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Friday, August 27, 2010





करोड़पति भुखमरे

कैसी विडम्बना है कि नेहरू-शास्त्री, वल्लभ भाई पटेल जैसे लोगों की शुरू की हुई नि:स्वार्थ सेवाभाव की राजनीति, अब एक ऊंचे दर्जे का धंधा बन गई है। नेता अब जनता का नहीं, अपना हित देख रहे हैं। महंगाई और $गरीबी से त्रस्त जनता जहां भूख से मर रही है, अपने चुने हुए नेताओं से निवाले की गुहार लगा रही है, वहीं ये नेता $खुद के पेट भरे होने के बाद, अब सूटकेस और तिजोरी भरने की जुगाड़ में सफल हो रहे हैं। 375 प्रतिशत वेतन बढ़ाने के बाद भी ये और मांग रहे हैं।
......................................................................................... सांसद का टिकट हमेशा पैसा वालों को ही दिया जाता है। है कोई उदाहरण कि किसी पार्टी ने किसी $गरीब कार्यकर्ता को टिकट दिया हो.. सच तो ये है कि $गरीब को तो पार्षद का टिकट तक नसीब नहीं होता।

चन्द्रशेखर सिंह
कैसी विडम्बना है कि नेहरू-शास्त्री, वल्लभ भाई पटेल जैसे लोगों की शुरू की हुई नि:स्वार्थ सेवाभाव की राजनीति, अब एक ऊंचे दर्जे का धंधा बन गई है। नेता अब जनता का नहीं, अपना हित देख रहे हैं। महंगाई और $गरीबी से त्रस्त जनता जहां भूख से मर रही है, अपने चुने हुए नेताओं से निवाले की गुहार लगा रही है, वहीं ये नेता $खुद के पेट भरे होने के बाद, अब सूटकेस और तिजोरी भरने की जुगाड़ में सफल हो रहे हैं। अब समझ में आ रहा है, कि हमसे वोट पाने के लिए हमारे आगे पीछे घूमने वाले ये नेता लोग, जीतने के लिए चुनावों में क्यों करोड़ों रूपये तक $खर्च करने में पीेछे नहीं रहते। दरअसल मौजूदा राजनीति अब जनसेवा नहीं रहीे, ये लोग 'धनÓ के लिए 'सेवाÓ करने का नाटक करते हैं।
मौजूदा हालत में इन नेताओं को जनसेवक कहना बेमानी हो गया है। इनका ये कहना कि ये लोग राजनीति में जनसेवा के लिए आए हैं, तो ये एक मज़ाक ही होगा। ये लोग राजनीति में सि$र्फ 'ऊंचीÓ कमाई का सपना लिए ही प्रवेश करते हैं। चाहे सांसद हो या विधायक, सभी का मुख्य उद्देश्य पैसा पीटना हो गया है।
राजनीति में ये लोग कच्छा बनियान में उतरते हैं, लेेकिन जैसे जैसे ये लोग इस 'गंदगीÓ में तैरते हुए आगे बढ़ते हैं, वैसे-वैसे इनके शरीर पर राजसी भोग प्रगट होते जाते हैं। ये लोग $खुद को जनप्रतिनिधि कहते हैं, पर संसद में जनता के लिए कभी इतने एकजुट नहीं दिखते, जितने $खुद के वेतन बढ़वाने को लेकर दिखे। कितने शर्म की बात है, कि संसद में सवाल पूछने के लिए भी ये पैसा खाते हैं।
क्यों ये सांसद या विधायक बन कर संतुष्ट नहीं होते। सांसद या विधायक रहते हुए भी अपने कोटे में मिली धनराशि से ये अपने अपने क्षेत्रों का विकास कर सकते हैं, लेकिन ये नहीं करते हैं। इनके कोटे की राशि $खर्च ही नहीं हो पाती है, क्योंकि इन्हें जनहित में दिलचस्पी ही नहीं है। विकास करते हैं तो सि$र्फ अपना, या अपने रिश्तेदारों का। क्योंकि ये सांसद और विधायक मंत्री बनना चाहते हैं ? क्योंकि मंत्री बनकर कमाई के ज्य़ादा अवसर हो जाते हैं। मंत्री बनकर ही लोगों ने चारा घोटाला किया, बो$फोर्स सौदा किया, सैनिकों के ताबूतों में कमीशन तक खाया है। भ्रष्टाचार की ऐसी लम्बी $फेहरिस्त है, जिसे यहां लिखा जाए तो स्याही कम पड़ जाए।
इनका तर्क है कि इनका वेतन संसदीय सचिवों से कम है, इनके अन्य भत्ते अभी हाल ही में बढ़ा दिये गये हैं।
दैनिक भत्ता एक हज़ार से बढ़ाकर दो हज़ार, आ$िफस $खर्च और निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 20 हज़ार से बढ़ाकर 40 हज़ार, कन्वेऐन्स एडवांस एक से चार लाख, रोड माइलेज अलाऊंस 13 से 16 रूपये प्रति किलोमीटर और पेंशन आठ से 20 हज़ार रूपये कर दिया है। इस पे भी तुर्रा कि यह सब भत्ते आयकर मुक्त हैं। इस वृद्धि से सरकारी $खज़ाने पर करोड़ों रूपयों का अतिरिक्त सलाना भार पड़ा है।
किंतु इन्हें $खुद को मिलने वाली सुविधाओं का जि़क्र करना मुनासिब नहीं लगा। इनको इतनी अधिक सुविधाएं मिलती हंै कि सही मायनों में इन्हें वेतन की तो शायद ज़रूरत ही न पड़े। किंतु यदि इन्हें संसदीय सचिवों से ही तुलना करनी है, तो इनको $खुद को जनप्रतिनिधि या जनसेवक आर.ए.एस., आई.ए.एस. या आई.पी.एस. की परीक्षा पास करके ये कुव्वत बनानी चाहिए, कि ऊंची पगार मिल सके, तभी ये ऊंची पगार के हक़दार बन सकते हैं। अभी ये आज जनता से सेवा का वादा करते हैं, उसे लुभाते हैं, और उसका बेशकीमती वोट पा जाते हैं। लेकिन उसके लिए कुछ करते नहीं हंै। अनाज सड़ जाए, किंतु उस अनाज को किसी भूखे पेट में जाने से टोकने के लिए दीवार खड़ी कर देते हैं। आम जनता महंगाई से हाहाकार कर रही है, भुखमरी जान लेने पर उतारू है, किंतु इन नेताओं को कोई $िफक्र नहीं है। $िफक्र है तो $खुद के वेतन की। 375 गुना वेतन बढऩे के बाद भी, इन्हें संतोष नहीं। अभी भी ये और ज्य़ादा चाहते हैं।
फिर भी, वाम दल अब भी सांसदों के वेतन में किसी भी तरह की वृद्धि के $िखला$फ है


