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लो·सभा में महंगाई पर चर्चा · बाद लो·पाल बिल पेश

हृ जैनेन्द्र ·ुमार
नई दिल्ली। अन्ना हज़ारे और उन·े समर्थ·ों ने ·मज़ोर बिल पेश ·रने से $ख$फा हो·र लो·सभा में ही जलार्इंं लो·पाल बिल ·ी प्रतियां। महंगाई पर भी विपक्ष ने सर·ार पर ·िए तीखे प्रहार।
इन दिनों देश ·े राजनीति· गलियारों से ले·र आम जनता त· तीन मुद्दों ·ो ·ा$फी अहम माना जा रहा है, और इन्हीं पर हर जगह चर्चा होती दिखाई देती है। ये तीन मुद्दे हैं पहला-जन लो·पाल विधेय·, दूसरा भ्रष्टाचार और तीसरा महंगाई। लो·सभा ·ी ·ार्रवाई में भी इन दिनों ·मोबेश इन्हीं मुद्दों पर चर्चा हो रही है। परिणाम क्या नि·लेंगे यह ·हना तो अभी मुम·िन नहीं है, ले·िन जिस तरह से सर·ार ने अन्ना हज़ारे ·े जन लो·पाल विधेय· ·ो नख-दंत विहीन ·र·े लो·सभा में पेश ·िया उससे यह तो सा$फ हो गया है, ·ि सर·ार अन्ना हज़ारे ·ी टीम ·े द्वारा तैयार ·िए गए जनलो·पाल विधेय· ·ो पास ·रने ·े मूड में ·तई नहीं है, बल्·ि वह सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे, ·ी तजऱ् पर लो·सभा में ·मज़ोर लो·पाल विधेय· पेश ·र अपने ·र्तव्य ·ी इतिश्री ·रने में ही लगी है। दूसरी तर$फ उसने अन्ना हज़ारे ·े अनशन ·ो छिन्न-भिन्न ·रने ·े लिए भी अभी से ·मर ·स ली है। सवाल यह है, ·ि जब विभिन्न संस्थाओं ·ी ओर से ·राए गए सर्वे में यह सामने आ गया है, ·ि जनता ·ा लगभग ८० प्रतिशत अन्ना हज़ारे ·े द्वारा सुझाए गए जन लो·पाल विधेय· ·ो पास ·रने ·े पक्ष में है, तब सर·ार ही क्यों जि़द्द पर अड़ी है, और झु·ने ·ो तैयार नहीं है। दूसरी बात, जिसने आम जन जीवन ·ो अस्त-व्यस्त ·र दिया है वह है महंगाई। पिछले तीन सालों ·ी बात ·रें तो विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ·े प्रधानमंत्री होने ·े बावजूद महंगाई ·ा ग्रा$फ तेज़ी से चढ़ा है, इससे आम जनता ·ा जीवन यापन ·रना उत्तरोत्तर दुष्·र होता जा रहा है। इस सब से इतर अगर हम भ्रष्टाचार और घोटालों ·ी बात ·रें तो आए दिन नए नए घोटाले देखने में आ रहे हैं, जिन्हें जानने ·े बाद यह तय हो चला है ·ि भविष्य में यूपीए-२ सर·ार ·ो घोटालों ·ी सर·ार ·ी संज्ञा ही इतिहास·ार देना पसंद ·रेंगे। $िफलवक्त इन्हीं मुद्दों पर लो·सभा में क्या चल रहा है इसी पर $खास ·लेवर से सजी $खबर:-
भाजपा ·ी अगुआई वाले विपक्ष ·े विरोध ·े बाद भी सर·ार ने प्रधानमंत्री ·ो जांच ·े दायरे से बाहर रखने वाला लो·पाल विधेय· ४ अगस्त, २०११ यानी गुरुवार ·ो लो·सभा में पेश ·र दिया। इस·े बाद इसे संसद ·ी स्थायी समिति ·ो भेज दिया गया। लो·सभा में लो·पाल विधेय· नौंवी बार पेश ·िया गया है।
इससे पहले आठ बार लो·सभा में लो·पाल विधेय· पेश तो ·िया गया, ले·िन हर बार ·िसी न ·िसी वजह से पास नहीं हो स·ा। ·ार्मि· और पेंशन तथा प्रधानमंत्री ·ार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायणसामी ने विधेय· लो·सभा में पेश ·िया। विपक्ष ·ी नेता सुषमा स्वराज ने नियम ७२ ·े तहत विधेय· पेश ·रने से पहले इस पर अपनी राय रखी। सुषमा स्वराज ने ·हा क्या प्रधानमंत्री ·ो दायरे में नहीं लाने से यह विधेय· संविधान में प्रदत्त समानता ·े अधि·ार ·ा उल्लंघन नहीं है? उन्होंने दूसरा सवाल यह दा$गा ·ि जब भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निरोध· ·ानून ·े तहत प्रधानमंत्री ·ो छूट नहीं है, तब इस विधेय· ·े तहत छूट क्यों? उन्होंने इस बात पर भी आपत्ति उठाई ·ि मनमोहन सिंह ·ो प्रधानमंत्री ·ो लो·पाल विधेय· ·े दायरे में रखने पर आपत्ति नहीं है तो सहयोगियों ·ो क्यों? २००१ में प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री ·ो लो·पाल ·े दायरे में लाने पर सहमत थे, फिर वे अब क्यों पीछे हट रहे हैं। लो·सभा में पेश वर्तमान लो·पाल विधेय· पर ·ड़ी आपत्ति जताते हुए प्रसिद्ध गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हज़ारे और उन·े समर्थ·ों ने लो·सभा में पेश विधेय· ·ो $गरीब विरोधी, दलित विरोधी बताते हुए गुरुवार ·ो उस·ी प्रतियां जलाईं।
इससे पहले बुधवार ·ी लो·सभा ·ी ·ार्रवाई ·ो दौरान महंगाई ·ा मुद्दा छाया रहा- महंगाई और भ्रष्टाचार पर ·ाबू नहीं पाने से $ख$फा विपक्ष ने लो·सभा में यूपीए-२ सर·ार ·ो घेरने ·ी ·ोशिश ·ी। महंगाई ·े मुद्दे पर सर·ार ·ो ·ड़ी आलोचना ·ा भी सामना ·रना पड़ा। सर·ार पर आरोप लगाया गया ·ि सर·ार ·ी आर्थि· और वित्तीय नीतियों ·े ·ारण ·रोड़ों लोग $गरीबी रेखा ·े नीचे जीवन यापन ·रने ·ो मजबूर हैं।
महंगाई पर विपक्ष ने लो·सभा में क्या ·हा-जनता जब महंगाई से बुरी तरह परेशान थी तब सर·ार ने बार-बार पैट्रोलियम पदार्थों ·ी ·ीमतें बढ़ाईं। सर·ार ने जनता ·ो महंगाई $खास·र पैट्रोलियम पदार्थों ·े दाम ·म ·र जनता ·ो राहत देने ·े लिए ·भी भी ठोस ·दम क्यों नहीं उठाए? एशियाई वि·ास बैं· ·ी रिपोर्ट बताती है ·ि पिछले २० महीने में महंगाई ·े चलते और पांच ·रोड़ लोग $गरीबी रेखा ·े नीचे चले गए हैं। इस·े बाद भी सर·ार अब त· चुप क्यों है? रसोई गैस ·े आसमान छूते दामों ने गृहिणियों ·े घर ·ा बजट बिगाड़ ·र रख दिया है। राशन ·ा संभवतया हर सामान रसोई से दूर हो चला है। तीन साल में सर·ार ने इस·े लिए क्या ·िया? सर·ार ·ी गलत नीतियों ·े ·ारण पिछले तीन साल में लोगों ·ा साढ़े छह ·रोड़ रुपया अतिरिक्त $खर्च हुआ। आ$िखर यह पैसा ·हां गया, क्या जमा$खोर, ·ालाबाज़ारी, सूदखोर इसे खा गए? आठ प्रतिशत वि·ास दर ·ा दावा ए·दम झूठ है। अगर ग्रोथ ·ा मतलब महंगाई है तो हमें ऐसी ग्रोथ नहीं चाहिए। देश में खाद्यान्न भरपूर है। ६५ मिलियन टन अनाज राजग सर·ार ·े समय भी गोदामों में भरा हुआ था। नौ साल बाद भी गोदामों में इतना ही अनाज है। क्या पैदावार बढ़ी ही नहीं है? साल २००२ में राजग सर·ार ·े समय देश में सदी ·ा सबसे बड़ा अ·ाल पड़ा। तत्·ालीन सर·ार ने आंध्रप्रदेश सहित देश ·े ·ई राज्यों में अनाज सीधे $गरीबों त· पहुंचाया। वर्तमान सर·ार भी यह ·दम क्यों नहीं उठाती, क्यों अनाज सड़ा रही है? सर·ार ·ो महंगाई से लडऩे ·ा ·ाम रिज़र्व बैं· पर छोड़ दिया। आरबीआई ने ११ बार ब्याज दरें बढ़ाईं। क्या सर·ार विपक्ष से चर्चा ·र उपाय नहीं ढूंढ़ स·ती है? खुदरा व्यापार ·े क्षेत्र में ५१ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश देश ·े हित में नहीं है। हालां·ि सर·ार अमेरि·ा ·े दबाव में विदेशी ·ंपनियों ·े लिए दरवाज़े खोलती जा रही है, जिस·े चलते देश से खुदरा व्यापार और लघु उद्योग समाप्त होते जा रहे हैं। देश ·े उद्योगपति विदेशों में निवेश ·र रहे हैं। उन·ा देश में निवेश ·रने से मोहभंग हो गया है। सर·ार इस ओर ध्यान क्यों नहीं दे रही? क्या यह वि·ासशील अर्थव्यवस्था ·े लिए अच्छा माना जा स·ता है?
सर·ार ·ी ओर से जवाब में यह ·हा गया- इन सवालों ·े जवाब में सर·ार ·ी ओर से ·ानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने ·हा, महंगाई ·ी मुख्य वजह वैश्वि· बाज़ारों ·ी मौजूदा स्थिति है। उन्होंने महंगाई ·ी गंभीरता ·ो स्वी·ारते हुए ·हा ·ि इस समस्या ·ा समाधान ए·जुट हो·र नि·ालना होगा। ·ानून मंत्री ने विपक्ष ·ो आगाह ·िया ·ि उसे सर·ार ·ेहर ·दम पर सवालिया निशान लगाने ·ी प्रवृत्ति ·ो छोडऩा होगा। उन्होंने ·हा महंगाई थामने ·े लिए सर·ार ने ·ई ·दम उठाए हैं जिनमें आयात शुल्· घटाना और दाल व चावल ·े वायदा ·रोबार पर अस्थायी रो· लगाना आदि शामिल हैं। महंगाई ·े मुद्दे पर $खुर्शीद ने ·हा ·ि महंगाई दर पिछले साल १५.७४ प्रतिशत थी, जो अब घट·र ८.४५ प्रतिशत पर आ गई है। हर बार मानसून अच्छा नहीं होता है, इस·ा नु·सान भी हमें होता है। हालां·ि उन्होंने यह माना ·ि दिसंबर ·े बाद महंगाई बढ़ी है, ले·िन इस·े लिए उन्होंने वैश्वि· स्तर पर पेट्रो पदार्थों ·े दाम बढऩे ·ो जि़म्मेदार ठहराया। उन्होंने ·हा ·ि सर·ार महंगाई ·ी बिल·ुल भी अनदेखी नहीं ·र रही है, सर·ार ·ी मंशा तेज़ी से वि·ास ·रना है ता·ि $गरीबों ·ा भला हो स·े।
भाजपा ·े नेता यशवंत सिन्हा ने महंगाई पर चर्चा ·ी शुरुआत ·ी। उन्होंने ·हा ·ि यह १२वीं बार है जब सदन महंगाई पर चर्चा ·र ·र रहा है। विपक्ष ·े दमदार आरोपों से यूपीए-२ सर·ार बचाव ·ी मुद्रा में नज़र आई। दो दिन ·े विपक्ष ·े हंगामे ·े बाद सर·ार मतविभाजन ·े प्रावधान वाले नियम १८४ ·े तहत महंगाई पर चर्चा ·रने ·े लिए तैयार हुई। सर·ार और विपक्ष ·े बीच यह सहमति बनी ·ि प्रस्ताव में सर·ार ·ो सीधे दोषी नहीं ठहराया जाएगा बल्·ि महंगाई ·ी स्थिति पर चिंता जताई जाएगी। प्रस्ताव में ·हा गया ·ि सदन में बार-बार चर्चा ·े बाद भी महंगाई बढ़ती ही जा रही है। यह सदन सर·ार से महंगाई पर अं·ुश लगाने ·े लिए असरदार ·दम उठाने ·ा आग्रह ·रता है। हालां·ि सहमति होने ·े ·ारण चर्चा ·े बाद विपक्ष ·े मत विभाजन ·ी मांग पर ज़ोर देने ·ी संभावना ·म ही नज़र आती है। जनता जल यूनाइटेड ·े प्रमुख शरद यादव ने ·हा ·ि $गरीब आदमी आज भी वहीं है जहां साठ साल पहले था। टेली·ॉम टावरों ·ो चलाने ·े लिए सालाना १७०० ·रोड़ रुपए ·ी सब्सिडी दी जा रही है। यह सब्सिडी ·िसानों ·ो दे दी जाए तो हालात बदल जाएंगे। राजद ·े रघुवंश प्रसाद सिंह ने ·हा ·ि ·ि सर·ार दो तरह ·ी बातें ·र रही है। सटोरियों ·ो बढ़ावा मिल रहा है और महंगाई बढ़ रही है। वायदा ·रोबार पर रो· नहीं लगाई जा रही है। इससे ·िसानों या आम आदमी ·ो क्या लाभ है। हालां·ि इस मसले पर भाजपा ने सर·ार ·े प्रति नरमी दिखाई। महंगाई सर·ारी नीतियों में खेती, ·िसानों ·ी उपेक्षा और वायदा व्यापार, ·ालाबाजारी, जमाखोरी और खाद्यान्न निर्यात रो·ने में अनिच्छा ·ा परिणाम है। ·िसानों ·ी उपज ·े दामों में वृद्धि होने पर हंगामा मचाया जाता है, ले·िन उद्योगों में बनने वाली वस्तुओं ·े दामों में भारी वृद्धि हुई है, ले·िन उस पर सभी ने चुप्पी साध रखी है। इस सब ·े बीच जनता दल यूनाइटेड ·े अध्यक्ष शरद यादव ने बहस में ए· आदर्श सुझाव रखा। उन्होंने ·हा ·ि यदि सर·ार देश में चार लाख मोबाइल टावरों, १५ लाख डीज़ल ·ारों, होटलों और मॉल ·े मालि·ों ·ो डीज़ल पर दी जाने वाली ३.८ रुपए प्रति लीटर ·ी सब्सिडी ·ो समाप्त ·र ·िसानों ·ो देना शुरू ·र दे, तो महंगाई ·ी समस्या ·ा ·ा$फी हद त· हल नि·लना संंभव है।


लो·पाल:
असली महाभारत तो अब होगा

हृ शांतिप्रिय
डॉ. मनमोहन सिंह ·ी सर·ार ने ए· ठोस रणनीति ·े तहत जनलो·पाल ·ा मसौदा बनाया है क्यों·ि सर·ार पर पहले ही भाजपा यह आरोप लगा चु·ी है ·ि मनमोहन सिंह ·मज़ोर सर·ार ·े प्रधान मंत्री हैं। इसलिए अन्ना हजारे ·ी टीम ·े सुझाव जस ·े तस नहीं स्वी·ार ·िये गये। सर·ार ने उन बिन्दुओं पर विशेष ज़ोर दिया जिन·ो ले·र अन्ना हज़ारे ·ी टीम में भी मतभेद थे।जैसे ·ि प्रधानमंत्री और सुप्रीम ·ोर्ट ·े मुख्य न्यायाधीश ·ो इस विधेय· ·ी परिधि से बाहर रखा जाये।
चालीस साल से जिस लो·पाल बिल ·ी भूमि·ा बन रही थी, उस·ो ले·र असली महाभारत अगस्त ११ में शुरू होगा। संसद ·े मानसून सत्र में ·ेन्द्र सर·ार इस·े मसौदे ·ो पेश ·रेगी। गत २८ जुलाई ·ो डा० मनमोहन सिंह ·ी ·ैबिनेट ने लो·पाल बिल ·े मसौदे ·ो मंजूरी दे दी है। इस बिल ·े लिये ·ेन्द्र सर·ार ने ए· मसौदा पहले भी तैयार ·िया था ले·िन उस·ा जोरदार विरोध हुआ और गांधीवादी नेता अन्ना हजारे दिल्ली में अनशन ·रने लगे। उन्हें भारी समर्थन भी मिला और ·ेन्द्र सर·ार ने अन्ना हजारे ·े सुझाव पर ए· संयुक्त मसौदा समिति बनायी जिसमें अन्ना हजारे, अरविन्द ·ेजरीवाल, शांतिभूषण, प्रशांत भूषण और ·र्नाट· ·े लो·ायुक्त संतोष हेगड़े भी शामिल थे। सर·ार ·ी तरफ से ·पिल सिव्बल, वीरप्पा मोइली, सलमान खुर्शीद और गृहमंत्री पी. चिदम्बरम ·ो रखा गया था। समिति में मतभेद पैदा हुआ और अन्ना हजारे ·ी टीम ने मसौदे ·ा विरोध ·िया है। श्री अन्ना हजारे ने पूर्व घोषित ·ार्य·्रम ·े तहत १६ अगस्त से दिल्ली में इस·े विरोध में अनशन ·ा ऐलान भी ·र दिया अब देखना यह है ·ि सर·ार और अन्ना हजारे ·े बीच शुरू हुए इस महाभारत में ·ौन ·िस·ा साथ देता है।
डा० मनमोहन सिंह ·ी सर·ार ने ए· ठोस रणनीति ·े तहत जनलो·पाल ·ा मसौदा बनाया है क्यों·ि सर·ार पर पहले ही भाजपा यह आरोप लगा चु·ी है ·ि मनमोहन सिंह ·मजोर सर·ार ·े प्रधानमंत्री हैं। इसलिए अन्ना हजारे ·ी टीम ·े सुझाव जस ·े तस नहीं स्वी·ार ·िये गये। सर·ार ने उन बिन्दुओं पर विशेष जोर दिया जिन·ो ले·र अन्ना हजारे ·ी टीम में भी मतभेद थे जैसे ·ि प्रधानमंत्री और सुप्रीम ·ोर्ट ·े मुख्य न्यायाधीश ·ो इस विधेय· ·ी परिधि से बाहर रखने ·ा फैसला डॉ० मनमोहन सिंह ·ी सर·ार ने प्रधानमंत्री, सुप्रीम ·ोर्ट ·े न्यायाधीश और सदन ·े भीतर सांसदों ·ी गतिविधियों ·ो लो·पाल बिल ·ि दायरे से बाहर रखा है। मुख्य विरोध प्रधानमंत्री और जजों ·ो लो·पाल बिल से बाहर रखने ·ा ही है। पूर्व पुलिस अधि·ारी और अन्ना हजारे ·ी टीम ·ी सदस्य ·िरण वेदी ·हती हैं ·ि सर·ार ने देश ·े साथ छल ·िया है। उन्होंने आशं·ा जतायी ·ि यदि लो·पाल बिल इसी मसौदे ·े तहत पारित हो गया तो जो राज्य लो·ायुक्त ·ा गठन ·रने जा रहे हैं, वे मुख्यमंत्री ·ो और हो स·ता है अपने विधाय·ों ·ो भी लो·ायुक्त ·े दायरे से बाहर ·र दें। दिल्ली में शीला दीक्षित ने लो·ायुक्त ·े अधि·ार ·म ·रने ·ी योजना बनायी भी थी। इसी प्र·ार ·र्नाट· ·े लो·ायुक्त संतोष हेगड़े ने ·हा ·ि सर·ार ·ा यह ड्राफ्ट ·ाफी ·मजोर है। उन्होंने ·हा सर·ार ·ो ए· मौ·ा मिला था ·ि सख्त ·ानून बनाये जाएं जिसमें प्रधानमंत्री डा० मनमोहन सिंह ने खुद लो·पाल बिल ·े दायरे में रखने ·ी पेश·श ·ी थी। उन्होंने यह जाहिर ·र दिया ·ि जैसा लोग आरोप लगाते हैं ·ि प्रधानमंत्री जांच ·े दायरे में आने से डरते हैं यह सही नहीं है।
प्रधानमंत्री ·ी पेश·श ·े बाद भी ·ैबिनेट ने उन्हें लो·पाल विधेय· ·े दायरे से बाहर रखा है।
इसी तरह सांसदों ·ी सदन ·े अन्दर ·ी हर·तों ·ो भी संसद ने अपने स्तर से ही निपटाने ·ा अधि·ार सुरक्षित रखा है। अन्ना हजारे ·ी टीम चाहती है ·ि संासदों ·ो और प्रधानमंत्री ·ो लो·पाल ·े दायरे में रखा जाए। इसी प्र·ार लो·ायुक्त और लो·पाल ·ो नियुक्त ·रने ·े लिए ए· ही बिल (प्रावधान) ·ी बात ·ही गयी है जब·ि सर·ार ·ा मानना है ·ि लो·ायुक्त ·ी तैनाती ·ा विशेषाधि·ार राज्य सर·ारों ·ा है। इस प्र·ार ·ेन्द्र सर·ार ने अन्ना हजारे ·ी टीम ·ो स्वयं न घेर·र राज्य सर·ारों और विपक्षी दलों ·ो भी अपने साथ मिला लिया है। अन्ना हजारे १६ अगस्त से अनशन ·रने वाले हैं ले·िन अब विपक्षी दल उन·ा साथ ·िस आधार पर देंगे, यह देखने ·ी बात होगी। भाजपा और उस·े सहयोगी दलों ·ी राज्य सर·ारें अपने विशेषाधि·ार में ·टौती ·ो ·ैसे स्वी·ार ·रेंगी। यही स्थिति सांसदों ·ी गतिविधियों ·ो ले·र होगी। हिमाचल प्रदेश ·े मुख्यमंत्री प्रेेम ·ुमार धूमल और पंजाब ·े मुख्यमंत्री प्र·ाश सिंह बादल ने पहले ही ·हा था ·ि लो·पाल विधेय· से भ्रष्टाचार दूर नहीं हो स·ता। अब लड़ाई आमने-सामने ·ी है। सदन में यदि विपक्ष दल अन्ना हजारे ·े पक्ष में आ·र लो·पाल बिल ·े मसौदे ·ा विरोध ·रते हैं तो सर·ार सांसदों ·ो और राज्यों ·े लो·ायुक्त नियुक्त ·रने ·े अधि·ार ·ो समाप्त ·र देगी। इस प्र·ार सर·ार पर यह आरोप नहीं लगेगा ·ि उसने राज्यों ·ा अधि·ार छीना है। इस·ी संभावना ·ितनी है, यह सहज ही ·ल्पना ·ी जा स·ती है। भाजपा समेत सभी विपक्षी दल असमंजस में हैं ·ि लो·पाल बिल ·े इस मसौदे पर ·िस·ा साथ दिया जाए। यही डा० मनमोहन सिंह ·ी सर·ार चाहती थी ·ि अन्ना हजारे ·ा मु·ाबला ·रने ·े लिए विपक्षी दल भी उस·े साथ खड़े हों।
(हिफी)

