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Friday, April 30, 2010





मनमोहन की माया

आलोक तोमर

एक दिलचस्प और हृदय विदारक संयोग यह है कि झारखंड में भाजपा की मदद से सरकार चला रहे और अब तक लोकसभा के सदस्य बने हुए मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने लोकसभा में आ कर यूपीए के पक्ष में मतदान किया। भाजपा के नेता यह जानते थे और झारखंड में उथल पुथल नहीं हो, इसलिए खामोश बने रहे। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के और लालू प्रसाद के राष्ट्रीय जनता दल के कुल 26 सांसद हैं।
इन दोनों दलों ने कटौती प्रस्ताव पेश किए थे, मगर मतदान के समय वाक आउट कर के उन्होंने सरकार की मदद कर दी। मायावती, मुलायम सिंह और लालू, तीनों ने वही पुराना मुहावरा दोहराया, जिसके अनुसार वे सांप्रदायिक ताकतों यानी भाजपा को सत्ता में आते नहीं देखना चाहते हैं। इसके बावजूद यूपीए को बहुत मु$गालते में नहीं रहना चाहिए। उसे 289 वोट मिले, जो सदस्य संख्या के आधे यानी 272 से सि$र्फ 17 ज़्यादा हैं। ज़ाहिर है कि मायावती के 21 सांसद मदद नहीं करते और मुलायम और लालू वाक आउट नहीं करते तो सरकार संकट में फंस जाने वाली थी।
कांग्रेस के मैनेजरों ने इतना इंतज़ाम कर लिया कि भाजपा और वाम मोर्चा मिल कर बाकी दलों की मदद से कटौती प्रस्तावों को ले कर सरकार को जो संकट में डालने वाले थे, अपने इरादों में कामयाब नहीं हुए। एक वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री ने तो मंज़ूर भी किया कि बसपा के 21 सदस्य हमारे पक्ष में आए और इसका मतलब यह है कि हमारे पास अपने 272 सांसद नहीं हैं और जिस दिन सारा विपक्ष तय कर लेगा, सरकार गिर जाएगी।
देवेगौड़ा के जनता दल एस के यूपीए से निकल जाने के बाद यूपीए के पास 271 सदस्य रह गए हैं मगर देवेगौड़ा भी $गैर हाजि़र थे। तृणमूल एनसीपी और तीन सांसद दिल्ली समय पर नहीं पहुंच पाए, जबकि उन्हें पहले से पता था कि लोकसभा में करो या मरो की स्थिति हैं। कांग्रेस को उम्मीद थी कि छोटे दल भाजपा से निकाले गए जसवंत सिंह कटौती प्रस्तावों के $िखला$फ वोट डालेगी मगर ऐसा हुआ नहीं। पार्टी में आम राय थी कि बसपा के साथ समझौता करने से राजनैतिक लेन देन का आरोप लगेगा। मायावती ने समर्थन की घोषणा करते वक्त सांप्रदायिक ताकतों वाला मुहावरा ही इस्तेमाल किया और यह भी कह दिया कि उन्हें और उत्तर प्रदेश सरकार को केंद्र सरकार अकारण परेशान कर रही है। लेकिन अब ज़ाहिर हो चुका है कि सरकार बनी रहे इसके लिए भी मायावती का समर्थन ज़रूरी है और मायावती ब$गैर दाम वसूले कोई काम नहीं करती। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने मतदान के बाद राहत की मुद्रा में कहा, कि सदन ने मान लिया कि सरकार की नीतियां सही हैं।
असली दिक्कत लालू और मुलायम सिंह को होने वाली है क्योंकि $खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि इन लोगों ने यानी विपक्ष के तेरह पार्टियों के गठबंधन ने धमकियां दे कर पूरे एक महीने देश को और लोकतंत्र को बंधक बनाए रखा था। अब दिलचस्प स्थिति यह है कि भाजपा और वाम मोर्चा एक साथ हैं और बाकी विपक्ष बिखरा हुआ है। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार कटौती प्रस्तावों पर मतदान हुआ है।
मीरा कुमार से पहले कहा गया था कि वे कटौती प्रस्तावों को मंज़ूर ही न करे, लेकिन उन्होंने सांसदों के संवैधानिक अधिकार का हवाला दे कर इन्हें मंज़ूर किया। संसद सचिवालय के अधिकारियों ने जानबूझ कर किया या वाकई यह तकनीकी भूल थी कि मतदान के समय ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग सिस्टम $खराब हो गया। पहले सारे कटौती प्रस्ताव $गनीमत से $खरिज किए गए और फिर पर्चियों से मतदान करवाया गया। प्रणब मुखर्जी सबसे ज़्यादा सक्रिय थे और सोनिया गांधी खामोशी से तमाशा देख रही थी। ममता बनर्जी और आश्चर्यजनक रूप से सांसदों के बीच घूम कर असली मैनेजमेंट कर रहे थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लगातार $खमोश बैठे रहे और उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया। वैसे भी उन्हें मतदान करने का अधिकार नहीं था क्योंकि वे राज्य सभा के सदस्य हैं।





कमाई का ज़रिया बनी मुख्यमंत्री कन्यादान योजना
महेश गोस्वामी

सारनी (बैतूल)।
मुख्यमंंत्री कन्यादान योजना अधिकारियों के लिए वरदान साबित हो रही है। एक जोड़े के लिए 7500 रूपये का शासन अनुदान दे रही है, जो अधिकारियों के लिए कमाई का ज़रिया बन गया है। ऐसा ही एक मामला आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र की जनपद पंचायत घोड़ाडोंगरी में बीते दिनों मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत 207 जोड़ों का सामूहिक विवाह कार्यक्रम के दौरान वर वधु के परिवारों के भूखे पेट वापस जाने के अलावा सामग्री $खरीदी एवं व्यवस्थाओं में भारी अनियमित्ताएं होने का मामला उजागर हुआ है। बताया जाता है कि विकास खण्ड घोड़ाडोंगरी की जनपद पंचायत को मुख्य मंत्री कन्या दान योजना के लिए 15 लाख 57 हज़ार रूपये मिले थे। जिसमें 56 पंचायतों से 207 जोड़ों की शादियां कराईं गईं । शासन ने एक जोड़े के लिए 6500 रूपये एवं अन्य व्यवस्थाओं के लिए 1000 रूपये प्रति जोड़े के हिसाब से भुगतान किया था। जनपद पंचायत ने एक जोड़े को 1950 रूपये एक मंगलसूत्र एक ग्राम और 125 मिली ग्राम एवं 2900 रूपये का भारत पेट्रोलियम का एक गैस कनेक्शन देने के अलावा अन्य सामग्री प्रदान की है। इसके अलावा प्रत्येक जोड़े के परिवार के 14 लोगो को 25 रूपये प्रति थाली के हिसाब से खाना देने का प्रावधान है। लेकिन जनपद पंचायत घोड़ाडोंंगरी के द्वारा कराये गये सामुहिक विवाह में ऐसा कुछ देखने में नज़र नही आया बल्कि प्रत्येक जोड़े के परिवार से आए लोगों को खाना नही मिलने पर भूखे पेट वापस लौटना पड़ा। इतना ही नहीं व्यवस्था के नाम पर 45 टेंट लगाये थे। जिसका भुगतान करीबन 50 हज़ार रूपये किया गया है। जबकि 15 बाई 15 का टेंट मात्र दो सौ रूपए में लगता है। उसके अनुसार 45 टेंटों का भुगतान 9 से 10 हज़ार रूपए होना चाहिए था। आश्चर्य की बात तो यह है कि एक जोड़े को दिये गये रज़ाई गद्दे में रूई के स्थान पर जूट भरा हुआ है। वहीं एक नजऱ बाज़ार की ओर करें तो एक सोने का मंगलसूत्र ब$गैर मार्क का 1600 से 1700 रूपये, ग्रामीण क्षेत्रो के लिए एचपी गैस कनेक्शन 2500 से 2700 रूपए में मिल जाता है। लेकिन यह सभी सामग्री जनपद पंचायत ने अधिक दामों पर $खरीद की है। अगर इस सामूहिक विवाह मामले की उच्चस्तरीय जांच कराई जाये तो जनपद पंचायत के अधिकारियों के कई चेहरों पर से नकाब उठ सकता है।
अधिकारी बोले:-
जनपद पंचायत घोड़ाडोंगरी के अंतर्गत जो सामुहिक विवाह आयोजन में जो अनियमित्ताए हुई हैं, उनकी जांच कराई जायेगी।
विजय आनंद कुरील, कलेक्टर बैतूल
इनका कहना है:-
सामूहिक विवाह के लिए जो सेम्पल दिखाये गये थे, वो नहीं दिये गये हैं। इस कार्यक्रम के दौरान जो भी अनियमित्ताएं हुई हैं, उनकी जांच कराई जायेगी। भुगतान रोके जाने के संबंध में भी कार्यवाही की जावेगी।
मनीराम बरकड़े, अध्यक्ष जनपद पंचायत घोड़ाडोंगरी।