परमाणु ऊर्जा का उत्पादन शीघ्र परमाणु विधेयक लोस में पारित
भारतीय संसद के निचले सदन लोकसभा में परमाणु दायित्व विधेयक कई संशोधनों के बाद पारित हो गया है। इससे पहले बहस के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि परमाणु दायित्व विधेयक उस सफऱ का अंतिम पड़ाव है जिससे भारत पर थोपी गई परमाणु भेदभाव की नीति का अंत होगा. उन्होंने पूरी लोकसभा से इसे सर्वसम्मति से पारित करने का अनुरोध किया है। परमाणु दायित्व विधेयक को बुधवार अगस्त 25 को लोकसभा में पेश किया गया. सरकार ने कहा कि इसमें विपक्षी दलों की माँग के अनुरुप संशोधन किए गए हैं और धारा सात-बी में आपूर्तिकर्ताओं के लिए जोड़़ा गया है। जानबूझ कर या इरादतन शब्द हटा दिया गया है। इस विधेयक को लोकसभा में रखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान ने कहा कि इसके तहत मुआवज़े की दर 500 करोड़ से बढ़ाकर 1,500 करोड़ कर दी गई है जैसा कि अमरीका में भी है। विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के नेता जसवंत सिंह ने परमाणु संयंत्रों की पर्याप्त सुरक्षा पर ज़ोर दिया। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों द्वारा रखी गए कई संशोधन भी पारित किए गए. लेकिन वाम दलों समेत अन्य विपक्षी दलों के संशोधन पारित नहीं हुए। उधर राष्ट्रीय दल के नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने विधेयक का विरोध करते हुए एक अख़बार की ख़बर का हवाला दिया और कांग्रेस-भाजपा में इस मुद्दे पर सांठगाठ का आरोप लगाया। बहस में विपक्षी दलों के सदस्यों के उठाए कुछ मुद्दों का जवाब देते हुए प्रधामंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, ये कहना कि ये विधेयक भारत के हितों से समझौता करता है। या अमरीकी कंपनियों को मदद करता है, तथ्यों से दूर होगा. ये परमाणु भेदभाव की नीति को ख़त्म करता है। मनमोहन सिंह का कहना था कि उनके ख़िलाफ़ ये पहली बार नहीं कहा जा रहा कि अमरीका के दबाव में कोई क़दम उठाया जा रहा है। जब उन्होंने 1992 में वित्त मंत्री के तौर पर बजट पेश किया था तब भी ऐसे ही आरोप लगे थे।
भोपाल का हवाला : बहस को समाप्त करते हुए पृथ्वीराज चौहान ने कहा कि विधेयक में विपक्षी पार्टी भाजपा की आपत्तियों को सुना गया और सुझाए गए संशोधन को माना भी गया है। इस विधेयक के बाद भारत के शोध कार्यक्रमों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. उन्होंने कहा कि परमाणु विधेयक के ज़रिए परमाणु ऊर्जा का उत्पादन होगा जो साफ़ ईंधन है। इस विधेयक में किसी आपदा की स्थिति में मुआवजा़ जल्दी मिलने का भी प्रावधान किया गया है। इससे पहले चौहान ने कहा था कि इसकी ज़रूरत इसलिए हैं, ताकि यदि कोई हादसा होता है तो पीडि़त लोगों को दर-दर भटकना न पड़े और उन्हें मुआवज़ा मिल सके। भोपाल गैस त्रासदी का जि़क्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के किसी भी क़ानून के न होने के कारण पीडि़तों को अनेक दुख भोगने पड़े हैं। 28 देशों में पहले से ऐसे काऩून हैं लेकिन भारत और पाकिस्तान में ही ऐसा क़ानून नहीं है।