Saturday, July 16, 2011





यह ·ैसा छवि सुधार ·ा मंत्रिमंडल विस्तार
विवादों ·े घेरे में मंत्रिमंडल विस्तार, ·ैबिनेट मंत्री न बनाने से नाराज गुरुदास ·ामत ने दिया इस्ती$फा, दा$िगयों ·ो नहीं बदला, चहेतों ·ो जगह दी, ईमानदार मंत्री एम.एस.गिल ·ो दिखाया बाहर ·ा रास्ता
नए मंत्री और उन·े मंत्रालय
दिनेश त्रिवेदी-रेल, वी.·िशोर चंद्र देव-आदिवासी मामले और पंचायती राज, बेनी प्रसाद वर्मा-इस्पात, जयराम रमेश-ग्रामीण प्रभार
राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)
श्री·ांत जेना-सांख्यि·ी और ·ार्य·्रम ·ार्यान्वयन, रसायन एवं उर्वर·, जयंती नटराजन-पर्यावरण और वन, पवन सिंह घाटोवार-पूर्वोत्तर क्षेत्र वि·ास, गुरुदास ·ामत-पेयजल और स्वच्छता
राज्य मंत्री
सुदीप बंदोपाध्याय-सवास्थ्य और परिवार ·ल्याण, चरण दास महंत-·ृषि एवं खाद्य प्रसंस्·रण उद्योग, मिलिंद देवड़ा-संचार और सूचना प्रौद्योगि·ी, जितेन्द्र सिंह-गृह मामले
मंत्रालय में बदलाव
विलासराव देशमुख-विज्ञान एवं प्रौद्योगि·ी और पृथ्वी विज्ञान, वी वीरप्पा मोइली-·ॉर्पोरेट मामले, आनंद शर्मा-वाणिज्य और उद्योग, ·पड़ा मंत्रालय ·ा अतिरिक्त प्रभार, पी.·े.बंसल-संसदीय मामले और जल संसाधन ·ा अतिरिक्त प्रभार, सलमान $खुर्शीद-·ानून एवं न्याय और अल्पसंख्य· मामलों ·ा अतिरिक्त प्रभार
राज्य मंत्री
ई अहमद-विदेश मामले और मानव संसाधन वि·ास, वी नारायण स्वामी-·ार्मि· लो· शि·ायत एवं पेंशन और प्रधानमंत्री ·ार्यालय, हरीश रावत-·ृषि एवं खाद्य प्रसंस्·रण उद्योग और संसदीय मामले, मु·ुल रॉय-जहाज़रानी, अश्विनी ·ुमार-योजना, विज्ञान एवं प्रौद्योगि·ी और पृथ्वी विज्ञान
लगता है विवाद और यूपीए-२ ·ा चोली दामन ·ा साथ है, इसी ·े चलते मिस्टर क्लीन मनमोहन ·े बड़ी सावधानी पूर्व· ·िए गए मंत्रिमंडल फेरबदल ·े बावजूद विवाद ने तूल प·ड़ लिया है। भले ही ·हने ·े लिए यह बदलाव सर·ार ·ी छवि चम·ाने ·े लिए ·िया गया हो, ले·िन अब जो तस्वीर उभर ·र सामने आई है उससे सा$फ हो जाता है ·ि सर·ार ने दा$गी मंत्रियों ·ो अब भी सिर-माथे पर बिठा रखा है। ·पिल सिब्बल जिन पर $िफलवक्त आरोप दर आरोप लगाए जा रहे हैं, उन·े साथ ·ोई छेड़छाड़ नहीं ·ी गई है। वहीं दूसरी ओर एआईडीएम·े ·ी सुप्रीमो अम्मा यानी जे. जयललिता ·ी मानें तो धांधली ·र·े चुनाव जीतने वाले पी.चिदम्बरम ·ो भी सर·ार छत्रछाया देने से नहीं चू·ी है। जब·ि इससे इतर राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार ·ो समय रहते रो·ने ·ी सिफारिश प्रधानमंत्री से ·रने वाले ईमानदार मंत्री एम.एस.गिल ·ो बाहर ·ा रास्ता दिखा दिया गया है। इससे आम आदमी में यूपीए-२ सर·ार ·ी छवि चम·ी है या धूमिल हुई है, ये तो आने वाला वक्त ही सा$फ ·र पाएगा।
राहुल गांधी ·ो प्रधानमंत्री बनाए जाने, मनमोहन ·े अरोपों से परेशान हो·र पीएम पद त्यागने सरीखी आए दिन उडऩे वाली अ$फवाहों ·ो विराम देते हुए यूपीए-२ ·ी छवि सा$फ-सुथरी बनाने ·े उद्देश्य से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ·ेन्द्रीय मंत्रिमंडल में मंगलवार ·ो फेरबदल · र दिया है। इस·े तहत सात मंत्रियों ·ो हटाया गया है, वहीं आठ नए चेहरों ·ो शामिल ·िया गया है। हालां·ि इस फे रबदल में चार बड़े मंत्रालयों- वित्त, गृह, रक्षा और विदेश ·ो ज्यों ·ा त्यों रहने दिया गया है। मंत्रिमंडल फेरबदल ·े होते ही सर·ार ·ी छवि सा$फ हुई है या नहीं यह ·हना तो अभी जल्दी होगा, ले·िन इतना तो वह हो गया है ·ि यह फेरबदल सर·ार ·ो फिर से विवादों में घसीटने ·े लिए ·ा$फी है। प्रधानमंत्री ने सोनिया और राहुल ·े चहेतों ·ो $खास ओहदों से नवाज़ा है, वहीं ·ईयों ·ो उन·ी औ·ात दिखाने ·ी ·ोशिश भी ·ी है। ·ुल मिला·र यह फेरबदल सर·ार ·ी सब·ो साथ ले·र चलने ·ी नीति ·ी ओर ही सं·ेत देता है, ले·िन बावजूद इस·े बात बनने ·ी जगह बिगड़ती ही नज़र आ रही है। ·ैबिनेट मंत्री न बनाने से नाराज़ गुरुदास ·ामत ने इस्ती$फा दे दिया है, जब·ि वीरप्पा मोइली ने ·िसी ·ा नाम न लेते हुए इशारे से ·हा ·ि दूसरे ·ी $गलतियों ·ा ठी·रा मेरे सिर फोडऩा ·तई औचित्यपूर्ण नहीं है। इससे इतर जेना तो शपथ लेने ही नहीं पहुंचे। मनमोहन ने तीन पुराने मंत्रियों ·ो ·ैबिनेट मंत्री ·ा दर्जा दे·र उन·ा ·द बढ़ाया है।
यह फेरबदल
वीरप्पा मोइली ·ो ·ानून मंत्रालय से हटा·र ·ॉर्पोरेट मामले मेंं भेज दिया गया है, उन·ी विधि मंत्री ·ी ·ुर्सी सलमान $खुर्शीद ·ो सौंपी गई है। तृणमूल ·ांग्रेस ·े नेता दिनेश त्रिवेदी ·ा ·द बढ़ा·र उन्हें ·ैबिनेट में स्थान दिया गया है और उन·ी झोली में ममता बनर्जी द्वारा छोड़ा गया रेल विभाग आ गया है।
बेनी प्रसाद वर्मा ·ो ·ेन्द्रीय स्पात मंत्री बनाया गया है, पहले वे स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री ·े बतौर यही मंत्रालय देख रहे थे। जयंती नटराजन ·ो पर्यावरण और वन विभाग जब·ि डिब्रुगढ़ सांसद पवन सिंह घाटोवार ·ो पूर्वोतर क्षेत्र वि·ास विभाग दिया गया है। तृणमूल ·ांग्रेस ·े नेता सुदीप बंदोपाध्याय ·ो स्वास्थय और परिवार ·ल्याण विभाग, अलवर ·े सांसद जितेंद्र सिंह ·ो गृह विभाग, मिलिंद देवड़ा ·ो संचार और सूचना एवं प्रौद्योगि·ी विभाग और राजीव शुक्ला ·ो संसदीय मामले से नवाज़ा गया है। जितेन्द्र सिंह, चरणदास महंत और मिलिंद देवड़ा ·ो राहुल ·े ·रीबी होने ·ा $फायदा मिला है, जब·ि जयंती नटराजन ·ो सोनिया ·ा ·रीबी होने ·ा $फायदा मिला है। इससे यह अंदाज़ा लगाया जा रहा है ·ि अब सर·ार में धीरे-धीरे राहुल गांधी ·े चहेतों ·ा ·द बढ़ाने ·ी अघोषित ·वायद शुरू ·र दी गई है।
इन·ी हुई छुट्टी
एम.एस.गिल (सांख्यि·ी एवं ·ार्य·्रम ·ार्यान्वयन), बी.·े.हांडि· (पूर्वोत्तर क्षेत्र वि·ास विभाग) ·ांतिलाल भूरिया (आदिवासी मामले) मुरली देवड़ा (·ॉर्पोरेट मामले) दयानिधि मारन (·पड़ा) शामिल हैं। मारन ने २ जी स्पैक्ट्रम मामले में नाम आने ·े बाद हाल ही इस्ती$फा दिया है, जब·ि मुरली देवड़ा ने बढ़ती उम्र ·ा बहाना ·र अपने बेटे ·े लिए मंत्रिमंडल में जगह मांगी थी। अगर सभी मंत्री शपथ ग्रहण ·रते हैं, तो मंत्रिमंडल ·ी क्षमता ६८ हो जाएगी।
बदलाव ·ी वजह
रमेश ·ी गिनती अच्छा ·ाम ·रने वाले मंत्री ·े तौर पर होती है, ले·िन पर्यावरण से जुड़े मामलों से निपटने ·े दौरान ·ई विवादों में घिरने ·ारण उन्हें ·ैबिनेट में ग्रामीण वि·ास विभाग में भेजा गया है। आनंद शर्मा ·े पास पहले से ही वाणिज्य एवं उद्योग है, उन्हें ·पड़ा मंत्रालय और सौंपा गया है। इसी तरह पी.·े. बंसल ·े पास संसदीय मामले पहले से हैं, उन्हें जल संसाधन ·ा अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। मानव संसाधन वि·ास मंत्री ·पिल सिब्बल दूरसंचार ·ा अतिरिक्त प्रभार संभाले हैं, जब·ि प्रवासी भारतीय मामले मंत्री वयालार रवि ·े पास नागर विमानन विभाग ·ा अतिरिक्त प्रभार है। आंध्र प्रदेश ·े बुजुर्ग सांसद वी. ·िशोर चंद्र देव ने पहली बार मंत्रिमंडल में ·दम रखा है। सर·ार से $ख$फा चल रहे श्री·ांत जेना ·ो सांख्यि·ी एवं ·ार्यान्वयन विभाग ·ा स्वतंत्र प्रभार सौंपा गया है, हालां·ि वे रसायन और उर्वर· विभाग ·े राज्य मंत्री बने रहेंगे, जब·ि डीएम·े ·े एम.ए.अलागिरी इस विभाग ·े ·ैबिनेट मंत्री रहेंगे। चरण दास महंत ·ो ·ृषि और संचार मंत्रालय से ए· नए मंत्रालय पेयजल और स्वच्छता में स्वतंत्र प्रभार दिया गया है। विलास राव देशमुख ·ो विज्ञान, प्रौद्योगि·ी और पृथ्वी विज्ञान में भेजा गया है। ई अहमद ·ो मानव संसाधन वि·ास मंत्रालय ·ा प्रभार दिया गया है।
हटाये जाने ·े सम्भावित ·ारण
दयानिधि मारन: स्पैक्ट्रम २ जी घोटाले में आया नाम, मुरली देवड़ा: बेटे ·े लिए छोड़ी ·ुर्सी, ·ांतिलाल भूरिया: मध्यप्रदेश ·ांग्रेस अध्यक्ष ·ी जि़म्मेदारी दी, बी.·े.हांडि·: अस्वस्थता ·े ·ारण असमर्थता जताने पर, एम.एस.गिल: राष्ट्रमंडल खेल और $खराब प्रदर्शन, अरुण यादव:एआईसीसी में सचिव बनाए गए, ए.साई.प्रताप: विद्रोही नेता जगन रेड्डी ·े नज़दी·ी होने ·ी वजह से हटाए गए।

म धमा·ों से दहली मुंबई

हृ निरंजन परिहार
मुंबई ए· बार फिर दहल गई है। जवेरी बाज़ार, ऑपेरा हाउस और दादर में धमा·े हुए। 21 लोगों ·े मारे जाने ·ी सर·ारी पुष्टि हो चु·ी है और ·रीब सवा सौ लोग घायल हैं। शहर ·े इन सबसे भीड़ भरे तीन इला·ों ·ी तासीर ए· ही है। तीनों बेहद व्यस्ततम व्यापारि· इला·े हैं। जवेरी बाज़ार देश ·ा सबसे बड़ा सोने ·ा थो· बाजार है, ऑपेरा हाउस देश ·ा सबसे बड़ा डायमंड बाज़ार और दादर रिटेल बाज़ार है। ले·िन तीनों ही इला·े बेहद भीड़भाड़ वाले हैं। हालां·ि दादर मध्य मुंबई में है और जवेरी बाज़ार और ऑपेरा हाउस दोनों दक्षिण मुंबई में है। मगर तीनों ही इला·ों ·ी तासीर यही है ·ि शाम ·े समय यहां लोगों ·ी आवाजाही ·ुछ ज्य़ादा ही बढ़ जाती है।
जवेरी बाजार न ·ेवल मुंबई बल्·ि देश ·ा सबसे बड़ा सोने ·ा बाजार है। यहां देश भर से सोने ·े $खरीददार आते हैं। साथ ही शाम ·े समय सड़·ों पर लोगों ·ी संख्या ·रीब तीन गुना से भी ज्य़ादा हो जाती है। देश ·ा विख्यात और मुंबई ·ी आराध्य देवी मुंबादेवी ·ा मंदिर भी यहीं पर जवेरी बाज़ार में ही है। जवेरी बाजार में बम ब्लास्ट उस पतली सी खाऊ गली में हुआ, जो सि$र्फ 40 फीट चौड़ी और 100 मीटर लंबी है। जब·ि इतनी सी जगह में शाम ·े वक्त ·रीब चार से पांच हज़ार लोग वहां मौजूद होते हैं। इस·े आसपास ·ी दूसरी गलियां धनजी स्ट्रीट और मिजऱ्ा स्ट्रीट वगैरह भी ·ा$फी सं·री है। यही वजह रही ·ि आतं·वादियों ने पांच साल बाद इ· बार फिर इसी इला·े ·ो निशाने पर लिया। ऑपेरा हाउस ·ा नाम पूरी दुनिया में देश ·े सबसे बड़े डायमंड हब ·े रूप में विख्यात है।
शाम ·े वक्त वहां ·े हालात भी ·मोबेश जवेरी बाज़ार जैसे ही होते हैं। हीरा बाज़ार ·े इस इला·े में जिस इमारत में विस्फोट हुआ, उस प्रसाद चेंम्बर नाम· इमारत में देश ·ी ही नहीं दुनिया भर ·ी बड़ी बड़ी डायमंड ·ंपनियों ·े द$फ्तर हैं। साथ ही वहां शाम ·ो इतनी भारी भीड़ रहती है ·ि तिल रखने ·ी भी जगह नहीं होती।
हीरे ·े बहुत सारे व्यापारी शाम ·े वक्त सड़·ों पर ही अपना ·ारोबार ·रते हैं। आतं·वादियों ने इसीलिए इस इला·े पर अपना निशाना साधा।
मध्य मुंबई ·ा सबसे भीडभाड़ वाला इला·ा दादर, शाम ·े वक्त घर जाने वाले लोगों से अटा पड़ा रहता है। मुंबई ·ी सेंट्रल और वेस्टर्न रेलवे ·ो जोडऩे वाले दादर में शाम ·े वक्त लोग तो बहुत बड़ी तादाद में आते जाते हैं, स्·ूलों से बच्चे भी इसी वक्त बड़ी संख्या में ए· साथ घर लौटते हैं। वैसे बम ब्लास्ट ·े दिन बुधवार 13 जुलाई ·ो दादर में ही पास ·े सिद्धि विनाय· मंदिर जाने वालों ·ी भी बहुत भारी भीड़ होती है। फिर शिवसेना ·ा मुख्यालय भी दादर में ही है। हालां·ि ·बूतर खाना जहां, धमा·ा हुआ, वह पूर्ण रूप से रिटेल ·ा बाज़ार है। सो, लोग ·ाफी संख्या में हर वक्त रहते हैं। आतं·वादियों ने वहां भी धमा·ा इसी मंशा से ·िया, ता·ि ज्य़ादा से ज्य़ादा लोगों ·ो आसानी से निशाना बनाया जा स·े। 2008 में लश्·र ·े आतं·ियों ने मुंबई ·ो बंध· बनाया था और देशी विदेशी 166 लोगों ·ो मौत ·े घाट उतार दिया था। तीन साल ·े भीतर मुंबई पर हुई यह आतं·ी ·ार्रवाई वैसी नहीं है जैसी 26/11 ·ी थी, ले·िन छिप·र ही सही आतं·ियों ने ए· बार फिर मुंबई ·ी मेहनत·श जनता ·ो निशाना बना·र अपना घिनौनापन उजागर ·िया है। शाम ·ो हुए विस्फोट ·े बाद देर रात सुरक्षा एजेंसियों ने यह ·हना शुरू ·र दिया है ·ि इस आतं·ी हमले में ·िसी देसी आतं·ी संगठन ·ा हाथ हो स·ता है। सच्चाई सामने आने में थोड़ा वक्त लगेगा, ले·िन शाम 6.50 मिनट पर मुंबई ·े जवेरी बाज़ार में हुए पहले विस्फोट ·े बाद दस मिनट ·े अंदर सिलसिलेवार ढंग से ·िये गये ये तीनों विस्फोट सोच समझ·र और रणनीति बना·र ·िये गये हैं।

