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Saturday, May 28, 2011






आखिर कौन है दोषी? बोर्ड, खिलाड़ी या सिस्टम

हृ जैनेन्द्र कुमार

आईपीएल-४ के दिग्गज खिलाड़ी महेन्द्र सिंह धोनी, सचिन तेन्दुलकर, जहीर $खान, वीरेन्द्र सहवाग के वेस्टइंडीज़ दौरे पर न जाने से देशभर में एक बहस छिड़ गई है, कि क्या अब खिलाड़ी सि$र्फ पैसे के लिए खेलते हैं, और जब देश के लिए खेलने की बारी आती है तो विश्राम के नाम पर बैकफुट पर चले जाते हैं। किरण मोरे ने कहा है कि वल्र्डकप के दौरान गौतम गंभीर के चोट आने के बाद वे आईपीएल-४ और वेस्टइंडीज़ में नहीं खेलना चाहते थे, लेकिन बोर्ड के दबाव में गंभीर आईपीएल-४ में खेलने को राजी हुए थे। और अब बोर्ड ने गंभीर को ही वेस्टइंडीज़ दौरे की चुनी गई टीम का कप्तान भी बना दिया। ऐसा बोर्ड ने क्यों किया? यह भी महत्वपूर्ण सवाल है। अब जब कि गौतम गंभीर की चोट ज़्यादा गंभीर हो गई है, तो बीसीसीआई ने चोरी और सीना ज़ोरी की तर्ज पर गंभीर से स$ख्त नाराज़ी जताई है, और कहा है, कि गंभीर अपनी चोट छिपाकर आईपीएल में लगातार क्यों खेलते रहे, जबकि गंभीर ने कहा है कि कोलकाता नाइट राइडर्स के टीम प्रबंधन ने उनकी चोट के गंभीर होने की जानकारी नहीं दी, और उन्हें लागातार आईपीएल मैचों में खिलाते रहे। आखिर क्या है वर्तमान क्रिकेट, क्रिकेटर्स और बोर्ड की सच्चाई इसी की पड़ताल करती रिपोर्ट।
इसी साल धोनी की कप्तानी में टीम इंडिया ने वल्र्ड कप जीत कर इतिहास रचा है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। इसके $खत्म होने के कुछ ही दिनों बाद ८ अप्रैल २०११ से आईपीएल-४ की शुरुआत हो गई। आईपीएल का आ$िखरी और $फाइनल मैच २८ मई २००१ को खेला जाएगा और इसी के साथ आईपीएल का समापन होगा। इसके बाद ४ जून से शुरू होने वाले वेस्टडंडीज़ दौरे के लिए टीम की घोषणा कर दी गई है। टीम इंडिया के क प्तान भरोसेमंद बैट्समैन माने जाने वाले गौतम गंभीर होंगे। इस दौरे के लिए उप कप्तान सुरेश रैना को बनाया गया है। इसके अलावा टीम में पार्थिव पटेल, विराट कोहली, युवराज सिंह, एस. बद्रीनाथ, रोहित शर्मा, हरभजन सिंह, आर. अश्विन, प्रवीण कु मार, ईशांत शर्मा, मुनाफ पटेल, विनय कुमार, यूसुफ पठान, अमित मिश्रा और वर्धिमान शाह को शामिल किया गया है। सचिन तेन्दुलकर, महेन्द्र सिंह धोनी और ज़हीर खान को आराम दिया गया है, जबकि वीरेंद्र सहवाग अनफिट होने की वजह से वेस्ट इंडीज़ दौरे पर नहीं जा सकेंगे। टीम इंडिया एक ट्वंटी-ट्वंटी मैच और पांच एक दिवसीय मैच वेस्टइंडीज़ की टीम के $िखला$फ उनके ही मैदानों पर खेलेगी। हालांकि, अब वेस्टइंडीज़ जाने वाली भारतीय टीम के कप्तान गौतम गंभीर का चोट के कारण इस दौरे पर जाना संदिग्ध हो गया है। आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स की कप्तानी संभाल रहे गंभीर ने रविवार, २२ मई को मंबई इंडियंस से मैच के दौरान कंधे में दर्द की शिकायत की थी। मंगलवार २४ मई को उनका एमआरआई स्कैन किया गया, जिससे उनके दाएं कंधे में चोट के गंभीर होने का पता लगा है। गंंभीर को यह चोट वल्र्डकप फाइनल के दौरान लगी थी। उस मैच में गंभीर ने ९७ रन बनाए थे। आईपीएल में भी मुंबई इंडियंस के विरुद्ध खेलते हुए फील्डिंग के दौरान उनके कंधे में ज़ोर का झटका लगा था, जिसे बाद उन्हें कराहते हुए देखा गया था। हालांकि, वे इसके बाद भी मुंबई इंडियंस के विरुद्ध एक और मैच खेले। इस मामले में शाहरु$ख $खान और कोलकाता नाइट राइडर्स टीम प्रबंधन से गौतम गंभीर नाराज़ हैं। गंभीर का कहना है कि टीम प्रबंधन ने उन्हें कंधे की चोट गहराने की जानकारी नहीं दी और वे लगातार १५ मैच खेलते रहे। बीसीसीआई के सचिव एन.श्रीनिवासन की मानें तो कोलकाता नाइट राइडर्स के $िफजि़यो एंड्यू लीपस ने बोर्ड को लिखित जानकारी दी है, कि गंभीर के लिए कम से कम छह सप्ताह का आराम ज़रूरी है। इस मामले में चयन समिति के दो पूर्व अध्यक्षों की राय भी $काबिले $गौर है। किरण मोरे कहते हैं, कि लगातार खेलने के बजाय गंभीर कुछ मैचों में आराम करते तो चोट नहीं गहराती। वे इंडीज़ दौरे पर जाना नहीं चाहते थे, और न ही आईपीएल में खेलना चाहते थे। बोर्ड के दबाव में राजी हुए थे। दिलीप वेंगसरकर का कहना है कि यदि गौतम की चोट गंभीर होती तो वे आईपीएल-४ में ३५० से ज़्यादा रन कैसे बनाते। बाद में दर्द ज़्यादा बढ़ा तब गंभीर परेशान हुए। वैसे इस मामले में कार्रवाई की संभावना नहीं है। इससे इतर आईपीएल-४ में गंभीर ११ करोड़ रुपए में बिके थे। गंभीर ने चोट के बावजूद टीम के सभी १५ मैचों में हिस्सा लिया और ३७८ रन बनाए। बीसीसीआई इस बात से भी स$ख्त नाराज़ हैं, कि गंभीर की चोट के बारे में नाइटराइडर्स प्रबंधन ने उन्हें अंधेरे में रखा और जोखिम के बावजूद लगातार मैच खिलाता रहा। टीम इंडिया के सलामी बल्लेबाज वीरेन्द्र सहवाग भी $िफलहाल कंधे की चोट से उबर नहीं पाए हैं। उनके कंधे की इसी महीने की शुरुआत में लंदन में सर्जरी की गई थी। हालांकि, इस सबके बावजूद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की राष्ट्रीय चयन समिति के अध्यक्ष कृष्णामचारी श्रीकांत ने विश्वास जताया है कि टीम इंडिया ४ जून, २०११ से शुरू होने वाले वेस्टइंडीज़ दौरे में शानदार प्रदर्शन करेगी। हालांकि, उन्होंने गौतम गंभीर के खेलने के सवाल पर चुप्पी साध ली। सारे मामले पर नज़र डालने के बाद कुछ बातें सोचने पर मजबूर करती हैं।
पहली- वल्र्ड कप, फिर आईपीएल-४ और अब वेस्टइंडीज दौरा-आ$िखर क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ी भी तो हाड़मास के बने इंसान ही हैं। उन्हें भी थकान होती है, उन्हें भी चोट लगती है, उन्हें भी आराम की ज़रूरत होती है, फिर क्यों बीसीसीआई लगातार क्रिकेटर्स से ये उम्मीद करती है, कि वे सबकुछ भुलाकर बस क्रिकेट ही खेलते रहें।
दूसरी- वल्र्डकप खेलने के दौरान जब गंभीर के कंधे में चोट लग गई थी और वे आईपीएल-४, वेस्टइंडीज़ दौरे में खेलने के इच्छुक नहीं थे, फिर क्यों बीसीसीआई ने न सि$र्फ आईपीएल-४ में खेलने का गौतम गंभीर पर दबाव डाला, बल्कि उन्हें वेस्टइंडीज़ दौरे में टीम इंडिया का कप्तान बनाकर सारी जि़म्मेदारी उन्हीं के कंधों पर डाल दी। क्या बीसीसीआई पर भी आईपीएल टीमों के मालिकों जो कि रसू$खदार भी हैं, का दबाव था, इसलिए उसने ऐसा किया और कहीं यह बात सामने न आ जाए इसलिए वेस्टइंडीज़ दौरे में कप्तानी की जि़म्मेदारी गौतम गंभीर को सौंपी।
तीसरी- धोनी, सचिन और ज़हीर खान जब बिलकुल फिट हैं और आईपीएल-४ में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया है तो उन्हें बीसीसीआई ने वेस्टइंडीज़ दौरे की टीम में शामिल क्यों नहीं किया और क्यों उन्हें विश्राम दिया गया?
चौथी- क्या बीसीसीआई ये समझती है, कि एक क्रिकेटर के लिए सबकुछ सि$र्फ क्रिकेट ही हो सकता है? क्या क्रिकेटर्स को समाज और अपने परिवार के प्रति अपनी जि ोदारियों को पूरा करने के लिए समय नहीं चाहिए? और अगर इन बातों से बीसीसीआई इत्तेफाक रखती तो क्यों वो लगातार क्रिकेटर्स से क्रिकेट खेलने की उम्मीद करती है और उन्हें क्रिकेट खेलने के लिए दबाव डालती है।
पांचवीं- गौतम गंभीर की चोट की गंभीरता को छिपाने वाले कोलकाता नाइट राइडर्स के टीम प्रबंधन और टीम के मालिक के विरुद्ध बीसीसीआई अब कोई स त कदम उठाएगी, जिससे कि गंभीर जैसी परेशानी का सामना किसी और खिलाड़ी को भविष्य में न करना पड़े।
छठी- अगर वेस्टइंडीज़ दौरे पर टीम इंडिया बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाती है, तो कौन जि़म्मेदार होगा। उन्हें लगातार क्रिकेट खिलाने वाली बीसीसीआई या टीम इंडिया और क्रिकेटर्स की थकान और चोटें।



