैली को संबोधित करते हुए बाबा रामदेव ने आशंका व्यक्त की कि उनकी जान को $खतरा है, लेकिन साथ ही उन्होंने यह बात भी कहा कि यह बाबा डेथ प्रू$$$फ है, इसलिए वे लोग मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। बाबा रामदेव ने रैली में अपने विरोधियों को चेतावनी देते हुए कहा, कि रामदेव को नहीं मार सकते, क्योंकि यह बाबा तुम्हारी मौत बनकर आया है।
27 $फरवरी रविवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित रैली में करीब एक लाख लोगों की रैली आयोजित की गयी थी। इस रैली में हालांकि $खुद बाबा रामदेव तीन घण्टे देर से आये और जब तक बाबा रामदेव आये, तब तक एक चौथाई जनता जा चुकी थी। लेकिन आने के बाद बाबा रामदेव ने कांग्रेस पर ज़ोरदार हमला बोला और न केवल नेहरू गांधी परिवार पर जमकर हमला बोला, बल्कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी आड़े हाथों लिया। उन्होंने नेहरू गांधी परिवार पर हमला बोलते हुए कहा कि आ$िखर क्या कारण है कि देश की आधे से अधिक योजनाएं एक ही परिवार के व्यक्तियों के नाम पर चलायी जा रही हैं। महात्मा गांधी के नाम पर तो सि$र्फ एक योजना है मनरेगा, जबकि नेहरू $खानदान के नाम ही देश की अधिकांश योजनाएं संचालित की जाती हैं। बाबा रामदेव ने अपनी राजनीतिक गतिविधियों पर उठाये जा रहे सवाल पर चुटकी लेते हुए कहा, कि जो लोग मेरी राजनीतिक सक्रियता पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें मालूम होना चाहिए कि सन्यास धर्म के साथ राजधर्म का निर्वहन भी ज़रूरी है। बाबा रामदेव ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बेचारा प्रधानमंत्री बताते हुए कहा, कि वे अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार के ईमानदार प्रधानमंत्री हैं।
इस अवसर पर अन्ना हज़ारे ने बोलते हुए कहा कि लोकपाल विधेयक को पारित करवाने के लिए वे आगामी पांच अप्रैल से दिल्ली के जंतर मंतर पर आमरण अनशन पर बैठने जा रहे हैं, जबकि किरण बेदी ने कहा कि किसी भी सूरत में लोकपाल विधेयक कानून पारित होना चाहिए, और कानून में दोषी पाये गये लोगों के लिए फांसी की सज़ा निर्धारित होनी चाहिए। रैली को संबोधित करते हुए काले धन के $िखला$$फ कानूनी रूप से अभियान शुरू करनेवाले राम जेठमलानी ने कहा कि स्विटज़रलैण्ड का एक अ$खबार आज से बीस साल पहले इस बारे में $खबर छाप चुका है, कि राजीव गांधी का स्विस बैंक में काला धन जमा है। राजीव गांधी के मरने के बाद उसका संरक्षक आज भी नेहरू गांधी $खानदान है। रैली को अरविन्द केजरीवाल, गोविन्दाचार्य आदि ने भी संबोधित किया।
रोड रोलर की तरह राजनीति में आगे बढ़ेंगे। इसके लिए जितना आर्थिक, सांगठनिक और सामाजिक ज़मीन उन्हें चाहिए वे वह तैयार कर चुके हैं। अपनी इस राजनीितक यात्रा में उन्हें कांग्रेस जैसा शाश्वत राजनीतिक दुश्मन भी मिल गया है, जिसके विरोध के नाम पर ही भारत में राजनीतिक ज़मीन पैदा हुई है। यह रामदेव के लिए सुखद संयोग है। इसलिए अब वे गांव गांव जाने और तहसील तहसील अलख जगाने की घोषणा कर रहे हैं। उनकी घोषणा में दम इसलिए भी है, क्योंकि रामदेव अपनी बात आम आदमी तक पहुंचाने की कला जानते हैं। रामदेव में आक्रामिकता भी है और आम आदमी से