Saturday, July 2, 2011







असहाय हुआ रेलवे टि· · दलाली · नासूर
वर्तमान हालात में आम आदमी ·ी हर तरफ से आफत है। ए· तरफ महंगाई ने आम आदमी ·ी ·मर तोड़ दी है तो दूसरी ओर उसे हर स्तर पर भ्रष्टाचार ने परेशान ·र रखा है। बच्चे ·ो अच्छे स्·ूल या ·ॉलेज में दाखिला दिलवाना है तो डोनेशन, रिटन और इंटरव्यू पास ·र लिया है तो पोस्टिंग ·े लिए डोनेशन... इतना ही नहीं, पिछले ·ई सालों से बढ़ते टूरिज्म ·े चलते रेलवे ·े टि·ट रिजर्वेशन में लगे दलालों ·ी पो-बारह हो गई है। आम आदमी ट्रेन से इसलिए सफर ·रता है ·ि बस और हवाई जहाज ·ी यात्रा ·ी अपेक्षा ट्रेन से सफर सस्ता पड़ता है, ले·िन अब इस सेक्टर में भी रेलवे ·े आला अधि·ारियों, ·र्मचारियों और दलालों ·ी मिलीभगत ·े चलते आम आदमी ·ो टि·ट अरक्षित ·रवाने ·े लिए मजबूरन दलालों ·ी शरण में जाना पड़ता है। इससे नतीजतन आम आदमी ·ी जेब पर प्रति टि·ट २०० से ५०० रुपए त· ·ा अतिरिक्त भार पड़ता है। टि·ट ·ो ब्लै· में बेचने वाले टि·ट ·ी दर आदमी ·ी जरूरत और हैसियत ·े हिसाब से तय ·रते हैं, इसी ·े चलते देशभर में ·ई रेलवे स्टेशनों पर ·ई बार सीबीआई ने छापामार ·र्रवाई ·ी, ले·िन नतीजा वही ढा· ·े तीन पात। अखिर ·ैसे होता है रेलवे ·ी दलाली ·ा खेल और इससे देश ·ी जनता ·ी जेब पर सालाना ·रोड़ों रुपए ·ा भार पड़ रहा है। यह भार अब जनता ·े लिए नासूर बन गया है। इन्हीं सब बातों ·ी पड़ताल इस लेख में ·ी गई है।
हाल ही सीबीआई ने जयपुर जंक्शन, ढेहर ·े बालाजी, गांधीनगर स्टेशन, एजेंट फर्म हेमेंद्र श्रीमाल, भर्तरी व जी.एस. लु बा फर्म पर अचान· जांच और ·ार्रवाई ·ी। सीबीआई ·ी ओर से ·हा गया ·ि लंबे समय से ऐसी शि·ायतें मिल रही थीं ·ि टि·ट दलाल और रेलवे ·र्मचारियों ·ी मिलीभगत से आम आदमी ·ो रिजर्वेशन मिलना ही मुश्·िल हो गया है और जब बात हो तत्·ाल आरक्षण ·ी तब तो यह समस्या और भी वि·ट हो जाती है। गौरतलब है ·ि टि·ट दलाल और रेलवे ·े टि·ट बु· ·रने वाली एजेंसियां आम आदमी से टि·ट ·ी ·ीमत ·े अतिरिक्त प्रति टि·ट अमूमन २०० रुपए प्रति टि·ट ·ी दर से वसूलते हैं। टि·ट पर अतिरिक्त ली जाने वाली धनराशि जरूरत और हैसियत ·े हिसाब से बढ़ा भी दी जाती है। ऐसे में मान लीजिए ·िसी परिवार में पांच सदस्य हैं और उन्हें आरक्षित टि·ट चाहिए तो उन्हें टि·ट ·ी राशि ·े अलावा ए· हजार रुपए अतिरिक्त बतौर आरक्षण ·े दलाल या एजेंसी ·ो देने होंगे। ऐसा नहीं है ·ि टि·ट ·ी दलाली ·ा यह गोरखधंधा सिर्फ जयपुर त· ही सीमित है, ·मोबेश देश ·े हर रेलवे स्टेशन पर यही हाल हैं। दिल्ली, मुंबई, ·ोल·ाता, मद्रास हो या आगरा, उज्जैन, लखनऊ हर जगह ·े रेलवे स्टेशन पर रेलवे ·े ·र्मचारियों और रेलवे ·े टि·ट बु· ·रने वाली एजेंसियों व टि·ट दलालों ·ी मिलीभगत ·े चलते यह ·ारगुजारी पूरे देश में बदस्तूर जारी है और अब यह आम आदमी ·े लिए भयावह समस्या में तब्दील हो चु·ी है। इसी ·े चलते ·ुछ महीने पहले ही देश ·े ·ुछ अन्य महानगरों ·े रेलवे स्टेशन पर भी टि·ट दलाली ·े खेल ·ी पोल खोलने और इसपर लगाम ·सने ·े उद्देश्य से ·ार्रवाई ·ी गई थी। मौटे तौर पर देशभर में आम जनता द्वारा ए· दिन में ·रोड़ों रुपए ·े रेलवे ·े टि·टों ·ा आरक्षण ·रवाया जाता है और प्रतिदिन रेलवे ·े टि·ट दलाल लाखों रुपए दलाली ·े खा जाते हैं। इस तरह दलालों ·े लिए टि·ट दलाली ·ा धंधा ·ाफी लाभदाय· सिद्ध हो रहा है। अब ए· टि·ट पर आरक्षण ·े नाम पर अगर दलाल प्रति टि·ट २०० रुपए लेता है तो जाहिर ये २०० रुपए उस·ी ही जेब में नहीं चले जाते बल्·ि इसमें रेलवे ·े ·र्मचारियों ·ा भी निश्चत हिस्सा होता है।
आशं·ा तो यह भी है ·ि रेलवे ·ी टि·ट दलाली से होने वाली आय में से ए· निश्चित हिस्सा रेलवे ·े उच्चाधि·ारियों ·े पास त· भी पहुंचाया जाता हो, जिस·े चलते दलाल ·ो रेलवे ·ी टि·ट ·ो ब्लै· ·े बेचने ·ा अघोषित रूप से खुला लाइसेंस मिल जाता है और वह धड़ल्ले से निडर हो·र टि·ट दलाली में धंधे में जम जाता है। ऐसे होता है खेल-दलाल रात २:०० बजे से ही रेलवे स्टेशन पर जा·र सो जाते हैं और आरक्षण ·ी खिड़·ी खुलने पर रेलवे ·ा ही ए· ·र्मचारी भीड़ ·ो देखते हुए व्यवस्था ·े नाम पर ·ाउंटर नंबर और ·ैंडीडेट नंबर सब·े फॉर्मों पर लगा देता है। रेलवे ·ा ·र्मचारी दलालों ·ो भलीभांति पहचानता है इसलिए पहले १ से १० त· ·े नंबर सभी ·ाउंटर पर दलालों ·े फॉर्म पर ही मार्· ·िए जाते हैं। ऐसे में आम आदमी ·ा नंबर चाहे वह ·िसी भी ·ाउंटर पर खड़ा हो ग्यारहवां ही आता है। उस·ा नंबर आते आते तत्·ाल में मिलने वाला आरक्षण दलालों ·े ही खाते में चला जाता है आम आदमी ·ो तो वेटिंग ही मिलती है। इस तरह से यह खेल जयपुर ही नहीं देश ·े सभी रेलवे स्टेशनों पर धड़ल्ले से चल रहा है। गौरतलब बात यह भी है ·ि रेलवे ·े टि·ट आरक्षण वाली खिड़·ियों पर ऐसे ही रेलवे ·े ·र्मचारियों ·ो पोस्टिंग दी जाती है जिन·ी दलालों से अच्छी साठ-गांठ होती है या जो पोस्टिंग ·े बाद दलालों से सांठ-गांठ ·रने में माहिर होते हैं। ऐसे में आम आदमी अपने आप ·ो ठगा-सा महसूस ·रता है। ·ई बार तो सीट होने पर भी आम आदमी से ·ह दिया जाता है ·ी फलां-फलां जगह ·े लिए सीट नहीं है, ऐसे में आम आदमी वेटिंग ·े झंझट में पडऩे ·े बजाय दलालों से ·न्फर्म टि·ट लेने में ही भलाई समझता है। ·िया जाता है दोहरा व्यवहार-रेलवे ·े टि·ट आरक्षण विंडो पर बैठे ·र्मचारी ·ी ओर से आम आदमी से तो ·ह दिया जाता है ·ि आप ए· बार में ए· या दो से ज्यादा रिजर्वेशन फॉर्म जमा नहीं ·रवा स·ते अगर आप·ो इससे ज्यादा फॉर्म जमा ·रवाने हैं तो नए सिरे से फिर से आरक्षण ·े लिए लगी लाइन में लगना होगा, जब·ि इससे इतर दलालों ·े लिए फॉर्म ·ी सं या संबंधी ·ोई सीमा नहीं होती, वे ए· बार में जितने चाहे फॉर्म जमा ·रवा स·ते हैं। यह सब सिर्फ इसलिए ·िया जाता है ·ि आम आदमी ·ो ज्यादा से ज्यादा असुविधा और परेशानी ·ा सामना ·रना पड़े। ए· तो आम आदमी ·ा इससे ·ीमती वक्त जाया होता है, दूसरा रेलवे ·े ·र्मचारियों ·ो असहयोगपूर्ण रवैया उन्हें निराश ·रता है ऐसे में तंग आ·र आम आदमी टि·ट ·े लिए दलालों ·ी शरण में पहुंच जाता है और न चाहते हुए भी प्रति टि·ट पर २०० से ५०० रुपए त· दलाल ·ो देता है। ·ई बार तो ऐसा भी होता है ·ि जितनी धनराशि ·े रेलवे से यात्रा ·रने ·े टि·ट नहीं होते उससे ज्यादा धनराशि तो उसे दलालों ·ी जेब में डालनी पड़ती है। आमतौर पर टे्रनों में १०-२५ प्रतिशत त· तत्·ाल ·ा ·ोटा होता है। गाड़ी रवानगी से तीन दिन पहले तत्·ाल बु·िंग शुरू होती है। बु·िंग ·ाउंटर सुबह ८:०० बजे खुलता है, ले·िन दलाल रात ·ो ही आ जाते हैं। ·ाउंटर खुलते ही दलाल टि·ट ले लेते हैं और जरूरतमंदों ·ो दलालों से ब्लै· में टि·ट लेने ·े लिए मजबूर होना पड़ता है।


·रोड़ों · टि·टों पर लाखों · दलाली
ए· अनुमान ·े अनुसार ए· दिन में पूरे देश से रेलवे ·े टि·ट से होने वाली आय ·रोड़ों रुपए में होती है। अब ·रोड़ों रुपए ·े टि·ट बु· ·राने पर लाखों ·ी दलाली होना तो जाहिर ही है। अगर यह मान लिया जाए ·ि पूरे देश में ए· दिन में महज २ लाख रुपए दलाल रेलवे ·े टि·ट ·े रिजर्वेशन ·े बतौर आम आदमी से ब्लै· में वसूलते हैं तो महीने भर में दलाली ·ी राशि लगभग ६० लाख रुपए हो जाएगी और अगर हम सालाना ·ी बात ·रें तो यही र·म ·रीब ६१ ·रोड़ रुपए ·ा आं·ड़ा पार ·र जाती है। इस बात से अंदाजा लगाया जा स·ता है ·ि रेलवे ·े टि·ट ·े नाम पर आम आदमी ·ी जेब से ·ितना पैसा गैर ·ानूनी रूप से वसूला जाता है, जिस·ा बंदरबांट दलाल, रेलवे ·े ·र्मचारी और अधि·ारी आपस में ·रते हैं। ·ई बार सीबीआई देश ·े विभिन्न शहरों ·े रेलवे ·ाउंटर्स पर और टि·ट बु· ·रने वाली एजेंसियों ·े यहां छापामार ·ार्रवाई ·र चु·ी है, ले·िन आज त· भी रेलवे ·े टि·ट ·े दलालों से आम आदमी ·ो निजात नहीं मिली है । इस·ी ए· मु य वजह यह है ·ि दलाली ·ा पैसा रेलवे ·े आला अफसरों त· भी पहुंचता है और वे रसूखदार अफसर ·ेन्द्र में अपनी पहुंच ·े बूते सीबीआई ·े ·ाम में हस्तक्षेप ·रने से नहीं चू·ते, इससे दलालों पर प्रभावी ·ार्रवाई ·रना संभव नहीं हो पाता। इससे इतर रेलवे ·े यही रसूखदार अफसर दलालों ·ी शरणस्थली बन जाते हैं।




भ्रष्टाचार · गंगा बह रही
मामला छपारा जनपद ·

ठ्ठ वृक्षारोपण · नाम पर लाखों बहे ठ्ठ शासन · मंशा पर फिरा पानी ठ्ठ सरपंच/सचिव जनपद अधि·ारियों · ·ार्यप्रणाली संदिग्ध
हृ डॉ. संतोष ठा·ुर
छपारा (सिवनी) शासन ·ी योजनाओं पर ·ैसे पलीता लगाया जाता है इस बात ·ा उदाहरण जनपद क्षेत्र छपारा में स्पष्ट देखा जा स·ता है। विदित है ·ि सर·ार ·ेन्द्र ·ी हो या प्रदेश ·ी हो इन्होंने क्षेत्र वि·ास ·े लिए नित नई योजनाओं ·ो बनाया है व वि·ास ·ी दिशा में लाखों रूपयों ·ो खर्च ·िया है जिसमें रोज़गार गारंटी योजना वि·ास ·े लिए सर·ार साबित होती नज़र आई है ·िंतु इस योजना ·ा वास्तवि· लाभ आम जन ·ो नहीं मिल पाया इस बात ·े उदाहरण योजना ·े ·ार्य रूप व ज़मीनी स्तर में देखे जा स·ते हैं इसी तरह रोज़गार गारंटी योजना अंतर्गत वृक्षारोपण ·ार्य ·ा प्रारंभ छपारा जनपद में वर्ष 2006-2007 से प्रारंभ ·िया गया था जो 7 से 9 वर्ष ·ी ·ार्य योजना थी जिस पर शासन ने जनपद स्तर पर ·रोड़ों रूपए पंचायत वार खर्च ·िए गए जो ·ेवल दिखावा मात्र साबित हुए हैं।
वृक्षारोपण ·े 4 वर्ष पूरे और पौधों ·ा पता नहीं
योजना ·े मुताबि· वृक्षारोपण ·ार्ययोजना में सड़·ों ·े ·िनारे, स्·ूलों ·े ·िनारे सर्वसुविधा युक्त स्थानों पर पौधों ·ा रोपण ·िया जाना था व पौधों ·ी सुरक्षा पालन पोषण ·े लिए लोहे ·े ऐंगल व तार ·ी $फेंसिंग ·िया जाना था ले·िन यह ·ार्य दिखावे ·े तौर पर ·िया गया जिसमें पंचायतों में लाखों रूपए $खर्च ·िए, 9 वर्ष ·ी इस योजना ·े 4-5 वर्ष बीत चु·े हैं और पंचायतों पर न तो पौधे देखने ·ो मिलते हैं और न लोहे ·े एंगल व तार इस तरह वृक्षारोपण ·ार्ययोजना पर अधि·ारियों ·ी अनदेखी ·े चलते वृक्षारोपण ·ार्ययोजना पर दीम· लग गया।
चोरी हो रहे हैं लाखों ·े ऐंगल व तार
वृक्षारोपण ·ार्ययोजना में लगाए गए लाखों रूपए ·े लोहे ·े ऐंगल व तार अब चोरी होने लगे हैं ज्ञात हो ·ि पंचायतों में पौधों ·ी सुरक्षा ·े लगाए गए प्रति ऐंगल व तार चोरी जा रहे हैं जिन्हें रो·ने वाला ·ोई नहीं है।
खैरी पंचायत से आई ऐंगल चोरी ·ी शि·ायत
छपारा जनपद ·ी ग्राम पंचायत खैरी में वृक्षारोपण ·ार्ययोजना ·े तहत वर्ष 2006-07 में 20 लाख रूपए से अधि· $खर्च ·िया गया था, जहां वर्तमान समय में ए· भी पौधों ·ा पता नहीं है।
शेष पेज-4

और पंचायत ·ी निगरानी में लगाई $फेंसिंग ·े एंगल पंचायत जनप्रतिनिधियों ·े सामने चुराए व निजी उपयोग ·े लिए ग्राम ·े लोगों द्वारा ले जा रहे हंै इतने पर भी पंचायत उन पर ·ोई प्रतिबंधात्म· ·ार्य या रिपोर्ट दर्ज नहीं ·रवा पा रही है यह बात तब सामने आई जब खैरी पंचायत ·े पंच व वन समिति अध्यक्ष ठा·ुर मुखराम परते ने एंगल व तार चोरी ·ी शि·ायत जनपद ·ार्यालय छपारा व ·लेक्टर जि़ला सिवनी ·ो ·िया तब हर·त में आ·र जनपद अधि·ारियों ·े ·ान में जूं रैंगी और जांच ·रने ग्राम पंचायत खैरी पहुंचे जहां गांव पांडीवाड़ा में 100 ऐंगल चोरी होने ·ी शि·ायत ·ी गई थी जांच में मामला ·ो सही पाया गया और एंगल चोरों ·ो समझा बुझा·र मामला ·ो रफादफा ·र दिया गया। इस तरह योजनाओं ·ो पलीता लगाने में छपारा जनपद में बैठे भ्रष्ट जांच अधि·ारी ·ेवल मात्र जांच ·र अपनी औपचारि·ता पूरी ·र रहे हैं उस·े बाद उस ·ार्य ·ा या योजना ·ा क्या हो रहा है इससे इन्हें ·ोई लेना देना नहीं होता।
सभी पंचायतों में वृक्षारोपण ·ार्ययोजना $फेल
जनपद क्षेत्र छपारा में राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना ·े तहत वृक्षारोपण ·े नाम पर वर्ष 2006-07 से अब त· ·रोड़ों रूपए खर्च हो चु·े हैं और नतीजा शून्य है इस योजना में पंचायतवार वृक्षारोपण ·ार्य ·िया गया था जिस·े अंतर्गत लोहे ·े ऐंगल व तार ·ी $फेंसिंग व पौधा रोपण ·िया गया था और इस योजना ·ो 9 वर्ष त· लगाए गए पौधों ·ी देख रेख ·र उन·ा पालन पोषण ·रना था। यदि पौधे सूख जाते हैं या क्षतिग्रस्त हो जाते हैं तो उस स्थान पर पुन: जुलाई माह में पौधों ·ो रोपण ·रना था ले·िन छपारा जनपद में पंचायतों ने ·ार्य ·ी औपचारि·ता वर्ष 2006-07 ·ेवल मात्र पूरी ·ी है और लाखों रूपए ·ा गोलमाल ·र अपना जेब गरम ·िया और तब से लगाए गए पौधों ·ी तर$फ देखना भी उचित नहीं समझा आज ·ी दशा यह है ·ि जहां जिस पंचायत में वृक्षारोपण ·ार्ययोजना ·े तहत ·ार्य ·िया गया है वहां न तो पौधे दिखाई देंगे और न तो लाखों रूपए ·े ऐंगल व तार इस तरह शासन से इस योजना में हुए ·ार्यों ·ी जांच ·रने व दोषी अधि·ारियों सरपंच/सचिव पर राशि $गबन ·ी ·ार्यवाही ·र पर्यावरण सुधार ·े लिए बनाई गई योजना ·ो स·ारात्म· रूप देने समाचार ·े माध्यम से जि़ला प्रशासन से अपेक्षा ·ी जाती है

