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Saturday, January 22, 2011

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काला धन और काला मन
कुछ सप्ताह पहले के अपने ब्लॉग में मैंने राम जेठमलानी, सुभाष कश्यप और के.पी.एस. गिल द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका के विदेशों के - टैक्स हेवन्स में जमा भारतीय धन को भारत वापस लाने हेतु सरकार को बाध्य किया जाए - का उल्लेख किया था। 15 जनवरी को सुबह समाचारपत्रों में यह समाचार पढ़कर लाखों पाठक अवश्य ही प्रफुल्लित हुए होंगे कि एक दिन पूर्व न्यायालय ने सोलिसीटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम को उस समय बुरी तरह से लताड़ा, जब उन्होंने यह बताया कि सरकार को जर्मन सरकार से लीसटेनस्टीन बैंक में जमा सभी भारतीय नागरिकों के धन के बारे में पूरी जानकारी मिली है, लेकिन भारत सरकार इसे सार्वजनिक नहीं करना चाहती। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी और एस.एस. निर्झर की पीठ ने सुब्रमण्यम से पूछा, जिन लोगों ने विदेशी बैंकों में धन जमा किया है, उनके बारे में जानकारी सार्वजनिक न करने के पीछे कौन सा विशेषाधिकार है? न्यायालय ने आगे कहा कि वे चाहेंगे कि पुणे के व्यवसायी हसन अली खान जिसके विरूध्द विदेशी बैंकों में कथित काला धन जमा कराने की जांच प्रवर्तन निदेशालय ने की थी, को भी याचिका में एक पार्टी के रूप में शामिल किया जाए।
पेज 1 का शेषन्यायालय की टिप्पणियों के परिप्रक्ष्य में, सोलिसीटर जनरल ने कहा कि वे सरकार से निर्देश लेंगे। गत् सप्ताह इस समूचे मुद्दे पर विचार करने के लिए एन.डी.ए. की एक विशेष बैठक हुई। संसद में एन.डी.ए. के सभी दलों के सदन के नेताओं ने भाग लिया और प्रधानमंत्री को एक कड़ा पत्र तैयार किया। इस पत्र के तीन पैराग्रा$फ निम्नलिखित हैं हमारी आशंका है कि इस मोर्चे पर यूपीए सरकार द्वारा सक्रियता न दिखाने के पीछे उसे स्वयं अपने फंसने का डर है। आ$िखरकार, संयुक्त राष्ट्र द्वारा '$फूड फॉर ऑयल' घोटाले की जांच हेतु गठित वोल्कर रिपोर्ट ने कांग्रेस पार्टी को एक लाभार्थी के रूप में नामित किया है। हमारी जांच एजेंसियों और राजस्व एजेंसियों की जांच में यह सा$फ सिध्द हुआ है जो कि ढ्ढञ्ज्रञ्ज के आदेश में भी परिलक्षित होता है, कि बो$फोर्स घूस काण्ड में दलाली लेने वालों में अतावियो क्वात्रोची ने ए.ई. सर्विसेज़ और कोल बार इन्वेस्टमेंट जैसी कम्पनियों की आड़ में घूस ली है। अतावियो क्वात्रोची और उनकी पत्नी मारिया के कांग्रेस पार्टी के परिवार विशेष से सम्बन्ध सर्वज्ञात हैं और उन पर कोई विवाद नहीं है। एक स्विस पत्रिका के 19 नवम्बर, 1991 के अंक में प्रकाशित एक खोजपरक समाचार में तीसरी दुनिया के 14 वैश्विक नेताओं के नाम दिए गए हैं, जिनके स्विटज़रलैण्ड में खाते हैं। भारत के एक पूर्व प्रधानमंत्री का नाम भी इसमें शामिल है। रिपोर्ट का आज तक खण्डन नहीं किया गया। डा. येवजेनिया एलबट्स की पुस्तक में चौंकाने वाले रहस्योद्धाटन किए गए हैं कि भारत के एक पूर्व प्रधानमंत्री और उनके परिवार को रूस के व्यवसायिक सौदों के बदले में लाभ मिले हैं। ये शोधपरक समाचार हैं जो लेखों या पुस्तकों के रूप में प्रकाशित हुए हैं। जिनके विरूध्द जांच की गई है, उन्होंने औपचारिक रूप से न तो इसका खण्डन किया है और न ही उन्होंने ऐसे संदेह पैदा करने वाले प्रकाशनों के विरूध्द कोई कार्रवाई की है। यह सरकार के लिए महत्वपूर्ण है कि वह सुनिश्चित करे कि पूर्व प्रधानमंत्री सहित भारत के अतीत एवं वर्तमान नेताओं के नाम पर कलंक न लगे। अत: या तो इन आरोपों को ज़ोरदार ढंग से खण्डन करना चाहिए या इनकी जांच होनी चाहिए। वैश्विक अर्थव्यवस्था में शुचिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक स्वैच्छिक संगठन ग्लोबल $फाइनेंशियल इंटिग्रिटी अच्छा काम कर रहा है। पिछले महीने ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटी द्वारा जारी एक सारगर्भित रिपोर्ट भारत के बारे में कुछ यह कहती है 1948 से 2008 तक भारत ने अवैध वित्तीय प्रवाह (गैरकानूनी पूंजी पलायन) के चलते कुल 213 मिलियन डालर की राशि गंवा दी है। यह अवैध वित्तीय प्रवाह सामान्यतया भ्रष्टाचार, घूस और दलाली तथा अपराधिक गतिविधियों से जन्मता है। अवैध वित्तीय प्रवाह अवैध रूप से कमाए गए, स्थानांतरित या उपयोग में लाए गए देश से बाहर भेजे गए धन से जुड़ता है; इसमें सामान्यतया भ्रष्टाचार, सौदे के बदले सामान, अपराधिक गतिविधियों जैसी $गैर-कानूनी गतिविधियों से कमाए गए धन का स्थानांतरण और देश के कर से बचाने के लिए सम्पत्ति को संरक्षण देना शामिल है। रिपोर्ट आगे जोड़ती है भारत की वर्तमान कुल अवैध वित्तीय प्रवाह की वर्तमान कीमत कम से कम 462 बिलियन डालर है। यह अल्पावधि अमेरिका ट्रेजऱी बिल की दरों पर सम्पत्ति पर लाभ के दरों की बराबर पर आधारित है।

जो काम सरकार न कर सकी...
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी देश की संप्रभु सरकार जो काम करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है, वह काम अब विकीलीक्स करने जा रहा है। शुक्रवार जनवरी 14 को वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते, हुए सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को फटकार लगाई थी, कि आ$िखर क्या कारण है कि सरकार उन लोगों के नाम सार्वजनिक नहीं कर रही है, जिनका पैसा स्विस बैंकों में जमा है, और जिनकी सूची केन्द्र सरकार के पास उपलब्ध हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी भले ही केन्द्र सरकार अभी तक उन लोगों के नाम सार्वजनिक करने या फिर सुप्रीम कोर्ट को ही सीलबंद लि$फा$फे में देने की हिम्मत नहीं जुटा पायी है, विकीलीक्स ने दावा किया है, कि वह स्विस बैंकों में दुनिया के उद्योगपतियों, नौकरशाहों, कलाकारों सहित दुनिया भर के करीब 40 राजनीतिज्ञों का खुलासा करेगा। केबलगेट आपरेशन चलाकर अमेरिका को दहला देने वाले स्वीडिश वेबसाइट विकिलीक्स को ऐसे करीब दो हज़ार लोगों का ब्यौरा हासिल होने जा रहा है, जिन्होंने स्विस बैंकों में पैसा जमा कर रखा है।
इनमें भारतीयों के भी नाम शामिल हैं।सोमवार जनवरी 24 को उसे इन स्विस बैंक खाताधारकों का कच्चा चि_ा मिल जाएगा। पूर्व स्विस बैंकर रुडोल्$फ एल्मर चुनिंदा खाताधारकों का विवरण विकिलीक्स को मुहैया कराएंगे। समाचार पत्र डेर सोन्नटैग को एल्मर ने बताया कि विदेशी खाताधारकों को ब्यौरा सोमवार को वह लंदन में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में विकिलीक्स को सौंप देंगे। हालांकि विकिलीक्स जानकारी हासिल हो जाने के बाद भी इसे जल्द सार्वजनिक नहीं किया करेगा। एल्मर ने स्विस अ$खबार से कहा कि वह करीब दो हज़ार खाताधारकों के नाम और उनके बैंक खाते के ब्यौरे से संबंधित जानकारी वाले दो सीडी को विकिलीक्स को सौंप देगा। इसके पूर्व एल्मर ने स्विस बैंक के अंदरुनी दस्तावेज़ को विकिलीक्स पर सार्वजनिक किया था। इस मामले में एल्मर पर बुधवार जनवरी 19 को स्विट्जरलैंड में मुकदमा चलाया जाना था।