Friday, April 23, 2010





बीपीएल को भूलकर सरकार खेल रही है आईपीएल

दुर्भाग्य है कि एक तरफ जहां महंगाई से जूझ रही जनता भरपेज भोजन के लिए तरस रही है, हमारे नेता चाहे वो विपक्ष में बैठे हों या सत्तापक्ष में, सभी संसद का बेशकीमती वक्त आईपीएल के खेल में बर्बाद कर रहे हैं। दरअसल आईपीएल इस समय सबसे हॉट मुद्दा है, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में छाया हुआ है, ऐसे में सारे नेता आईपीएल पर बोलकर मीडिया में कवरेज बटोरना चाहते हैं, फिर बीपीएल से अभी क्या मिलेगा? अभी चुनाव भी पास नहीं हैं फिर $गरीब के लिए बोलने से क्या फायदा...
संजय तिवारी
साल 2007 में खेल शुरू होता है जी समूह के सुभाष चन्द्रा द्वारा आईसीएल बनाने से। सुभाष चंद्रा अपना खेल चैनल लेकर आनेवाले थे। मामला अटक गया। बीसीसीआई के दांव से सुभाष चंद्रा पट$खनी खा गये। उन्हें क्रिकेट मैचों के प्रसारण अधिकार $खरीदने ही नहीं दिये गये। मामला कोर्ट कचहरी तक गया, लेकिन बात नहीं बनी। ऐसे ही वक्त में उन्होंने घरेलू क्रिकेट की टीमों के लिए इंडियन क्रिकेट लीग बना दी।
क्रिकेटरों के $खरीद $फरोख्त का पहला प्रयोग सुभाष चंद्रा ने ही किया था। फिर क्या था। मानों ललित मोदी को पंख लग गये। बीसीसीआई के बंद बक्से में पड़ा घरेलू क्रिकेट का जिन्न बाहर निकल आया, और 2007 में ही आईपीएल का गठन हो गया। जो खेल सुभाष चंद्रा खेलना चाहते थे उसे खेलना शुरु किया ललित मोदी ने। सुभाष चंद्रा $खुद टीमों को खरीद रहे थे। ललित मोदी ने खेल खिलाड़ी और असली खिलाडिय़ों का ऐसा $खाका खींचा कि सितंबर 2007 में क्रिकेट की पहली नीलामी के मौके पर बड़े-बड़े व्यावसायिक घराने टीम $खरीदने के लिए आ खड़े हुए। मुकेश अंबानी जैसे संजीदे व्यापारी पत्नी के क्रिकेट मोह में खिंचे चले आये, तो रंगीले माल्या भी बोली लगाने पहुंचे। पहले ही दौर की नीलामी के बीसीसीआई ने 4500 करोड़ रुपये कमाए। बीसीसीआई के बाज़ीगर जो अभी तक घरेलू क्रिकेट के रणजी ट्राफी में अटके हुए थे उनके सामने खेल का ऐसा चटकदार रंग उभर आया था, जो परंपरागत क्रिकेट को पानी पानी कर रहा था। पहले ही दौर में जिन छह टीमों को नीलाम किया गया था, उसके लिए सबसे बड़ी बोली लगाई थी मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी ने। उन्होंने मुंबई इंडियन्स के लिए 11 खिलाडिय़ों को $खरीदने के लिए 383 करोड़ रुपये अदा किये थे। तीन साल पहले जो सबसे बड़ी रकम थी तीन साल बाद उस रकम की कोई कीमत ही नहीं बची। इस साल आईपीएल की जिन दो टीमों को इस लीग में शामिल किया गया, उनमें से एक टीम कोच्चि को 1702 करोड़ रुपये में $खरीदा गया। सहाराश्री ने भी पुणे की टीम गठित करने के लिए 1533 करोड़ रुपये खर्च कर दिये।
खेल के पीछे छिपा खेल शबाब पर आ गया था। अपने पहले सीज़न में कम वस्त्रधारी लड़कियों के कारण नैतिक आलोचना के शिकार बने आईपीएल के तीसरे सीज़न आते आते खेल बड़े खिलाडिय़ों के चंगुल में चला गया। आईपीएल में ऐसा क्या $खास था जो रणजी ट्रा$फी में नहीं था? आप कहेंगे कि रणजी ट्राफ़ी में ऐसा था ही क्या, जो आईपीएल में नहीं है? क्रिकेट खिलाडिय़ों के लिए भरपूर पैसा, क्रिकेट के प्रायोजकों को भरपूर दर्शक, टीम के $खरीदारों को हार जीत की हर अवस्था में मुनाफे़ की गारंटी, बीसीसीआई की मोटी कमाई, प्रसारण का अधिकार पाये लोगों की भरपूर गोद भराई, आईपीएल सबको सबकुछ तो दे रहा है। फिर आ$िखर ऐसा क्या हुआ कि आईपीएल असली खिलाडिय़ों के आंख की किरकिरी बन गया। कारण ढूंढने के लिए दूर नहीं जाना है। कारण आईपीएल के गठन में ही छिपे हुए हैं।
असल खेल शुरू हो गया है। ललित मोदी ने जिस क्रिकेट को पैसे का कारोबार बनाकर परोसा था, वही कारोबार अब उनके गले की हड्डी बन गया है। अति सब जगह वर्जित है, और ललित मोदी शायद यह भूल गये कि चोरी से कोकीन रखने के आरोप में दो साल जेल काट लेना आसान है, एक अरब लोगों के साथ धोखाधड़ी करके सा$फ बच निकलना मुश्किल होता है। देश के समस्त खेलों को $खत्म करके स्थापित हुए क्रिकेट को यह आईपीएल खा जाएगा। देखते जाइये, ललित मोदी ने क्रिकेट की जड़ में पूंजी का म_ा डाल दिया है। वह अपना काम ज़रूर करेगा। आईपीएल के गठन की सबसे पहली और बड़ी भूल यह थी कि इस खेल में सबकुछ होते हुए भी कुछ नहीं है। मसलन, आईपीएल के तहत टीमों के गठन के लिए सात चार की व्यवस्था की गयी है। यानी, सात खिलाड़ी भारत के होंगे जबकि चार खिलाड़ी विदेशों से लाए जाएंगे, यानी एक ही देश का एक खिलाड़ी अगर बैटिंग कर रहा है तो दूसरा खिलाड़ी बालिंग करता है। एक प्रदेश का एक खिलाड़ी इस टीम से खेल रहा होता है तो दूसरा उस ओर से. भारतीय टीम के खिलाड़ी तो मानों पंचूरण की तरह पूरे आईपीएल में बंट गये हैं। अब तक क्रिकेट के दर्शक जिस टीम भावना के वशीभूत होकर क्रिकेट देखते थे वह टीम भावना विधिवत काट पीटकर फेंक दी गयी, लेकिन भारती दर्शक क्रिकेट के नाम पर अगर दीवार पर तीन लाइनें खीचकर स्पंट बना सकते हैं खेल के इस स्वरूप को भी स्वीकार कर लेने में कोई हर्जा नहीं है। पहले साल आईपीएल के शोर में इस खेल की सभी खामियां दब गयीं लेकिन इसके अगले ही साल विवादों ने डेरा जमाना शुरू कर दिया। लेकिन आईपीएल के कमिश्नर ललित मोदी की योजनाएं कहीं से कमज़ोर नहीं हो रही थीं। छह से आठ और भविष्य दस टीमों का भरा पुरा क्रिकेट परिवार बन चुका आईपीएल बतौर क्रिकेट इतना बड़ा कन्$फ्यूज़न है कि दर्शक अपने आप को शायद इसके साथ पूरी तरह से जोड़ नहीं पाता है। इस साल जितने भी मैच हुए हैं उसमें अधिकांश मैचों को न तो टीवी पर मनमा$िफक टीआरपी मिली है, और न ही स्टेडियम में दर्शक. आईपीएल के अंतरविरोध दिखने शुरू हो गये थे।
लेकिन केवल मैदान के अंतर्विरोध ही उभरकर सामने नहीं आ रहे थे। मैदान के बाहर असल खिलाडिय़ों के मुना$फे की मानसिकता और अहम का टकराव इसके पतनशील होने का बड़ा कारण साबित हुआ। ललित मोदी ने सगर्व घोषणा की थी, इस साल आईपीएल 22000 करोड़ रुपये का कारोबार हो चुका है। टीमों की कमाई के इतर बीसीसीआई को अकेले वर्तमान साल में ही कोई साढ़े चार से पांच हज़ार करोड़ कमाई की उम्मीद थी। यह कमाई सि$र्फ खेलों से है। टीमों की $खरीद बिक्री से नहीं। लेकिन इसी बीच अति मुनाफे की मानसिकता आड़े आ गयी। कोच्चि टीम में रुचि रखने के आरोपी शशि थरूर आईपीएल के लपेटे में आ गये। अपने उच्च संपर्कों और अति महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व के शिकार ललित मोदी ने शशि थरूर से अपनी निजी खुन्नस निकालने के लिए $खबर लीक करवाई कि कोच्चि टीम में जो खरीदार हैं उसमें सुनंदा नामक मालकिन के पास 70 करोड़ के स्वीट शेयर हैं। यह $खबर न बनती अगर सुनंदा का नाम शशि थरूर से न जोड़ा जाता। अब तो शशि थरूर पर बन आयी। वे यह इंकार कैसे कर देंगे कि वे सुनंदा को नहीं जानते और सुनंदा यह इंकार कैसे कर दें कि उन्होंने टीम में स्वीट शेयर हासिल नहीं किये हैं? फिर वे सारे प्रमोटर कौन हैं जो एक दूसरे को नहीं जानते, लेकिन आईपीएल की सबसे महंगी टीम मिल जुलकर $खरीद लेते हैं? उन सभी लोगों के बीच केन्द्र के रूप में कौन कार्य कर रहा है? ललित मोदी ने शशि थरूर को संकट में डाल दिया था। लेकिन थरूर भी भला क्यों चुप रहते? कांग्रेस के निशाने पर ललित मोदी पहले से ही बने रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण उनका भाजपा नेता वसुंधरा राजे से नज़दीक रिश्ता भी है। कांग्रेस के राजीव भाई इस वक्त बीसीसीआई में कांग्रेसी प्रतिनिधि और प्रवक्ता हैं। वे शायद ही कभी चाहें कि भाजपा के करीबी ललित मोदी बीसीसीआई में प्रभावी हों। लेकिन दूसरी ओर शरद पवार हैं जो देश के $गरीबों से अधिक चिंता बीसीसीआई के अमीरों की करते हैं। वैसे भी अब वे क्रिकेट की अंतरराष्ट्रीय संस्था के अध्यक्ष हो चुके हैं। इसलिए अपने देश की संस्था के स्वाभाविक संरक्षक तो वे हो ही जाते हैं। मामला दोनों ही ओर से उलझता चला गया। बात छापेमारी और जांच पड़ताल तक चली गयी है। इधर भाजपाई शशि थरूर को निशाना बना रहे हैं, कि वे इस्ती$फा दें तो उधर कांग्रेसी ललित मोदी को निशाना बनाकर उन्हें सा$फ कर देना चाहते हैं। अ$फवाहें हैं कि ललित मोदी पर बीसीसीआई का मज़बूत शिकंजा कस दिया जाए। ललित मोदी भी कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं। अगले दो साल तक उन्हें उनके पद से हटाने का मतलब है आईपीएल को ही भंग कर देना। इसलिए कमज़ोर करने की रणनीति पर ही काम हो रहा है। छापेमारी इसी रणनीति का अहम हिस्सा है। वैसे भी आईपीएल में जितना अनाप शनाप पैसा लगने की खबरें उड़ रही हैं उससे एक बात तो साफ है कि ललित मोदी का दामन बेदाग तो बिल्कुल नहीं होगा। और हमारे देश का आयकर विभाग जब अपने पर उतर आता है तो क्या करता है यह आप हर्षद मेहता को याद करके अंदाज़ा लगा सकते हैं। इसलिए ललित मोदी तो कायदे से नपेंगे इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन शांत तो शायद वे भी नहीं बैठेंगे।