Saturday, June 18, 2011


‘दिग्गी राजा’ आज भी ‘तुरुप ·ा इक्·ा’
हृ जैनेन्द्र ·ुमार
राजनेताओं ·े बारे में आम राय यही है ·ि इन·े ‘खाने ·े दांत और दिखाने ·े दांत और’ होते हैं, यानी ये ·हते ·ुछ हैं और ·रते ·ुछ और हैं, ले·िन आज भी देश में ·ुछ ऐसे नेता मौजूद हैं, जो पूरी मुस्तैदी से अपनी जि़म्मेदारियों ·ो निभा रहे हैं। वे जो ·हते हैं वही ·रने ·ा दम भी रखते हैं। हम बात ·र रहे हैं ·ांग्रेस पार्टी ·े महासचिव दिग्गी राजा ·े नाम से विख्यात दिग्विजय सिंह ·ी। उन·ी ·ुशलता और बुद्धिमत्ता ·ा लोहा ·ांग्रेस पार्टी में ही नहीं, देश ·ी सभी पार्टियां ए· मत से स्वी·ार ·रती हैं। दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश ·े मुख्यमंत्री पद से हटने ·े बाद १० साल त· ·िसी भी प्र·ार ·ा चुनाव न लडऩे और मंत्री पद न लेने ·ा ऐलान ·िया था, और उस·ा पालन वे आज भी ·र रहे हैं। हालां·ि अब वे यूपीए नीत सर·ार में ·िसी मंत्री पद पर नहीं हैं, इस·े बावजूद जब भी ·िसी भी तरह ·ा हमला सर·ार पर ·िया जाता है, तो उस·े डिफेंस में वे ही सबसे पहले प्रति·्रिया जताते और पार्टी ·ी रीति-नीतियों ·ो पु$ख्ता ·रने ·ी मुहिम में लगे नज़र आते हैं। इसे देखते हुए यह ·हा जा स·ता है ·ि मध्य प्रदेश ·े दिग्गी राजा जो ·हते हैं वैसा ही ·रने ·ी ·ुव्वत भी रखते हैं, उन्हें न सत्ता ·ा लालच है और न ही सुर्खियों में छाए रहने ·ी परवाह। इस·े बाद भी हाल ·े महीनों पर नज़र डालें तो सा$फ हो जाता है ·ि यूपीए सर·ार पर या इस·े ·िसी राजनेता पर विरोधी पार्टी या नेता ·िसी भी तरह ·ा वार ·रता है, तो दिग्गी राजा पलटवार ·र उस·ी बोलती बंद ·रने में पीछे नहीं रहते। तटस्थता से देखा जाए तो नज़र आता है ·ि मौनी बाबा ·े नाम से मशहूर रहे देश ·े भूतपूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव ·े बाद ·िसी ने मौन साधने में महारत हासिल ·ी है तो वे हैं वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। इन·े बारे में तो अब यहां त· ·हा जाने लगा है ·ि जब त· सुप्रीम ·ोर्ट डांट-फट·ार न ·रे तब त· मनमोहन अपना मौन भंग ·रने ·ी ज़हमत नहीं उठाते। सोनिया गांधी ·ी बात ·रें तो वे भी ज़्यादा ज़ुबानी जमा$खर्च ·रने में य·ीन नहीं रखतीं। ·ांग्रेस सर·ार ·े वरिष्ठ मंत्री ·पिल सिब्बल, पी. चिदमबरम त· ·िसी घपले-घोटाले ·ी बात छिड़ते ही मौन साध लेते हैं। ऐसे हालात में दिग्गी राजा ही विरोधियों ·ो ·ाबू में रखने ·ा ·ाम ·रते हैं। अब यह बात सा$फ हो चली है ·ि दिग्गी राजा ने ही सर·ार ·ा हर मोर्चे पर बचाव ·रने ·ी जि़म्मेदारी उठा रखी है। बाबा रामदेव ·े अनशन ·े मामले में जहां ए· ओर सर·ार ·े चार-चार ·ेन्द्रीय मंत्री बाबा ·े स्वागत में बिछे नज़र आए। हालां·ि, इस·े बाद भी वे अपने निहितार्थों में सफलीभूत न हो स·े और उन्हीं में से ए· ·ी जल्दबाजी ·े चलते ४ जून ·ो अनशन·ारियों पर पुलिस ·ार्रवाई ·ो अंजाम दिया गया और अब सुप्रीम ·ोर्ट ने इस·े लिए जवाब-तलब ·िया है। वहीं इससे इतर दिग्गी राजा ने डं·े ·ी चोट पर योग गुरु बाबा रामदेव ·ी ·ड़ी आलोचना ·ी, यहां त· ·ि बाबा ·ो ‘ठग’ त· ·हने ·ी हिम्मत दिखाई। हाल ही बाबा रामदेव ·े अनशन तोडऩे ·े बाद दिग्गी राजा यह ·हने से नहीं चू·े ·ि रामदेव ·ी ‘नौटं·ी’ समाप्त हो गई है। $गौरतलब यह भी है ·ि ऐसा नहीं है ·ि दिग्विजय सिंह ·ी तल्ख टिप्पणियां महज़ सुर्खियां बटोरने ·े लिए होती हैं। सच तो यह है ·ि ·ांग्रेस ·े दिग्गज नेताओं में शुमार ·िए जाने वाले दिग्गी राजा सरीखा दमखम अब पार्टी ·े अन्य नेताओं में ·म ही नज़र आता है, जो विरोध ·े वक्त, विपरीत हालात में भी पार्टी और सर·ार ·ो बचाने ·े लिए ढाल ·ी तरह खड़े नज़र आते हैं। जब-जब भी पार्टी पर आंच आई या विपक्ष ने ·ुछ $गलत ·िया तो उन्होंने टी·ा-टिप्पणी ·र उन्हें राजनीति ·ी शालीनता ·े दायरे में रखने वाली बातें (चाहे वे चुभने वाली ही क्यों न हों) बेझिझ· ·हीं। रामदेव ·े ४ जून ·े अनशन ·े दौरान देर रात पुलिस ·ार्रवाई ·ो भुनाने ·े चक्·र में भाजपा ने राजघाट पर ए· दिन ·ा अनशन ·िया। हद तो तब हो गई जब पार्टी ·ार्य·र्ताओं ·ा मनोबल बढ़ाने ·े नाम पर बीजेपी नेत्री सुषमा स्वराज ने जम·र ठुम·े लगाए और उसपर तुर्रा यह ·ि हम तो देशभक्ति गीत पर नाच रहे थे। $खैर, ह·ी·त ·ुछ भी हो, ले·िन जिन दर्श·ों ने सुषमा स्वराज ·ो जिस अंदाज़ में न्यूज़ चैनलों ·े ज़रिए अपने टीवी सैट्स पर लाइव नाचते देखा, उसे देख·र ऐसा लगाता तो नहीं था ·ि वे ‘मनोरंजन’ ·े लिए नहीं ‘मनोबल’ बढ़ाने ·े लिए नाच रहीं हैं। इस पर ·ड़ी आपत्ति जताते हुए दिग्विजय सिंह ने भाजपा ·े नेताओं से राजघाट पर महात्मा गाँधी ·ी समाधि ·ा अपमान ·रने ·े लिए नैति·ता ·े आधार पर त्यागपत्र देने त· आग्रह ·िया और भाजपा ·ो ‘नचनियों ·ी पार्टी’ घोषित ·र दिया। आज बीजेपी ·ी हालत देखें तो वह शीर्षविहीन नज़र आती है, अटलबिहारी वाजपेयी ·े बाद लाल·ृष्ण अडवाणी प्रधानमंत्री बनने ·ा सपना देखने लगे थे, ले·िन देखते ही देखते पार्टी ·े अन्य नेताओं ने उन्हें हाशिए पर ला दिया है।
भाजपा ·े अन्य नेताओं में भी आपसी खींचतान जारी है, ऐसे में पार्टी ·ा भविष्य अधर में है, इसी ·ो देखते हुए दिग्गी राजा बीजेपी पर ·ोई भी वार ·रने से चू·ते नहीं हैं। ·हने ·ो तो ·ांग्रेस पार्टी में दिग्गज नेताओं ·े नाम पर लंबी फेहरिस्त सहज ही बनाई जा स·ती है, ले·िन ·ोई भी ·ठोर ·दम लेने ·े वक्त या सर·ार पर ·ोई गंभीर आसन्न सं·ट ·े समय ·ांग्रेस भी शीर्षविहीन सरीखी ही नज़र आती है, क्यों·ि सर·ार से ·ोई $गलती होने पर उस·ा ठी·रा ·ोई भी अपने सिर नहीं फोडऩा चाहता, इसी तहर पार्टी में अनुशासन बनाए रखने और ·ठोर निर्णय लेने ·े वक्त भी सभी चुप्पी साध लेते हैं। ऐसे में ·ांग्रेस ·े तारणहार दिग्गी राजा ही पहल ·रते हैं और विरोधियों ·ो ·ाबू ·रने ·ा ·ाम ·रने ·े साथ ही पार्टी ·े अंदर भी अनुशासन ·ो ·ायम रखने ·े लिए पहल ·रते नज़र आते हैं। इस तरह से वर्तमान राजनीति· परिदृश्य ·ो देखते हुए ·हा जा स·ता है ·ि ·ांग्रेस पार्टी ·े लिए दिग्विजय सिंह आज भी तुरुप ·ा पत्ता साबित हो रहे हैं। और इस बात ·ो मानने में ·िसी ·ो ·ोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए ·ि अपनी घोषणा ·े अनुसार यदि १० साल बाद दिग्गी राजा चुनाव लड़ते हैं तो न ·ेवल वे अपने बूते चुनाव जीत·र मध्य प्रदेश ·े मुख्यमंत्री ·े पद ·ो सुशोभित ·रेंगे, वरन ·ेन्द्र ·ी राजनीति में ही दमदार भूमि·ा पर खरा उतरेंगे।




जि़ला भाजपा ·े वन मैन शो गौरीशं·र बिसेन
हृ रहीम खान
भरवेली (बालाघाट)। राज्य सर·ार में सह·ारिता एवं पी.एच.ई विभाग ·े मंत्री गौरीशं·र बिसेन जबसे प्रदेश मंत्री मण्डल में शामिल हुए उन्होंने अपनी ·ार्यप्रणाली से मीडिया में ज़्यादा से ज़्यादा जगह हासिल ·ी है साथ ही जि़ले ·ी राजनीति में भी उन्होंने अपने ·ार्यो से ए· नया परिवर्तन लाया और आयोजित होने वाले पार्टी ·े ·ार्य·्रम जिस भव्यता ·े साथ संपन्न होते है यह स्थितियां पहले ·भी जिले में नही देखी गई। यही ·ारण है ·ि उन·े बारे में ·हां जाता है ·ि बालाघाट जिला भारतीय जनता पार्टी में गौरीशं·र बिसेन, जिन्हें लोग प्यार से गौरी भाउ ·ह·र पु·ारते है ने जिले ·ी राजनीति ·ी दिशा बदल दी। इस वक्त वह पार्टी में वन मेन शो है। प्रदेश सर·ार ·ा प्रत्य· $फैसला चाहे वह ·लेक्टर ·ा तबादला हो एस.पी. ·ा या पार्टी से जुड़ा ·ोई भी निर्णय उसे तब त· हरी झण्डी नहीं मिलती जब त· ·ि उसे गौरी भाउ ओ·े न ·र दें। म.प्र. ·े मुख्यमंत्री शिवराज सिंह प्रदेश भर ·ा भ्रमण ·रते हैं, वहां उन·ा स्वागत सत्·ार भी होता है। परंतु जो भव्यता और ए· अलग तरह ·ा रोमांच बालाघाट जि़ले ·े भ्रमण में देखने ·ो मिलता है, वह अन्य प्रदेशों में नहीं। बेहद सहज भाव ·े साथ सह·ारिता मंत्री एवं पी.एच.ई. विभाग ·े मंत्री ·े रूप में अपनी उपलब्धियों ·ो गिनाने वाले गौरीभाउ ने विगत ए· माह ·े अंतराल में तपती धूप में गांव-गांव घूम·र जिले ·ी राजनीति में नई हलचल पैदा ·र दी है। गर्मी ·ी उमस में जब घर बैठना पंसद ·रते तब गौरीभाउ अपने ·ार्य·र्ताओं ·े साथ अधि·ारियों ·ी टोली ले·र ग्रामीण क्षेत्रों ·े चप्पे-चप्पे में घूम·र ए· तरह से जनता ·ी अदालत लगा रहे हैं और लोगो ·ी समस्याएं सुन·र उसे तत्·ाल समाधान ·रने ·ी ओर भी पहल ·र रहे हैं। इस स·्रियता ·े संबंध जब उनसे ·हां गया तो उन·ा उत्तर था, उन·े ·ार्य·ाल ·ो ढाई वर्ष हो चु·े है, इस अंतराल में हमने अपने ·ामों से जनता ·े दिल में ·ितनी जगह बनाई उन·ी समस्याओं ·ो ·ितना निरा·रण ·िया और ·ौन सी समस्या है, जिन·ा समाधान बा·ी है। साथ ही लोग हमारे और सर·ार ·े बारे में क्या सोच रहे हैं, इस·ा आ·लन ·रने ·े दृष्टि·ोण से ही यह सघन जनसंपर्· अभियान चलाया जा रहा है।
यह सब ·ार्य प्रदेश ·े मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ·े मार्गदर्शन में ·िया जा रहा है। ·ारण यह है ·ि जनता से जुड़े जितने बड़े ·ार्य अतीत में रही सर·ारों ने नहीं ·िये वह वर्तमान प्रदेश सर·ार ·र रही है। गौरीभाउ इस जनसंपर्· अभियान में अधि·ारियों ·ो फट·ारने में भी ·हीं पीछे नहीं है। साथ ही पुलिस से जुड़ी समस्याओं पर वह दो टू· उत्तर देते हैं, ·ि यदि पुलिस ·र्मचारी या अधि·ारी अपनी ·ार्यप्रणाली में सुधार नहीं ·रते, तो उन्हें तबादले ·े लिये तैयार रहना चाहिये। 18 दिवसीय विदेश यात्रा में 11 देशो ·े भ्रमण पर उन्होंने जो अनुभव प्राप्त ·िया उस·ो अमली जामा पहनाने ·े प्रयास भी वह मप्र में ·रना चाहते हैं, और इस बात ·ा विश्वास है ·ि आने वाले वर्षों में हेण्डपंप जैसी सुविधाओं से बेहतर सुविधा वह जनता ·ो उपलब्ध ·राएंगे। उन्होंने महसूस ·िया ·ि परिवार नियोजन ·ार्य·्रम ·ो शक्ति ·े साथ अमल में लाना चाहिये। बढ़ती जनसंख्या हमारे लिये निश्चित रूप से चिंता ·ा विषय है। विदेशी भ्रमण में उन्होंने महसूस ·िया ·म आबादी बेहतर वि·ास ·ा रास्ता प्रशस्त ·रती है। ढाई वर्ष ·े मंत्री·ाल में सफलता ·े साथ विवादों ·ा भी सामना उन्हें ·रना पड़ा, जिस·े चलते ·ुछ समय उन्हें खामोश रह·र विभागीय ·ार्यो में बिताना पड़ा। परन्तु ए· बार फिर जनता ·े बीच उन·ी स·्रियता इस बात ·ी ओर सं·ेत ·र रही है ·ि आने वाले चुनावों में वह ·िसी बड़े राजनीति· लक्ष्य ·ो प्राप्त ·रने ·ी ओर ·ार्य ·र रहे हैं। संभव है ·ि प्रदेश ·ी राजनीति में ·ुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं, उस·ा असर उन·े क्षेत्र या जिले में ना पड़े उस·े पहले ही वह अपनी ज़मीन मज़बूत रखना चाहते हैं। साथ ही बहुमुखी राजनीति· प्रतिभा ·ी धनी पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष उन·ी पत्नी श्रीमती रेखा बिसेन ·े लिए भी वह सुरक्षित चुनाव क्षेत्र ·ा आ·लन ·रने में लगे है। फिलहाल उन·ी स·्रियता यही ·ुछ अप्रत्यक्ष राजनीति· संदेश दे रही है।