काबू में नहीं कर पा रहे महंगाई
हृ जैनेन्द्र कुमार
देश ही नहीं विश्व के $फलक पर बेहतरीन अर्थशास्त्री की पहचान रखने वाले डॉ. मनमोहन सिंह ने देश की कमान संभाली, तो जनता को उनसे यही उम्मीद बंधी कि वे कुछ और करें न करें, लेकिन अर्थ के मामले में देश को राहत ज़रूर दिलवाएंगे। एक बेहतरीन अर्थशास्त्री से यह अपेक्षा रखना कि उसके कार्यकाल में जनता को महंगाई से राहत मिलेगी, लाजि़मी ही था। इसके उलट, उनके कार्यकाल में अर्थ-नीति राज-नीति की दुर्गम वीथियों में उलझ कर रह गई और जनता की उम्मीदें और सपने एक के बाद एक, चकनाचूर होते गए। और यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। पहले इकोनॉमिक रिसेशन के नाम पर और फिर $फसल $खराबे के नाम पर, तो कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल और गैस की कीमतें बढऩे की आड़ लेकर यूपीए सरकार ने कीमतें बढ़ाने का क्रम ज़ारी रखा। दिनोंदिन बेतहाशा बढ़ती महंगाई ने पिछले सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। यह महंगाई कहीं सरकार को भारी न पड़ जाए, इसी सोच के चलते हाल ही देश के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में तीन दिवसीय मैराथन बैठक चली। अ$फसोस, तीन दिन तक चलने वाली बैठक बेनतीजा रही। कोई महंगाई से पार पाने का रास्ता तो नहीं दिखा, अलबत्ता महंगाई से परेशान देश के आला नेता आपस में उलझ बैठे। महंगाई के बढ़ते ग्रा$फ का बारीकी से अध्ययन किया जाए तो सा$फ हो जाता है कि कुछ महीनों की समयावधि के अंतराल पर सरकार की नीतियां कीमतें बढ़ाने वाली ही रही हैं। मसलन, सरकार ने मात्र चार महीनों में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत ८.४ $फीसद बढ़ाई, पेट्रोल की कीमतें $फरवरी २०१० में ४७ रुपए ४३पैसे प्रति लीटर से बढ़ाकर जून में ५१ रुपए ४३ पैसे प्रति लीटर की गईं। पहली बार वृद्धि बजट घाटे को कम करने के लिए की गई और फिर पेट्रो पीएसयू की कमाई के अंतर को पाटने के लिए यह कदम उठाया गया। दोनों अवसरों पर यह कदम मुद्रास्$फीति में वृद्धि को नज़र अंदाज़ करके उठाया गया। इसके बाद भी सरकार ने अलग-अलग वजहें बताकर पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने का क्रम जारी रखा। पेट्रोल की कीमतों की बात करें तो हाल ही १६ जनवरी, २०११ को फिर से यूपीए सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि की, इससे अब पेट्रोल की कीमत प्रति लीटर जयपुर में ५९ रुपए २६ पैसे से बढ़कर ६२ रुपए १३ पैसे हो गई है। मुबई में पेट्रोल की कीमत ६० रुपए ४६ पैसे प्रति लीटर से बढ़कर अब ६३ रुपए ३० पैसे हो गई है। दिल्ली में पेट्रोल पहले ५५ रुपए ८७ पैसे की दर से दिया जा रहा था, जो अब ५८ रुपए ४० पैसे प्रति लीटर का भार उपभोक्ता की जेब पर डाल रहा है। चैन्नई की बात करें तो वहां पेट्रोल की कीमत ६० रुपए ६५ पैसे प्रति लीटर से बढ़ाकर ६३ रुपए ४० रुपए कर दी गई है। कोलकाता में पेट्रोल पहले उपभोक्ता की जेब से ५९ रुपए ९० पैसे प्रति लीटर निकालता था, वहीं अब उपभोक्ता को ६२ रुपए ६० पैसे प्रति लीटर के हिसाब से देने पड़ रहेे हैं। इस बार पेट्रोल की कीमतों में करीब ४.५ $फीसद प्रति लीटर की वृद्धि की गई है। इससे पहले दिसंबर २०१० में खाद्य सामग्री की कीमतों की महंगाई २१.६ फीसद पर पहुंच गई थी घरेलू गैस-एपीजी, पेट्रोल, डीजल, कच्चे तेल, खाद्य पदार्थ, दालें, मसाले, सब्जि़यां यहां तक कि अनाज भी बढ़ती महंगाई के शिकंजे से अछूता नहीं है। प्याज़ १०० रुपए प्रतिकिलो की सीमा को भी पार कर गया है, वहीं पेट्रोल की आए दिन बढ़ती कीमतें आम जनता को काट खाने को दौड़ती हैं। ३०-४० रुपए प्रति किलो की दर से बिकने वाला लहसुन ४०० रुपए प्रति किलो तक बेचा जा रहा है। इससे भी बढ़ी महंगाई: सच तो यह है कि छठे वेतन आयोग के लागू करते ही सरकार ने यह मान लिया कि अब लोगों के पास $खर्चने के लिए का$फी पैसा आ गया है। इसके बाद से ही आए दिन किसी न किसी वस्तु के किसी न किसी बहाने से दाम बढ़ाने का सिलसिला चल निकला। जबकि मज़दूरों, किसानों और निजी संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन में किसी तरह का इज़ा$फा नहीं हुआ। ऐसे में महंगाई ने इन वर्गों के सामने पेट भरने का संकट खड़ा कर दिया। महंगाई के लगातार बढऩे से भारत के $गरीब तबके के साथ ही मध्य तबका भी इसकी चपेट में आ गया। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह बजट देखे या अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करे। ऐसे में कजऱ् लेना उसकी मजबूरी हो चला है। यही कजऱ् किसानों के लिए तो आत्महत्या का कारण बन जाता है। बेतहाशा बढ़ती महंगाई का एक स्याह पहलू तो यह है कि विदर्भ और मध्य प्रदेश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं और सरकार नीरो बनी बंसी बजाने में मगन है। सुनवाई नहीं: पहले कीमतें बढ़ाने पर जनता विरोध में हड़ताल, चक्काजाम, धरना-प्रदर्शन सरीखी प्रतिक्रिया कर सरकार को-रोल बैक करने के लिए मज़बूर कर देती थी, लेकिन अब कमज़ोर विपक्ष और घपलों-घोटालों की गूंज में जनता की आवाज़ कहीं खो गई है। आम जनता की बात महंगाई के मामले में किसी भी स्तर पर सुनी ही नहीं जा रही। ऐसे में आम जनता करे तो क्या करे। वह $खून का घूंट पीकर रह जाती है। जनता अंदर ही अंदर महंगाई से पूरी तरह टूट चुकी है। उसे कहीं से भी उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आ रही है। ऐसे में वह कजऱ् लेने और फिर कजऱ् पे कजऱ् और ब्याज़ पे ब्याज़ चुकाने को मज़बूर है। ऐसे में कजऱ् के मजऱ् से जकडऩे के बाद यदि जनता आत्महत्या का रास्ता अपना ले तो किसी को अचम्भा नहीं होना चाहिए। ...फिर ऐसा क्यों?: देवेगौड़ा, गुजराल और नरसिंह राव के प्रधामंत्रित्व काल में बतौर वित्त मंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह ने सरकार को महंगाई समेत कई मुद्दों पर पेच फंसने पर रास्ता दिखाया और उन सरकारों में रहते हुए सराहनीय काम किया। इससे देश ही नहीं विदेश में भी उनकी सा$ख बढ़ी। ऐसे में महंगाई घटाने का रास्ता सरकार के पास नहीं है या सरकार के पास जादू की छड़ी नहीं कि उसे घुमाते ही जनता को महंगाई से राहत मिल जाए। ऐसे जुमले कह कर यूपीए सरकार बच नहीं सकती। जब मनमोहन विदेश मंत्री या अन्य किसी पद पर रहते सरकार को सही राह दिखाते और सराहनीय कार्य करते रहे तो अब उनकी क्षमताओं पर प्रश्न चिन्ह क्यों उठना चाहिए? अब जबकि एक तरह से वे सर्वेसर्वा हैं तो उन्हें महंगाई से निज़ात दिलाने का रास्ता क्यों नहीं सुझाई पड़ता। क्या जनता यह मान ले कि अर्थशास्त्री मनमोहन अब बेहतर राजनीतिज्ञ और बदतर अर्थशास्त्री हो गए हैं? आ$िखर क्यों दुनिया का ख्यात अर्थशास्त्री आज इतना असहाय नज़र आता है? क्या वजह है पत्नी के एलपीजी गैस के दाम न बढ़ाने की $फरमाइश को दरकिनार कर वे दाम बढ़ा देते हैं? क्यों एक संवेदनशील आला दर्जे का व्यक्ति आज संवेदनाओं से परे जा बैठा है? क्यों किसानों की हत्या से उसका हृदय द्रवित नहीं होता? क्यों ईंधन के दाम लगातार बढ़ाए जा रहे हैं कि लोगों को सुकून देने वाले वाहन आज उनकी मुसीबत बन बैठे हैं? क्या जनता यह मान ले कि आम हो या $खास, पढ़ा हो या बेपढ़ा, सचरित्र हो या दुष्चरित्र-सत्ता ऐसी चीज़ है कि उसके मिलते ही वह इन सबका भेदभाव माने बिना सभी को समान रूप से भ्रष्ट बना ही देती है? ऐसे अनगिनत प्रश्न आज भारतीय जनता के ज़ेहन को लगातार मंथ रहे हैं। और इन सभी का जवाब मनमोहन और यूपीए सरकार को देर-सवेर देना ही होगा। अगर चुप्पी साधने या हाथ खड़े करने की नीति पर ही यूपीए सरकार कायम रहती है, तो अगले लोगसभा चुनाव में उसे इसका नतीजा भुगतने को तैयार रहना होगा। इसमें कोई दोराय की गुंजाइश नहीं है।

उमा भारती हैं कि भाजपा में आती ही नहीं
नाटकीय राजनीति का यह एक और नाटकीय अल्पविराम है। लिटिल (नितिन) गडकरी ने भी हथियार डाल दिये। लगता है बात बिगड़ ही गयी। पहले 26 दिसंबर को अपनी नागपुर यात्रा के बाद उमा भारती ने कहा कि वे भाजपा में वापस नहीं आ रही हैं, तो मंगलवार को भुवनेश्वर में नितिन गडकरी ने सा$फ किया कि $िफलहाल तो वे भाजपा में वापस नहीं आ रही हैं, फिर भी वे जब चाहें भाजपा में वापस आ सकती हैं। नितिन गडकरी के शब्दों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब वे चाहें तब, लेकिन सवाल है कि कब? पिछले साल सवा साल से उनकी भाजपा में वापसी की $खबर इतनी द$फा अ$खबारों में प्रकाशित हो चुकी है। अब अ$खबार वाले भी कहते हैं कि अब उनके वापसी की $खबर तभी प्रकाशित करेंगे, जब वे भाजपा में वापस आ जाएंगी।
हर ह$फ्ते पखवाड़े पहले उनकी वापसी की $खबर छपती है, फिर दोनों ही ओर से खण्डन जारी हो जाते हैं. उमा ऐसा अचार हो गयी हैं, जो भाजपा रूपी भरनी में समाने को ही तैयार नहीं। लेकिन इस बार बात गंभीर थी। लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लाग पर लिखा था, कि उमा की ज़रूरत है। उमा भारती भाजपा में वापसी के लिए जिस सम्मानजनक रास्ते की तलाश में थी, वह रास्ता वाया ब्लाग आडवाणी जी ने उपलब्ध कराने की कोशिश की, लेकिन फिर नतीजा वही ढाक के तीन पात। मामला टांय टांय फिस्स हो गया। अगर आप एक लाइन में जानना चाहते हैं, कि आ$िखर उमा भारती भाजपा में वापस क्यों नहीं आती, तो कारण यह है कि उमा भारती चाहती हैं, कि उन्हें गाजे बाजे के साथ पार्टी में वापस लाया जाए, और पार्टी के लिए उन्होंने जो काम किया है उसके पूरे सम्मान को तराज़ू के एक पलड़े पर रखा जाए, और दूसरे पर उनकी वापसी की ताजपोशी हो। वे इस बात के लिए तैयार नहीं हो पा रही हैं कि उत्तर प्रदेश में वे एक बार फिर वैसी ही मेहनत करें, जैसा मध्य प्रदेश में किया था। उनका सवाल है कि इतनी मेहनत के बाद दोबारा अगर वे उत्तर प्रदेश में पार्टी को खड़ा करती हैं, तो क्या गारंटी है कि उनके साथ एक बार फिर उसी तरह का व्यवहार नहीं होगा, जैसा मध्य प्रदेश में हुआ? उमा के इस सवाल का भाजपा के पास कोई जवाब नहीं है। उल्टे भाजपा में बैठे गद्दीनशीन नेता उमा भारती को घुटने के बल रेंगते हुए पार्टी में लाना चाहते हैं, ताकि उनका इस्तेमाल तो हो, लेकिन $खुद उमा भारती प्रभाव से मालामाल न हो सकें। अब भाजपा वालों को कौन बताए कि उमा भारती को हल्की सी अर्थराइटिस की समस्या हो गयी है। वे चाहें भी तो भी भाजपाइयों की इच्छा पूर्ति नहीं हो सकती। इसलिए दोनों दूर ही $खुश हैं।

