करोड़पति भुखमरे
कैसी विडम्बना है कि नेहरू-शास्त्री, वल्लभ भाई पटेल जैसे लोगों की शुरू की हुई नि:स्वार्थ सेवाभाव की राजनीति, अब एक ऊंचे दर्जे का धंधा बन गई है। नेता अब जनता का नहीं, अपना हित देख रहे हैं। महंगाई और $गरीबी से त्रस्त जनता जहां भूख से मर रही है, अपने चुने हुए नेताओं से निवाले की गुहार लगा रही है, वहीं ये नेता $खुद के पेट भरे होने के बाद, अब सूटकेस और तिजोरी भरने की जुगाड़ में सफल हो रहे हैं। 375 प्रतिशत वेतन बढ़ाने के बाद भी ये और मांग रहे हैं।
......................................................................................... सांसद का टिकट हमेशा पैसा वालों को ही दिया जाता है। है कोई उदाहरण कि किसी पार्टी ने किसी $गरीब कार्यकर्ता को टिकट दिया हो.. सच तो ये है कि $गरीब को तो पार्षद का टिकट तक नसीब नहीं होता।
चन्द्रशेखर सिंह
कैसी विडम्बना है कि नेहरू-शास्त्री, वल्लभ भाई पटेल जैसे लोगों की शुरू की हुई नि:स्वार्थ सेवाभाव की राजनीति, अब एक ऊंचे दर्जे का धंधा बन गई है। नेता अब जनता का नहीं, अपना हित देख रहे हैं। महंगाई और $गरीबी से त्रस्त जनता जहां भूख से मर रही है, अपने चुने हुए नेताओं से निवाले की गुहार लगा रही है, वहीं ये नेता $खुद के पेट भरे होने के बाद, अब सूटकेस और तिजोरी भरने की जुगाड़ में सफल हो रहे हैं। अब समझ में आ रहा है, कि हमसे वोट पाने के लिए हमारे आगे पीछे घूमने वाले ये नेता लोग, जीतने के लिए चुनावों में क्यों करोड़ों रूपये तक $खर्च करने में पीेछे नहीं रहते। दरअसल मौजूदा राजनीति अब जनसेवा नहीं रहीे, ये लोग 'धनÓ के लिए 'सेवाÓ करने का नाटक करते हैं।
मौजूदा हालत में इन नेताओं को जनसेवक कहना बेमानी हो गया है। इनका ये कहना कि ये लोग राजनीति में जनसेवा के लिए आए हैं, तो ये एक मज़ाक ही होगा। ये लोग राजनीति में सि$र्फ 'ऊंचीÓ कमाई का सपना लिए ही प्रवेश करते हैं। चाहे सांसद हो या विधायक, सभी का मुख्य उद्देश्य पैसा पीटना हो गया है।
राजनीति में ये लोग कच्छा बनियान में उतरते हैं, लेेकिन जैसे जैसे ये लोग इस 'गंदगीÓ में तैरते हुए आगे बढ़ते हैं, वैसे-वैसे इनके शरीर पर राजसी भोग प्रगट होते जाते हैं। ये लोग $खुद को जनप्रतिनिधि कहते हैं, पर संसद में जनता के लिए कभी इतने एकजुट नहीं दिखते, जितने $खुद के वेतन बढ़वाने को लेकर दिखे। कितने शर्म की बात है, कि संसद में सवाल पूछने के लिए भी ये पैसा खाते हैं।
क्यों ये सांसद या विधायक बन कर संतुष्ट नहीं होते। सांसद या विधायक रहते हुए भी अपने कोटे में मिली धनराशि से ये अपने अपने क्षेत्रों का विकास कर सकते हैं, लेकिन ये नहीं करते हैं। इनके कोटे की राशि $खर्च ही नहीं हो पाती है, क्योंकि इन्हें जनहित में दिलचस्पी ही नहीं है। विकास करते हैं तो सि$र्फ अपना, या अपने रिश्तेदारों का। क्योंकि ये सांसद और विधायक मंत्री बनना चाहते हैं ? क्योंकि मंत्री बनकर कमाई के ज्य़ादा अवसर हो जाते हैं। मंत्री बनकर ही लोगों ने चारा घोटाला किया, बो$फोर्स सौदा किया, सैनिकों के ताबूतों में कमीशन तक खाया है। भ्रष्टाचार की ऐसी लम्बी $फेहरिस्त है, जिसे यहां लिखा जाए तो स्याही कम पड़ जाए।
इनका तर्क है कि इनका वेतन संसदीय सचिवों से कम है, इनके अन्य भत्ते अभी हाल ही में बढ़ा दिये गये हैं।
दैनिक भत्ता एक हज़ार से बढ़ाकर दो हज़ार, आ$िफस $खर्च और निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 20 हज़ार से बढ़ाकर 40 हज़ार, कन्वेऐन्स एडवांस एक से चार लाख, रोड माइलेज अलाऊंस 13 से 16 रूपये प्रति किलोमीटर और पेंशन आठ से 20 हज़ार रूपये कर दिया है। इस पे भी तुर्रा कि यह सब भत्ते आयकर मुक्त हैं। इस वृद्धि से सरकारी $खज़ाने पर करोड़ों रूपयों का अतिरिक्त सलाना भार पड़ा है।