शिवराज का साहस नीतीश की नेकनीयत
हृ शेष नारायण सिंह

शिवराज सिंह चौहान ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में यह बयान देकर चौंका दिया है कि देश के ऊपरी सदन को $खत्म कर दिया जाना चाहिए। शिवराज सिंह के इस बयान की भले ही कुछ लोग आलोचना करें, लेकिन शिवराज सिंह चौहान ने बहुत सटीक बात कही है। इसी तरह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधायक निधि को भंग करके बहुत साहसिक और ऐतिहासिक काम किया है। निश्चित रूप से इन राजनीतिज्ञों की यह समझ और पहल राजनीति को भ्रष्टाचार से उबारने में मदद करेगी। भ्रष्टाचार अपने देश के सामाजिक ताने बाने में बुरी तरह से घुस चुका है। घूस में की गयी चोरी को बाकायदा कमाई कहा जाता है। अंग्रेज़ों के दौर में संस्था का रूप हासिल करने वाली संस्कृति को आज़ादी के बाद नौकरशाही ने घूस की संस्कृति में बदल दिया। आज़ादी के संघर्ष में शामिल नेताओं के जाने के बाद जो नेता राजनीति में आये उनके लिए घूस एक मौलिक अधिकार की शक्ल ले चुका था। नेता जब घूस$खोर होगा तो अ$फसरों और सरकारी कर्मचारियों को घूसजीवी बनने से रोक पाना नामुमकिन है। घूस में मिली र$कम के बल पर लोग ऐशोआराम की जि़ंदगी बसर करते हैं, और कहीं चूँ नहीं होती। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में ऐसे लोग मुख्य सचिव बना दिए जाते हैं जिनको महाभ्रष्ट के रूप में मान्यता मिल चुकी होती है। नेताओं के बच्चों की शादियों में करोड़ों रूपये खर्च किये जाते हैं और कोई नहीं पूछता कि यह पैसा कहाँ से आया। अब तक भ्रष्टाचार वही माना जाता रहा है, जो पकड़ लिया जाय और मुक़दमा कायम हो जाए। आम तौर पर इन मुक़दमों में अभियुक्त बच ही निकलता है।
भ्रष्टाचार के कारणों की जांच नहीं की जाती, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस दिशा में पहला क़दम उठा लिया है। उन्होंने बिहार स्पेशल कोर्ट्स एक्ट 2010 के तहत अफसरों की उन संपत्तियों को ज़ब्त करना शुरू कर दिया है, जो घूस की कमाई से खरीदी गयी हैं। इस मामले में पहला शिकार पकड़ा भी जा चुका है और उसकी 44 लाख रूपये की संपत्ति सरकारी कब्ज़े में ली जा चुकी है। ज़ाहिर है कि अगर अफसरों में यह डर समा गया कि घूस से बनायी गई संपत्ति बाद में भी सरकारी कब्ज़े में आ जायेगी तो घूस के प्रति मोह कम होगा। अगर उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह का काम शुरू हो जाए तो भ्रष्टाचार पर निर्णायक काबू पाने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है। नीतीश कुमार ने दूसरा अहम काम भी किया है। उन्होंने विधायकों को मिलने वाली उस र$कम को भी रद्द करने का फैसला कर लिया है, जो विधायक निधि के नाम पर क्षेत्र के विकास के लिए दी जाती है। इसी रक़म से विधायक लोग अपने चेलों को पालते हैं, विधायक निधि से कमीशन लेते हैं, और भ्रष्टाचार का माहौल बनाते हैं। उसी निधि से अफसर भी अपना हिस्सा लेते हैं और सरकारी पैसे को पूरी तरह से नंबर दो का बना देते हैं। कुछ सम्मानजनक अपवाद भी हैं।
एक उदाहरण तो अरुण शौरी का ही है। उत्तर प्रदेश से राज्यसभा का सदस्य बनने के बाद उन्होंने सरकार से अनुमति मांग कर अपनी सांसद निधि को आईआईटी कानपुर में एक महत्वपूर्ण प्रयोगशाला बनाने के लिए दे दिया। 6 साल के कार्यकाल में उन्हें 12 करोड़ रूपये मिलने थे, कुछ सरकारी मदद लेकर एक संस्था की स्थापना हो गयी लेकिन इस तरह के उदाहरण बहुत कम हैं।
ज़्यादातर लोग तो विकास निधि को अपनी नंबर दो की कमाई ही मानते है। इसकी उत्पत्ति भी बहुत ही अजीब तरीके से हुई थी। सांसदों को अपने साथ रखने के चक्कर में भ्रष्ट प्रधान मंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने सांसद निधि को शुरू किया था। बाद में विधायकों के लिए भी राज्य सरकारों ने व्यवस्था कर दी। अब तो भ्रष्टाचार का माहौल बनाने में इसी निधि का सबसे अहम योगदान है। बिहार में इस घूस की जननी को ख़त्म करने की शुरुआत हुई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बाकी देश में भी यह उदाहरण लागू किया जायेगा। एक अन्य मुख्यमंत्री ने भी भ्रष्टाचार की जड़ों में म_ा डालने की एक आइडिया का जि़क्र किया है।
भोपाल में चुनाव सुधारों के लिए आयोजित एक बैठक में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, शिवराज सिंह ने बहुत बुनियादी बात कही। उन्होंने कहा कि संसद का जो ऊपरी सदन है, वह भ्रष्टाचार के लिए आजकल बहुत बड़ी खाद का काम करने लगा है। देखा गया है कि राज्य सभा में अब वे सारे लोग पंहुच रहे हैं जो पैसा देकर टिकट लेते हैं और विधायकों को पैसा देकर उनकी वोट खरीदते हैं। शराब के व्यापारी, सत्ता के दलाल, अन्य बे-ईमानी का काम करने वाले लोग राज्य सभा में पंहुच रहे हैं, और ऐलानियाँ ऐसा काम कर रहे हैं, जो किसी भी कीमत पर सही नहीं है।
आम आदमी के विरोध में जो भी नीतियाँ बन रही हैं, यह लोग उसे समर्थन दे रहे हैं। शिवराज सिंह ने कहा कि राज्य सभा को ही ख़त्म कर देना चाहिए। लोकसभा जनहित और राष्ट्र हित के सभी $फैसले लेने के लिए सक्षम है। ज़ाहिर है कि यह विचार मौलिक परिवर्तन की बात करता है, और भ्रष्टाचार के प्रमुख कारणों को दबा देने की ताक़त रखता है।
इस बात में दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए राजनीतिक पहल के लिए ज़रूरत है और निहित स्वार्थ वाले उसका पूरी तरह से विरोध करेगें। लेकिन अगर भ्रष्टाचार पर सही तरीके से हमला किया गया, तो देश के विकास को बहुत बड़ी शक्ति मिल जायेगी।

