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Saturday, December 25, 2010

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कांग्रेस, भ्रष्टाचार और मनमोहन
एक ईमानदार प्रधानमंत्री के कार्यकाल में आज तक के सबसे बड़े २ जी स्पैट्रम घोटाले के उजागर होने के बाद, उन्हीं की सरकार के पूर्व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ए.राजा ने संसद में खड़े होकर इस आशय की बात कही थी कि ''मैंने जो कुछ भी किया प्रधानमंत्री की जानकारी में लाकर किया।ÓÓ इसके बाद भी उनका मौन भंग नहीं हुआ। इससे डॉ.सिंह की ईमानदारी का संदेह के घेरे में आ जाना लाजिमी है। इसके अलावा कॉमनवैल्थ घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला भी डॉ. सिंह के कार्यकाल में ही हुए। हालांकि, इससे यह सिद्ध नहीं होता कि इह्व तीनों घोटालों में डॉ. सिंह की कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका रही होगी, लेकिन कार्यपालिका के शीर्ष पर होने से वे इस बात से तो नहीं बच सकते कि वे भ्रष्टाचार पर नकेल डालने में नाकाम रहे।
जैनेन्द्र कुमार
जयपुर। इन दिनों तीन बातों की सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है। काँग्रेस पार्टी का 83 वाँ महाधिवेशन, डॉ. मनमोहन सिंह की ईमानदारी और 2जी स्पैक्ट्रम घोटाला। सबसे पहले बात काँग्रेस पार्टी की। काँग्रेस पार्टी के 125 साल पूरे होने पर इसके इतिहास पर भी नज़र डालना लाजि़मी हो जाता है। स्वतंत्रता के साथ ही काँग्रेस पार्टी ने प्रशासनिक कुशलता, निरंतरता, शहरी-ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संतुलन, उत्पादन में वृद्धि वाली राजनीतिक व्यवस्था कायम करने का $फैसला लिया था। पार्टी का उद्देश्य तब न्याय पर आधारित सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्था की स्थापना और अहिंसात्मक एवं शांतिपूर्ण तरीके से वर्गविहीन लोकतंत्रीय समाज की स्थापना करना था। संसदीय जनतंत्र पर आधारित व्यवस्था में अधिकारों की समानता और विश्वशांति एंव विश्व-बंधुत्व स्थापित करना था। इससे इतर काँगे्रस पार्टी के 83वें तीन दिवसीय महाधिवेशन के अंतिम दिन सोमवार दिसंबर 20 को कई महत्वपूर्ण बातें समाने आईं। मसलन भ्रष्टाचार महामारी की तरह समाज के हर स्तर पर फैल चुका है। साम्प्रदायिकता बहुसंख्य और अल्पसंख्यक आतंकवाद दोनों ही देश के लिए $खतरा हैं। दृढ़-संकल्प में शक की गुंजाइश न होने के बावजूद सीमापार आतंकवाद जारी है। जम्मू-कश्मीर मसले पर कई द$फा वार्ता होने के बाद भी समस्या जस की तस है। पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति के लिए समझौते का विकल्प खुला रखना ज़रूरी है। नक्सलवाद देश के लिए गंभीर समस्या बन गया है। पार्टी को चिंतन समूह गठित कर उनकी सलाह माननी होगी। इससे सा$फ हो जाता है, कि आ$िखर पार्टी अपने उद्देश्यों को पूरा करने में कितना सफल हो पाई। उसे आगे कहाँ सुधार करने व कितनी मेहनत करने की दरकार और है।
अब डॉ. मनमोहन सिंह के मुद्दे पर आते हैं। देश के प्रधानमंत्री और ख्यात अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने हाल ही काँग्रेस पार्टी के 83 वें महाधिवेशन में कहा-मेरा यही मानना है कि जूलियस सीज़र की पत्नी की भांति प्रधानमंत्री को भी संदेह से परे रहना चाहिए। यही कारण है कि मैं पीएसी के समक्ष उपस्थित होने को तैयार हूँ।
यह बात अलग है कि इससे पहले इस तरह का कोई वाकया नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, इस महान देश के प्रधानमंत्री के तौर पर साढ़े छह वर्षों के अपने कार्यकाल के दौरान हो सकता है कि मैंने गलतियां की हों। हालांकि, मैंने अपनी काबिलियत के अनुरूप इस देश की सेवा करने की भरसक कोशिश की है।
मेरे पास छुपाने के लिए कुछ भी नहीं है। कार्यपालिका के सर्वोच्च शिखर पर आसीन व्यक्ति के लिए स्वयं को सवाल-जवाब के लिए प्रस्तुत करना आसान नहीं होता। उनका यह कहना कि हो सकता है कि मैंने $गलतियां की हों... उनकी प्रशंसनीय विनम्रता और ईमानदारी का अद्वितीय उदाहरण माना जा सकता है।
इसमें कोई दो राय नहीं, कि वे जितने अच्छे अर्थशास्त्री हैं, उतने ही अच्छे इंसान भी हैं। उनकी सा$फगोई की जितनी तारी$फ की जाए उतनी कम है, लेकिन 1 लाख 76 हज़ार करोड़ रुपए के 2जी स्पैक्ट्रम घोटाले पर उनकी लंबे समय तक जारी रही चुप्पी को क्या समझा जाए। एक ईमानदार प्रधानमंत्री के कार्यकाल में आज तक के सबसे बड़े 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले के उजागर होने के बाद उन्हीं की सरकार के पूर्व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ए.राजा ने संसद में खड़े होकर इस आशय की बात कही थी, कि मैंने जो कुछ भी किया प्रधानमंत्री की जानकारी में लाकर किया। इसके बाद भी उनका मौन भंग नहीं हुआ। इससे डॉ. सिंह की ईमानदारी का संदेह के घेरे में आ जाना लाज़मी है। इसके अलावा कॉमनवैल्थ घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी घोटाला भी डॉ. सिंह के कार्यकाल में ही हुए। हालांकि, इससे यह सिद्ध नहीं होता, कि इन तीनों घोटालों में डॉ. सिंह की कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष भूमिका रही होगी, लेकिन कार्यपालिका के शीर्ष पर होने से वे इस बात से तो नहीं बच सकते, कि वे भ्रष्टाचार पर नकेल कसने में नाकाम रहे। उनकी शालीनता, सौम्यता और गंभीरता को उनकी ही सरकार के लोगों ने उनकी कमज़ोरी समझा और जो मन में आया वही किया, इस बात पर विचार किए ब$गैर कि वो जो कर रहे हैं, वह भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है, और इसके लिए देर-सवेर उन्हें तो सजा मिलेगी ही, उनके साथ ही पूरी पार्टी को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे अथवा पूरे संगठन के लोगों की ईमानदारी पर उंगलियाँ उठ सकती हैं।
इसके अलावा एक बात और जो आम जनता के मन को लगातार मथ रही है, वह है, उनका संयुक्त संसदीय समिति यानी जॉइंट पार्लियामेंट कमेटी-जेपीसी के लिए स्वीकृति ना देना। डॉ. सिंह लोक लेखा समिति, पीएसी के सामने पेश होने को तैयार हैं, लेकिन संयुक्त संसदीय समिति, जेपीसी की माँग को उन्होंने ठुकरा दिया। हालांकि, लोक लेखा समिति के अध्यक्ष संसदीय प्रणाली में प्रमुख विपक्षी दल के नेता होते हैं, और $िफलवक्त भाजपा के डॉ. मुरली मनोहर जोशी इसके अध्यक्ष हैं। इस समिति में संसद के लगभग सभी प्रमुख दलों के चुने हुए सांसदों को शामिल किया जाता है। इसका अधिकार क्षेत्र सरकार के $खर्च और प्राप्ति के बहीखातों की तकनीकी जाँच करना है। 2 जी स्पैक्ट्रम करीब-करीब इसके अधिकार क्षेत्र में आता है। सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा, कि लाइसैंस देने में गड़बड़ी होने से सरकार को एक लाख 76 हज़ार करोड़ रुपए का घाटा हो चुका है। इसके बाद देश की राजनीति और विशेषतौर से भारतीय संसद में तू$फान सा उठ खड़ा हुआ। जिस संसद की कार्यवाही पर लाखों-करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जाते हैं, वही संसद विपक्षी पार्टी के सांसदों ने यह कहकर नहीं चलने दी, कि 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले की जाँच जेपीसी से कराई जाए, लेकिन सरकार नहीं मानी और गतिरोध दूर न हो सका।