किंतु इन्हें $खुद को मिलने वाली सुविधाओं का जि़क्र करना मुनासिब नहीं लगा। इनको इतनी अधिक सुविधाएं मिलती हंै कि सही मायनों में इन्हें वेतन की तो शायद ज़रूरत ही न पड़े। किंतु यदि इन्हें संसदीय सचिवों से ही तुलना करनी है, तो इनको $खुद को जनप्रतिनिधि या जनसेवक आर.ए.एस., आई.ए.एस. या आई.पी.एस. की परीक्षा पास करके ये कुव्वत बनानी चाहिए, कि ऊंची पगार मिल सके, तभी ये ऊंची पगार के हक़दार बन सकते हैं। अभी ये आज जनता से सेवा का वादा करते हैं, उसे लुभाते हैं, और उसका बेशकीमती वोट पा जाते हैं। लेकिन उसके लिए कुछ करते नहीं हंै। अनाज सड़ जाए, किंतु उस अनाज को किसी भूखे पेट में जाने से टोकने के लिए दीवार खड़ी कर देते हैं। आम जनता महंगाई से हाहाकार कर रही है, भुखमरी जान लेने पर उतारू है, किंतु इन नेताओं को कोई $िफक्र नहीं है। $िफक्र है तो $खुद के वेतन की। 375 गुना वेतन बढऩे के बाद भी, इन्हें संतोष नहीं। अभी भी ये और ज्य़ादा चाहते हैं।
फिर भी, वाम दल अब भी सांसदों के वेतन में किसी भी तरह की वृद्धि के $िखला$फ है
परमाणु ऊर्जा का उत्पादन शीघ्र परमाणु विधेयक लोस में पारित
भारतीय संसद के निचले सदन लोकसभा में परमाणु दायित्व विधेयक कई संशोधनों के बाद पारित हो गया है। इससे पहले बहस के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि परमाणु दायित्व विधेयक उस सफऱ का अंतिम पड़ाव है जिससे भारत पर थोपी गई परमाणु भेदभाव की नीति का अंत होगा. उन्होंने पूरी लोकसभा से इसे सर्वसम्मति से पारित करने का अनुरोध किया है। परमाणु दायित्व विधेयक को बुधवार अगस्त 25 को लोकसभा में पेश किया गया. सरकार ने कहा कि इसमें विपक्षी दलों की माँग के अनुरुप संशोधन किए गए हैं और धारा सात-बी में आपूर्तिकर्ताओं के लिए जोड़़ा गया है। जानबूझ कर या इरादतन शब्द हटा दिया गया है। इस विधेयक को लोकसभा में रखते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान ने कहा कि इसके तहत मुआवज़े की दर 500 करोड़ से बढ़ाकर 1,500 करोड़ कर दी गई है जैसा कि अमरीका में भी है। विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के नेता जसवंत सिंह ने परमाणु संयंत्रों की पर्याप्त सुरक्षा पर ज़ोर दिया। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों द्वारा रखी गए कई संशोधन भी पारित किए गए. लेकिन वाम दलों समेत अन्य विपक्षी दलों के संशोधन पारित नहीं हुए। उधर राष्ट्रीय दल के नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने विधेयक का विरोध करते हुए एक अख़बार की ख़बर का हवाला दिया और कांग्रेस-भाजपा में इस मुद्दे पर सांठगाठ का आरोप लगाया। बहस में विपक्षी दलों के सदस्यों के उठाए कुछ मुद्दों का जवाब देते हुए प्रधामंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, ये कहना कि ये विधेयक भारत के हितों से समझौता करता है। या अमरीकी कंपनियों को मदद करता है, तथ्यों से दूर होगा. ये परमाणु भेदभाव की नीति को ख़त्म करता है। मनमोहन सिंह का कहना था कि उनके ख़िलाफ़ ये पहली बार नहीं कहा जा रहा कि अमरीका के दबाव में कोई क़दम उठाया जा रहा है। जब उन्होंने 1992 में वित्त मंत्री के तौर पर बजट पेश किया था तब भी ऐसे ही आरोप लगे थे।
भोपाल का हवाला : बहस को समाप्त करते हुए पृथ्वीराज चौहान ने कहा कि विधेयक में विपक्षी पार्टी भाजपा की आपत्तियों को सुना गया और सुझाए गए संशोधन को माना भी गया है। इस विधेयक के बाद भारत के शोध कार्यक्रमों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. उन्होंने कहा कि परमाणु विधेयक के ज़रिए परमाणु ऊर्जा का उत्पादन होगा जो साफ़ ईंधन है। इस विधेयक में किसी आपदा की स्थिति में मुआवजा़ जल्दी मिलने का भी प्रावधान किया गया है। इससे पहले चौहान ने कहा था कि इसकी ज़रूरत इसलिए हैं, ताकि यदि कोई हादसा होता है तो पीडि़त लोगों को दर-दर भटकना न पड़े और उन्हें मुआवज़ा मिल सके। भोपाल गैस त्रासदी का जि़क्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के किसी भी क़ानून के न होने के कारण पीडि़तों को अनेक दुख भोगने पड़े हैं। 28 देशों में पहले से ऐसे काऩून हैं लेकिन भारत और पाकिस्तान में ही ऐसा क़ानून नहीं है।