Saturday, May 21, 2011






मिटा डालो..........खाप पंचायतों के $खौ$ को
हृ जैनेन्द्र कुमार
कहने को तो भारत में संविधान लागू है, विधि का शासन है और कानून के समक्ष राष्ट्रपति से लेकर आम आदमी तक सब बराबर हैं, लेकिन खाप पंचायत भारत की कानूनी छवि को चुनौति देती नज़र आती हैं। देश के कुछ $खास हिस्सों में रहने वालों के ज़ेहन में सि$र्फ खाफ का $खौ$फ होता है, क्योंकि उनके लिए जि़ंदगी और मौत दोनों खाप पंचायतें ही तय करती हैं। कानून, प्रशासन, पुलिस व्यवस्थाएं वहां लुंज-पुंज और बेचारी नजर आती हैं। इस्लामी मज़हब के मसीहा आएदिन बे सिर-पैर के $फतवे जारी करते रहते हैं, कुछ इन्हीं की तजऱ् पर ही खाप पंचायतें भी काम करती नज़र आती हैं।
मसलन हाल ही खाप पंचायतों ने लड़कियों के जींस पहनने पर पाबंदी लगा दी है। अगर एक ही गोत्र के लड़का-लड़की शादी कर लें और उस शादी में उनके परिजनों की मजऱ्ी हो तो भी खाप पंचायतें उन्हें न केवल भाई-बहन घोषित कर देती हैं, बल्कि अमुक दंपती को भाई-बहन की तरह ही रहने के लिए मजबूर भी किया जाता है, और खाप के ऐसे $फैसले का उल्लंघन करने पर कभी उन्हें जात बाहर कर दिया जाता है, और कभी इतने पर भी संतोष न कर उनके ही परिजनों पर इतना दबाव डाला जाता है, कि इज्ज़त के नाम पर वे अपने ही बेटे-बेटी या भाई-बहन का बेरहमी से कत्ल कर देते हैं, और ऐसा करने में शान समझी जाती है। इसे आमतौर पर ऑनर किलिंग यानी इज्ज़त के लिए की गई हत्या के रूप में जाना जाता है और खाप पंचायतों के सर्वेसर्वा ऐसा करने वालों की पीठ थपथपाते नहीं थकते। इसी तरह अगर शादी करने वाले अलग-अलग जातियों से होते हैं-$खासकर उनमें से एक पक्ष अगर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का होता है तब तो उस प्रेमी जोड़े को विवाह करने से पहले मारना ही खाप पंचायत की नाक का सवाल बन जाता है और अमूमन ऐसे जोड़ों को बेरहमी और बर्बरता से सार्वजनिक तौर पर मार दिया जाता है, ताकि दूसरे युवा भी उनकी मौत से सबक ले सकें, और कोई ऊंची जाति वाला किसी नीची जाति वाले या नीची जाति वाला किसी ऊंची जाति वाले से प्रेम करने की हिमाकत ना करे। सदियों से ऐसा होता आ रहा है और आगे भी इसके थमने के कोई आसार नज़र नहीं आते। हालांकि, जब कभी भी ऑनर किलिंग के मामले होते हैं-मीडिया तूल ज़रूर देता है, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया लाइव कवरेज दिखाता है, तो प्रिंट मीडिया भी ऑनर किलिंग पर खोजपरक रपट लिखता है, लेकिन इसके बावजूद होता-जाता कुछ नहीं है। आज तक कभी भी खाप पंचायतों के अलंबरदारों और ऑनर किलिंग के दोषियों को सज़ा नहीं दी जा सकी है।
इसके पीछे दलील यही दी जाती है कि सबूतों और साक्ष्यों के अभाव में दोषी बच निकलने में कामयाब होते हैं, लेकिन इससे इतर सच्चाई यह है कि खाप पंचायत के $खौ$फ पर नकेल कसने के लिए न तो सरकारी मशीनरी प्रभावी कदम उठाने में रुचि लेती है, न ही समाज के रसू$खदार ऑनर किलिंग को बुराई के रूप में देखते हैं। यहां तक कि मीडिया का भी एक $खास तबका खाप के मामले में मौन साधना ही ज़्यादा बेहतरी समझता है।
इसकी कई वजहें हैं-पहली, खाप पंचायतों के क्षेत्र में काम करने वाले पुलिसक र्मियों, पुलिस के आला अधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों में से ज़्यादातर स्थानीय जाति-समाज से संबंधित लोग ही होते हैं, ऐसे में वे खाप पंचायतों पर नकेल कसने के बजाय उन्हें मूक समर्थन देने में ही $खुद की भलाई समझते हैं। दूसरी बात उनकी सोच भी ऐसी ही होती है, कि वे स्वाभाविक तौर पर खाप को $गलत नहीं समझते। तीसरी, खाप क्षेत्रों में स्थानातंरित होकर आए प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी संख्याबल में कम होने के कारण खाप की मनमानी को मूक दर्शक बने देखते रहते हैं। अगर कोई अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर खाप पंचायतों के अमानुषिक $फैसलों और बर्बर कृत्यों को अपने स्तर पर रोकने की कोशिश करता है तो या तो उसका तबादला कर दिया जाता है, या उसे भी डरा-धमका कर चुप करा दिया जाता है। चौथी और सबसे अहम वजह यह है कि खाप पंचायत आमतौर पर जाति पंचायतें होती हैं। कई बार तो खाप पंचायत इतनी बड़ी होती हैं कि उसमें तीस-चालीस गांव या जहां तक उस अमुक जाति के लोग होते हैं वहां तक एक ही खाप पंचायत के हुक्म की बिना सोचे-समझे तामील की जाती है। ऐसे में खाप पंचायतों को $खुश रखकर राजनेता अपना वोट बैंक बढ़ाने की कोशिशों में लग रहते हैं। कोई भी राजनेता या राजनीतिक पार्टी खाप पंचायतों की मु$खाल$फत कर एक बड़े वोट बैंक को अपने हाथ से निकलने नहीं देना चाहती। ऐसे में कभी प्रत्यक्ष रूप से तो बहुधा परोक्ष रूप से राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं का वरद हस्त खाप पंचायत के सर्वेसर्वाओं पर रहता है। ऐसे में इस बात का सवाल ही नहीं उठता कि समय के साथ खाप पंचायतें कमज़ोर हों या ऑनर किलिंग के मामलों में कमी आए। सच तो यह है कि भारतीय समाज शुरू से ही जातियों-उपजातियों और गोत्रों में बंटा रहा है, ऐसे में भारतीय राजनीति भी जातिगत राजनीति के संरक्षण में ही पल्लवित-पुष्पित होती रही है। इस तरह पहले राजनीति वोट की राजनीति में तब्दील होती है, फिर जातीय राजनीति के रूप में बदल जाती है, और सबसे निचले स्तर तक उतरते उतरते यही राजनीति खाप राजनीति या खाप पंचायत का रूप धारण कर लेती है। ऐसे में राजनीति खाप के $खौ$फ को दिनों दिन और मज़बूत ही कर रही है, बजाय उसे कमज़ोर करने के।
खाप पंचायत के बारे में कुछ तथ्य
खाप पंचायतों का अस्तित्व मुख्यत: पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी राजस्थान, हरियाणा और तमिलनाडु में है। तमिलनाडु में खाप पंचायतों को कट्टा पंचायत के नाम से जाना जाता है। ये पंचायतें अपने आदेश मनवाने के लिए ऑनर किलिंग, हुक्का-पानी बंद करना, गांव/समाज/जात/बिरादरी से निकालने और लेने-देने पर रोक लगाने का काम करती हैं। इनकी कोई वैधानिक स्थिति नहीं है, अत: खाप पंचायतें पूर्णत: अवैधानिक हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई उम्मीद की किरण
लंबे इंतज़ार के बाद आ$िखर १९ अप्रैल, १९११को खाप पंचायतों को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण $फैसले में खाप पंचायतों को अवैध करार देते हुए उन्हें स$ख्ती से बंद करने के कहा है। कोर्ट ने ऑनर किलिंग को बर्बर और शर्मनाक बताया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इसकी आड़ में होने वाली ज़्यादतियों को रोकने में विफल प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया जाए। जस्टिस मर्कंडेय काटजू और ज्ञानसुध मिश्रा की बैंच ने एक $फैसले में ये सख्त टिप्पणियां कीं। बैंच ने कहा कि उसने हाल ही के सालों में खाप पंचायतों (तमिलनाडु में कट्टा पंचायतों) के बारे में सुना है। ये विभिन्न जाति व धर्मों के विवाहित या विवाह की इच्छा रखने वाले युवक-युवतियों के $िखला$फ ऑनर किलिंग या अन्य ज़्यादतियों को बढ़वा देती हैं। ये लोगों की निजी जि़ंदगी में दखल देती हैं। बर्बर हत्या के बारे में बैंच के अनुसार-हमारा मानना है कि यह पूरी तरह से अवैध हैं। इसे तत्काल बंद करवाया जाना चाहिए । ऑनर किलिंग में कुछ भी सम्मानजनक नहीं है। हकीकत में यह बर्बर तथा शर्मनाक हत्या है। कोर्ट ने कड़े उपाय करने पर भी ज़ोर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खाप पंचायतों की ज़्यादतियों को रोकने के लिए प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को कड़े उपाय करने चाहिए। यदि ऐसी कोई घटना होती है तो इसके लिए जि़म्मेदार लोगों के $िखला$फ $फौजदारी प्रक्रिया शुरू की जाए। राज्य सरकार को संबंधित जि़ले के मजिस्ट्रेट/कलैक्टर और एसएसपी/एसपी जैस अन्य अधिकारियों को निलंबित करने और चार्जशीट दायर करने के आदेश दिए जाएं। बैंच ने यह भी कहा कि यदि पूर्व सूचना के बावजूद अधिकारी ऐसी घटनाओं को रोक नहीं पाते हैं, तो सरकार को उनके $िखला$फ विभागीय कार्यवाही करनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इस फैसले की प्रति सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेश के प्रमुख सचिवों, गृह सचिवों, डीजीपी व अन्य बड़े अधिकारियों को भेजी जाएं।
इसके बिना खाप का $खौ$ नहीं होगा कम
सुप्रीम कोर्ट ने जो $फैसला सुनाया और पहल की वह प्रशंसनीय है, लेकिन इतिहास गवाह है कि कानून बनाने या लिखत-पढ़त की कानूनी रोक-बांध से कभी भी देश की रूढिग़त कुपंरपराओं पर लगाम नहीं लगाई जा सकी है। कानून आमतौर पर बुद्धिजीवियों की वैचारिक जुगाली, विधानसभा और लोकसभा में बहस और किताबों की शोभा बढ़ाने तक ही सिमट कर रह जाते हैं। किसी भी बड़े बदलाव के लिए और $खासतौर से शताब्दियों से समाज में गहरे पैठी खाप पंचायतों सरीखी मज़बूत कुपंरपराओं को जड़मूल से नष्ट करने के लिए पूरे देश को एकजुट होकर प्रयास करने होंगे, तभी देश के माथे से खाप रूपी कलंक को धोना संभव हो पाएगा।
पहली बात- देश में तमाम समाज सेवी, जिनमें अन्ना हज़ारे, अरुणा रॉय जैसी नामचीन श$िख्सयतों का भी शुमार होता है। सभी समाज सेवियों को चाहिए कि वे एकजुट होकर खाप पंचायतों को समूल उखाड़ फेंकने के लिए अपनी अपनी सामथ्र्यानुसार देशभर में आंदोलन चलाएं और सभी को खाप पंचायतों की करतूतों से वाकि$फ कराने के साथ ही खाप पंचायतों की मु$खाल$फत करने के लिए जन साधारण को जागरूक करें। अगर सभी समाज सेवी अपनी पूरी सामथ्र्य से खाप पंचायतों के अस्तित्व को $खत्म करने का बीड़ा उठा लें और देशव्यापी आंदोलन चलाते हुए साधारण और युवा शक्ति को अपने साथ मिला लें, तो कोई सवाल ही नहीं उठता कि खाप के $खौ$फ से आम जनता को निजात नहीं मिले।
दूसरी बात- अमतौर पर कोई भी अवैधानिक या अमानुषिक कृत्य होता है तो मानवाधिकर वाले चिल्ला-चिल्लाकर आसमान सिर पर उठा लेते हैं, लेकिन जब खाप पंचायतें ऑनर किलिंग को अंजाम देती हैं, तब ये मानवाधिकर वाले न जाने कहां घोड़े बेच कर सो जाते हैं। खाप पंचायतों की मु$खाल$फत के लिए मानवाधिकार आयोग को भी अपने स्तर पर पूरी ताकत झोंकनी होगी।
तीसरी बात- $िफल्मी हस्तियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाडिय़ों को चाहिए कि वे खाप पंचायतों को आमूल-चूल नष्ट करने के लिए प्रभावी कदम उठाएं। चूंकि $िफल्मी और खेल जगत की सैलेब्रिटीज़ को ही आज का युवा अपना आइडियल मानता है, ऐसे में अगर ये युवा शक्ति और अपने $फैंस से एकजुट हो खाप पंचायतों की मु$खाल$फत करने के लिए एकजुट हो आंदोलन चालने और खाप के ठेकेदारों को सबक सिखाने के लिए आह्वान करें तो निश्चित ही नतीजे सुखकारक होंगे।
चौथी बात- चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों को अपने वोट बैंक का लालच छोड़कर खाप पंचायत के नाम पर सरेआम बर्बरता से युवा प्रेमी-प्रेमिकाओं को जि़ंदा जलाने या किसी अन्य अमानुषिक तरीके से मासूम, निर्दोष प्रेमी जोड़ों की हत्या करने वालों या अन्य सामाजिक अथवा जातीय बंधन लगाने वाले खाप पंचायत के मुखियाओं/रसू$खदारों को उचित दंड देने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे, तब ही समाज को खाप रूपी नासूर से निजात मिलना संभव है।
पांचवीं बात- देश-दुनिया में बसे स्वदेसी धनकुबेरों को भी खाप पंचायतों पर लगाम लगाने के लिए आर्थिक मदद देने के साथ ही राजनीतिज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों पर खाप पंचायतों पर नकेल कसने के लिए दबाव बनाना होगा, क्योंकि राजनीति और राजनीतिज्ञों पर दबाव समूहों का प्रभावी असर होता है, और वे दबाव समूह की अनदेखी नहीं कर सकते।