फिर चालू हुआ गरीबों के लिए अतिक्रमण
बालाघाट। अतिक्रमण शब्द जहां आता है वहां पर लोगों की सोच बन जाती है कि यह कार्यवाही सिर्फ़ छोटे लोगों की दुकानों या $$गरीबों के घर गिराने के लिए यह कार्यवाही की जा रही है। नगर में फिर से प्रारंभ हुए अतिक्रमण के इस कार्य में फिर से यही देखने में आ रहा है। पुलिस लाईन के समीप जो छोटे लोग छोटा-मोटा व्यवसाय कर अपना जीवन-यापन कर रहे थे बुल्डोज़र द्वारा उनकी झोपडिय़ां, ठेले तोड़ दिए गए, जिसके चलते इन लोगों में आक्रोश व्याप्त है। इन्हें अपने रोज़ी रोटी की चिंता होने लगी है, कि अब हम अपना परिवार कैसे चलाएंगे। आ$िखर इस अतिक्रमण अभियान में शासन एवं प्रशासन बड़े व्यापारियों एवं बड़े लोगों की बिल्डिंगों तक क्यों नहीं पहुंच पाते। क्यों इस अतिक्रमण में इन पर कार्यवाही नहीं होती। सड़कों के व्यस्ततम मार्ग पर इनके व्यापार एवं भवन खड़े हैं जिससे आवागमन में सभी लोगों को परेशानी होती है। इस जगह पर से सबसे पहले अतिक्रमण प्रारंभ किया जाए एवं एक बार पूरे दमखम से इस अतिक्रमण को शासन एवं प्रशासन चलाए एवं दोबारा इतना सुस्त न हो जाए कि फिर इस जगह पर अतिक्रमण हो जाए। इस बात का मौका दोबारा न दिया जाए कि बार-बार यही कार्यवाही सि$र्फ दिखावे के लिए चलती रहे एवं निष्पक्ष अपना कार्य करते हुए शासन एवं प्रशासन बिना छोटे एवं बड़े का भेदभाव करते हुए अपना कार्य करे, न कि सि$र्फ $$गरीबों के लिए अभियान चलाया जाए।

