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Saturday, November 27, 2010



बिहार में नीतीश के विकास की जय
नीतिश कुमार के विकास ने आ$िखरकार चमत्कार दिखा ही दिया। लालू इसे 'जादूÓ कह ही रहे हैं। पर ये जादू या चमत्कार नहीं है। यदि ईमानदारी से प्रदेश के हित में काम किया जाए, लोगों के विकास की बात हो, तो जातिवाद, साम्प्रदायिकता जैसे $फैक्टर नगण्य हो जाते हैं।
हृ चन्द्र शे$खर सिंह
बिहार में नीतीश कुमार की बम्पर जीत ने लालू-पासवान और कंाग्रेस को ज़रूर ये सोचने को मजबूर कर दिया होगा, कि अब मतदाता को नारों-वादों से बेवकू$फ नहीं बनाया जा सकता। वो जागरूक हो गया है, जान गया है कि जातिवाद और मुस्लिम तुष्टिकरण का जाल फैलाकर लालू एंड पार्टी उसे सदा से मूर्ख बनाती रही है। हम पूर्व में भी लिख चुके हंै कि बिहार का मतदाता इस बार किसे चुनने वाला है। (देखें $खबरयार अंक 41 दिनांक 29-10-2010) बिहार चुनाव के अखाड़े में इस बार लालू, पासवान ओर कंाग्रेस थे, तो दूसरी तरफ नीतिश और भाजपा थी। लालू को बिहारी मतदाता बहुत अच्छी तरह से जान गया है। उन्होंने बहुत लम्बे समय तक बिहार पर राज किया है। पर बिहार के विकास के लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। विकास किया तो $खुद का, $खुद के परिवार का, $खुद के रिश्तेदारों का वे केन्द्र में भी पावर$फुल रहे, पर वहाँ रहकर भी उन्होंने बिहार के लिए शायद ही कुछ किया हो। हाँ, कुछ रेले ज़रूर बिहार को दीं, पर ये बिहार के लिए एक सुविधा हो सकती है, विकास नहीं। पासवान का चरित्र कोई नहीं समझ पाया। वे $िफल्मों के चंकी पाण्डे की तरह हो गये हैं। उनका अकेले कोई वजूद नहीं है, सो बेचारे लालू के साथ हो लिए पर ज़ीरो, ज़ीरो, मिलकर ज़ीरो ही रहे। $िफल्म तो हीरो से चलती है, उनकी $िफल्म $फ्लाँप हो गई है। कंाग्रेस के साथ ज़रूर यहाँ कुछ ज्य़ादती हुई है। राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इस बार बिहार में नई शुरूआत की थी। उनको इस बार पहले से अपेक्षाकृत अधिक सीटें मिलने की उम्मीद थी। पर उन्हें शायद उनकी पिछली $गलतियों ने हराया है। बिहारी मतदाता कांग्रेसी चेहरे को भी अच्छी तरह से पढ़ चुके हैं। कंाग्रेस भले ही अकेले चुनाव लड़कर एक नई शुरूआत करने का दावा कर रही थी, किन्तु मतदाता को कांग्रेस लालू, पासवान के साथ ही खड़ी नज़र आती थी। लालू, पासवान और कांग्रेस इतने लम्बे समय तक साथ-साथ रहे हैं, कि वे अलग अलग होने के बाद भी साथ में खड़े दिखते हैं। यही बात कांग्रेस को ले डूबी। नीतिश कुमार के विकास ने आ$िखरकार चमत्कार दिखा ही दिया। लालू इसे 'जादूÓ कह ही रहे हैं। पर ये जादू या चमत्कार नहीं है। यदि ईमानदारी से प्रदेश के हित में काम किया जाए, लोगों के विकास की बात हो, तो जातिवाद, साम्प्रदायिकता जैसे $फैक्टर नगण्य हो जाते हैं। हां ये चमत्कार है कि बिहार के 29 वें मुख्यमंत्री के रूप में वे विश्वासमत भी हासिल नहीं कर पाए थे, 31 वें मुख्यमंत्री के रूप में न केवल उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया है, बल्कि 32 वें मुख्यमंत्री के रूप में भी एक ताकतवर संख्याबल लेकर उभरे हैं।


जेपीसी पर जाम संसद
दूरसंचार घोटाले में जेपीसी की मांग पर गुरुवार नवंबर 25 को भी संसद जाम रही। मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी जहां एक ओर जेपीसी की मांग पर अड़ी रही, वहीं कांग्रेस थोड़ी तल्$ख हुई और कहा कि जेपीसी जांच की मांग नहीं मानी जाएगी, विपक्ष चाहे तो सरकार के $िखला$फ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है। संसदीय कार्यमंत्री पवन कुमार बंसल ने कहा कि पहले भी ऐसे दो मौके आये हैं, जब विपक्ष में रहते हुए हमने जेपीसी की मांग की थी, लेकिन उस वक्त एनडीए सरकार ने जेपीसी मांग को मान्य नहीं किया था। बंसल ने कहा कि तहलका और ताबूत घोटाले में हमने जेपीसी की मांग की थी, लेकिन उस वक्त आज की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा सत्ता में थी और उसने इस मांग को स्वीकार नहीं किया था। अब विपक्ष को चाहिए कि वह संसद को चलने दे, और संसद में किसी भी मुद्दे पर चर्चा के ज़रिए हम समस्याओं को सुलझाएंगे। अगर जेपीसी के नाम पर विपक्ष सि$र्फ प्रधानमंत्री और मंत्री के नाम सम्मन भेजने की इच्छा रखता है, तो इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा। इससे पहले राज्यसभा सभापति हामिद अंसारी ने सुबह राज्यसभा के नेताओं की एक बैठक बुलाई थी जिसमें कोई समाधान