Saturday, June 11, 2011






योग 'गुरुÓ राजनीति में है 'गुरु-घंटालÓ

कुल मिलाकर देखा जाए तो योग की दुनिया के दिग्गज गुरु स्वामी रामदेव राजनेताओं से गच्चा खा ही बैठे। उन्हें राजनीति में आना है तो उनका स्वागत है, लेकिन उन्हें
इससे पहले राजनीति के खेल को समझने के लिए किसी राजनीतिक गुरु की शरण लेकर राजनीति की एबीसीडी से शुरू करना होगा, तब जाकर उनकी मांगें और राजनीति में नाम कमाने का उनका सपना साकार हो सकेगा। बहरहाल गलतियां दोनो ओर से की गई हैं किसी एक पक्ष पर ही सारा दोष मढ़ देना सही नहीं है। हां, लोकतांत्रिक देश का नागरिक होने के नाते इतना ज़रूर कहना होगा कि 4 जून के दोषियों को कठोर से कठोर सज़ा दी जाए ताकि फिर से मानवता को शर्मसार करने की कोई दुर्घटना न हो। रामदेव को भी यह समझना होगा कि जनता जिसके साथ होती है, सत्ता उसी के हाथ में सौंपती है, इसके लिए अभी उन्हें राजनीति के दांव-पेंच को सीखने के साथ ही इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसी निडरता से काम लेना होगा। राजनीति में मुसीबत से भागने वाला नहीं, बल्कि मुसीबत का सामना करते करते प्राण-गंवाने वाले को ही सच्चा नेता माना जाता है। एक वाक्य में कहें तो, योग गुरू राजनीति में गुरु-घंटाल ही साबित हुए हैं। हृ जैनेन्द्र कुमार
$िफलवक्त योग गुरु बाबा रामदेव के सत्याग्रह के दौरान यानी 4 जून 2011 की देर रात को दिल्ली पुलिस की कार्रवाई देशभर में बहस का विषय बन गई है। जितने मुंह उतनी बातें, केन्द्र सरकार बाबा रामदेव को $गलत बताती है तो बाबा रामदेव केन्द्र सरकार को वादा $िखला$फी का दोषी मानते हैं। कुल मिलाकर पूरा देश दो धड़ों में बंटा नज़र आता है एक बाबा रामदेव के साथ है तो दूसरा केन्द्र सरकार के साथ, लेकिन सिलसिलेवार दोनों पक्षों पर नज़र डालें तो एक अलग ही तस्वीर नजर आती है केन्द्र सरकार और बाबा रामदेव दोनों ने ही $गल्तियां की हैं, कोई भी दूध का धुला हुआ नहीं है। सभी पक्षों पर नज़र डालती खोज परक रपट:-
योग गुरु बाबा रामदेव की ओर से की गई गलतियां
पहली- भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की ओर से 1 जून 2011 से 20 दिन तक के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में 5,000 लोगों की मौजूदगी में योग शिविर चलाने की अनुमति ली गई थी, लेकिन इससे इतर 3 जून की मध्यरात्रि तक ही रामलीला मैदान में 25,000 से ज्यादा लोग रामलीला मैदान में आ गए थे और 4 जून की बात करें तो यह संख्या लगभग 50,000 के करीब तक पहुंच गई थी। बाबा राम देव की ओर से की गई पहली चूक यह थी कि जब उन्हें इस बात का अंदाजा था कि देशभर में उनके लाखों भक्त-समर्थक हैं फिर क्यों उनके संरक्षण में चल रहे ट्रस्ट की ओर से महज 5,000 आदमियों के लिए अनुमति ली गई, क्या वे सरकार को धोखा देने के पक्ष में थे, क्या उनकी नीयत में खोट था।
दूसरी- $खास बात यह है कि भ्रष्टाचार व विदेशों में जमा भारतीयों के कालेधन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर उसे वापस देश में लाने। विदेशी भाषा में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों को भारतीय भाषाओं में पढ़ाने व भ्रष्टाचारियों को फांसी की सज़ा देने का प्रावधान किए जाने जैसी मांगों को लेकर सत्याग्रह करने का जब बाबा रामदेव पहले से ही ऐलान कर चुके थे, तब उनके ट्रस्ट ने दिल्ली के रामलीला मैदान पर सत्याग्रह करने की अनुमति लेने के बजाय, योग शिविर चलाए जाने की अनुमति क्यों ली? यह भी लाख टके का सवाल है जब आप सच्चाई की राह पर हैं और न्याय के लिए लड़ रहे हैं तो ऐसी लड़ाई डंके की चोट पर सा$फ नीयत से लडऩे के बजाय चोरी-छिपे या छल-कपट के सहारे लडऩे की कोशिश क्यों की गई?
तीसरी- सरकार ने जब 4 जून को रामलीला मैदान का जायज़ा लिया तो पाया कि वहां 5,000 से दस गुना ज़्यादा नागरिक एकत्र हैं और योग शिविर की अनुमति लेकर सत्याग्रह चलया जा रहा है। सरकार ने यह भी महसूस किया कि अगले दिन यानी 5 जून 2011 को उनके साथ प्रसिद्ध गाँधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे भी अपने समर्थकों के साथ शामिल हो सकते हैं, तब हालात हर हाल में काबू से बाहर हो जाएंगे और उसे किसी तरह से भी काबू कर पाना संभव नहीं होगा, तब तुरंत प्रभाव से प्रशासन की ओर से 4 जून की देर रात को ही ट्रस्ट को दी गई अनुमति रद्द कर दी गई। जब अनुमति रद्द करने के पत्र को लेकर सरकार के कारिंदे बाबा रामदेव के पास पहुंचे और उन्हें वह पत्र देना चाहा, तो बाबा और उनके समर्थकों ने पत्र लेने से इंकार कर दिया, इतना ही नहीं उन्होंने सरकार को ललकारते हुए कहा, कि हम किसी की नहीं सुनने वाले, सरकार से जो हो सके वह कर ले। जब सरकार ने भारत स्वाभिमान ट्रस्ट को योग शिविर के लिए अनुमति पत्र दिया तब तो उसने झट से ले लिया और अनुमति रद्द पत्र देना चाहा तो उसका सुर बदला नजर आया। क्या यह व्यवहार किसी सच्चे सत्याग्रही और उसके समर्थकों अथवा बाबा रामदेव और उनके अनुयायियों की गरिमा के अनुकूल था। कदाचित नहीं, बल्कि यही ऐसा कदम था जिसने सरकार को इस बात के लिए न केवल उकसाया, बल्कि मजबूर कर दिया कि वह सरकार और प्रशासन के आदेश को ठेंगा दिखाने वाली अभद्र जनता को काबू करने के लिए कठोर कदम उठाए।
चौथी- जब दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी बाबा रामदेव को गिर$फ्तार करने गए तो उन्होंने भीड़ को शांत रहने की बात तो कही लेकिन उन्होंने महात्मा गाँधी सरीखे सत्याग्रही की भाँति शांतिपूर्ण तरीके से गिर$फ्तारी देने के बजाय छद्म रूप धर पुलिस प्रशासन को चकमा देने की कोशिश की। वे मंच से देखते ही देखते कूद गए और भीड़ में घंटों छिपे रहे। करीब तीन घंटे तक रात में बाबा के समर्थकों को लगा कि बाबा को पुलिस ने गिर$फ्तार कर लिया है और वह उनके योग गुरु को किसी भी प्रकार की हानि पहुंचा सकती है, जबकि दूसरी तरफ पुलिस की पकड़ से बाबा रामदेव बाहर थे, पुलिस समझ गई थी कि लोग $गलत समझ रहे हैं और उन्हें लग रहा है कि पुलिस ने बाबा को पकड़ लिया है और वह उनके समर्थकों से झूठ बोल रही हैं। इस $गलतफहमी के कारण ही बाबा के कुछ समर्थक भाव आवेश में आकर पत्थर फेंकने लगे। फिर जैसा कि होता है एक हल्की सी आक्रोश की चिंगारी देखते ही देखते हिंसक बेकाबू भीड़ में तब्दील हो गई। आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि करीब आधा लाख लोग महज़ डेढ़ हज़ार पुलिसकर्मियों पर पत्थर बरसाने लगें तो हालात कैसे होंगे। यह वह स्थिति थी जिसमें मजबूरन हालात काबू में करने के लिए न चाहते हुए भी पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा। पचास हज़ार लोगों की आक्रोशित भीड़ के मुकाबले डेढ़ हज़ार पुलिसकर्मी क्या हैसियत रखते हैं, यह सहज ही समझा जा सकता है इसलिए हालात काबू करने के लिए सीआपीए$फ के जवान और रैपिड एक्शन $फोर्स के जवानों को भी रामलीला मैदान पर बुलाना पड़ा। तब करीब तीन घंटे लाठीचार्ज के बाद बेकाबू भीड़ को नियंत्रित किया गया। इस दौरान सैकड़ों बेगुनाह घायल हुए, तो हज़ारों को मामूली चोटें आईं। घायलों को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। यह सबसे बड़ी बाबा रामदेव की ओर से की गई $गलती थी, कि वे महिला का सलवार सूट पहन कर दीवार के सहारे छिप कर बैठे रहे और उनके बुलावे पर अपना घर-परिवार छोड़कर आए उनके भक्त लाठियों से पिटते रहे, वहीं पुलिसकर्मी पत्थरों का सामना करते रहे। और यह सब हुआ $गलत$फहमी के कारण। अगर बाबा रामदेव चाहते तो इन सब हालात से बचा जा सकता था, जब भीड़ को यह गलत$फहमी हुई कि पुलिस ने बाबा को पकड़ लिया है, और पत्थरबाज़ी शुरू हुई, तभी वे सामने आ जाते, तो मामाला सा$फ हो जाता कि बाबा गिर$फ्तार नहीं हुए हैं, और वे शांति की अपील करते तो भीड़-जिसमें ज़्यादातर उनके भक्त ही थे शांत हो जाते और लाठी चार्ज की नौबत ही न आती। यह कहां की बाबागीरी है या सत्याग्रह है कि जिस बाबा पर यकीन कर अपने घर-परिवार को छोड़कर आए लोग पिटते रहे, वही बाबा महिला के कपड़ों में उनके आसपास ही छिपा रहा और हद तो तब हो गई जब तीन घंटे बाद मामला कुछ ठंडा पडऩे पर उन्होंने अपनी महिला साथियों के साथ पुलिस की आंख में धूल झोंककर भागने की कोशिश की, हालांकि वे इस कोशिश में नाकम रहे और दिल्ली पुलिस ने उन्हें गिर$फ्तार कर लिया। यह भी गौरतलब है कि पुलिस सबसे पहले बाबा के मंच पर गई थी, उसी समय बाबा गिरफ्तारी दे देते, तो किसी प्रकार की गलत$फहमी नहीं फैलती, न जनाक्रोश फैलता, न इतनी हिंसा का नंगा नाच होता। ईमानदारी से देखा जाए तो इस सब के लिए परोक्ष रूप से बाबा रामदेव स्वयं भी जि़म्मेदार हैं।
पांचवीं- बाबा रामदेव ने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस रामलीला मैदान में उनकी हत्या करने और लाशें बिछाने के इरादे से आई थी, तब सवाल यह उठता है कि अगर वह इसी इरादे से आई थी और 4 जून को देर रात 2:00 से 4:00 बजे के बीच दिल्ली पुलिस, रैपिड एक्शन $फोर्स और सीआरपीएफ की संयुक्त कार्रवाई के दौरान उसने भीड़ पर पूरी तरह से काबू पा लिया था, तो उसने समर्थकों की लाशें क्यों नहीं बिछाईं और बाबा रामदेव को भी गिर$फ्तार कर लिया, तो उन्हें मारने के बजाय ससम्मान उनके हरिद्वार आश्रम में क्यों छोड़ आई? बाबा रामदेव का यह आरोप कि पुलिस उनको मारने के इरादे से आई थी, सरासर गलत और मिथ्यावचन हैं, क्योंकि बाबा रामदेव पब्लिक फिगर हैं, उनकी गिनती देश के हाई प्रो$फाइल योग गुरुओं में होती है, उनसे आम आदमी ही नहीं, नामी, रसूखदार, धनी और राजनेता तक आशीर्वाद लेने और योग के गुर सीखने जाते हैं, ऐसे में सरकार उन्हें किसी भी तरह की चोट पहुंचा कर क्यों अपने ही गले में घंटी बांधने का काम करेगी? यह बात गले नहीं उतरती।
छठी- बाबा रामदेव कहने को भ्रष्टाचार व विदेशों में जमा भारतीयों के कालेधन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर उसे वापस देश में लाने। विदेशी भाषा में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों को भारतीय भाषाओं में पढ़ाने व भ्रष्टाचारियों को फांसी की सज़ा देने का प्रावधान किए जाने जैसी गंभीर मांगों को लेकर सत्याग्रह कर रहे हैं, लेकिन वक्त-वेवक्त उनका मज़ाकिया अंदाज़ इस बात का परिचायक है, कि वे सही मायने में अभी इन मुद्दों और सत्याग्रह के प्रति न तो पूर्ण रूप से गंभीर हैं, न ही समर्पित।
सातवीं- सत्याग्रह के दौरान एक ही मंच से साध्वी ऋतम्भरा और अन्य साम्प्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर उन्होंने सत्याग्रह को रातनीति और साम्प्रदायिकता के रंग में रगने दिया, चाहिए तो था कि वे भी अन्ना हज़ारे की तरह किसी भी राजनीतिक या साम्प्रदायिक ताकत से हाथ मिलाने के बजाय अपने बूते और आम जनता के बूते अपनी मांगे मंगवाने के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ नज़र आते।
आठवीं- अन्ना हज़ारे ने बाबा रामदेव को सत्याग्रह शुरू करने से पहले ही आगाह किया था कि वे केन्द्र सरकार के नेताओं से सावधान रहें, लेकिन उन्होंने अन्ना हजारे की बात पर ध्यान नहीं दिया, और कांग्रेस सरकार के चार दिग्गज मंत्रियों के कहे-सुने में आकर पत्र लिख दिया और बाद में उन्हें पछतावे के सिवाय कुछ नहीं मिला। आम आदमी भी यह जानता है कि अगर एक तर$फ अन्ना हज़ारे सरीखा समाजसेवी हो और दूसरी ओर सरकार के घाघ मंत्री तो किस पर यकीन किया जाए, लेकिन बाबा रामदेव तो आम आदमी से भी अनाड़ी निकले और आ$िखरकार राजनीति के भंवर में फंस ही गए।
नवीं- बाबा रामदेव ने महिला के कपड़े पहनने पर सफाई दी कि शिवाजी ने भी औरंगजेब से बचने के लिए ऐसा किया था, लेकिन वैसे हालात 4 जून की रात को नहीं थे और वे अपने ही वेश में रहते तब भी उनकी जान को किसी तरह का कोई $खतरा नहीं था, उनके 4 जून की रात को किए गए व्यवहार से साफ हो जाता है कि भले ही वे योग की दुनिया के बेताज बादशाह हों, लेकिन राजनीति में वे सि$फर ही हैं।
दसवीं- बाबा रामदेव ने बार-बार आरोप लगाया कि सारी कार्रवाई के पीछे सोनिया गाँधी का हाथ है, मनमोहन सिंह का हाथ है। उन्होंने यह भी कहा कि सोनिया गाँधी विदेशी मूल की होकर राजनीति में हो सकती हैं, तो वे क्यों नहीं हो सकते। सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के मुद्दे को तूल देना बाबा को शोभा नहीं देता, क्योंकि अगर बाबा पूरी दुनिया के भक्तों से भेंट-चढ़ावा ले सकते हैं, तो उन्हें एक विदेशी से इस कदर परहेज़ क्यों है।
ग्यारहवीं- 7 जून को देर रात एक टीवी न्यूज़ चैनल के हवाले से बाबा रामदेव ने कहा कि वह दिल्ली सरकार को मा$फ करते हैं। सवाल उठता है कि जो सरकार महज़ चार दिन पहले जिस बाबा रामदेव और उनके समर्थकों की खून की प्यासी थी, उसे बाबा रामदेव ने इतनी आसानी से मा$फ कैसे कर दिया।
कांग्रेस सरकार की ओर से की गई गलतियां
पहली- सरकार की इस मामले में सबसे ज़्यादा भद्द इसी वजह से पिटी है कि उसने आधी रात को शांतिप्रिय ढंग से अनशन करने की मंशा से आए बाबा और उनके समर्थकों को डरा-धमका कर भगा दिया।
दूसरी- बाबा रामदेव के मंच से $गायब होने के बाद भीड़ जब नेतृत्वविहीन हो गई तो उसपर लाठीचार्ज करने की क्या तुक है। कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि महिलाओं के कपड़े फाड़ कर और लघुशंका के लिए गई महिलाओं को महिला शौचालय से खींच-खींच कर बाहर लाया गया। ऐसा कर दिल्ली पुलिस किस तरह की वीरता दिखाना चाहती थी।
तीसरी- जब सत्याग्रह में आए समर्थक हाथ जोड़ रहे थे, तब पुलिस को लाठियां भांजने या उन्हें डराने-धमकाने की क्या मजबूरी आ पड़ी।
चौथी- इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों के कैमरे क्यों बंद करवाए गए और न मानने पर उनके भी हाथ-पैर तोडऩे की धमकी क्यों दी गई। मीडियाकर्मियों से दुव्र्यवहार क्यों किया गया? मीडिया कर्मियों के कैमरे बंद क्यों करवाए गए, क्या पुलिसकर्मी, रैपिड एक्शन $फोर्स और सीआरपीए$फ के जवान कुछ ऐसा कर रहे थे जो मानवता को शर्मसार करने वाला था, बर्बर था, अमानुषिक था, जिसके दिखाए जाने पर जनता भड़क सकती थी, या सरकार के नुमांइदों की पोल खुलने का डर था।
पांचवां- बाबा रामदेव के दिल्ली पहुंचने पर सरकारी प्रोटोकॉल की अनदेखी करते हुए एक नहीं चार चार कैबिनेट मंत्री उनकी अगुवानी के लिए गए। उन्हें इतना वेटेज क्यों दिया गया। क्या इस सबके पीछे बाबा रामदेव को प्रसन्न कर सत्याग्रह न करने के लिए उन्हें मनाना था। इसी के तहत बाबा रामदेव और चारों कैबिनेट मंत्रियों की ओर से कई बार चर्चाओं के दौर चले और जब बात नहीं बनी, तो जैसा कि कहा जा रहा है, कपिल सिब्बल ने बदले की कार्रवाई का मन बना लिया। जिस बाबा रामदेव के स्वागत में चार कैबिनेट मंत्रियों ने पलक-पांवड़े बिछाए, बात बिगडऩे पर उन्हीं बाबा और उनके समर्थकों को सरकार की ताकत दिखाने में सरकार ने देर नहीं की। देर रात को ही योग शिविर की अनुमति रद्द कर दी गई, और कानून के डंडे निरीह लोगों पर बरसाए गए। महिला, बच्चों, बीमारों और वृद्धों तक को नहीं छोड़ा गया।
छठी- बाबा रामदेव के सत्याग्रह से पहले ही सरकार के वरिष्ठ मंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा कि बाबा ठग है। इसके पास काला धन है। अगर ऐसा ही था तो सरकार ने अब तक ऐसे (अपराधी) के $िखला$फ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। ऐसे बाबा के स्वागत के लिए सरकार ने चार वरिष्ठ मंत्रियों को क्यों भेजा गया?
सातवीं- सत्याग्रह से पहले दिग्विजय सिंह ने कहा था कि हम बाबा रामदेव से डरते नहीं हैं, इसीलिए हमने उन्हें गिर$फ्तार नहीं किया है। अगर हम बाबा रामदेव की ताकत से डरते तो कब का उन्हें पकड़ कर बंद कर दिया होता, फिर 4 जून को क्या सरकार बाबा रामदेव से डर गई थी कि उन्हें गिर$फ्तार करने के लिए रामलीला मैदान पहुंच गई। और फिर देखते ही देखते इतना डरी कि पुलिसकर्मियों से साथ ही उसे सीआपीएफ और आरएएफ को भी बुलाना पड़ा। आंसू गैस के गोले दागने पड़े। लाठी चार्ज करना पड़ा।
आठवीं- कुछ महीने पहले ही हुए गुर्जर आंदोलन के दौरान आरक्षण की मांग को लेकर ट्रेन की पटरियों पर कब्ज़ा कर लिया गया, सड़क मार्ग अवरुद्ध कर दिए गए, लाखों लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा, करोड़ों रुपए की सार्वजनिक सम्पत्ति का नुकसान किया गया। सैकड़ों व्यापारियों को रोज़ाना लाखों-करोड़ों का नुकसान सहना पड़ा। एक पुलिस चौकी तक आग के हवाले कर दी गई। इतना सब होने के बाद भी इसी कांग्रेस सरकार ने आंदोलनकारियों के $िखला$फ कोई कठोर कदम नहीं उठाया। इसके उलट बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के दिल्ली के रामलीला मैदान पर शांतिपूर्ण सत्याग्रह करने से किसी को कोई परेशानी नहीं हुई। आम जनता की बात की जाए तो उसे परेशानी तो दूर वह तो इस बात से $खुश थी, कि कोई तो है जो अन्ना हज़ारे के बाद भ्रटाचार के खात्मे, काले धन को देश में लाने के बारे में गंभीर है, और न्याय के लिए लड़ रहा है। इससे बावजूद कांग्रेस सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से आपतकाल सरीखी कार्रवाई की गई। इतनी स$ख्त कार्रवाई की गई और आम जनता से इतनी बर्बरता से पुलिस प्रशासन पेश आया कि सुप्रीम कोर्ट को जवाब तलब करना पड़ा है। यह दिखाता है कि कांग्रेस भी दोहरे मापदंड और पूर्वग्रह की शिकार है।
नवीं- सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मनमोहन सिंह ने कहा कि सरकार के पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था, क्या प्रधानमंत्रीजी आम आदमी को यह बताने का कष्ट करेंगे कि आ$िखर ऐसा उनकी क्या मजबूरी थी, कि उनके पास और कोई रास्ता ही नहीं रहा।
कुल मिलाकर देखा जाए तो योग की दुनिया के दिग्गज गुरु स्वामी रामदेव राजनेताओं से गच्चा खा ही बैठे। उन्हें राजनीति में आना है तो उनका स्वागत है, लेकिन उन्हें इससे पहले राजनीति के खेल को समझने के लिए किसी राजनीतिक गुरु की शरण लेकर राजनीति की एबीसीडी से शुरू करना होगा, तब जाकर उनकी मांगें और राजनीति में नाम कमाने का उनका सपना साकार हो सकेगा। बहरहाल गलतियां दोनो ओर से की गई हैं किसी एक पक्ष पर ही सार दोष मढ़ देना सही नहीं है। हां, लोकतांत्रिक देश का नागरिक होने के नाते इतना ज़रूर कहना होगा कि 4 जून के दोषियों को कठोर से कठोर सज़ा दी जाए ताकि फिर से मानवता को शर्मसार करने की कोई दुर्घटना न हो। रामदेव को भी यह समझना होगा कि जनता जिसके साथ होती है, सत्ता उसी के हाथ में सौंपती है, इसके लिए अभी उन्हें राजनीति के दांव-पेंच को सीखने के साथ ही इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसी निडरता से काम लेना होगा। राजनीति में मुसीबत से भागने वाला नहीं, बल्कि मुसीबत का सामना करते करते प्राण-गंवाने वाले को ही सच्चा नेता माना जाता है। एक वाक्य में कहें तो, योग गुरू राजनीति में गुरु-घंटाल ही साबित हुए।




उमा भारती का वनवास $खत्म
उत्तर प्रदेश में करेंगीं पार्टी को मजबूत

नई दिल्ली।
मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की बीजेपी में वापसी हो गई है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने आज इस संबंध में घोषणा की। भारती 2005 में पार्टी से बाहर हो गई थीं। उन्हें उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी अध्यक्ष ने साफ कर दिया कि उनका कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश रहेगा और वे लखनऊ में अधिकांश समय देंगीं।
भारती ने कर्नाटक के हुबली के ईदगाह मैदान पर तिरंगा फहराने के एक आंदोलन में हिस्सा लिया था और उसी मुद्दे पर उनके $िखला$फ गिर$फ्तारी वारंट निकला था। वे उस समय मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री थीं, और वारंट के कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। पार्टी ने वरिष्ठ नेता बाबूलाल गौर को कमान सौंप दी थी।
इसके बाद पार्टी और उमा के बीच मतभेद बढ़ते गए और अंतत: पार्टी ने उमा को बाहर का रास्ता दिखा दिया।उसके बाद उमा भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी बनाई लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। अब वे फिर पार्टी में वापस आ गई हैं।
पार्टी अध्यक्ष गडकरी ने कहा कि उमा भारती ने पार्टी में शामिल होने की इच्छा जताई और इसके बाद उन्होंने पार्टी नेताओं से चर्चा की। भारती की संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पार्टी छोडऩे के पहले उमा के सुषमा स्वराज से विवाद पर उन्होंने कहा कि वह इतिहास है। उन्होंने सा$फ किया कि मध्य प्रदेश के नेताओं सहित सभी बड़े नेताओं से उनकी चर्चा हुई है और इसी के बाद यह निर्णय लिया गया।
उमा भारती ने कहा कि वे पिछले पांच साल भूलना चाहती हैं। वे उत्तर प्रदेश के अलावा गंगा नदी को साफ करने के भी अभियान में हिस्सा लेंगीं। उन्होंने कहा कि बीजेपी से अलग होकर भी उन्होंने विचारों से कभी भी समझौता नहीं किया।
इसी बीच भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि बीती बातें भूलकर, आगे की सुध लें। उमाजी का महत्व है तभी पार्टी ने उन्हें वापस लिया है। वे उन्हें घर जाकर बधाई देंगे।
उन्होंने बताया कि पार्टी ने सबकी सहमति से निर्णय लिया है, मुझसे भी बात की गई थी। उनसे पूछा गया कि क्या पार्टी अब भी 2013 का विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ेगी, शिवराज ने कहा कि मुझे पार्टी जो काम देती है, मैं वो करता हूं।
यूपी के महाभारत में उमा की एंट्री
तेज़ तर्रार महिला नेता उमा भारती की भारतीय जनता पार्टी में वापसी हो गई। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मंगलवार 14 जून को इसका औपचारिक ऐलान किया। उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा गया है। इसके साथ ही यह तय हो गया कि उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभी चुनाव में उमा भारती भाजपा की स्टार प्रचारक होंगी।
प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए नितिन गडकरी ने कहा कि उमा भारती पार्टी की तेज़ तर्रार नेता रही हैं। उन्होंने इच्छा जताई थी कि मेरी श्रद्धा इस पार्टी के साथ है और मैं दोबारा से पार्टी के लिए काम करना चाहती हूं। उनकी इस इच्छा का सम्मान करते हुए हमने उन्हें पार्टी में दोबारा लेने का फैसला किया है। नितिन गडकरी ने कहा कि उत्तर प्रदेश उनका कर्मक्षेत्र होगा और वह राज्य में मुख्य रूप से प्रचार का काम करेंगी। उन्होंने कहा कि पार्टी में आने से पहले ही वह हमारी पवित्र नदी गंगा बचाओ आंदोलन में शिरकत कर रही हैं। हमारी पार्टी की देश की सांस्कृतिक विरासत की रक्षा में पूरा विश्वास रहा है, और हमारी पार्टी इसके लिए उनके साथ लड़ेगी। पत्रकारों को संबोधित करते हुए उमा भारती ने कहा कि मेरे राजनीतिक जीवन की शुरुआत ही इस पार्टी से हुई। 15-20 सालों तक इस पार्टी में जुड़े रहने के बाद कुछ अप्रिय घटनाओं के कारण मैं पिछले पांच-छह सालों तक पार्टी से अलग रही, लेकिन इस दौरान भी मेरी विचारधारा पार्टी के साथ ही रही। उन्होंने कहा कि मुझे लगा कि अगर मुझे देश के लिए कुछ करना है, तो इसी पार्टी में रहकर कर सकती हूं। उन्होंने पार्टी में अपनी वापसी पर प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए कहा कि मेरी कोशिश रहेगी कि मैं पार्टी की सेवा तन्मयता से कर सकूं। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश गांवों का एवं राम का राज्य है। वहां राम राज्य लाने के लिए मैं पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलकर काम करूंगी। उन्होंने पार्टी के अधिकारियों और अध्यक्ष गडकरी को धन्यवाद दिया।
गौरतलब है कि उमा भारती ने सोमवार को इस बाबत संकेत दिए थे। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा था कि देश को ईमानदार नेता की ज़रूरत है और मैं ईमानदार हूं। राजनीति उनका कर्मक्षेत्र है।
उल्लेखनीय है कि नवंबर 2004 को भाजपा मुख्यालय में एक मीटिंग के दौरान उमा भारती ने ब$गावती तेवर दिखाते हुए लालकृष्ण आडवाणी पर खुला हमला बोल किया था, जिसके बाद 2005 में उन्हें भाजपा से निष्कासित कर दिया गया था। उमा भारती पिछले का$फी समय से उत्तर प्रदेश में गंगा बचाओ आंदोलन में शिरकत कर रही हैं। इस बात के कयास पहले से ही लगाए जा रहे थे कि उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी उमा भारती की पार्टी में वापसी का ऐलान कर देगी।