Tuesday, August 24, 2010

Friday, August 20, 2010




भाजपा ने किया नरेन्द्र मोदी के बदले संसदीय सौदा

कृष्णमोहन सिंह
नई दिल्ली। क्या भारतीय जनता पार्टी ने परमाणु जि़म्मेदारी विधेयक के सवाल पर वास्तव में केंद्र सरकार से कोई समझौता किया है? जिस तरह रातों रात भाजपा ने रुख़ बदला है, उससे शक होने लगा है। शक की पहली वजह यह है, कि एक तरफ़ भाजपा का रवैया बदला, तो दूसरी ओर सीबीआई अचानक नरेंद्र मोदी के प्रति मेहरबान नजऱ आने लगी है। और अब तो सीबीआई ने साफ़ कह दिया है, कि उसके पास सोहराबुद्दीन फज़ऱ्ी मुठभेड़ के मामले में कम से कम नरेंद्र मोदी के खि़लाफ़ कोई सबूत नहीं है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया की मनमोहनी सरकार अमेरिका व उसकी लाबी वाले देशों को लाभ पहुंचाने वाली परमाणु दायित्व बिल को संसद के इसी मानसून सत्र में पास कराने के लिए हर तरह का उपक्रम कर रही है। क्योंकि उसको अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा को भारत में आगवानी का तोहफ़ा देना है। यह तभी संभव है जब ओबामा के आने के पहले ही, बिल पास हो जाय। ओबामा के स्वागत में मनमोहन सरकार ने संसद का शीतकालीन सत्र समय से पहले ही बुलाने का लगभग निर्णय तो कर लिया है।
सो उसके पहले इस मानसून सत्र में ही परमाणु दायित्व बिल पास कराने की जी जान से कोशिश हो रही है। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेसी मैनेजरो़ ने इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद हर तरह से प्रयास शुरू कर दिया है। सूत्रों का कहना है कि इससे संबंधित मंत्रालय के स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट पर सरकार बहुत ग़ौर नहीं करेगी। वैसे भी जो कमेटी के चेयरमैन हैं, वह कांग्रेसी हैं और कहा जा रहा है, कि इस मामले में वह कांग्रेस की ही लाइन लेने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार भाजपा की आडवाणी मंडली से कांग्रेसी संकटमोचक व मैनेजरों ने बात की है। अभी आगे भी बात होनी है। कहा जाता है कि सौदेबाज़ी चल रही है। सूत्रों का कहना है कि भाजपा में परमाणु समझौते का सबसे बड़े विरोधी अरूण शौरी थे, उनको लालकृष्ण आडवाणी ने कपट से किनारे लगा दिया, फिर से राज्यसभा सांसद नहीं बनवाने दिया। क्योंकि अरूण शौरी ही थे जिन्होंने पार्टी की बैठक में परमाणु समझौते की तरफ़दारी कर रहे लालकृष्ण आडवाणी के सारे तर्कों को ध्वस्त करते हुए खुलकर विरोध किया था, और एक तरह से इस मामले में भी आडवाणी के दोहरे चरित्र को एक्सपोज़ कर दिया। परमाणु बिल तो जैसे-तैसे यूपीए-1 की मनमोहनी सरकार ने पास करा लिया। अब यूपीए-2 में परमाणु दायित्व बिल पास कराने के लिए सौदेबाज़ी शुरू हो गई है। भाजपा के कुछ नेताओं की 5 शर्तें हैं - (1) मनमोहन सरकार परमाणु दायित्व बिल में ही जोड़े कि परमाणु रियेक्टर लगाने का काम केवल सरकार व उसकी सम्पूर्ण प्रभूत्ववाली कम्पनियां करेंगी, किसी प्राइवेट कम्पनी को इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं दिया जायेगा। (2) दुर्घटना होने पर लोकलबाडी से हर्जा खर्चा का ब्यौरा लेकर उसके आधार पर हर्जाना देने, और वह भी 500 करोड़ रू. से कम में ही निपटा देने का जो बैरियर है उसे ख़त्म किया जाय।
(3) हर्जाने आदि की अतिअधिकतम सीमा 2000 करोड़ रू. वाला बैरियर ख़त्म किया जाय। (4) जोभी अमेरिकी या विदेशी कम्पनी परमामाणु रियेक्टर मशीन सप्लाई करे, परमाणु दुर्घटना होने पर उसको भी जि़म्मेदार बनाया जाय। (5)अमेरिका में जिस तरह नियम हंै कि कोई भी परमाणु रियेक्टर आधरित प्लांट स्थापित करने के पहले एक लाख करोड़ रू से अधिक का गारंटी बांड भरवाया जाता है, वही नियम भारत में भी लागू किया जाय, ताकि दुर्घटना होने पर कम्पनी के उस रकम से दुर्घटना के प्रभावितों को मुआवज़ा आदि दिया जा सके, पर्यावरण में हुए प्रदूषण को दूर करने का उपक्रम हो सके।
सूत्रों के मुताबिक अमेरिका व उसकी लाबी वाले देशों को $खुश करने के लिए किसी भी हद तक चले जाने वाले मनमोहन सिंह अमेरिकी दबाव में यह सब नहीं करेंगे। यानी भाजपा की ये शर्तें मनमोहन सरकार नहीं मानेगी। इसमें से एक- दो इधर उधर करके बिल पास करवा लेने की योजना है। सूत्रों का कहना है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को सोहराबुद्दीन, कौसरबी व अन्य मामलों में सीबीआई से बचाने के लिए भाजपा के जो नेता रात दिन एक किये हुए हैं, उनके पुरोधा से कांग्रेसी संकटमोचकों की बात हो गई है। कहा जाता है कि इशारे-इशारे में सौदेबाज़ी की बात चल रही है-कांग्रेस मोदी को सीबीआई से बचाये तब बदले में भाजपा परमाणु दायित्व बिल पास करायेगी।