नहीं निकल सका था। बैठक में शामिल रहे भाजपा के एसएस अहलूवालिया ने कहा कि सरकार पब्लिक अकाउण्ट कमेटी से जांच का हवाला दे रही है, लेकिन पब्लिक एकाउण्ट कमेटी मंत्री से इस बारे में पूछताछ का अधिकार ही नहीं रखती है। भाजपा के राज्यसभा सांसद तरूण विजय ने भी संसद में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि जेपीसी जांच ज़रूरी है। बिना इसके हम संसद को सामान्य नहीं होने देंगे। विपक्ष की जेपीसी की जांच की मांग का समर्थन करते हुए सीपीआई सचिव ए राजा ने कहा कि अगर विपक्ष स्पेक्ट्रम घोटाले के मसले पर जेपीसी की मांग कर रहा है, और संसद की कार्यवाही बाधित है, तो सरकार को इस बारे में ज़रूर सोचना चाहिए। सरकार एवं विपक्ष का आपसी विवाद दो ताकतवर सांडों जैसा है जिसमें नुकसान तो $गरीब पड़ोसी का ही होगा जिसकी दीवार ढह ढेरी हो रही है। भारी भरकम वेतन भत्ते व करोड़ों के $खर्चे करके संसद का काम काज ठप्प करके $गरीब जनता का ही उत्पीडऩ किया जा रहा है। न सांसदों को कोई घाटा है और न सरकार को। इस पर विचार करने की किसे चिंता है।

Friday, November 19, 2010

Monday, November 15, 2010





खिसियाने सुदर्शन ने खम्बा नोंचा
अब संघ ही संग नहीं
भाजपा हुई दीन-हीन, मुद्दा विहीन
हृ चंद्रशेखर सिंह
भोपाल। सुदर्शन ने भोपाल में सोनिया गांधी पर जो टिप्पणियां की हैं, उसके बाद कांग्रेस में जो उबाल आया है, संघ और भाजपा के $िखला$फ जो प्रदर्शन शुरू हुए हैं, वो काई आश्चर्यजनक बात नहीं है। बयान के बाद सुदर्शन तो चुप हो ही गए हैं उन्होंने साथ-साथ संघ और भाजपा की बोलती भी बंद कर दी है। दरअसल सुदर्शन ने जितनी घटिया टिप्पणियां सोनिया गांधी पर की हैं, उन्हें कोई भी जायज़ नहीं ठहरा सकता। भाजपा और संघ के सि$र्फ मौन रहने, या सि$र्फ यह कह देने से, कि यह सुदर्शन की निजी राय है, संघ या भाजपा का इससे कोई लेना-देना नहीं है, काम चलने वाला नहीं है। सुदर्शन संघ से जुड़े हुए हैं, और संघ का भाजपा से चोली-दामन का साथ है। सुदर्शन ने जो आरोप लगाए हैं, वो संघ के धरना-प्रदर्शन के दौरान, यानि संघ के प्लेटफार्म पर ही लगाए हैं। इसलिए भाजपा और संघ दोनों को ही खुलकर सामने आना ज़रूरी है। यदि सोनिया गांधी पर लगाए गए आरोपों में रत्ती भर भी सच्चाई है, तो संघ और भाजपा को खुलकर सुदर्शन के समर्थन में खड़ा होना चाहिए और यदि वो इन आरोपों को सही नहीं मानते, तो सुदर्शन पर अविलंब कड़ी कार्रवाई कर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। संघ और भाजपा दोनों ही हिन्दुत्व के नाम पर संगठित हैं, और हिन्दू धर्म में नारी के सम्मान को सर्वोपरि माना गया है, ऐसे में उन्हीं के संगठन का एक पूर्व संघ सरसंचालक यदि किसी नारी पर यूं भद्दी टिप्पणियां करता है, तो उसे इसका $खमियाज़ा भुगतना ही चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है, कि आ$िखर सुदर्शन को इस तरह की घटिया टिप्पणी करने की ज़रूरत क्यों पड़ गई। अगर बीते माह पर नज़र डालें तो लगता है कि हालात कुछ ऐसे बन पड़े, कि खिसियानी बिल्ली खंबा नोंचे वाली कहावत चरितार्थ हो गई।
बीते माह तक भाजपा मज़बूत स्थिति में थी। कॉमनवेल्थ गेम्स में जिस तरह से भ्रष्टाचार की $खबरें आईं, उससे बेजान होती भाजपा में जान आ गई। ए. राजा का मुद्दा उनके पास पहले से ही था। उसके बाद ही मुंबई का आदर्श सोसायटी फ्लैट वितरण घोटाले में महाराष्ट्र के सीएम का नाम आने के बाद, तो भाजपा लगभग पावर में आ गई थी। कांग्रेस की यूपीए सरकार के $िखला$फ विस्फोट करने के लिए उसके पास भरपूर मात्रा में बारूद इकट्ठा था। संघ पर लगे आतंकवाद के आरोपों का मुंहतोड़ जवाब होता ये, किंतु तीन दिन पहले ही कांग्रेस ने कलमाड़ी और महाराष्ट्र सीएम की कुर्सी से अशोक चव्हाण को विदा करके, भाजपा संघ के थोक में जमा बारूद को गीला कर दिया। संघ का कांग्रेस के $िखला$फ धरना-प्रदर्शन पूर्व नियोजित था। उसी कार्यक्रम में बौखलाए संघ के सुदर्शन ने उक्त बयान देकर अपनी भड़ास निकाल ली, लेकिन उक्त बयान उन्हीं के लिए गले की हड्डी बनकर दर्दनाक हो गया है। संघ ही उनके संग नहीं है।
भाजपा भी उनके बयान के बाद और दीन हीन हो गई है। कहां वो भ्रष्टाचार के $िखला$फ आंदोलन चलाना मनमोहन सोनिया के पुतले जलाने की जुगत भिड़ा रही थी। कहां आज उनके $खुद के नेताओं के पुतले उनके द$फ्तरों के सामने फुंक रहे हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स और मुंबई $फ्लैट घोटाले में जो जन समर्थन भाजपा को मिलने की उम्मीद थी, वो भी सुदर्शन के बयानों से उससे छिटक गया है। सोनिया गांधी पर लगाए बेहूदे आरोपों ने आम जनता को भी अपने $िखला$फ खड़ा कर लिया है।