Friday, June 3, 2011









साधना, सुषमा और शिवराज का दांवहृ




विनोद उपाध्याय




भाजपा की बड़ी दीदी यानी सुषमा स्वराज का वर्तमान रेड्डी बंधुओं के कारण विवादों में फंसा हुआ है। यह विवाद क्या गुल खिलाएगा यह तो कुछ दिनों में पता चल ही जाएगा लेकिन उनके लिए सबसे चिन्तादायक $खबर यह है कि उनका भविष्य अधर में लटकने वाला है। भाजपा से प्रधानमंत्री पद की संभावित दावेदारों में से एक लोकसभा की नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज को भी इसका आभास हो गया है। उन्हें यह $खतरा दिख रहा है, उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की धर्मपत्नी साधना सिंह से।यायावर राजनेता रहीं सुषमा स्वराज को लगभग ढाई दशक बाद विदिशा संसदीय क्षेत्र के रूप में एक सुरक्षित ठिकाना मिला है। हरियाणा विधानसभा से 1977 में शुरू हुआ उनका राजनीतिक स$फर, अंबाला कैंट, करनाल, दिल्ली, बेल्लारी और उत्तराखंड होते हुए मप्र आकर विराम ले रहा है। श्रीमती स्वराज अब $खुद को मध्यप्रदेश निवासी साबित करने के साथ हमेशा उस विदिशा से ही जुड़े रहना चाहती हैं, जो भाजपा के लिए देश में सर्वाधिक सुरक्षित दो संसदीय क्षेत्रों में से एक है।शिवराज को विदिशा इतना प्यारा है कि उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद यहां से पार्टी की वरुण गांधी को लोकसभा भेजने की इच्छा को भी मान्य नहीं किया। वरुण की काट के तौर पर क्षेत्र की जनता ने मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी साधना सिंह का नाम आगे बढ़ाया। समझौता मुख्यमंत्री के $खास मित्र रामपाल सिंह के नाम पर हुआ, जिन्हें मंत्री पद से इस्ती$फा दिला कर शिवराज ने लोकसभा भेजा, तो केवल इसलिए कि विदिशा पर उनकी विरासत बरकरार रहे। उनके इसी विदिशा पर सुषमा की नज़र गड़ गई। हरियाणा में दो बार विधायक रहीं सुषमा स्वराज अपने गृह प्रांत में लोकसभा का एक भी चुनाव नहीं जीत पाईं। उन्होंने करनाल से 1980, 1984 और 1989 में लगातार तीन लोकसभा चुनाव लड़े और तीनों में पराजय हाथ लगी। ओजस्वी वक्ता और महिला होने के नाते भाजपा को उनकी संसद में ज़रूरत थी, तो उन्हें 1990 में राज्यसभा भेज दिया गया। इसके बाद हरियाणा के बजाए दिल्ली उनका मुकाम हो गया और उन्हें 1990 में राज्यसभा भेज दिया गया और उन्होंने 1996 तथा 1998 के चुनाव दक्षिण दिल्ली से लड़े। वे लगभग तीन माह दिल्ली की मुख्यमंत्री भी रहीं, लेकिन वहां के विधानसभा चुनाव में अपनी सरकार न बनवा पाईं।सुषमा को उनका कद बढ़ाने वाली पराजय मिली सोनिया गांधी के हाथों। 1999 में भाजपा ने उन्हें कर्नाटक के बेल्लारी से श्रीमती गांधी के $िखला$फ उतारा और इसके बाद वे भाजपा के लिए $खासम$खास हो गईं। श्रीमती स्वराज को पार्टी ने 2000 में उत्तराखंड से राज्यसभा भेजा। यह कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्हें 2006 में मध्यप्रदेश से उच्च सदन पहुंचाया गया। मध्यप्रदेश से जुड़ाव ने उन्हें यहां स्थायी डेरा जमाने की प्रेरणा दी और सुषमा ने मप्र में लोकसभा सीट पर दावा जता दिया। अंदरखाने की बातें हैं कि मुख्यमंत्री उन्हें विदिशा नहीं देना चाहते थे, इसलिए भोपाल संसदीय क्षेत्र की पेशकश की गई। सुषमा को यह जम भी गया, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री और भोपाल के सांसद कैलाश जोशी का वीटो भारी साबित हुआ। हारकर शिवराज को विदिशा से अपने मित्र रामपाल सिंह को होशंगाबाद भेजना पड़ा, जहां रामपाल को पराजय नसीब हुई और विदिशा में सुषमा को विजय। अब कभी भोपाल में मुख्यमंत्री का आवास रहा शानदार बंगला सुषमा स्वराज का है। यहीं से वे विदिशा का अपना साम्राज्य संभालती है। वे कह भी चुकी हैं कि अब अंतिम समय तक विदिशा से उनका नाता बना रहेगा। बताते हैं कि सुषमा के विदिशा प्रेम ने शिवराज सिंह को हरकत में ला दिया है और सुषमा का यह विदिशा प्रेम ही साधना को राजनीति में सक्रिय होने का मुख्य कारण बन गया है।अपने पति द्वारा सहेज कर रखे गए संसदीय क्षेत्र से बेदखल होने की पीड़ा ने उन्हें राजनीति की मुख्य धारा में ला दिया। प्रदेश भाजपा के अनुकूल माहौल में उन्होंने महिला मोर्चा का उपाध्यक्ष पद लिया है और उनकी सक्रियता पहले से कही अधिक है। वे हर बुधवार विदिशा में बनवाए गए मंदिर जाती हैं, तो वहां के लोगों की समस्याएं भी प्राथमिकता से हल करवाती हैं। कहना नहीं होगा कि विदिशा के लिए अब दो महिला नेत्रियां सक्रिय हैं, एक सांसद दूसरी सांसद बनने की संभावना को $खारिज कर चुकी हैं, लेकिन उनकी लोकप्रियता और क्षेत्र के प्रति समर्पण इस बात की चुगली कर रहा है, कि मौका मिला तो वे चुनाव ज़रूर लड़ेंगी। ऐसे में उनकी पहली प्राथमिकता विदिशा ही होगी। इसलिए अभी कहा नहीं जा सकती कि भाजपा के बड़े नेताओं का लांचिंग पैड रहा विदिशा अगली बार किसको संसद पहुंचाएगा। बताते हैं कि अभी तक अपने आपको मध्य प्रदेश की राजनीति तक ही सीमित रखने का मन बना चुकी साधना सिंह को केंद्रिय राजनीति का सपना दिखा रही हैं महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष स्मृति ईरानी। भाजपा के सूत्र बताते हैं, कि हमेशा अपने पति(शिवराज सिंह चौहान) के साथ साए की तरह रहने वाली साधना सिंह को राजनीति की पाठशाला के गुण-दोष सिखाने का जि़म्मा भी स्मृति ईरानी ने उठा रखा है। साधना सिंह के संभावित प्रयासों को भांप कर सुषमा स्वराज ने भी दिल्ली की अपनी व्यवस्तताओं में से विदिशा के लिए अधिक से अधिक समय निकालना शुरू कर दिया है। उनकी हरियाणवी टीम के लोग संसदीय क्षेत्र में घूम-घूम कर $फीडबैक लेते रहते हैं। एक तरह से क्षेत्र की पूरी कमान ही श्रीमती स्वराज के इन $खास लोगों के हाथों में है। स्थानीय नेतृत्व को किसी भी काम के लिए इन्हीं लोगों से संपर्क करना पड़ता है। श्रीमती स्वराज हर माह का एक सप्ताह विदिशा और भोपाल को देकर नब्ज टटोलती रहती है। क्षेत्र के लिए मोबाइल एंबुलेंस सहित कई सौगातें भी वे दे रही हैं। उधर विदिशा को अपना घर बना चुके शिवराज सिंह चौहान और उनकी धर्मपत्नी साधना सिंह विदिशा से किसी भी कीमत पर दूरी नहीं बनाना चाहते हैं। उनके लिए यह क्षेत्र उतना ही $खास है, जितना वर्तमान संसद के लिए है। शिवराज के प्रदेश भर में सक्रिय रहने को देखते हुए साधना सिंह ही विदिशा से संबंधित मामले देखती हैं। उनका गांव-गांव के कार्यकर्ताओं से नाता है और क्षेत्र में वेयर हाउस, मकान भी हैं। क्षेत्र के एक पूर्व विधायक कहते हैं कि शिवराज सिंह समूचा संसदीय क्षेत्र पैदल ही नाप लेते थे। वे ऐसे सांसद थे, जिनका जनता से सीधा जुड़ाव था, अगर भैया को $फुरसत नहीं मिलती थी तो भाभी (साधना सिंह) समस्याओं को हल करवा दिया करती थीं, मगर अब वो बात नहीं रही। इस लिए हम चाहते हैं कि भैया न सही भाभी तो अपने लोगों का प्रतिनिधित्व करें। वहीं शिवराज समर्थक संघ के एक नेता ने भी उन्हें चेताते हुए कहा है कि सुषमा की आदत है कि वह पहले उंगली पकड़ती हैं और मौका मिलते ही उस आदमी को धकेल कर उसकी जगह ले लेती हैं। वह कहते हैं कि हरियाणा की राजनीति से बेद$खल होने के बाद जब सुषमा राजनीति करने दिल्ली पहुंची तो पहले उन्होंने वहां के दबंग नेता मदन लाल खुराना की उंगली पकडऩी चाही, लेकिन खुराना ने सुषमा स्वराज को कोई विशेष महत्व नहीं दिया, सो वे उनकी सरकार के मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के साथ दिल्ली में अपनी पकड़ बनाने में जुट गईं। वर्मा के ही दम पर उन्होंने दक्षिण दिल्ली लोकसभा का चुनाव भी जीता। समय आने पर खुराना की जगह सज्जन सिंह वर्मा को $िफट करा दिया और बाद में स्वयं उस पद पर (दिल्ली की मुख्यमंत्री) बैठ गईं। 1998 में दिल्ली विधानसभा का चुनाव सुषमा स्वराज के नेतृत्व में लड़ा गया, जिसमें सरस्वती पुत्री को 84 के दंगों के दा$गी नेताओं ने मिलकर धूल चटा दी। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि भाजपा के टिकट वितरण में सबसे ज़्यादा सुषमा स्वराज की ही चली थी, और नतीजे आने पर दिल्ली से भाजपा का ऐसा स$फाया हुआ, कि आज तक उस सदमें से नहीं उभर पाई। ऐसे में मध्य प्रदेश में सत्ता और संगठन को इस विषय पर मंथन करने का अभी पर्याप्त समय है। अब देखना है की सुषमा स्वराज की $िखला$फत में मध्य प्रदेश की राजनीति में उठा बवंडर शांत होता है, या आंधी का रूप धारण करता है।




भाजपा विधायक-सरपंच पर $फौजदारी




मुकदमामामला नवलपुरा में सिक्ख समाज के धार्मिक स्थल पर तोडफ़ोड़ का, सिक्खसमाज की भावनाओं को भड़काने संबंधी प्रकरण
15 जून को कोर्ट में पेश होंगे विधायक होना होगा, सरपंच की ज़मानत मंज़ूर
हृ मनीष मडहारखरगोन।
खरगोन जि़ले के भगवानपुरा क्षेत्र के विधायक जमना सिह सोलंकी को इंदौर के निजी चिकित्सालय सुयश में भर्ती कराया गया। उन्हें अंनिद्रा के चलते तकली$फ हो रही थी। विधायक के करीबी सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार स्थानीय डाक्टरों की सलाह के बाद उन्हें इंदौर रै$फर किया गया है। जि़ले के नवलपुरा में सिख समाज के सदस्यों से अभद्रता करने पर उनके $िखला$फ प्रथम न्यायायिक दंण्डाधिकारी न्यायालय में आपराधिक प्रकरण दर्ज किया है शहर और राजनैतिक तबके में चर्चा ज़ोरों पर है, भगवानपुरा क्षेत्र के विधायक जमना सिह सोलंकी को 30 मई को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना था, जहां उनकी ज़मानत पर फैसला होना था नवलपुरा के सिख समाज के लोगों द्वारा लगाये गये मुकदमे के कारण क्षेत्र के विधायक की रातों की नींद हराम हो गई है। सोमवार को विधायक जमना सिह सोलंकी न्यायालय के समक्ष हाजि़र नहीं हुये। उनके अभिभाषक ने स्वास्थ कारणों का हवाला देकर राहत की मंाग की न्यायालय ने परिवाद के अधिवक्ताओं की मंाग पर दोबारा समन जारी कर दिया है।प्रथम श्रेणी न्याययिक दण्डाधिकारी न्यायालय में सोमवार मई 30 को $खासी चहल-पहल रही सिक्ख समाज के सरदार महेन्द्र सिह ओर उनके साथी एवं परिवार के सदस्य परिवाद पर मुकदमे का सामना कर रहे भाजपा के विधायक जमना सिह सोलंकी और धुलकोट के सरपंच जगदीश सोलकी को सोमवार को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत होना था न्यायालय ने इन्हें प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुये स्वत: ही प्रकरण दर्ज कर समन जारी किये थे, परन्तु विधायक न्यायालय के समक्ष हाजि़र नहीं हुये। उनके अभिभाषक ने न्यायालय के समक्ष स्वास्थ कारणों का हवाला दिया व उपस्थित नहीं होने संबंधी आवेदन के साथ पुलिस दस्तावेज़ भी पेश किये न्यायालय ने विधायक के स्वास्थ कारणों पर अस्पताल के दस्तावेज़ो की मांग स्वीकारते हुये उन्हे 15 जून को उपस्थित होने का समन जारी किया गया है।न्यायलय ने सोमवार को भाजपा विधायक जमना सिंह सोलकी के स्वास्थ कारणों के हवाले पर दस्तावेज़ की मंाग की है, $गौरतलब है कि सोलंकी इंदौर के निजी अस्पताल सुयश में दाखिल है, और पिछले तीन दिनों से अपना इलाज करवा रहे हैं, पुलिस ने भी सुयश हास्पिटल में विधायक के होने की पुष्टि की है, वहीं सिक्ख समाज के लोगों ने विधायक के अस्पताल में दाखिल होने पर तल्ख टिप्पणी ज़ाहिर की है समाज के लोगों ने कहा कि समन जारी होने के बाद ही विधायक की बीमारी सामने आई है। अक्सर राजनैतिक नेता किसी मामले में फंसने के बाद ही बीमार होकर अस्पताल में भर्ती होते हैं। मामले से जुड़े सरपंच को सोमवार को न्यायालय के समक्ष पेश हुये उन्हे 10000 रू के मुचलके और इतनी ही राशि पर ज़मानत दे दी गई। इसी मामले में विधायक को जारी समन पर अब दोबारा तारीख तय की गई है, बहरहाल परिवाद के अभिभाषक की मंाग पर न्यायालय ने विधायक को दोबारा समन जारी किया है और सिक्ख समाज के सदस्यों ने इसका स्वागत किया है ।

Saturday, May 28, 2011






आखिर कौन है दोषी? बोर्ड, खिलाड़ी या सिस्टम

हृ जैनेन्द्र कुमार

आईपीएल-४ के दिग्गज खिलाड़ी महेन्द्र सिंह धोनी, सचिन तेन्दुलकर, जहीर $खान, वीरेन्द्र सहवाग के वेस्टइंडीज़ दौरे पर न जाने से देशभर में एक बहस छिड़ गई है, कि क्या अब खिलाड़ी सि$र्फ पैसे के लिए खेलते हैं, और जब देश के लिए खेलने की बारी आती है तो विश्राम के नाम पर बैकफुट पर चले जाते हैं। किरण मोरे ने कहा है कि वल्र्डकप के दौरान गौतम गंभीर के चोट आने के बाद वे आईपीएल-४ और वेस्टइंडीज़ में नहीं खेलना चाहते थे, लेकिन बोर्ड के दबाव में गंभीर आईपीएल-४ में खेलने को राजी हुए थे। और अब बोर्ड ने गंभीर को ही वेस्टइंडीज़ दौरे की चुनी गई टीम का कप्तान भी बना दिया। ऐसा बोर्ड ने क्यों किया? यह भी महत्वपूर्ण सवाल है। अब जब कि गौतम गंभीर की चोट ज़्यादा गंभीर हो गई है, तो बीसीसीआई ने चोरी और सीना ज़ोरी की तर्ज पर गंभीर से स$ख्त नाराज़ी जताई है, और कहा है, कि गंभीर अपनी चोट छिपाकर आईपीएल में लगातार क्यों खेलते रहे, जबकि गंभीर ने कहा है कि कोलकाता नाइट राइडर्स के टीम प्रबंधन ने उनकी चोट के गंभीर होने की जानकारी नहीं दी, और उन्हें लागातार आईपीएल मैचों में खिलाते रहे। आखिर क्या है वर्तमान क्रिकेट, क्रिकेटर्स और बोर्ड की सच्चाई इसी की पड़ताल करती रिपोर्ट।
इसी साल धोनी की कप्तानी में टीम इंडिया ने वल्र्ड कप जीत कर इतिहास रचा है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। इसके $खत्म होने के कुछ ही दिनों बाद ८ अप्रैल २०११ से आईपीएल-४ की शुरुआत हो गई। आईपीएल का आ$िखरी और $फाइनल मैच २८ मई २००१ को खेला जाएगा और इसी के साथ आईपीएल का समापन होगा। इसके बाद ४ जून से शुरू होने वाले वेस्टडंडीज़ दौरे के लिए टीम की घोषणा कर दी गई है। टीम इंडिया के क प्तान भरोसेमंद बैट्समैन माने जाने वाले गौतम गंभीर होंगे। इस दौरे के लिए उप कप्तान सुरेश रैना को बनाया गया है। इसके अलावा टीम में पार्थिव पटेल, विराट कोहली, युवराज सिंह, एस. बद्रीनाथ, रोहित शर्मा, हरभजन सिंह, आर. अश्विन, प्रवीण कु मार, ईशांत शर्मा, मुनाफ पटेल, विनय कुमार, यूसुफ पठान, अमित मिश्रा और वर्धिमान शाह को शामिल किया गया है। सचिन तेन्दुलकर, महेन्द्र सिंह धोनी और ज़हीर खान को आराम दिया गया है, जबकि वीरेंद्र सहवाग अनफिट होने की वजह से वेस्ट इंडीज़ दौरे पर नहीं जा सकेंगे। टीम इंडिया एक ट्वंटी-ट्वंटी मैच और पांच एक दिवसीय मैच वेस्टइंडीज़ की टीम के $िखला$फ उनके ही मैदानों पर खेलेगी। हालांकि, अब वेस्टइंडीज़ जाने वाली भारतीय टीम के कप्तान गौतम गंभीर का चोट के कारण इस दौरे पर जाना संदिग्ध हो गया है। आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स की कप्तानी संभाल रहे गंभीर ने रविवार, २२ मई को मंबई इंडियंस से मैच के दौरान कंधे में दर्द की शिकायत की थी। मंगलवार २४ मई को उनका एमआरआई स्कैन किया गया, जिससे उनके दाएं कंधे में चोट के गंभीर होने का पता लगा है। गंंभीर को यह चोट वल्र्डकप फाइनल के दौरान लगी थी। उस मैच में गंभीर ने ९७ रन बनाए थे। आईपीएल में भी मुंबई इंडियंस के विरुद्ध खेलते हुए फील्डिंग के दौरान उनके कंधे में ज़ोर का झटका लगा था, जिसे बाद उन्हें कराहते हुए देखा गया था। हालांकि, वे इसके बाद भी मुंबई इंडियंस के विरुद्ध एक और मैच खेले। इस मामले में शाहरु$ख $खान और कोलकाता नाइट राइडर्स टीम प्रबंधन से गौतम गंभीर नाराज़ हैं। गंभीर का कहना है कि टीम प्रबंधन ने उन्हें कंधे की चोट गहराने की जानकारी नहीं दी और वे लगातार १५ मैच खेलते रहे। बीसीसीआई के सचिव एन.श्रीनिवासन की मानें तो कोलकाता नाइट राइडर्स के $िफजि़यो एंड्यू लीपस ने बोर्ड को लिखित जानकारी दी है, कि गंभीर के लिए कम से कम छह सप्ताह का आराम ज़रूरी है। इस मामले में चयन समिति के दो पूर्व अध्यक्षों की राय भी $काबिले $गौर है। किरण मोरे कहते हैं, कि लगातार खेलने के बजाय गंभीर कुछ मैचों में आराम करते तो चोट नहीं गहराती। वे इंडीज़ दौरे पर जाना नहीं चाहते थे, और न ही आईपीएल में खेलना चाहते थे। बोर्ड के दबाव में राजी हुए थे। दिलीप वेंगसरकर का कहना है कि यदि गौतम की चोट गंभीर होती तो वे आईपीएल-४ में ३५० से ज़्यादा रन कैसे बनाते। बाद में दर्द ज़्यादा बढ़ा तब गंभीर परेशान हुए। वैसे इस मामले में कार्रवाई की संभावना नहीं है। इससे इतर आईपीएल-४ में गंभीर ११ करोड़ रुपए में बिके थे। गंभीर ने चोट के बावजूद टीम के सभी १५ मैचों में हिस्सा लिया और ३७८ रन बनाए। बीसीसीआई इस बात से भी स$ख्त नाराज़ हैं, कि गंभीर की चोट के बारे में नाइटराइडर्स प्रबंधन ने उन्हें अंधेरे में रखा और जोखिम के बावजूद लगातार मैच खिलाता रहा। टीम इंडिया के सलामी बल्लेबाज वीरेन्द्र सहवाग भी $िफलहाल कंधे की चोट से उबर नहीं पाए हैं। उनके कंधे की इसी महीने की शुरुआत में लंदन में सर्जरी की गई थी। हालांकि, इस सबके बावजूद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की राष्ट्रीय चयन समिति के अध्यक्ष कृष्णामचारी श्रीकांत ने विश्वास जताया है कि टीम इंडिया ४ जून, २०११ से शुरू होने वाले वेस्टइंडीज़ दौरे में शानदार प्रदर्शन करेगी। हालांकि, उन्होंने गौतम गंभीर के खेलने के सवाल पर चुप्पी साध ली। सारे मामले पर नज़र डालने के बाद कुछ बातें सोचने पर मजबूर करती हैं।
पहली- वल्र्ड कप, फिर आईपीएल-४ और अब वेस्टइंडीज दौरा-आ$िखर क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ी भी तो हाड़मास के बने इंसान ही हैं। उन्हें भी थकान होती है, उन्हें भी चोट लगती है, उन्हें भी आराम की ज़रूरत होती है, फिर क्यों बीसीसीआई लगातार क्रिकेटर्स से ये उम्मीद करती है, कि वे सबकुछ भुलाकर बस क्रिकेट ही खेलते रहें।
दूसरी- वल्र्डकप खेलने के दौरान जब गंभीर के कंधे में चोट लग गई थी और वे आईपीएल-४, वेस्टइंडीज़ दौरे में खेलने के इच्छुक नहीं थे, फिर क्यों बीसीसीआई ने न सि$र्फ आईपीएल-४ में खेलने का गौतम गंभीर पर दबाव डाला, बल्कि उन्हें वेस्टइंडीज़ दौरे में टीम इंडिया का कप्तान बनाकर सारी जि़म्मेदारी उन्हीं के कंधों पर डाल दी। क्या बीसीसीआई पर भी आईपीएल टीमों के मालिकों जो कि रसू$खदार भी हैं, का दबाव था, इसलिए उसने ऐसा किया और कहीं यह बात सामने न आ जाए इसलिए वेस्टइंडीज़ दौरे में कप्तानी की जि़म्मेदारी गौतम गंभीर को सौंपी।
तीसरी- धोनी, सचिन और ज़हीर खान जब बिलकुल फिट हैं और आईपीएल-४ में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया है तो उन्हें बीसीसीआई ने वेस्टइंडीज़ दौरे की टीम में शामिल क्यों नहीं किया और क्यों उन्हें विश्राम दिया गया?
चौथी- क्या बीसीसीआई ये समझती है, कि एक क्रिकेटर के लिए सबकुछ सि$र्फ क्रिकेट ही हो सकता है? क्या क्रिकेटर्स को समाज और अपने परिवार के प्रति अपनी जि ोदारियों को पूरा करने के लिए समय नहीं चाहिए? और अगर इन बातों से बीसीसीआई इत्तेफाक रखती तो क्यों वो लगातार क्रिकेटर्स से क्रिकेट खेलने की उम्मीद करती है और उन्हें क्रिकेट खेलने के लिए दबाव डालती है।
पांचवीं- गौतम गंभीर की चोट की गंभीरता को छिपाने वाले कोलकाता नाइट राइडर्स के टीम प्रबंधन और टीम के मालिक के विरुद्ध बीसीसीआई अब कोई स त कदम उठाएगी, जिससे कि गंभीर जैसी परेशानी का सामना किसी और खिलाड़ी को भविष्य में न करना पड़े।
छठी- अगर वेस्टइंडीज़ दौरे पर टीम इंडिया बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाती है, तो कौन जि़म्मेदार होगा। उन्हें लगातार क्रिकेट खिलाने वाली बीसीसीआई या टीम इंडिया और क्रिकेटर्स की थकान और चोटें।