इसका नतीजा यह निकला कि संसद के शीतकालीन सत्र में कोई उल्लेखनीय कार्रवाई ही नहीं हो पाई। इतना सब होने के बावजूद डॉ. सिंह जेपीसी की जाँच के लिए सहमत नहीं हैं। जब सिंह पीएसी के हर सवाल का जवाब देने को तैयार हैं, तो जेपीसी को हरी झंडी देने में क्या अड़चन आ रही है, यह आम जनता की समझ से परे है। बहरहाल सरकार के शीर्ष पर बैठे मुखिया के पास सबसे ज़्यादा अधिकार होते हैं, तो सबसे ज़्यादा जि़म्मेदारियां भी, और उनकी मजबूरियों को भी हर कोई समझ ले, ऐसा नहीं हो सकता। आज के परिदृश्य में भारतीय राजनीति और कांग्रेस पार्टी का विश्लेषण किया जाए, तो दोनों ही तमाम दुविधाओं और समस्याओं से घिरी नज़र आती हैं। रही बात डॉ. सिंह की, तो जनता उनसे यही उम्मीद करती है कि वे शांत और चुप्पी साधने की अपनी सामान्य छवि के विपरीत, अब आक्रामक तेवर दिखाएंगे, और भ्रष्टाचारियों-दोषियों को कठोर दंड देने के लिए हर संभव कदम उठाएँगे।



मैं प्रभात झा से बेहतर हिन्दू हूं
भोपाल। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कहा है कि वह मध्यप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष प्रभात झा से कहीं बेहतर हिन्दू हैं। अपने निवास पर मंगलवार दिसंबर 21 को उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि वे झा से बेहतर हिन्दू हैं, और इसके लिए उनको झा से किसी भी प्रमाण-पत्र की ज़रूरत नहींं हैं।
जब उनसे यह कहा गया कि विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने उन्हें 'पा$गलÓ करार दिया है, तो उन्होंने कहा कि ऐसा आरोप लगाने के पहले सिंघल को $खुद अपने दिमा$ग की जांच करानी चाहिये। यह पूछे जाने पर कि उनके संघ के बारे में क्या विचार हैं, तो उन्होंने कहा कि वह संघ के बारे में इतना कह चुके हैं, कि उन्हें उसके बारे में कुछ भी और कहने की ज़रूरत नहीं है। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि संघ ऐसी संस्था है, जो चोरों से चोरी करने के लिए कहती है, और कोतवाल से उन्हें पकडऩे की बात करती है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने मांग की है, कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को इस्ती$फा दे देना चाहिए, क्योंकि वह यहां पर किसानों के आंदोलन को रोकने में पूरी तरह विफल रहे हैं। कांग्रेस महासचिव ने अपने निवास पर पत्रकारों से चर्चा में कहा कि चौहान झूठ बोलते हैं, ये बात वह $खुद नहींं, बल्कि वे किसान कह रहे हैं, जो भाजपा द्वारा चलाये गये संगठन का हिस्सा हैं। सिंह ने कहा कि वह दस साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे लेकिन उस दौरान इस तरह का कोई भी आंदोलन प्रदेश में कहीं पर भी नहींं हुआ। उन्होंने कहा कि भाजपा के पिछले सात सालों के शासन में खाद की कालाबाज़ारी बढ़ी है और किसानों के $िखला$फ कठोर कदम उठाये गये हैं। कांग्रेस महासचिव ने कहा कि अगर चौहान में वाकई दम है तो उन्हें उन लोगों के $िखला$फ कदम उठाने चाहिए, जो लोग खाद जैसी चीज़ों की कालाबाज़ारी में लगे हुये हैं।

Tuesday, December 21, 2010

Monday, December 20, 2010

Saturday, December 18, 2010






अर्जुन के बाण भी तुणीर से बाहर आने को आतुर
अर्जुन के तीर अभी भी लक्ष्य भेदी हैं
हृ लिमटी खरे नई दिल्ली। ख़्ामोश अर्जुन भी आज कुछ कहना चाहते हैं। उनके करीबी कह रहे हैं, कि उनकी $खामोशी जल्द ही टूटने वाली है। भ्रष्टाचार, घोटालों और अव्यवस्था से घिरी कांग्रेस गठबंधन सरकार में इस समय जिस तरह रहस्योद्घाटनों की झड़ी लगी है, उसमें एक कड़ी अर्जुन सिंह की भी जुडऩे वाली है, और वे जो बोलेंगे तो एक बार कांग्रेस में भूचाल ज़रूर आएगा। यह अलग बात है, कि कांग्रेस भी इस वक्त गैंडे की खाल ओढ़े हुए है, और सब हमलों को झेलती आ रही है। यूं तो कांग्रेस के चतुरसुजान कुंवर अर्जुन सिंह, कांग्रेस गठबंधन सरकार की दूसरी पारी में अपनी प्रासंगिता खो चुके हैं। कांग्रेस के छत्रपों में शुमार और राजीव गांधी के ज़माने में कई बार अपनी राजनीतिक एवं प्रशासनिक उपयोगिता सिद्ध करने वाले अर्जुन आज बेबस हैं, और का$फी पहले एक तरह से कांग्रेस से दूध में से मक्खी की तरह निकाल बाहर किए जा चुके हैं, तथापि इस वक्त उनका मुंह खुल जाना राजनीतिक रूप से नए विवाद खड़े कर सकता है।
इशारों ही इशारों में तीर चलाकर अर्जुन सिंह को अपने विरोधियों का मर्दन करने में महारथ हासिल रही है। संप्रग की दूसरी पारी में उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया था। उस वक्त भी उम्मीद जताई जा रही थी कि वे अपनी उपेक्षा से कुपित होकर कोई न कोई धमाका अवश्य ही करेंगे, लेकिन यह आश्चर्य हुआ कि अर्जुन ने धैर्य नहीं खोया। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने अर्जुन सिंह को किनारे करने के लिए कोई जतन नहीं छोड़े। उनकी पुत्री वीणा सिंह को कांग्रेस का टिकट भी नहीं दिया गया। यहां तक कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव प्रचार में जाने के लिए उनके लिए निर्धारित विमान भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के एक करीबी गुजरात की यात्रा पर निकल गए और मजबूरी में अर्जुन सिंह को महाकौशल एक्सप्रेस से सतना पहुंचना पड़ा।
इसके उपरांत अर्जुन सिंह की पत्नी ने परोक्ष तौर पर सोनिया गांधी पर आरोप लगाकर ठहरे हुए पानी में कंकर मार दिया, जिससे उनके राज्यपाल बनने की $खबरें अ$फवाह में बदल गईं। अर्जुन सिंह से सोनिया गांधी की नाराज़गी का आलम यह पाया गया कि सोनिया गांधी ने अपने परिवार अर्थात जवाहर लाल नेहरू ट्रस्ट से भी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इसके बावजूद अर्जुन सिंह ने धैर्य नहीं खोया और ख़ामोशी को ही राजनीतिक प्रतिक्रिया बनने दिया। उनके राजनैतिक तौर पर किनारे होने की आशंका को भांपकर उनके अनुयाईयों ने भी नया ठौर ठिकाना ढूंढकर अपने आका बदल लिए हैं। लगभग डेढ़ साल से अर्जुन सिंह के दिल्ली स्थित सरकारी आवास में सन्नाटा ही पसरा हुआ था, लेकिन इधर कुछ विशिष्ट आवाजाही बढ़ती दिख रही है। पिछले दिनों जब वे मध्यप्रदेश की यात्रा पर गए तो पत्रकारों से चर्चा के दौरान उन्होंने कहा था, कि वे राजनैतिक जीवन के अर्जित अवकाश का आनंद उठा रहे हैं। अर्जुन सिंह के $करीबियों का कहना है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दूसरे कार्यकाल में घोटाले दर घोटाले सामने आने के बाद अब अर्जुन सक्रिय होते नजऱ आ रहे हैं। चर्चा तो यहां तक है, कि जल्द ही अर्जुन सिंह मीडिया से रूबरू होने वाले हैं, जिसमें वे घोटालों के कारण धूमिल होती कांग्रेस की छवि को ध्यान में रखकर, समस्त मंत्रियों को यह भी मशविरा दे सकते हैं कि सभी अपने अपने त्यागपत्र सौंप दें, और फिर से नए सिरे से मंत्रिमण्डल का गठन किया जाए। इन बातों में सच्चाई कितनी है यह तो कुंवर अर्जुन सिंह ही ज्य़ादा बताएंगे किन्तु उनके आवास की बढ़ती चहल पहल से लगने लगा है, कि जल्द ही कांग्रेस के गुज़रे ज़माने के नेता की $खामोशी टूटने वाली है।