अभी व$क्त है, भाजपा और संघ यदि अभी भी सुदर्शन के प्रति उदार रवैया नहीं छोड़ते, तो उनकी हालत भी महाभारत के धृतराष्ट्र जैसी होनी तय है, जो पुत्रमोह में अपना कुल ही गंवा बैठा था।

नये निज़ाम के दामन पर हैं ज़्यादा दा$ग
हृ निरंजन परिहार
मुंबई। महाराष्ट्र के नए निज़ाम भी कोई दूध के धुले नहीं हैं। कांग्रेस आलाकमान ने अशोक चव्हाण को $फजऱ्ीवाड़े से $फ्लैट पाने के आरोप में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की गद्दी से हटा दिया। लेकिन नए मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण भी उसी तरह के $फजऱ्ीवाड़े में गले तक डूबे हुए हैं। उन्होंने जितने बड़े बड़े झूठ बोलकर सरकार से $फ्लैट हथियाए हैं, वे कांग्रेस के लिए ज़्यादा दागदार हैं।
पृथ्वीराज चव्हाण के चेहरे पर भ्रष्टाचार की कालिख नई नहीं है। सात साल पहले का मामला है। पृथ्वीराज चव्हाण ने 2003 में सरकार से सस्ते $फ्लैट लेने के लिए सरकार के सामने गलत दस्तावेज सौंपे थे। मुंबई के वड़ाला स्थित भक्ति पार्क में उनका $फ्लैट है, जो उन्होंने $फजऱ्ी दस्तावेज के आधार पर ही लिया है। अर्बन लैंड सीलिंग एक्ट के तहत महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने 2003 में ये $फ्लैट पृथ्वीराज चव्हाण को अलॉट किया था। और सबूत के जो का$गज़ात सामने आए हैं, उनके मुताबिक जो इस $फ्लैट को पाने के लिए पृथ्वीराज ने जो कई तरह के झूठ बोले। उनमें से एक झूठ यह भी है कि चव्हाण ने $फ्लैट लेने के लिए $खुद को आमदार यानि महाराष्ट्र का एमएलए बताया था, जबकि उस वक्त पृथ्वीराज चव्हाण मध्यप्रदेश में थे। इसके अलावा एक झूठ यह भी है कि चव्हाण ने यह $फ्लैट पाने के लिए तब अपनी सालाना कमाई सिर्फ 76 हज़ार रुपए ही बताई थी। जबकि तब वे सांसद थे और भारत के किसी भी सांसद को साल भर में कितनी सैलरी मिलती है यह किसी से भी छुपा हुआ नहीं है। दरअसल, कहानी ये है कि महाराष्ट्र अर्बन लैंड सीलींग एक्ट के तहत अपने विशेष कोटा में से पांच $फीसदी $फ्लैट बहुत ही कम कीमत पर मुख्यमंत्री किसी को भी अलॉट कर सकते हैं । लेकिन स्कीम के तहत पिछले सोलह सालों में करीब 85 $फीसदी $फ्लैट नेताओं या उनके रिश्तेदारों को ही बांटे गए।
यही नहीं, ईमानदार और बेदाग छवि बताकर कांग्रेस ने जिन पृथ्वीराज चव्हाण को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाकर भेजा है, उन पर चुनाव लडऩे के लिए दिए गए संपत्ति के घोषणापत्र में भी अपनी बहुत सारी संपत्ति छुपाने का आरोप है। पृथ्वीराज चव्हाण ने सासंद का चुनाव लडऩे के वक्त जो शपथपत्र दिया, उसमें अपनी सतारा की खेती की ज़मीन का कोई जि़क्र ही नहीं किया। कांग्रेस ने पृथ्वीराज चव्हाण के बारे में ईमानदारी के बड़े - बड़े दावों और पाक सा$फ दामन की सोच-समझ के साथ महाराष्ट्र की गद्दी के लिए उनके नाम का एलान किया। पृथ्वीराज चव्हाण को गद्दी सैंपने के पीछे यह सोच भी रही, कि अशोक चव्हाण की वजह से भ्रष्टाचार के जो दा$ग कांग्रेस के दामन पर लगे हैं, उनको ये नए चव्हाण धो देंगे। लेकिन सियासत के जंगल में जब गड़े मुर्दे उखड़ते हैं, तो अच्छे-अच्छों के चेहरों पर कालिख पुती नज़र आती है। पृथ्वीराज चव्हाण के चेहरे पर भी भ्रष्टाचार, $फजऱ्ीवाड़े और झूठे हल$फनामे देने के कलंक की जो कालिख पुती नज़र आ रही है, उससे सा$फ लगता है कि कांग्रेस के ज़्यादातर लोगों के दामन दा$गदार ही हैं।
कुल मिलाकर कांग्रेस भले ही कितना प्रचार करे और पृथ्वीराज चव्हाण को भले ही कितना भी ईमानदार और सा$फ छवि का घोष्त कहे, लेकिन $फ्लैट आवंटन के साथ साथ चुनाव आयोग के सामने दिए गए संपत्ति के शपथ पत्र की जांच करने के लिए मामले की तह में जाएं और सारी बातों को ध्यान से देखें, तो पृथ्वीराज चव्हाण का दामन भी कोई कम दा$गदार नहीं है। $फ्लैट आवंटन में अशोक चव्हाण के तो रिश्तेदारों के ही नाम थे, लेकिन पृथ्वीराज चव्हाण तो $खुद $फजऱ्ीवाड़ा करके $फ्लैट पाने में कामयाब रहे हैं। भ्रष्टाचार का दलदल यहां भी है और अशोक चव्हाण पर तो कीचड़ के कुछ छींटे ही उड़े हैं, पृथ्वीराज चव्हाण तो $खुद उसके दलदल में गले तक डूबे हैं। इसीलिए कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र के नए निज़ाम भी कोई दूध के धुले नहीं हैं।

Friday, November 5, 2010



दीवाली पर दीवाला

अशोक चव्हान आह$िखर कब तक?