शिवराज का साहस नीतीश की नेकनीयत
हृ शेष नारायण सिंह

शिवराज सिंह चौहान ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में यह बयान देकर चौंका दिया है कि देश के ऊपरी सदन को $खत्म कर दिया जाना चाहिए। शिवराज सिंह के इस बयान की भले ही कुछ लोग आलोचना करें, लेकिन शिवराज सिंह चौहान ने बहुत सटीक बात कही है। इसी तरह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधायक निधि को भंग करके बहुत साहसिक और ऐतिहासिक काम किया है। निश्चित रूप से इन राजनीतिज्ञों की यह समझ और पहल राजनीति को भ्रष्टाचार से उबारने में मदद करेगी। भ्रष्टाचार अपने देश के सामाजिक ताने बाने में बुरी तरह से घुस चुका है। घूस में की गयी चोरी को बाकायदा कमाई कहा जाता है। अंग्रेज़ों के दौर में संस्था का रूप हासिल करने वाली संस्कृति को आज़ादी के बाद नौकरशाही ने घूस की संस्कृति में बदल दिया। आज़ादी के संघर्ष में शामिल नेताओं के जाने के बाद जो नेता राजनीति में आये उनके लिए घूस एक मौलिक अधिकार की शक्ल ले चुका था। नेता जब घूस$खोर होगा तो अ$फसरों और सरकारी कर्मचारियों को घूसजीवी बनने से रोक पाना नामुमकिन है। घूस में मिली र$कम के बल पर लोग ऐशोआराम की जि़ंदगी बसर करते हैं, और कहीं चूँ नहीं होती। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में ऐसे लोग मुख्य सचिव बना दिए जाते हैं जिनको महाभ्रष्ट के रूप में मान्यता मिल चुकी होती है। नेताओं के बच्चों की शादियों में करोड़ों रूपये खर्च किये जाते हैं और कोई नहीं पूछता कि यह पैसा कहाँ से आया। अब तक भ्रष्टाचार वही माना जाता रहा है, जो पकड़ लिया जाय और मुक़दमा कायम हो जाए। आम तौर पर इन मुक़दमों में अभियुक्त बच ही निकलता है।
भ्रष्टाचार के कारणों की जांच नहीं की जाती, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस दिशा में पहला क़दम उठा लिया है। उन्होंने बिहार स्पेशल कोर्ट्स एक्ट 2010 के तहत अफसरों की उन संपत्तियों को ज़ब्त करना शुरू कर दिया है, जो घूस की कमाई से खरीदी गयी हैं। इस मामले में पहला शिकार पकड़ा भी जा चुका है और उसकी 44 लाख रूपये की संपत्ति सरकारी कब्ज़े में ली जा चुकी है। ज़ाहिर है कि अगर अफसरों में यह डर समा गया कि घूस से बनायी गई संपत्ति बाद में भी सरकारी कब्ज़े में आ जायेगी तो घूस के प्रति मोह कम होगा। अगर उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह का काम शुरू हो जाए तो भ्रष्टाचार पर निर्णायक काबू पाने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है। नीतीश कुमार ने दूसरा अहम काम भी किया है। उन्होंने विधायकों को मिलने वाली उस र$कम को भी रद्द करने का फैसला कर लिया है, जो विधायक निधि के नाम पर क्षेत्र के विकास के लिए दी जाती है। इसी रक़म से विधायक लोग अपने चेलों को पालते हैं, विधायक निधि से कमीशन लेते हैं, और भ्रष्टाचार का माहौल बनाते हैं। उसी निधि से अफसर भी अपना हिस्सा लेते हैं और सरकारी पैसे को पूरी तरह से नंबर दो का बना देते हैं। कुछ सम्मानजनक अपवाद भी हैं।
एक उदाहरण तो अरुण शौरी का ही है। उत्तर प्रदेश से राज्यसभा का सदस्य बनने के बाद उन्होंने सरकार से अनुमति मांग कर अपनी सांसद निधि को आईआईटी कानपुर में एक महत्वपूर्ण प्रयोगशाला बनाने के लिए दे दिया। 6 साल के कार्यकाल में उन्हें 12 करोड़ रूपये मिलने थे, कुछ सरकारी मदद लेकर एक संस्था की स्थापना हो गयी लेकिन इस तरह के उदाहरण बहुत कम हैं।
ज़्यादातर लोग तो विकास निधि को अपनी नंबर दो की कमाई ही मानते है। इसकी उत्पत्ति भी बहुत ही अजीब तरीके से हुई थी। सांसदों को अपने साथ रखने के चक्कर में भ्रष्ट प्रधान मंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने सांसद निधि को शुरू किया था। बाद में विधायकों के लिए भी राज्य सरकारों ने व्यवस्था कर दी। अब तो भ्रष्टाचार का माहौल बनाने में इसी निधि का सबसे अहम योगदान है। बिहार में इस घूस की जननी को ख़त्म करने की शुरुआत हुई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बाकी देश में भी यह उदाहरण लागू किया जायेगा। एक अन्य मुख्यमंत्री ने भी भ्रष्टाचार की जड़ों में म_ा डालने की एक आइडिया का जि़क्र किया है।
भोपाल में चुनाव सुधारों के लिए आयोजित एक बैठक में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, शिवराज सिंह ने बहुत बुनियादी बात कही। उन्होंने कहा कि संसद का जो ऊपरी सदन है, वह भ्रष्टाचार के लिए आजकल बहुत बड़ी खाद का काम करने लगा है। देखा गया है कि राज्य सभा में अब वे सारे लोग पंहुच रहे हैं जो पैसा देकर टिकट लेते हैं और विधायकों को पैसा देकर उनकी वोट खरीदते हैं। शराब के व्यापारी, सत्ता के दलाल, अन्य बे-ईमानी का काम करने वाले लोग राज्य सभा में पंहुच रहे हैं, और ऐलानियाँ ऐसा काम कर रहे हैं, जो किसी भी कीमत पर सही नहीं है।
आम आदमी के विरोध में जो भी नीतियाँ बन रही हैं, यह लोग उसे समर्थन दे रहे हैं। शिवराज सिंह ने कहा कि राज्य सभा को ही ख़त्म कर देना चाहिए। लोकसभा जनहित और राष्ट्र हित के सभी $फैसले लेने के लिए सक्षम है। ज़ाहिर है कि यह विचार मौलिक परिवर्तन की बात करता है, और भ्रष्टाचार के प्रमुख कारणों को दबा देने की ताक़त रखता है।
इस बात में दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए राजनीतिक पहल के लिए ज़रूरत है और निहित स्वार्थ वाले उसका पूरी तरह से विरोध करेगें। लेकिन अगर भ्रष्टाचार पर सही तरीके से हमला किया गया, तो देश के विकास को बहुत बड़ी शक्ति मिल जायेगी।

Saturday, May 21, 2011






मिटा डालो..........खाप पंचायतों के $खौ$ को
हृ जैनेन्द्र कुमार
कहने को तो भारत में संविधान लागू है, विधि का शासन है और कानून के समक्ष राष्ट्रपति से लेकर आम आदमी तक सब बराबर हैं, लेकिन खाप पंचायत भारत की कानूनी छवि को चुनौति देती नज़र आती हैं। देश के कुछ $खास हिस्सों में रहने वालों के ज़ेहन में सि$र्फ खाफ का $खौ$फ होता है, क्योंकि उनके लिए जि़ंदगी और मौत दोनों खाप पंचायतें ही तय करती हैं। कानून, प्रशासन, पुलिस व्यवस्थाएं वहां लुंज-पुंज और बेचारी नजर आती हैं। इस्लामी मज़हब के मसीहा आएदिन बे सिर-पैर के $फतवे जारी करते रहते हैं, कुछ इन्हीं की तजऱ् पर ही खाप पंचायतें भी काम करती नज़र आती हैं।
मसलन हाल ही खाप पंचायतों ने लड़कियों के जींस पहनने पर पाबंदी लगा दी है। अगर एक ही गोत्र के लड़का-लड़की शादी कर लें और उस शादी में उनके परिजनों की मजऱ्ी हो तो भी खाप पंचायतें उन्हें न केवल भाई-बहन घोषित कर देती हैं, बल्कि अमुक दंपती को भाई-बहन की तरह ही रहने के लिए मजबूर भी किया जाता है, और खाप के ऐसे $फैसले का उल्लंघन करने पर कभी उन्हें जात बाहर कर दिया जाता है, और कभी इतने पर भी संतोष न कर उनके ही परिजनों पर इतना दबाव डाला जाता है, कि इज्ज़त के नाम पर वे अपने ही बेटे-बेटी या भाई-बहन का बेरहमी से कत्ल कर देते हैं, और ऐसा करने में शान समझी जाती है। इसे आमतौर पर ऑनर किलिंग यानी इज्ज़त के लिए की गई हत्या के रूप में जाना जाता है और खाप पंचायतों के सर्वेसर्वा ऐसा करने वालों की पीठ थपथपाते नहीं थकते। इसी तरह अगर शादी करने वाले अलग-अलग जातियों से होते हैं-$खासकर उनमें से एक पक्ष अगर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का होता है तब तो उस प्रेमी जोड़े को विवाह करने से पहले मारना ही खाप पंचायत की नाक का सवाल बन जाता है और अमूमन ऐसे जोड़ों को बेरहमी और बर्बरता से सार्वजनिक तौर पर मार दिया जाता है, ताकि दूसरे युवा भी उनकी मौत से सबक ले सकें, और कोई ऊंची जाति वाला किसी नीची जाति वाले या नीची जाति वाला किसी ऊंची जाति वाले से प्रेम करने की हिमाकत ना करे। सदियों से ऐसा होता आ रहा है और आगे भी इसके थमने के कोई आसार नज़र नहीं आते। हालांकि, जब कभी भी ऑनर किलिंग के मामले होते हैं-मीडिया तूल ज़रूर देता है, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया लाइव कवरेज दिखाता है, तो प्रिंट मीडिया भी ऑनर किलिंग पर खोजपरक रपट लिखता है, लेकिन इसके बावजूद होता-जाता कुछ नहीं है। आज तक कभी भी खाप पंचायतों के अलंबरदारों और ऑनर किलिंग के दोषियों को सज़ा नहीं दी जा सकी है।
इसके पीछे दलील यही दी जाती है कि सबूतों और साक्ष्यों के अभाव में दोषी बच निकलने में कामयाब होते हैं, लेकिन इससे इतर सच्चाई यह है कि खाप पंचायत के $खौ$फ पर नकेल कसने के लिए न तो सरकारी मशीनरी प्रभावी कदम उठाने में रुचि लेती है, न ही समाज के रसू$खदार ऑनर किलिंग को बुराई के रूप में देखते हैं। यहां तक कि मीडिया का भी एक $खास तबका खाप के मामले में मौन साधना ही ज़्यादा बेहतरी समझता है।
इसकी कई वजहें हैं-पहली, खाप पंचायतों के क्षेत्र में काम करने वाले पुलिसक र्मियों, पुलिस के आला अधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों में से ज़्यादातर स्थानीय जाति-समाज से संबंधित लोग ही होते हैं, ऐसे में वे खाप पंचायतों पर नकेल कसने के बजाय उन्हें मूक समर्थन देने में ही $खुद की भलाई समझते हैं। दूसरी बात उनकी सोच भी ऐसी ही होती है, कि वे स्वाभाविक तौर पर खाप को $गलत नहीं समझते। तीसरी, खाप क्षेत्रों में स्थानातंरित होकर आए प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी संख्याबल में कम होने के कारण खाप की मनमानी को मूक दर्शक बने देखते रहते हैं। अगर कोई अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर खाप पंचायतों के अमानुषिक $फैसलों और बर्बर कृत्यों को अपने स्तर पर रोकने की कोशिश करता है तो या तो उसका तबादला कर दिया जाता है, या उसे भी डरा-धमका कर चुप करा दिया जाता है। चौथी और सबसे अहम वजह यह है कि खाप पंचायत आमतौर पर जाति पंचायतें होती हैं। कई बार तो खाप पंचायत इतनी बड़ी होती हैं कि उसमें तीस-चालीस गांव या जहां तक उस अमुक जाति के लोग होते हैं वहां तक एक ही खाप पंचायत के हुक्म की बिना सोचे-समझे तामील की जाती है। ऐसे में खाप पंचायतों को $खुश रखकर राजनेता अपना वोट बैंक बढ़ाने की कोशिशों में लग रहते हैं। कोई भी राजनेता या राजनीतिक पार्टी खाप पंचायतों की मु$खाल$फत कर एक बड़े वोट बैंक को अपने हाथ से निकलने नहीं देना चाहती। ऐसे में कभी प्रत्यक्ष रूप से तो बहुधा परोक्ष रूप से राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं का वरद हस्त खाप पंचायत के सर्वेसर्वाओं पर रहता है। ऐसे में इस बात का सवाल ही नहीं उठता कि समय के साथ खाप पंचायतें कमज़ोर हों या ऑनर किलिंग के मामलों में कमी आए। सच तो यह है कि भारतीय समाज शुरू से ही जातियों-उपजातियों और गोत्रों में बंटा रहा है, ऐसे में भारतीय राजनीति भी जातिगत राजनीति के संरक्षण में ही पल्लवित-पुष्पित होती रही है। इस तरह पहले राजनीति वोट की राजनीति में तब्दील होती है, फिर जातीय राजनीति के रूप में बदल जाती है, और सबसे निचले स्तर तक उतरते उतरते यही राजनीति खाप राजनीति या खाप पंचायत का रूप धारण कर लेती है। ऐसे में राजनीति खाप के $खौ$फ को दिनों दिन और मज़बूत ही कर रही है, बजाय उसे कमज़ोर करने के।
खाप पंचायत के बारे में कुछ तथ्य
खाप पंचायतों का अस्तित्व मुख्यत: पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी राजस्थान, हरियाणा और तमिलनाडु में है। तमिलनाडु में खाप पंचायतों को कट्टा पंचायत के नाम से जाना जाता है। ये पंचायतें अपने आदेश मनवाने के लिए ऑनर किलिंग, हुक्का-पानी बंद करना, गांव/समाज/जात/बिरादरी से निकालने और लेने-देने पर रोक लगाने का काम करती हैं। इनकी कोई वैधानिक स्थिति नहीं है, अत: खाप पंचायतें पूर्णत: अवैधानिक हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई उम्मीद की किरण
लंबे इंतज़ार के बाद आ$िखर १९ अप्रैल, १९११को खाप पंचायतों को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण $फैसले में खाप पंचायतों को अवैध करार देते हुए उन्हें स$ख्ती से बंद करने के कहा है। कोर्ट ने ऑनर किलिंग को बर्बर और शर्मनाक बताया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इसकी आड़ में होने वाली ज़्यादतियों को रोकने में विफल प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया जाए। जस्टिस मर्कंडेय काटजू और ज्ञानसुध मिश्रा की बैंच ने एक $फैसले में ये सख्त टिप्पणियां कीं। बैंच ने कहा कि उसने हाल ही के सालों में खाप पंचायतों (तमिलनाडु में कट्टा पंचायतों) के बारे में सुना है। ये विभिन्न जाति व धर्मों के विवाहित या विवाह की इच्छा रखने वाले युवक-युवतियों के $िखला$फ ऑनर किलिंग या अन्य ज़्यादतियों को बढ़वा देती हैं। ये लोगों की निजी जि़ंदगी में दखल देती हैं। बर्बर हत्या के बारे में बैंच के अनुसार-हमारा मानना है कि यह पूरी तरह से अवैध हैं। इसे तत्काल बंद करवाया जाना चाहिए । ऑनर किलिंग में कुछ भी सम्मानजनक नहीं है। हकीकत में यह बर्बर तथा शर्मनाक हत्या है। कोर्ट ने कड़े उपाय करने पर भी ज़ोर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खाप पंचायतों की ज़्यादतियों को रोकने के लिए प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को कड़े उपाय करने चाहिए। यदि ऐसी कोई घटना होती है तो इसके लिए जि़म्मेदार लोगों के $िखला$फ $फौजदारी प्रक्रिया शुरू की जाए। राज्य सरकार को संबंधित जि़ले के मजिस्ट्रेट/कलैक्टर और एसएसपी/एसपी जैस अन्य अधिकारियों को निलंबित करने और चार्जशीट दायर करने के आदेश दिए जाएं। बैंच ने यह भी कहा कि यदि पूर्व सूचना के बावजूद अधिकारी ऐसी घटनाओं को रोक नहीं पाते हैं, तो सरकार को उनके $िखला$फ विभागीय कार्यवाही करनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इस फैसले की प्रति सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेश के प्रमुख सचिवों, गृह सचिवों, डीजीपी व अन्य बड़े अधिकारियों को भेजी जाएं।
इसके बिना खाप का $खौ$ नहीं होगा कम
सुप्रीम कोर्ट ने जो $फैसला सुनाया और पहल की वह प्रशंसनीय है, लेकिन इतिहास गवाह है कि कानून बनाने या लिखत-पढ़त की कानूनी रोक-बांध से कभी भी देश की रूढिग़त कुपंरपराओं पर लगाम नहीं लगाई जा सकी है। कानून आमतौर पर बुद्धिजीवियों की वैचारिक जुगाली, विधानसभा और लोकसभा में बहस और किताबों की शोभा बढ़ाने तक ही सिमट कर रह जाते हैं। किसी भी बड़े बदलाव के लिए और $खासतौर से शताब्दियों से समाज में गहरे पैठी खाप पंचायतों सरीखी मज़बूत कुपंरपराओं को जड़मूल से नष्ट करने के लिए पूरे देश को एकजुट होकर प्रयास करने होंगे, तभी देश के माथे से खाप रूपी कलंक को धोना संभव हो पाएगा।
पहली बात- देश में तमाम समाज सेवी, जिनमें अन्ना हज़ारे, अरुणा रॉय जैसी नामचीन श$िख्सयतों का भी शुमार होता है। सभी समाज सेवियों को चाहिए कि वे एकजुट होकर खाप पंचायतों को समूल उखाड़ फेंकने के लिए अपनी अपनी सामथ्र्यानुसार देशभर में आंदोलन चलाएं और सभी को खाप पंचायतों की करतूतों से वाकि$फ कराने के साथ ही खाप पंचायतों की मु$खाल$फत करने के लिए जन साधारण को जागरूक करें। अगर सभी समाज सेवी अपनी पूरी सामथ्र्य से खाप पंचायतों के अस्तित्व को $खत्म करने का बीड़ा उठा लें और देशव्यापी आंदोलन चलाते हुए साधारण और युवा शक्ति को अपने साथ मिला लें, तो कोई सवाल ही नहीं उठता कि खाप के $खौ$फ से आम जनता को निजात नहीं मिले।
दूसरी बात- अमतौर पर कोई भी अवैधानिक या अमानुषिक कृत्य होता है तो मानवाधिकर वाले चिल्ला-चिल्लाकर आसमान सिर पर उठा लेते हैं, लेकिन जब खाप पंचायतें ऑनर किलिंग को अंजाम देती हैं, तब ये मानवाधिकर वाले न जाने कहां घोड़े बेच कर सो जाते हैं। खाप पंचायतों की मु$खाल$फत के लिए मानवाधिकार आयोग को भी अपने स्तर पर पूरी ताकत झोंकनी होगी।
तीसरी बात- $िफल्मी हस्तियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाडिय़ों को चाहिए कि वे खाप पंचायतों को आमूल-चूल नष्ट करने के लिए प्रभावी कदम उठाएं। चूंकि $िफल्मी और खेल जगत की सैलेब्रिटीज़ को ही आज का युवा अपना आइडियल मानता है, ऐसे में अगर ये युवा शक्ति और अपने $फैंस से एकजुट हो खाप पंचायतों की मु$खाल$फत करने के लिए एकजुट हो आंदोलन चालने और खाप के ठेकेदारों को सबक सिखाने के लिए आह्वान करें तो निश्चित ही नतीजे सुखकारक होंगे।
चौथी बात- चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों को अपने वोट बैंक का लालच छोड़कर खाप पंचायत के नाम पर सरेआम बर्बरता से युवा प्रेमी-प्रेमिकाओं को जि़ंदा जलाने या किसी अन्य अमानुषिक तरीके से मासूम, निर्दोष प्रेमी जोड़ों की हत्या करने वालों या अन्य सामाजिक अथवा जातीय बंधन लगाने वाले खाप पंचायत के मुखियाओं/रसू$खदारों को उचित दंड देने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे, तब ही समाज को खाप रूपी नासूर से निजात मिलना संभव है।
पांचवीं बात- देश-दुनिया में बसे स्वदेसी धनकुबेरों को भी खाप पंचायतों पर लगाम लगाने के लिए आर्थिक मदद देने के साथ ही राजनीतिज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों पर खाप पंचायतों पर नकेल कसने के लिए दबाव बनाना होगा, क्योंकि राजनीति और राजनीतिज्ञों पर दबाव समूहों का प्रभावी असर होता है, और वे दबाव समूह की अनदेखी नहीं कर सकते।