Saturday, January 15, 2011





महंगाई पर शहीद होगी सरकार!

मनमोहन की छीछालेदर और परेशानी-पहले मनमोहन की शालीनता को दरकिनार कर उन्हें अब तक का सबसे अक्षम पी।एम. कहा गया, उन्हें सोनिया
केइशारे पर चलने वाला कहा गया, $िफर पी.एम. को आदर्श हाउसिंग सोसाइटी स्कैम के नाम पर घेरा गया, तो २जी स्पैक्ट्रम मामले में भी उनकी $खूब किरकिरी हुई, उन्होंने आहत होकर पीएसी के समक्ष पेश होने की पेशकश की। और अब महंगाई के मुद्दे पर घिरने के बाद बैठक बुलाई तो उसमें कोई हल निकलने की जगह दो दिग्गज़ आपस में ही उलझ बैठे। इन सब से आहत होकर पीएम इस्ती$फे की पेशकश कर सकते हैं, सत्ता के गलियारों में इस बात की फुसफुसाहट होने लगी है। उनका इस्ती$फा देने और मध्यावधि चुनाव करवाने के पीछे कांग्रेस पार्टी के पास पर्याप्त कारण हैं। विश्लेषण कर रहे हैं- जैनेन्द्र कुमार जयपुर।
महंगाई डायन को काबू करने के लिए सरकार कभी चीनी के व्यापारियों के यहाँ छापे मारती है, तो कभी प्याज़ के आढ़तियों को सरकारी छापों का सामना करना पड़ता है। सरकार ने सब्सिडी पर भी प्याज़ देने की मुहिम छेड़ रखी है। इसके बावजूद सब्जि़यों, दालों, चीनी जैसे खाद्य पदार्थों के साथ ही डीज़ल-पेट्रोल के दामों में भी बेतहाशा वृद्धि हो रही है। महंगाई अब $गरीब की झोली से छिटक कर पूरे देश पर शिकंजा कस चुकी है। अब तक $गरीब जनता को खाने वाली यह डायन महंगाई, कहीं सरकार को ही न डस ले, इसी आशंका के चलते महंगाई पर काबू पाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सरकार की तीन दिवसीय बैठक १२ जनवरी को समाप्त हो गई। सरकार की मैराथन बैठक में महंगाई से पार पाने की कोई सूरत तो नहीं निकली, अलबत्ता प्रणब मुखर्जी और शरद पवार उलझ बैठे। यह बैठक कितनी महत्वपूर्ण थी, इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री और देश के पीएम मनमोहन सिंह, गृह मंत्री पी.चिदंबरम, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, कृषि मंत्री शरद पवार, कैबिनेट सैक्रेट्री, ची$फ इकोनॉमिक एडवाइज़र सरीखे दिग्गज़ शामिल हुए। तीन दिनों तक दिमाग की सारी नसों को हिला देने वाली इस बैठक का नतीज़ा सि$फर रहा, या यूँ कहिए कि ढाक के तीन पात। पी.एम. की ओर से कहा गया कि महंगाई की वज़ह वैश्विक अर्थव्यवस्था है। यह बात भी निकल कर आई कि सरकार के पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं, कि वह घुमाए और महंगाई फुर्र से $गायब हो जाए। इतना ज़रूरी कहा गया कि मौसम की मार की वज़ह से $फसलों पर विपरीत असर पड़ा है जिसके चलसे खाद्य जिंसों की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, जो संभवतय: अगली $फसल आने के बाद काबू में आ जाएंगी।
महंगाई के मुद्दे पर सरकार के हाथ खड़े करने के बाद अब मध्यावधि चुनावों की तलवार लटकती नज़र आने लगी है। प्याज़ के कीमतें एक बार $िफर से चढ़ी हैं। भारतीय राजनीति इस बात की गवाह है कि महंगाई पहले भी सरकार को सत्ता से उतार चुकी है। अब ऐसा हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हालात ऐसा ही इशारा करते हैं। मनमोहन की छीछालेदर और परेशानी-पहले मनमोहन की शालीनता को दरकिनार कर उन्हें अब तक का सबसे अक्षम पी.एम. कहा गया, उन्हें सोनिया के इशारे पर चलने वाला कहा गया, $िफर पी.एम. को आदर्श हाउसिंग सोसाइटी स्कैम के नाम पर घेरा गया, तो २जी स्पैक्ट्रम मामले में भी उनकी $खूब किरकिरी हुई, उन्होंने आहत होकर पीएसी के समक्ष पेश होने की पेशकश की। और अब महंगाई के मुद्दे पर घिरने के बाद बैठक बुलाई तो उसमें कोई हल निकलने की जगह दो दिग्गज़ आपस में ही उलझ बैठे। इन सब से आहत होकर पीएम इस्ती$फे की पेशकश कर सकते हैं, सत्ता के गलियारों में इस बात की फुसफुसाहट होने लगी है। उनका इस्ती$फा देने और मध्यावधि चुनाव करवाने के पीछे कांग्रेस पार्टी के पास पर्याप्त कारण हैं। अगर मनमोहन स्ती$फा देते हैं तो मनमोहन की मिस्टर क्लीन की छवि बरकरार रहेगी और लोगों की सहानुभूति का उनके साथ ही कांग्रेस को भी निश्चित ही $फायदा मिलेगा। दूसरा राहुल को प्रधानमंत्री के तौर पर का$फी समय से प्रोजेक्ट किया जा रहा है। पार्टी के आलाकमान की यह इच्छा मध्यावधि चुनाव से पूरी हो जाएगी। राहुल गाँधी, सचिन पायलट जैसे युवा नेता होने से देश का युवाओं का आधार कांग्रेस की ओर हो सकता है। कांग्रेस ने अपनी सरकार के मंत्रियों का नाम घोटाले में आने के बाद तत्काल उनपर कार्रवाई की और उन्हें पद से हटा दिया। इनमें शशि थरूर, कलमाडी, ए.राजा जैसे मंत्री शामिल हैं और उनपर कार्रवाई जारी है। कांग्रेस ने सरकार को पाक सा$फ बनाने का अभियान चला रखा है और दागियों को हटाने की मुहिम तेज़ कर दी है। प्याज़ के मुद्दे ने बीजेपी को सत्ता से उतार दिया था तो कांग्रेस ने प्याज़ के कीमतें बढ़ते ही उसके कीमतों पर नियंत्रण के लिए सस्ती दर पर प्याज़ उपलब्ध करवाने का सिलसिला शुरू करने के साथ ही प्याज के, चीनी के जमा$खोरों के यहाँ छापे की कार्रवाई कर इस बात का संकेत दिया, उसे जनता की $िफक्र है। इसका $फायदा भी कांग्रेस के खाते में ही जाएगा। लखनऊ में हाल ही एक विद्यार्थी के महंगाई पर पूछे सवाल के जवाब में राहुल गाँधी ने कहा -महंगाई कम न होने की वजह गठबंधन की सरकार के दल हैं, उनका इशारा राकांपा के सुप्रीमो शरद पवार की ओर था। यह जग ज़ाहिर है कि पवार शुरू से ही महत्वाकांक्षी रहे हैं, उन्हें जब इस बात का अहसास हुआ कि अनुभवी होने के बाद भी कांग्रेस में रहते उन्हें पीएम की कुर्सी नहीं मिल सकती, क्योंकि इसके उत्तराधिकारी के रूप में पार्टी और देश की जनता राहुल को देख रही है, तो उन्होंने कांग्रेस से अलग पार्टी बनाई। और जोड़-तोड़ की राजनीति में लग गए। ऐसे में राहुल के जवाब से पवार के भड़कने की पूरी आशंका है। बीजेपी जिस बिहार में सफलता का राग अलापते $िफलवक्त नहीं अघा रही है। दरअसरल, वह जीत बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने जैसी ही है। बिहार में बीजेपी की जीत नहीं हुई बल्कि कमज़ोर विपक्ष और कांग्रेस की राजद के लालू यादव से करीबी ही कांग्रेस को ले डूबी। बीजेपी की बात करें तो उसे मध्यावधि चुनाव में $फायदे के बजाय नुकसान ही ज्य़ादा होगा, इसकी भी पर्याप्त वजहें हैं। पहली और सबसे $खास वजह तो यही है कि पार्टी में कोई भी ऐसा कद्दावर नेता नहीं है जिसे बतौर पी.एम. और पार्टी के चेहरे के रूप में पेश किया जा सके। ऐसे में पार्टी के सभी सदस्यों का ज्य़ादा समय तक एक ही दिशा में चलना $िफलवक्त तो संभव नहीं लगता। पार्टी का एक सदस्य कुछ कहता है, तो दूसरा कुछ। जेपीसी की माँग पर जब बीजेपी ने कांग्रेस को घेरा तो मनमोहन की पीएसी के समक्ष पेश होने की गुज़ारिश पर पीएसी प्रमुख और बीजेपी के आला नेता मुरली मनोहर जोशी ने मौन साध लिया, जिससे यह कयास लगाए जा रहे थे, कि यह संवभतया उनकी मौन चुप्पी उनकी सहमति हो सकती है और इससे पूरी बीजेपी में खलबली मच गई थी। ऐसे अंतरविरोधों से जूझती बीजेपी चुनाव में कुछ $खास कर पाएगी, इसकी संवाभना कम ही नज़र आती है। एक दमदार वजह यह भी है कि बीजेपी की कथनी और करनी में का$फी अंतर है, यह बीजेपी ने जता दिया है और जनता इस बात को अच्छे से समझ गई है, ऐसे में उनका पक्ष कांग्रेस की ओर ही रहेगा इसमें कोई दोराय नहीं हो सकती। बीजेपी कांग्रेस को तो भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दों पर कांग्रेस को घेरती रही, लेकिन जब बीजेपी की सरकार थी तो उसने प्याज़ के दाम घटाने के लिए क्या किया? यह किसी से छिपा नहीं है। जहां तक भ्रष्टाचार की बात है तो उसका दामन $खुद ही दा$गदार है तो वह किस मुंह से दूसरे को सा$फ रहने की सीख दे सकती है? येदियुरप्पा को उसने $फौरी फायदे के चलते अब तक नहीं हटाया है और न ही आगे उसे हटाने की उसकी नीयत नज़र आती है। एक तरह से येदियुरप्पा बीजेपी की गल$फांस बन गए हैं। येदियुरप्पा का जनाधार मज़बूत है। वे जनसंघ जमाने से ही पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। वे दक्षिण भारतीय राज्य में मुख्यमंत्री बनने वाले भाजपा के पहले नेता हैं। उनका रिकॉर्ड का$फी अच्छा है और वे कर्नाटक में का$फी लोकप्रिय भी हैं। $खासकर लिंगायत समुदाय के जनप्रिय नेता हैं और कर्नाटक की २० प्रतिशत आबादी लिंगायत समुदाय से है। येदियुरप्पा से इस्ती$फा लेने पर वे अलग से पार्टी बना सकते हैं, और बीजेपी के मुकाबले भी खड़े हो सकते हैं। ज़ाहिर है ऐसे में बीजेपी के हाथ से कर्नाटक का गढ़ चला जाएगा। दूरदृष्टि से भी बीजेपी को इससे दक्षिण भारत में पैर जमाने के सभी रास्ते लगभग बंद हो जाएंगे। इस सब को देखते हुए बीजेपी ने कोई कार्रवाई नहीं की है। इसके बावजूद बीजेपी को यह नहीं भूलना चाहिए कि चुनाव में यही मुद्दा उछाल-उछाल कर कांगे्रसी और दूसरे दल पार्टी के चेहरे पर कालिख मलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। ऐसे में पार्टी की राष्ट्रीय छवि तो धूमिल होगी ही, अगर उसका सूपड़ा-सा$फ ही हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। अब देखना यह है कि राजनीति की बिसात पर राज करने वाले नेताओं की ओर से मध्यावधि चुनाव का शंखनाद कब और कैसे होता है। जनता को इसी का इंतज़ार है, क्योंकि वह भ्रष्टाचार और महंगाई के दलदल में $फंसे देश की सरकार को चुनाव के ज़रिए फिर से अपने मत की शक्ति दिखाने को बेताब है।


