
काला धन और काला मनकुछ सप्ताह पहले के अपने ब्लॉग में मैंने राम जेठमलानी, सुभाष कश्यप और के.पी.एस. गिल द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका के विदेशों के - टैक्स हेवन्स में जमा भारतीय धन को भारत वापस लाने हेतु सरकार को बाध्य किया जाए - का उल्लेख किया था। 15 जनवरी को सुबह समाचारपत्रों में यह समाचार पढ़कर लाखों पाठक अवश्य ही प्रफुल्लित हुए होंगे कि एक दिन पूर्व न्यायालय ने सोलिसीटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम को उस समय बुरी तरह से लताड़ा, जब उन्होंने यह बताया कि सरकार को जर्मन सरकार से लीसटेनस्टीन बैंक में जमा सभी भारतीय नागरिकों के धन के बारे में पूरी जानकारी मिली है, लेकिन भारत सरकार इसे सार्वजनिक नहीं करना चाहती। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी और एस.एस. निर्झर की पीठ ने सुब्रमण्यम से पूछा, जिन लोगों ने विदेशी बैंकों में धन जमा किया है, उनके बारे में जानकारी सार्वजनिक न करने के पीछे कौन सा विशेषाधिकार है? न्यायालय ने आगे कहा कि वे चाहेंगे कि पुणे के व्यवसायी हसन अली खान जिसके विरूध्द विदेशी बैंकों में कथित काला धन जमा कराने की जांच प्रवर्तन निदेशालय ने की थी, को भी याचिका में एक पार्टी के रूप में शामिल किया जाए।
पेज 1 का शेषन्यायालय की टिप्पणियों के परिप्रक्ष्य में, सोलिसीटर जनरल ने कहा कि वे सरकार से निर्देश लेंगे। गत् सप्ताह इस समूचे मुद्दे पर विचार करने के लिए एन.डी.ए. की एक विशेष बैठक हुई। संसद में एन.डी.ए. के सभी दलों के सदन के नेताओं ने भाग लिया और प्रधानमंत्री को एक कड़ा पत्र तैयार किया। इस पत्र के तीन पैराग्रा$फ निम्नलिखित हैं हमारी आशंका है कि इस मोर्चे पर यूपीए सरकार द्वारा सक्रियता न दिखाने के पीछे उसे स्वयं अपने फंसने का डर है। आ$िखरकार, संयुक्त राष्ट्र द्वारा '$फूड फॉर ऑयल' घोटाले की जांच हेतु गठित वोल्कर रिपोर्ट ने कांग्रेस पार्टी को एक लाभार्थी के रूप में नामित किया है। हमारी जांच एजेंसियों और राजस्व एजेंसियों की जांच में यह सा$फ सिध्द हुआ है जो कि ढ्ढञ्ज्रञ्ज के आदेश में भी परिलक्षित होता है, कि बो$फोर्स घूस काण्ड में दलाली लेने वालों में अतावियो क्वात्रोची ने ए.ई. सर्विसेज़ और कोल बार इन्वेस्टमेंट जैसी कम्पनियों की आड़ में घूस ली है। अतावियो क्वात्रोची और उनकी पत्नी मारिया के कांग्रेस पार्टी के परिवार विशेष से सम्बन्ध सर्वज्ञात हैं और उन पर कोई विवाद नहीं है। एक स्विस पत्रिका के 19 नवम्बर, 1991 के अंक में प्रकाशित एक खोजपरक समाचार में तीसरी दुनिया के 14 वैश्विक नेताओं के नाम दिए गए हैं, जिनके स्विटज़रलैण्ड में खाते हैं। भारत के एक पूर्व प्रधानमंत्री का नाम भी इसमें शामिल है। रिपोर्ट का आज तक खण्डन नहीं किया गया। डा. येवजेनिया एलबट्स की पुस्तक में चौंकाने वाले रहस्योद्धाटन किए गए हैं कि भारत के एक पूर्व प्रधानमंत्री और उनके परिवार को रूस के व्यवसायिक सौदों के बदले में लाभ मिले हैं। ये शोधपरक समाचार हैं जो लेखों या पुस्तकों के रूप में प्रकाशित हुए हैं। जिनके विरूध्द जांच की गई है, उन्होंने औपचारिक रूप से न तो इसका खण्डन किया है और न ही उन्होंने ऐसे संदेह पैदा करने वाले प्रकाशनों के विरूध्द कोई कार्रवाई की है। यह सरकार के लिए महत्वपूर्ण है कि वह सुनिश्चित करे कि पूर्व प्रधानमंत्री सहित भारत के अतीत एवं वर्तमान नेताओं के नाम पर कलंक न