महिला एवं बाल विकास विभाग में नियुक्तियों में मनमानी
परियोजना अधिकारियों एवं जि़ला कार्यक्रम अधिकारी की सांठगांठ से अपात्रों का चयन
हृ अनूप सक्सेना
राजगढ़। ग्राम पीपल्दी तहसील जीरापुर में आंगनवाड़ी केन्द्र पर सहायिका पद पर श्रीमति मंजू बाई पत्नि नारायण सिंह का नियुक्ति आदेश जो 5.4.2010 को परियोजना अधिकारी एकीकृत बाल विकास परियोजना जीरापुर द्वारा जारी किया गया था, उस आदेश के विरूद्ध धापूबाई पति रोशन सिंह द्वारा क्लेक्टर न्यायालय में प्रस्तुत अपील के दौरान पूर्व क्लेक्टर लोकेश जाटव ने परियोजना अधिकारी के विरूद्व गंभीर अनियमितताओं की पुष्टी कर विभागीय जांच संस्थित करने का आदेश दिया गया था। तत्कालीन कलेक्टर महोदय के स्थानांतरण के बाद क्लेक्टर न्यायालय का यह निर्णय महिला एवं बाल विकास विभाग के नीति निर्धारकों के लिये रद्दी का$गज़ से अधिक कुछ भी नहीं है और ज़ीरापुर के तत्कालीन परियोजना अधिकारी के विरूद्ध किसी भी प्रकार की कोई जांच अस्तित्व में नहीं आ सकी है। इस प्रकरण में अपीलार्थी धापूबाई द्वारा अधिवक्ता के माध्यम से क्लेक्टर न्यायालय में तर्क दिये गये, कि मंजूबाई कक्षा चौथी पास है। उसे नियुक्ति की पात्रता नहीं है, मंजूबाई का नाम ग्राम पीपल्दी की मतदाता सूची में भी नहीं है, न ही राशन कार्ड में नाम है। मंजूबाई समय की मांग की व निर्धारित समय तक कोर्ट के समक्ष लिखित में कुछ भी पेश नहीं कर सकी। क्लेक्टर न्यायलय ने माना कि ग्राम पीपल्दी की अंतिम सूची 18.7.2008 को जारी होने के बाद नियुक्ति आदेश 5.4.2010 को जारी किया गया। सूची जारी होने के बाद प्रकरण जि़ला स्तरीय आपति दावा निराकरण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाना था जो नहीं किया गया, अत्यन्त आपत्तिजनक है। अत: क्लेक्टर न्यायलय के निर्णय दि, 28.9.2010 में जि़ला स्तरीय आपति दावा निराकरण समिति के अनुमोदन के बिना नियुक्ति आदेश जारी करने के कारण संबंधित परियोजना अधिकारी एकीकृत बाल विकास परियोजना जीरापुर के विरूद्व विभागीय जांच अधिकारी तथा अनुविभागीय अधिकारी खिलचीपुर को प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्ति किया था।
क्लेक्टर न्यायलय ने जि़ला कार्यक्रम अधिकारी महिला एवं बाल विकास ( तत्कालीन ) शेल श्रीवास्तव के कृत्य को भी गंभीर अनियमितता माना क्लेक्टर न्यायलय द्वारा मजंूबाई की नियुक्ति निरस्त करने के बाद विज्ञप्ति जारी कर नई नियुक्ति के आदेश दिये गये। विभागीय जांच की जानकारी लेने के लिये जब प्रभारी जि़ला महिला बाल विकास अधिकारी डिप्टी क्लेक्टर नीता राठौर को उनके मोबाइल क्र 0942481654 पर दिनांक16.5.2011 का दोपहर 12.48 पर प्रयास किया।
अपने कक्ष में बैठे रहने के बावजूद उनके द्वारा मोबाइल रिसीव नहीं किया गया। क्लेक्टर कार्यालय में नीता राठौर के पास विभागीय जांच का भी जि़म्मा है। समाज के चौथे स्तंभ से उनका दूरीयां बनाकर रखना महिला एवं बाल विकास विभाग जैसे राजगढ़ में बदनाम रहे विभाग को उनके द्वारा निष्पक्ष चलाये जाने पर प्रश्न चिन्ह निश्चित तौर पर लगता है।
ग्रम सेमलीकलां तहसील खिलचीपुर जि़ला राजगढ़ में म.प्र. शासन के निर्देशानुसार आंगनवाड़ी केन्द्र पर कार्यकर्ता पद पर संजू पति होकमचन्द्र मालवीय की नियुक्ति की गई। इसके विरूद्ध ज्योति पति महेन्द्र शर्मा द्वारा आपत्ति प्रस्तुत की गई कि संजू मालवीय का मूल निवासी $फजऱ्ी है, संजू मालवीय का पति राजस्थान पुलिस में आरक्षक होकर ग्राम जूलागढ़ जि़ला झालावाड़ मे रहते है व संजू पति होकमचन्द्र के पास दोनों स्थानों के राशनकार्ड हैं। जिला स्तरीय दावा आपत्ति एवं निराकरण समिति द्वारा जांच उपरांत संजू मालवीय के मूल अभिलेख चेक किये गये व सही पाये गये। 16.12.2000 को परियोजना अधिकारी एकीकृत बाल विकास परियोजना खिलचीपुर के आदेश क्रं. 664 से संजू मालवीय को नियुक्ति दी गई। इस नियुक्ति के विरूद्ध ज्योति शर्मा द्वारा कलेक्टर न्यायालय में अपील प्रस्तुत करने पर अपने वकील के माध्यम से होकमचन्द्र मालवीय को शासकीय कर्मचारी सिद्ध कर पदस्थापना झालावाड़ जि़ले में होना सिद्ध पाया गया। यह भी सिद्ध किया गया कि संजू लावीय का नाम बी.पी.एल सूची में नहीं है, फिर भी 10 अंक नियम विरूद्ध दिए गए हैं।
तत्कालीन कलेकटर लोकेश जाटव ने अपने निर्णय मे लिखा कि संजू मालवीय के द्वारा प्रस्तुत अभिलेखों से उसके ग्राम पंचायत सेमलीकला की स्थानीय निवासी होने की पुष्टी नहीं होती है।
इस संबंध में दावाआपत्ति निराकरण समिति के निर्णय का अवलोकन किया गया उल्लेखित है, कि संजू पति होकमचन्द्र का चयन नियमानुसार नहीं है। प्रकरण में पुन: जांच की जाये।
मूल प्रकरण में पृष्ठ 69 में जि़ला स्तरीय आपत्ति द्वारा निराकरण समिति के निर्णय उपरांत पृथक हेण्ड राईटिंग में लिखा गया, कि 5.12.2009 की बैठक में जांच उपरांत संजू पति होकमचन्द्र के मूल अभिलेख चेक किये गये, सही पाये गये। संजू मालवीय का नियुक्ति आदेश जारी करें। इस पर जि़ला कार्यक्रम अधिकारी शैल् श्रीवास्तव के हस्ताक्षर है कलेक्टर न्यायालय ने माना कि जि़ला स्तरीय आपत्ति दावा निराकरण समिति द्वारा पारित निर्णय के पालन मे मात्र जि़ला कार्यक्रम अधिकारी म.बा.वि. द्वारा ही मनमाने तरीके से जांच की गई इसकी पुष्टी जिलाचयन समिति से नही कराई गई नियुक्ति आदेश भी जारी कर दिया कलेक्टर द्वारा जि़ला कार्यक्रम अधिकारी म.बा.वि. (तत्कालन) शैल श्रीवास्तव के विरूद्ध प्रमुख सचिव महिला एवं बाल विकास विभाग म.प्र. शासन को पत्र क्र/मबावि/प्ब्क्ै/2010/3229 दिनांक 28.09.2010 लिखकर यथोचित कार्यवाही करने का अनुरोध किया तथा खिलचीपुर के तत्कालीन परियोजना अधिकारी एकीकृत बाल विकास परियेाजना के .सी. तिवारी को पत्र क्रं./मबावि/प्ब्क्ै/2010/3223 दिनांक 28.09.2010 के द्वारा कारण बताओ सूचना पत्र जारी कर जवाब मांग गया।
कलेक्टर न्यायालय के आदेश के बाद ज्योति शर्मा को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता नियुक्त कर दिया, परन्तु परियोजना अधिकारी एवं जि़ला कार्यक्रम अधिकारी के विरूद्ध जि़ला स्तर से लेकर शासन स्तर तक कोई कार्यवाही नहीं हो सकी।


