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Friday, September 24, 2010







सुलझी हुई समस्या को उलझाने पर आमादा

आज जो लोग भी कश्मीर की समस्या निपटाने निकले है, सवाल पैदा होता है क्या उन्हें कश्मीर की समस्या का ओर-छोर भी पता है? क्या राहुल गांधी और उमर अब्दुल्ला की नयी पीढ़ी 1947 से 2010 के बीच कश्मीर में क्या हुआ है, उसकी प्रामाणिक जानकारी से लैस भी है? यदि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार कश्मीर की स्थिति को ठीक से समझ ही रही होती, तो क्या पिछले 6 वर्षों के शासनकाल में उसने एक सुलझ चुकी समस्या को उलझा लेने की मूर्खता की होती?
हृ प्रेम शुक्ल
कश्मीर के बिगड़ते हालात को सुधारने के लिए आज देश के गृहमंत्री पी.चिदंबरम के साथ सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल कश्मीर की यात्रा शुरू कर रहा है। इस दौरे को सफल बनाने के लिए कश्मीर के अलगाववादी नेता सैय्यद गिलानी और मीरवाईज़, उमर फ़ारूक समेत लगभग 30 कश्मीरी नेताओं को वार्ता के लिए आमंत्रित किया गया है। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह हर शर्त पर कश्मीर में शांति चाहते हैं। कांग्रेस के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री राहुल गांधी कश्मीर में बिगड़ते हालात के बावजूद अपने मित्रओमर अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री पद पर बनाए रखना चाहते हैं। कांग्रेस नेताओं की ओर से पिछले दरवाज़े से पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता महबूबा मुफ़्ती से कश्मीर में सत्ता परिवर्तन की चर्चा का पहला दौर पूरा किया जा चुका है। सरकार और मीडिया कश्मीर के अलगाववादियों के जिस आन्दोलन को शांतिपूर्ण और उनपर आत्मरक्षार्थ गोलीबारी करने वाले सुरक्षाबलों को कटघरे में खड़े कर रहे हैं, उन पर तथाकथित शांतिवादी अलगाववादियों के उकसावे पर हुए पथराव में 1600 से अधिक जवानों के सिर अब तक फूट चुके हैं। सेना के तीनों अंगों के प्रमुख सेना को कश्मीर में प्राप्त विशेष अधिकारों की कटौती के खि़लाफ़ चेतावनी जारी कर चुके हैं। देश के मुख्य विपक्षी गठबंधन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने सरकार को कश्मीर के मसले में पूर्ण सहयोग के बावजूद अलगाववादियों के वाकजाल में फंसने के प्रति सचेत किया है।
2004 में जब संप्रग की सरकार सत्ता में आई, उस समय जम्मू एवं कश्मीर में लगभग वही स्थिति आ चुकी थी जो 1996 में पंजाब की थी, यानी राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से विकास कार्य तेज़ करना था और जम्मू एवं कश्मीर पूरी तरह से भारतीय संघ में अपना हित देखता। अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों के साथ हिन्दुस्तान उस समय अपनी आज़ादी के बाद सबसे बेहतरीन स्थिति में था। पाकिस्तान इतना उलझा हुआ था कि तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ नियंत्रण रेखा को दोनों देशों की अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनने का प्रसताव लिए हिन्दुस्तानी हुक्मरानों के पीछे दौड़ रहे थे। चीन हस्तक्षेप से $खुद को बचाने में अपना हित मान रहा था। कश्मीर की समस्या को सुलझाने के लिए इससे उत्तम स्थिति हो ही नहीं सकती थी। इन 6 वर्षों में संप्रग सरकार ने क्या कूड़ा किया है। यह आप सहज समझ सकते हैं, कि जब पाकिस्तान बाढ़ की विभीषिका झेल रहा है, और किसी आतंकवादी गिरोह में कश्मीर में घुस कर सुरक्षाबलों से भिडऩे की ताकत नहीं बची है, तब आम कश्मीरी युवकों को भड़का कर सुरक्षाबलों के सिर फुड़वाये जा रहे हैं। चीन गिलगित और बालतिस्तान में लालसेना की खुली घुसपैठ करा रहा है, लेकिन हमारे सत्ता संस्थान में इतना कलेजा भी नहीं है कि उसके विरोध में एक शब्द भी बोल सके। 2004 में हमारा देश अफग़ानिस्तान में हस्तक्षेप करने की स्थिति में आ गया था, अब स्थिति यह है कि अमेरिका $खुद हिन्दुस्तान को अफग़ानिस्तान से दूर रखने की बात कर रहा है। शक है कि अमेरिका का ओबामा प्रशासन अफग़ानिस्तान की समस्या को सुलझाने के लिए तालिबान और पाकिस्तान से कश्मीर का सौदा कर सकता है। कश्मीर का भूत अचानक जाग गया है, और पूरा देश तनावग्रस्त है। हमारी मीडिया का ही एक बड़ा वर्ग ऐसा प्राचारित करता है, जैसे सचमुच कश्मीर में हिन्दुस्तान अतिक्रमणकारी हो और पाकिस्तान न्याय के पक्ष में खड़ा हो। कश्मीर जानेवाले क्या जानते हैं।
1.1947 में पार्लियामेंट द्वारा पारित स्वाधीनता अधिनियम के प्रावधान के तहत जम्मू एवं कश्मीर राज्य भारत को दिया गया था।
2. भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश सरकार और मोहम्मद अली जिन्ना को सुझाव दिया था कि भारत की रियासतों को अपने राज्य की जनता की इच्छा अनुसार,अपनी भावी स्थिति का निर्णय लेने दें; तथा इस बारे में नवाब, निज़ाम तथा महाराजा की रूचि/सुझावों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उस समय पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल मोहमाद अली जिन्ना ने ही अंग्रेज़ों के बलबूते यह आग्रह किया कि जनता नहीं, बल्कि राजाओं को अपने राज्य के भविष्य का निर्णय लेना चाहिए। जिन्ना की यह इच्छा थी कि भोपाल, हैदराबाद तथा जूनागढ़ जैसे राज्यों के शासक तथा राजस्थान के रजवाड़ों के मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी वाले क्षेत्र या तो स्वतंत्र हो जायेंगे या फिर पाकिस्तान में शामिल हो जायेंगे। उनका अनुमान था कि यदि रजवाड़ों को स्वतंत्र रहना है या पाकिस्तान में शामिल होना है तो इससे भारत का भौगोलिक क्षेत्र कम हो जाएगा तथा इसकी राजनीतिक पहचान भी टुकड़ों में बँट जायेगी।
3. जिन्ना को यह आशा थी कि कश्मीर राज्य जिसमें भी विशेष कर घाटी का मुस्लिम बहुमत महाराजा हरी सिंह के खि़लाफ़ विद्रोह कर देगा, जिससे कश्मीर या तो स्वतंत्र हो जाएगा या फिर पाकिस्तान में शामिल हो जाएगा।
