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Friday, December 3, 2010





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जश्न में दबे प्रश्न
पांच साल की पारी: गौरव दिवस के जश्न
शिवराज इन दिनों अपनी उपलब्धियों का जश्न मना रहे हैं। वे अपनी उपलब्धियां गिना रहे हैं, इतरा रहे हैं। जानकार मानते हैं कि उनकी सि$र्फ एक उपलब्धि है, कि उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया है, और चुनाव जीतने के बाद फिर एक नए कार्यकाल को पूरा करने की तर$फ अग्रसर हैं। उनका जश्न मनाना जायज़ है, मध्यप्रदेश में भाजपा के एकमात्र वही मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने ये रिकार्ड बनाया है, उनको हमारी भी बधाई और शुभकामनाएं। इस जश्न में यदि उनके साथ प्रदेश की जनता भी खड़ी नज़र आती तो यकीनन यही शिवराज की सबसे बड़ी उपलब्धि होती। पर सच तो ये है कि शिवराज अपनी जितनी योजनाएं गिनकर बता रहे हैं, उनसे ज़्यादा गिनती तो उनके शासनकाल में हुए घपले-घोटालों की है, जिनमें वे $खुद भी कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं। उनकी कामयाब सत्तायात्रा के लिए कांग्रेस का भी योगदान रहा है, जो अपनी आपसी खींचतान में ही अपनी सारी ऊर्जा झोंक रही है। शिवराज सिंह चौहान के शासनकाल की पोस्टमार्टम करती सरिता अरगरे की रपट -
मध्य प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी के पाँच साल निर्विघ्न पूरे होने की $खुशी में भाजपा राजधानी में पूरे जोशो$खरोश के साथ जश्न मनाने में जुटी है। केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की तजऱ् पर राज्य में शिवराज सिंह प्रदेश की $गैैर काँग्रेसी सरकार के पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं , जो पाँच साल की लम्बी पारी खेलने में कामयाब रहे हैं। इससे पहले तक बीजेपी की सरकारों में आयाराम-गयाराम का दौर ही देखा गया है। ऐसे में बीजेपी का जश्न मनाना तो ह$क बनता है ! लेकिन बीजेपी शिवराजसिंह को जिस तरह से सिर माथे पर बिठाकर गौरव दिवस मनाने में लगी है,वो पार्टी नेतृत्व की सोच,समझ और क्षमताओं पर ही सवाल खड़े करता है । सरकार के जश्न में डूबने से ज्य़ादा बेहतर है कि पार्टी यह विचार करे कि शिवराजसिंह के नेतृत्व में प्रदेश ने क्या पाया और क्या खोया?
घोषणायें, दौरे, व वायदों के पिटारे
शिवराज सिंह के अब तक के कामकाज,घोषणाओं, दौरों और वायदों के पिटारों को खोल कर देखा जाये , तो वे राजनीति की राखी सावंत से इतर नज़र नहीं आते । वही तेवर और वही लटके-झटके । क्वींस बैटन से लेकर ओबामा, और स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मसलों पर त्वरित बयान देने की उनकी अदा पर मीडिया भी $िफदा है । पिछले पाँच वर्षों में उनके द्वारा की गई घोषणाओं पर सरसरी निगाह डालें, तो चंद चाटुकार अधिकारियों की मदद से मीडिया को $खरीद कर बनाई गई छबि पल भर में छिन्न-भिन्न होती दिखाई देती है। घोषणाओं के भूसे में योजनाओं की ज़मीनी ह$की$कत सुई की मानिंद हो चुकी है । मीठा-मीठा गप्प कर $खामियों का ठीकरा केन्द्र के सिर फोडऩे की राजनीति के चलते शिवराजसिंह लगातार केन्द्र के $िखला$फ सत्याग्रह, धरने, प्रदर्शन कर जनता को भरमाने की कोशिश करते रहे हैं। दरअसल वे अब तक ना तो सूबे के मुखिया की भूमिका को ठीक तरह से समझ सके हैं, और ना ही आत्मसात करने का प्रयास करते नजऱ आते हैं। वे अब भी प्रदेश के विकास के लिये समग्र दृष्टिकोण विकसित कर सकारात्मक राजनीति को अपनाने में नाकाम हैं। वास्तव में शिवराज अपनी काबिलियत के बूते नहीं, बीजेपी की अँदरुनी कलह और शीर्ष नेतृत्व में मचे घमासान के बीच प्रदेश में अँधों में काना राजा की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं । दिल्ली में बैठे सूरमाओं की ताल पर थिरकते शिवराज सिंह प्रदेश में बीजेपी मज़बूरी बन गये हैं।
कमज़ोर विपक्ष
शिवराजसिंह की पाँच साल की इस निर्बाध पारी का श्रेय का$फी हद तक काँग्रेस के प्रादेशिक नेताओं को भी जाता है, जिन्होंने गंभीर मुद्दों को जनता के बीच नहीं ले जाकर एक तरह से मुख्यमंत्री का ही साथ दिया। जब-जब शिवराज की कुर्सी पर किन्हीं कारणों से संकट के बादल मँडराये,विपक्षी पार्टी ने हमेशा पर्दे के पीछे से अपना मित्र धर्म ब$खूबी निभाया। शिवराजसिंह ने कुर्सी सम्हालते ही अपनी विशिष्ट प्रवचनकारी शैली में जनता के बीच जाकर यह स्वीकार किया था, कि प्रदेश में सात तरह के मा$िफयाओं का राज है और वे जनता को इससे मुक्ति दिला कर ही दम लेंगे। लेकिन राजधानी भोपाल से लेकर दूरदराज़ के इलाकों में हो रही आपराधिक घटनाएँ प्रदेश मे $फैले गुंडाराज की कहानी $खुद बयान करती है। आज आलम ये है कि मा$िफयाओं के खिला$फ कार्रवाई की हुँकार भरने वाली सरकार ज़मीन के सौदागरों के $फायदों को ध्यान में रखकर ही नीतियाँ बना रही है।
बुनियादी सुविधायें ढंूढते रह जाओगे
भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति का नारा बुलंद करने वाली भाजपा आज $खुद इन्हीं व्याधियों से बुरी तरह घिर चुकी है। बिजली, पानी और सड़क के मुद्दे पर सत्ता में आई भाजपा के सात साल के शासनकाल में ये बुनियादी सुविधाएँ ढूँढ़ते रह जाओगे के हालात में पहुँच गई है। केन्द्र से मिलने वाले कोयले को घटिया क्वालिटी का ठहराकर गाँधीजी की दाँडी यात्रा(नमक सत्याग्रह) की तजऱ् पर कोयला सत्याग्रह का चोंचला कर सुर्खियाँ बटोरने वाली सरकार बिजली संकट से निपटने का कोई तोड़ नहीं ढूँढ पाई है। राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा के लिये केन्द्र को कठघरे में खड़ा करने वाली सरकार शहरों की सड़कों की बदहाली के लिये किसे जि़़म्मेदार ठहराएगी ? प्रदेश में लोगों को पीने का पानी भले ही मय्यसर नहीं हो, मगर हर दस कदम पर शराब मिलना तय है। पूरे प्रदेश में भूजल स्तर में गिरावट की स्थिति आने वाले वक्त की भयावह तस्वीर पेश करती है,मगर टेंडर,करारनामों और सरकारी ज़मीनों की बँदरबाँट से तर सरकार आम जनता की परेशानियों से बे$खबर है।
पंचायत लगाने के शौकीन