मनमोहन सिंह की सरकार में एक के बाद एक घोटाले जिस तरह से सामने आ रहे हैं, उससे कांग्रेस का भारी नुकसान हो रहा है। धर्मनिर्पेक्षता के चक्कर में भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस को उछालकर कांग्रेस ने अपने को बुरा फंसा लिया है। इस कार्ड का कांग्रेस को नुकसान ज्य़ादा हुआ है, जिसका परिणाम बिहार चुनाव में सामने आया है। यहां कांग्रेस का जो हाल हुआ है, वह कांग्रेस हाईकमान की रणनीतिक विफलताओं को प्रकट करता है। सोनिया गांधी आज जिन सलाहकारों के दम पर कांग्रेस को चलाना चाहती हैं उनके अपने एजेंडे हैं और वे कांग्रेस के लिए नहीं बल्कि अपने लिए काम करते हैं।
लोकसभा में पारित कई विधेयक ऐसे हैं, जिनके परिणाम पूरी तरह कांग्रेस के खिलाफ जाते हैं और जिनके कारण भाजपा को लाभ पहुंचा है। इनमें शत्रु संपत्ति कानून ने कांग्रेस का भारी नुकसान किया है, कश्मीर के मौजूदा हालात से निपटने में सरकार का बोदापन सामने आया, स्पेक्ट्रम घोटाले ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को देश का बुरी तरह से विफल प्रधानमंत्री साबित कर दिया है, जबकि अर्जुन सिंह ने एक समय अपने राजनीतिक कौशल से अशांत पंजाब के राज्यपाल के रूप में पंजाब को देश की मुख्यधारा में लौटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर अपने महत्व को सिद्ध किया था। वही अर्जुन सिंह आज उस समय की प्रतीक्षा में बताए जाते हैं, जिसमें वे कांग्रेस की विफलताएं गिनाकर कुछ ऐसे रहस्योद्घाटन, करें जिनसे यह सिद्ध होता हो, कि अर्जुन के तीर अभी भी लक्ष्यभेदी हैं।



मध्य प्रदेश के बयानबाज़ नेता
हृ अशोक त्रिपाठी भोपाल। इतिहास की धरोहर सहेजने वाले मध्य प्रदेश में राजा-रजवाड़े और उनके द्वारा किए गये निर्माण कार्य जिनमें खजुराहों जैसे मंदिर विश्व प्रसिद्ध हैं, तब की राजनीति भी बहुत ऊंचे दर्जे की हुआ करती थी। कांग्रेस के इस गढ़ को राज परिवार की महारानी विजय राजे सिन्धियां ने तोड़ा था, जबकि उनके बेटे माधव राव सिन्धियां ने कांग्रेस का दामन थामा। श्यामा चरण शुक्ल और विद्या चरण शुक्ल की जोड़ी ने इस राज्य में ब्राह्मण राज को मज़बूत किया, तो अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह ने क्षत्रियों के वर्चस्व को बढ़ाया लेकिन इन सभी की बेतुकी बयानबाज़ी उनकी पार्टी को ही डुबोती चली गयी। वर्तमान में भी इससे कोई सीख नहीं ले रहा है। हाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के बयान दोनों ही पार्टियों के लिए मुसीबत का कारण बने हैं। अभी भाजपा ने सुश्री उमा भारती को औपचारिक रूप से पार्टी में शामिल नहीं किया, लेकिन उन्हें उत्तर प्रदेश में पार्टी का काम देखने का सिग्नल दे दिया गया है, और यह उनकी गृह वापसी का स्पष्ट संकेत भी है। इसके बावजूद वे अपने गृहराज्य मध्य प्रदेश को लेकर कोई टिप्पणी नहीं करेंगी, यह कहना मुश्किल है। श्री चौहान ने यह भाषण दे तो दिया, लेकिन थोड़ी ही देर बाद उन्हें अपनी $गलती का एहसास हो गया और उन्होंने कहा कि मेरी बातों को अगर अन्यथा लिया गया है, तो मैं क्षमाप्रार्थी हूं। दरअसल श्री चौहान ने जाने-अनजाने भाजपा की भी खिल्ली उड़ाई। केंद्र में भाजपा की भी सरकार रह चुकी है और उद्योगपतियों की तो वह पार्टी ही कही जाती है। प्रमोद महाजन जैसे नेता जाने-माने उद्योगपति ही थे। राज्य सभा में भाजपा का बहुमत है और महिला आरक्षण बिल पर इसीलिए केंद्र सरकार को भाजपा की मदद लेनी पड़ी थी। इधर, शिवराज सिंह दो मामलों में परेशान थे। एक तो यह कि उद्योगपति रतन टाटा ने पहले तो फोनटेपिंग के मामले में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को दोषी ठहराया, लेकिन विमानन कम्पनी के लिए रिश्वत देने के मामले में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार को भी कठघरे में खड़ा कर दिया। तत्कालीन विमानन मंत्री ने तो इस बात की जांच कराने की मांग ही कर दी थी, लेकिन राहुल बजाज ने यह कहकर मामला ठंडा कर दिया कि बिना रिश्वत के कोई काम ही नहीं होता।
बहरहाल, श्री शिवराज सिंह चौहान अपनी ज़ुबान पर नियंत्रण नहीं रख सके और उद्योगपतियों के बहाने राज्यसभा पर ही अपना $गुस्सा उतार दिया। वे सुश्री उमाभारती की गृह वापसी से भी परेशान दिख रहे हैं। उन्हें लगता है कि सुश्री उमा भारती भाजपा में शामिल होने के बाद कोई न कोई बखेड़ा खड़ा करेंगी। इसीलिए नितिन गडकरी की इच्छा के बावजूद सुश्री उमा भारती को अभी तक पार्टी में शामिल नहीं किया गया था। अब उन्हें हरी झण्डी तब मिली है, जब उनसे वादा ले लिया गया कि वे (उमा भारती) मध्य प्रदेश में द$खलंदाज़ी के बजाय उत्तर प्रदेश को संभालेंगी। उत्तर प्रदेश में ही राम मंदिर का मुद्दा भी जमकर उछाला जाना हैं, इसलिए उमा भारती मान गयीं, लेकिन श्री चौहान का $गुबार बाहर आकर भाजपा के लिए मुसीबत बन गया। इससे पूर्व कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मुंबई हमले में मारे गये वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे की हत्या पर सवाल उठाया। यह सवाल तब उठाया गया जब संसद पर आतंकी हमले की वर्षगांठ (१३ दिसम्बर) नज़दीक थी। इसलिए श्री दिग्विजय सिंह को यह मामला इस तरह नहीं उठाना था। वैसे ही अ$फज़ल गुरू की फांसी का मामला लटकाने का आरोप कांग्रेस पर लग रहा है।
श्री दिग्विजय सिंह अभी भी अपनी बात पर अड़े हैं। वे कहते हैं कि हेमंत करकरे की जि़न्दगी को हिन्दू कट्टरवादी ताकतों से $खतरा था। श्री दिग्विजय सिंह ने स$फाई देते हुए कहा कि उन्होंने मुंबई पर आतंकी हमले में पाकिस्तान की भूमिका होने पर कभी संदेह नहीं किया, लेकिन आडवाणी जी और राजनाथ सिंह को जवाब देना होगा कि माले गांव विस्फोट के बाद जब साध्वी प्रज्ञा भारती को गिर$फ्तार किया गाया था, तब वे प्रधानमंत्री से मिलने क्यों गये थे? शिवराज सिंह चौहान ने इसका जवाब भी श्री दिग्विजय सिंह को दिया है। उन्होंने कहा कि दिग्विजय सिंह मानसिक रूप से बीमार हैं। इससे पूर्व वे दिल्ली के बटाला हाउस मुठभेड़ का भी इसी तरह विरोध कर चुके हैं और नक्सली समस्या से निपट रहे गृहमंत्री पी- चिदम्बरम से भी ऊल-जलूल सवाल पूछ चुके हैं। राजनीति की विडम्बना देखिए कि वही काम शिवराज सिंह चौहान भी कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश का बंटवारा होने के समय यह समझा जा रहा था कि नक्सलवाद से प्रभावित सि$र्फ एक जि़ला बालाघाट-ही बचा है। राजनीति के झगड़े ने प्रदेश के सात और जिलों को नक्सलियों के हाथों दे दिया है। नक्सल प्रभावित जि़लों में अब बालाघाट के अलावा मंडला, डिंडोरी, सिवनी, सीधी, अनूपपुर, उमरिया और शहडोल भी शामिल हैं। केंद्र सरकार ने इनके विकास के लिए २५ लाख रुपये दिये हैं, लेकिन बेतुकी की बयानबाज़ी से फुर्सत मिले, तभी तो राज्य में विकास कार्य होंगे।