Friday, April 16, 2010





दलितों के नाम पर दंगल

एक ज़माना था, जब कांग्रेस दलित उत्थान का दावा महात्मा गांधी के नाम पर करती थी और देश का दलित और अल्पसंख्यक वोट उसकी झोली में होता था। लगभग 40 साल तक गांधी के नाम पर कांग्रेस दलित वोट हथियाती रही, और दलित-दलित ही बनाए रखे गए। उसके बाद कांशीराम ने बाबा साहेब अम्बेडकर के नाम पर कांग्रेस के दलित वोट बैंक में सेंध लगानी शुरू कर दी। उन्होंने धोती और सोटी वाले गांधी की जगह सूटबूटधारी टाई वाले बाबा साहेब अम्बेडकर को दलितों का मसीहा बना कर खड़ा कर दिया। जी.डी.गोयलनई दिल्ली। 14 अप्रैल का दिन उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगरवासियों के लिए अविस्मरणीय बन गया, उसकी वजह थी, देश के दो बड़े दलों के, दो बड़े नेताओं का एकाएक उभरा दलित प्रेम। ये नेता थे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री, बसपा सुप्रिमो सुश्री मायावती और कांग्रेस के सांसद युवराज राहुल गांधी और दिन था बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर की जंयती। इस दिन इन दोनों नेताओं ने अपनी-अपनी रेलियां तय कर दीं। राहुल गांधी ने इस दिन को चुना उत्तर प्रदेश में निकाली जाने वाली कांग्रेस की चुनावी रथ यात्रा की शुरूआत के लिए। हालांकि रथ यात्रा शुरू होने वाली है सहारनपुर से, लेकिन मतलब तो केवल मायावती से राजनैतिक पंगा लेने से ही था, और इसके लिए बाबा अंबेडकर का जन्म दिन और स्वयं मायावती का गृह जि़ले से बेहतर और क्या हो सकता था।
राहुल गांधी की इस योजना का पुरज़ोर विरोध मायावती ने भी अपने ही ढंग से किया। पहले तो घोषणा कर दी गई, कि राहुल गांधी को बाबा साहेब अम्बेडकर की मूर्ति पर माला नहीं चढ़ाने दी जायेगी। लेकिन कांग्रेस ने उसका भी तोड़ निकाल लिया, उन्होंने बाबा साहेब अम्बेडकर का एक बड़ा चित्र सभा स्थल पर लगा लिया और उस माल्यार्पण करने की घोषणा कर दी। तब मायावती ने दूसरा दांव खेलते हुए देर रात में कांग्रेसी खेमे के पास जि़लाधिकारी का आदेश भिजवा दिया कि वे अपनी सभा मायावती की सभा समाप्त होने के दो घंटे बाद ही प्रारम्भ कर सकेंगे।
इन सारे दांव पेचों के बाद दोनों ही दलों ने जब अपनी-अपनी सभायें कीं, तो केवल एक दूसरे पर कीचड़ उछालने का काम किया। मायावती ने कांग्रेस और भाजपा सहित दोनों पर आरोप लगाया कि आज़ादी के बाद इन दलों की केन्द्र में और राज्यों में सरकारें रहीं, लेकिन इन लोगों ने दलित नेताओं के सम्मान के लिए कुछ नहीं किया। अब जब हमारी सरकार उनकी मूर्तियां स्थापित कर उन्हें सम्मानित करने की कोशिश कर रही है, तो ये लोग उसका विरोध कर रहे हैं। सच्चाई तो यह है कि ये लोग दलितों के उद्धार की बात करते हैं, लेकिन उनके नेताओं का सम्मान तक नहीं करना चाहते। मायावती ने यह चेलेंज भी किया कि ये लोग कितना भी विरोध करें वे और उनकी सरकार दलित नेताओं के स्मारक और बनाने और मूर्तियां लगाने का काम करती रहेंगी।
मायावती के बाद जब राहुल गांधी का नम्बर आया तो, उन्होंने मायावती को हर तर$फ से कटघरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि दिल्ली से जितनी राशि दलितों और आदिवासियों के विकास के लिए भेजी जाती है, वो सब भ्रष्टाचार के रास्ते खा ली जाती है। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण राज्य में भ्रष्टाचार व्याप्त है, और प्रदेश की जनता $खासतौर पर आदिवासी और दलित इस कुशासन से निदान चाहते हैं, और केवल कांग्रेस ही यह काम कर सकती है। एक ज़माना था, जब कांग्रेस दलित उत्थान का दावा महात्मा गांधी के नाम पर करती थी और देश का दलित और अल्पसंख्यक वोट उसकी झोली में होता था। लगभग 40 साल तक गांधी के नाम पर कांग्रेस दलित वोट हथियाती रही, और दलित-दलित ही बनाए रखे गए। उसके बाद कांशीराम ने बाबा साहेब अम्बेडकर के नाम पर कांग्रेस के दलित वोट बैंक में सेंध लगानी शुरू कर दी। उन्होंने धोती और सोटी वाले गांधी की जगह सूटबूटधारी टाई वाले बाबा साहेब अम्बेडकर को दलितों का मसीहा बना कर खड़ा कर दिया। उसकी दो वजह थी, एक तो बाबा साहेब स्वयं उसी वर्ग से थे, दूसरे गांधी और उनमें एक अंतर था जहां गांधी दलितों के लिए न्याय की याचना करते नज़र आते थे, वहीं बाबा साहेब उन्हें अपने अधिकार छीनने की प्रेरणा देते नज़र आते थे। नतीजा यह रहा कि इस वर्ग को वह नेता अच्छा लगा जो उनसे अपने अधिकार छीनने की बात करता हो ना कि मांगने की और बस उसके साथ ही गांधी की जगह बाबा साहेब दलितों के मसीहा के नाम पर पुज गए और कांग्रेस के हाथ से दलित वोट बैंक खिसक कर कांशीराम की शिष्या मायावती की बहुजन समाज पार्टी के हाथ में पहुंच गया। अब कांग्रेस की भी यह मजबूरी हो गई है, कि वह दलित वोटों के लिए गांधी का सहारा छोड़ कर बाबा साहेब का पल्ला पकड़े, और इसी मजबूरी के कारण ही राहुल गांधी भी बाबा साहेब अम्बेडकर के जन्मदिन पर उनकी मूर्ति पर माला पहनाने जा पहुंचे। कुल मिलाकर यह सारा तमाशा इसीलिए हो रहा है कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, और दोनों ही पार्टीयां इन चुनावों में अपनी सरकार बनाने की कोशिश कर रही हैं।





समन्वयक मण्डली रसातल में पहुंचा दी
मुनीन्द्र तिवारी
शहडोल।
गांवों की प्राथमिक शिक्षा के बुनियादी स्तर को ऊपर उठाने के लिये विश्व प्रेरणा से भारत शासन के मानव संसाधन विकास विभाग द्वारा शुरू की गयी सर्व शिक्षा अभियान योजना शहडोल जि़ले के ब्यौहारी जन स्त्रोत समन्वयक अजीत श्रीवास्तव व उनकी मण्डली ने मिलकर रसातल सहित बी.आर.सी. समन्वयक भोपाल और नगरों में सेटल हो गये हैं। और बच्चों का भविष्य और उद्देश्य नष्ट हो गया। इन सभी के महानगरों में सेटल होने के पीछे गत वर्षों सर्वशिक्षा अभियान योजना की राशि के क्रियान्वयन भ्रष्टाचार और का$गज़ी खाना पूर्तियों में बढ़ चढ़ा कर हड़प किये जाने के आरोप सदैव से लगते रहे हैं, लेकिन तीसरी बार लम्बे समय से ब्यौहारी बी.आर.सी. समन्वयक बनने में कामयाब अजीत श्रीवास्तव और उनके मण्डली के $िखला$फ प्रशासनिक बाहों में दम नहीं। सूत्रों का कहना है कि आज ब्यौहारी बी.आर.सी. कार्यालय को आवंटित महत्वपूर्ण सामग्रियां नदारत हंै मात्र बिलिंग और औचित्य हीन सामग्रियों का स्टाक मात्र भर शेष है। कार्यालय में मात्र छोटे स्तर के एकाध कर्मचारी ही पाए जाते है शेष मण्डली के सरगना सहित अपने उच्च कारोबारों में व्यस्त अधिकारी नदारत हंै। जानकार लोगों को दावा है कि उस तरह इस दौरान ब्यौहारी बी.आर.सी. के अंतर्गत शिक्षा के स्तर को उठाने के सामग्रियों भवन निर्माण की राशियों का मनमानी उपयोग किये जाने की पूरी छूट और शासन वरिष्ठ अधिकारियों को क्रियान्वयन शत प्रतिशत सही बताये जाने की जानकारी देने को लोग हास्यप्रद बता रहे हैं। ब्यौहारी उत्कृष्ट विद्यालय रसायनशास्त्र के अध्यापक अजीत श्रीवास्तव को रिक्त कर ब्यौहारी बी.आर.सी. तीसरी बार तैनात किये जाने के बाद भ्रष्टाचार गतिविधियों को संचालित किये जाने के दौरान उनकी गंभीर अनियमितताएं अधिकारियों के सामने आयीं, लेकिन अनियमितताओं के सामने आने के बाद प्रशासनिक हल्कों में कुछ दिनों ब्यौहारी बी.आर.सी. कार्यालय प्रमुख की कारगुज़ारियां सुर्खियों में रहने के बाद पता नहीं बिना माकूल कार्यवाही हुए ही दब जाती है क्यों। पूर्व में ज्ञात आय स्त्रोतों से कई गुना अधिक सामग्री सम्पत्ति ब्यौहारी भोपाल, सतना, रीवा में संचित किये जाने की शिकायत और म.प्र. विधानसभा में 35 अतिथि शिक्षकों को मानदेय $फजऱ्ी आहरण कर लिये जाने के मामले की जानकारी लम्बी जांच पश्चात गत दिनों अतिरिक्त कलेक्टर शहडोल डॉ.के वाशुकी द्वारा की गयी छापामार कार्यवाही के दौरान गंभीर प्रशासकीय और वित्तीय अनियमितताएं प्रकाश में आने के बाद आज तक कार्यवाही नहीं हुई। बताया जाता है संचालित कस्तूरबा गांधी बालिका आश्रम में वास्तविक उपस्थिति संख्या से कई गुना अधिक बताकर लगभग मार्च माह का उपयोग करते हुए सात लाख को बोगस बिल शामिल किये जाने की भनक प्रशासन को लगी थी। उल्लेखनीय है कि उक्त आश्रम के प्रभारी समन्वयक के रिश्ते के साले रीतेश श्रीवास्तव बताये जाते है। इसी तरह गुरू शिष्य पुत्र के तकनीकी निर्देशन नियंत्रण में पिछले वर्षों शाला माध्यमिक शालाओं अतिरिक्त कमरों किचन शेडों के निर्माण कामों में सा.शा. कर राशियां निकाल ली गयीं अब क्षेत्र की बिल्डिंग आधी अधूरी पड़ी है और जो पूरी हो भी गयी है वह भी धराशायी होने की स्थिति में हैं। क्षेत्र की बहुत बिल्डिंगों का निर्माण प्राक्कलन के विपरीत किया गया है उदाहरण के लिये कन्या मा.वि. भवन ब्यौहारी है। विडंबना यह है कि निर्माण के मानक मापदण्ड की घोर अनदेखी अनियमितता किये जाने के बावजूद संबंधी तकनीकी विशेषज्ञ अपने मूल विभाग से अपनी सेवाएं ग्रामीण यांत्रिक सेवा में करा ली है, जिसके कारनामों का खुलासा भी गत दिनों कलेक्टर के सामने आया है। लोगों का कहना है अजीत श्रीवास्तव इसके पूर्व अध्यापक के साथ लड़कों को ट्यूशन पढ़ा अपना घर चलाते थे। अब भाई अंजनी श्रीवास्तव की जि़ला सहकारी बैंक में बाबू की सेवा और अजीत श्रीवास्तव की सेवा से करोड़ों की दौलत कैसे?



ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजनामें लाखों का घोटाला
घनश्याम नामदेव
मुलताई (बैतूल)।
भारत शासन द्वारा जनहित में लागू की गई रोज़गार गारंटी योजना का लाभ भले ही ग्रामीण जनता को हुआ हो या नहीं, लेकिन बेनामी ठेकेदार व अपनी राजनैतिक रसू$ख रखने वालों को अवश्य हुआ हैं। प्रभातपट्टन विकासखण्ड में सड़कों के निर्माण में ऐसे लोगों के नाम सरपंचों ने चेक काट दिये, जिनका न तो पेट्रोल पम्प है न डीज़ल पम्प है। इनका डीज़ल-पेट्रोल से काई भी मतलब नहीं है वे तो भ्रष्टाचार की $फसल काट रहे हैं।
सन् 2006 से 2008 तक प्रभातपट्टन ब्लाक में 65 ग्राम पंचायतें में 375 ग्रेवल सड़कों पर रोलर चलाने का जि़ला पंचायत से 900 रूपये प्रतिदिन का अनुबंध ब$गैर डीज़ल के विजय मुनरे प्रभातपट्टन से हुआ था। इन्हीं सड़कों पर पानी डालने के लिए टेंकर 700 प्रतिदिन की दर से अतुल ठाकरे बिसनुर से अनुबंध हुआ थ, जिसमें उन्हें सरपंचों को डीज़ल प्रदाय नहीं किया जाना था। किंतु इन ठेकेदारों के अलावा अन्य लोगों को भी रोड रोलर और पानी के टेंकर के बिलों के अलावा सरपंचों से लाखों रूपये का पेट्रोल व डीज़ल के बिलों का भुगतान करवा लिया। अधिकारी से मिलीभगत होने के कारण आडिटरों द्वारा भी आपत्ति नहीं लगाई गई। इस तरह डीज़ल के नाम पर 32 लाख 25 हज़ार तीन सौ रूपये का चूना शासन को लगाया गया। विजय मुनरे, अतुल ठाकरे ने डीज़ल के अलावा रोड रोलर पानी के बिलों का $फजऱ्ी प्राप्त कर लिया। डीज़ल का भुगतान अतुल ठाकरे को 10 लाख 83 हज़ार 700 सौ, विजय मुनरे को 17 लाख 97 हज़ार 8 सौ, मिथुन विश्वास को 45 हज़ार 3 सौ, $खलील भाई को 71 हज़ार नौ सौ, रामकिशन को 59 हज़ार 500 का अनियमित भुगतान किया गया। सरपंचों द्वारा ऐसे लोगों को डीज़ल के भुगतान के चेक काटे गये, जिनके पास डीज़ल पम्प नहीं हंै।

Friday, April 9, 2010





भ्रष्टाचार के कंधों पर सवार हो कर चल रहा है नक्सलवाद

आज़ादी से पहले भारत में नक्सलवाद का कहीं नामों निशान नहीं था। पूरे भारत की तरह अन्य क्षेत्रों के आदिवासियों ने भी अंग्रेज़ों के िखलाफ देश की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और कुर्बानियां दीं, लेकिन आज़ादी के बाद जब हमारी अपनी सरकार बनी और उसके अधिकारियों की नियुक्ति इन क्षेत्रों में हुई तो उन्होंने इन वन वासियों के भोलेपन का नाजायज़ $फायदा उठाना प्रारम्भ किया और उनका हर प्रकार का शोषण करना शुरू कर दिया। उसको रोकने के लिए तब ना कोई नेता आया और ना कोई सरकार। ऐसी हालत में उनके बीच नक़्सलवादी आये और उन्होंने उनके हाथों में बंदूक थमा दी। भले ही उससे भ्रष्टाचार और दमन ना रूका हो, लेकिन उनमें बदला लेनेकी ताकत और आदत तो पनप ही गई, जो आज इन इलाकों में नक़्सलवाद के पनपने का प्रमुख कारण बनी है। अब इतनी देर हो चुकी है, कि शायद अब बात से काम नहीं चल पायेगा, अब Justify Fullतो आवश्यक है एक तेज़ कार्यवाही की जो इनकी धर पकड़ कर दे और ये हथियार डालने को मजबूर हो जायें, लेकिन उसके साथ ही साथ यह भी ज़रूरी है कि इन इलाकों से सरकारी कर्मचारियों के दमन और भ्रटाचार को जड़ से समाप्त कर आदिवासियों के दिलों में सरकार और कानून के प्रति विश्वास जमें और वे माओवादियों के भड़कावे में आने से बचें।