संवाद स्थापित कर लेने की क्षमता भी। इसलिए उन्होंने महज़ पंद्रह सालों में देश में ऐसा समर्थक वर्ग पैदा कर लिया है, जो अब सि$र्फ बाबा रामदेव को देखता है, उनके कर्मों को नहीं। यह रामदेव की संवाद कला का ही कमाल है, कि वे अपने सामने मौजूद समूह को वह समझा पाते हैं, जो वह समझाना चाहते हैं। शायद इसी वजह से उन्हें वह राजनीतिक ज़मीन सा$फ दिखाई दे रही है, जो उन्हें देश का प्रधानमंत्री भी बना सकती है। रामदेव के समर्थक वैसे भी अब नारा लगाने लगे हैं ''देश का प्रधानमंत्री कैसा होÓÓ बाबा रामदेव जैसा हो। उनके समर्थकों द्वारा लगाया यह नारा रामदेव की महत्वाकांक्षा को पूर्ण करेगा या फिर उन्हें धराशायी कर देगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा, कि रामदेव अपनी संवाद क्षमता बरकरार रख पाते हैं, या नहीं। क्योंकि आ$िखरकार राजा वही है, जो प्रजा से संवाद करना जानता है।
भारत के हरियाणा राज्य (जि़ला महेन्द्रगढ़ के अलीपुर में 1965 में) जन्मे रामकिशन यादव स्कूली शिक्षा केवल आठवीं तक ही प्राप्त कर पाये। खानपुर ग्राम में संस्कृतिक एवं योग अध्ययन हेतु गुरूकुल में भरर्ती हो गये। समाज से लगभग विरक्त हो कर सन्यास धारण करने के पश्चात वे कल्वा गुरूकुल में योग के शिक्षक बन गये। योग,ध्यान, एवं पुरातन गन्थों के अध्ययन से उन्हें सन्तुष्टि प्राप्त हुई।
मगर गत कुछ वर्षों से (करीब दो ढाई दशकों के अन्तराल से) उनकी गतिविधियां बहुपक्षीय हो गईं। सन्यास, योग, आयुर्वेदिक औषधियां एवं इलाज आदि क्षेत्रों में ट्रस्र्ट ,कैम्प, केन्द्र चलाते हुये उनकी मुलाकातें भारत के विभिन्न प्रान्तों के मुख्य मंत्रीयों ,व अन्य बड़े बड़े राजनैतिक, उद्योग पति, धन्ना सेठों, भूस्वामियों और अनेक प्रकार के विभिन्न लोगों से हुईं। श्री राम किशन यादव अब तक स्वामी योगी राम देव बन चुके थे, जिन को श्रद्धा पूर्वक लोग सम्मान देने लगे और स्वामी जी इन अवसरों को अजाईं गंवाना उच्चित नहीं समझते थे । स्वामी जी ने इन अवसरों का भरपूर लाभ उठाया और जिस किसी यजमान का जितना दोहन कर सके किया।
1970-80 के दशक मेें साईकिल से गुरूकुलों में आते जाते अब निजी हैलीकाप्टर से स्काटलैंड में अपने स्वामित्व के जज़ीरे में ही उन्हें राहत मिलती है। लगभग हर प्रान्त के बड़े बड़े राजाओं (मंत्रीओं मुख्य मंत्रीयों और धन्ना सेठों ) ने उन्हें किसी न किसी तरह से उपकृत किया। कहीं योग केन्द्र अथवा आयुर्वेदिक दवाओं के कारखानों हेतु कीमती भूमि, तो कहीं करोड़ों लाखों की अकूत सम्पत्ति एकत्र की । मध्यप्रदेश राज्य, जहां भूखे नंगे परेशान किसान बेचारे हालात से मजबूर $खुदकुशी को मजबूर हैं, भी इस वख्शीश से वंचित नहीं।
जानकार लोग अब पूछने लग गये हैं, कि केवल दो दशकों के अन्तराल में कोई व्यक्ति अरबों की सम्पत्ति का मालिक बन गया, आ$खर उस धन का रंग काला था या स$फेद और बाबा के पास यह जो अकूत धन सम्पत्ति है, देश में और विदेशों में उसका रंग कितना स$फेद है ? आश्चर्य तो यह होता है कि अब बाबा की नज़रों में और ज़हन में नेतागिरी और राजनैतिक महत्वकांक्षा हिलोरे ले रही है, और देश के सर्वोच्च पद के दावेदार बन रहे हैं।

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