सेना के चंद बड़े अधिकारियों के संग प्रदेश व जि़ले के अनेक अधिकारी निशाने पर
दीपावली से ठीक पहले कुर्सी पर छाए संकट से हताश चह्वाण ने मुख्यमंत्री पद के दावेदारों को भी आदर्श सोसाइटी घोटाले में लपेटने की कोशिश की। इससे आलाकमान की रही-सही सहानुभूति भी उनके प्रति $खत्म होने के संकेत हैं। चह्वाण की मुख्य ताकत माने जाने वाले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने भी उन्हें मिलने का समय नहीं दिया। चह्वाण मामले की जांच कर रहे एके एंटनी ने रविवार को सा$फ कहा कि श्मामले की जांच में वक्त लगेगा, लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं।
हृ चन्द्रशेखर सिंह
मुंबई (महाराष्ट्र)। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण के बचने की उम्मीदें क्षीण होती जा रही हैं। वैसे, कांग्रेस नेतृत्व के सामने भी उनका उत्तराधिकारी चुनने का संकट कम नहीं है। शनिवार अक्टूबर 30 को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस्ती$फे की पेशकश करने के बाद चह्वाण रविवार को सारा दिन इस विवाद से उबरने की कोशिश करते रहे। हालांकि उनका हर प्रयास दलदल में हाथ-पैर मारने जैसा रहा। दीपावली से ठीक पहले कुर्सी पर छाए संकट से हताश चह्वाण ने मुख्यमंत्री पद के दावेदारों को भी आदर्श सोसाइटी घोटाले में लपेटने की कोशिश की। इससे आलाकमान की रही-सही सहानुभूति भी उनके प्रति $खत्म होने के संकेत हैं। चह्वाण की मुख्य ताकत माने जाने वाले कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने भी रविवार अक्टूबर 31 को उन्हें मिलने का समय नहीं दिया। चह्वाण मामले की जांच कर रहे एके एंटनी ने रविवार को सा$फ कहा कि मामले की जांच में वक्त लगेगा, लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं। एंटनी के बयान के निहितार्थ यही निकाले जा रहे हैं कि यह ज़रूरी नहीं है कि चह्वाण के बारे में अंतिम $फैसले के लिए दीपावली या ओबामा के भारत दौरे तक का इंतज़ार किया जाए। हालांकि, इस $फैसले में सबसे बड़ी बाधा चह्वाण के नए उत्तराधिकारी को चुनने की चुनौती ही है।
पुराने चेहरे ही आज़माए जाएं या फिर किसी नए पर भरोसा जताया जाए तो वह कौन हो? बहरहाल, रविवार रात ही कोलकाता से लौटे प्रणब मुखर्जी और एंटनी के बीच इस मसले पर विचार के लिए बैठक हुई। इन दोनों नेताओं कीे इस मसले का हल निकालने की जि़म्मेदारी दी गई है। चह्वाण ने भी मुखर्जी से मिलने का समय मांगा हुआ है।
माना जा रहा है कि दो नवंबर को कांग्रेस की कार्यसमिति के बाद भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के बारे में $फैसला लिया जा सकता है। हालांकि, प्रणब और एंटनी के सामने नए चेहरे को चुनने की चुनौती होगी। मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को हटाने के बाद इन्हीं दोनों ने अशोक चह्वाण का नाम तय किया था। विधानसभा चुनाव के बाद जब फिर महाराष्ट्र में सरकार बनी तो राहुल ने चह्वाण के सिर पर हाथ रख दिया। इसके बाद सारी दावेदारी $खत्म हो गई। दिक्कत यह है कि गांधी परिवार के साथ-साथ प्रणब व एंटनी भी चह्वाण के प्रति अच्छी राय रखते रहे हैं। लेकिन, करगिल की विधवाओं के नाम पर बनी आदर्श हाउसिंग सोसाइटी में चह्वाण के परिवार के नाम से चार $फ्लैट आने के बाद कांग्रेस नेतृत्व मान रहा है कि इस मामले में अब कोई स$फाई जनता के सामने काम नहीं करेगी। लिहाज़ा, चह्वाण को बचाने का संदेश जनता में बहुत $खराब जाएगा। हालांकि, चह्वाण से पहले मुख्यमंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे और विलासराव देशमुख समेत महाराष्ट्र के कई बड़े नाम भी इस घोटाले में जुड़ रहे हैं। वहीं दिल्ली में महाराष्ट्र के चेहरों का कद और रुतबा इतना नहीं है कि वे राज्य में सहयोगी व एनसीपी नेता शरद पवार के सामने खड़े हो सकें। यही कारण है कि चह्वाण ने दिल्ली में अपने प्रवास के दौरान इन नेताओं के $िखला$फ भी मीडिया में $खबरें दीं। इसे आलाकमान ने और गंभीरता से लिया है। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री देशमुख ने तो उल्टे चह्वाण पर ही हमला बोल दिया। उन्होंने कहा कि मेरी इसमें कोई भूमिका नहीं। जब यह मामला मेरे सामने आया था तो मैंने इसे राजस्व विभाग उस समय राजस्व मंत्री भी सुरेश चह्वाण ही थे, के सुपुर्द कर दिया था। आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाले में कांग्रेस और राकांपा के और नेताओं के जुड़े होने की खबरों के बीच महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे, सुशील कुमार शिंदे और राकांपा के अजीत पवार ने सभी आरोपों का खंडन किया है। इन नेताओं ने रविवार को दावा किया कि उन्होंने श्सदस्यता के लिए किसी भी व्यक्ति की सि$फारिश नहीं की थी। वर्तमान में केंद्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने इस मामले में कहा, आदर्श मोर्चे पर दिल्ली में बहुत कुछ नहीं हो रहा है। यह सि$र्फ समाचार पत्र हैं जो हो-हल्ला मचा रहे हैं।श राज्य के एक अन्य पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने कहा, मुझे ऐसा एक भी व्यक्ति दिखाएं, जो मेरा रिश्तेदार हो या जिसे मैं जानता हूं, जो सोसाइटी का सदस्य हो। जबकि राकांपा के मुखिया शरद पवार के भतीजे और इस वक्त महाराष्ट्र सरकार में मंत्री अजीत पवार ने कहा, मैंने सदस्यता के लिए किसी के भी नाम की अनुशंसा नहीं की है। इन नेताओं के बयान टेलीविजन चौनलों की उन रपटों के मद्देनज़र आया है जिसमें कहा गया है कि महाराष्ट्र के कांग्रेस-राकांपा के कुछ शीर्ष नेताओं ने आदर्श सोसाइटी में अपने सहयोगियों और जान-पहचान के लोगों को $फ्लैट दिलाने के लिए उनके नामों की सिफारिश की थी। इन नेताओं ने ऐसी खबरों को $खुद को बदनाम करने की साजिश बताया है। पूर्व मुख्यमंत्री व केन्द्रीय मंत्री विलास राव देशमुख से जुड़े 3 लोगों को आदर्श हाउसिंग सोसाइटी में $फ्लैट मिला है जिनके नाम हैं-अमोल वी.खरभरी, किरन भदंगे,उत्ताम घकरे। पूर्व मुख्यमंत्री व केन्द्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे से जुड़े डव्लू खनखोजे को $फ्लैट मिला है। मंत्री नारायण राणे के परिजन रूपाली रावराणे, गिरिश प्रवीणचन्द्र मेहता को $फ्लैट मिला है। उर्जा मंत्री अजीत पवार से जुड़े कृष्णराव भेगड़े और शिवाजी राव काले को $फ्लैट मिला है। गृहमंत्री आरआर पाटिल के परिजन चन्द्रशेखर गयकवाड़ को मिला है। ग्रामीण विकास मंत्री जयंत पाटिल के रिश्तेदार आदित्य पाटिल को मिला है। पूर्व मंत्री शिवाजी निलंगेकर के सहयोगी अरूण डावले और सम्पत खिड्से को मिला है। खाद्य आपूर्ति मंत्री अनिल देशमुख से जुड़े मुकुन्द राव मांकड़ को $फ्लैट मिला है। मंत्री पतंगराव कदम से जुड़े बालासाहब सावंत को $फ्लैट मिला है। सूत्रों के मुताबिक कारगिल के शहिदों के परिजनों के लिए बने इस आदर्श हाउसिंग सोसाइटी में बिल्डर के साथमिलकर घोटाला करने में कांग्रेसी और राकापा के नेता तो गले तक डूबे ही हैं, शिव सेना और भाजपा के भी कई नेताओं और उनके लग्गूओं-भग्गूओं ने भी बहती गंगा में डुबकी लगाई है।
जहां $फाईल पहुंची उसी ने मारा हाथ
सपनों के शहर मुंबई के मुंह पर ऐसी कालिख शायद ही कभी लगी हो। मुंबई के कोलाबा स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी की जैसी कहानी सामने आ रही है, वह दिल दहला देनेवाली है। जिस शहर में इंच-सेन्टीमीटर में भी रहने की जगह का हिसाब रखा जाता हो, वहां एक 31 मंजि़ला बिल्डिंग अवैध ज़मीन पर, अवैध तरीके से खड़ी कर दी गयी। भवन को खड़ा करने का यह भ्रष्टाचार उतना संगीन नहीं है, जितना संगीन है यह समाचार कि यह भवन 1999 में कारगिल में शहीद जवानों की विधवाओं को आवासीय सुविधा देने के लिए तैयार किया जानेवाला था। कोलाबा के पास जिस स्थान पर यह भवन सीना तान खड़ा हुआ है उसकी हकीकत इतनी गंदी है, कि किसी भी स्वाभिमानी नागरिक का सिर शर्म से झुक जाएगा।
इस भ्रष्टाचार की तह में जाने से पहले यह जान लें कि कोलाबा के जिस ब्लाक-4 पर यह भवन बना है, वह सेना के लिए रिज़र्व रखी गयी ज़मीन है, जिसे महाराष्ट्र सरकार को सांताक्रूज में वेस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे के लिए ली गयी ज़मीन के बदले में देना था। कोलाबा के ब्लाक-4 में ज़मीन का यह टुकड़ा सेना को इसलिए दिया जाना था, क्योंकि यहां पहले से नेवी का पश्चिमी कमान का आ$िफस और आवासीय परिसर विकसित हो रहा था। भूमि की इस अदला बदली के प्रस्ताव में यह बात भी कही गयी थी, अगर राज्य सरकार बदले में ज़मीन नहीं दे पाती है तो वह सेना को पैसा अदा करेगी। 1973 में इसी ब्लाक-4 पर बेस्ट को बस स्टैण्ड बनाने के लिए 5। 14 एकड़ ज़मीन दे दी गयी। क्योंकि सड़क का विस्तार होना था, इसलिए 200 फुट की सड़क के लिए जगह छोड़कर बेस्ट ने बस डिपो बना लिया। लेकिन मुश्किल वही, कि $खाली जगह और वह भी दक्षिण मुंबई के अति सिमटे हुए कोलाबा इलाके में, भला खाली कैसे बची रह सकती थी? इन्क्रोचमेन्ट होना शुरू हो गया, जिसे रोकने के लिए पेड़ पौधे लगाने का काम शुरू कर दिया गया। यहां यह याद रखिए अभी तक सेना को यह ज़मीन आधिकारिक तौर पर सौंपी नहीं गयी थी। 27 अक्टूबर 1996 को मेजर जनरल बी ए करियप्पा ने इस पार्क का उद्घाटन भी कर दिया। असली खेल इसके चार साल बाद शुरू हुआ।