लगे। अत: या तो इन आरोपों को ज़ोरदार ढंग से खण्डन करना चाहिए या इनकी जांच होनी चाहिए। वैश्विक अर्थव्यवस्था में शुचिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से एक स्वैच्छिक संगठन ग्लोबल $फाइनेंशियल इंटिग्रिटी अच्छा काम कर रहा है। पिछले महीने ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटी द्वारा जारी एक सारगर्भित रिपोर्ट भारत के बारे में कुछ यह कहती है 1948 से 2008 तक भारत ने अवैध वित्तीय प्रवाह (गैरकानूनी पूंजी पलायन) के चलते कुल 213 मिलियन डालर की राशि गंवा दी है। यह अवैध वित्तीय प्रवाह सामान्यतया भ्रष्टाचार, घूस और दलाली तथा अपराधिक गतिविधियों से जन्मता है। अवैध वित्तीय प्रवाह अवैध रूप से कमाए गए, स्थानांतरित या उपयोग में लाए गए देश से बाहर भेजे गए धन से जुड़ता है; इसमें सामान्यतया भ्रष्टाचार, सौदे के बदले सामान, अपराधिक गतिविधियों जैसी $गैर-कानूनी गतिविधियों से कमाए गए धन का स्थानांतरण और देश के कर से बचाने के लिए सम्पत्ति को संरक्षण देना शामिल है। रिपोर्ट आगे जोड़ती है भारत की वर्तमान कुल अवैध वित्तीय प्रवाह की वर्तमान कीमत कम से कम 462 बिलियन डालर है। यह अल्पावधि अमेरिका ट्रेजऱी बिल की दरों पर सम्पत्ति पर लाभ के दरों की बराबर पर आधारित है।
जो काम सरकार न कर सकी...
सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी देश की संप्रभु सरकार जो काम करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है, वह काम अब विकीलीक्स करने जा रहा है। शुक्रवार जनवरी 14 को वरिष्ठ अधिवक्ता राम जेठमलानी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते, हुए सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को फटकार लगाई थी, कि आ$िखर क्या कारण है कि सरकार उन लोगों के नाम सार्वजनिक नहीं कर रही है, जिनका पैसा स्विस बैंकों में जमा है, और जिनकी सूची केन्द्र सरकार के पास उपलब्ध हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी भले ही केन्द्र सरकार अभी तक उन लोगों के नाम सार्वजनिक करने या फिर सुप्रीम कोर्ट को ही सीलबंद लि$फा$फे में देने की हिम्मत नहीं जुटा पायी है, विकीलीक्स ने दावा किया है, कि वह स्विस बैंकों में दुनिया के उद्योगपतियों, नौकरशाहों, कलाकारों सहित दुनिया भर के करीब 40 राजनीतिज्ञों का खुलासा करेगा। केबलगेट आपरेशन चलाकर अमेरिका को दहला देने वाले स्वीडिश वेबसाइट विकिलीक्स को ऐसे करीब दो हज़ार लोगों का ब्यौरा हासिल होने जा रहा है, जिन्होंने स्विस बैंकों में पैसा जमा कर रखा है।
इनमें भारतीयों के भी नाम शामिल हैं।सोमवार जनवरी 24 को उसे इन स्विस बैंक खाताधारकों का कच्चा चि_ा मिल जाएगा। पूर्व स्विस बैंकर रुडोल्$फ एल्मर चुनिंदा खाताधारकों का विवरण विकिलीक्स को मुहैया कराएंगे। समाचार पत्र डेर सोन्नटैग को एल्मर ने बताया कि विदेशी खाताधारकों को ब्यौरा सोमवार को वह लंदन में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में विकिलीक्स को सौंप देंगे। हालांकि विकिलीक्स जानकारी हासिल हो जाने के बाद भी इसे जल्द सार्वजनिक नहीं किया करेगा। एल्मर ने स्विस अ$खबार से कहा कि वह करीब दो हज़ार खाताधारकों के नाम और उनके बैंक खाते के ब्यौरे से संबंधित जानकारी वाले दो सीडी को विकिलीक्स को सौंप देगा। इसके पूर्व एल्मर ने स्विस बैंक के अंदरुनी दस्तावेज़ को विकिलीक्स पर सार्वजनिक किया था। इस मामले में एल्मर पर बुधवार जनवरी 19 को स्विट्जरलैंड में मुकदमा चलाया जाना था।