4. जब जिन्ना की अपेक्षा पूरी नहीं हुयी, तब अक्टूबर 1947 में जम्मू एवं कश्मीर में पाकिस्तान ने कबायलियों की आड़ में सेना की घुसपैठ करा दी। भारत ने इस हमले को आंशिक रूप से कुचल दिया।
5.सन 1948 में भारत संयुक्त राष्ट्र में इस आशा के साथ गया था, कि अंतर्राष्ट्रीय संगठन पाकिस्तानी कब्ज़े वाले कश्मीर को ख़ाली करवा देगा। पार्लियामेंट में पारित स्वाधीनता अधिनयम के तहत कश्मीर के महाराजा द्वारा भारत में कश्मीर के विलय को लेकर पाकिस्तान द्वारा खड़ी की गयी बाधाओं को दूर कर देगा।
6.भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कुछ शर्तों के साथ कश्मीर में जनमत संग्रह की अनुमति दी थी. उसमे सर्वाधिक महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि पहले पाकिस्तान को कश्मीर से अपनी सेनायें हटानी पड़ेंगी. उसे जनमत संग्रह के पूर्व जम्मू एवं कश्मीर को पूरी तरह से ख़ाली करना पड़ेगा। जो लोग भी कश्मीर में भारत द्वारा जनमत संग्रह के लिए संयुक्त राष्ट्र में किये गए वादे की बात करते हैं वे कृपया बताएं कि पाकिस्तानी कब्ज़े वाले कश्मीर में पिछले 63 वर्षों में जिस तरह आबादी में बड़े पैमाने की घुसपैठ कराई गयी है, उसे 1947 वाली स्थिति में वे कैसे ले जायेंगे?
7. इसके उलटे हिन्दुस्थान के जम्मू एवं कश्मीर में भारतीय संविधान की धरा 370 के प्रावधान के चलते 63 वर्षों में आबादी में केवल यही परिवर्तन हुआ है कि 1990 में घाटी से लाखों की हिन्दू पंडितों की आबादी को निर्वासित कर दिया गया है. पाकिस्तानी प्रश्रय के कारण कश्मीर में जिस तरह का इस्लामी अतिवाद फैलाया गया है उससे अनावश्यक हिन्दुस्थान विरोधी माहौल बना है। यदि कश्मीर में आत्मनिर्णय की बात करनी है तो पहले पाक कब्ज़े वाले कश्मीर को खाली कराया जाना चाहिए। 1947 में उस इलाके में जो मूल निवासी बसे थे उसकी शिनाख़्त की जानी चाहिए और उनके वंशजों को दशक-दो दशक भारत में विलीन किया जाए,उसके बाद कश्मीर को भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत स्वायत्तता देने के प्रस्ताव पर विचार किया जा सकता है।
8. हमारे सत्ताधीशों के भ्रामक व्यवहार के चलते ही कश्मीर यह प्रचारित करने में कामयाब रहा है कि हिन्दुस्थान के साथ संबंधों के सामान्यीकरण में सबसे बड़ी बाधा कश्मीर है। तमाम अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दे पर विफल होने के बाद पाकिस्तान 3 बार हिन्दुस्थान से युद्ध कर चुका है। इन युद्धों में भी पराजय के बाद पाकिस्तान हिन्दुस्थान को छलने में कामयाब हुआ है। 1965-66 के युद्ध में पराजय के बाद जब सोवियत संघ की मध्यस्थता से पाकिस्तानी राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब और हिंदुस्तानी प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के बीच ताशकंद समझौता हुआ था, तो उसमें स्पष्ट तौर पर यह प्रावधान किया गया था, कि दोनों देश अब एक दूसरे के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। मतलब साफ़ था, कि कश्मीर विवाद का हल मान लिया गया था। 1971-72 के युद्ध में पाकिस्तान पर निर्णायक विजय के बाद भी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के परामर्शदाताओं की आपसी रंजिश ने शिमला समझौते में कश्मीर को विवादास्पद क्षेत्र मानने की ग़लती कर ली। 1971 -72 में ऐसा मौक़ा आया था जब पाकिस्तान अपने कब्ज़े वाले कश्मीर से भी हटने के लिए तैयार हो जाता। शिमला वार्ता के दौरान इंदिरा गांधी के एक सलाहकार डी.पी.धर युद्धबंदी पाकिस्तानी सैनिकों को रिहा करने और पाकिस्तानी क्षेत्र से कब्ज़ा हटाने के लिए यह शर्त पेश कर रहे थे, कि पाकिस्तान ज मू एवं कश्मीर पर हिन्दुस्तान का पूर्ण अधिकार स्वीकार ले. ज़ुल्फि़कार अली भुट्टो उस समय इतने दबाव में थे कि उनके पास इस शर्त को मानने के आलावा कोई विकल्प नहीं था. लेकिन इंदिरा गांधी के दूसरे प्रमुख सलाहकार पी.एन हक्सर ने इंदिरा गांधी को भ्रमित कर दिया कि युद्धबंदियों की रिहाई को अधिक समय तक रोके रखना भारत को भारी पड़ सकता है। उनका दूसरा तर्क था कि यदि पाकिस्तान के क्षेत्रों को हिंदुस्तानी सेनाओं ने ख़ाली नहीं किया, तो दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ जाएगा और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय हिन्दुस्तान के खि़लाफ़ निर्णय लेने को मजबूर हो जायेंगे। इंदिरा गांधी पर डी.पी.धर की तुलना में पी.एन.हक्सर का प्रभाव अधिक पड़ा। शिमला समझौते में ज़ुल्फि़कार अली भुट्टो ने कश्मीर को विवादास्पद मुद्दे के तौर पर उल्लेख कराने में सफलता प्राप्त कर ली। प्रख्यात कानूनविद राम जेठमलानी कहते हैं कि ज़ुल्फि़कार अली भुट्टो कानून के ज्ञाता थे, सो बड़ी ही चतुराई से उन्होंने ताशकंद समझौते में जिस मुद्दे को ख़त्म मान लिया गया था, उस कश्मीर मुद्दे को शिमला समझौते में शामिल करा लिया।
कुल मिला कर कश्मीर मुद्दा जितना उलझा नहीं है, उससे अधिक उसे हमारे राजनीतिज्ञों ने उलझा दिया है। सशस्त्र विशेषाधिकार अधिनियम के मुद्दे पर भी पूरे देश को दिग्भ्रमित किये जाने का प्रयास जारी है। ऐसी तस्वीर खड़ी की जा रही है, जैसे इस क़ानून के चलते ही कश्मीर में बखेड़ा खड़ा हो गया हो। इस अधिनियम पर पूर्वोत्तर राज्यों में भी समय-समय पर बखेड़ा खड़ा होता रहा है। पूर्वोत्तर में बखेड़े के मद्देनजऱ केंद्र ने इसकी समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी आयोग का गठन भी किया था।
जीवन रेड्डी आयोग ने पाया कि जहां पर भी उक्त अधिनियम लागू थे, वहाँ सेना की बजाय उत्पातियों की मौत पुलिस बल के हाथों हुयी हैं। सेना को तो अनायास ही बदनाम किया जाता रहा है। कश्मीर पर किसी भी प्रकार का मानस बनाने के पहले ज़मीनी सच्चाईयों को समझना ज़रूरी है।