2000 में राज्य सरकार ने एक प्रस्ताव पारित करके कोलाबा ज़ोन-4 में परेड ग्राउण्ड, हैलीपैड, बेस्ट बस डिपो और रहिवासी कालोनी को स्वीकृति दे दी। साथ ही 200 $फीट जगह का उपयोग करने के लिए प्रस्तावित सड़क को घटाकर 60 फुट का घोषित कर दिया। बस आदर्श हाउसिंग सोसायटी के लिए सरकार के आला अधिकारियों ने आदर्श स्थिति पैदा कर दी थी। अब सवाल यह है कि इसे किसका भ्रष्टाचार कहें? जब सेना को सरकार ने अभी तक ज़मीन सौंपी ही नहीं थी, तो भला सेना ने किस हैसियत से वहां हाउसिंग कालोनी बनाने का प्रस्ताव पेश कर दिया? राज्य सरकार ने भी जब ज़मीन सेना को देने के लिए सुरक्षित रखा था तो फिर सेना को देने की बजाय वहां हाउसिंग कालोनी के प्रस्ताव को स्वीकार कैसे कर लिया? क्या सेना के उच्चाधिकारियों, अ$फसरों और रक्षा मंत्री ने ज़मीन के इस टुकड़े के लिए भ्रष्टाचार किया? या फिर राज्य सरकार के अधिकारियों और नेताओं ने भ्रष्ट तरीके से अपने लिए प्राइम लोकेशन पर एक आशियाना तैयार कर लिया? आप $गौर से अगर पूरे घटनाक्रम पर नज़र दौड़ाएंगे तो पायेंगे, कि ज़मीन के इस टुकड़े पर बिल्डिंग खड़ी करने के लिए सेना और राज्य सरकार दोनों की ओर से भ्रष्टाचार किया गया। इस ज़मीन पर भवन बनाने के लिए जिसके पास से $फाइल गुज़री, उसने अपनी रात गुज़ारने की व्यवस्था कर ली। 2001 में जब सोसायटी बनाने के लिए आवेदन किया गया, तबसे लेकर सोसायटी को मंज़ूरी मिलने तक जहां जहां से $फाइल गुज़री उसके किसी न किसी रिश्तेदार, नातेदार का नाम बन रही बिल्डिंग में $फ्लैट पाने के लिए जुड़ गया।
इस बिल्डिंग को छह मंजि़ल से अधिक ऊंची उठने की परमीशन नहीं मिल सकती थी लेकिन यह बिल्डिंग 31 मंजि़ल तक उठती चली गयी। कोई भी जानना चाहेगा कि ऐसा क्यों और कैसे हो गया? मुंबई में भवन निर्माण के लिए जिस जादुई ए$फएसआई ($फ्लोर स्पेश इंडेक्स) की ज़रूरत है उसे बेस्ट की खाली पड़ी ज़मीन से लेकर पूरा कर लिया गया और भवन को 30 मीटर की जगह 100 मीटर से भी ऊंचा बना दिया गया। अब जरा देखिए कि कहां कहां किसने अपने नाम इस भवन में अपने लिए $फ्लैट सुरक्षित करवाया। पश्चिमी नेवल कमान के प्रमुख संजय भसीन ने नेवी ची$फ को लिखे जिस पत्र से इस भ्रष्टाचार की परतें उघडऩी शुरू हुई, ने अपनी चि_ियों में लिखा है कि सेना के सर्वोच्च सेनानायकों ने भी संसद को गुमराह किया है। 2003 में जब इस ज़मीन के मालिकाना हक के लिए संसद में तारांकित सवाल उठाया गया तब भी आला सैन्य अधिकारियों ने संसद को गुमराह किया था। गुमराह करने का परिणाम यह हुआ सेना के दो पूर्व आर्मी ची$फ एनसी विज और दीपक कपूर को इस सोसायटी में $फ्लैट मिल गया। संभवत: सेना को इसलिए उपकृत किया गया क्योंकि कानूनन यह ज़मीन सेना की नहीं थी, लेकिन सेना चाहती तो इस ज़मीन के आवंटन को रोकने के लिए सवाल उठा सकती, क्योंकि किसी भी सैनिक प्रतिष्ठान या हैलीपैड के आस पास इस तरह के भवन निर्माण को भी कानूनन इज़ाजत नहीं दी जा सकती। फिर भी सेना न सि$र्फ मौन रही, बल्कि उसने शहीद सेनानायकों की विधवाओं को $फ्लैट देने के नाम पर प्रस्ताव को मंज़ूर कर दिया। इसके बाद नगर विकास मंत्रालय के सचिव ने इस प्लान को मंज़ूर कर लिया, तो तत्कालीन सचिव पीवी देशमुख और रामानंद तिवारी के परिजनों का नाम भी इस सूची में जुड़ गया। जैसे-जैसे विभिन्न विभागों से मंज़ूरी मिल रही थी अ$फसर सोसायटी में सदस्यता ग्रहण करके अपनी चौथ वसूल रहे थे। मूल रूप से 40 $फ्लैट की इस सोसायटी में जब भ्रष्ट अधिकारियों के लिए जगह कम पडऩे लगी तो ए$फएसआई बढ़ाने की ज़रूरत महसूस हुई। इसके लिए बेस्ट की ए$फएसआई को इस्तेमाल करके भवन में 95 $फ्लैटों को मंज़ूरी मिल गयी। इसका पुरस्कार तत्कालीन बेस्ट जीएम उत्तम खोब्रागडे की बेटी देवयानी का नाम बतौर सदस्य इस सोसायटी में जुड़ गया। इसके आगे जब कोआपरेटिव हाउसिंग सोसाटयी को मंज़ूरी के