काबू में नहीं कर पा रहे महंगाई
हृ जैनेन्द्र कुमार
देश ही नहीं विश्व के $फलक पर बेहतरीन अर्थशास्त्री की पहचान रखने वाले डॉ. मनमोहन सिंह ने देश की कमान संभाली, तो जनता को उनसे यही उम्मीद बंधी कि वे कुछ और करें न करें, लेकिन अर्थ के मामले में देश को राहत ज़रूर दिलवाएंगे। एक बेहतरीन अर्थशास्त्री से यह अपेक्षा रखना कि उसके कार्यकाल में जनता को महंगाई से राहत मिलेगी, लाजि़मी ही था। इसके उलट, उनके कार्यकाल में अर्थ-नीति राज-नीति की दुर्गम वीथियों में उलझ कर रह गई और जनता की उम्मीदें और सपने एक के बाद एक, चकनाचूर होते गए। और यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। पहले इकोनॉमिक रिसेशन के नाम पर और फिर $फसल $खराबे के नाम पर, तो कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल और गैस की कीमतें बढऩे की आड़ लेकर यूपीए सरकार ने कीमतें बढ़ाने का क्रम ज़ारी रखा। दिनोंदिन बेतहाशा बढ़ती महंगाई ने पिछले सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। यह महंगाई कहीं सरकार को भारी न पड़ जाए, इसी सोच के चलते हाल ही देश के प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में तीन दिवसीय मैराथन बैठक चली। अ$फसोस, तीन दिन तक चलने वाली बैठक बेनतीजा रही। कोई महंगाई से पार पाने का रास्ता तो नहीं दिखा, अलबत्ता महंगाई से परेशान देश के आला नेता आपस में उलझ बैठे। महंगाई के बढ़ते ग्रा$फ का बारीकी से अध्ययन किया जाए तो सा$फ हो जाता है कि कुछ महीनों की समयावधि के अंतराल पर सरकार की नीतियां कीमतें बढ़ाने वाली ही रही हैं। मसलन, सरकार ने मात्र चार महीनों में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत ८.४ $फीसद बढ़ाई, पेट्रोल की कीमतें $फरवरी २०१० में ४७ रुपए ४३पैसे प्रति लीटर से बढ़ाकर जून में ५१ रुपए ४३ पैसे प्रति लीटर की गईं। पहली बार वृद्धि बजट घाटे को कम करने के लिए की गई और फिर पेट्रो पीएसयू की कमाई के अंतर को पाटने के लिए यह कदम उठाया गया। दोनों अवसरों पर यह कदम मुद्रास्$फीति में वृद्धि को नज़र अंदाज़ करके उठाया गया। इसके बाद भी सरकार ने अलग-अलग वजहें बताकर पेट्रोल की कीमतें बढ़ाने का क्रम जारी रखा। पेट्रोल की कीमतों की बात करें तो हाल ही १६ जनवरी, २०११ को फिर से यूपीए सरकार ने पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि की, इससे अब पेट्रोल की कीमत प्रति लीटर जयपुर में ५९ रुपए २६ पैसे से बढ़कर ६२ रुपए १३ पैसे हो गई है। मुबई में पेट्रोल की कीमत ६० रुपए ४६ पैसे प्रति लीटर से बढ़कर अब ६३ रुपए ३० पैसे हो गई है। दिल्ली में पेट्रोल पहले ५५ रुपए ८७ पैसे की दर से दिया जा रहा था, जो अब ५८ रुपए ४० पैसे प्रति लीटर का भार उपभोक्ता की जेब पर डाल रहा है। चैन्नई की बात करें तो वहां पेट्रोल की कीमत ६० रुपए ६५ पैसे प्रति लीटर से बढ़ाकर ६३ रुपए ४० रुपए कर दी गई है। कोलकाता में पेट्रोल पहले उपभोक्ता की जेब से ५९ रुपए ९० पैसे प्रति लीटर निकालता था, वहीं अब उपभोक्ता को ६२ रुपए ६० पैसे प्रति लीटर के हिसाब से देने पड़ रहेे हैं। इस बार पेट्रोल की कीमतों में करीब ४.५ $फीसद प्रति लीटर की वृद्धि की गई है। इससे पहले दिसंबर २०१० में खाद्य सामग्री की कीमतों की महंगाई २१.