राजीव- सोनिया को मिलाने वाले चाल्र्स एंटनी नहीं रहे
हृ सुप्रिया रॉय
सोनिया गांधी और राजीव गांधी को लंदन में पहली बार मिलवाने वाले चार्ल्स एंटनी की मौत हो गई है। वे बहुत दिनों से बीमार थे और पिछले कुछ समय से अंधे हो गए थे। मगर चार्ल्स एंटनी अपने पीछे बहुत सारी कहानियां छोड़ गए हैं। सबसे पहले तो उनका परिचय। एंटनी कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के पास रेस्टोरेंट चलाते थे और 1965 में सोनिया मियानो नाम की छात्रा उनके यहां कुछ खाने आई थी। इस छात्रा की पसंदीदा सीट खिड़की के पास थी जो घिरी हुई थी और वहां काफी भीड़ थी। एंटनी ने सोनिया मियानो को जो सीट सबसे कम भरी हुई थी यानी जिस पर सिर्फ एक छात्र बैठा हुआ था, उस पर बिठाया। सामने बैठे हुए छात्र का नाम राजीव गांधी था। सोनिया गांधी ने बाद में अपनी किताब में लिखा भी है, कि राजीव गांधी की आंखों में झांकते ही उन दोनों में प्यार हो गया था। एंटनी भी यह कहानी मरते दम तक अपने परिवार वालों और दोस्तों को सुनाते रहे। एंटनी के भाई ने पत्रकारों से कहा है, कि वे राजीव और सोनिया को बहुत चिढ़ाया करते थे। जब सोनिया गांधी राजनीति में आई और 2004 में यूपीए की पहली सरकार बनी, तो एंटनी ने अपने पास पड़ोस में चॉकलेट बांट कर इसका जश्न मनाया था। जन्म से ग्रीक नागरिक एंटनी ने बहुत बाद में सन 2006 में सोनिया गांधी को एक पत्र भी लिखा था, जिस पर सात रेसकोर्स रोड का पता था, मगर यह पत्र सोनिया तक पहुंच गया था। डाकिए का काम मनमोहन सिंह ने किया था। लेकिन सोनिया और राजीव को मिलवाने वाले एंटनी का सबसे कमाल का कारनामा कुछ और ही था। राजीव गांधी 1984 में जब प्रधानमंत्री बने, तो एंटनी दिल्ली के जहाज़ में बैठे और राजीव और सोनिया से मिलने भारत आ गए। उन्हें हवाई अड्डे पर ही धर लिया गया, क्योंकि उनके पासपोर्ट पर भारत का वीजा नहीं लगा था। शायद एंटनी ने सोचा था कि जब वे देश के प्रधानमंत्री को इतने करीब से जानते हैं, तो भारत में कौन रोकेगा? मगर नियमों के तहत उन्हें हिरासत में ले लिया गया, और नियमों के तहत ही एक फ़ोन करने की इजाज़त दी गई। एंटनी ने प्रधानमंत्री निवास फ़ोन किया और सिफऱ् संदेश छोड़ा कि प्रधानमंत्री को बता दिया जाए कि वे दिल्ली हवाई अड्डे पर हिरासत में हैं। आधे घंटे के भीतर छह एंबेसडर कारें, गुलदस्तों और कोका कोला की केम से भरी पेटी के साथ एंटनी के पास पहुंच गई थी और विदेश और गृह मंत्रालय के अधिकारी $खुद वीजा की मुहर लगाने हवाई अड्डे पर पहुंचे थे।
भारत में एंटनी ने जो दिन बिताए उनमें वे अंडमान निकोबार भी गए और दिल्ली की गलियों में घूमे। आगरा का ताजमहल तो ख़ैर उन्होंने देखा ही। आखिरी दिन एंटनी ने काफ़ी कष्ट में गुज़ारे। आंखों की रोशनी वापस लाने के लिए वे हर महीने एक इंजेक्शन आंखों में लगवाते थे, मगर रोशनी नहीं आई, तो नहीं आई। एंटनी ने अपने भाई को बताया था कि सोनिया लंच टाइम में आई थी, और राजीव गांधी 11 नंबर की मेज़ पर कुछ दोस्तों के साथ बैठे थे। राजीव गांधी के दोस्त ताहिर जहांगीर भी इसके गवाह थे और एंटनी के अनुसार सोनिया के मेज पर बैठते ही राजीव गांधी सिफऱ् उन्हें देखते ही रहे। एंटनी के पास तो उस फि़ल्म के दो बंटे हुए टिकट भी रखे हुए हैं जो राजीव और सोनिया ने साथ साथ देखी थी। यह फि़ल्म थी सत्यजीत रे की पाथेर पांचाली।