लाल किला ध्वस्त कांग्रेस का हाथ मज़बूत
हाल ही में हुए पांच राज्यों के चुनावों के परिणामों पर नजर डालें तो सा$फ हो जाता है कि मतदात ने इस बार पैसा, जाति, शराब को दरकिनार कर काम करने वालों को सिरआँखों पर बिठाया है, वहीं आमजन के विरोध में काम करने वालों और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे दा$गी नेताओं का स$फाया करने में दिलचस्पी लेकर यह सा$फ कर दिया है कि आज भी लोकतंत्र में लोक के हाथ में ही तंत्र की कमान है। सबसे बड़ा चमत्कार तो पश्चिम बंगाल में हुआ है। वहाँ ३४ साल से राज्य पर कब्ज़ा जमाए वाम सरकार को राज्य की जनता ने सिरे से $खारिज कर सादगी पसंद और हर समय जनसेवा में लीन रहने वालीं ममता बनर्जी के सिर पर विजय का ताज रख दिया है। वहीं असम में सा$फ छवि वाले और काम करने के लिए ख्यात कांग्रेस के नेता तरुण गोगई को जिताकर उन्हें हैट्रिक लगाने का मौका दिया है। केरल में कांटे की टक्कर के बावजूद कांग्रेस ने बाज़ी मार ली है। तमिलनाडु की बात करें तो इस बार २ जी घोटाला करुणानिधि के लिए भारी पड़ा है, और जनता ने डीएमके को अंगूठा दिखाते हुए जयललिता को जीत का तोह$फा दिया है, जबकि पुडुचेरी में कांग्रेस की सत्ता को जनता ने उखाड़ फेंका है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भारी फेरबदल के क्या कारण रहे और जनता ने किसे, क्यों जिताया, इसी पर पेश है विश्लेषणात्मक टिप्पणी।
पश्चिम बंगाल की बात करें तो माकपा सरकार को किसानों की ज़मीनों का अधिग्रहण कर किसानों की अनदेखी करने और बिज़नेस टायकून्स से हाथ मिलाने का $खमियाज़ा भुगतना पड़ा है। वहीं सादा साड़ी वाली नीली हवाई चप्पल पहने हर समय आम आदमी के हित में सरकार के विरोध और आमजन के समर्थन में खड़ी हो जाने वालीं ममता दीदी जनता को अपनी-सी लगी हैं। इसी का नतीजा है कि इस बार ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने दमदारी से जीत दर्ज करवाते हुए करीब साढ़े तीन दशक से सत्ता पर काबिज़ माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को न केवल हराया, बल्कि उसकी पार्टी के सभी दिग्गजों को चारों खाने चित कर दिया है। पश्चिम बंगाल में अभी तक रहे मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी जाधवपुर सीट तक नहीं बचा पाए, उन्हें तृणमूल के मनीष गुप्ता ने १६,००० के बड़े अंतर से हरा शर्मसार कर दिया, वहीं बर्धवान से उद्योग मंत्री निरुपम सेन को तृणमूल के रवि रंजन चट्टोपाध्याय ने पटखनी देते हुए ३६,४३८ मतों से करारी शिकस्त दी। माकपा नेता और राज्य के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता को तृणमूल के अमित मित्रा के हाथों करहादा सीट पर २६,१५४ मतों से हार का मुंह देखना पड़ा। शहरी विकास मंत्री अशोक भट्टाचार्य को सिलीगुड़ी सीट पर तृणमूल के रुद्र नारायण भट्टाचार्य ने ३६,१०० मतों से पट$खनी दी। माकपा के स्टार नेता गौतम देव को दमदम सीट से ब्रत्या बसु ने ३१,४९७ मतों से पराजित किया। माकपा के कद्दावर नेता कांति गांगुली रायदीघी सीट नहीं बचा सके, उन्हें तृणमूल के देवाश्री गांगुली ने हराया। इसके अलावा देबेश दास, आनंदी साहू, क्षीती गोस्वामी, सुदर्शन राय चौधरी और रंजीत खुंडू जैसे दिग्गजों ने भी तृणमूल की ''बोदलाब की बोयारÓÓ के सामने घुटने टेक दिए। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल में लाल किला पूरी तरह से ढह गया है। पिछली बार सन २००६ के विस चुनाव से तुलना करने पर सा$फ हो जाता है कि तृणमूल कांग्रेस को इस बार१५४ सीटों का अतिरिक्त $फायदा मिला है, कांग्रेस के पाले में भी २१ सीटों का इज़ा$फा हुआ है, जबकि १३६ सीटों का नुकसान माकपा को झेलना पड़ा है, सहयोगी भी ३१ सीटों के घाटे में हैं, अन्य को भी ८ सीटें गंवानी पड़ी हैं।
इस तरह इस बार माकपा का सूपड़ा सा$फ हो गया है, वहीं तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस $फायदे में रही हैं। तमिलनाडु में कांग्रेस को दा$गी द्रमुक का साथ देने का भरपूर $खमियाज़ा भुगतना पड़ा। द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन को महज़ ३१ सीटें मिलीं, वहीं अन्नाद्रमुक को १४६ सीटों पर जनता ने जिताया। जनता जानती है कि करुणानिधि और जयललिता में से कोई भी दूध का धुला हुआ नहीं है, दोनों के ही दामन दा$गदार हैं, लेकिन वर्तमान हालात में करुणानिधि की पार्टी के ए.राजा का २ जी घोटाले में लिप्त होना, यहां तक कि उनकी बेटी कनिमोझी और उनकी पत्नी का नाम भी इस घोटाले में आने के बाद से जनता के पास करुणानिधि की द्रमुक को हराने के सिवाय और कोई चारा नहीं था, इसका $फायदा जयललिता की अन्नाद्रमुक को मिला है। सही मायनों में यह जयललिता की जीत न होकर, करुणानिधि की हार है। भले ही जयललिता को स्पष्ट बहुमत मिल गया हो, लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता भ्रष्ट नेताओं को सबक ज़रूर सिखाती है। ऐसे में जयललिता को सोच-समझकर राज्य को चलाना होगा, न कि बदले की राजनीति से प्रेरित होकर। कुल मिलाकर एआईडीएमके को ८९ सीटों का $फायदा हुआ है, जबकि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी डीएमके को ७३ सीटें गंवानी पड़ीं, वहीं कांग्रेस के हाथ से भी २९ सीटें निकल गई हैं। अन्य पार्टियों को १३ सीटों का फायदा हुआ है।
केरल में कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतान्त्रिक मोर्चा (यूडीए$फ) ने १४० विस सीटों में से ७२ पर जीत दर्ज करवाते हुए माकपा नीत वाम लोकतान्त्रिक मोर्चा (एडीएफ) को सत्ता से बेदखल कर दिया है।
हालांकि, कांटे की टक्कर में एलडीए$फ ने ६८ सीटों पर कब्ज़ा जमाने में कामयाबी हासिल की। केरल में कांग्रेस १४ सीटों के $फायदे में है, वहीं कांग्रेस के सहयोगियों को १७ सीटों का लाभ मिला है, माकपा को १६ और अन्य पार्टियों को १५ सीटें गंवानी पड़ी हैं।
असम में ७६ सीटें जीतते हुए कांग्रेस ने राज्य में तीसरी बार भी अपना विजयी रथ जारी रखने में कामयाबी हासिल की है। प्रतिद्वंद्वी अगप को निर्णायक पटखनी देने वाले तरुण गोगोई की जीत के पीछे कई कारण हैं।
अलगाववादी संगठन उल्फा को वार्ता के लिए तैयार करने और दिवालिया स्थिति तक पहुंच चुके असम को फिर से पटरी पर लाने वाले मुख्यमंत्री तरुण गोगोई प्रशासकीय क्षमता और राजनीतिक बुद्धिमत्ता के अलावा अपनी सौम्य मुस्कान, बेबाकी और स्वच्छ छवि के लिए भी मशहूर हैं। असम में कांग्रेस के खाते में २५ अतिरिक्त सीटें आई हैं, एजीपी को १४ और अन्य पार्टियों को ११ सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है।
पुडुचेरी में कुल ३० विस सीटों में से २० पर अन्नाद्रमुक और सहयोगी विजयी रहे हैं। यहाँ कुल ३० विस सीटों में से एआईएनआरसी १५ सीटों के $फायदे में हैं, एआईडीएमके को २ सीटों का $फायदा हुआ है। कांग्रेस को ३ और अन्य पार्टियों को ७ सीटों की हानि हुई है।
कांग्रेस की स्थिति
इस विस चुनावों में कांग्रेस की स्थिति मज़बूत हुई है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को २१ सीटों का, केरल में १४ सीटों का, असम में सबसे ज़्यादा २५ सीटों का $फायदा हुआ है। हालांकि, करुणानिधि प्रेम उसे तमिलनाडु में भारी पड़ा और वहां कांग्रेस को २९ सीटों से हाथ धोना पड़ा। पुडुचेरी में भी उसे ३ सीटों का घाटा हुआ है। २००९ की तुलना में अब कांग्रेस ज़्यादा मज़बूत स्थिति में है। कांग्रेस या कांग्रेस नीत सरकारें पहले की अपेक्षा अब भारत के ज़्यादा राज्यों पर शासन करती नज़र आती हैं। अगर भविष्य में मनमोहन सरकार, कलमाडी, ए राजा की तरह ही अपनी पार्टी या अपने सहयोगी पार्टियों के दा$िगयों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने का सिलसिला जारी रखती है, तो उसकी स्थिति आने वाले चुनावों में और भी मज़बूत होने के आसार नज़र आते हैं।