६ फीसद पर पहुंच गई थी घरेलू गैस-एपीजी, पेट्रोल, डीजल, कच्चे तेल, खाद्य पदार्थ, दालें, मसाले, सब्जि़यां यहां तक कि अनाज भी बढ़ती महंगाई के शिकंजे से अछूता नहीं है। प्याज़ १०० रुपए प्रतिकिलो की सीमा को भी पार कर गया है, वहीं पेट्रोल की आए दिन बढ़ती कीमतें आम जनता को काट खाने को दौड़ती हैं। ३०-४० रुपए प्रति किलो की दर से बिकने वाला लहसुन ४०० रुपए प्रति किलो तक बेचा जा रहा है। इससे भी बढ़ी महंगाई: सच तो यह है कि छठे वेतन आयोग के लागू करते ही सरकार ने यह मान लिया कि अब लोगों के पास $खर्चने के लिए का$फी पैसा आ गया है। इसके बाद से ही आए दिन किसी न किसी वस्तु के किसी न किसी बहाने से दाम बढ़ाने का सिलसिला चल निकला। जबकि मज़दूरों, किसानों और निजी संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन में किसी तरह का इज़ा$फा नहीं हुआ। ऐसे में महंगाई ने इन वर्गों के सामने पेट भरने का संकट खड़ा कर दिया। महंगाई के लगातार बढऩे से भारत के $गरीब तबके के साथ ही मध्य तबका भी इसकी चपेट में आ गया। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह बजट देखे या अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करे। ऐसे में कजऱ् लेना उसकी मजबूरी हो चला है। यही कजऱ् किसानों के लिए तो आत्महत्या का कारण बन जाता है। बेतहाशा बढ़ती महंगाई का एक स्याह पहलू तो यह है कि विदर्भ और मध्य प्रदेश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं और सरकार नीरो बनी बंसी बजाने में मगन है। सुनवाई नहीं: पहले कीमतें बढ़ाने पर जनता विरोध में हड़ताल, चक्काजाम, धरना-प्रदर्शन सरीखी प्रतिक्रिया कर सरकार को-रोल बैक करने के लिए मज़बूर कर देती थी, लेकिन अब कमज़ोर विपक्ष और घपलों-घोटालों की गूंज में जनता की आवाज़ कहीं खो गई है। आम जनता की बात महंगाई के मामले में किसी भी स्तर पर सुनी ही नहीं जा रही। ऐसे में आम जनता करे तो क्या करे। वह $खून का घूंट पीकर रह जाती है। जनता अंदर ही अंदर महंगाई से पूरी तरह टूट चुकी है। उसे कहीं से भी उम्मीद की कोई किरण नज़र नहीं आ रही है। ऐसे में वह कजऱ् लेने और फिर कजऱ् पे कजऱ् और ब्याज़ पे ब्याज़ चुकाने को मज़बूर है। ऐसे में कजऱ् के मजऱ् से जकडऩे के बाद यदि जनता आत्महत्या का रास्ता अपना ले तो किसी को अचम्भा नहीं होना चाहिए। ...फिर ऐसा क्यों?: देवेगौड़ा, गुजराल और नरसिंह राव के प्रधामंत्रित्व काल में बतौर वित्त मंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह ने सरकार को महंगाई समेत कई मुद्दों पर पेच फंसने पर रास्ता दिखाया और उन सरकारों में रहते हुए सराहनीय काम किया। इससे देश ही नहीं विदेश में भी उनकी सा$ख बढ़ी। ऐसे में महंगाई घटाने का रास्ता सरकार के पास नहीं है या सरकार के पास जादू की छड़ी नहीं कि उसे घुमाते ही जनता को महंगाई से राहत मिल जाए। ऐसे जुमले कह कर यूपीए सरकार बच नहीं सकती। जब मनमोहन विदेश मंत्री या अन्य किसी पद पर रहते सरकार को सही राह दिखाते और सराहनीय कार्य करते रहे तो अब उनकी क्षमताओं पर प्रश्न चिन्ह क्यों उठना चाहिए? अब जबकि एक तरह से वे सर्वेसर्वा हैं तो उन्हें महंगाई से निज़ात दिलाने का रास्ता क्यों नहीं सुझाई पड़ता। क्या जनता यह मान ले कि अर्थशास्त्री मनमोहन अब बेहतर राजनीतिज्ञ और बदतर अर्थशास्त्री हो गए हैं? आ$िखर क्यों दुनिया का ख्यात अर्थशास्त्री आज इतना असहाय नज़र आता है? क्या वजह है पत्नी के एलपीजी गैस के दाम न बढ़ाने की $फरमाइश को दरकिनार कर वे दाम बढ़ा देते हैं? क्यों एक संवेदनशील आला दर्जे का