पंचायत लगाने के शौकीन मुख्यमंत्री किस्म-किस्म की महापंचायतों के माध्यम से अब तक करीब एक दर्जन से ज़्यादा मर्तबा भोपाल में मजमा जुटा चुके हैं। सरकारी योजनाओं के मद की राशि से लगाई गई इन पंचायतों का शायद ही किसी को कोई $फायदा मिला हो। आगे पाठ पीछे सपाट के $फार्मूले पर अमल कर आगे बढ़ रहे शिवराजसिंह $खुद भी भूल चुके हैं कि इन पंचायतों में की गई घोषणाओं पर अमल हुआ भी या नहीं ? पंचायत प्रेम के अलावा तरह-तरह की यात्राओं की शिगू$फेबाज़ी से भी जनता को बरगलाने में मुख्यमंत्री का कोई सानी नहीं है। कभी साइकल, तो कभी मोटरसाइकल की सवारी कर आम जनता से नाता जोडऩे की कवायद के बाद शिवराज ने स्वर्णिम मध्यप्रदेश का शोशा छोड़ा । 1 नवम्बर 1956 को गठित मध्यप्रदेश के विभाजन को भी एक दशक गुज़र चुका है लेकिन मुख्यमंत्री ने आओ बनायें अपना मध्यप्रदेश की मुहिम छेड़ रखी है। मध्यप्रदेश कितना और कैसा बना कह पाना मुश्किल है मगर प्रादेशिक अ$खबार, न्यूज़ चैनल और विज्ञापन एजेंसियों के साथ अधिकारियों और नेताओं की ज़रुर बन आई है। मंत्रियों से लेकर छुटभैये नेताओं की शानोशौकत देखकर एक बारगी यकीन करने को जी चाहता है कि वाकई मध्यप्रदेश स्वर्णिम बन रहा है । जनता कुछ समझ पाती, इसके पहले ही वे इन दिनों शिवराज मामा जी वनवासी सम्मान यात्रा के बहाने जगह-जगह स्वयं का सम्मान कराते घूम रहे हैं।
बच्चों के बीच पंडित जवाहरलाल नेहरु की चाचाजी वाली लोकप्रिय छबि से प्रेरित शिवराज मामाजी के तौर पर म$कबूल होने की हर मुमकिन कोशिश में जुटे हैं । मगर पौराणिक गाथाओं की मानें और भारतीय संस्कृति पर $गौर करें तो मामाओं का घर-परिवार में ज़्यादा दखल कभी भी सुखद नहीं माना गया है। नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ $खुद को प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार साबित करने की जुगत में जुटे तेज़ र$फ्तार शिवराज ने हाल ही में बाल दिवस पर भोपाल के मॉडल स्कूल में आयोजित समारोह में बच्चों से प्रधानमंत्री कब बनोगे सवाल पुछवा कर अपनी दावेदारी ठोक दी है । उनकी आसमान छूती परवाज़ और मंजि़ल तक पहुँचने की जल्दबाज़ी देखकर तो यही लगता है कि आने वाले सालों में मौका मिलने पर वे विश्व की चौधराहट का दावा पेश करने से भी नहीं चूकेंगे।
पूंजी पतियों को उपकृत करने की प्रवृति
छोटे किसान के घर से मुख्यमंत्री निवास तक पहुँचने के स$फर में शिवराज सिंह चौहान का एक ही सपना था कि प्रदेश का किसान खुशहाल हो। सत्ता हाथ में आते ही उन्हें कुछ बड़े घरानों ने अपने मोहपाश में ऐसा फांस लिया है कि वे उन पर ज़रूरत से ज्य़ादा मेहरबान हैं। एक तर$फ सरकार वन भूमि को कुछ बड़े घरानों को विकास के नाम पर बाँट रही है, वहीं पूँजीपतियों को उपकृत करने की $खातिर संरक्षित वन्य क्षेत्रों और अभयारण्यों से जुड़े तमाम नियम-कायदों को ताक पर रख दिया गया है। जिस सरकार पर राज्य की संपत्ति बचाने और बढ़ाने की जि़म्मेदारी है, वही राज्य की संपत्ति लुटाने में जुटी है। प्रदेश भर की सैकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन के मुकदमे हार कर भी सरकार बे$िफक्र है। वोट बैंक की $खातिर विभिन्न सामाजिक संगठनों को खुले हाथों से सरकारी ज़मीन लुटाने में भी कोई गुरेज़ नहीं है। राजधानी भोपाल की ऐतिहासिक इमारत मिंटो हॉल सहित प्रदेश की कई ऐतिहासिक धरोहरों को औने-पौने में व्यापारिक घरानों को देने की पहल भी सरकार के मंसूबों को सा$फ करती है।
हर $खामी का दोष केन्द्र सरकार पर मढऩा