महिला एवं बाल विकास विभाग में नियुक्तियों में मनमानी
परियोजना अधिकारियों एवं जि़ला कार्यक्रम अधिकारी की सांठगांठ से अपात्रों का चयन
हृ अनूप सक्सेना
राजगढ़। ग्राम पीपल्दी तहसील जीरापुर में आंगनवाड़ी केन्द्र पर सहायिका पद पर श्रीमति मंजू बाई पत्नि नारायण सिंह का नियुक्ति आदेश जो 5.4.2010 को परियोजना अधिकारी एकीकृत बाल विकास परियोजना जीरापुर द्वारा जारी किया गया था, उस आदेश के विरूद्ध धापूबाई पति रोशन सिंह द्वारा क्लेक्टर न्यायालय में प्रस्तुत अपील के दौरान पूर्व क्लेक्टर लोकेश जाटव ने परियोजना अधिकारी के विरूद्व गंभीर अनियमितताओं की पुष्टी कर विभागीय जांच संस्थित करने का आदेश दिया गया था। तत्कालीन कलेक्टर महोदय के स्थानांतरण के बाद क्लेक्टर न्यायालय का यह निर्णय महिला एवं बाल विकास विभाग के नीति निर्धारकों के लिये रद्दी का$गज़ से अधिक कुछ भी नहीं है और ज़ीरापुर के तत्कालीन परियोजना अधिकारी के विरूद्ध किसी भी प्रकार की कोई जांच अस्तित्व में नहीं आ सकी है। इस प्रकरण में अपीलार्थी धापूबाई द्वारा अधिवक्ता के माध्यम से क्लेक्टर न्यायालय में तर्क दिये गये, कि मंजूबाई कक्षा चौथी पास है। उसे नियुक्ति की पात्रता नहीं है, मंजूबाई का नाम ग्राम पीपल्दी की मतदाता सूची में भी नहीं है, न ही राशन कार्ड में नाम है। मंजूबाई समय की मांग की व निर्धारित समय तक कोर्ट के समक्ष लिखित में कुछ भी पेश नहीं कर सकी। क्लेक्टर न्यायलय ने माना कि ग्राम पीपल्दी की अंतिम सूची 18.7.2008 को जारी होने के बाद नियुक्ति आदेश 5.4.2010 को जारी किया गया। सूची जारी होने के बाद प्रकरण जि़ला स्तरीय आपति दावा निराकरण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाना था जो नहीं किया गया, अत्यन्त आपत्तिजनक है। अत: क्लेक्टर न्यायलय के निर्णय दि, 28.9.2010 में जि़ला स्तरीय आपति दावा निराकरण समिति के अनुमोदन के बिना नियुक्ति आदेश जारी करने के कारण संबंधित परियोजना अधिकारी एकीकृत बाल विकास परियोजना जीरापुर के विरूद्व विभागीय जांच अधिकारी तथा अनुविभागीय अधिकारी खिलचीपुर को प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्ति किया था।
क्लेक्टर न्यायलय ने जि़ला कार्यक्रम अधिकारी महिला एवं बाल विकास ( तत्कालीन ) शेल श्रीवास्तव के कृत्य को भी गंभीर अनियमितता माना क्लेक्टर न्यायलय द्वारा मजंूबाई की नियुक्ति निरस्त करने के बाद विज्ञप्ति जारी कर नई नियुक्ति के आदेश दिये गये। विभागीय जांच की जानकारी लेने के लिये जब प्रभारी जि़ला महिला बाल विकास अधिकारी डिप्टी क्लेक्टर नीता राठौर को उनके मोबाइल क्र 0942481654 पर दिनांक16.5.2011 का दोपहर 12.48 पर प्रयास किया।
अपने कक्ष में बैठे रहने के बावजूद उनके द्वारा मोबाइल रिसीव नहीं किया गया। क्लेक्टर कार्यालय में नीता राठौर के पास विभागीय जांच का भी जि़म्मा है। समाज के चौथे स्तंभ से उनका दूरीयां बनाकर रखना महिला एवं बाल विकास विभाग जैसे राजगढ़ में बदनाम रहे विभाग को उनके द्वारा निष्पक्ष चलाये जाने पर प्रश्न चिन्ह निश्चित तौर पर लगता है।
ग्रम सेमलीकलां तहसील खिलचीपुर जि़ला राजगढ़ में म.प्र. शासन के निर्देशानुसार आंगनवाड़ी केन्द्र पर कार्यकर्ता पद पर संजू पति होकमचन्द्र मालवीय की नियुक्ति की गई। इसके विरूद्ध ज्योति पति महेन्द्र शर्मा द्वारा आपत्ति प्रस्तुत की गई कि संजू मालवीय का मूल निवासी $फजऱ्ी है, संजू मालवीय का पति राजस्थान पुलिस में आरक्षक होकर ग्राम जूलागढ़ जि़ला झालावाड़ मे रहते है व संजू पति होकमचन्द्र के पास दोनों स्थानों के राशनकार्ड हैं। जिला स्तरीय दावा आपत्ति एवं निराकरण समिति द्वारा जांच उपरांत संजू मालवीय के मूल अभिलेख चेक किये गये व सही पाये गये। 16.12.2000 को परियोजना अधिकारी एकीकृत बाल विकास परियोजना खिलचीपुर के आदेश क्रं. 664 से संजू मालवीय को नियुक्ति दी गई। इस नियुक्ति के विरूद्ध ज्योति शर्मा द्वारा कलेक्टर न्यायालय में अपील प्रस्तुत करने पर अपने वकील के माध्यम से होकमचन्द्र मालवीय को शासकीय कर्मचारी सिद्ध कर पदस्थापना झालावाड़ जि़ले में होना सिद्ध पाया गया। यह भी सिद्ध किया गया कि संजू लावीय का नाम बी.पी.एल सूची में नहीं है, फिर भी 10 अंक नियम विरूद्ध दिए गए हैं।
तत्कालीन कलेकटर लोकेश जाटव ने अपने निर्णय मे लिखा कि संजू मालवीय के द्वारा प्रस्तुत अभिलेखों से उसके ग्राम पंचायत सेमलीकला की स्थानीय निवासी होने की पुष्टी नहीं होती है।
इस संबंध में दावाआपत्ति निराकरण समिति के निर्णय का अवलोकन किया गया उल्लेखित है, कि संजू पति होकमचन्द्र का चयन नियमानुसार नहीं है। प्रकरण में पुन: जांच की जाये।
मूल प्रकरण में पृष्ठ 69 में जि़ला स्तरीय आपत्ति द्वारा निराकरण समिति के निर्णय उपरांत पृथक हेण्ड राईटिंग में लिखा गया, कि 5.12.2009 की बैठक में जांच उपरांत संजू पति होकमचन्द्र के मूल अभिलेख चेक किये गये, सही पाये गये। संजू मालवीय का नियुक्ति आदेश जारी करें। इस पर जि़ला कार्यक्रम अधिकारी शैल् श्रीवास्तव के हस्ताक्षर है कलेक्टर न्यायालय ने माना कि जि़ला स्तरीय आपत्ति दावा निराकरण समिति द्वारा पारित निर्णय के पालन मे मात्र जि़ला कार्यक्रम अधिकारी म.बा.वि. द्वारा ही मनमाने तरीके से जांच की गई इसकी पुष्टी जिलाचयन समिति से नही कराई गई नियुक्ति आदेश भी जारी कर दिया कलेक्टर द्वारा जि़ला कार्यक्रम अधिकारी म.बा.वि. (तत्कालन) शैल श्रीवास्तव के विरूद्ध प्रमुख सचिव महिला एवं बाल विकास विभाग म.प्र. शासन को पत्र क्र/मबावि/प्ब्क्ै/2010/3229 दिनांक 28.09.2010 लिखकर यथोचित कार्यवाही करने का अनुरोध किया तथा खिलचीपुर के तत्कालीन परियोजना अधिकारी एकीकृत बाल विकास परियेाजना के .सी. तिवारी को पत्र क्रं./मबावि/प्ब्क्ै/2010/3223 दिनांक 28.09.2010 के द्वारा कारण बताओ सूचना पत्र जारी कर जवाब मांग गया।
कलेक्टर न्यायालय के आदेश के बाद ज्योति शर्मा को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता नियुक्त कर दिया, परन्तु परियोजना अधिकारी एवं जि़ला कार्यक्रम अधिकारी के विरूद्ध जि़ला स्तर से लेकर शासन स्तर तक कोई कार्यवाही नहीं हो सकी।


लाल किला ध्वस्त कांग्रेस का हाथ मज़बूत
हाल ही में हुए पांच राज्यों के चुनावों के परिणामों पर नजर डालें तो सा$फ हो जाता है कि मतदात ने इस बार पैसा, जाति, शराब को दरकिनार कर काम करने वालों को सिरआँखों पर बिठाया है, वहीं आमजन के विरोध में काम करने वालों और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे दा$गी नेताओं का स$फाया करने में दिलचस्पी लेकर यह सा$फ कर दिया है कि आज भी लोकतंत्र में लोक के हाथ में ही तंत्र की कमान है। सबसे बड़ा चमत्कार तो पश्चिम बंगाल में हुआ है। वहाँ ३४ साल से राज्य पर कब्ज़ा जमाए वाम सरकार को राज्य की जनता ने सिरे से $खारिज कर सादगी पसंद और हर समय जनसेवा में लीन रहने वालीं ममता बनर्जी के सिर पर विजय का ताज रख दिया है। वहीं असम में सा$फ छवि वाले और काम करने के लिए ख्यात कांग्रेस के नेता तरुण गोगई को जिताकर उन्हें हैट्रिक लगाने का मौका दिया है। केरल में कांटे की टक्कर के बावजूद कांग्रेस ने बाज़ी मार ली है। तमिलनाडु की बात करें तो इस बार २ जी घोटाला करुणानिधि के लिए भारी पड़ा है, और जनता ने डीएमके को अंगूठा दिखाते हुए जयललिता को जीत का तोह$फा दिया है, जबकि पुडुचेरी में कांग्रेस की सत्ता को जनता ने उखाड़ फेंका है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भारी फेरबदल के क्या कारण रहे और जनता ने किसे, क्यों जिताया, इसी पर पेश है विश्लेषणात्मक टिप्पणी।
पश्चिम बंगाल की बात करें तो माकपा सरकार को किसानों की ज़मीनों का अधिग्रहण कर किसानों की अनदेखी करने और बिज़नेस टायकून्स से हाथ मिलाने का $खमियाज़ा भुगतना पड़ा है। वहीं सादा साड़ी वाली नीली हवाई चप्पल पहने हर समय आम आदमी के हित में सरकार के विरोध और आमजन के समर्थन में खड़ी हो जाने वालीं ममता दीदी जनता को अपनी-सी लगी हैं। इसी का नतीजा है कि इस बार ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने दमदारी से जीत दर्ज करवाते हुए करीब साढ़े तीन दशक से सत्ता पर काबिज़ माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को न केवल हराया, बल्कि उसकी पार्टी के सभी दिग्गजों को चारों खाने चित कर दिया है। पश्चिम बंगाल में अभी तक रहे मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी जाधवपुर सीट तक नहीं बचा पाए, उन्हें तृणमूल के मनीष गुप्ता ने १६,००० के बड़े अंतर से हरा शर्मसार कर दिया, वहीं बर्धवान से उद्योग मंत्री निरुपम सेन को तृणमूल के रवि रंजन चट्टोपाध्याय ने पटखनी देते हुए ३६,४३८ मतों से करारी शिकस्त दी। माकपा नेता और राज्य के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता को तृणमूल के अमित मित्रा के हाथों करहादा सीट पर २६,१५४ मतों से हार का मुंह देखना पड़ा। शहरी विकास मंत्री अशोक भट्टाचार्य को सिलीगुड़ी सीट पर तृणमूल के रुद्र नारायण भट्टाचार्य ने ३६,१०० मतों से पट$खनी दी। माकपा के स्टार नेता गौतम देव को दमदम सीट से ब्रत्या बसु ने ३१,४९७ मतों से पराजित किया। माकपा के कद्दावर नेता कांति गांगुली रायदीघी सीट नहीं बचा सके, उन्हें तृणमूल के देवाश्री गांगुली ने हराया। इसके अलावा देबेश दास, आनंदी साहू, क्षीती गोस्वामी, सुदर्शन राय चौधरी और रंजीत खुंडू जैसे दिग्गजों ने भी तृणमूल की ''बोदलाब की बोयारÓÓ के सामने घुटने टेक दिए। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल में लाल किला पूरी तरह से ढह गया है। पिछली बार सन २००६ के विस चुनाव से तुलना करने पर सा$फ हो जाता है कि तृणमूल कांग्रेस को इस बार१५४ सीटों का अतिरिक्त $फायदा मिला है, कांग्रेस के पाले में भी २१ सीटों का इज़ा$फा हुआ है, जबकि १३६ सीटों का नुकसान माकपा को झेलना पड़ा है, सहयोगी भी ३१ सीटों के घाटे में हैं, अन्य को भी ८ सीटें गंवानी पड़ी हैं।
इस तरह इस बार माकपा का सूपड़ा सा$फ हो गया है, वहीं तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस $फायदे में रही हैं। तमिलनाडु में कांग्रेस को दा$गी द्रमुक का साथ देने का भरपूर $खमियाज़ा भुगतना पड़ा। द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन को महज़ ३१ सीटें मिलीं, वहीं अन्नाद्रमुक को १४६ सीटों पर जनता ने जिताया। जनता जानती है कि करुणानिधि और जयललिता में से कोई भी दूध का धुला हुआ नहीं है, दोनों के ही दामन दा$गदार हैं, लेकिन वर्तमान हालात में करुणानिधि की पार्टी के ए.राजा का २ जी घोटाले में लिप्त होना, यहां तक कि उनकी बेटी कनिमोझी और उनकी पत्नी का नाम भी इस घोटाले में आने के बाद से जनता के पास करुणानिधि की द्रमुक को हराने के सिवाय और कोई चारा नहीं था, इसका $फायदा जयललिता की अन्नाद्रमुक को मिला है। सही मायनों में यह जयललिता की जीत न होकर, करुणानिधि की हार है। भले ही जयललिता को स्पष्ट बहुमत मिल गया हो, लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता भ्रष्ट नेताओं को सबक ज़रूर सिखाती है। ऐसे में जयललिता को सोच-समझकर राज्य को चलाना होगा, न कि बदले की राजनीति से प्रेरित होकर। कुल मिलाकर एआईडीएमके को ८९ सीटों का $फायदा हुआ है, जबकि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी डीएमके को ७३ सीटें गंवानी पड़ीं, वहीं कांग्रेस के हाथ से भी २९ सीटें निकल गई हैं। अन्य पार्टियों को १३ सीटों का फायदा हुआ है।
केरल में कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतान्त्रिक मोर्चा (यूडीए$फ) ने १४० विस सीटों में से ७२ पर जीत दर्ज करवाते हुए माकपा नीत वाम लोकतान्त्रिक मोर्चा (एडीएफ) को सत्ता से बेदखल कर दिया है।
हालांकि, कांटे की टक्कर में एलडीए$फ ने ६८ सीटों पर कब्ज़ा जमाने में कामयाबी हासिल की। केरल में कांग्रेस १४ सीटों के $फायदे में है, वहीं कांग्रेस के सहयोगियों को १७ सीटों का लाभ मिला है, माकपा को १६ और अन्य पार्टियों को १५ सीटें गंवानी पड़ी हैं।
असम में ७६ सीटें जीतते हुए कांग्रेस ने राज्य में तीसरी बार भी अपना विजयी रथ जारी रखने में कामयाबी हासिल की है। प्रतिद्वंद्वी अगप को निर्णायक पटखनी देने वाले तरुण गोगोई की जीत के पीछे कई कारण हैं।
अलगाववादी संगठन उल्फा को वार्ता के लिए तैयार करने और दिवालिया स्थिति तक पहुंच चुके असम को फिर से पटरी पर लाने वाले मुख्यमंत्री तरुण गोगोई प्रशासकीय क्षमता और राजनीतिक बुद्धिमत्ता के अलावा अपनी सौम्य मुस्कान, बेबाकी और स्वच्छ छवि के लिए भी मशहूर हैं। असम में कांग्रेस के खाते में २५ अतिरिक्त सीटें आई हैं, एजीपी को १४ और अन्य पार्टियों को ११ सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है।
पुडुचेरी में कुल ३० विस सीटों में से २० पर अन्नाद्रमुक और सहयोगी विजयी रहे हैं। यहाँ कुल ३० विस सीटों में से एआईएनआरसी १५ सीटों के $फायदे में हैं, एआईडीएमके को २ सीटों का $फायदा हुआ है। कांग्रेस को ३ और अन्य पार्टियों को ७ सीटों की हानि हुई है।
कांग्रेस की स्थिति
इस विस चुनावों में कांग्रेस की स्थिति मज़बूत हुई है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को २१ सीटों का, केरल में १४ सीटों का, असम में सबसे ज़्यादा २५ सीटों का $फायदा हुआ है। हालांकि, करुणानिधि प्रेम उसे तमिलनाडु में भारी पड़ा और वहां कांग्रेस को २९ सीटों से हाथ धोना पड़ा। पुडुचेरी में भी उसे ३ सीटों का घाटा हुआ है। २००९ की तुलना में अब कांग्रेस ज़्यादा मज़बूत स्थिति में है। कांग्रेस या कांग्रेस नीत सरकारें पहले की अपेक्षा अब भारत के ज़्यादा राज्यों पर शासन करती नज़र आती हैं। अगर भविष्य में मनमोहन सरकार, कलमाडी, ए राजा की तरह ही अपनी पार्टी या अपने सहयोगी पार्टियों के दा$िगयों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने का सिलसिला जारी रखती है, तो उसकी स्थिति आने वाले चुनावों में और भी मज़बूत होने के आसार नज़र आते हैं।

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