(हिफी)

Friday, December 10, 2010






सही $फरमा रहे हैं असलम शेर$खान
चेत जाओ महारथियो
हृ चन्द्र शेखर सिंह मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान अपने शासनकाल के 5 साल पूरे होनेे की $खुशी में जो जश्न मना रहे हैं, उसके कोलाहल के बाद भी यदि मध्यप्रदेश के कांग्रेसी नेताओं की आंखें नहीं खुलतीं, तो फिर इसमें कोई संदेह नहीं, कि अगले चुनावों में मध्यप्रदेश एक और बिहार के रूप में खड़ा नज़र आएगा। ये आश्चर्यजनक है कि डंपर, भूमि......आदि घोटालों से घिरी शिवराज की सत्तायात्रा, बे$खौ$फ जारी है। कांग्रेस $खुद को सत्ता का दावेदार समझती है, पर सही मायने में वो आज की तारी$ख में एक दमदार विपक्षी पार्टी के रूप में भी नज़र नहीं आ रही है। हाल ही में मप्र कांग्रेस इकाई उपाध्यक्ष असलम शेर$खान ने इस तर$फ ध्यान खींचते हुए अपनी पार्टी के महारथियों को आपसी गुटबाज़ी छोड़कर एक साथ खड़े होने का आव्हान किया था, किंतु नहीं लगता कि सुभाष यादव, राहुल सिंह, सुरेश पचौरी, कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह वगैरा अपने-अपने अहम भूलकर गले मिल पाएंगे। भोपाल। मध्यप्रदेश कांग्रेस की हालत अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा, दिग्विजय सिंह जैसे विशेष कद्दावर नेताओं के केन्द्र की राजनीति में सक्रिय हो जाने से लावारिस सी हो गई है। अभी कुछ माह पूर्व तक विधानसभा में विपक्ष की नेता जमुना देवी के निधन के बाद तो जैसे यतीमों की सी हालत में आ गई है। वह शासक पार्टी को अनेक मुद्दों पर कानूनी घेरों में लिए रखती थी, और किसी न किसी मामले में रैली, आंदोलन चलाकर कांग्रेस पार्टी के अस्तित्व को जीवित रखे हुए थीे। दूसरे कद्दावर नेता सुभाष यादव बीमारी की वजह से पार्टी कार्यों में भाग नहीं ले पाते। प्रदेश पार्टी के अध्यक्ष श्री पचौरी अन्य ताकतवर नेताओं कार्यकर्ताओं को अपने साथ लेकर चलने में शायद अपना अनादर समझते हैं, जिसकी वजह से अजय सिंह (राहुल), असलम शेर $खान जैसे और भी कद्दावर नेता कार्यकर्ताओं का उन्हें सहयोग प्राप्त नहीं हो पाता। असलम शेर $खान ने ही बताया कि जिस मीडिया कमेटी और राजीव गांधी पंचायत राज संगठन की जि़म्मेदारी उन्हें सौंपी गई है, वह केवल नाम की ही है। उनके पास न कोई अधिकार हैं न काम। लगभग यही हालत रही अजय सिंह (राहुल) के प्रभार वाली समिति का जिसका प्रभारी उन्हें बना रखा था।
छुटपुट समाचार मिलते हैं, जब मध्यप्रदेश के कद्दावर नेता कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कांतिलाल भूरिया, दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के दौरे पर आकर किसी हद तक कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार करते रहते हैं। मगर क्या अच्छा हो यदि पार्टी हित में वे अपने-अपने स्वार्थों व अहम को भूलकर एक स्थान पर, एकजुट होकर, एक मज़बूत संगठन के निर्माण की पहल करें।
वर्तमान मप्र सरकार जो लगभग 5-5 वर्षों की दो पारियां पूरी करने जा रही है, उसके भ्रष्ट कारनामों से मज़दूर, किसान, छोटे व्यापारी, कर्मचारी, आम जनता कितनी दुखी और त्रस्त है, उसका आंकलन कांग्रेसी कार्यकर्ता करें।
रेगिस्तान में पानी की झील के मा$िफक वायदों से त्रस्त लोग भटक रहे हैं। जनता की महंगाई के कारण कमर टूटी जा रही है, जबकि बड़े व्यापारियों के गोदामों में माल सड़ रहे हैं। जब मंत्री और अधिकारी ही बिना कमीशन के किसी की बात नहीं सुनते, तो जनता के दर्द का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। ऐसे में यदि बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस, आंदोलन रैली, पर्चे, प्रचार और जनसंपर्क कर के दुखी जनता का समर्थन नहीं जुटा सकती, तो दोष पार्टी मुखिया का ही माना जाएगा। गत वर्ष 2008 के निर्वाचन से पूर्व, यदि एकजुट संगठित होकर प्रयास किए जाते, तो प्रदेश का राजनैतिक नक्शा कुछ और होता, मगर अ$फसोस कि इन सब नेताओं की तोपों के रू$ख विभिन्न दिशाओं में हैं, जो एक-दूसरे को ही भेद रहे हैं। काश यह सब एकजुट होकर एक ही दिशा में प्रयास करते...

संसद को बौना करते बड़े नेता
हृ रामबहादुर राय
एक पखवाड़े से अधिक का समय बीत गया दुनिया के सबसे बड़े देश की संसद ठप पड़ी हुई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में संयुक्त संसदीय जांच दल के नाम पर अपनी अपनी राजनीतिक गोटियां $िफट कर रहे हैं, जिसके कारण संसद ठप पड़ी हुई है. रामबहादुर राय मानते हैं कि असल में संयुक्त संसदीय जांच दल की विपक्ष की मांग एक ऐसी राजनीतिक मांग है जिसका सत्ता पक्ष और विपक्ष में बैठे कुछ नेताओं को राजनीतिक लाभ पहुंचाती है, इसीलिए इस मामले में पीएसी की जांच को कमतर बताकर जेपीसी की मांग के नाम पर संसद को ठप कर दिया गया है। संसद के सामने पिछले 17 दिनों से एक सवाल है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मामले की जांच जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) करे, या पीएसी (लोक लेखा समिति)। अभी सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता जो कर रहे हैं, उससे या तो उनका अहंकार झलकता है, या नासमझी, या फिर अज्ञानता। जसवंत सिंह ने लेख लिखा, लालकृष्ण आडवाणी, प्रणव मुखर्जी और सुषमा स्वराज ने बयान दिए, चारों के बयान तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। संसद जनता का मंच है, संविधान का मंच है, लेकिन ये नेता उसे नकार रहे हैं। इनसे सवाल पूछा जाना चाहिए कि आप संसद में क्यों हैं। अगर इन नेताओं में संसदीय मर्यादा होती और संसद के प्रति प्रतिबद्धता होती, तो ये कोई न कोई रास्ता निकाल लेते। लेकिन दोनों पक्ष वर्ष 2014 की चुनावी राजनीति पर उतर आए हैं, और ऐसा एक बार पहले भी हो चुका है। जब अप्रेल 1987 में बो$फोर्स का मामला उछला, तब चुनाव को दो साल ही रह गए थे। विपक्ष ने ऐसी परिस्थिति बनाई कि राजीव गांधी को मध्यावघि चुनाव में जाना पड़ा। नेता बो$फोर्स मामले को खींचते रहे, संसद की कार्यवाही बाघित होती रही। फिर संसद में कार्यवाही लगातार बाघित हो रही है। दो-तीन तरह के भ्रम हैं। कहा जा रहा है, जेपीसी ताकतवर होगी, पीएसी कमज़ोर होगी। विशेषज्ञों का कहना है, यह वाहियात बात है। पीएसी संसद की आर्थिक मामलों की स्थायी समिति है। पीएसी को वही अघिकार हैं, जो आप जेपीसी को बनाकर देंगे। विपक्ष द्वारा जेपीसी की मांग हो रही है, जबकि जेपीसी का अनुभव अच्छा नहीं रहा है। सबसे पहले जेपीसी की मांग 1989 में उठी थी और ह$फ्ते भर के राजनीतिक दंगल के बाद तत्कालीन सरकार जेपीसी के लिए तैयार हो गई थी। बी. शंकरानंद की अध्यक्षता में जेपीसी बनी। मालूम होना चाहिए कि शंकरानंद की जांच रिपोर्ट एस.के. भटनागर की देखरेख में बनी थी। बो$फोर्स में जो 100 लोग आरोपी थे, उनमें भटनागर भी शमिल थे। जो व्यक्ति शंकरानंद समिति का सचिव था, उसने रिटायर होने के बाद इस राज़ को खोल दिया है। संसद में जो लोग रूचि लेते हैं, वे जान गए हैं कि राजीव गांधी के इशारे पर शंकरानंद की रिपोर्ट संसद मे नहीं, बल्कि रक्षा मंत्रालय में बनी और इसीलिए उस जेपीसी से कुछ नहीं निकला। 