किसान खाद,पानी,बिजली और बीज के लिये परेशान है और खेती को लाभ का धंधा बनाने का नारा देने वाली सरकार हर खामी का दोष केन्द्र सरकार के सिर मढ़कर अपनी ही धुन में मदमस्त है। अवैधखनन के ज़रिये प्राकृतिक संसाधनों की लूट करने वालों की तो जैसे पौ-बारह हो गई है। वन मंत्री ने हाल ही में बयान दिया था कि मुख्यमंत्री के गृह जि़ले सीहोर और बुधनी में सागौन की अवैधकटाई तथा रेत खनन का काम तेज़ी से $फलफ़ूल रहा है।
यू. पी. बिहार से बदतर हालत
दोबारा सत्ता में आते ही पचमढ़ी में कॉर्पोरेट कल्चर की सीख का असर मंत्रियों पर कुछ ऐसा तारी हुआ कि कमोबेश सभी ने औद्योगिक घरानों के रंग-ढंग अपनाना शुरु कर दिया। अब प्रदेश के ज़्यादातर महकमों के मंत्री और नौकरशाह किसी व्यापारिक घराने से कमतर नहीं हैं । हाल के सालों में बच्चों की शिक्षा,स्वास्थ्य, पोषण, दलितों और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे गौण हो चुके हैं । आँकड़ों की ज़ुबान समझने वालों का कहना है कि विकास के पैमाने पर प्रदेश की हालत उत्तरप्रदेश और बिहार से भी बदतर हो चली है, जबकि दलित अत्याचार, महिला उत्पीडऩ, अपहरण, हत्या, लूट, चोरी, डकैती, फिरौती जैसी आपराधिक गतिविधियों का ग्रा$फ लगातार कुलाँचे मार रहा है। प्रदेश में बने अराजकता के माहौल में उच्च शिक्षा का हाल भी बुरा है । ज़्यादातर विश्वविद्यालय राजनीति का अखाड़ा बन गये हैं और अधिकांश कुलपतियों को लेकर कैंपस में घमासान मचा है । बेरोज़गारी का ग्रा$फ र$फ्तार पकड़ रहा है,मगर इन्वेस्टर मीटस की रेलमपेल के बीच आत्ममुग्ध मुख्यमंत्री करारनामों पर हस्ताक्षरों को ही स$फलता का पैमाना मान बैठे हैं । इन सबके बीच रातोंरात कंपनियाँ बनाकर सस्ती ज़मीन हथियाने और एमओयू के नाम पर बैंकों से कजऱ् लेकर दूसरे धंधों में लगाने का कारोबार ज़़ोरों पर है।
अरबों रूपयों के कारनामों की हकीकत
तीन करोड़ रुपये की होली जलाकर अक्टूबर में खजुराहो में की गई ग्लोबल इन्वेस्टर मीट में हुए अरबों रुपयों के करारनामों की ह$की$कत तो गुज़रते वक्त के साथ ही सामने आ सकेगी । बहरहाल विधानसभा में उद्योगमंत्री द्वारा दिये गये आँकड़े अब तक के सरकारी प्रयासों की कलई खोलने के लिये काफ़ी हैं । बीते पांच वर्षो में चार विदेश यात्राएं, 20 करारनामों (एमओयू) पर हस्ताक्षर, नौ करारनामों का क्रियान्वयन नहीं, करार करने वाली एक कंपनी की परियोजना में रुचि ही नहीं, सि$र्फ दो पर काम शुरू। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पिछले पांच वर्षों में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए प्रयासों के ये नतीजे सामने आए हैं। कांग्रेस विधायक गोविंद सिंह द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बताया कि मुख्यमंत्री ने वर्ष 2005 में दो, 2007 एवं 2008 में एक-एक विदेश यात्रा की । इन यात्राओं के दौरान विदेशी कारोबारियों के साथ कुल 20 करारनामों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से 2005 में ग्यारह, 2007 में चार और 2008 में पांच करारनामों पर मध्य प्रदेश सरकार तथा विदेशी कंपनियों के बीच हस्ताक्षर हुए थे।