Friday, September 17, 2010






राजनीतिक एनकाउण्टर की आहट

राजकुमार की हत्या के विरोध में आयोजित रैली में स्वामी अग्निवेश और ममता बनर्जी क्या, देश में अब एनकाउण्टर के नाम पर राजनीतिक हत्याकाण्ड का दौर शुरू हो गया है? पिछले एक डेढ़ साल में हुई राजनीतिक हत्याओं पर नजऱ दौड़ाएं, तो यह सवाल बिल्कुल ही बेकार नजऱ नहीं आता। अभी हाल में ही मध्य प्रदेश पुलिस ने भिंड युवक जि़ला कांग्रेस के पद पर कार्यरत अमजद ख़ान को एनकाउण्टर में मार गिराया, जिस पर मध्य प्रदेश विधानसभा के उपनेता चौधरी राकेश सिंह और मध्य प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष डॉ. गोविन्द सिंह नें भिंड पुलिस के ऊपर आरोप लगाया है, कि भिंड पुलिस नें 22 अगस्त को एक मुठभेड़ दिखाकर अमजद ख़ान की हत्या कर दी।
चौधरी राकेश सिंह और डॉ गोविन्द सिंह इसे फज़ऱ्ी मुठभेड़ बता रहे हैं, और मामले की सीबीआई से जाँच कराने की मांग कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि अमजद ख़ान भिंड जि़ला युवक कांग्रेस के सचिव के आलावा पूर्व सैनिक भी था और भारत के तरफ़ से कारगिल युद्ध में उसने भाग भी लिया था। अमजद ख़ान की पत्नी यास्मिन मध्य प्रदेश महिला कांग्रेस की सक्रिय कार्यकर्ता है। मध्य प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में दखल देते हुए अपने स्तर पर जाँच कराने की बात कही है।
दूसरी तरफ़ ममता बनर्जी नें कोलकाता में तृणमूल छात्र परिषद की स्थापना दिवस पर ज्ञानेश्वरी रेल हादसे के आरोपी उमाकांत महतो की पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मौत पर सवाल खड़ा करते हुए कहा है, कि उमाकांत महतो को साजि़श के तहत पुलिस द्वारा फज़ऱ्ी मुठभेड़ में मार दिया गया। ममता का कहना है कि पुलिस मुठभेड़ का बहाना बनाकर ज्ञानेश्वरी रेल हादसे के आरोपियों की हत्या कर रही है। ममता ने यह भी कहा है कि जंगमहल में माओवादियों के नाम पर माकपा हिंसा कर रहे हंै। ज्ञानेश्वरी रेल हादसे में उमाकांत महतो से कई सबूत मिलने की उम्मीद थी, क्योंकि हादसे को लेकर उमाकांत महतो नें माकपा के स्थानीय नेताओं पर उंगली उठाई थी। इससे भयभीत माकपा नेताओं के इशारे पर पुलिस नें फज़ऱ्ी मुठभेड़ में उमाकांत को मार डाला और मुठभेड़ का रूप दे दिया।
सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश नें नक्सली नेता चेरूकूरी राजकुमार उफऱ् आज़ाद और उत्तरांचल के पत्रकार हेमराज पाण्डेय की मौत की न्यायिक जाँच कराने की मांग की है। स्वामी अग्निवेश के आलावा अनेक बुद्धिजीवियों, सामाजिक संगठनों और पत्रकारों नें पुलिस के मुठभेड़ के दावे को ग़लत बताया है। ममता बनर्जी ने इसे $खून (कत्ल) करार दिया है, तो पश्चिम बंगाल के वामपंथी सरकार में मंत्री क्षिति गोश्वामी ने आज़ाद और हेमराज पाण्डेय के मौत की जाँच की मांग की है। आन्ध्र प्रदेश पुलिस एआईबी पर आरोप है कि वह नागपुर स्थित महाराष्ट पुलिस के एंटी नक़्सल आपरेशन के अधिकारियों को बिना जानकारी दिए नागपुर में घुसी और नागपुर से माओवादी नेता आज़ाद और पत्रकार हेमराज का अपहरण कर वर्धा, चंद्रपुर और गडचिरोली होते हुए आन्ध्र प्रदेश स्थित अदिलाबाद के जंगलों में ले गये। आरोप यह भी है कि रास्ते में कहीं उन दोनों की हत्या कर, उनके शव को अदिलाबाद के जंगल में फेंक दिया था।
स्वामी अग्निवेश एवं अन्य को इस बात को लेकर गहरी चिंता एवं क्षोभ है क्योंकि गृहमंत्री पी. चिदंबरम तीन माह पहले स्वामी अग्निवेश को नक्सलियों के साथ शांतिवार्ता में मध्यस्थता के लिए बुलाया था स्वामी अग्निवेश का यह भी कहना है कि उनके कहने पर आज़ाद वार्ता के लिए कदम बढ़ाते हुए शांतिवार्ता की तिथि निर्धारित करने जा ही रहा था, कि आंध्र पुलिस द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी। उसके साथ एक पत्रकार हेमराज पाण्डेय की भी हत्या कर दी गयी। अग्निवेश के अनुसार इन हत्याओं से उनके द्वारा बनायी जा रही शांतिवार्ता की योजना को गहरा धक्का लगा।
इसके आलावा अन्य चर्चित मामले इसरत जहां, सोहराबुद्दीन शेख़, दिल्ली का बटला हाऊस के अलावा सामने आया जो पुलिस की कार्यशैली और देश के कानून पर सवाल खड़े करता है। यह एक ऐसे पुलिस मुठभेड़ की कहानी हंै, जिसमें एक ही व्यक्ति के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस दो अलग-अलग जगह पर दो बार मुठभेड़ करती है। दोनों जगह नौशाद नाम का वह व्यक्ति मारा जाता है। एक जगह है ग़ाजिय़ाबाद और दूसरा मेरठ। दोनों जि़ला पुलिस के दस्तावेज़ कह रहे है कि असली को हमने मारा। पुलिस मेनुअल के मुताबिक अपराधी को पकडऩे के लिए अगर बहुत ज़रूरी हो तो कमर के नीचे गोली मारी जानी चाहिए, लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दें तो लगभग सभी मुठभेड़ों में पुलिस गोली अपराधी के छाती या सिर पर मारी जाती है. आमने-सामने की मुठभेड़ में पुलिस का बाल बांका भी नहीं होता और अपराधी हर बार मारा जाता है।
फज़ऱ्ी मुठभेड़ के मामले पर अगर गौर करें तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) में आयी शिकायतों में उत्तर प्रदेश का स्थान सबसे ऊपर है। अक्टूबर 1993 अक्टूबर 2009 के दौरान उत्तर प्रदेश से फज़ऱ्ी मुठभेड़ की 716 शिकायतें एनएचआरसी को मिलीं। बिहार 79 शिकायतों के साथ दूसरे नंबर पर रहा। आंध्र प्रदेश 73, महाराष्ट्र 61, असम 11, गुजरात 20, हरियाणा 18, कर्नाटक 10, मध्य प्रेदश 36, मणिपुर 18, पंजाब 31, राजस्थान 11, तिमलनाडू 24, त्रिपुरा 4, पश्चिम बंगाल 8, अंडमान निकोवार 1, दिल्ली 22, छत्तीसगढ़ 6, झारखंड 21 और उत्तराखंड से 29 शिकायतें दर्ज की गयीं। एनएचआरसी में पहुंची फज़ऱ्ी मुठभेड़ की शिकायतों के मद्देनजर पूरे देश में 1993-2009 के बीच 1999 मामले दर्ज किए गए। क्या आपको लगता है कि पुलिस मुठभेड़ की आड़ में ये सभी हत्यायें स्वयं के आउट आफ़ टर्न प्रमोशन के लिए कर रही है ? यकीनन। कुछ मामले अपवाद हो सकते है। किंतु आधिसंख्य मामलों के लिए यह कहा जा सकता है कि एक हत्यायें पुलिस सत्ताधीशों के इशारे पर कर रही है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में एक मज़बूत कानून व्यवस्था होते हुए भी मानवाधिकारों का हनन करने वाले इन्हीं सत्ताधारियों द्वारा बचाया जाता है। कानून के अनुसार किसी व्यक्ति की हत्या को आपराधिक दंड संहिता (सी. पी.सी) की धारा 46 के अनुसार यदि तर्क संगत नहीं ठहरया जा सके, तो संबंधित अधिकारी को मानव हत्या का दोषी माना जाएगा। किंतु क्या अमजद ख़ान, उमाकांत महतों, चेरूकूरी राजकुमार उफऱ् आज़ाद तथा पत्रकार हेमराज पाण्डेय की पुलिस मुठभेड़ बताकर की गयी हत्याओं की पड़ताल अगर सोहराबुद्दीन फज़ऱ्ी मुठभेड़ की तरह की जाय, तो यकीन मानिए इन सभी मामलों में लिप्त सत्ताधारी अमित शाह के चेहरे से नकाब हट सकता है।



फ़ जऱ्ी और झोलाछाप डॉक्टरों का कारोबार
हृ मनीष मडाहर खरगोन। खरगोन जि़ले में पिछले कई वर्षो से $फजऱ्ी व झोलाछाप डाक्टरों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में मनमाने ढंग से इलाज के नाम पर गरीब व भोलेभाले ग्रामीणों को सरे आम लुटा जा रहा है। जि़ले में $फजऱ्ी व झोलाछाप डॉक्टर मरीज़ों की जिदंगी बर्बाद करने पर तुले है बिना किसी डिग्री और आयुर्वेद की आड़ में एलोपैथिक इलाज करने वाले डॉक्टर धड़ल्ले से दवाइयों बेच कर अपनी जेब भर रहे हैं ।
अंधिकांश जगहों पर बाहर से आये हुए डॉक्टर हैं, जिनका खरगोन के कई बड़े प्राईवेट अस्पतालों एवं शासकीय अस्पतालों से तार जुड़े हैं, और कमीशन के लालच में ये उन मरीज़ों को यहां रे$फर करते हंै। ऐसा नहीं कि खरगोन के आला दर्जे के अधिकरियों को इस बात की भनक नहीं है। यह सब उनकी मेहरबानियों का ही अंजाम है, क्यों कि इस सबके बदले उन्हें हर महीने मोटा सा कमीशन जो मिल रहा है। पिछले दिनों कलेक्टर महोदय श्री केदार शर्मा जी ने आदेश जारी किया था, कि जि़ले के सभी $फजऱ्ी व झोलाछाप डॉक्टर खोजे जायें और उनके खि़लाफ़ कार्यवाही की जाये। परन्तु उन अधिकारियों को कलेक्टर महोदय के आदेश के बावजूद एक भी झोलाछाप डॉक्टर व उनका चिकित्सालय नहीं मिला। जबकि जि़ले के हर गांव, कस्बे, गलियों में 8 से 10 डॉक्टर बेख़ौफ़ अपना कार्य कर रहे हंै। कई डाक्टरों ने तो अपने डिस्पेन्सरी में मेडिकल दुकान भी खोल रखी है, जो बाज़ार से उचे व मनमाने दोमों पर दवाईयां बेच रहे हंै। परेशान व ग्रामीण जायें तो जायें कहां। बाज़ार में मिलने वाली ग्लुकोज़ की बाटल 20 से 25 रू. की वही उस मरीज़ को 150 से 200 रू. में चढ़ाते हंै और कई बार तो हाईडोस व ग़लत दवाईयों के कारण मरीज़ों की मौत तक हो जाती है।
गलत इलाज से किसी मरीज़ की मौत होने पर वे प्रशासन को इसकी जानकारी भी नहीं होने देते। इन मुद्रों की जांच की सख़्त कार्यवाई होना चाहिए, ताकि क्षेत्र की जनता के साथ रिवलवाड़ न हो और संबंधित विभाग इस ओर ध्यान देकर ऐसे झोलाछाप डॉक्टरों(यमराजों) से मरीज़ों की जि़दंगी बचाकर उन्हें एक नया जीवन प्रदान करे।