सुरक्षा में छेद ही छेद
हृ जी. डी. गोयल नई दिल्ली। छ: अप्रैल को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में माओवादियों ने केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस $फोर्स के 76 जवानों को जंगल में घेर कर मार डाला। $फोर्स की इस बटालियन को एक अपने ही एजेंट के ज़रिए $खबर दी गई कि पास के जंगलों में भारी तादाद में नक़्सलवादी मौजूद हैं। इस $खबर पर विश्वास करके अ$फसरों ने अपने जवानों को जंगल में भेज दिया। $गलत $खबर के आधार पर गए जवान उधर जंगल में नक़्सलवादियों को तलाश करते रहे, उधर नक़्सलवादी उनके वापस लौटने के रास्ते में सुरंगें बिछाते रहे। माओवादियों ने ठीक महाभारत की तरह सीआरपीए$फ के जवानों के लिए चक्रव्यूह की रचना की थी और कमज़ोर सूचना तंत्र के शिकार वे जवान उनके चक्रव्यूह में फंस कर अपनी जान गवां बैठे। अब सरकार परंपरागत तरीके से एक बार फिर नक़्सलवादियों से निपटने का दावा कर रही है। जबकि आतंकवादियों और नक़्सलवादियों के द्वारा आये दिन होने वाली ऐसी घटनायें इस बात का सबूत हैं कि वातानुकूलित कमरों में बनाई जाने वाली हमारी सुरक्षा योजनाओं में ऐसे सैंकड़ों छेद हैं, जिनका लाभ उठा कर अपनी योजनायें पूरी कर लेते हैं, और सराकार बाद में लकीर पीटने का काम करती रहती है। जहां तक नक़्सलवाद का प्रश्न है, इससे प्रभावित राज्यों और केन्द्र में अलग-अलग पार्टियों की सरकार होने के कारण उनकी नीतियों और कार्यप्रणालियों में हमेशा टकराव बना रहता है। आये दिन बातें तो उनके $िखला$फ संयुक्त अभियान चलाने की, की जातीं हैं, लेकिन काम अपने-अपने ढंग से किए जाते हैं। एक तर$फ जहां केन्द्र सरकार इनका सख़्ती से दमन करना चाहती है, वहीं वोट की राजनीति के लिए कई मुख्यमंत्री इनसे सहयोग लेना और उनसे समझौता करने की कोशिश में लगे रहते हैं, जिनमें प्रमुख नाम छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का लिया जा सकता है।
कुछ ही दिन पहले जब केन्द्र सरकार ने नक़्सलवद प्रभावित राज्यों के मुख्य मंत्रियों की बैठक बुलाई थी तब झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन और बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने हिस्सा नहीं लिया था। हालांकि कहने को तो छत्तीसगढ़ में सीआरपीए$फ और राज्य पुलिस नक़्सलवादियों के $िखला$फ मिल कर अभियान चला रही हैं, लेकिन छ: अप्रैल को जो कार्यवाही हुई, उसकी कोई जानकारी तक राज्य की पुलिस को नहीं थी। अगर यह कार्यवाही राज्य पुलिस के साथ मिल कर की गई होती, तो यकीनन इस क्षेत्र से अनजान सीआरपीए$फ के जवान इस तरह नक़्सलवादियों के शिकार नहीं बन पाते। नक़्सलवादियों के $िखला$फ कार्यवाही करने की कमज़ोर राजनैतिक इच्छा शक्ति ने ही आज इन राज्यों में नक़्सलियों को इतना बढ़ावा दिया है, कि आज वे हज़ारों की तादाद में एकत्र होकर सीआरपीए$फ की एक सशस्त्र बटालियन का स$फाया करने का कारनामा कर सकी है।
इस हमले में नक़्सलवादियों ने जिन हथियारों का प्रयोग किया है, वे चीन से भेजे गए थे, जो इस बात का संकेत है कि स्थानीय असंतुष्टों को मदद करके चीन अब तिब्बत और नेपाल की तरह भारत के इन हिस्सों में भी माओवाद का ज़हर फैला कर भारत की अखंडता को नुकसान पहुंचाने की चाल चल रहा है, और अगर इसी तरह हमारे नेता आपसी राजनैतिक हितों को भुला कर इस समस्या का निदान करने में सफल नहीं हो पाये, तो इन देशों की चीनी ड्रेगन एक दिन भारत के इन हिस्सों में भी अपने पंजे जमा कर बैठ जाएगा।





नरेगा के कार्यों में भारी अनियमितताएं
अनूप सक्सेना राजगढ़। केन्द्र सरकार द्वारा महत्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार योजना में गठित नौ सदस्यों की समिति में स्थान पाये राजगढ़ सांसद नारायण सिंह आमलाबे ने मनरेगा में जि़ले में व्यापक भ्रष्टाचार की जांच कर निर्माण कार्यों का निरीक्षण कर राजगढ़ जनपद की भियापुरा ग्राम पंचायत से आरंभ कर समूची भाजपा को झकझोर के रख दिया है और जि़ला कार्यक्रम समन्वयक के रूप में कलेक्टर तथा अतिरिक्त जि़ला कार्यक्रम समन्वयक के रूप में जि़ला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी की पेशानी पर सलवटों की संख्या बढ़ा दी है। जि़ले की राजनीति में ग्राम पंचायत भियापुरा वरिष्ठ भाजपा नेता रामनारायण शर्मा के प्रभाव में विगत 20 वर्षों से रही है, और इस नाते मनरेगा में 1,26,56,466 रूपये मनरेगा में 31/12/2009 तक व्यय किये जा चुके हैं, जो राजगढ़ जनपद पंचायत क्षेत्र में ग्राम पंचायत झझाडपुर माचलपुर एवं बगा पंचायत के बाद $खर्च की गयी सबसे बड़ी धनराशि है। सांसद द्वारा अपने निरीक्षण का आरंभ ग्राम लहरचा (पंचायत भियापुरा) से किया गया। यहां शासकीय दस्तावेज़ों में दर्ज मनरेगा के तहत निर्मित 3,36,956 रूपये की सड़क मौके पर नदारद दिखी। इस गुम सड़क के लिये वहां मौजूद अधिकारियों द्वारा दिये गये जवाब अत्यन्त हास्यास्पद रहे। अधिकारियों के मुताबिक मनरेगा द्वारा निर्मित यह सड़कलोक निर्माण विभाग द्वारा बनायी गयी। सड़क के अंदर दब गयी ऐसा ही दृश्य ग्राम पाटरीकला में लगभग 8 लाख की लागत से मनरेगा के तहत बनी (का$गज़ों मे तैयार) सड़कों में दिखायी दिया। इन सड़कों को भौतिक सत्यापन इसलिये नहीं हो सका कि प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना तथा लोक निर्माण विभाग की सड़कें मनरेगा के कार्यों के ऊपर बनायी जाना दिखा कर अधिकारियों ने अपना उल्ला झाड़ लिया। रोज़गार की गारंटी दिलाने वाली यह योजना अधिकांश ग्रामीणों के जाबकार्ड खाली मिलने से अपने वास्तविक ज़मीनी धरातल पर मूल उद्देश्यों की पूर्ति में नाकाम दिखी। ग्राम लहरचा में ही इकसठ जाबकार्ड खाली मिले।
भियापुरा ग्राम पंचायत में जनपद पंचायत राजगढ़ की ओर से लम्बे समय तक उपयंत्री ए.के. जैन (अभिषेक कुमार जैन) मनरेगा के गुणवत्ताहीन आधे अधूरे कहीं कहीं तो सि$र्फ मस्टर रोल व का$गज़ों पर कार्यों को पूर्ण दर्शाकर कार्यों का मूल्यांकन मेज़रमेंट बुक में करते रहे। वहीं इस भ्रष्टाचार को प्रश्रय में नरेगा के एस.डी.ओ. अखिलेश श्रीवास्तव द्वारा भ्रष्टाचार को पल्लवित पोषित करने के उद्देश्य से किये जाते रहे। निर्माण कार्यों में (भियापुरा ग्राम पंचायत) इस प्रकार के प्रमाणिक खुले रूप में भ्रष्टाचार के आदी रहे अभिषेक जैन तथा अखिलेश श्रीवास्तव के विरूद्ध सांसद श्री नारायण सिंह आमलाबे कब तक किस स्तर की कार्यवाही करवा पाते हैं, इस पर दोनों ही दलों के राजनीतिज्ञों, प्रशासनिक अमले की नज़रें लगी हैं। जि़ले के राजनेतिक विश्लेषकों का मानना है, कि कुछ माह पूर्व ग्राम बापची मे नरेगा के तहत ठेकेदार द्वारा किये मनमाने कार्यों के बाद सांसद की सहमति के बाद भी कलेक्टर जो नरेगा के जि़ला कार्यक्रम समन्वयक भी हैं, के द्वारा उक्त अनियमित भुगतान को रोका जाकर उक्त ग्राम बापची का कार्य निरस्त कर दिया था। इस पर सांसद महोदय कलेक्टर से नाराज़ थे।
वहीं विधायक हेमराज कल्पोनी अपनी कुछ सि$फारिशों को जि़ला पंचायत सी.ई.ओ. जो नरेगा के अतिरिक्त जि़ला कार्यक्रम समन्वयक भी है के द्वारा अस्वीकार करने से रूष्ट थे। विधायक एवं सांसद द्वारा नरेगा के सबसे अधिक प्रमाणित स्तर के भ्रष्टाचार के मामले ग्राम पंचायत भियापुरा में तलाश करके जि़ला कार्यक्रम अधिकारी के रूप में कलेक्टर श्री शिवानंद दुबे की उलझने बढ़ा दी गई हैं। पूर्व में भाजपा के सांसद लक्ष्मण सिंह द्वारा भी कालीपीठ क्षेत्र में नरेगा के कार्यों में 6 रू. व 8 रू. मज़दूरी दिये जाने की शिकायत मुख्यमंत्री से कर अधिकारियों के निरंकुश रवैये पर प्रश्न चिन्ह लगाने के बाद भी तथा मुख्यमंत्री के निर्देश पर जि़ले के प्रभारी मंत्री द्वारा कलेक्टर को मौके पर जाकर दोषी अधिकारियों के विरूद्ध सख़्त कार्यवाही के निर्देश देने के बाद भी किसी भी प्रकार की कोई भी कार्यवाही किसी भी स्तर के अधिकारी या सरपंच पर नहीं हो सकी थी। परंतु इस बार सांसद श्री आमलाबे नरेगा की केन्द्र द्वारा बनायी गयी नौ सदस्यों की समिति के सदस्य हैं, इसलिये भियापुरा के लाखों रूपये के $फजऱ्ी कार्यों के मूल्यांकन कर्ता अधिकारी उपयंत्री ए.के.जैन तथा इन निर्माण कार्यों के सत्यापन कर्ता अधिकारी अखिलेश श्रीवास्तव पर कार्यवाही का दबाव बढ़ता जायेगा।
देखना यह है कि कलेक्टर शिवानंद दुबे इन भियापुरा के कार्यों में दोषी साबित अधिकारियों पर कार्यवाही कर जि़ले में सत्तारूढ़ दल की नाराज़ी मोल लेते हैं या पूर्व सांसद लक्ष्मण सिंह के दौरे की तरह सांसद नारायण सिंह का यह नरेगा के कार्यों को निरीक्षण महज़ रस्म अदायगी सिद्ध होता है। दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने भी उपयंत्री ए.के.जैन द्वारा जिन कांग्रेस समर्थित सरपंचों की ग्राम पंचायतों में मूल्यांकन किया है व जनपद में एस.डी.ओ. नरेगा अखिलेश श्रीवास्तव से सत्यापन कराया है उन ग्राम पंचायतों के कार्यों की भी जांच कराने की मांग की है, जो जि़ला कार्यक्रम अधिकारी श्री शिवानंद दुबे के लिये परेशानी का कारण भी हो सकता है।