1993 में राव सरकार के समय दूसरी बार रामनिवास मिर्धा की अध्यक्षता में जेपीसी बनी, जब हर्षद मेहता कांड हुआ। 1993 में भी संसद 17 दिन तक नहीं चली थी। तीसरी बार जेपीसी 1999 में वाजपेयी सरकार के समय बनी, प्रकाश मणि त्रिपाठी की अध्यक्षता में, केतन पारेख प्रतिभूति घोटाले का मामला था। चौथी जेपीसी बनी मनमोहन सिंह की सरकार के समय 2005 में, इसमें शीतलपेय में जहरीले रसायन की जांच का काम होना था, इस जेपीसी के अध्यक्ष शरद पवार बनाए गए। अब तक चार बार जेपीसी बन चुकी है और सत्ता पक्ष का व्यक्ति ही जेपीसी का अध्यक्ष होता है। जेपीसी के लिए सबसे पहले लोकसभा में प्रस्ताव आता है। तीन बातें तय होती हैं, जेपीसी के सदस्य कौन होंगे, वह किन मामलों की जांच करेगी और कितने दिनों में जांच पूरी कर ली जाएगी। लोकसभा अध्यक्ष प्रधानमंत्री से सलाह करके जेपीसी के अध्यक्ष को मनोनीत करता है और इसलिए पिछले चार जेपीसी के अध्यक्ष सत्ता पक्ष के ही हुए हैं। हैरानी की बात है कि विपक्ष जेपीसी की मांग क्यों कर रहा है। अभी पीएसी में ज्य़ादा ताकत है, उसके अध्यक्ष भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी हैं। उनकी एक छवि है, वे अध्यक्ष के रूप में किसी को भी बुला सकते हैं और किसी को भी सख़्त छानबीन में लपेट सकते हैं। $गलत बयानी हो रही है कि पीएसी प्रधानमंत्री को नहीं बुला सकती। लगता है, भाजपा के नेता मुरली मनोहर जोशी से डरे हुए हैं, जबकि पीएसी जांच जैसा सुनहरा मौका विपक्ष के हाथ नहीं आएगा। बताया जाता है, विपक्ष के दो नेताओं की दस जनपथ के साथ मिलीभगत है। ध्यान देने की बात है, पीएसी बाकायदा निर्वाचित होती है और अभी पीएसी एकमत से चाहती है कि 2जी स्पेक्ट्रम की जांच उसे सौंपी जाए, ताकि संसद की इस समिति को वाजिब मर्यादा मिले।
दरअसल, विपक्ष भी जल्दी निपटारा नहीं चाहता है। जल्दी निपटारा हो जाएगा, तो इसको चुनावी मुद्दा नहीं बना सकेंगे। अगर ये जल्दी निपटारा चाहते हैं, तो एक बीच का रास्ता भी हो सकता है, सरकार जेपीसी की मांग मान ले और विपक्ष समिति के सदस्यों के नामों पर सहमत हो जाए। लेकिन अभी दोनों तर$फ राजनीति सिर चढ़कर बोल रही है, इनको ख्य़ाल नहीं है कि संसद का क्या होगा। सबसे बड़ा नुकसान यह कि लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों ने हाशिये पर खड़ा कर दिया है। लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका होनी चाहिए, लेकिन नहीं है। इससे संसदीय मर्यादाओं का खुलकर उल्लंघन हो रहा है और इसके लिए एक तरह से विपक्ष और सत्ता पक्ष, दोनों ने ही सहमति बना ली है।
यह तो सामान्य बहस से तय होने वाली चीज़ है। 9 नवंबर से शीतकालीन सत्र शुरू हुआ। उसे 13 दिसम्बर तक चलना है, इसमें कुल पांच-छह दिन बचे हैं और अब तक संसद में कोई कामकाज नहीं हुआ है। इसमें दो बातें हैं, पहली बात, संसद में जो बहस होती रही है, उसकी अवघि घटाई जा रही है। इंदिरा गांधी से पहले तक संसद में बजट सत्र तीन महीने का मानसून और शीतकालीन सत्र छह-छह ह$फ्ते के होते थे। अब सरकार की भी दिलचस्पी इसमे नहीं है कि संसद में बहस हो और बहस से चीज़ें तय हों। छह ह$फ्ते मे से दो ह$फ्ते निकाल दिए गए।
कुल मिलाकर 20-22 दिन का सत्र हो गया है। चालू सत्र में 17 दिन बिना काम के निकल चुके हैं। दूसरी बात, लोगों की जेब से जो पैसा सरकारी $खज़ाने में जाता है, उसका एक आंकलन बजट में होता है। शीतकालीन सत्र में सरकार पूरक अनुदान मांग का प्रस्ताव रखती है और उस पर बहस होती है। इस बार बिना बहस कराए पूरक मांगें मान ली गई हैं। उससे भी गंभीर बात है, एक्सेस बजट भी पारित करवा लिया गया है। विपक्ष और पक्ष संसद को अपनी मनमजऱ्ी से चलवा रहे हैं। जहां सहमति होती है, जैसे अपने वेतन-भत्ते पर, वहां एक मिनट में सहमति का ठप्पा लगा देते हैं। संसद में चालू हंगामे के पीछे दलीय राजनीति काम कर रही है, और देश की सबसे बड़ी पंचायत को केवल अपनी मनमानी पर ठप्पा लगाने वाली मशीनरी के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
सवाल है, आ$िखर यूपीए सरकार जेपीसी के लिए क्यों तैयार नहीं है? राजनीतिक रूप से उसे कोई नुकसान नहीं है, लेकिन यूपीए नेतृत्व ने जेपीसी जांच को $खारिज करने का निर्णय बिना ज्य़ादा विचार के लिया था और अब उनका यह निर्णय अहंकार का विषय बन गया है। एक संभावना यह भी है कि 2जी स्पेक्ट्रम की जांच होगी, तो आंच कांग्रेस नेतृत्व तक भी पहुंच सकती है। अत: सत्ता पक्ष इसमें अपनी भलाई समझ रहा है, कि मामले को उलझाए रखा जाए, और इसमें उसे विपक्ष का भी साथ मिल रहा है।

Friday, December 3, 2010





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जश्न में दबे प्रश्न
पांच साल की पारी: गौरव दिवस के जश्न
शिवराज इन दिनों अपनी उपलब्धियों का जश्न मना रहे हैं। वे अपनी उपलब्धियां गिना रहे हैं, इतरा रहे हैं। जानकार मानते हैं कि उनकी सि$र्फ एक उपलब्धि है, कि उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया है, और चुनाव जीतने के बाद फिर एक नए कार्यकाल को पूरा करने की तर$फ अग्रसर हैं। उनका जश्न मनाना जायज़ है, मध्यप्रदेश में भाजपा के एकमात्र वही मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने ये रिकार्ड बनाया है, उनको हमारी भी बधाई और शुभकामनाएं। इस जश्न में यदि उनके साथ प्रदेश की जनता भी खड़ी नज़र आती तो यकीनन यही शिवराज की सबसे बड़ी उपलब्धि होती। पर सच तो ये है कि शिवराज अपनी जितनी योजनाएं गिनकर बता रहे हैं, उनसे ज़्यादा गिनती तो उनके शासनकाल में हुए घपले-घोटालों की है, जिनमें वे $खुद भी कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं। उनकी कामयाब सत्तायात्रा के लिए कांग्रेस का भी योगदान रहा है, जो अपनी आपसी खींचतान में ही अपनी सारी ऊर्जा झोंक रही है। शिवराज सिंह चौहान के शासनकाल की पोस्टमार्टम करती सरिता अरगरे की रपट -
मध्य प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी के पाँच साल निर्विघ्न पूरे होने की $खुशी में भाजपा राजधानी में पूरे जोशो$खरोश के साथ जश्न मनाने में जुटी है। केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की तजऱ् पर राज्य में शिवराज सिंह प्रदेश की $गैैर काँग्रेसी सरकार के पहले ऐसे मुख्यमंत्री हैं , जो पाँच साल की लम्बी पारी खेलने में कामयाब रहे हैं। इससे पहले तक बीजेपी की सरकारों में आयाराम-गयाराम का दौर ही देखा गया है। ऐसे में बीजेपी का जश्न मनाना तो ह$क बनता है ! लेकिन बीजेपी शिवराजसिंह को जिस तरह से सिर माथे पर बिठाकर गौरव दिवस मनाने में लगी है,वो पार्टी नेतृत्व की सोच,समझ और क्षमताओं पर ही सवाल खड़े करता है । सरकार के जश्न में डूबने से ज्य़ादा बेहतर है कि पार्टी यह विचार करे कि शिवराजसिंह के नेतृत्व में प्रदेश ने क्या पाया और क्या खोया?