...और अब कामनवेल्थ कोठे

आलोक तोमर

नई दिल्ली।
ये कामनवेल्थ का एक ऐसा पाप है, जिसके लिए आप सुरेश कलमाडी गिरोह को कसूरवार नहीं ठहरा सकते कॉमनवेल। गेम्स की आड़ में मानव तस्कर जमकर चांदी काट रहे हैं। कॉमनवेल्थ गेम में काम दिलाने के नाम पर दूरदराज़ के गांवों से लड़कियों को लाकर उन्हें बेचने का धंधा तेज़ी से बढ़ा है। कॉमनवेल्थ गेम्स में नौकरी पाने की लालच में लड़कियां तस्करों की जाल में फंसकर दिल्ली के कोठे पर पहुंच रही हैं। तस्कर गैंग की शिकार हुई लड़की पूजा (बदला हुआ नाम) की आप बीती दिल दहला कर रख देने वाली है। पश्चिम बंगाल की रहने वाली पूजा लड़कियों की तस्करी करने वाले गैंग की शिकार हो गई। वही गैंग जो दिल्ली में होने वाले महाखेलों में काम दिलाने का झांसा देकर भोली-भाली गऱीब लड़कियों को अंधेरी गलियों में धकेल रहा है। दरअसल पूजा की एक सहेली मानव तस्कर गिरोह की सदस्य है। उसने पूजा को महाखेल में काम दिलाने के साथ-साथ दिल्ली घुमाने का लालच दिया। अपनी सहेली की बातों में आकर पूजा ट्रेन में बैठ गई। उसके मुताबिक ट्रेन में उसे कुछ खाने के लिए दिया गया। खाने के बाद उसे गहरी नींद आ गई। जब आंख खुली तो वह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर थी। दिल्ली में उसे एक आंटी के पास रख दिया गया। आंटी यानी जीबी रोड के एक कोठे की मालकिन। पूजा को बेच दिया गया था। पूजा की किस्मत अच्छी थी। एक कस्टमर ने उसकी दास्तान सुनी और उससे उसके घर का फ़ोन नंबर लेकर उसके घर ख़बर कर दी। घर वाले दिल्ली पहुंचे और एक ग़ैर-सरकारी संगठन की मदद से उसे छुड़ा लिया गया।
पूजा को कोठे की कैद से बेशक छुड़ा लिया गया। मगर पूजा की तरह ना जाने कितनी लड़कियों को दिल्ली में कॉमनवेल्थ में काम दिलाने या फिर खेल में लगने वाले मेला घुमाने के नाम पर दिल्ली लाया गया है, औऱ इनमें से कई अभी भी कैद हैं।
मालूम हो कि दिल्ली के तीन रेलवे स्टेशनों से पिछले दो महीनों में पुलिस ने पूजा जैसी सौ से ज्य़ादा लड़कियों को दलालों के चंगुल से छुड़ाया है। इनमें ज्य़ादतर गऱीब नाबालिग़ लड़कियां हैं, जिन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान काम दिलाने का झांसा देकर दलालों ने अपने जाल में फंसाया। दिल्ली पुलिस के ही आंकड़े बताते हैं, कि पिछले सात महीनों में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से 35, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से 23 और निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर करीब 1 दर्जन लड़कियां मुक्त कराई जा चुकी हैं।
दिल्ली पुलिस के मुताबिक तस्करी के शिकार बच्चों को बचाने के लिए दिल्ली के हरेक थाने में जुवेनायल अफ़सर हैं। छुड़ाए गए बच्चों के पुर्नवास के लिए भी पुलिस कोशिश करती है। मगर इस बात को दिल्ली पुलिस भी मानती है कि इन बच्चों को दिल्ली काम के बहाने ही लाया गया। लेकिन राजधानी आने पर ज्य़ादातर लड़कियों से वो काम कराया जाता है, जो शायद कभी उसने सपने में भी न सोचा था।
हाल ही में दिल्ली पुलिस ने दो लोगों को गिरफ़्तार कर 14 लड़कियों को मुक्त कराया था। जांच में ये पता लगा था, कि इन लड़कियों को काम दिलाने के नाम पर ही दिल्ली लाया जा रहा था। गिरफ़्तार आरोपी दिल्ली में प्लेसमेंट एजेंसी चलाता था। ऐसी लड़कियों की लिस्ट लंबी चौड़ी है।
दरअसल दिल्ली में कामनवेल्थ गेम की दस्तक ने मानव तस्करी का नया बहाना दे दिया। कई संगठित गिरोहों ने इस गेम की तैयारी कई महीनें पहले शुरू कर दी। झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम और छतीसगढ़ की गऱीब लड़कियां इनके निशाने पर रहीं और गिरोह के एजेंट सक्रिय हो गए। इन एजेंटों ने गेम में कई तरह के काम दिलाने की बात इन जगहों पर फैलाई और फिर गऱीब मां-बाप की ममता को बेचने की गहरी साजि़श पर अमल करना शुरू कर दिया। तस्करी के इस तरीके के ज़रिए वो जम कर चांदी काटने लगे।
नाबालिग़ लड़कियों की तस्करी कोई नई बात नहीं, मगर कॉमनवेल्थ गेम के नाम पर इस समय की जा रही तस्करी ने पुलिस और ग़ैर सरकारी संगठनों की नींद उड़ा दी है, क्योंकि इनका मानना है कि तस्करों के चंगुल से छुड़ाई गई लड़कियों की संख्या से दस गुणा ज्य़ादा संख्या उन लड़कियों की है, जिन्हें काम दिलाने के नाम पर दिल्ली लाया गया, और अब वो लापता हैं।