Monday, September 13, 2010



तलाक के बाद हनीमून

आलोक तोमर
रांची। दो बार तलाक के बाद भाजपा और शिबू सोरेन फिर साथ आ गए हैं। मुख्यमंत्री दो बार शपथ ले चुके अर्जुन मुंडा बनेंगे और तीन बार शपथ ले चुके शिबू सोरेन उन्हें समर्थन देंगे। सोरेन पर दया भी आती है, मगर वे शायद इसी लायक थे। झारखंड में भारतीय जनता पार्टी ने मंगलवार को झारखंड मुक्ति मोर्चा और ऑल झारखण्ड स्टूडेंट्स यूनियन के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया। पार्टी के विधायक दल के नेता चुने गए अर्जुन मुंडा ने राज्यपाल एम.ओ.एच. फ़ारूक से मिलकर उन्हें 45 विधायकों के समर्थन की चि_ी दी। झामुमो, आजसू, जनता दल (युनाइटेड) के नेता और दो निर्दलीय विधायक भी उनके साथ थे।
इससे पहले, पूर्व मुख्यमंत्री मुंडा को भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया। पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष रघुबर दास ने बताया कि अर्जुन मुंडा को विधायक दल का नेता चुना गया है। ग़ौरतलब है कि बीते 30 मई को शिबू सोरेन के इस्तीफ़ा देने के बाद से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है। इससे पहले सोमवार सितंबर 6 को जेएमएम विधायक दल के सचेतक शशांक शेखर भोक्ता ने कहा था, कि राज्य में लोकप्रिय सरकार बनाने के लिये जल्द दावा पेश किया जायेगा। उन्होंने कहा कि जेएमएम बीजेपी के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिये तैयार है और अब बीजेपी को आगे पहल करना है।
झारखंड विधानसभा में बहुमत के लिये 41 विधायकों की आवश्यकता है और बीजेपी के 18, जेएमएम के 18 और आजसू के पांच विधायकों के ठोस समर्थन से यह जादुई आंकड़ा प्राप्त हो जाएगा। राज्य में आदिवासी मुख्यमंत्री बनाये रखने की परंपरा के कारण बीजेपी में एक बार फिर मुंडा का नाम मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में सबसे ऊपर चल रहा है। मुंडा दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। झारखंड में अर्जुन मुंडा को बीजेपी विधायक दल का नेता चुना गया है, और वह जेएमएम और एजेएसयू के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। राज्य में तीन महीने से जारी राजनीति गतिरोध टूटा। जेएमएम ने कहा, बिना शर्त समर्थन दिया।
मौजूदा विधायक दल के नेता रघुवर दास के इस्तीफे़ के बाद मुंडा को नया नेता चुना गया है। सोमवार की रात दास को फोन कर बीजेपी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने विधायक दल की बैठक बुलाने को कहा। मंगलवार सितंबर को बैठक के बाद रघुवर दास ने कहा, निर्देश के मुताबिक मैंने अपना पद छोड़ दिया है और पार्टी विधायक दल की बैठक में अर्जुन मुंडा को नेता चुना गया है।
इससे पहले बीजेपी ने झारखंड में जेएमएम और एजेएसयू के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश करने का फ़ैसला किया है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता अजय मारू ने कहा, पार्टी ने नई सरकार बनाने का फ़ैसला किया है। तीन महीने पहले बीजेपी और जेएमएम की गठबंधन सरकार उस वक्त बिखर गई, जब बजट सत्र के दौरान लोकसभा में कटौती प्रस्ताव पर जेएमएम प्रमुख शिबू सोरेन ने यूपीए सरकार के पक्ष में मतदान किया। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा, जेएमएम ने सरकार बनाने की बीजेपी की पहल को बिना शर्त समर्थन देने का फ़ैसला किया है। इससे पहले शिबू सोरेन के बेटे और जेएमएम विधायक दल के नेता हेमंत सोरेने ने कहा कि वह समान विचारधारा वाली पार्टियों को समर्थन देने के विकल्प खुले रखे हुए हैं, क्योंकि फिर से चुनाव कराने पर भी खंडित जनादेश ही आएगा। एजेएसयू के उपाध्यक्ष प्रवीण प्रभाकर ने भी कहा है कि उनके पांच विधायक बीजेपी की पहल का समर्थन करेंगे। बीजेपी संसदीय बोर्ड ने 28 अप्रैल को सोरेन सरकार से समर्थन वापस लेने का फ़ैसला किया, क्योंकि शिबू सोरेन ने पार्टी की तरफ़ से लोकसभा में लाए गए कटौती प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया। बाद में हेमंत सोरेन की तरफ़ से बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी को पत्र लिखे जाने पर बीजेपी ने समर्थन वापसी के फै़सले को रोक दिया। इस पत्र में जेएमएम ने कहा कि वह बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देने के लिए तैयार है। लेकिन जेएमएम अपनी बात से पीछे हट गई और बारी बारी से सरकार का नेतृत्व करने की मांग करने लगी। इस बात पर सहमित बनी कि 25 मई को सोरेन मुख्यमंत्री का पद छोड़ देंगे, जिसके बाद मुंडा अगली गठबंधन सरकार का नेतृत्व करेंगे।
लेकिन जब जेएमएम सत्ता साझेदारी की डील से भी पीछे हट गई, तो हताश होकर बीजेपी को 23 मई को शिबू सोरेन सरकार से समर्थन वापस लेना पड़ा। इसके बाद सोरेन सरकार गिर गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया। यह बात सब जानते हैं कि राजनीति में कोई लंबे समय तक दोस्त और दुश्मन नहीं रहता जी हां, इस बात का उदाहरण दे रही हैं भारतीय जनता पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा। ये दोनों पार्टी एकबार फिर साथ-साथ दिख रही हैं। ऐसा माना जा रहा है, कि ये दोनों एक बार फिर झारखंड में मिल-जुलकर अपनी सरकार बनाने वाले हैं। इन दोनों पार्टियों की बीच लंबे समय से बातचीत चल रही है हालांकि खुले तौर पर ये वार्ता नहीं हो रही थी। बातचीत के बाद भाजपा एक बार फिर सरकार बनाने की तैयारियों में जुटी है। वह जल्द ही सरकार बनाने का दावा करेगी। भाजपा का दावा है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा फिर बिना शर्त समर्थन देगी।
सूत्रों के अनुसार रांची में मंगलवार सुबह भाजपा विधायक दल की बैठक बुलाई गई। इसमें पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल के नेता रघुवर दास ने नेता पद से इस्तीफा दे दिया, तथा अर्जुन मुंडा को विधायक दल का नया नेता चुन लिया गया। विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद मुंडा अब राज्यपाल से मुलाकात करने जाएंगे तथा सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे।
इससे पहले रविवार सितंबर 5 को झामुमो की बैठक हुई थी। इसमें झामुमो नेता शिबू सोरेन को सारे फैसले लेने के अधिकार सौंप दिए गए थे। इस बीच, भाजपा की भी बैठक हुई थी, जिसमें अर्जुन मुंडा को सारे अधिकार सौंपे गए थे।