उद्योग मंत्री के मुताबिक वर्ष 2005 से 2009 के बीच हुईं विदेश यात्राओं पर कुल दो करोड़ चार लाख रुपये खर्च हुए हैं। मध्य प्रदेश में निवेश के लिए विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने सहित अन्य मसलों को लेकर मुख्यमत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में 19 सदस्यीय दल ने 13 से 23 जून 2010 तक जर्मनी, नीदरलैण्ड और इटली की यात्रा की, जिस पर 1 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च हुए। श्री विजयवर्गीय के अनुसार इस यात्रा का मकसद सि$र्फ विदेशी निवेशकों को पूंजी निवेश के लिए आकर्षित करना ही नहीं था, बल्कि प्रौद्योगिकी अवलोकन और हस्तांतरण, व्यावसायिक सहयोग, प्रदेश की ब्रांडिंग तथा विदेश से निवेशकों को खजुराहो ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट 2010 के लिये आमंत्रित करना भी था।
बढ़ती $गरीबी-पिसते $गरीब
प्रदेश में $गरीबी मिटाने के सरकार चाहे जितने दावे करे, लेकिन हकीकत कुछ और है। $गरीबी यहाँ तेज़ी से पैर पसार रही है। इसके गवाह आठ जि़लों के लोग हैं, जिनकी प्रतिदिन आय मात्र 27 रुपये है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भिंड, श्योपुर कलां, शिवपुरी, टीकमगढ़, रीवा, पन्ना, बड़वानी और मंडला वे जि़ले हैं, जहां प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 10 हज़ार रुपये से भी कम है। इन इलाकों के लोगों की औसत आय प्रतिमाह 833 रुपये है। हालांकि, सरकार $गरीबी दूर करने के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन $गरीबी कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। $गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओ में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रदेश में $गरीबी बढऩे की मूल वजह है। वहीं प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच लड़ाई में भी $गरीब पिस रहे हैं। कर्मचारियों को छठे वेतनमान देने के मुद्दे पर पैसे की तंगी का रोना रोने वाली राज्य सरकार विधायकों और मंत्रियों के ऐशो आराम पर दिल खोलकर $खर्च रही है।
मुखिया की ऊँची उड़ानें
भाजपा के पुरोधा और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जैसी सर्वमान्य छबि गढऩे के फेर में शिवराजसिंह इन दिनों मुख्यमंत्री निवास को धार्मिक समारोहों का आयोजन स्थल बनाने पर तुले हैं । एक दौर वो भी था जब शिवराज सार्वजनिक मंचों पर कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिलाकर पुराने न$गमे गुनगुनाया करते थे । लेकिन लागा चुनरी में दा$ग गाकर मह$िफल लूटने वाले कैलाश विजयवर्गीय से दामन छुड़ाकर अब वे रंजना बघेल, गोपाल भार्गव और लक्ष्मीकांत शर्मा की मंडली के साथ जि़लों के दौरों के वक्त भजन-कीर्तन करते नज़र आने लगे हैं। वैसे विजय शाह के साथ गले में ढोल लटका कर लोकधुनों पर झूमने का शौक भी इन दिनों परवान चढ़ रहा है । पेंशन और ज़मीन घोटाले के आरोप में $फँसे कैलाश विजयवर्गीय की राह में काँटे बोकर शिवराज एक मशहूर वाशिंग पाउडर के विज्ञापन तो दा$ग अच्छे हैं की तरह अपने दामन पर लगे डंपर कांड के दाग को भी जस्टिफ़ाई कर रहे हैं। वास्तव में सूबे के मुखिया के तौर पर शिवराजसिंह का कार्यकाल अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल पर भारी पड़ रहा है। उनकी पाँच साल की गौरवगाथा का बखान करने में कई साल लग सकते हैं।