घोषणायें, दौरे, व वायदों के पिटारे
शिवराज सिंह के अब तक के कामकाज,घोषणाओं, दौरों और वायदों के पिटारों को खोल कर देखा जाये , तो वे राजनीति की राखी सावंत से इतर नज़र नहीं आते । वही तेवर और वही लटके-झटके । क्वींस बैटन से लेकर ओबामा, और स्थानीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मसलों पर त्वरित बयान देने की उनकी अदा पर मीडिया भी $िफदा है । पिछले पाँच वर्षों में उनके द्वारा की गई घोषणाओं पर सरसरी निगाह डालें, तो चंद चाटुकार अधिकारियों की मदद से मीडिया को $खरीद कर बनाई गई छबि पल भर में छिन्न-भिन्न होती दिखाई देती है। घोषणाओं के भूसे में योजनाओं की ज़मीनी ह$की$कत सुई की मानिंद हो चुकी है । मीठा-मीठा गप्प कर $खामियों का ठीकरा केन्द्र के सिर फोडऩे की राजनीति के चलते शिवराजसिंह लगातार केन्द्र के $िखला$फ सत्याग्रह, धरने, प्रदर्शन कर जनता को भरमाने की कोशिश करते रहे हैं। दरअसल वे अब तक ना तो सूबे के मुखिया की भूमिका को ठीक तरह से समझ सके हैं, और ना ही आत्मसात करने का प्रयास करते नजऱ आते हैं। वे अब भी प्रदेश के विकास के लिये समग्र दृष्टिकोण विकसित कर सकारात्मक राजनीति को अपनाने में नाकाम हैं। वास्तव में शिवराज अपनी काबिलियत के बूते नहीं, बीजेपी की अँदरुनी कलह और शीर्ष नेतृत्व में मचे घमासान के बीच प्रदेश में अँधों में काना राजा की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं । दिल्ली में बैठे सूरमाओं की ताल पर थिरकते शिवराज सिंह प्रदेश में बीजेपी मज़बूरी बन गये हैं।
कमज़ोर विपक्ष
शिवराजसिंह की पाँच साल की इस निर्बाध पारी का श्रेय का$फी हद तक काँग्रेस के प्रादेशिक नेताओं को भी जाता है, जिन्होंने गंभीर मुद्दों को जनता के बीच नहीं ले जाकर एक तरह से मुख्यमंत्री का ही साथ दिया। जब-जब शिवराज की कुर्सी पर किन्हीं कारणों से संकट के बादल मँडराये,विपक्षी पार्टी ने हमेशा पर्दे के पीछे से अपना मित्र धर्म ब$खूबी निभाया। शिवराजसिंह ने कुर्सी सम्हालते ही अपनी विशिष्ट प्रवचनकारी शैली में जनता के बीच जाकर यह स्वीकार किया था, कि प्रदेश में सात तरह के मा$िफयाओं का राज है और वे जनता को इससे मुक्ति दिला कर ही दम लेंगे। लेकिन राजधानी भोपाल से लेकर दूरदराज़ के इलाकों में हो रही आपराधिक घटनाएँ प्रदेश मे $फैले गुंडाराज की कहानी $खुद बयान करती है। आज आलम ये है कि मा$िफयाओं के खिला$फ कार्रवाई की हुँकार भरने वाली सरकार ज़मीन के सौदागरों के $फायदों को ध्यान में रखकर ही नीतियाँ बना रही है।
बुनियादी सुविधायें ढंूढते रह जाओगे
भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति का नारा बुलंद करने वाली भाजपा आज $खुद इन्हीं व्याधियों से बुरी तरह घिर चुकी है। बिजली, पानी और सड़क के मुद्दे पर सत्ता में आई भाजपा के सात साल के शासनकाल में ये बुनियादी सुविधाएँ ढूँढ़ते रह जाओगे के हालात में पहुँच गई है। केन्द्र से मिलने वाले कोयले को घटिया क्वालिटी का ठहराकर गाँधीजी की दाँडी यात्रा(नमक सत्याग्रह) की तजऱ् पर कोयला सत्याग्रह का चोंचला कर सुर्खियाँ बटोरने वाली सरकार बिजली संकट से निपटने का कोई तोड़ नहीं ढूँढ पाई है। राष्ट्रीय राजमार्गों की दुर्दशा के लिये केन्द्र को कठघरे में खड़ा करने वाली सरकार शहरों की सड़कों की बदहाली के लिये किसे जि़़म्मेदार ठहराएगी ? प्रदेश में लोगों को पीने का पानी भले ही मय्यसर नहीं हो, मगर हर दस कदम पर शराब मिलना तय है। पूरे प्रदेश में भूजल स्तर में गिरावट की स्थिति आने वाले वक्त की भयावह तस्वीर पेश करती है,मगर टेंडर,करारनामों और सरकारी ज़मीनों की बँदरबाँट से तर सरकार आम जनता की परेशानियों से बे$खबर है।
पंचायत लगाने के शौकीन
पंचायत लगाने के शौकीन मुख्यमंत्री किस्म-किस्म की महापंचायतों के माध्यम से अब तक करीब एक दर्जन से ज़्यादा मर्तबा भोपाल में मजमा जुटा चुके हैं। सरकारी योजनाओं के मद की राशि से लगाई गई इन पंचायतों का शायद ही किसी को कोई $फायदा मिला हो। आगे पाठ पीछे सपाट के $फार्मूले पर अमल कर आगे बढ़ रहे शिवराजसिंह $खुद भी भूल चुके हैं कि इन पंचायतों में की गई घोषणाओं पर अमल हुआ भी या नहीं ? पंचायत प्रेम के अलावा तरह-तरह की यात्राओं की शिगू$फेबाज़ी से भी जनता को बरगलाने में मुख्यमंत्री का कोई सानी नहीं है। कभी साइकल, तो कभी मोटरसाइकल की सवारी कर आम जनता से नाता जोडऩे की कवायद के बाद शिवराज ने स्वर्णिम मध्यप्रदेश का शोशा छोड़ा । 1 नवम्बर 1956 को गठित मध्यप्रदेश के विभाजन को भी एक दशक गुज़र चुका है लेकिन मुख्यमंत्री ने आओ बनायें अपना मध्यप्रदेश की मुहिम छेड़ रखी है। मध्यप्रदेश कितना और कैसा बना कह पाना मुश्किल है मगर प्रादेशिक अ$खबार, न्यूज़ चैनल और विज्ञापन एजेंसियों के साथ अधिकारियों और नेताओं की ज़रुर बन आई है। मंत्रियों से लेकर छुटभैये नेताओं की शानोशौकत देखकर एक बारगी यकीन करने को जी चाहता है कि वाकई मध्यप्रदेश स्वर्णिम बन रहा है । जनता कुछ समझ पाती, इसके पहले ही वे इन दिनों शिवराज मामा जी वनवासी सम्मान यात्रा के बहाने जगह-जगह स्वयं का सम्मान कराते घूम रहे हैं।
बच्चों के बीच पंडित जवाहरलाल नेहरु की चाचाजी वाली लोकप्रिय छबि से प्रेरित शिवराज मामाजी के तौर पर म$कबूल होने की हर मुमकिन कोशिश में जुटे हैं । मगर पौराणिक गाथाओं की मानें और भारतीय संस्कृति पर $गौर करें तो मामाओं का घर-परिवार में ज़्यादा दखल कभी भी सुखद नहीं माना गया है। नरेन्द्र मोदी, सुषमा स्वराज जैसे दिग्गजों को पीछे छोड़ $खुद को प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार साबित करने की जुगत में जुटे तेज़ र$फ्तार शिवराज ने हाल ही में बाल दिवस पर भोपाल के मॉडल स्कूल में आयोजित समारोह में बच्चों से प्रधानमंत्री कब बनोगे सवाल पुछवा कर अपनी दावेदारी ठोक दी है । उनकी आसमान छूती परवाज़ और मंजि़ल तक पहुँचने की जल्दबाज़ी देखकर तो यही लगता है कि आने वाले सालों में मौका मिलने पर वे विश्व की चौधराहट का दावा पेश करने से भी नहीं चूकेंगे।
पूंजी पतियों को उपकृत करने की प्रवृति