झारखंड में जम कर चली रकम की राजनीति

हृ कृष्णमोहन सिंह
नई दिल्ली। शिबू सोरेन ने अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाने के लिए समर्थन यों ही नहीं दे दिया है। राजनैतिक तौर पर भले ही मोर्चा को कोई ख़ास लाभ नहीं हुआ हो, मगर गुरुजी और उनकी पार्टी अच्छी ख़ासी रईस हो गई है। एक बड़े उद्योग समूह ने भाजपा के लिए इस काम में दिल खोल कर सहयोग किया है, और ज़ाहिर है, कि इस सहयोग की पूरी कीमत यह कंपनी वसूल करेगी। टूटने से बचने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा( झामुमो) ने उद्योगपति एस्सार के तथाकथित यसमैन अर्जुन मुंडा को मजबूरी में समर्थन दे दिया। अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए एस्सार का दिल्ली में कारपोरेट चीफ़ यानी लाइज़निंग चीफ़ रहा निशीकांत दूबे लगभग पांच माह से रात दिन एक किये हुए हैं।
कहा जाता है कि दूबे आज भी अघोषित रूप से रूइया के लिए तथाकथित लाइज़निंग का काम कर रहा है। रूइया की रूची झारखंड के खादानों में है। सो एक बार उसका यसमैन मुख्यमंत्री बन गया तो कर्नाटक के रेव्ी ब्रदर्स की तरह रूइया भी झारखंड में मालामाल हो जायेगा। उसका अघोषित लाइजनर भी और मालामाल हो जायेगा। अघोषित लाइजऩर का तो घोषित लाइजनिंग के समय का ही रूइया की कई कम्पनियों में करोड़ों रूपये के शेयर हैं। इस लाइजऩर के चलते सुषमा स्वराज भी रूइया की तथाकथित शुभचिंतक हो गई हैं और अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए पूरा ज़ोर लगा दी है।
सूत्रों के मुताबिक राजनाथ सिंह को भी तथाकथित लाइजनर के अलावा खुद अर्जुन मुंडा ने पहले से ही पटा रखा है। अर्जुन मुंडा जब मुख्यमंत्री थे तो राजनाथ भाजपा अध्यक्ष थे। कहा जाता है कि उस समय अर्जुन मुंडा राजनाथ और वेंकैया नायडू को हर माह सलामी देने जाते थे। सो ये लोग भी अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए जी जान से लगे हुए हैं। सुषमा,राजनाथ ही हैं जिनने रघुवर दास पर दबाव डालकर झारखंड भाजपा विधायक दल के नेता पद से इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया और अर्जुन मुंडा को नेता भाजपा विधायक दल बनवाया। भाजपा अध्यक्ष नीतिन गडकरी इस समय रूस भ्रमण कर रहे हैं। वह 6 अगस्त को गये थे। उनपर भी सुषमा स्वराज और राजनाथ का भारी दबाव था कि अर्जुन मुंडा को ही मुख्यमंत्री बनाने के लिए हामी भरिये। गडकरी इन दोनों के दबाव में आ गये। नागपुर के तीन व्यापारी भी इसमें प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं, जो रांची में डेरा डाले हुए हैं।
कहा जाता है कि ये भी कुछ अपने पावर प्रोजेक्ट के धंधे और कुछ अन्य लाभ के लिए अन्दर -अन्दर एस्सार लाबी के तथाकथित अंग हो गये हैं। सूत्रों के मुताबिक अर्जुन मुंडा अपने चहेते एस्सार के तथाकथित लाइजऩर के सहयोग से 30 जून 2010 से ही झामुमो,आजसू,जदयू व कुछ निर्दलियों को साम-दाम-दंड-भेद से पटाने में लगे रहे। झामुमो के हेमंत सोरेन तो पहले किसी भी हालत में अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री पद के लिए समर्थन देने के लिए राज़ी नहीं हो रहे थे। क्योंकि वह अर्जुन मुंडा के रग़-रग़ से वाकिफ़ हैं। अर्जुन मुंडा ने उनके पिता शिबु सोरेन को कई बार दग़ा दिया है। अर्जुन मुंडा मूल रूप से तो झारखंड मुक्ति मोर्चा के हैं। वह संघ से दीक्षित होकर भाजपा में नहीं आये हैं। इसलिए भी उनको तरह-तरह के करम करने से कोई गुरेज़ नहीं रहा है। मुख्यमंत्री रहते उन्होंने जो किया वह उतना उजागर नहीं हो पाया, वरना दुनिया जानती कि वह भी किसी से कम नहीं। इस बार मुख्यमंत्री बन गये तो पुरानी आदत तो रहेगी ही। लेकिन इसबार उनकी हर फ़ाइल पर कांग्रेस और उसके चहेते अफ़सरों की निगाह रहनी है। सो ऐसे अर्जुन मुंडा को समर्थन देकर मुख्यमंत्री बनवाने से अच्छा सरकार नहीं बने तो ही ठीक।
हेमंत सोरेन ने भाजपा नेताओं से कहा कि आप लोग भाजपा के किसी वरिष्ठ आदिवासी विधायक को मुख्यमंत्री बनवाइये, झामुमो उसका समर्थन करेगी। हेमंत ने इसके लिए खूंटी विधान सभा के भाजपा विधायक और तीन बार मंत्री रहे संघ से दीक्षित, नीलकंठ मुंडा को समर्थन देने का संकेत किया। नीलकंठ को भाजपा के वरिष्ठ सांसद व लोकसभा उपसभापति करिया मुंडा तथा पूर्व विदेश-वित्ता मंत्री यशवंत सिन्हा भी मुख्यमंत्री बनवाना चाहते थे। लेकिन सुषमा एवं राजनाथ को तो अर्जुन मुंडा के अलावा कोई और इस पद पर चाहिए ही नहीं। ये दोनों अर्जुन मुंडा के नाम पर अड़े रहे, और इधर अर्जुन मुंडा व एस्सार के तथाकथित लाइजऩर ने मिलकर झामुमो के विधायकों को साम-दाम-दंड-भेद से पटाने का अभियान तेज़ कर दिया। झामुमो के विधायकों एवं सांसदों का तो अपनी बोली लगाने का इतिहास ही रहा है।
सो कहा जाता है, कि लगभग दो तिहाई विधायक मेढ़की भूमिका में अर्जुन मुंडा व उसकी तथाकथित एस्सारी पलड़े में छलांग लगा दिये। यह सब कर्म हुआ चुनाव कराने से रोकने के सुचिता के नाम पर। कितने में क्या हुआ इसका खुलासा भी कुछ दिन में हो जायेगा। यह हो जाने की पक्की सूचना मिलने के बाद शिबू सोरेन- हेमंत सोरेन ने पार्टी बचाने के लिए मजबूरी में अर्जुन मुंडा को समर्थन किया।