वैसाखी जालियाँवाला बा$ग आज़ादी के परवानों का $कत्लेआम
जालियाँवाला बा$ग हत्याकांड भारत के पंजाब प्रान्त के अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर के निकट जलियाँवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 (बैसाखी के दिन) हुआ था। रौलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी जिसमें जनरल ओ. डायर नामक एक अंग्रेज़ ऑ$िफसर ने अकारण उस सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियाँ चलवा दीं जिसमें 1000 से अधिक व्यक्ति मरे और 2000 से अधिक घायल हुए। 13 अप्रैल 1919 को डॉ. सत्यपाल और सै$फुद्दीन किचलू की गिरफ़्तारी तथा रोलेट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियाँवाला बा$ग में लोगों ने एक सभा रखी, जिसमें उधमसिंह लोगों को पानी पिलाने का काम कर रहे थे। इस सभा से तिलमिलाए पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओ डायर ने अपने ही उपनाम वाले जनरल डायर को आदेश दिया कि वह भारतीयों को सबक सिखा दे। इस पर जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियाँवाला बा$ग को चारों ओर से घेर लिया और मशीनगनों से अंधाधुँध गोलीबारी कर दी, जिसमें सैकड़ों भारतीय मारे गए। जान बचाने के लिए बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी। बा$ग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सि$र्फ कुए से ही मिले। आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 379 बताई गई जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए। स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी, जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी। इस हत्याकाण्ड के विरोध में रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने इस हत्याकाण्ड के विरोध में सर की उपाधि लौटा दी और उधमसिंह ने लन्दन जाकर पिस्तौल की गोली से जनरल डायर को भून दिया और इस हत्या काण्ड का बदला लिया।




Friday, April 2, 2010

यारों का यार खबरयार




अंधा बांटे रेवड़ी फिर-फिर अपनों को देय

मिल बांट कर खा रहे हैं नेता
Justify Full जी.डी.गोयल नई दिल्ली। मध्यप्रदेश के विधायकों और मंत्रियों ने विधानसभा सत्र में अपनी तन$ख्वाह और भत्ते बढ़ा लिए। अब मध्यप्रदेश के विधायकों को लगभग 50 हज़ार रूपये मिला करेंगे। यह $फैसला ऐसे समय में किया गया है, जब कि न केवल मध्यप्रदेश, बल्कि पूरे देश में जनता बेरोज़गारी और महंगाई की मार से कराह रही है। केन्द्र और राज्य दोनों ही सरकारें, सरकारी खर्चा पूरा करने और सरकारी कंपनियों का घाटा पूरा करने के नाम पर टैक्स पर टैक्स बढ़ाये जा रही है। देश के लोग ऐसे समय में अपने नेताओं से त्याग और मदद की उम्मीद कर रहे हैं।
भारत की आज़ादी से पहले जिन नेताओं ने देश के लिए कुर्बानियां दी थी, उन्होंने उस काम के लिए देश की जनता से ना कोई तनख्वाह मांगी थी, और ना उनसे किसी भत्ते की उम्मीद की थी। सरदार भगत सिंह हो, चन्द्रशेखर आज़ाद हो, या सुभाष चन्द्र बोस, किसी ने भी अपनी जान इस लालच में नहीं दी थी कि आज़ाद होने के बाद देश की जनता उनकी मूर्तियां लगवायेगी या उनके परिवार वालों को उसका कोई मुआवज़ा देगी। उन्होंने ये कुर्बानियां देश और देश की जनता के सम्मान और सुखी भविष्य बनाने के लिए दी थीं। इसीलिए उन्हें नेता और रहनुमा कहा गया।
देश के आज़ाद होने के बाद भी यह प्रश्न उठा था, कि जिन लोगों के कंधों पर देश को चलाने की जि़म्मेदारी दी जायेगी, क्या वे उसके बदले में जनता से कुछ मांगेंगे? उस ज़माने के नेताओं ने एक स्वर से इस बात से इंकार किया था। उनकी नज़र में देश सेवा की कोई कीमत नहीं होनी चाहिए थी, लेकिन हमारे समझदार नेताओं ने कहा कि अगर देश के रहनुमाओं को कुछ नहीं दिया गया, तो हो सकता है कि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए वे बेईमानी का रास्ता अपनाने और जनता के धन का दुरूपयोग करने लगें। इसलिए यह तय किया गया कि जितने दिन वे विधान सभा अथवा संसद में चुन कर रहेंगे और देश के लिए काम करेंगे, उतने दिन उन्हें जनता के धन से मानदेय और खर्चा मिलेगा। उस समय उन नेताओं को अंदाज़ा भी नहीं रहा होगा, कि अपने नेता इस मानदेय को अपना अधिकार ही बना लेेंगे और उसके बाद भी जनता को लूट कर खाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। इतना ही नहीं इन नेताओं ने पहले तो यह कानून बना लिया कि अगर एक बार चुन गए, तो चाहे दो दिन विधायक रहें या 100 दिन, पूरी तन$ख्वाह और भत्तों के अधिकारी होंगे। उसके बाद भी जीवन भर उन्हें पेंशन मिलेगी। संसद हो या विधानसभा, देश और जनता की भलाई के लिए आने वाले हर बिल पर ये नेता सालों बहस करते रहें और उसके बाद भी कई बार तो वे पास भी नहीं होते, लेकिन जब इन नेताओं की तनख्वाह बढ़ाने या $खर्चे और सुविधायें बढ़ाने की बात की जाती है, तो उस बिल को पास होने में एक घंटा भी नहीं लगता।
सारे राजनैतिक मतभेद भुला कर, सारे नेता तुरत उसे पास करने के लिए सहमति में हाथ उठा देते हैं, जैसा कि अभी मध्यप्रदेश में हुआ है। दर असल हमारे संविधान निर्माताओं को यह $गलत $फहमी थी, कि जिस तरह देश को आज़ाद करने के लिए नेताओं में ईमानदारी और जन सेवा की भावना थी, उसी प्रकार आज़ादी के बाद के नेता भी सेवक और ईमानदार होंगे। बस यही परउनसे गलती हो गई उन्होंने आने वाली नेताओं की पीड़ी पर विश्वास करके जनता का धन उन्हें सौंप दिया, और जब $खज़ाने की चाबी उन्हें मिल ही गई, तो जब जितना जी चाहा मिलजुल कर बांट लिया। अब हालत यह हो गई कि देश का आम आदमी दाने दाने और पैसे पैसे को तरस रहा है, और उससे ही बटोरे गए धन को ये नेता मिल बांट कर खा रहे हैं।