Saturday, May 14, 2011






कानून के डंडे से खुन्नस का खेल
हृ जैनेन्द्र
भोपाल। भोपाल शहर की पहचान बन चुके मिनाल मॉल को इतने बड़े पैमाने पर कार्रवाई करके आनन-फानन में तोडऩे से बिल्डर्स, राजनीतिक हलकों और बुद्धिजीवियों के साथ ही आम जनता के ज़ेहन को भी एक ही सवाल मथ रहा है, कि आ$िखर पिछले 25 सालों से शहर की छाती पर शान से खड़े मिनाल मॉल के अवैध होने की सुध सरकार को अब जाकर ही क्यों आई? इसी सवाल के सटीक जवाब को खोजती और इस पूरे प्रकरण के सभी पहलुओं पर गहराई से प्रकाशमान करती खोजपरक रपट।
भोपाल की पहचान बन चुकी भेल क्षेत्र के जेके रोड और अयोध्या बाईपास के मध्य स्थित मिनाल रेज़ीडेंसी (जो अब मिलान मॉल के नाम से जानी जाती है) को सरकार ने अवैध करार देते हुए, दो दिन तक ध्वस्तीकरण कार्रवाई की। इस दौरान मिनाल की सभी 125 दुकानों को मटियामेट कर दिया गया। हालांकि, $िफलवक्त मिनाल स्थित मकानों को नहीं तोड़ा गया है। असली मसला यह है कि गोविंदपुरा के तहसीलदार मुकुल गुप्ता ने मिनाल मॉल का सीमांकन किया था, जिसमें 140 एकड़ भूमि पर अवैध कब्ज़ा पाया गया था। इसके बाद अवैध अतिक्रमण को हटाने की मुहिम शुरू की गई। मिनाल रेजीडेंसी/ मॉल की विशालता और भव्यता का इस बात से सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इसे ध्वस्त करने के लिए 104 किलो बारूद, 10 जेसीबी, 20 डंपर के साथ ही पुलिस, नगर निगम और विद्युत विभाग के करीब 500 लोगों की मदद ली गई और इस कार्रवाई को अंजाम देने में 6 और 7 मई 2011 के दो दिन लगे। इसके अलावा सरकार ने सा$फ कर दिया है, कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में आया $खर्चा बिल्डर से वसूला जाएगा। यह $खर्चा अनुमानित 25 लाख आंका जा रहा है। सरकार ने अवैध अतिक्रमण को ध्वस्त किया, यह तो स्वागत योग्य बात है, लेकिन मिनाल को बने लगभग 25 साल पूरे होने के बाद ही अचानक से प्रशासन नींद से जागा और आनन-फानन में कार्रवाई कर दी गई। सरकार का यह रवैया कई सवाल पैदा करता है।
$िखर इन सरकारों ने क्या किया...
सबसे पहले इस बात पर ज़रा $गौर कर लिया जाए कि मिनाल के 25 सालों के दौरान राज्य में सत्ता किस-किस के हाथ में रही। मौजूदा भाजपा सरकार पिछले 10 सालों से मध्य प्रदेश की कमान संभाले बैठी है, सबसे पहले लगभग एक साल तक भाजपा की स्टार नेत्री उमा भारती मु यमंत्री के पद को सुशोभित करती रहीं। उनके किसी विवाद में फंसने पर उन्हें हटा कर पार्टी ने सरकार की बागडोर बाबूलाल गौर के हाथ में थमा दी, लेकिन वे सरकार को ज़्यादा दिन तक काबू में रहीं रख पाए। नतीजा शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बना दिया गया, जो कि वर्तमान में भी सत्ता पर काबिज़ हैं। इससे पहले की बात करें तो लगभग एक दशक तक मध्यप्रदेश पर कांग्रेस पार्टी के दिग्विजय सिंह ने बतौर मुख्यमंत्री शासन किया। उससे भी पहले इतिहास के पन्नों को पलटें तो सामने आता है कि भाजपा के सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री रहे। सब जानते हैं कि मिनाल मॉल के निर्माण की बात आजकल की बात नहीं है। मिनाल मॉल के निर्माण के दौरान तत्कालीन सरकार ने सत्ता का दमखम क्यों नहीं दिखाया, तब किस तरह इतने बड़े पैनाने पर अवैध इमारत खड़ी करने दी गई। तब क्यों कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए एक बड़े बिल्डर को इतने बड़े पैमाने पर निर्माण करने की इजाजत दे ही गई, छूट दी गई। क्या तब राज्य सरकार के इमारत निर्माण से संबंधित नियम-कायदे वर्तमान में लागू नियम-कायदों से अलग थे? इसका दो टूक उत्तर है, नहीं। ज़ाहिर है यह सब उस समय की सरकारों, नौकरशाहों और रसू$खदारों की मिलीभगत से ही हुआ होगा। तब सरकार की नींद क्यों नहीं टूटी? उस समय अवैध को वैध करार देकर किन नेताओं, आला अ$फसरों ने मिनाल निर्माण की $फाइलों पर सही के हस्ताक्षर करते हुए बेरोक-टोक मिनाल मॉल को बनाने की इजाज़त दी थी। अगर यह मान भी लिया जाए कि उस समय की राज्य सरकार की मदद से ही अवैध निर्माण करवाया गया था, तो मौजूदा शिवराज सिंह चौहान की भाजपा नीत सरकार को लभगभ 10 साल होने को आए, पर उसे भी मिनाल के अवैध कब्ज़े की $खबर अब लगी, और फिर यकायक 6 मई 2011 को ऐसी कौन-सी आ$फत गले आ पड़ी या ऐसा कौन-सा भूचाल आ गया कि सरकार ने आनन-फानन ही मध्य प्रदेश $खासकर भोपाल की पहचान बन चुके मिनाल मॉल के बड़े हिस्से को देखते ही देखते ज़मींदोज़ कर दिया और दूसरे दिन भी इसी काम के लिए उसने एड़ी से लेकर चोटी तक का ज़ोर लगा दिया।
कहीं ये रंजिश की खुन्नस तो नहीं...
$गौरतलब है, कि मिनाल मॉल राज बिल्डर्स द्वारा निर्मित है। राज ग्रुप प्रदेश का प्रमुख बिल्डर ग्रुप है। इसी राज ग्रुप ने मीडिया में भी पैठ बनाई हुई है। राज एक्सप्रेस मध्यप्रदेश के प्रमुख दैनिक अ$खबारों में से एक माना जाता है। यह राज ग्रुप की ही मिल्कियत है। राज टीवी के नाम से केबल चैनल में भी ग्रुप का अच्छा-$खासा दखल है। राज एक्सप्रेस के संपादक पद पर जब से रवींद्र जैन आए हैं, $खासतौर से तभी से यह अ$खबार $खास तेवर अपनाए हुए है। पिछले एक साल की बात करें, तो अ$खबार ने कई बड़े नेताओं की मुखर होकर मु$खाल$फत की। राज एक्सप्रेस की कई $खबरों ने सत्तारूढ़ नेताओं, मंत्रियों, अधिकारियों के काले चिट्ठे जनता के सामने खोल के रख दिए। राज ग्रुप की ओर से बतौर बिल्डर चाहे जैसे निर्माण करवाए गए हों, लेकिन उसके अ$खबार राज एक्सप्रेस ने तो पत्रकारिता के मानदंडों को न केवल पूरा किया, बल्कि उसमें प्रकाशित $खबरों से साफ हो जाता है, कि वह पत्रकारिता के सिद्धांतों पर पूरी तरह से खरा उतरा। राज एक्सप्रेस के संपादक रवींद्र जैन कितना भी लिखें, लेकिन अगर अ$खबार के मालिक की सहमति न हो तो सरकार की पोल खोलती सटीक $खबरों का प्रकाशित होना संभव नहीं होता। इस नज़रिये से देखा जाए तो, न केवल संपादक रवींद्र जैन बल्कि राज ग्रुप की ओर से भी समाज से गंदगी को सा$फ करने की मुहिम चलाई गई, और भ्रष्टाचारियों पर शिंकजा कसने की पुरज़ोर कोशिश की गई। सूत्रों का तो यही कहना है कि अ$खबार की यही दमदारी रसू$खदारों को रास नहीं आई और इसका $खामियाजा मिनाल मॉल को उठाना पड़ा। इस तरह सरकार की ओर से उठाया गया यह कदम पूरी तरह रंजिशभरा लगता है। और करोड़ों के निमार्ण कार्यों को ज़मीन चटाकर खुन्नस निकाली गई।
यदि वाकई मध्यप्रदेश सरकार अतिक्रमण हटाने के मामले में गंभीर है, और राज एक्सप्रेस समाचार पत्र में छपी $खबरों के बाद सत्ता में बैठे रसू$खदारों के काले चिट्ठे खुलने के बाद सत्ताधारी सरकार की ओर से मिनाल मॉल को ध्वस्त करना उसकी ओर से बौखलाहट भरा कदम नहीं है, तो उसे शहर के दूसरे अवैध निर्माणों को भी तुरंत प्रभाव से ध्वस्त करना चाहिए। शहर में अन्य कई बिल्डर्स ने भी पैर पसारे हुए हैं, और अगर सरकार ईमानदारी से सभी बिल्डर्स द्वारा कराए गए निर्माण कार्यों की ईमानदारी से जाँच करवाए, तो ज़्यादातर में उसे $खामियां मिल जाएंगी। ऐसे में उसे सि$र्फ मिनाल मॉल को तोड़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री करने के बजाय, पूरे शहर और, यहां तक कि पूरे मध्य प्रदेश में अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने के लिए मुहिम छेडऩी चाहिए। जबकि मध्य प्रदेश सरकार ज़ोर-शोर से मिनाल मॉल के एक बड़े हिस्से को ध्वस्त करने के बाद शांत नज़र आ रही है, इससे तो आम आदमी के ज़ेहन में यही शंका ज़ाहिर होती है कि सरकार की मंशा मिनाल मामले में सा$फ नहीं है।
सा$फगोई उन्हें रास न आई
राज एक्सप्रेस के सम्पादक पत्रकार रविन्द्र जैन के द्वारा स्वस्थ पत्रकारिता के साथ-साथ भारत माता के सच्चे सपूत होने का $फजऱ् अदा करते हुए, भ्रष्टों द्वारा देश व जनता की लूट करने वालों को जनता व सरकार के समक्ष नंगा किया जाता रहा। यदि उनके द्वारा जनता के सामने लाए गए भ्रष्ट कार्यों की जांच करवा कर उसमें सुधारात्मक कार्यवाहियां की जातीं तो प्रदेश की जनता को कुछ राहत की सांस मिलती। मगर स्वर्णिम मध्यप्रदेश का नारा देने वाले प्रदेश में गले-गले तक भ्रष्टाचार के गटर में डूबे मंत्री व अधिकारियों को यह रास नहीं आया।
'राज एक्सप्रेसÓ में घटित इस कांड ने एक बार फिर साबित कर दिया, कि पत्रकारिता का संस्थान यदि किसी पत्रकारिता के पवित्र पेशे से जुड़े व्यक्ति के स्वामित्व में है, तो वही सही व स्वतंत्रता से 'पत्रकारिता के गदाÓ से भ्रष्टाचार रूपी राक्षसों का संहार कर सकता है, मगर अ$फसोस कि अब हमारे देश में स्वस्थ पत्रकारिता से जुड़े कलमकारों का टोटा होता जा रहा है, और बहुधा आर्थिक कारणों से कालोनाईज़र, ठेकेदार, डाक्टर, जौहरी, व्यापारी आदि व्यक्तियों ने पत्रकारिता/माध्यम के संस्थानों को अपने-अपने पेशों की सुरक्षात्मक ढाल के रूप में उपयोग किया जा रहा है। सरकारी अधिकारी व मंत्री आदि भी उनके इन कार्यों में मददगार साबित हो रहे हैं। पत्रकारिता क्षेत्र में लद गए वह ज़माने, जब महात्मा गांधी, मालवीया जी, लाला लाजपतराय, भगत सिंह, माखनलाल, सुभाष बोस ने अपने विचारों को अपनी-अपनी लेखनी के माध्यम से सदियों से दासता की बेडिय़ों से जकड़ी भारत की जनता में जागृति पैदा करके स्वतंत्रता देवी के दर्शन कराए। अब भारत मां के सपूत अन्ना हज़ारे ने दानव भ्रष्टाचार से भिडऩे का मन बना लिया है। देश के प्राय: सभी वर्गों के लाखों-करोड़ों लोग उनके साथ हो लिए हैं। यदि रविन्द्र जैन जैसे चंद और कलम के धनी उनका साथ देकर देश में से भ्रष्टाचार की गंदगी को निकाल फेंकने हेतु कमर कस लें, तो केवल एक दो दशकों के अंदर ही पूरे भारत की जनता को वास्तविक आज़ादी मिल जाएगी, और आम जनता हर तरह से राहत महसूस करने लगेगी।
हृ सम्पादक, $खबरयार
अरुण सहलोत ने रविन्द्र जैन को हटाया
राज एक्सप्रेस में मध्य प्रदेश सरकार के $िखला$फ सरकार की $गलत नीतियों के $िखला$फ $खबरें लिखने की कीमत संपादक रविन्द्र जैन को चुकानी पड़ गई है। सरकार की आंख की किरकिरी बन चुके रविन्द्र जैन पर दबाव बनवाने के लिए सरकार ने पहले राज एक्सप्रेस के मालिक और सीएमडी अरुण सहलोत के शापिंग मॉल को निशाना बनाया। इसके बाद दबाव में आए अरुण सहलोत ने संपादक रविन्द्र जैन को अखबार से एक झटके में अलग कर, अपनी हताशा का परिचय भी दे दिया।
राज एक्सप्रेस के भोपाल, ग्वालियर, इंदौर और जबलपुर एडिशनों के पेज नम्बर तीन पर एक $खबर छापकर रविन्द्र जैन को पद का दुरुपयोग करने के कारण तत्काल प्रभाव से हटाए जाने की जानकारी राज ग्रुप के सीएमडी अरुण सहलोत के हवाले से दी गई है। इससे सा$फ है कि सरकार की $गलत नीतियों के $िखला$फ संपादक की बलि लाला जी ने ले ली है। मध्य प्रदेश सरकार भी अपने मिशन में कामयाब दिख रही है, जो एंटी $खबरें छपने से रविन्द्र जैन से बुरी तरह नाराज़ व आहत नज़र आती थी।
माना जा रहा है कि अरुण सहलोत मॉल गिरने के बाद बुरी तरह बौखलाए और घबराए हुए हैं। रविन्द्र जैन के संपादकत्व में $खबरों की ताप से मध्य प्रदेश सरकार बुरी तरह झुलसी हुई थी। इसी के चलते मॉल को निशाना बनाया गया। सरकार के $िखला$फ आग उगलने वाले संपादकों-पत्रकारों को निपटाने का लंबा इतिहास रहा है। कहा जा रहा है कि मॉल तोड़े जाने से घबराए अरुण सहलोत ने भी सरकार के इशारे पर रविन्द्र जैन की बलि चढ़ा दिया है।



$फजऱ्ी चिकित्सक गांवों में खुलेआम करते इलाज
ठ्ठ रोज़ाना सैंकड़ों मरीज़ों की जान से हो रहा खिलवाड़ ठ्ठ आयुक्त स्वास्थ्य विभाग के आदेशों की मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थय अधिकारी द्वारा खुली अव्हेलना
हृ अनूप सक्सेना