मास्को में गडकरी आखिर किसके मेहमान

हृ सुप्रिया रॉय
नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी विदेश यात्राओं के मामले में पार्टी के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भी मात देने में जुटे हुए हंै। इस समय वे मास्को में हैं और उनकी इस पांच दिन की यात्रा को ले कर अच्छा ख़ासा विवाद छिड़ गया है। तकनीकी तौर पर गडकरी पेयजल के क्षेत्र में रूस के सहकारी आंदोलन की भूमिका का अध्ययन करने गए हैं। भाजपा की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार वॉटर फ्रीडम रिवोल्यूशन संस्था के निमंत्रण पर गडकरी मास्को गए हैं, और यह संस्था पूरे विश्व को शुद्व पानी उपलब्ध करवाने के प्रति समर्पित है। इस संस्था के संयोजक प्रोफ़ेसर विक्टर पैट्रिक हैं, जिन्होंने पानी शुद्व करने का एक नया फ़ॉर्मूला, गोल्डन फ़ॉर्मूला ईजाद किया है। भाजपा की ओर से इस संस्था की बहुत तारीफ़ की गई है, लेकिन रूस से मिली ख़बरों के अनुसार पेट्रिक काफ़ी विवादास्पद व्यक्ति हैं और एटमी तकनीक और कार्बनशीट के अविष्कार का जो उनका दावा है, वह भी तथ्यों पर खरा नहीं उतरता। ख़ास तौर पर एटमी तरीके से शुद्व किया हुआ पानी तो लोगों को नुकसान भी पहुंचा सकता है। भारतीय जनता पार्टी ने पुष्टि की है कि यह आपत्तियां भी उनकी जानकारी में हैं, मगर पार्टी अध्यक्ष मास्को में कोई वचन देने नहीं गए थे।

Friday, September 3, 2010




नकली खाद व कीटनाशक कारखानों पर छापे

छींटे मध्यप्रदेश मंत्री पर

प्रकरण के प्रमुख आरोपी जैन और भादुपोते राईट-लेफ़्ट हैंड कहे जाते थे सहकारिता मंत्री श्री बिसेन के। बालाघाट के प्रत्येक कार्यक्रम में मंत्री के पीछे दिखते थे। भाजपा कार्यकर्ता इनको मजबूरी में भाव देते रहे, मगर मंत्री के नकचढ़े स्टाफ़ बसंत रहांगडाले से तो कार्यकर्ता असंतुष्ट ही हैं। पप्पू भादुपोते की पहचान मंत्री के किचन मेम्बर के रूप में होने लगी थी। आरोपी जैन और भादुपोते के खि़लाफ़ गोंदिया रावणवाड़ी एवं गंगाझरी में मामला धारा 13, 3, 4 के 17 (1), 18 (1) कीटनाशक एक्ट के साथ ही धारा 418, 420, 468, 447, 483, 201, 34 भारतीय दण्ड विधान के तहत दर्ज किया गया है। खाद में सी.जी. बायोएक्टिवा, जादूजाईम, श्रीजी-ट्राई, कोडर्म पाउडर, उसमें मिश्रित किये जाने वाला टेलकम पाउडर, पैकिंग के स्टीकर व डिब्बे बरामद हुए। नकली कीटनाशक रूपये 1.25 करोड़ के ज़प्त किये गये। आरोपी मादुपोते से संबंधों को लेकर मंत्री जी का बयान मात्र एक औपचारिता है। छग-मप्र के कई जि़लों में नकली कीटनाशक सप्लाई किये जाते थे। गोंदिया में अक्रोशित जनता द्वारा आरोपियों के पुतले जलाये गए।
हृ रहीम खान
गोंदिया (महाराष्ट्र)। विदर्भ क्षेत्र के गोंदिया, नागपुर एवं वर्धा में आईबी द्वारा पुलिस के सहयोग से छापामार कार्यवाही करके जिस तरह से असली कीटनाशकों व खाद में मिलावट कर नकली माल बनाकर कृषकों व आमजनों से धोखाधड़ी कर की जा रही लूटपाट का पर्दा$फाश किया है, यह कृत्य वास्तव में ही सराहनीय है।
मध्यप्रदेश के बालाघाट से केवल 45 किलोमीटर स्थित महाराष्ट्र के नगर गोंदिया में सिविल लाईन स्थित सुधीर हुकुमचंद जैन के मकान में पुलिस द्वारा इंटेलीजेंस ब्यूरो एवं आईबी के पहल पर कृषि उपयोग में लाये जाने वाले कीटनाशकों को मिलावट करके बड़े पैमाने पर नकली कीटनाशक बनाने वाले अड्डों पर छापा मारकर करोड़ों रूपये का माल ज़प्त किया गया। रि-पैकिंग की जा रही बोतलें प्राप्त हुई, जिसमें सच्चाई सामने आयी, कि श्रीजी-बायोटेक एग्रीकल्चर एण्ड ईक्वीपमेंट के एग्डीरेस्टिनीम 1500 पीपीएम नामक कीटनाशक की असली दवा की एक बोतल के माध्यम से अधिक बोतलों में मिलावटी कीटनाशक भरने का काम किया जा रहा है। इसके अलावा बोतलों के खोले गये ढक्कन व दूसरी बोतलें तैयार करने के लिए स्टीकर, ढक्कन व खाली बोतलें बरामद हुईं। उल्लेखित है कि कृषि विभाग एवं ड्रग एण्ड फुड विभाग, क्वालिटी कन्ट्रोल के तहत यह जि़म्मेदारी आती है कि बाज़ार में बिकने वाली कीटनाशकों का समय समय पर नमूना एकत्रित कर प्रयोग शाला में उनकी शुद्धता की जांच करायी जाये, लेकिन इन विभागों की मिलीभगत के कारण इस तरह के मिलावटी केन्द्र संचालित हो रहे हैं। इसलिए आईबी ने पुलिस विभाग के माध्यम से कार्यवाही करायी। इस गोरख धंधे में मध्यप्रदेश के सहकारिता मंत्री गौरीशंकर बिसेन के ख़ासम ख़ास या नाक के बाल कहे जाने वाले पप्पू भादुपोते की भी प्रमुख भूमिका रही है। पुलिस ने छापे के बाद हल्बीटोला में एक गोदाम में पकड़े गये कीटनाशक के मामले में रावणवाड़ी पुलिस थाने में पप्पु भादुपोते, अज्जू भादुपोते, कमलेश बनोटे व सुधीर जैन के खि़लाफ़ धारा 13, 3, 4 के 17 (1), 18 (1) कीटनाशक एक्ट के साथ ही धारा 418, 420, 468, 447, 483, 201, 34 भारतीय दण्ड विधान के तहत मामला दर्ज किया। आरोपी सुधीर जैन को 19 अगस्त को ही पुलिस ने हिरासत में ले लिया और उसके खि़लाफ़ फिर लगातार कार्यवाही की जा रही है। पर अन्य आरोपी राजनीतिक संरक्षण के कारण बचते फिर रहे हैं। इस पूरे मामले में बालाघाट जि़ले के निवासी मध्यप्रदेश शासन के सहकारिता मंत्री श्री गौरीशंकर बिसेन की भूमिका भी संदिग्ध दिखायी पड़ रही है, क्योंकि प्रमुख आरोपी पप्पू भादुपोते जैसे ही बिसेन मंत्री बने, उनके आगे पीछे हमेशा बालाघाट में देखे जाते थे। यह अचानक रातों रात बालाघाट में इनका प्रेम अनेक लोगों को समझ नहीं आ रहा था। परन्तु जब सम्पूर्ण मामले का पर्दाफ़ाश हुआ तो स्पष्ट हो रहा है, कि इन्होंने सहकारिता मंत्री के संरक्षण में यह कारनामा किया है, जिस की आग में मंत्री जी भी झुलसे बिना नहीं रह सकते। न्यायालय द्वारा प्रमुख आरोपी सुधीर जैन को ज़मानत नही दी गयी। स्मरणीय है कि पप्पू भादुपोते को सहकारिता मंत्री ने हैसियत से अधिक जिस प्रकार से महत्व दिया था और बालाघाट जि़ले में भी किसानों के द्वारा नकली खाद प्राप्ति की शिकायतें लगातार की जाती रही हैं, जिसका $फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह सब घटनाक्रम इस बात को सोचने के लिए मजबूर कर देता है कि गोंदिया और बालाघाट में 45 किलोमीटर की दूरी है और नकली खाद के प्रमुख आरोपी पूंछ की तरह मंत्री श्री गौरीशंकर बिसेन से चिपके रहते थे, तो यह स्पष्ट है कि यदि पुलिस किसी राजनीतिक दबाव में नहीं आती, तो इस प्रकरण के छींटे सहकारिता मंत्री के दामन को भी दाग़दार कर देंगे। बताया जाता है कि बालाघाट में खुलने वाला शक्कर कारखाने में भी पप्पू भादुकोते कहीं न कहीं अपनी भूमिका निभा रहे थे।
गोंदिया से जुड़े हमारे सूत्रों ने बताया कि पप्पू भादुपोते का काम प्रभाव में रहने वाले राजनेताओं से जुड़कर अपनी दुकान को चलाना रहा है और यही काम सहकारिता मंत्री के साथ भी वह कर रहे थे। हमारे सूत्रों ने जानकारी दी है कि सहकारिता मंत्री के दबाव के कारण ही पप्पू भादुपोते के $िखला$फ पुलिस कार्यवाही नहीं कर पा रही है। परन्तु लोकतंत्र में कानून सबसे बड़ा है।
मंत्री का बयान
नकली कीटनाशक प्रकरण में अपने नाम घसीटे जाने पर सहकारिता मंत्री बिसेन ने राजनीति का औपचारिकता प्रदर्शित करने वाला यह बयान दिया कि कीटनाशक की पूर्ति खंरीदी का कार्य कृषि विभाग के अंतर्गत होता है। सहकारिता विभाग से उसका कोई संबंध नहीं है, गोंदिया में उनका ससुराल है। वर्षों से यहां उनका आना जाना है। अनेक लोग उनके सम्पर्क में आते हैं। कौन कैसा है? उससे उनका कोई सरोकार नहीं है। दूर दूर तक उनको इस मामले की जानकारी नहीं है।
जबकि वास्तविकता यह है कि भादुपोते उनके मंत्री बनने के बाद ही उनके साथ लगातार चिपककर चल रहे थे। यह बात बालाघाट का प्रत्येक कार्यकर्ता अच्छी तरह से जानता हैं। उल्लेखित बिन्दु यह है कि भादुपोते ने सहकारिता मंत्री के साथ चिपककर मध्यप्रदेश के अनेक प्रभावशाली राजनेताओं से अपनी घुसपैठ बना ली थी, और उसके माध्यम से वह बड़ा गेम खेल रहे थे। जानकार बताते हैं, कि सुधीर जैन का बालाघाट में इतना दबदबा रहा कि उनके बिल आसानी से विभाग द्वारा पास कर दिये जाते थे।
जनता का आक्रोश
गोंदिया में विभिन्न संगठनों द्वारा नकली कीटनाशक निर्माण करने वाले प्रमुख आरोपी सुधीर जैन और पप्पू भादुपोते के सार्वजनिक रूप से पुतले जलाकर अपना विरोध प्रकट किया गया।
भादुपोते अभी भी $फरार
राजनैतिक संरक्षण में व्यवसाय करने वाले प्रमुख आरोपी पप्पु भादुपोते पुलिस गिरफ्त से बाहर हैं, जिनको पकडऩे के लिए पुलिस द्वारा विभिन्न स्थानों पर छापे भी मारे गये, पर असफलता ही हाथ लगी।
सरकार के $खुफिय़ा विभाग द्वारा एक व्यवस्थित रूप से पुलिस के माध्यम से छापा मार कार्यवाही करके नकली कीटनाशक प्रकरण में साहस का परिचय देते हुए प्रभावशाली आरोपियों पर हाथ डालकर उनका असली चेहरा बेनकाब किया गया है, मगर संकट के समय राजनीतिक संरक्षण से वंचित प्रमुख आरोपी कब तक पुलिस को चकमा देकर अपने आप को बचाते रहेंगे। दुर्भाग्य पूर्ण विषय तो यह है कि किसानों के नेता कहलाने वाले प्रभावी लोग ही किसानों का गला घोटने वाले आरोपियों को संरक्षण दे रहे हैं।