लिए तत्कालीन कलेक्टर प्रदीप व्यास के पास भेजा गया तो उनकी आईएएस पत्नी सीमा व्यास का नाम जुड़ गया। सोसायटी को शैक्षणिक संस्था से जोडऩे के लिए तत्कालीन शिक्षा निदेशक जेएम अभ्यंकर के पास $फाइल पहुंची तो सोसायटी में बतौर सदस्य उनका भी नाम जुड़ गया। कोआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी थी इसलिए तत्कालीन सहकारिता मंत्री बाबा साहेब कुपेकर के लिए भी इस सोसायटी में एक $फ्लैट आरक्षित हो गया। हालांकि इस समय सारी चर्चा मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण के रिश्तेदारों के नाम आरक्षित $फ्लैट पर केन्द्रित हो गयी है और सीबीआई पता लगाएगी कि ज़मीन का मालिकाना हक आ$िखरकार किसके पास है और यहां जो भवन निर्माण हुआ है, उसके लिए कौन कौन कितनी मात्रा में जि़म्मेदार है? सवाल यह है कि सेना और सरकार के उच्च अधिकारियों की मिलीभगत से मुंबई के इस प्राइम लोकेशन पर जगह पाने के लिए जो भ्रष्टाचार किया गया, क्या केवल इसकी जांच करने मात्र से सेना और सरकार के अधिकारियों के पाप धुल जाते हैं? अगर ऐसा नहीं है, तो फिर उन दोषियों के लिए क्या सज़ा निर्धारित की जाएगी जो इस भ्रष्टाचार में शामिल पाये जाएंगे?
सीबीआई से भी झूठ बोला सरकार ने
महाराष्ट्र सरकार के असहयोग के कारण आदर्श सोसाइटी घोटाले की जांच शुरू नहीं हो पा रही है। सीर्बीआई ने लगभग एक महीने पहले महाराष्ट्र सरकार से आदर्श सोसाइटी के लिए सेना के ज़मीन के आवंटन से संबंधित का$गज़ात मांगे थे, लेकिन अब तक वे सीबीआई को नहीं दिए गए हैं। सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इन का$गज़ात के मिलने के बाद ही जांच शुरू हो पाएगी। इस घोटाले में $खुद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण का नाम सामने आया है। सीबीआई के मुंबई ब्रांच के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि आदर्श सोसाइटी घोटाले की जांच के लिए सेना की ओर से अनुरोध आ चुका है। इसके बाद सीबीआई ने महाराष्ट्र सरकार के संबंधित विभागों से इस सोसाइटी को मंज़ूरी दिए जाने संबंधित सभी का$गज़ात मांगे थे, जिससे आरोपों की पड़ताल कर दोषी अधिकारियों के $िखला$फ ए$फआइआर दर्ज की जा सके लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने अभी तक सीबीआई को ये का$गज़ात नहीं सौंपे। सीबीआई के उक्त वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार से का$गज़ात मिलते ही जांच शुरू कर दी जाएगी। उनके अनुसार इस मामले में जांच शुरू करने के लिए राज्य सरकार की अनुशंसा की ज़रूरत भी नहीं है, क्योंकि यह ज़मीन सेना की थी और सेना से संबंधित मामलों की जांच सीबीआई के अधिकार क्षेत्र में आती है। सीबीआई अगले ह$फ्ते एक बार फिर राज्य सरकार को ये का$गज़ात जल्द उपलब्ध कराने के लिए कहेगी।
सलाम लेने वाले सलाखों के पीछे!
आदर्श सोसायटी के आदर्श घोटाले में कुल मिला कर बहुत सारी बहुएं और पत्नियां शामिल हैं और उन्हें अगर अभियुक्त का दर्जा दे दिया गया, तो देश के बहुत सारे वीआईपी अपनी पत्नियों के ज़मानत करवाते नज़र आएंगे। आदर्श सोसाइटी विवाद मामले में सेना के अ$फसरों पर लगे आरोप पर सेना ने कोर्ट ऑ$फ इंक्यारी का आदेश दे दिया है। अधिकारियों की आय की भी जांच की जाएगी। इस मामले में पूर्व सेनाअध्यक्ष दीपक कपूर, एन सी विज समेत सेना के कई बड़े ऑ$िफसर जांच के दायरे में होंगे। आदर्श सोसाइटी घोटाले में महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री के अलावा महाराष्ट्र के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के नाम भी सामने आए हैं। इस मामले में लगातार नए-नए खुलासे हो रहे हैं। महाराष्ट्र के तीन पूर्व मुख्यमंत्री और चार मंत्रियों ने करगिल के शहीदों के हक पर डाका डाला है। इन पर आरोप है कि शहीदों की ज़मीन पर तैयार $फ्लैट अपने चहेतों को दिलवा दिए। इसके अलावा महाराष्ट्र के पांच मंत्रियों ने भी करगिल के शहीदों के हक पर डाका डाला। शरद पवार के भतीजे और महाराष्ट्र सरकार में जल संसाधन मंत्री अजीत पवार पर अपने दो करीबियों को आदर्श सोसाइटी के $फ्लैट दिलाने का आरोप है। गृह मंत्री आर। आर। पाटिल, खाद्य और नागरिक आपूर्त मंत्री अनिल देशमुख, वन मंत्री पतंगराव कदम और तत्कालीन राजस्व मंत्री शिवाजी राव निलांगेकर भी आरोपों के घेरे में है। इस महाघोटाले में अब तक महाराष्ट्र के 8 बड़े राजनेताओं के नाम सामने आ चुके हैं। इसमे पहला नाम महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलास राव देशमुख का है। देशमुख ने अपने 3 करीबियों को $फ्लैट दिलाए।