किसान पुत्र, किसानों की सुध लो
बड़े शर्म की बात है कि किसान पुत्र के प्रदेश में किसानों द्वारा उन्हें अपना जीवन निर्रथक सा लग रहा है और वे थोक में आत्महत्यायें किये जा रहे हैं। इसी एक माह के दौरान सात किसानों द्वारा आत्म हत्यायें की गई हैं, और करीब इतने ही किसानों ने कीटनाशक व अन्य ज़हरीली वस्तुओं का सेवन कर, $खुद कुशी करने का दुस्साहस किया है।

भोपाल।
प्रदेश के किसान पुत्र शिवराजसिंह के हाथों में प्रदेश की कमान है। उसकी अपनी पार्टी भा.ज.पा. का वर्चस्व हासिल है। विपक्षी दल इतने दुर्बल हैं कि व्यवस्था में कहीं भी द$खल देने का न अधिकार रखते हैं, न उनकी कुव्वत है। ऐसे में इन के राज में किसान, जो सर्दी, गर्मी, बरसात, जाड़ा, आन्धी, तू$फान, के सारे संकट झेल कर अन्न व अन्य खाद्य पदार्थ उपजा कर, हम सब का पेट पालते हैं, वही दुखी हैं। दुख की भी कोई हद होती है। दुख जब हद से बढ़ जाता है और कहीं से कोई सहारा नहीं सूझता, तभी दुखी व्यक्ति अपना जीवन निरर्थक जान कर, आत्यहत्या की सोचता है। बड़े शर्म की बात है कि किसान पुत्र के प्रदेश में किसानों द्वारा उन्हें अपना जीवन निर्रथक सा लग रहा है और वे थोक में आत्महत्यायें किये जा रहे हैं। इसी एक माह के दौरान सात किसानों द्वारा आत्म हत्यायें की गई हैं, और करीब इतने ही किसानों ने कीटनाशक व अन्य ज़हरीली वस्तुओं का सेवन कर, $खुद कुशी करने का दुस्साहस किया है।
अभी कुछ ही दिन पूर्व प्रदेश के करीब एक लाख किसानों का जमावड़ा भोपाल में हुआ जब उन्हेंने ट्रैक्टर ट्रालियां , तम्बू कनातें, कम्बल राशन आदि सहित 3 दिनों तक यह डेरा डाले रखा और उन के नेताओं से चर्चा कर उन्हें आश्वासनों की घुटी देकर वापिस अपने अपने घरों को भेज दिया गया। क्या माननीय मुख्यमंत्री जी किसानों के बीच में से हैं, उनके दुख दर्द को समझते हैं या आंख कान आदि बन्द कर जानते हुये भी अनजान का सा अभिनय कर रहे हैं। एक ओर तो ''वोट बटोरÓÓ दौड़ लगाने में मस्त, कन्याओं के शादी विवाह करवा रहे हैं एवं इसी प्रकार की और अनेक योजनायें चलाये जा रहे हैं, दूसरी ओर घर परिवार समाज की जड़ अन्नदाता किसान की अनदेखी कर के उन्हें $खुद कुशी हेतु मज़बूर किया जा रहा है। न असली अच्छे खाद,बीज, कीटनाशक आदि उपलब्ध कराये जा रहे हैं, और न ही मौसम की मार के समय कोई तहत दी जा रही है। आर्थिक सहायता या सहयोग की तो बात ही क्या करें। बेचारे निजी अथवा बैंकों के कजऱ्ों के बोझ तले दबे परेशान किस से शिकायत करें या गुज़ारिश करें। गिनाने को तो ढेर सारी योजनायें बनाई गई, हैं और उन योजनाओं की आड़ में आप श्री मान जी के चमचे, लगुए भगुए सब चट कर जाते हैं, और किसान को मिलता है, तो केवल आप जैसे नेताओं का आश्वासन अथवा द$फ्तरों के चक्कर। किसान पुत्र मुखिया के रहते उनकी टीम के मंत्री इस दुर्दशा का जि़म्मेदार स्वंय किसानोंं को ही बता रहे हैं, और उनके कारिन्दे इन आत्महत्याओं को किसानों के आर्थिक कारणों को न मान कर पारिवारिक कारण बता रहे हैं। आप के ही $खैमे से इन घटनाओं और $खबरों को मीडिया की साजि़श बताया जा रहा है। इस से भी और शर्म की बात क्या हो सकती है, कि सही तस्वीर व आयना दिखाने वाले को ही सूरदास बताया जा रहा है। किसान पुत्र के प्रदेश में ही उस की टीम के सारे मंत्रियों के पास अच्छे से अच्छी और बढिय़ा कारें आदि गाडिय़ोंं के मौजूद रहते 22-22 लाख की और नई गाडिय़ों की व्यवस्था की जा रही है। सारे विधायकों मंत्रियों के वेतन भक्तों में इज़ा$फा कर $गरीब किसान जनता पर हर तरह का टैक्सों का बोझ लाद दिया गया है। $गरीब किसान को कुएं लगाने चलाने हेतु कई प्रकार के पापड़ बेल कर कजऱ् उठा कर भी अधिकारियों दलालों को दलाली यदि नहीं दी जाती, तो सैंकड़ों चक्कर लगाने के बाद भी कजऱ् की सुविधा नहीं मिल पाती। इसी लिये हे प्रदेश के मुखिया, किसान पुत्र, किसी प्रकार भी अन्य योजनाओं पर भले ही कुछ समय हेतु विराम लगाना पड़े, मौसम की मार व सरकारी कारिन्दों की $िफटकार खाये दुख दर्द से कराह रहे प्रदेश के इन अन्नदाताओं की सुध लो। उनके लिये अच्छे खाद, बीज, आर्थिक सहायता, बिजली, पानी व पशुओं हेतु चारा एवं चिकित्सा आदि शीघ्र उपलब्ध कराओ, तभी आपका यह प्रदेश स्वर्णिम प्रदेश बनने का सपना पूरा कर पायेगा।