Friday, August 6, 2010




मध्य प्रदेश में सरकार किसकी है?

हृ आलोक तोमर
मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी में अब बहुत $खतरनाक दरारें पड़ गई हैं। दरअसल भाजपा जिन जिन राज्यों में राज कर रही है, उनमें शायद मध्य प्रदेश ही ऐसा होगा, जहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह राजनैतिक स्वायत्ता में ज़रूरत से कुछ ज्य़ादा ही विश्वास करने लगे हैं। उनके लिए संघ परिवार का तो फिर भी कुछ महत्व है मगर पार्टी को उनकी राय में उनके इशारों पर चलना चाहिए। सरकार के मुखिया तो वे हैं ही।
भाजपा के महासचिव और मध्य प्रदेश के प्रभारी अनंत कुमार रतलाम में शिवराज सिंह से खुलेआम कह कर गए थे, कि जितने भी दागी मंत्री हैं उन्हें किनारे लगाओ। खुद शिवराज सिंह सहित लोकायुक्त के दरबार में आठ मंत्रियों के $िखला$फ भ्रष्टाचार, अनाचार और दुराचार की शिकायतें दर्ज हंै। इन पर जांच के बाद जो भी $फैसला आए, दा$ग तो लग ही गया है। मगर शिवराज सिंह चौहान ने एक भी मंत्री के $िखला$फ कार्रवाई करना तो दूर, सवाल तक नहीं पूछा। हो सकता है कि वे अपने आप से भी सवाल पूछने से डर रहे हों। अटल बिहारी वाजपेयी की बहन के बेटे अनूप मिश्रा को चरित्र प्रमाण पत्र देने का साहस शायद किसी में नहीं हो। ग्वालियर जि़ले में ज़मीन को ले कर हुए गोली कांड में पहले उनकी कुर्सी गई और अब उनके बेटे और भतीजे के $िखला$फ वारंट भी निकल गए। ज़ाहिर है कि शिवराज सिंह मध्य प्रदेश में अटल परंपरा का नाश करने पर तुले हुए हैं और इसके लिए अनूप मिश्रा $खुद कम जि़म्मेदार नहीं हैं। गङ्ढा अनूप ने खोदा था और अटल जी की प्रतिमा को उसमें द$फन शिवराज ने कर दिया।
मध्य प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष के तौर पर प्रभात झा का आना एक और बड़ी लहर थी। मध्य प्रदेश भाजपा के समुद्र में यह एक ऐसा ज्वर था, जिससे अब तक पार्टी निपट नहीं पा रही है। प्रभात झा को कांग्रेस के दिग्विजय सिंह से भी पहले भाजपा के नेता ही याद दिला रहे थे, कि प्रभात झा मध्य प्रदेश के नहीं, बिहार के हैं। उनको प्रदेश का अध्यक्ष नहीं बनाना चाहिए। उस हिसाब से चंदन मित्रा बंगाल के हैं, सुषमा स्वराज हरियाणा की हैं और लाल कृष्ण आडवाणी पाकिस्तान में पैदा हुए थे, और उन्हें मध्य प्रदेश से राज्यसभा में क्यों भेजा गया? मगर प्रभात झा भी मध्य प्रदेश भाजपा में असहयोग के शिकार हंै। वे सि$र्फ दस्तखत कर रहे हैं और पार्टी के पदाधिकारियों के नाम दूसरे लोग चुन रहे हैं। वरना ऐसा नहीं होता, कि जिस भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष पद पर शिवराज सिंह $खुद रह चुके हैं, उस पर एक ऐसा विधायक मनोनीत कर दिया जाता, जिसके $िखला$फ चोरी, मारपीट और ठगी के मामले दर्ज हंै। अब या तो भाजपा दा$ग निरपेक्ष हो गई है, या फिर प्रभात झा ने शिवराज सिंह के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। प्रभात झा ने शुरूआत बहुत धमाके से की थी, आदर्शों के कुछ मानक बनाए थे और यह भी ऐलान किया था, कि वे पैंसठ साल की उम्र के बाद सक्रिय राजनीति में नहीं रहेंगे। इस हिसाब से दस बारह साल प्रभात झा के पास बचते हैं।