छोटे किसान के घर से मुख्यमंत्री निवास तक पहुँचने के स$फर में शिवराज सिंह चौहान का एक ही सपना था कि प्रदेश का किसान खुशहाल हो। सत्ता हाथ में आते ही उन्हें कुछ बड़े घरानों ने अपने मोहपाश में ऐसा फांस लिया है कि वे उन पर ज़रूरत से ज्य़ादा मेहरबान हैं। एक तर$फ सरकार वन भूमि को कुछ बड़े घरानों को विकास के नाम पर बाँट रही है, वहीं पूँजीपतियों को उपकृत करने की $खातिर संरक्षित वन्य क्षेत्रों और अभयारण्यों से जुड़े तमाम नियम-कायदों को ताक पर रख दिया गया है। जिस सरकार पर राज्य की संपत्ति बचाने और बढ़ाने की जि़म्मेदारी है, वही राज्य की संपत्ति लुटाने में जुटी है। प्रदेश भर की सैकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन के मुकदमे हार कर भी सरकार बे$िफक्र है। वोट बैंक की $खातिर विभिन्न सामाजिक संगठनों को खुले हाथों से सरकारी ज़मीन लुटाने में भी कोई गुरेज़ नहीं है। राजधानी भोपाल की ऐतिहासिक इमारत मिंटो हॉल सहित प्रदेश की कई ऐतिहासिक धरोहरों को औने-पौने में व्यापारिक घरानों को देने की पहल भी सरकार के मंसूबों को सा$फ करती है।
हर $खामी का दोष केन्द्र सरकार पर मढऩा
किसान खाद,पानी,बिजली और बीज के लिये परेशान है और खेती को लाभ का धंधा बनाने का नारा देने वाली सरकार हर खामी का दोष केन्द्र सरकार के सिर मढ़कर अपनी ही धुन में मदमस्त है। अवैधखनन के ज़रिये प्राकृतिक संसाधनों की लूट करने वालों की तो जैसे पौ-बारह हो गई है। वन मंत्री ने हाल ही में बयान दिया था कि मुख्यमंत्री के गृह जि़ले सीहोर और बुधनी में सागौन की अवैधकटाई तथा रेत खनन का काम तेज़ी से $फलफ़ूल रहा है।
यू. पी. बिहार से बदतर हालत
दोबारा सत्ता में आते ही पचमढ़ी में कॉर्पोरेट कल्चर की सीख का असर मंत्रियों पर कुछ ऐसा तारी हुआ कि कमोबेश सभी ने औद्योगिक घरानों के रंग-ढंग अपनाना शुरु कर दिया। अब प्रदेश के ज़्यादातर महकमों के मंत्री और नौकरशाह किसी व्यापारिक घराने से कमतर नहीं हैं । हाल के सालों में बच्चों की शिक्षा,स्वास्थ्य, पोषण, दलितों और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे गौण हो चुके हैं । आँकड़ों की ज़ुबान समझने वालों का कहना है कि विकास के पैमाने पर प्रदेश की हालत उत्तरप्रदेश और बिहार से भी बदतर हो चली है, जबकि दलित अत्याचार, महिला उत्पीडऩ, अपहरण, हत्या, लूट, चोरी, डकैती, फिरौती जैसी आपराधिक गतिविधियों का ग्रा$फ लगातार कुलाँचे मार रहा है। प्रदेश में बने अराजकता के माहौल में उच्च शिक्षा का हाल भी बुरा है । ज़्यादातर विश्वविद्यालय राजनीति का अखाड़ा बन गये हैं और अधिकांश कुलपतियों को लेकर कैंपस में घमासान मचा है । बेरोज़गारी का ग्रा$फ र$फ्तार पकड़ रहा है,मगर इन्वेस्टर मीटस की रेलमपेल के बीच आत्ममुग्ध मुख्यमंत्री करारनामों पर हस्ताक्षरों को ही स$फलता का पैमाना मान बैठे हैं । इन सबके बीच रातोंरात कंपनियाँ बनाकर सस्ती ज़मीन हथियाने और एमओयू के नाम पर बैंकों से कजऱ् लेकर दूसरे धंधों में लगाने का कारोबार ज़़ोरों पर है।
अरबों रूपयों के कारनामों की हकीकत
तीन करोड़ रुपये की होली जलाकर अक्टूबर में खजुराहो में की गई ग्लोबल इन्वेस्टर मीट में हुए अरबों रुपयों के करारनामों की ह$की$कत तो गुज़रते वक्त के साथ ही सामने आ सकेगी । बहरहाल विधानसभा में उद्योगमंत्री द्वारा दिये गये आँकड़े अब तक के सरकारी प्रयासों की कलई खोलने के लिये काफ़ी हैं । बीते पांच वर्षो में चार विदेश यात्राएं, 20 करारनामों (एमओयू) पर हस्ताक्षर, नौ करारनामों का क्रियान्वयन नहीं, करार करने वाली एक कंपनी की परियोजना में रुचि ही नहीं, सि$र्फ दो पर काम शुरू। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पिछले पांच वर्षों में विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए किए गए प्रयासों के ये नतीजे सामने आए हैं। कांग्रेस विधायक गोविंद सिंह द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बताया कि मुख्यमंत्री ने वर्ष 2005 में दो, 2007 एवं 2008 में एक-एक विदेश यात्रा की । इन यात्राओं के दौरान विदेशी कारोबारियों के साथ कुल 20 करारनामों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से 2005 में ग्यारह, 2007 में चार और 2008 में पांच करारनामों पर मध्य प्रदेश सरकार तथा विदेशी कंपनियों के बीच हस्ताक्षर हुए थे।
उद्योग मंत्री के मुताबिक वर्ष 2005 से 2009 के बीच हुईं विदेश यात्राओं पर कुल दो करोड़ चार लाख रुपये खर्च हुए हैं। मध्य प्रदेश में निवेश के लिए विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने सहित अन्य मसलों को लेकर मुख्यमत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में 19 सदस्यीय दल ने 13 से 23 जून 2010 तक जर्मनी, नीदरलैण्ड और इटली की यात्रा की, जिस पर 1 करोड़ 30 लाख रुपए खर्च हुए। श्री विजयवर्गीय के अनुसार इस यात्रा का मकसद सि$र्फ विदेशी निवेशकों को पूंजी निवेश के लिए आकर्षित करना ही नहीं था, बल्कि प्रौद्योगिकी अवलोकन और हस्तांतरण, व्यावसायिक सहयोग, प्रदेश की ब्रांडिंग तथा विदेश से निवेशकों को खजुराहो ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट 2010 के लिये आमंत्रित करना भी था।
बढ़ती $गरीबी-पिसते $गरीब
प्रदेश में $गरीबी मिटाने के सरकार चाहे जितने दावे करे, लेकिन हकीकत कुछ और है। $गरीबी यहाँ तेज़ी से पैर पसार रही है। इसके गवाह आठ जि़लों के लोग हैं, जिनकी प्रतिदिन आय मात्र 27 रुपये है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भिंड, श्योपुर कलां, शिवपुरी, टीकमगढ़, रीवा, पन्ना, बड़वानी और मंडला वे जि़ले हैं, जहां प्रति व्यक्ति सालाना औसत आय 10 हज़ार रुपये से भी कम है। इन इलाकों के लोगों की औसत आय प्रतिमाह 833 रुपये है। हालांकि, सरकार $गरीबी दूर करने के लिए कई योजनाएं चला रही है, लेकिन $गरीबी कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। $गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओ में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रदेश में $गरीबी बढऩे की मूल वजह है। वहीं प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच लड़ाई में भी $गरीब पिस रहे हैं। कर्मचारियों को छठे वेतनमान देने के मुद्दे पर पैसे की तंगी का रोना रोने वाली राज्य सरकार विधायकों और मंत्रियों के ऐशो आराम पर दिल खोलकर $खर्च रही है।
मुखिया की ऊँची उड़ानें
भाजपा के पुरोधा और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी जैसी सर्वमान्य छबि गढऩे के फेर में शिवराजसिंह इन दिनों मुख्यमंत्री निवास को धार्मिक समारोहों का आयोजन स्थल बनाने पर तुले हैं । एक दौर वो भी था जब शिवराज सार्वजनिक मंचों पर कैलाश विजयवर्गीय के सुर में सुर मिलाकर पुराने न$गमे गुनगुनाया करते थे । लेकिन लागा चुनरी में दा$ग गाकर मह$िफल लूटने वाले कैलाश विजयवर्गीय से दामन छुड़ाकर अब वे रंजना बघेल, गोपाल भार्गव और लक्ष्मीकांत शर्मा की मंडली के साथ जि़लों के दौरों के वक्त भजन-कीर्तन करते नज़र आने लगे हैं। वैसे विजय शाह के साथ गले में ढोल लटका कर लोकधुनों पर झूमने का शौक भी इन दिनों परवान चढ़ रहा है । पेंशन और ज़मीन घोटाले के आरोप में $फँसे कैलाश विजयवर्गीय की राह में काँटे बोकर शिवराज एक मशहूर वाशिंग पाउडर के विज्ञापन तो दा$ग अच्छे हैं की तरह अपने दामन पर लगे डंपर कांड के दाग को भी जस्टिफ़ाई कर रहे हैं। वास्तव में सूबे के मुखिया के तौर पर शिवराजसिंह का कार्यकाल अब तक के सभी मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल पर भारी पड़ रहा है। उनकी पाँच साल की गौरवगाथा का बखान करने में कई साल लग सकते हैं।