राजगढ़।
तत्कालीन आयुक्त लोक स्वास्थय एवं परिवार कल्याण विभाग अलका उपाध्याय द्वारा आदेश क्र ए$फ 292/1044 दि, 25.2.2008 जारी कर $फजऱ्ी चिकित्सकों झोलाछाप डाक्टरों, मध्यप्रदेश में चिकित्सा व्यव्साय कर रहे अन्य पंजीकृत चिकित्सकों के विरूद्व कार्यवाही के निर्देश दिये थे। आदेश में $खुलासा किया गया था, कि ऐसे चिकित्सक ऐलौपेथी पद्धति की औषधियां रोगियों को दे रहे हैं, ऐसे कई प्रकरण सामने आये हैं, जहां अपात्र $फजऱ्ी चिकित्सकों द्वारा $गलत इंजेक्शन देने से रोगियों को एब्सेस गेंगरीन आदि रोग हो गया, तथा कई प्रकरणों में रोगी की मृत्यु तक हां गयी। मध्यप्रदेश रजिस्ट्रीकरण तथा अनुज्ञापन अधिनियम 1973 की धारा 3 के अनुसार नर्सिंग होम निजी चिकित्सालय परामर्श केन्द्र औषधालय प्रयोगशाला एक्सरे डेटल क्लीनिक उक्त एक्ट के अन्तरगत रजिस्ट्रीकरण अनुज्ञप्ति के बिना नहीं खोले जा सकते हैं, न ही चलाये जा सकते हैं। उक्त धारा 3 का उल्लंघन करने पर जुर्माने तथा 3 माह तक के कठोर कारावास का प्रावधान है। ऐलोपैथी चिकित्सा पद्वति में केवल वे ही चिकित्सा व्यवसाय हेतु पात्र हैं, जो मेडीकल काउन्सिल आ$फ इंडिया एक्ट 1956 की धारा 15 (1) में उल्लेखित अर्हता धारी होकर मध्यप्रदेश मेडिकल काउन्सिल एक्ट 1987 के अन्तरगत पंजीकृत हो, अपात्र व अपंजीकृत व्यक्तियों द्वारा ऐलोपैथी चिकित्सा पद्वति में चिकित्सा व्यवसाय करने पर मध्यप्रदेेश मेडीकल काउन्सिल एक्ट 1987 धारा 24 के अन्तरगत 3 वर्ष तक के कठोर करावास एवं 5,000 रूपय तक जुर्माना का प्रावधान है, तथा अभिदान डाक्टर का उपयोग केवल मान्य चिकित्सक पद्वतियों में रजिस्टर्ड मेडीकल प्रेक्टिशनर ही कर सकते हैं। अपात्र व्यक्ति द्वारा उक्त अभिदान का उपयोग चिकित्सा शिक्षा संस्था नियंत्रण अधीनियम 1973 की धारा 8,(2) के अन्तरागत 3 वर्ष कारावास या रूपए 50,000 जुर्माने या दोनों से दण्डनीय रखा गया है। आयुक्त द्वारा जारी इस आदेश के बाद क्लेक्टर राजगढ़ की टीप दि, 29,8,2009 जारी होने के पालन में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थय अधिकारी द्वारा जारी आदेंश क्र/पंजी/ नर्सिगहोम / एक्ट 1997 /2009 दि, 3.9.2009 द्वारा $फजऱ्ी चिकित्सकों पर जांच व कार्यवाही किये जाने हेतू जि़ला स्तरीय समिति अपर राजगढ़ उप पुलिस अधीक्षक राजगढ़ तथा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थय अधिकारी को शामिल कर बनायी गयी अधिकारी पुलिस तथा खण्ड स्तर पर अनुविभागीय अधिकारी राजस्व अनुविभागीय अधिकारी पुलिस तथा खण्ड चिकित्सा अधिकारी के दल बनाये गये थे। तथा $फजऱ्ी चिकित्सकों के विरूद्व कार्यवाही कर कार्यवाही से अवगत कराने के निर्देश दिये गये थे। जि़ले में 300 से अधिक $फजऱ्ी झोला छाप चिकित्सकों के विरूद्व न तो जि़ला स्तर नहीं खण्ड स्तर पर बनाये गये जांच दल किसी भी प्रकार की कोई कार्यवाही का साहस दिखा सके हैं।

इनका कहना
जि़ले में झोला छाप $फजऱ्ी चिकित्सकों की पहुंच बहुत उपर तक है। नरसिंहगढ़ में एक अवैध क्लीनिक पर कार्यवाही के प्रयास किये, तो विधायक से लेकर स्वास्थय मंत्री तक के सि$फारिशी $फोन आ गये, इन $फजऱ्ी चिकित्सकों पर कार्यवाही कर कौन बुराई मोल लेगा।
डा.सी.डी. शर्मा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थय अधिकारी राजगढ

Saturday, May 7, 2011





आतं·वाद · $खात्मा शुरू

आईएसआई ·ी मजबूरी

सौंपा ओबामा ·ो ओसामा

हृ संजीव पांडेय
नई दिल्ली। जब पा·िस्तानी समय ·े अनुसार देर रात दो बजे ओबामा ·ो ओसामा ·ी मौत ·ी $खबर मिली तो उन्हें निश्चित रूप से भारी सु·ून भरा अहसास मिला होगा। पिछले ·ुछ दिनों से परेशान ओबामा ·ो आईएसआई ·ी तर$फ से इससे बेहतर ·ोई गि$फ्ट नहीं हो स·ता है। मीडिया पर जो बरा· ओबामा ·ी वीरता ·ा बखान हो रहा है, वास्तव में वो वीरता न हो, आईएसआई और अमेरि·ी एजेंसियों ·ा ए· ज्वाइंट खेल था, जिस·ा शि·ार ओसामा-बिन-लादेन हुआ। पिछले ·ुछ दिनों अपनी जन्मभूमि और धर्म ·ो ले·र अमेरि·ा में झेल रहे आलोचना ·ो दबाने ·े लिए आ$िखर बरा· ओबामा ने आईएसआई ·ा सहयोग लिया और ओसामा बिन लादेन ·ो ढेर ·र दिया।
इस ·ड़ी ·ो समझने में ·ुछ ज़्यादा दिमा$ग लगाने ·ी ज़रूरत नहीं है। ओसामा बिन लादेन पा·िस्तान ·े एबोटाबाद में रह रहा था। जिस म·ान में रह रहा था, उस म·ान ·े निर्माण ·ो देख ·ोई भी समझ स·ता है, ·ि यह निर्माण सेना ·ा है। साथ ही सेना ·ी ए· यूनिट भी थी। यह जगह इस्लामाबाद से ·ा$फी दूर नहीं है, और पा·िस्तान ·ी सेना ·े लिए यह महत्व इसलिए भी रखता है ·ि पूर्व तानाशाह अयूब $खान भी यहीं ·े रहने वाले थे। हज़ारा जनजाति ·े बाहुल्य वाले इस इला·े में पश्तूनों और हज़ारा जनजाति ·े बीच संघर्ष भी होता है। मिली जान·ारी ·े अनुसार ओसामा बिन लादेन आ$िखर·ार पा·िस्तानी सेना और $खु$िफया एजेंसी आईएसआई ·े उस राजनीति ·ा शि·ार हो गई जिस·े आधार पर ही आईएसआई ने अपने पूर्व में रहे बॉसों ·ो भी नहीं ब$ख्शा।
वास्तव में लादेन ·ा$फी लंबे समय से आईएसआई ·े संरक्षण में ही सीमांत इला·े में था, जो सहूलियत ·े हिसाब से सारा ·ुछ ·रता था। लादेन ·ी सारी एक्टिविटी सेना और आईएसआई ·ो पता था। बस सही अमेरि·ी दबाव ·ा इंतज़ार था। इस दबाव ·ो आईएसआई सह नहीं स·ी और लादेन मारा गया।
इस पूरे खेल ·ी शुरूआत तो छ महीनें पहले हो गई थी। अमेरि·ा ·ो यह पता था ·ि आईएसआई ·े संरक्षण में ही लादेन है। अप्रैल महीनें में इस खेल ·ी पूरी प्लांटिग ·र दी गई। इस महीनें ही अमेरि·ा ·े दौरे पर शुजा पाशा पहुंचे। साथ ही परवेज़ ·यानी भी निरंतर अमेरि·ा अथॉरिटी ·े संपर्· में रहे। शुजा पाशा ·े अमेरि·ी दौरे ·े दौरान ·ुछ तल्$ख बातचीत सीआईए और आईएसआई ची$फ ·े बीच हुई थी। इस दौरे में पा·िस्तान में बिना वीजा रहने वाले अमेरि·ी एजेंटों ·ो ले·र विवाद हुआ था। यह मामला मीडिया में भी आया था। ले·िन इससे अलग ए· गंभीर बातचीत लादेन ·ो ले·र आईएसआई ची$फऔर सीआईए ची$फ ·े बीच हुई थी। इस दौरान अमेरि·ा ने सा$फतौर पर लादेन ·ो $खत्म ·रने संबंधी प्रस्ताव आईएसआई ·े सामने रखा। उधर आईएसआई पर यह प्रेशर और तब आ गया जब वि·ीलीक्स ·े खुलासे में आईएसआई संबंधी ए· $खबर सामने आई, जिस·े मुताबि· अमेरि·ी सूची में आईएसआई आतं·ी संगठन है। पा·िस्तान ·े अब्बोटाबाद में वह घर जहां ·थित तौर पर ओसामा बिन लादेन ·ो अमेरि·ी एजंसियों ने मार गिराया में मिली जान·ारी ·े अनुसार शुजा पाशा अपने $खास सैन्य प्रमुखों से सलाह ·े बाद ओसामा बिन लादेन ·ी बलि देने ·ो तैयार हो गए थे। इस·े पीछे आईएसआई ·े बड़े लोगों और पा·िस्तानी सेना ·ी अपनी आर्थि· मजबूरी थी। यहीं से आपरेशन लादेन ·ी शुरूआत हो गई थी। अप्रैल माह में ही ए· पा·िस्तानी प्रतिनिधिमंडल ·ाबुल पहुंच गया था। इस प्रतिनिधमंडल ·े हेड प्रधानमंत्री युसू$फ रज़ा गिलानी थे। ले·िन उन·े साथ ही सेना ची$फ परवेज़ ·यानी और आईएसआई ची$फ शुजा पाशा भी थे। वास्तव में जिलानी तो मुखौटा थे। वास्तव में यह दौरा ·यानी और पाशा ·ा था, जिन्होंने अपने दौरे ·े दौरान विभिन्न अ$फ$गान जनजातियों और पीस ·ाउंसिल ·े सदस्यों ·ी राय ली। साथ ही यह भी आं·लन ·िया ·ि आ$िखर लादेन ·ो अमेरि·ा ·े हवाले ·र दिया जाएगा तो उस·ा क्या प्रभाव प$ख्तून जनजातियों और तालिबान जैसे संगठनों पर पड़ेगा। इस·े बाद ही अप्रैल ·े अंतिम सप्ताह में पेशावर में पख्तो पीस ·ाउंसिल ·ी तर$फ से विश्व पश्तो ·ांग्रेस ·ा आयोजन ·िया गयाथा। इसमें पूरी तरह से प$ख्तूनों ·ो शांतिप्रिय जनजाति बताया गया और अरबों ·ो गाली दी गई। इस ·ांफ्रेंस में शामिल लोगों ने ·हा था ·ि प$ख्तूनों पर अरब ·ल्चर ·ो डाला जा रहा है, और अरब ·ल्चर वाले प$ख्तूनों ·ो हथियार दे·र शांतिप्रिय जनजाति ·ो हिंसा ·ी तर$फ ढ·ेल रहे है। इस पूरे अध्ययन ·े बाद आ$िखर·ार ओबामा ·े हाथ में ओसामा ·ो सौंप दिया गया। जिस तरह से अमेरि·ी एजेंसियों ने देर रात आपरेशन ·िया है, उसमें पा·िस्तान ·ी भागीदारी न हो, यह मूर्खता भरी बात है। पा·िस्तान ·ी पूरी भागीदारी ·े साथ ही यह आपरेशन हुआ और ओसामा मारा गया। इस मामले में अन्य आतं·ी संगठन जिसमें तालिबान ·े जलादुद्दीन हक्कानी नेटवर्· ·े लोग भी शामिल है, विश्वास में लिया गया है, बताया जा रहा है। वास्तव में पा·िस्तान सेना और आईएसआई ·े उपर हाल में जो अमरि·ा ने खुले आरोप लगाए उससे आईएसआई ·ो भारी मुश्·िलों ·ा सामना ·रना पड़ रहा था। दूसरा आईएसआई और सेना · पता है ·ि आ$िखर·ार पा·िस्तान ·ो अमेरि·ी डालरों ·े बिना चलाना मुश्·िल है। सेना ·ी भी ·माई अमेरि·ी सहायता राशि से आ रही है। उधर अमेरि·ी दबाव और इधर पा·िस्तानी अर्थव्यवस्था ·ी चरमराहट पा·िस्तान ·ो परेशान ·िए हुए थे। पा·िस्तान ·ो ·ुल जीडीपी ·ा मात्र दस प्रतिशत ही टैक्स से आ रहा है। हालत यह है ·ि देश ·ी सि$र्फ ए· प्रतिशत जनता ही टैक्स दे रही है। इन परिस्थितियों में अमेरि·ी प्रतिरोध ·ो पा·िस्तान सेना और आईएसआई झेलने ·ो तैयार नहीं है। आ$िखर जो वि·ास ·े लिए पैसा आता है, उसमें भी भारी हाथ सेना ही मार जाती है। इसलिए ·ई मजबूरियां थी, जिस·े ·ारण लादेन ओबामा ·े हवाले ·र दिए गए।