आर.ई.एस. में भ्रष्टाचार चरम पर
नष्ट अनुपयोगी कुएं का किया सत्यापन दोषी अधिकारी पर कार्यवाही की मांग कमिश्नर से
हृ अनूप सक्सेना राजगढ़। जि़ले में ब्यावरा में जन भागीदारी योजना से शासकीय चिकित्सालय परिसर में ग्रामीण यांत्रिकी सेवा विभाग को ऐजेंसी नियुक्त कर बनाये कुएं के निर्माणधीन अवस्था में लगभग समचा ही नष्ट हो जाने तथा नष्ट कुएं का ही सत्यापन तत्कालीन एस.डी.ओ. आर.ई.एस. ब्यावरा के.के. जैन द्वारा किये जाने, फलस्वरूप ठेकेदार को पूर्ण भुगतान कर देेने का सनसनी $खेज़ प्रमाणित भ्रष्टाचार का प्रकरण सामने आया है। जि़ले के जागरूक पत्रकारों ने इस मामले में गत दिवस जि़ला मुख्यालय पर आये कमिश्नर श्री पुखराज मारू साहब को अवगत करा दोषी अधिकारी पर कार्यवाही की मांग की है। अस्पताल परिसर ब्यावरा में कुआं निर्माण के लिये 2,00,000 रूपये की लागत तय कर, 1 लाख रूपये जनभागीदारी व 1 लाख रूपये निर्माण ऐजेंसी द्वारा व्यय किये जाने थे। मरीज़ों एवं परिजनों के लिये जल व्यवस्था की जाने के सम्बंध में यह कुआं निर्मित किया जाना था। आर.सी.सी. से यह कुआ निर्माण होना था। अत्याधिक गुणवत्ता-हीन निर्माण कार्य के चलते यह कुआं पूर्ण रूप से निर्मित होते ही धसक कर समूचा ही नष्ट हो गया और एक गड्डे के रूप में उसके अवशेष चिकित्सालय परिसर में मौजूद हंै। कुएं के समूल नष्ट हो जाने के बाद भी भ्रष्टाचार के निरूकुंश घोड़े पर सवार ग्रामीण यांत्रिकी सेवा विभाग के एस.डी.ओ. के.के.जैन द्वारा 26/6/2009 को उक्त शासकीय धन की बर्बादी के जीवंत प्रतीक बने कुएं का सत्यापन कर दिया गया। इस आधार पर ठेकेदार ने अपना पूर्ण भुगतान 1,22,640 रूपये विभाग से 1/8/2009 को प्राप्त कर लिया। इस समूचे घटनाक्रम में भ्रष्टाचार को किसी हद तक जि़ले में पल्लवित पोषित किया जा रहा है, इसका प्रमाण भी मिलता है, कि दोषी अधिकारी के.के.जैन जिनको स्थानांतरण के चलते 1/7/2009 को ब्यावरा से जाना था, श्री जैन द्वारा जाते जाते इस नष्ट कुएं का सत्यापन कर ठेकेदार से कमीशन प्राप्ति का रास्ता सुगम कर ठेेकेदार का भुगतान कराया। अनुपायोगी नष्ट इस कूप की चिंता न तो रोगी कल्याण समिति चिकित्सालय ब्यावरा को है, न ही शासकीय राशि की निष्फल व्यय के रूप में हुई इस बर्बादी पर ग्रामीण यांत्रिकी सेवा विभाग द्वारा दोषी अधिकारी के विरूद्ध किसी भी प्रकार की अनुशासनात्मक या विभागीय जांच जैसी कार्यवाही प्रचलित न करने से समूचे ग्रामीण यांत्रिकी सेवा विभाग के अनियमितताओं के आदी रहने का प्रमाण मिलता है।
गत दिवस पत्रकारों ने जि़ला मुख्यालय पर आये आयुक्त भोपाल संभाग श्री पुखराज मारू को सप्रमाण शासकीय धन की इस कुएं के निर्माण में हुई बर्बादी के बारे में अवगत कराया, तथा दोषी अधिकारी के.के.जैन के विरूद्ध कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही की मांग, तथा तुरंत निलंबन की मांग की गई। आयुक्त श्री मारू द्वारा शीघ्र इस विषय पर एक्शन लेने का भरोसा पत्रकारों को दिया। देखना यह है इस सिद्ध भ्रष्टाचार के मामले में कब तक आयुक्त महोदय कार्यवाही कर पाते हैं।



पी.डी.एस.राशन में घोटाला ही घोटाला बड़े $गज़ब का है जि़म्मेवार अधिकारियों का खेल $गरीब न पायें चावल चीनी, न मिले मिट्टी तेल अफरा तफरी मामले में उच्चाधिकारी को बचा कर निम्न स्तर कर्मचारियों की बली
संजय शर्मा राययढ़ (छ.ग.)। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में हुये लाखों के खाद्यान्न घोटाले में कलेक्टर द्वारा दो खाद्य निरीक्षकों को निलंबित तो कर दिया गया है, परंतु मुख्य दोषी प्रभारी जि़ला खाद्य अधिकारी राजेश जयसवाल ही है, उसे भी निलंबित करने की शिवसेना ने मांग की है।
शिवसेना के जि़ला प्रमुख राजेश जैन ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुये कहा कि $गरीबों के हक के राशन की अफरा तफरी केवल रायगढ़ एवं पुसौर में ही नहीं हो रही है, बल्कि पूरे जि़ले में पीडीएस के राशन की कालाबाज़ारी धड़ल्ले से हो रही है और खाद्य विभाग के अधिकारी या तो इस ओर ध्यान देते ही नहीं हैं, अथवा जानबूझकर ध्यान देना नहीं चाहते हैं। केवल राशन ही नहीं $गरीबों को मिलने वाला नीला मिट्टी तेल भी उन तक पहुंच नहीं पाता है। श्री जैन ने कहा कि वर्तमान में 61 लाख रूपये के पीडीएस घोटाले के सामने आने के बाद भला हो पुलिस प्रशासन का जिन्होंने पूरी निष्पक्षता के साथ जांच कर दोषी लोगों पर कार्रवाई की अन्यथा खाद्य विभाग के भरोसे तो यह मामला भी पूर्व के अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाता। पूर्व में खाद्य निरीक्षकों द्वारा उड़ीसा बाई-पास पर भारी मात्रा में अवैध रूप से मिट्टी तेल का भंडारण करने वाले एक व्यापारी को पकड़ा था, जिसके बाद खाद्य अधिकारी ने इस बात की जांच ही नहीं की कि आ$िखर ये केरोसीन आया कहां से, तथा कहां खपाया जा रहा है? रायगढ़ व पुसौर की 34 राशन दुकानों में खाद्यान्न की अफरा-तफरी के मामले में कलेक्टर द्वारा खाद्य निरीक्षक सी एस नेताम व श्वेता अग्रवाल को कार्य में लापरवाही का दोषी पाते हुए निलंबित कर दिया है, परंतु यह कार्रवाई संतोषजनक नहीं है, चूंकि जांच करने का दायित्व अथवा अपने मातहत अधिकारियों से जांच करवाने का काम जि़ला खाद्य अधिकारी का है, तथा उन्होंने भी कभी स्वयं जांच करने में कोई रूचि नहीं दिखाई, आ$िखर क्यों? जि़ला प्रशासन ने एक तरह से इतने बड़े मामले में दो छोटे अधिकारियों को बली का बकरा बना कर जि़ला खाद्य अधिकारी राजेश जायसवाल को बचाया है, जो कि सरासर $गलत है। पूरे जि़ले में पीडीएस के राशन में घपला चल रहा है, जिसकी उच्च स्तरीय जांच करवाया जाना चाहिये। वहीं शिवसेना जि़ला प्रमुख राजेश जैन ने खाद्य अधिकारी राजेश जायसवाल को भी निलंबित करने की मांग की है।

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