कलमाड़ी की गिर$फ्तारी में भी अब देर नहीं
हृ सुप्रिया रॉय
नई दिल्ली। सुरेश कलमाड़ी के साथी चमचे और सह-अभियुक्त लगातार घेरे में आते जा रहे हैं, और उनके बयानों के आधार पर कलमाड़ी के $िखला$फ चार्जशीट तैयार होती जा रही है। अभी तक सीबीआई ने 77 अभियोगों के सिलसिले में एक ऐसी चार्जशीट तैयार की है जिसमें मुख्य अभियुक्त कलमाड़ी हैं और बाकी उनके सह अभियुक्त हैं।
कलमाड़ी कभी भी पहले पूछताछ के लिए गिर$फ्त में लिए जा सकते हैं, और फिर उन्हें बाकायदा कैद कर के उनके बाकी साथियों के साथ तिहाड़ जेल पहुंचाया जा सकता है। सीबीआई के अधिकारी जृरूरी मान रहे हैं कि कलमाड़ी को बाकी लोगों के साथ बिठा कर उनसे पूछताछ की जाए। अभी तक तो कलमाड़ी यही कहते घूम रहे हैं, कि उनको किसी बात का डर नहीं है। उन्होंने जो किया, नियमों के अनुसार किया, मगर फिर भी अगर जांच करनी है, तो सीबीआई से ले कर अदालत तक जांच कर ले, उन पर कोई आंच नहीं आएगी।
उधर सीबीआई के अधिकारियों को साफ निर्देश दिए गए हैं, कि सुरेश कलमाड़ी के $िखला$फ बयानों के ज़रिए सबूतो की जो $फाइल बन रही हैं, उसे अलग रखा जाए, ताकि बाद में न्याय प्रक्रिया में उसका इस्तेमाल किया जा सके। आ$िखर सुरेश कलमाड़ी पर हज़ारों करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप है, और ये घोटाले करने के लिए कलमाड़ी ने एक पूरी साथी मंडली बनाई थी। यह मंडली सबसे ज़्यादा जानती है, कि असल में क्या हुआ था और कौन सा पैसा कहां से होते हुए कहां तक पहुंचा? कई मामलों की तो खुलेआम पड़ताल हो चुकी है, और उनमें अब भी एक के बाद एक रहस्य निकल कर सामने आ रहे हैं। सुरेश कलमाड़ी ने वे शुरूआती सतर्कताएं ज़रूर बरती जिनके आधार पर उनका मानना था कि उन्हें कोई नहीं फंसा सकता। बहुत सारे काम तो मौखिक आदेशों के बहाने किए और बहुत से लोगों को $फायदा पहुंचाने के लिए नियम कानून भी बदल डाले।
दिलचस्प बात तो यह है कि कलमाड़ी ने दूसरी पार्टियों के और विरोध कर सकने वाले लोगों को भी साथ लेने की कोशिश की। नितिन गडकरी के करीबी संचेती परिवार को भी मोटे ठेके दिए गए और भाजपा नेता सुद्वांशु मित्तल की पारिवारिक कंपनी को भी ढाई सौ करोड़ का $फायदा पहुंचाया गया। इस बीच भूतपूर्व खेल मंत्री और कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य मणिशंकर अय्यर लगातार आरोप लगाते रहे, लेकिन कलमाड़ी ने तो देर होने का बहाना बना कर $खुद अय्यर को फंसा दिया और कहा कि बहुत सारी देर तो उनकी वजह से ही हुई थी। अब सुरेश कलमाड़ी को गिरफ्तार होने से कोई नहीं बचा सकता। कांग्रेस ने पहले से ही कलमाड़ी से दूरियां बनानी शुरू कर दी है। उन्हें पार्टी के सचिव पद से हटा दिया गया है और हालत यहां तक पहुंच गई है कि कॉमनवेल्थ खेलों के बाद जो समारोह हुए उनमें से किसी मेें भी कलमाड़ी को नहीं बुलाया गया। उन्होंने सोनिया गांधी से मिलने की कोशिश की मगर वह भी असफल रही। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ज़रूर उन्हेें दो बार मिलने का समय दिया और एक बार बहुत थोड़े समय के लिए मिले, मगर सि$र्फ इतना कहा कि श्रीमती सोनिया गांधी उनसे बहुत नाराज़ हैं, और उन्हें बहुत सारे स्पष्टीकरण देने पड़ेंगे। सुरेश कलमाड़ी अच्छे $खासे खिलाड़ी रहे हैं। मगर खेल के मैदान के नहीं, राजनीति के। सारे पदक उन्हें राजनीति में ही मिले है। ललित भनोट नाम का एक राजस्थानी कारोबारी उन्होंने पाल रखा था और खेल से कोई $खास वास्ता नहीं होने के बावजूद ललित भनोट कॉमनवेल्थ आयोजन समिति का महासचिव था। सबसे ज़्यादा मुखर हो कर वही बोलता था और हालत घमंड की यहां तक पहुंच गई थी कि अधिकारियों के खाने में एक बार जब कोई कीड़ा निकला तो ललित भनोट ने बहुत परिहास बुद्धि का परिचय देते हुए कहा कि हम आपको शाकाहारी के $खर्चे में मांसाहारी खाना खिला रहे है। यह मज़ाक जाहिर है कि ज़्यादा लोगों को पसंद नहीं आया होगा, लेकिन ललित भनोट दो ही चीज़ों के लिए जाने जाते रहे हैं। एक तो खोटी अंग्रेजी बोलने के लिए और दूसरे मेज पर रखा अपना पासपोर्ट सबको दिखाने के लिए कि वे कितने देश घूम आए है, लेकिन जब उनके यहां छापा पड़ा तो कलमाड़ी के दस्तावेज ही नहीं, बल्कि बनियान और अंडरवीयर भी उसके घर से बरामद हुए। अंतरंगता का अंदाजा लगाया जा सकता है। भनोट के गैराज में तीन महंगी गाडिय़ां भी मिलीं और सीबीआई वालों को भनोट की कलाकारी मालूम थी, इसलिए उन्होंने गाडिय़ों के इंजन सीटों के नीचे तक तलाशी ली। कमेटी के महानिदेशक वी के वर्मा के घर और ऑफिस में छापा मारा गया। वर्मा बैडमिंटन एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं, और अचानक उनके परिवार में भी एक कंपनी उगाई थी, जो कॉमनवेल्थ के ज़रिए अपना कल्याण कर रही थी। जब छापा पड़ा तो वर्मा साहब बैडिमिंटन संघ के $खर्चे पर मलेशिया में मौजूद थे। इतना ही नहीं, सीबीआई ने जो सूची बनाई है उसमें जांच के दायरे में दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के अधिकारी भी शामिल है। सीबीआई तो दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से बात करना चाहती है, और उपराज्यपाल तेजेंद्र खन्ना से भी इसके लिए केंद्र सरकार की अनुमति की आवश्यकता पड़ेगी। शीला दीक्षित और कलमाड़ी दोनों एक दूसरे को सारे घोटालों के लिए जि़म्मेदार ठहराते रहे हैं। सबसे ज़्यादा मगन मणिशंकर अय्यर है। लगभग 73 साल की उम्र में राजनयिक से राजनेता बने मणिशंकर अय्यर का$फी वाचाल माने जाते हैं और एक ज़माने में तो वे एक साप्ताहिक कॉलम भी लिखा करते थे, जिसे विषय से ज़्यादा गालियां देने की साहित्यिक प्रतिभा के लिए पढ़ा जाता था। यह कॉलम छापने वाले वीर सांघवी $िफलहाल नीरा राडिया के साथ फंसे हुए हैं। लेकिन अय्यर का कहना यही है, जांच-पड़ताल अगर तरीके से हो तो इसमें बड़े-बड़े नाम सामने आएंगे, और ये ऐसे नाम होंगे जिनकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। मणिशंकर अय्यर का सुरेश कलमाड़ी के साथ कभी कोई राजनैतिक बैर नहीं रहा मगर लगता है कि ये दोनों एक दूसरे को ले डूबने को तैयार है।

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