लेकिन भाजपा के महारथी तो प्रभात झा को यह दस बारह साल देने को भी तैयार नहीं हैं। $खास तौर पर दा$गी विधायकों को मुख्यमंत्री निवास से कह दिया गया है, कि जाओ और संगठन से अपने चाल चलन का प्रमाण पत्र ले कर आओ। अब प्रभात झा भाजपा के हवलदार बन गए हैं, जो हर विधायक के कर्मकांड की जांच कर के उसे चरित्र प्रमाण पत्र देने पर बाध्य होंगे और इस चक्कर में अपने दुश्मनोंं की सूची और बढ़ा बैठेंगे। इसके अलावा प्रभात झा ने अपने लिए कम मुसीबतें खड़ी नहीं की हैं। पता नहीं कि झोंक में उन्होंने अर्ध सैनिक और सुरक्षा बलों के जवानों को डकैत और तस्कर कह डाला। कम से कम आरोप तो यही है। कांग्रेस में भाजपा के सबसे अच्छे मित्रों में से एक और मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता की ओर से प्रभात झा के $िखला$फ बाकायदा राजद्रोह का मामला दर्ज हो गया है। इस मामले में आरोप बनते हैं या नहीं इसके लिए 16 अगस्त की तारीख तय की गई है। यह सबको पता था, कि मध्य प्रदेश पुलिस, मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष के $िखला$फ इतना गंभीर मामला दर्ज नहीं करेगी, इसलिए भोपाल जि़ला न्यायालय के ज़रिए अपील की गई। प्रभात झा ने बाद में अपना बयान बदल कर सुरक्षा बलों के प्रति सम्मान ज़ाहिर किया था, मगर भोपाल के हबीबगंज थाने में भी उनके $िखला$फ ए$फआईआर दर्ज हो चुकी है। कांग्रेस के प्रवक्ता जेपी धनोपिया ने पुलिस और अदालत से कहा है कि प्रभात झा ने राष्ट्रीय भावना को ठेस पहुंचाई है, और लोकतंत्र द्वारा स्थापित सरकार के प्रति अविश्वास पैदा करने की कोशिश की है। पता नहीं प्रभात झा को बिना मांगे यह प्रमाण पत्र देने की ज़रूरत कहां से पड़ गई? प्रभात झा मुख्मयंत्री शिवराज सिंह के सबसे विश्वासपात्र माने जाने वाले, नरेंद्र सिंह तोमर के उत्तराधिकारी यानी प्रदेश अध्यक्ष बने हैं, और यह भी किसी से छिपा नहीं है कि नरेंद्र सिंह तोमर और प्रभात झा के बीच भी कोई बहुत घनिष्ठ और विश्वास के रिश्ते नहीं रह गए हैं। इसका एक प्रमाण तो यही है कि जब भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी का गठन हो रहा था, तो नरेंद्र सिंह तोमर ने प्रभात झा को एक भी नाम सुझाने से इनकार कर दिया था, और प्रभात झा ने भी जो पदाधिकारी नियुक्त किए, वे आम तौर पर ऐसे माने जाते हैं, जो तोमर के प्रिय पात्रों में नहीं रहे। हार कर नरेंद्र सिंह तोमर भी कहने लगे हैं, कि उन्होंने पार्टी के नए अध्यक्ष को उनके काम में कोई बाधा नहीं पहुंचाने का $फैसला किया है। मगर बात घूम फिर कर वहीं आती है, कि मध्य प्रदेश में अगर कोई लोकतांत्रिक विधि से स्थापित सरकार हैं, तो उसके लिए योग्य पात्रों की क्या इतनी कमी पड़ गई है, कि शिवराज सिंह चौहान को अपने मंत्रिमंडल में दा$गी मंत्री रखना ज़रूरी है। ऐसे मुख्यमंत्री का क्या $फायदा जिसे मंत्रिमंडल की बैठक में उसके मंत्री पूछने लगें कि आ$िखर आपके न्याय का पैमाना क्या है? मध्य प्रदेश के निर्वाचित सांसदों से भी राज्य सरकार का रिश्ता ऐसा है, कि सांसद निधि के पैसे चंूकि जि़ला कलेक्टर को वितरित करने होते हैं, इसलिए $खास तौर पर भाजपा के सांसद अपने मतदाताओं और चुनाव क्षेत्र के नागरिकों से गालियां खाते रहते हंै। शिवराज सिंह की सरकार ने यूनियन कार्बाइड के $फैसले के वक्त सबसे पहले कमेटी बनाई थी, और न्याय की परंपरा का पालन कर के भोपाल के लोगों का हक दिलवा कर रहेंगे। इस मामले में आगे क्या हुआ, यह तो सि$र्फ सरकार को मालूम होगा।