हंसाएगी यमला पगला दीवाना: बॉबी
पिता धर्मेन्द्र के साथ देओल बंधुओं की $िफल्म यमला पगला दीवाना के प्रति दर्शकों की दीवानगी अभी से दिख रही है। पहले प्रोमो से ही पाजि़टिव रेस्पांस मिल रहे हैं। सनी और धर्मेन्द्र ने म्यूजि़क रिलीज़ के समय कहा भी कि लोग ट्रेलर देखकर ही ऐसी तारी$फ कर रहे हैं, मानो हमारी फिल्म हिट हो गई है। ख़ैर, $िफल्म का बॉक्स ऑ$िफस रिजल्ट तो $िफल्म रिलीज़ के बाद पता चलेगा।
़ यमला पगला दीवाना को लेकर आपकी पहली राय क्या है?
ह्न सालों के बाद ऐसी $िफल्म की है, जिसे लेकर पूरा विश्वास बना हुआ है। यह लोगों को हंसाएगी। दर्शकों के रिएक्शन भी हमारे विश्वास के समान मजबूत और पाजिटिव हैं। कॉमेडी मुश्किल काम है। आजकल कॉमेडी $िफल्में ज्य़ादा बन रही हैं, लेकिन $गौर करेंगे कि उनमें कॉमेडी कम होती है और लती$फेबाज़ी ज्य़ादा रहती है। हमारी $िफल्म किसी का मज़ाक नहीं उड़ाती।
़ लेकिन प्रोमो में तो आप सनी और धरम जी का मज़ाक उड़ाते हैं?
ह्न ऐसा लगता है कि मैं उनका मज़ाक उड़ा रहा हूं। भैया की इमेज सभी को पता है। हमारा राइटर जस्सी है। उसने डायलॉग लिखे हैं। पहले लगा कि यह सही लगेगा कि नहीं.., फिर रियलाइज़ किया कि इस पर दर्शक हंसेंगे। बाद में उन्होंने टंकी वाला सीन भी करवा लिया मुझसे। शोले के उस सीन को आप री-क्रिएट नहीं कर सकते। $िफल्म में मेरा कैरेक्टर जैसा है, वह इस तरह की बात सोच सकता है। उसे लगता है कि टंकी पर चढ़ जाएगा तो बात बन जाएगी। भैया बोलते हैं कि कुछ नहीं हो सकता, जमाना बदल गया है। आजकल टंकी पर चढऩे से बात नहीं बनती।
़ यह $िफल्म पंजाब में शूट हुई है। आप सभी पंजाबी हैं। कैसा अनुभव रहा?
ह्न हम तीनों कभी इतने दिनों तक एक साथ पंजाब में नहीं रहे। हमलोग 45 दिनों तक वहां रहे। सर्दी और गर्मी में $िफल्म की शूटिंग चली। मां के मायके के पास हमलोग शूटिंग कर रहे थे। वहां से खाना आ जाता था। $खूब छक कर खाया हम सभी ने। वहां से वज़न बढ़ाकर लौटे।
़ आपके परिवार में स्नेह और आदर की अहमियत है। उसका $खयाल भी रखा जाता है, लेकिन इस $िफल्म में वे हदें टूट गई लगती हैं?
ह्न यह तो $िफल्म है। सभी जानते हैं, कि मैं भैया और पापा के सामने कैसे बिहेव करता हूं। मैं तो इस तरह से बातें भी नहीं करता। $िफल्म के लिए ज़रूरी था। यह कॉमेडी $िफल्म है, इसलिए मुझे डायलॉग बोलने या सीन करने में ज्य़ादा दिक्कत नहीं हुई।
़ पापा के साथ कॉमिक टाइमिंग मैच करने में भी चुनौती आई?
ह्न उनकी कॉमिक टाइमिंग लाजवाब है। सभी जानते हैं कि वे कॉमेडी $िफल्मों में कैसा कमाल करते हैं। हमने मैच करने की कोशिश की है, लेकिन पापा के साथ हमारी तुलना नहीं हो सकती। इस उम्र में भी उनका जोश देखते ही बनता है। आप के सामने एक अच्छा ऐक्टर हो, तो आप भी अच्छा करने लगते हैं।
़ क्या कहानी है $िफल्म की?
ह्न यह दो ठगों की $िफल्म है। मैं और पापा बाप-बेटे हैं। $िफल्म में भाई बिछड़ गया है। बड़ा भाई अपने छोटे भाई और पिता को खोजते हुए आया है। हम दोनों उसका $फायदा उठाते हैं। हमें लगता है कि हमारा दिमा$ग और इसकी ताकत साथ हो जाए तो हम दुनिया लूट लेंगे। उसी में कहानी बनारस से पंजाब पहुंचती है।
़ $िफल्म से दर्शकों की उम्मीदें ज्यादा हैं? क्या उनकी उम्मीदें पूरी होंगी?
ह्न ज़रूर होंगी। देखिए $िफल्म अच्छी बनी है, इसलिए प्रोमो इतने अच्छे बने हैं। प्रोमो हमने अलग से शूट नहीं किए हैं। जो भी लोग देख रहे हैं, वह $िफल्म में हैं। $िफल्म में सिचुएशन और कंफ्य़ूज़न है। ज़बरदस्त कॉमेडी है। अभी से मैं क्या बताऊं। जब लोग देखेंगे, तो पता चलेगा।
़ $िफल्म के निर्देशक समीर कार्णिक का साथ कैसा लगा?
ह्न अब उनसे दोस्ती हो गई है। उनके काम पर मुझे यकीन है।
़ इस $िफल्म की शुरूआत कैसे हुई?
ह्न भैया की पारखी नज़र ने राइटर जसविंदर में कुछ देखा। उन्होंने उसे समीर के पास भेजा। पहले तो समीर को लगा कि हमने किसी राइटर रिश्तेदार को कुछ करने के लिए भेज दिया है। बाद में वे जसविंदर के साथ बैठे तो कहानी बनती चली गई। यह $िफल्म दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करेगी। उनके लिए नए साल की अच्छी शुरुआत होगी।

Friday, January 7, 2011





आरूषि मर्डर केस
रसू$ख का दबदबा या जाँच में कोताही

कुमार

राजेश तलवार जैसे नामचीन आदमी की चौदह वर्षीय बेटी आरुषि तलवार को करीब तीन साल पहले उसके ही घर में मौत के घाट उतार दिया गया। इस मासूम की हत्या के बारे में शुरू से ही पुलिस प्रशासन मीडिया से कुछ भी कहने से कन्नी काटता रहा, और अब सीबीआई ने भी अपर्याप्त साक्ष्यों का हवाला देते हुए क्लोज़र रिपोर्ट पेश कर दी है। हालांकि, अब तक मिले साक्ष्यों की रोशनी में देखा जाए, तो सा$फतौर पर तलवार दंपती शक और शुबहा के दायरे में नज़र आते हैं। फिर भी इन पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई न कर पुलिस और सीबीआई लीपापोती करती ही नज़र आती है। कहीं इन सबकी वजह अरुषि के पिता डॉ. राजेश तलवार का रसू$खदार होना तो नहीं है?
आरुषि तलवार नोएडा के जलवायु विहार स्थित अपने निवास पर संदिग्ध अवस्था में मृत पाई गई। उसके अगल ही दिन उसके 45 वर्षीय नौकर हेमराज की लाश छत से बरामद की गई। महीनों तक इस दोहरे हत्याकांड की खबरें अखबारों अैर पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियों में रहीं। शुरू से ही इस केस में पुलिस कु छ भी सा$फ-सा$फ बोलने से अचकचाती रही। उसके बाद इस मुद्दे को अखबारों और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के ज्य़ादा उछालने और तूल पकड़ते देखकर अरुषि और हेमराज के दोहरे हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने के लिए 1 जून, 2008 को जाँच सीबीआई को सौंपी गई। इसके बाद जनता को उम्मीद थी कि देर-सवेर ही सही, यह गुत्थी सुलझ ही जाएगी और कातिलों को उचित सजा मिल पाएगी, लेकिन इससे इतर हाल ही सीबीआई ने पर्याप्त सबूत न होने की बात कहकर इस मामले में क्लोज़र रिपोर्ट पेश की है। वहीं दूसरी तर$फ इस मामले में हत्या के शक में पकड़े गए नौकरों के वकील ने सीबीआई पर मानहानि का मुकद्दमा ठोंकने की बात कही है। इससे पहले कि आरुषि हत्याकांड अतीत के गर्त में समा जाए, आम जनता को भी इस मामले के बारे में साक्ष्यों की रोशनी में यह जानना उचित होगा कि आखिर इसकी सच्चाई क्या हो सकती है। सीबीआई निदेशक ए.पी. सिंह आरुषि हत्याकांड में अब तक मिले साक्ष्यों को अपर्याप्त मानते हैं, लेकिन कोर्ट चाहे तो इन्हीं साक्ष्यों के बूते राजेश तलवार के $िखलाफ आरोप तय यानी चार्जेज़ फ्ऱेम करते हुए ट्रायल शुरू कर सकती है। $िफलवक्त सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता के.टी.एस. तुलसी ने कहा है कि अदालत इस क्लोज़र रिपोर्ट पर कोई भी कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र है। हालांकि, इस केस में जांच से जुड़े सीबीआई के अधिकारियों का अब भी यही मानना है कि उनके जुटाए सुबूत तलवार दंपती को आरोपी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
क्या कहती है सीबीआई की क्लोज़र रिपोर्ट
सीबीआई की नज़र में तलवार दंपती को बेकुसूर ठहराने वाले तथ्य हैं