व्यक्ति आज संवेदनाओं से परे जा बैठा है? क्यों किसानों की हत्या से उसका हृदय द्रवित नहीं होता? क्यों ईंधन के दाम लगातार बढ़ाए जा रहे हैं कि लोगों को सुकून देने वाले वाहन आज उनकी मुसीबत बन बैठे हैं? क्या जनता यह मान ले कि आम हो या $खास, पढ़ा हो या बेपढ़ा, सचरित्र हो या दुष्चरित्र-सत्ता ऐसी चीज़ है कि उसके मिलते ही वह इन सबका भेदभाव माने बिना सभी को समान रूप से भ्रष्ट बना ही देती है? ऐसे अनगिनत प्रश्न आज भारतीय जनता के ज़ेहन को लगातार मंथ रहे हैं। और इन सभी का जवाब मनमोहन और यूपीए सरकार को देर-सवेर देना ही होगा। अगर चुप्पी साधने या हाथ खड़े करने की नीति पर ही यूपीए सरकार कायम रहती है, तो अगले लोगसभा चुनाव में उसे इसका नतीजा भुगतने को तैयार रहना होगा। इसमें कोई दोराय की गुंजाइश नहीं है।
उमा भारती हैं कि भाजपा में आती ही नहीं
नाटकीय राजनीति का यह एक और नाटकीय अल्पविराम है। लिटिल (नितिन) गडकरी ने भी हथियार डाल दिये। लगता है बात बिगड़ ही गयी। पहले 26 दिसंबर को अपनी नागपुर यात्रा के बाद उमा भारती ने कहा कि वे भाजपा में वापस नहीं आ रही हैं, तो मंगलवार को भुवनेश्वर में नितिन गडकरी ने सा$फ किया कि $िफलहाल तो वे भाजपा में वापस नहीं आ रही हैं, फिर भी वे जब चाहें भाजपा में वापस आ सकती हैं। नितिन गडकरी के शब्दों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब वे चाहें तब, लेकिन सवाल है कि कब? पिछले साल सवा साल से उनकी भाजपा में वापसी की $खबर इतनी द$फा अ$खबारों में प्रकाशित हो चुकी है। अब अ$खबार वाले भी कहते हैं कि अब उनके वापसी की $खबर तभी प्रकाशित करेंगे, जब वे भाजपा में वापस आ जाएंगी।
हर ह$फ्ते पखवाड़े पहले उनकी वापसी की $खबर छपती है, फिर दोनों ही ओर से खण्डन जारी हो जाते हैं. उमा ऐसा अचार हो गयी हैं, जो भाजपा रूपी भरनी में समाने को ही तैयार नहीं। लेकिन इस बार बात गंभीर थी। लालकृष्ण आडवाणी ने अपने ब्लाग पर लिखा था, कि उमा की ज़रूरत है। उमा भारती भाजपा में वापसी के लिए जिस सम्मानजनक रास्ते की तलाश में थी, वह रास्ता वाया ब्लाग आडवाणी जी ने उपलब्ध कराने की कोशिश की, लेकिन फिर नतीजा वही ढाक के तीन पात। मामला टांय टांय फिस्स हो गया। अगर आप एक लाइन में जानना चाहते हैं, कि आ$िखर उमा भारती भाजपा में वापस क्यों नहीं आती, तो कारण यह है कि उमा भारती चाहती हैं, कि उन्हें गाजे बाजे के साथ पार्टी में वापस लाया जाए, और पार्टी के लिए उन्होंने जो काम किया है उसके पूरे सम्मान को तराज़ू के एक पलड़े पर रखा जाए, और दूसरे पर उनकी वापसी की ताजपोशी हो। वे इस बात के लिए तैयार नहीं हो पा रही हैं कि उत्तर प्रदेश में वे एक बार फिर वैसी ही मेहनत करें, जैसा मध्य प्रदेश में किया था। उनका सवाल है कि इतनी मेहनत के बाद दोबारा अगर वे उत्तर प्रदेश में पार्टी को खड़ा करती हैं, तो क्या गारंटी है कि उनके साथ एक बार फिर उसी तरह का व्यवहार नहीं होगा, जैसा मध्य प्रदेश में हुआ? उमा के इस सवाल का भाजपा के पास कोई जवाब नहीं है। उल्टे भाजपा में बैठे गद्दीनशीन नेता उमा भारती को घुटने के बल रेंगते हुए पार्टी में लाना चाहते हैं, ताकि उनका इस्तेमाल तो हो, लेकिन $खुद उमा भारती प्रभाव से मालामाल न हो सकें। अब भाजपा वालों को कौन बताए कि उमा भारती को हल्की सी अर्थराइटिस की समस्या हो गयी है। वे चाहें भी तो भी भाजपाइयों की इच्छा पूर्ति नहीं हो सकती। इसलिए दोनों दूर ही $खुश हैं।