राजनीतिक मौन में राजमाता
हृ पुष्यमित्र
ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर डेविड कैमरन अपने पहले भारतीय दौरे पर आये हुए थे। उनके कार्यक्रमों की सूची में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी से मुलाकात का कार्यक्रम भी दर्ज था। मगर अ$फसोस भारतीय सत्ता के इन दोनों संविधानेतर महाशक्तियों ने अंतिम समय में कैमरन से मिलने से शिष्टता पूर्वक इनकार कर दिया। सोनिया ने जहां अपनी नासाज़ तबीयत का बहाना बनाया, वहीं राहुल एक दिन पहले अचानक कैमरन के ही मुल्क ब्रिटेन की यात्रा पर निकल गये। आ$िखर ऐसा क्यों हुआ ? अभी हाल में महंगाई को लेकर भारतीय संसद में विपक्षी सांसद ज़ोरदार हंगामा कर रहे हैं और संसद में सोनिया के बयान की मांग की जा रही है. मगर सोनिया उपलब्ध नहीं हैं। इससे पहले सीबीआई के राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर कांग्रेस पर आरोप लगाये गये, पर इन आरोपों का जवाब देने के सोनिया मीडिया के सामने नहीं आईं, या उन्होंने कोई बयान भी जारी नहीं किया. इसके पहले भोपाल गैस त्रासदी प्रकरण को लेकर बड़ा बवाल मचा। उनके स्वर्गीय पति पर गंभीर आरोप लगाये गये। आपरेशन ग्रीन हंट को लेकर पार्टी के अंतर्विरोध बाहर आये, नक्सलवाद के $िखला$फ सेना के इस्तेमाल पर दिग्विजय और चिदंबरम आमने-सामने हो गये। कामनवेल्थ को लेकर मणिशंकर अय्यर ने सरकार के $िखला$फ मोर्चा खोल दिया है। पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि के वक्त कांग्रेस संदेश के संपादक अनिल शास्त्री ने सोनिया से हस्तक्षेप की गुहार लगाई। मगर राजमाता सोनिया गांधी अंत:पुर से बाहर नहीं निकलीं। न ही उनके सुपुत्र कांग्रेस के तथाकथित युवराज राहुल गांधी ने कोई टिप्पणी की। भोपाल गैस त्रासदी के फैसले से ठीक पहले स्पेनिश लेखक ज़ैवियर मोरो अपनी किताब द रेड साड़ी के विवाद को लेकर भारत पहुंचे थे। सोनिया गांधी के जीवन पर केंद्रित इस पुस्तक में कई विवादास्पद मुद्दे टिप्पणियां थीं। मगर इस पुस्तक के $िखला$फभी दस जनपथ से कोई बयान जारी नहीं किया गया। दस जनपथ दो हाल-हाल तक भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था, अब इक्के दुक्के कांग्रेसी अपना झगड़ा सुलझाने वहां पहुंच रहे हैं। जो वहां जाते भी हैं उन्हें कोई सटीक जवाब नहीं मिलता। आ$िखर भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण अंग और कांग्रेसी राजनीति के माई-बाप माने-जाने ये दोनों पुरोधा पिछले छह माह से कहां गुम हैं? क्या यह भारतीय राजनीति के लिये एक गंभीर सस्पेंस नहीं है ? आ$िखर इनके चुप्पी की वजह क्या है? थोड़ी देर के लिये मान लेते हैं कि यही सच होगा, मगर क्या इन हालातों में कांग्रेसी भी उन्हें इस तरह उपेक्षित छोड़ देंगे जैसा कि इन दिनों नज़र आ रहा है। यह ठीक है कि सोनिया-राहुल ने यूपीए-2 को कामकाज में दिलचस्पी कम कर दी है, मगर यूपीए-2 के पुरोधा जिन्हें मालूम है कि उन्होंने यह कुर्सी इन्हीं दो लोगों के बदौलत पाई है, क्यों इनकी खोज $खबर नहीं ले रहे? क्या मौजूदा सरकार के काम-काज से ज़ाहिर नहीं कि वे भी यह साबित करने की कोशिश में जुट गये हैं, कि कांग्रेस को इन दोनों दिग्गजों के बैशाखी की ज़रूरत नहीं। सारे $फैसले $खुद लिये जा रहे हैं। चाहे आपरेशन ग्रीन हंट हो, पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि का मसला हो, पाकिस्तान के बातचीत के बिंदू हों, या फिर मोदी से निपटने की स्ट्रैटजी। न तो किसी मसले पर उनसे सलाह ली जा रही है, और न ही उनके स्टैंड का ख्य़ाल रखा जा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सोनिया ने $खुद को संविधानेतर शक्ति के संबोधन से मुक्त कराने और मनमोहन सिंह को असली किंग साबित करने के लिये एक और त्याग किया है। माना जा सकता है कि राजनीति में उनके आने का उद्देश्य कांग्रेस को भारतीय राजनीति के केंद्र में फिर से स्थापित करना भर था। अब चंूकि यह लक्ष्य हासिल किया जा चुका है, इसलिये वे चुपचाप बड़ी शालीनता से $खुद को कांग्रेस की