क्लोज़र रिपोर्ट के अनुसार राजेश के कपड़ों में सिर्फ आरुषि के खून के धब्बे मिले हैं, हेमराज के नहीं। नूपुर के कपड़ों पर भी किसी तरह के $खून के धब्बे नहीं मिले। गोल्$फ क्लब पर खून नहीं मिला और दूसरा धारदार हथियार बरामद नहीं किया जा सका है। शराब की बोतल पर मिले अंगुलियों के निशानों की पहचान नहीं हो सकी। हेमराज के $खून के धब्बे आरुषि के बिस्तर पर नहीं मिले। नूपुर पर हुए नार्को टैस्ट बेनतीजा निकले। दोहरे हत्याकांड का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। हत्यारों के खून से सने कपड़े और जिस कपड़े से $खून सा$फ किया गया, वे बरामद नहीं किए जा सके।
क्या है आरुषि और हेमराज की हत्या की गुत्थी की कहानी सीबीआई की क्लोज़र रिपोर्ट के नज़रिये से
क्लोज़र रिपोर्ट के अनुसार 15 मई 2008 की रात 9:30 बजे डॉ. राजेश तलवार अपने घर पहँचे थे। कुछ देर बाद कोरियर वाला आया, उसने हेमराज को पैकेट दिया, जिसमें डिजिटल कैमरा था, जो डॉ. तलवार ने आरुषि को जन्मदिन 24 मई के दिन देने के लिए मँगवाया था। हालाँकि, तलवार दम्पती ने उसी वक्त आरुषि के कमरे में जाकर उसे कैमरा दिया। आरुषि ने कैमरे से अपने माता-पिता की तस्वीरें खींचीं। उसके बाद दोनों अपने कमरे में आ गए। रात 11:00 बजे नूपुर आरुषि के कमरे में गई और इंटरनेट का राइटर ऑन किया। राजेश ने 11:57 बजे इंटरनेट ऑन किया और रात 12:08 तक उसका उपयोग किया। इस दौरान रात 12:00बजे आरुषि के मित्र अमोल ने लैंडलाइन से $फोन किया, जो राजेश के कमरे में था, उसे किसी ने नहीं उठाया। 16 मई 2008 की सुबह 6:00 बजे नौकरानी भारती ने कॉलबैल बजाई तो रोज़ाना की तरह हेमराज ने दरवाजा नहीं खोला, बल्कि नूपुर ने हेमराज के कमरे से चाबी लेकर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की और असफल रहने पर दरवाज़ा बाहर से बंद होने की बात कह बालकनी से चाबियां भारती को दीं। दरवाज़ा खोलकर अंदर आने पर तलवार दंपती ने रोते हुए भारती से कहा, देखो... हेमराज क्या करके गया है? भारती ने देखा तो वहाँ आरुषि की लाश स$फेद चादर से ढंकी थी।
तत्काल दोस्तों और संबंधियों को बुलाया और पुलिस को सूचना सवा घंटे बाद दी गई, जिसमें बताया गया कि हेमराज हत्या करके भाग गया है। इसी दौरान राजेश के मित्र डॉ.राजीव और डॉ.रोहित कोचर भी वहाँ आए, उन्हें टैरेस के दरवाज़े पर खून के धब्बे दिखे, जिन्हें सा$फ करने की कोशिश की गई। पुलिस ने भी निशान देखने के बाद दरवाजा खुलवाना चाहा, लेकिन राजेश ने अनसुनी कर यही कहा कि पुलिस को इन सब बातों में वक्त ज़ाया करने के बजाय हेमराज को ढँूढऩा चाहिए। दोपहर 3:00बजे आरुषि की बॉडी को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया। इसके बाद फर्श और कमरे की दीवारें जल्दबाजी में सा$फ की गईं। सीबीआई की रिपोर्ट के अनुसार 16 मई से ही राजेश के भाई दिनेश उनके दोस्त डॉ.सुशील चौधरी और रिटायर्ड डीएसपी के.के.गौतम आपस में सम्पर्क में थे। डॉ.चौधरी ने तब गौतम को बताया कि डॉ.दिनेश चाहते हैं कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रेप का जि़क्र न हो। हत्या के बाद $फोन $गायब था, जो नोएडा के सदरपुरा में करीब 15 दिन बाद मिला, लेकिन उसकी मैमोरी किसी ने हटा दी थी। डॉ. राजेश की डाइनिंग टेबल पर मिली शराब की बोतल पर आरुषि और हेमराज के $खून के निशान थे। पोस्टमार्टम शुरू होने से पहले डॉ.दिनेश ने पोस्टमार्टम करने वाले डॉ.डोहरे की बात एम्स के फॉरेन्सिक विभाग के हैड डॉ.डोगरा से करवाई थी।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार आरुषि और हेमराज दोनों की हत्या रात 12:00 से 1:00 के बीच की गई थी। दो तरह के हथियारों का प्रयोग किया गया, पहले भारी हथियार से मारा गया और फिर गला काटा गया। दोनों की हत्या में काम आए हथियार एक ही थे। डॉ. राजेश के घर से मिले गोल्$फ क्लब नंबर पर पाँच का डाइमेंशन आरुषि और हेमराज के सिर पर लगी चोट से डाइमेंशन से मेल खाता है। हेमराज के कमरे में 1 जून 2008को ली गई फोटो में एक ही क्लब दिख रहा है। सीबीआई ने तलवार से दूसरे क्लब के बारे में तफ़्तीश की तो वे संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए। हत्या के सालभर बाद राजेश ने कहा घर की स$फाई के दौरान क्लब मिला, लेकिन सालभर तक उन्होंने क्लब मिलने की बात सीबीआई को नहीं बताई। आरुषि और हेमराज के गले को किसी तेज धार वाले शस्त्र से काटा गया, वो भी सर्जिकल प्रीसीसीजन के साथ, ऐसा ऑपरेशन की टे्रनिंग लेने वाला व्यक्ति ही कर सकता है और राजेश सर्जिकल ट्रेनिंग ले चुके हैं।
रिपोर्ट से उठे सवाल जो आम आदमी को सोचने पर मजबूर करते हैं
1.हत्या के बाद लाश को हत्यारा स$फेद चादर से क्यों ढंकेगा? 2.$खून के धब्बों को किसने सा$फ करने की कोशिश की? 3.आरुषि के कमरे को किसके कहने पर और क्यों धोया गया? 4डॉ.दिनेश पोस्टमार्टम में रेप का जि़क्र न हो, ऐसा क्यों चाहते थे? 5.मोबाइल की मैमोरी किसने और क्यों हटाई? 6.डॉ.सुनील डोहरे की बात एम्स के $फॉरेन्सिक विभाग के हैड डॉ.डोगरा से करवाने के पीछे डॉ. दिनेश का क्या मकसद था? 7.स्टिक मिलने के बाद भी तलवार ने यह बात सीबीआई को सालभर बाद क्यों बताई? 8.दरवाज़े पर $खून के निशान होने के बाद भी दरवाज़े की चाबी देने में डॉ. राजेश के आनाकानी करने की क्या वजह थी? 9.हत्या में हत्यारे ने सर्जिकल प्रीसीसीजन का ही उपयोग क्यों और कैसे किया? 10.टैरेस के दरवाजे पर आमतौर पर ताला नहीं लगाया जाता, फिर उस दिन ताला क्यों लगाया गया था? 11.पुलिस को तुरंत सूचना देने के बजाय करीब सवा घंटे देर से क्यों दी गई? यह सब जानने के बाद शायद ही कोई आदमी इन साक्ष्यों को अपर्याप्त माने फि र सीबीआई ने इन्हें अपर्याप्त मानते हुए क्लोज़र रिपोर्ट क्यों पेश की? यही अब आम जनता के मन को मथ रहा है। देखना है कि क्या कोर्ट इस केस को शुरू कर आरुषि के हत्यारे को सज़ा दिलवाएगी या यह मामला भी जांच, कोर्ट और कानूनी पेचीदगियों के भँवर में फंस कर दम तोड़ देगा।
इस मामले का और सा$फ करने के लिए तिथिवार जानकारी दी जा रही है, जिससे पाठकों को इस जटिल घटनाक्रम को समझने में आसानी होगी-

16 मई, 2008
आरुषि तलवार नोएडा के जलवायु विहार स्थित अपने निवास पर संदिग्ध अवस्था में मृत पाई गई। हत्या का शक 45 वर्षीय नौकर हेमराज पर। हेमराज लापता।
17 मई, 2008
हेमराज की लाश छत से बरामद।
23 मई, 2008
दोहरे मर्डर केस में डॉ. राजेश तलवार गिरफ़्तार।
1 जून, 2008
जाँच सीबीआई को सौंपी गई।
11 जून, 2008
डॉ. तलवार के कम्पाउंडर कृष्णा का नार्को टैस्ट और दो दिन बाद उसकी गिरफ़्तारी।
20 जून, 2008
डॉ. राजेश तलवार का लाई डिटैक्टर टैस्ट।
27 जून, 2008
डॉ. तलवार की बिज़नेस पार्टनर डॉ. अनीता दुर्रानी का नौकर राजकुमार गिरफ्तार।
11 जुलाई, 2008
पड़ोसी का नौकर विजय मंडल गिरफ़्तार। डॉ. तलवार को क्लीन चिट दी गई।
21 जुलाई 2008
नेपाली नागरिक कृष्णा थापा और राजकुमार के समर्थन में जुटे नेपाली।
अक्टूबर 2008
पोस्टमार्टम से जुड़े डॉक्यूमैंट्स डिस्ट्रिक्ट हॉस्पीटल से $गायब।
4 सितम्बर, 2009
सबूतों से छेड़छाड़ के मामले की जाँच शुरू। हैदराबाद के डीएनए $िफंगरप्रिंटिंग एंड डाइग्नोस्टिक सैंटर ने आरुषि के कौमार्य के सैम्पल यह कह कर लौटा दिए कि वो उसके नहीं हैं।
5 जनवरी, 2010
सीबीआई ने तलवार दंपती के नार्को टैस्ट की इजाज़त माँगी, कोर्ट ने इजाज़त दी, अभी तक परिणाम घोषित नहीं किए गए।
29 दिसंबर, 2010
सीबीआई ने मामला बंद करने का निर्णय लिया, तीनों नौकरों को क्लीन चिट दी। डॉ. तलवार एकमात्र संदिग्ध।
3 जनवरी, 2011
क्लोज़र रिपोर्ट पर $गाजि़याबाद की विशेष अदालत ने सीबीआई को आड़े हाथों लेते हुए पूछा कि उन्हें इस मामले को $फाइल करने की इतनी जल्दबाज़ी क्यों है?
7 जनवरी, 2011
मामले की अगली सुनवाई।