उमा भारती आएं तो बात बन जाए..
नई दिल्ली। बुधवार ·ो नई दिल्ली में भाजपा ·े आला नेताओं ·ी ए· बैठ· हुई। बैठ· पार्टी अध्यक्ष नितिन गड·री ·े आवास पर हुई। हालां·ि बैठ· ·े मुद्दे और भी थे, ले·िन इस बात पर भी विचार होना था, ·ि उमा भारती ·ी भाजपा में वापसी ·ैसे सुनिश्चित ·ी जाए। हालां·ि बैठ· ·े बाद अरुण जेटली ने पत्र·ारों द्वारा पूछे जाने पर बड़े टाल मटोल वाले अंदाज़ में यह बात ·ही ·ि इस बारे में भी बात हुई थी। क्या बात हुई यह नहीं बताया। ले·िन बताया जाता है ·ि उमा भारती ·े वापसी ·े आसार इसलिए बन रहे हैं, क्यों·ि उत्तर प्रदेश ·े स्थानीय ·ार्य·र्ताओं ·ा पार्टी ·े आला नेताओं पर बहुत दबाव है।
उत्तर प्रदेश ·े स्थानीय नेता चाहते हैं, ·ि उमा भारती उत्तर प्रदेश में चुनाव अभियान ·ी ·मान संभाले। प्रदेश ·े वे स्थानीय नेता और ·ार्य·र्ता जो ·िसी नेता ·े अभाव में घायल हो·र घर पर बैठे हैं, उन·ो मैदान में उतारने ·े लिए ·िसी $फारयब्राण्ड नेता ·ी ज़रूरत है। उत्तर प्रदेश में रैलियों ·ो संबोधित ·र रहे पार्टी अध्यक्ष नितिन गड·री भी महसूस ·र रहे हैं ·ि उत्तर प्रदेश में अगर ·िसी बात ·ी ·मी है तो वह ए· $फायरब्राण्ड नेता ·ी, जिसे उमा भारती पूरी ·र स·ती हैं।
ले·िन जैसा ·ि सब जानते हैं, भाजपा न तो नेताओं ·ी पार्टी है और न ही ·ार्य·र्ताओं ·ी। यह इन दोनों ·े बीचवालों ·ी पार्टी है, जो ·भी ·भार नेता बने मिल जाते हैं, तो ·भी ·भार टाई लगा·र दलाली ·ा धंधा भी ·र लेते हैं। ऐसे ही नेताओं ·ी पूरी $फौज भाजपा ·ो ·माण्ड ·रती है। यही $फौज उमा भारती ·ो भाजपा से दूर रखने में अपनी भलाई समझ रही है। जिसमें हाल $िफलहाल में अब राजनाथ सिंह और ·लराज मिश्र भी शामिल हो गये हैं। राजनाथ सिंह ने चुप·े से ·लराज मिश्र ·ो मुख्यमंत्री हो जाने ·ी टोपी पहना दी है, और उन्हें समझा दिया है, ·ि वे तो ब्राह्मणों ·े सबसे बड़े नेता हैं। अब भाई ·लराज मिश्र ·े हर·ारे देश प्रदेश में डोल डोल·र सब·ो समझा रहे हैं, ·ि ·ैसे ·लराज मिश्र उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों ·े नेता हो गये हैं, और ·ैसे वे संगठन पर भारी भर·म प·ड़ रखते हैं।
ले·िन ·लराज मिश्र ·ा ·ष्ट यह है ·ि वे न तो ब्राह्मणों ·े नेता हैं, और न ही उन·ी संगठन पर वैसी ·ोई प·ड़ है, जैसा ·ि दावा ·िया जाता है। फिर भी राजनाथ सिंह ·ा हित इसी में सधता है ·ि ·लराज मिश्र उमा भारती ·ो प्रदेश में न घुसने दे, भले ही भाजपा ·ी स्थिति में ·ोई बदलाव हो न हो। ले·िन हाल में ·ुछ सर्वे जो सामने आ रहे हैं वे भाजपा ·े आला नेताओं ·ो परेशान ·र रहे हैं। ये सर्वे बता रहे हैं, ·ि प्रदेश में भाजपा ·ी स्थिति तेज़ी से सुधर रही है और उस·ा मत प्रतिशत वहां त· पहुंच चु·ा है जितना पिछले विधानसभा चुनाव में हासिल हुआ था। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ·ो 17 प्रतिशत मत हासिल हुआ था। सर्वेक्षण एजंसियों ·ा आं·लन है ·ि अगर उमा भारती जैसी ·ोई $फारब्राण्ड नेता भाजपा ·ी ·मान संभाल लेती है तो भाजपा ·े मत प्रतिशत में चार से पांच प्रतिशत ·ा इज़ा$फा हो स·ता है जो प्रदेश में भाजपा ·ो तीसरे से दूसरे नंबर ·ी पार्टी बना स·ता है।
उमा भारती ·े पक्ष में ऐसे ·ई ·ारण हैं जो इस लक्ष्य ·ो सुगमता से हासिल ·रने ·ा सं·ेत देते हैं। ए· तो उमा भारती ओबीसी हैं, दूसरे महिला हैं और तीसरे भ्रष्टाचार ·े आरोपों से मुक्त हैं। प्रदेश में भाजपा में आज ·ोई नेता ऐसा नहीं है जो ·ल्याण सिंह ·े बाद मुलायम या मायावती ·ा मु·ाबला ·र स·े। उमा भारती इन नेताओं ·ा सटी· इलाज नज़र आती हैं। बहरहाल, इस सूरतेहाल में शुक्रवार 6 मई ·ो ·ोई बड़ा डेवलपमेन्ट हो स·ता है। बुधवार ·ो पार्टी ·े से·ेण्ड क्लास नेताओं से मंत्रणा ·े बाद शुक्रवार ·ो गड·री आला नेताओं से बात ·रेंगे। पार्टी आला·मान तो पहले से चाहता है ·ि उमा ·ो उत्तर प्रदेश में उतार दिया जाए, ले·िन अब सवाल है ·ि उमा भारती दरवाज़े पर दस्त· दे·र बैठी हैं। वे अंदर ·ैसे आयेंगी, इस·ा ·ोई रास्ता नि·ालने ·े बाद हो स·ता है जल्द से जल्द ·ोई ऐसी घोषणा ·र दी जाए। उत्तर प्रदेश में उमा भारती ·ी वापसी ·ो ले·र बे·रारी ·िस हद त· है इस·ा प्रमाण इससे मिलता है, ·ि राजनाथ सिंह ·े ए· बेहद ·रीबी नेता भी भी यही ·हते हैं ·ि -उमा भारती आ जाए तो बात बन जाए....।




दो रसू$खदार मामाओं · ·ुश्ती

हृ लिमटी खरे
नई दिल्ली। देश ·ी राजनैति· राजधानी दिल्ली में इन दिनों देश ·े हृदय प्रदेश ·े ‘मामा’ चर्चा में हैं। ए· तर$फ प्रदेश ·े मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान $खुद ·ो सूबे ·े बच्चों ·ा मामा बताते आए हैं, तो अब प्रदेश ·ांग्रेस ·मेटी ·े नवनियुक्त अध्यक्ष ·ांतिलाल भूरिया ने $खुद ·ो असली मामा बता दिया है।
बीते दिनों भूरिया ·े पदभार ग्रहण ·रने ·े दौरान ·ांग्रेस ·ी ·थित ए·ता रेली में मामाओं पर ·ी गई टी·ा टिप्पणी ·ी दिल्ली में जम·र चर्चाएं हो रही हैं। इसी दौरान सांसद सज्जन सिंह वर्मा द्वारा यह बात भी ·ह दी गई ·ि इतिहास में दो ही मामाओं ·ा उल्लेख मिलता है, ए· ·ंस मामा और दूसरे श·ुनि मामा। वर्मा शायद बचपन ·े ‘चंदा मामा’ ·ो भूल गए। पांव पांव वाले भईया ·े नाम से चर्चित शिवराज सिंह चौहान द्वारा बच्चों और महिलाओं ·े हितों ·ो ध्यान में रख·र आरंभ ·ी गई योजनाओं ·े ·ारण सूबे में उन्हें लोग मामा ·े नाम से जानने लगे हैं, उधर आदिवासियों ·े बीच ·ांतिलाल भूरिया ·ो भी मामा ·े रूप में पहचाना जाता है। $खबरों ·े अनुसार ·ांतिलाल भूरिया ·े हाथों मध्य प्रदेश ·ांग्रेस ·ी ·मान सौंपे जाने ·े उपरांत सूबे में सुस्सुप्तावस्था में पड़ी ·ांग्रेस में ·ुछ हलचल अवश्य ही महसूस ·ी जा रही है। ए·ता रैली में ·मल नाथ,दिग्जिवय सिंह, सुरेश पचौरी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अरूण यादव जैसे क्षत्रपों ·ा ए· मंच पर आना भी ·ांग्रेस ·े लिए सुखद संयोग से ·म नहीं था, ·िन्तु समारोह में सिंधिया ·ा महज़ शक्ल दिखा·र लौट जाना और ·मल नाथ तथा प्रदेश प्रभारी महासचिव बी.·े.हरिप्रसाद ·ा वहां न पहुंचना भी चर्चाओं और चट$खारों ·ा ·ेंद्र बना हुआ है। आने वाला समय बताएगा ·ि जातिगत मामा भारी पड़ते हैं या जाति लाभ हेतु बनाए गए मामा।

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