सबसे शक्तिशाली कुर्सी से अलग कर रही हैं। क्या यह सच हो सकता है ? जैसे, यह जगज़ाहिर है कि माओवाद से निबटने और पेट्रोलियम पदार्थों का कीमतों को बाजार पर छोड़ देने के $फैसलों के मामले में दोनों उन $फैसलों के $िखला$फ होते जो सरकार ने लिये, मगर इसके बावजूद सरकार ने ऐसे $फैसले बेहिचक लिये। दिग्विजय, अनिल शास्त्री और मणिशंकर अय्यर जैसे नेता संभवत: यही सोचकर अपनी ही सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े कर रहे हैं, कि उन्हें सोनिया और राहुल का समर्थन मिलेगा। मगर सरकार बड़ी बेरहमी से इन्हें $खामोश करने के तरीके तलाश रही है। इसका अर्थ कहीं यह तो नहीं कि कांग्रेस दो धड़ों में बंट गयी है। मौजूदा सरकार में जि़म्मेदार पदों पर काबिज़ कांग्रेसी हर हाल में सोनिया-राहुल जैसे वट वृक्षों की छाया से निकल कर अपना अस्तित्व साबित करने में जुट गयी है। हालांकि अगर वाकई ऐसा हो रहा है और कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार की छत्र-छाया से निकल कर आत्म निर्भर होने की कोशिश में है, तो इसे सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिये, मगर यहां परिस्थितियां थोड़ी अलग है। कांग्रेसी सोनिया-राहुल की छत्र-छाया से इसलिये बाहर नहीं निकल रहे, कि वे आत्मनिर्भर होना चाहते हैं, बल्कि इसलिये यह कदम उठा रहे हैं, क्योंकि उन्हें कई जनविरोधी $फैसले लेने हैं, जो वे सोनिया-राहुल के प्रभाव में रहते हुए नहीं ले सकते। चिदंबरम को खनिज संपन्न पूर्वी भारत को माओवादियों के कब्जे से मुक्त कराकर टाटा और जिंदल को सौंपना है. इस काम के लिये ज़रूरत हुई तो वे इन इलाकों में बमबारी तक करवाने में नहीं हिचकेंगे, और उन्हें मालूम है कि सोनिया या राहुल से उन्हें इस मसले पर समर्थन मिलने वाला नहीं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को बाज़ार की ताकतों को खुश करने के लिये कई ऐसे $फैसले लेने हैं जो जनता में त्राहिमाम मचा सकते हैं. मनमोहन-मोंटक की अर्थशास्त्री जोड़ी का लक्ष्य वर्ल्ड बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश जैसी संस्थाओं की नीतियों को भारत में लागू करना है। दोनों इन्हीं बैंकों के पूर्व कर्मी रह चुके हैं। वैसे यूपीए-2 पर वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश के पूर्व कर्मियों का ही कब्ज़ा है। सरकार ने जनोन्मुखी वाम दलों से पहले ही पीछा छुड़ा लिया है। अब वे अपनी पार्टी की जनोन्मुखी ताकतों को साइड करने में जुटे हैं, ताकि बाज़ारोन्मुखी $फैसले लेने में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो। कहा यह भी जा रहा है कि सरकार को ऐसा शेप अमेरिकी प्रभाव में दिया जा रहा ताकि भारत सरकार पूरी तरह अमेरिकी पि_ू की तरह काम करे।
लेकिन सबकुछ इतना आसान नहीं...
मगर जो कुछ भी करने की कोशिश की जा रही है वह इतना आसान नहीं। सोनिया गांधी न तो महात्मा गांधी है, जिन्होंने आज़ादी के बाद नेहरू-पटेल द्वारा साइड-लाइन किये जाने की बात चुप-चाप सह ली, और साबित कर दिया कि उन्होंने सत्ता भोगने के लिये आज़ादी की लड़ाई नहीं लड़ी थी। सोनिया गांधी भारतीय राजनीति का वह किरदार है, जिसने लगभग डूब चुकी कांग्रेस को ऐसी राजनीतिक शक्ति में तब्दील कर दिया जो आज अजेय लगने लगी है। अगर वह इस पार्टी के लिये ऐसा करिश्मा कर सकती है, तो अपने पुत्र के राजनीतिक कैरियर के लिये जनता का रुख़ फिर से मोड़ सकती है। इसकी शुरुआत इसी महीने हो सकती है, जब उन्हें इस बार लगातार तीसरे टर्म के लिये सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने जाने की कोशिश हो। संसद के मानसून सत्र के बाद यह कार्रवाई होगी। बहुत संभव है कि सोनिया इस मौके पर $खुद ही अध्यक्ष पद स्वीकार न करे और किसी और का नाम आगे बढ़ाने की मांग कर दे। त्याग की राजनीति की माहिर खिलाड़ी सोनिया के इस कदम से पार्टी में जो उथल-पुथल मचेगी उससे मनमोहन-चिदंबरम कंपनी किस तरह निबटती है, यह देखने वाला अनुभव होगा।

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