'लोहड़ी का पर्व
लोकेश कुमार
भारती
हर साल 13 जनवरी को भारत के उत्तरी राज्यों में बड़ी धूमधाम से 'लोहड़ीÓ का पर्व मनाया जाता है। सभी संस्कृतियों को अपनाने वाली दिल्ली ने लोहड़ी को भी दिल से अपनाया है। राजधानी में पंजाबी संस्कृति का खासा प्रभाव है तो लोहड़ी का उत्साह तो नज़र आना ही है।
यूं तो लोहड़ी का सीधा संबंध किसानों से है, पर इसमें हर वर्ग के लोग हिस्सा लेते हैं। किसान लोहड़ी को रबी $फसल पकने की $खुशी में मनाते हैं। झूमने, नाचने-गाने का मौका होता है ये। पंजाब के किसानों के बीच यह पर्व विशेष उत्साह से मनाया जाता है, तो देशभर के पंजाबियों में भी कम उत्साह नहीं होता। लोहड़ी में लोग सर्वशक्तिमान ईश्वर से अच्छी खेतीबाड़ी होने की कामना करते हैं। पंजाब में गेहूं की $फसल अक्टूबर में बोई जाती है और मार्च-अप्रैल में काटी जाती है। मध्य जनवरी तक यह पता चल जाता है, कि $फसल कैसी होगी? हकीकत यह है कि गेहूं की कटाई तक लोग लोहड़ी को सेलिब्रेट करते हैं। पंजाब में लोहड़ी के दिन की समाप्ति सरसों के साग, मक्के की रोटी और रौ (ईख के रस और चावल से बनी) की $खीर के साथ होती है।
बोन $फायर
लोहड़ी में अगर 'बोन $फायरÓ न हो, तो बात अधूरी रह जाती है। शाम ढलते ही सूखी लकडिय़ां इक_ी की जाती हैं। धीरे-धीरे लोग अपने दोस्तों और सगे-संबंधियों के साथ वहां जमा होने लगते हैं। जब भीड़ जमा हो जाती है, तो लकडिय़ों में अग्नि जलाकर लोहड़ी का माहौल बनाया जाता है। फिर शुरू होता है नाचने-गाने का दौर, जो कहीं-कहीं तो पूरी रात चलता है। ढोल की थाप पर थिरकते पांव, हाथों में हाथ डाले नए-पुराने जीवनसाथी, रेवड़ी और मूंगफली की मनपसंद महक जो समां बांधते हैं, उसकी तुलना वाकई कहीं नहीं है। यही अग्नि लोहड़ी में आस्था का पक्ष भी जोड़ती है। अग्नि में प्रसाद चढ़ाने के लिए लोग कई तरह की चीज़ें लाते हैं, जैसे- पॉपकॉर्न, मूंगफली, रेवड़ी, गजक और मिठाई। आमतौर पर आग के चारों ओर तीन बार घूमने की प्रथा है। इस तरह अग्नि को नमन करते हुए किसान अच्छी $फसल की कामना करते हैं, तो बाकी लोग नई $खुशियों की। बाद में सभी लोग मिलकर-बांटकर प्रसाद खाते हैं।
नए का स्वागत
लोहड़ी को नए के स्वागत के रूप में भी मनाया जाता है। जीवन में नई $खुशियां पाकर कौन खुश नहीं होता? सभी के जीवन में कभी न कभी ये $खुशियां ज़रूर आती हैं। फिर चाहे, नन्हें मेहमान का जन्म हो या नई दुल्हन का घर आना।
लोहड़ी, और जाड़े की धमाचौकड़ी
नए के स्वागत में पंजाबी घरों में समारोह सा होता है। मोहल्ले-बस्ती के युवक-युवतियां उन घरों में जाकर बधाई मुबारक देते हैं और लोहड़ी की सौ$गात स्वयं मांग कर लेते हैं और $खुशियों के गीत गाते हैं। पेश हैं उनमें से चंद गीतों के नमूने:- सुंदर मुन्द्रिया ..हो तेरा कौन विचारा ..हो दुल्ला भट्टी वल्ला ..हो दुल्ले ने घी विअहियी ..हो सेर शकर पाई ..हो कुड़ी दे बोजे पाई ..हो शाल्लू कौन समेटे ..हो चाचा गाली देसे ..हो चाचे चूरी कुटी ..हो ज़मिन्दारण लुटी ..हो ज़मिन्दारा सिदाये ..हो गिन -गिन पोले लाई ..हो इक पोला रह गया ..हो सिपाही फड़ के लै गया ..हो आखो मुंडाओ ताना .. मक्की दा दाना .. आना लै के जाना



सवा सौ साल की कांग्रेस का ८३ वां महाधिवेशन
नए आत्म विश्वास की बानगी

बुराड़ी में सम्पन्न कांग्रेस के महाअधिवेशन में बहुत दिनों बाद पूरी पार्टी आत्मविश्वास से सराबोर दिखी। कार्यकर्ताओं का अनुशासन हो या अधिवेशन की व्यवस्थाएं। नेताओं के तेवर हों या पार्टी के राजनैतिक प्रस्ताव। वर्तमान पर पार्टी का राजनैतिक स्टैण्ड हो या भविष्य की रणनीति। कांग्रेस पूरे अधिवेशन में कहीं भी भ्रमित नज़र नहीं आई। मीडिया के कांग्रेस विरोधी खोजी भी पूरे महाअधिवेशन में सुरा$ग नहीं ढूंढ पाए। इस महाअधिवेशन ने पूरी मज़बूती के साथ भविष्य की राजनीति के संकेत भी दे दिए हैं।
देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी पार्टी ने अपना 125 साल का स$फर पूरा किया। इस मौके पर पार्टी का महाधिवेशन भी आयोजित किया गया। नई दिल्ली में आयोजित इस तीन दिन के महाधिवेशन में कांग्रेस ने अपने सवा सौ साल के इतिहास का जश्न तो मनाया ही, साथ ही उसने यह भी सिद्ध कर दिया कि वह देश की सबसे अनुशासित पार्टियों में शामिल है।
इस महाअधिवेशन में पार्टी की तैयारी देखने लायक थी। एक तर$फपार्टी के पुराने वरिष्ठ नेताओं और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को याद किया गया, वहीं वर्तमान राजनीति की चुनौतियों और भावी रणनीति पर पार्टी के स्टैण्ड की स्पष्ट घोषणा भी की गई। पूरे समेलन में कांग्रेस न तो विभाजित और दिशाविहीन नज़र आई, और न ही दिग्भ्रमित। अगर परिदृश्य को देखकर समीक्षा करें तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ताओं ने एक परिपक्व पार्टी के रूप में ही अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्वहन किया। पूरे अधिवेशन के दौरान कहीं कोई असमंजस या विवाद की स्थिति नहीं नज़र आई।
एक के बाद एक घोटालों के आरोप झेलने के बाद महाअधिवेशन में कांग्रेस पूरी तरह से आक्रामक नज़र आई। सोनिया गांधी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ न केवल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राहुल गांधी का बचाव किया, बल्कि भाजपा सहित विरोधी दलों को आड़े हाथों भी लिया। अधिवेशन का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव था- कार्यकारिणी का कार्यकाल बढ़ाकर पांच साल करना। इस प्रस्ताव के बाद अब पार्टी को बार-बार बेमतलब संगठनिक कसरत नहीं करनी पड़ेगी और संगठन में स्थायित्व नज़र आएगा। तो दूसरी ओर महाअधिवेशन के दौरान कांग्रेस के तेवर ऐसे थे, जैसे पार्टी ज़रूरत पडऩे पर आम चुनावों का सामना करने के लिए तैयार है, कांग्रेस के इन तेवरों को देखकर विपक्षी पार्टियों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा, कि अधिकांश सांसद अभी मध्यावधि चुनाव के पक्ष में नहीं हंै।
वहीं दूसरी ओर महाअधिवेशन में बार-बार यह प्रतिध्वनित हुआ कि पार्टी राहुल गांधी की ताजपोशी करने के लिए न केवल तैयार है, बल्कि आतुर भी है, लेकिन राहुल गांधी खुद ताजपोशी के लिए जल्दबाज़ी नहीं चाहते। वे $खुद किसी अच्छे अवसर के तलाश में हंै। इसके चलते यह भी संभव है संगठन और सरकार में राहुल गांधी को महत्वपूर्ण पद दिया जाए और संगठन में राहुल की टीम को जगह देकर पार्टी में युवाओं की हिस्सेदारी बढ़ाई जाए। असल में पार्टी में पीढ़ी परिवर्तन का दौर शुरू हो चुका है और प्रणव मुखर्जी से लेकर दिग्विजय सिंह तक इस सत्य को खुलेआम स्वीकार कर चुके हैं।
महाअधिवेशन के दौरान सोनिया गांधी ने कार्यकर्ताओं को पर्याप्त महत्व दिया और पार्टी नेताओं को लताड़ते हुए उन्हें निर्देश भी दिए कि वे आम कार्यकर्ताओं से मिलकर उनके साथ संवाद रखे और कार्यकर्ताओं के कार्यों को प्राथमिकता दें। सोनिया के इस आह्वान से भी पार्टी कार्यकर्ताओं में नए उत्साह का संचार हुआ है। महाअधिवेशन में स्वयं राहुल गांधी भी ज्य़ादा आत्मविश्वास से भरे नज़र आए और ज्य़ादा परिवक्त होकर उभरे हैं। हालांकि उन पर संगठन और सरकार में शामिल होने का दबाव है, लेकिन वे दिल्ली में टिकने की बजाय देशभर में घूम-घूमकर पार्टी को मजबूत करने की ज्यादा रुचि ले रहे हैं। अभी भी उनका लक्ष्य $िफलहाल उत्तरप्रदेश सहित अन्य राज्यों में पार्टी को मज़बूत कर वापस दो दशक पुरानी $फार्म में लाना है।
महाअधिवेशन में कांग्रेस ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि एकला चलो की नीति पर ही ध्यान केंद्रित करेगी और जहां वह अच्छी स्थिति में है, वहां किसी क्षेत्रीय दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी। इस तरह पार्टी ने दबाव की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दलों को संकेत दे दिए हैं कि वे अपना रास्ता स्वयं चुन लें।
महाअधिवेशन का सबसे नाटकीय मोड़ वह था, जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की कि वे जेसीपी के स्थान पर जांच समिति के सामने उपस्थिति होने को तैयार हैं। इस घोषणा के निहितार्थ चौंकाने वाले थे। वह एक तर$फकांग्रेस जेसीपी की मांग को लगातार खारिज करती रही। इस मुद्दे पर तीन हफ़्ते तक संसद नहीं चली। कांग्रेस ने संसद नहीं चलने के लिए विपक्ष की हठधर्मिता को जिम्मेदार ठहराया। ऐसा लगा कि पूरी पार्टी सरकार और प्रधानमंत्री के बचाव में एकजुट है और वह किसी भी कीमत पर जेसीपी नहीं बनने देगी, चाहे सरकार को गिराकर मध्यावधि चुनावों की नौबत ही क्यों न आ जाए।
लेकिन महाअधिवेशन के दौरान मनमोहन सिंह की नई पेशकश ने सबको चौंका दिया। अगर वे एक समिति से जांच कराने को तैयार हैं तो दूसरी समिति से इनकार क्यों है? वैसे मनमोहन सिंह की ईमानदारी और निष्ठा पर किसी को भी संदेह नहीं है, परन्तु लोकतंत्र में हर उठा हुआ सवाल, जवाब तो मांगता ही है। मनमोहनसिंह की यह पेशकश कुछ ऐसी है, जैसे वे अप्रत्यक्ष रूप से प्रधानमत्री पद से रूखसत होने की पेशकश कर रहे हों। क्योंकि समिति की जांच के बहाने ही वे प्रधानमंत्री पद छोडऩे की पेशकश करके राहुल गांधी के लिए रास्ता सा$फ करने के लिए तैयार हैं । पर स्वयं राहुल अभी मन से तैयार नहीं हैं। और दूसरी ओर मनमोहन सिंह को अचानक बिना किसी बहाने के प्रधानमंत्री पद से विदा नहीं किया जा सकता। कांग्रेस की यह कशमकश महाअधिवेशन में सा$फ नज़र आई। युवा पीढ़ी और बुजुर्ग पीढ़ी के साथ टकराव तो नज़र नहीं आया, पर कसमसाहट स्पष्ट थी और इसके निहितार्थ भी। पार्टी अब युवाओं को प्रतिनिधित्व देने तथा राहुल की ताजपोशी कर पीढ़ी परिवर्तन के लिए पूरी तरह तैयार है, पर अब इन्तज़ार है, तो बस अनुकूल समय का।