कलमाड़ी की गिर$फ्तारी में भी अब देर नहीं
हृ सुप्रिया रॉय
नई दिल्ली। सुरेश कलमाड़ी के साथी चमचे और सह-अभियुक्त लगातार घेरे में आते जा रहे हैं, और उनके बयानों के आधार पर कलमाड़ी के $िखला$फ चार्जशीट तैयार होती जा रही है। अभी तक सीबीआई ने 77 अभियोगों के सिलसिले में एक ऐसी चार्जशीट तैयार की है जिसमें मुख्य अभियुक्त कलमाड़ी हैं और बाकी उनके सह अभियुक्त हैं।
कलमाड़ी कभी भी पहले पूछताछ के लिए गिर$फ्त में लिए जा सकते हैं, और फिर उन्हें बाकायदा कैद कर के उनके बाकी साथियों के साथ तिहाड़ जेल पहुंचाया जा सकता है। सीबीआई के अधिकारी जृरूरी मान रहे हैं कि कलमाड़ी को बाकी लोगों के साथ बिठा कर उनसे पूछताछ की जाए। अभी तक तो कलमाड़ी यही कहते घूम रहे हैं, कि उनको किसी बात का डर नहीं है। उन्होंने जो किया, नियमों के अनुसार किया, मगर फिर भी अगर जांच करनी है, तो सीबीआई से ले कर अदालत तक जांच कर ले, उन पर कोई आंच नहीं आएगी।
उधर सीबीआई के अधिकारियों को साफ निर्देश दिए गए हैं, कि सुरेश कलमाड़ी के $िखला$फ बयानों के ज़रिए सबूतो की जो $फाइल बन रही हैं, उसे अलग रखा जाए, ताकि बाद में न्याय प्रक्रिया में उसका इस्तेमाल किया जा सके। आ$िखर सुरेश कलमाड़ी पर हज़ारों करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप है, और ये घोटाले करने के लिए कलमाड़ी ने एक पूरी साथी मंडली बनाई थी। यह मंडली सबसे ज़्यादा जानती है, कि असल में क्या हुआ था और कौन सा पैसा कहां से होते हुए कहां तक पहुंचा? कई मामलों की तो खुलेआम पड़ताल हो चुकी है, और उनमें अब भी एक के बाद एक रहस्य निकल कर सामने आ रहे हैं। सुरेश कलमाड़ी ने वे शुरूआती सतर्कताएं ज़रूर बरती जिनके आधार पर उनका मानना था कि उन्हें कोई नहीं फंसा सकता। बहुत सारे काम तो मौखिक आदेशों के बहाने किए और बहुत से लोगों को $फायदा पहुंचाने के लिए नियम कानून भी बदल डाले।
दिलचस्प बात तो यह है कि कलमाड़ी ने दूसरी पार्टियों के और विरोध कर सकने वाले लोगों को भी साथ लेने की कोशिश की। नितिन गडकरी के करीबी संचेती परिवार को भी मोटे ठेके दिए गए और भाजपा नेता सुद्वांशु मित्तल की पारिवारिक कंपनी को भी ढाई सौ करोड़ का $फायदा पहुंचाया गया। इस बीच भूतपूर्व खेल मंत्री और कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य मणिशंकर अय्यर लगातार आरोप लगाते रहे, लेकिन कलमाड़ी ने तो देर होने का बहाना बना कर $खुद अय्यर को फंसा दिया और कहा कि बहुत सारी देर तो उनकी वजह से ही हुई थी। अब सुरेश कलमाड़ी को गिरफ्तार होने से कोई नहीं बचा सकता। कांग्रेस ने पहले से ही कलमाड़ी से दूरियां बनानी शुरू कर दी है। उन्हें पार्टी के सचिव पद से हटा दिया गया है और हालत यहां तक पहुंच गई है कि कॉमनवेल्थ खेलों के बाद जो समारोह हुए उनमें से किसी मेें भी कलमाड़ी को नहीं बुलाया गया। उन्होंने सोनिया गांधी से मिलने की कोशिश की मगर वह भी असफल रही। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ज़रूर उन्हेें दो बार मिलने का समय दिया और एक बार बहुत थोड़े समय के लिए मिले, मगर सि$र्फ इतना कहा कि श्रीमती सोनिया गांधी उनसे बहुत नाराज़ हैं, और उन्हें बहुत सारे स्पष्टीकरण देने पड़ेंगे। सुरेश कलमाड़ी अच्छे $खासे खिलाड़ी रहे हैं। मगर खेल के मैदान के नहीं, राजनीति के। सारे पदक उन्हें राजनीति में ही मिले है। ललित भनोट नाम का एक राजस्थानी कारोबारी उन्होंने पाल रखा था और खेल से कोई $खास वास्ता नहीं होने के बावजूद ललित भनोट कॉमनवेल्थ आयोजन समिति का महासचिव था। सबसे ज़्यादा मुखर हो कर वही बोलता था और हालत घमंड की यहां तक पहुंच गई थी कि अधिकारियों के खाने में एक बार जब कोई कीड़ा निकला तो ललित भनोट ने बहुत परिहास बुद्धि का परिचय देते हुए कहा कि हम आपको शाकाहारी के $खर्चे में मांसाहारी खाना खिला रहे है। यह मज़ाक जाहिर है कि ज़्यादा लोगों को पसंद नहीं आया होगा, लेकिन ललित भनोट दो ही चीज़ों के लिए जाने जाते रहे हैं। एक तो खोटी अंग्रेजी बोलने के लिए और दूसरे मेज पर रखा अपना पासपोर्ट सबको दिखाने के लिए कि वे कितने देश घूम आए है, लेकिन जब उनके यहां छापा पड़ा तो कलमाड़ी के दस्तावेज ही नहीं, बल्कि बनियान और अंडरवीयर भी उसके घर से बरामद हुए। अंतरंगता का अंदाजा लगाया जा सकता है। भनोट के गैराज में तीन महंगी गाडिय़ां भी मिलीं और सीबीआई वालों को भनोट की कलाकारी मालूम थी, इसलिए उन्होंने गाडिय़ों के इंजन सीटों के नीचे तक तलाशी ली। कमेटी के महानिदेशक वी के वर्मा के घर और ऑफिस में छापा मारा गया। वर्मा बैडमिंटन एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं, और अचानक उनके परिवार में भी एक कंपनी उगाई थी, जो कॉमनवेल्थ के ज़रिए अपना कल्याण कर रही थी। जब छापा पड़ा तो वर्मा साहब बैडिमिंटन संघ के $खर्चे पर मलेशिया में मौजूद थे। इतना ही नहीं, सीबीआई ने जो सूची बनाई है उसमें जांच के दायरे में दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के अधिकारी भी शामिल है। सीबीआई तो दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से बात करना चाहती है, और उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना से भी इसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति की आवश्यकता पड़ेगी। शीला दीक्षित और कलमाड़ी दोनों एक दूसरे को सारे घोटालों के लिए जि़म्मेदार ठहराते रहे हैं। सबसे ज़्यादा मगन मणिशंकर अय्यर है। लगभग 73 साल की उम्र में राजनयिक से राजनेता बने मणिशंकर अय्यर का$फी वाचाल माने जाते हैं और एक ज़माने में तो वे एक साप्ताहिक कॉलम भी लिखा करते थे, जिसे विषय से ज़्यादा गालियां देने की साहित्यिक प्रतिभा के लिए पढ़ा जाता था। यह कॉलम छापने वाले वीर सांघवी $िफलहाल नीरा राडिया के साथ फंसे हुए हैं। लेकिन अय्यर का कहना यही है, जांच-पड़ताल अगर तरीके से हो तो इसमें बड़े-बड़े नाम सामने आएंगे, और ये ऐसे नाम होंगे जिनकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। मणिशंकर अय्यर का सुरेश कलमाड़ी के साथ कभी कोई राजनैतिक बैर नहीं रहा मगर लगता है कि ये दोनों एक दूसरे को ले डूबने को तैयार है।

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