मैच फिक्सिंग में दाऊद इब्राहिम?
हृ निरंजन परिहार
मुम्बई। अभी यह पता नहीं चला है कि मैच फि़क्सिंग के मामले में भारत का कौन सा गिरोह सक्रिय है? लंदन में पकड़े गए सुपर फि़क्सर मजीद ने भारत की ओर इशारा किया हंै और भारत में गुप्तचर एजेंसियों से ले कर छोटे बड़े सटोरिए तक इस बात पर सहमत हैं, कि इतना बड़ा ऑपरेशन दाऊद इब्राहीम के बिना नहीं हो सकता।
अब एजेंसियों को दाऊद इब्राहीम के क्रिकेट फि़क्सिंग में दिलचस्पी लेने के बारे में पता लगाना है। आखिऱ दाऊद इब्राहीम बहुत दिनों से भारत में सिफऱ् वसूली कर रहा है और उसमें भी छोटा शकील और उसके दूसरे चेले सामने आते हैं। दाऊद इब्राहीम के बारे में तो फि़लहाल यह भी पता नहीं है कि वह पाकिस्तान में मौजूद भी है या नहीं?
ऑपरेशन फि़क्सिंग कितना बड़ा रहा होगा यह इसी बात से ज़ाहिर है कि आईसीसी की कमेटी पाकिस्तान के पिछले अस्सी मैच समीक्षा की सूची में डालने के लिए तैयार हैं और अस्सी मैचों में अगर औसत के हिसाब से प्रति मैच एक अरब रुपए के भी दांव लगे, तो यह खेल 80 अरब रुपए का है। सही बात यह भी है कि इतनी बड़ी रकम में से खिलाडिय़ों को अगर मिला है, तो पांच से दस प्रतिशत मुनाफ़े से ज्य़ादा कुछ नहीं मिला होगा।
इंग्लैंड और पाकिस्तान के बीच लॉर्डस में हुई मैच फिक्सिंग के पीछे डी कंपनी का भी हाथ था। मुंबई के सटोरियों की मानें, तो इस फि़क्सिंग की मास्टर माइंड दाउद की डी कंपनी है। पाकिस्तानियों की मैच फि़क्सिंग के कारण भारतीय सट्टा बाज़ार को एक हज़ार करोड़ से ज्य़ादा की चपत लगी है। जबकि पाकिस्तान और इंगलैंड के बुकीज़ ने 20 मिलियन पाउंड कमा लिए हैं। स्टिंग ऑपरेशन में जब फि़क्सिंग का खुलासा हुआ तो भारतीय सटोरियों ने पैसे देने से मना कर दिया। लेकिन मुंबई के सटोरियों को अब पाकिस्तान से डी कंपनी के फ़ोन आ रहे हैं। पैसा देने के लिए उन पर जबरन दबाव बनाया जा रहा है। दाउद के नाम का हवाला देकर उन्हें नतीजा भुगतने की चेतावनी दी जा रही है। सटोरिए हैं कि वो सुरक्षा के लिए पुलिस से गुहार भी नहीं लगा पा रहे हैं।

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