उन्होंने उत्ताम घाकरे, किरण भडांगे, और अमोल करभानी को $फ्लैट दिलाने की सिफारिश की। देशमुख ने ही आदर्श सोसाइटी को पर्यावरण और दूसरी मंज़ूरी दी थी। दूसरा नाम महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे का है। राणे ने अपने 2 करीबियों को $फ्लैट दिलाए। राणे ने गिरीश मेहता और रुपाली राव राणे को $फ्लैट दिलवाए। राणे 1999 में मुख्यमंत्री थे। 1999 में उन्होंने आदर्श सोसाइटी को पहली मंज़ूरी दी। तीसरा नाम सुशील कुमार शिंदे का है। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शिंदे पर अपने एक करीबी मेजर खानकोजे को $फ्लैट दिलाने का आरोप है। इसके अलावा 2004 में मुख्यमंत्री रहे शिंदे ने आदर्श सोसाइटी को अंतिम मंज़ूरी भी दी थी। आदर्श सोसाइटी घोटाले में $खुलासे के बाद दिल्ली में कांग्रेस कार्यालय में राजनीतिक और कुटनीतिक हलचले तेज़ हो गई हैं। सूत्रों का कहना है कि घोटाले में शामलि लोगों की $फेहरिस्त का$फी लंबी है। अब तो कांग्रेस में वैसे लोगों की खोज की जा रही है जो इस घोटाले में शामिल नहीं है। सूत्रों की मानें तो सोनिया गांधी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए ही दो लोगों की कमेटी जांच के लिए बनाई है। ये कमेटी सि$र्फ महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण की संलिप्त होने की ही जांच नहीं करेगी। बल्कि तीन पूर्व मुख्यमंत्री सहित 4 मंत्रियों के संलिप्त होने की जांच भी करेगी। सूत्रों की मानें तो वित्ता मंत्री प्रणब मुखर्जी और ए.के. एंटनी एक समग्र रिपोर्ट तैयार करेंगे। इस घोटाले के बाद सवाल उठने लगा है कि क्या विपक्ष चव्हाण को ही निशाने पर लेगी या पूरे घोटाले बाज़ों पर भी निशाना लगाएगी। वहीं अपने नज़दीकी को $फायदा दिलाने के सवाल पर महाराष्ट्र के वन मंत्री पंतग राव देशमुख ने कहा कि मेरा इस घोटाले से कोई लेना देना नहीं है। मैने किसी की भी सि$फारिश नहीं की। मैं सारे तथ्य सीबीआई के सामने रखूंगा।


शिवराज निपटाएंगे अपने गृह विभाग को
मुख्यमंत्री के निर्देशों को लंबे समय से दबाकर बैठे गृह विभाग की कार्यप्रणाली सोमवार को निशाने पर आ सकती है। मुख्यमंत्री एक नवंबर को पुलिस के कामकाज की समीक्षा करेंगे। इसकी तैयारी शुरू होते ही मंत्रालय से लेकर पुलिस मुख्यालय तक रविवार को भी गहमागहमी का माहौल बना रहा। साथ ही दिन भर लंबित मामलों को निपटाने के प्रयास चलते रहे। जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री श्री चौहान की सर्वाधिक नाराजगी का सामना गृह व वित्ता विभाग के अ$फसरों को करना पड़ सकता है। इसकी पहली वजह तो बनेगा प्रस्तावित सुरक्षा एक्ट। मुख्यमंत्री की प्राथमिकता के बावजूद प्रदेश के महत्वपूर्ण स्थलों की सुरक्षा से जुड़े इस एक्ट के मसौदे को गृह विभाग लंबे समय से दबाकर बैठा है। पुलिस मुख्यालय द्वारा तैयार इस एक्ट को विभाग अब तक सचिव स्तर की कमेटी के सामने ही नहीं रख पाया है। जबकि इसे अमली जामा पहनाते हुए जल्द से जल्द हाईपावर कमेटी के साथ ही केबिनेट के सामने रखा जाना था। इसके तहत हाईराइज़ बिल्डिंग, मॉल, बड़े-बड़े शोरूम व निजी द$फ्तरों की सुरक्षा की गारंटी इनके प्रबंधन को ही लेना होगी। विभाग में लगभग यही स्थिति मुख्यमंत्री के अधिकांश आदेश-निर्देशों की बनी हुई है। मुख्यमंत्री अब तक पुलिस से जुड़े मुद्दों पर डेढ़ दर्जन निर्देश दे चुके हैं। इनमें से महज़ तीन पर ही विभाग और पीएचक्यू अमल कर सका है। पदों की वृध्दि, केवल थानों के लिए पुलिस बल तथा भूतपूर्व सैनिकों की बटालियन के गठन के ही आदेश विभाग से निकले हैं। शेष पंद्रह पर विभाग को जवाब देना पड़ सकता है। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री द्वारा इस बैठक में मंथन के अलावा अब तक दिए गए सभी निर्देशों की समीक्षा की जाएगी। साथ ही पुलिस बल व सुविधाओं के युक्तियुक्तकरण तथा गंभीर अपराधों की भी समीक्षा की जाना है। इन सभी को लेकर मंत्रालय से ऊपर से नीचे तक अधिकारी अवकाश के दिन भी माथापच्ची में जुटे रहे। इसके चलते मंत्रालय और पुलिस मुख्यालय के बीच भी दौड़भाग बनी रही।

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