Saturday, January 1, 2011





राजनीति के ट्रेक पर गुर्जर आंदोलन

हृ राजीव शर्मा

जयपुर।
घटनाक्रम वर्ष 2007 से शुरू होता है। अब 2011 की आमद हो रही है। गुर्जर आरक्षण आन्दोलन के इस प्रकार 4 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। इन चार वर्षों में बात के लिए $खुद सरकार कभी पटरी पर नहीं आई है। हां, अब पहली बार ऐसा हुआ है। सरकार और गुर्जरों के बीच पहले दौर की बातचीत भले ही विफल हो गयी हो, लेकिन गुर्जर समाज का आरक्षण आन्दोलन प्रदेश में दोनों ही प्रमुख दलों के बीच की भी एक जंग है। भाजपा ने अपनी सरकार इसी के चलते गंवाई थी। अब वो चाहती है, कि कांग्रेस के साथ भी कुछ ऐसा ही हो। मगर कांग्रेस है, कि आन्दोलन को उससे बिल्कुल ही अलग तरीके से निपटना चाहती है।
प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आरोप लगा रहे हैं, कि आन्दोलन की असली कमान तो भाजपा के हाथ में है और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी तथा प्रदेश में भाजपा नेता वसुंधरा राजे ने संभाल रखी है। स्थानीय स्तर पर भी भाजपा कार्यकर्ता आंदोलन को उग्र कर रहे हैं। साफ है, अशोक गहलोत ने आरक्षण मांग रहे गुर्जर समाज को आम आदमी से अलग करने की कोशिश की है। वैसे भी सरकार के दो साल पूरे हो चुके हैं। राजनैतिक वातावरण प्रदेश में धीरे धीरे गरमाना शुरू होगा ही। आरक्षण आन्दोलन ने उसे समय से कुछ पहले ही सामने ला दिया है।
वर्ष 2007 के मई महीने में पाटौली के चक्का जाम से देशभर में गुर्जर आरक्षण आन्दोलन को एक शक्ल और पहचान मिली। 2010 और इससे पहले ही इसकी शक्ल तो वो नहीं रही जो आरंभ में थी। मगर पहचान के लिए ये अब शब्दों और घटनाओं का मोहताज नहीं रहा है। इसकी पहचान के साथ जब भी चर्चा होगी वसुंधरा राजे का नाम ज़रूर आयेगा। प्रदेश की मुख्यमंत्री जिनके कार्यकाल में ये आन्दोलन शुरू हुआ और उनकी सरकार को दूसरा अवसर न मिल पाने के पीछे के कारणों में इसे नकारा नहीं जा सकता। पाटौली आन्दोलन से उपजे गुर्जर मीणा विवाद के चलते भाजपा के तेज़ र्रार नेता डा. किरोड़ी मीणा उससे दूर हो गये। उन्होंने अपना दम खम दिखाया और रानी को दुबारा मौका मिलने ही नहीं दिया। उस समय आम आदमी तक का मानना था, कि किरोड़ी मीणा अगर भाजपा में होते तो रानी दुबारा प्रदेश की कमान ज़रूर संभाल पाती। रानी वसुंधरा के आस-पास आज भी आरक्षण आन्दोलन और उसकी घटनाएं ज़रूर बनी रहती होंगी। लोगों की मानें तो वसुंधरा एक बार फिर इसी आरक्षण आन्दोलन के चलते राजस्थान की कमान संभालने का स्वप्न देखती हैं। यही कारण है, कि वह आरक्षण आन्दोलन को लेकर अपनी सक्रियता को छुपा नहीं पाती हैं।
मई 2008 के पीलूपुरा पार्ट 1 के समय रानी बयाना तक तो आई, मगर रेल्वे ट्रेक पर नहीं गई। ये आन्दोलन 28 दिन चला। कर्नल ने अपने हर आन्दोलन में 'पटरी पर आये सरकारÓ का नारा लगाया है।
रानी बसुंधरा ने कभी $खुद या अपने प्रतिनिधि को घटना स्थल पर कभी नहीं भेजा। इसके विपरीत अशोक गहलोत ने पीलूपुरा पार्ट 2 में अपनी सरकार के प्रतिनिधि को रेल्वे ट्रेक पर भेज कर एक अलग प्रकार का संदेश देने की कोशिश की है। वैसे देखा जाये तो इस आन्दोलन को लेकर दोनों का नज़रिया अलग अलग सा$फ नजर आ रहा है। गहलोत शासन काल में अभी तक कोई जनहानि नहीं हुई हैं। वहीं वसुंधरा राजे के समय सैकड़ों जानें आन्दोलनों के दौरान चली गईं। गहलोत सरकार की ओर से कहीं भी आन्दोलन कारियों ने ज़ोर ज़बरदस्ती जैसा कुछ भी नहीं किया जा रहा है। इतना ही नहीं आन्दोलन स्थल के आस पास दूर-दूर तक कहीं पुलिस का नामों निशान नहीं है। रेल्वे ट्रेक की ओर बढ़ते गुर्जर समाज को पुलिस प्रशासन का बिल्कुल भी विरोध नहीं झेलना पड़ा।
20 दिसंबर 2010 से शुरू आन्दोलन में 25 दिसंबर को सरकार ने वार्ता की पेशकश आर भ की। आरम्भिक ना नुकर के बाद कर्नल बैंसला संवाद को राज़ी हो गये । कर्नल पर जनसमूह का दबाव है कि वो कहीं नहीं जाएंगे। बार बार कर्नल बैंसला के जाने और आन्दोलन समाप्ति की घोषणा से गुर्जर समाज आजिज़ आ चुका है। ऐसे में पहली मांग रेल्वे ट्रेक पर हो, बात ही रखी गई थी। इसे सरकार की सदास्यता कहें या कूटनीति का गहराई, कि उसने कर्नल बैंसला और आन्दोलनकारियों की पहली मांग बिना किसी घबराहट के मान ली है। इतना ज़रूर है कि सरकार के रेल्वे ट्रेक पर बातचीत के लिए आने के बाद आन्दोलनकारियों के बीच सरकार को लेकर नकारात्मक भावों में कमी आई है। 25 दिसंबर को अशोक गहलोत का पुतला फूंकने वाले गुर्जर युवक 26 को शांति से बातचीत को सुनते नज़र आये। कहीं भी माहौल में सरकार को लेकर कोई नाराज़गी का भाव नज़र नहीं आ रहा था।
संवाद की इस पहली शुरूआत में अभी कुछ भी निकल कर सामने नहीं आया है। लेकिन सकारात्मक दिशा में आगे बढऩे की उम्मीद सा$फ दिखाई दे रही है। रेल्वे ट्रेक पर पहुंचे प्रदेश के उच्च शिक्षा और उर्जा मंत्री डा. जितेन्द्र सिंह गुर्जर ने समाज को भरोसा दिलाया है कि वो दुबारा $खाली हाथ आपके पास नहीं आएंगे, और अगर ऐसा नहीं हो सका, तो अपना इस्ती$फा समाज के सामने रख देंगे।
भले ही पहले दौर की बातचीत निराशाजनक रही, लेकिन बातचीत की प्रक्रिया जल्द ही सकरात्मक दिशा में आगे बढ़कर किसी अंजाम तक पहुंचे, ऐसी आशा हर $खासोआम कर रहा है। लेकिन इतना ज़रूर है कि राजस्थान की राजनीति के दो दलों और सीधे शब्दों में कहें तो, अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे के बीच भी ये सीधा घमासान है। दोनों की बयानबाज़ी अपने शबाब पर है। दोनों के आन्दोलन को निपटने के तरीके को लेकर लोग चर्चा कर रहे है। ऐसे में आगे ये देखना दिलचस्प होगा कि दिसंबर 2008 में सरकार गंवा चुकी वसुंधरा 2013 में एक बार फिर से प्रदेश की कमान संभाल पाती हैं या नहीं। इतना ज़रूर है कि गुर्जर आरक्षण आन्दोलन 2013 के विधानसभा चुनावों में एक बार फिर से गूंजेगा। कौन इसके काल का ग्रास बनेगा और किसे इससे संजीवनी मिलेगी। ये सब तो काल के गाल में है। पर सरकार को रेल्वे ट्रेक पर भेजकर अशोक गहलोत ने एक नई शुरूआत ज़रूर कर दी है।





राम के कारण फिर सांसत में भाजपा
राम जेठमलानी एक बार फिर भाजपा के लिए धर्मसंकट का कारण बन गये हैं। भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद राम जेठमलानी ने कहा है, कि जहां तक निजी तौर पर वे समझते हैं, विनायक सेन पर राजद्रोह का केस नहीं बनता है, और विनायक सेन की पैरवी उनके लिए सम्मान की बात होगी।
एक निजी टीवी चैनल से बात करते हुए जेठमलानी ने यह भी कहा, कि बीजेपी नेता होने के बावजूद बिनायक सेन की पैरवी से हितों का कोई टकराव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि, इस मामले में उनके विचार बीजेपी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज से अलग हैं। राम जेठमलानी पहले भी बिनायक सेन की ज़मानत का केस सुप्रीम कोर्ट में लड़ चुके हैं। उधर, बीजेपी नेता सुषमा स्वराज ने बिनायक सेन के बारे में ट्विटर पर लिखा है, कि राज्य के $िखला$फ हिंसात्मक रवैया, निर्दोष पुलिसवालों और मासूम लोगों का नरसंहार और हिंसा निश्चित रूप से राजद्रोह है।
राम जेठमलानी के इस बयान के बाद, भाजपा ने से$फ साइड लेते हुए कहा है, कि राम जेठमलानी एक पेशेवर वकील हैं, और अगर वे ऐसा करते हैं, तो इससे पार्टी विचारधारा का कुछ लेना देना नहीं है। पार्टी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी का कहना है, कि जेठमलानी एक वकील हैं, और अपने विवेक के अनुसार कोई भी केस लेने के लिए स्वतंत्र हैं।

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