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Saturday, October 30, 2010


दिग्विजय सिंह ने कैसे निपटाया लालू को ?
हाल ही में बिहार विधानसभा चुनावों के जो सर्वे सामने रहे हैं, उससे साफ़ होने लगा है कि इस बार भी लालू प्रसाद यादव का चमत्कार चलने नहीं वाला है। एक सर्वेक्षण के अनुसार इस बार जो परिदृश्य सामने रहा है, उसमें चौंकाने वाले नतीजे ही सामने रहे हैं। सभी सर्वेक्षणों को मिला लिया जाए तो जो स्थिति बनती है, उसके अनुसार इस बार जनता दल यूनाईटेड और भारतीय जनता पार्टी की जुगलबंदी वापस लौट सकती है।
हृ लिमटी खरे
देश के हृदय प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री रहे सुंदर लाल पटवा ने कांग्रेस के वर्तमान महासचिव और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री के बारे में कहा था, कि दिग्विजय शोध का विषय हैं। भाजपा के वयोवृध्द और अनुभवी नेता सुंदर लाल पटवा की बात आज भी अक्षरश: सत्य ही साबित होती दिखती है। कहा जाता है कि राजा दिग्विजय सिंह जिसके कंधे पर हाथ रख दें, उसका विनाश सुनिश्चित है। कांग्रेस आलाकमान ने राजा दिग्विजय सिंह को बिहार की कमान सौंपी और बिहार से लालू प्रसाद यादव का सफ़ाया हो गया। साल दर साल बिहार पर राज करने वाले लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल का बिहार में अब नामलेवा नहीं बचा है। कल तक स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव को तो केंद्र में और ही अपने सूबे में ही आधार मिल पा रहा है। बिहार में वैसे भी बाहुबलियों का राज रहा है। कांग्रेस ने ही इन बाहुबली, धनपति, अपराधियों को प्रश्रय देकर बिहार की राजनति को प्रदूषित कर दिया है। क्षेत्रवाद, भाषावाद की राजनीति के चलते बिहार के लोगों को महाराष्ट्र विशेषकर मुंबई से वापस भागने पर मजबूर होना पड़ रहा है। केंद्र और मध्य प्रदेश में कांग्रेसनीत सरकारें सत्ताारूढ हैं, फिर भी बिहार के लोगों को संरक्षण मिल पाना निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए डूब मरने की बात है, क्योंकि बिहार ही एसा प्रदेश है जिसने देश के पहले राष्ट्रपति डॉ। राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण जैसी विभूतियां दी हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के पहले चरण में कांग्रेस को केंद्र में सरकार बनाने में पसीना गया था। उस वक्त कांग्रेस ने चारा घोटाला के प्रमुख आरोपी लालू प्रसाद यादव को अपने साथ मिलाकर नैतिकता की समस्त वर्जनाएं तोड दी थीं। संप्रग के पहले कार्यकाल में लालू प्रसाद यादव ने रेल्वे मंत्रालय लेकर कांग्रेस पर ख़ासा दवाब बनाया था। इस कार्यकाल में लालू प्रसाद यादव ने रेल्वे को फ़ायदे में लाने की बात कहकर $खुद को स्वयंभू प्रबंधन गुरू के तौर पर स्थापित कर लिया था। इस कार्यकाल में लालू यादव ने देश विदेश के आला दर्जे के मेनेजमेंट कालेजों में जाकर व्याख्यान भी दिए थे। लालू यादव ने दबाव बनाकर कांग्रेस को बहुत ही हलाकान कर दिया था। यहां तक कि लालू के ऊपर चारा घोटाले के आरोप में जब भी सीबीआई का दबाव कांग्रेस ने बनाया तब तब लालू यादव और अधिक ताकतवर होकर उभरे थे। आलम यह था कि कांग्रेस के हर हथकंडे पूरी तरह से फ़्लाप ही साबित हुए। थक हारकर जब आलाकमान ने बीसवीं सदी में कांग्रेस की राजनीति के चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह को लालू यादव को साईज़ में लाने का काम सौंपा, तब जाकर कांग्रेस को चैन आया। राजा दिग्विजय सिंह ने अपने सधे कदमों से बिहार में कांग्रेस का ग्राफ़ उंचा करने और लालू प्रसाद यादव के कद को कम करने के प्रयास आरंभ कर दिए। पिछले विधानसभा चुनावों के बाद लोकसभा चुनावों में भी लालू यादव को गहरा झटका लगा। इसके बाद संप्रग की दूसरी पारी में कांग्रेस ने लाल यादव के कुशल प्रबंधन को दर किनार करते हुए मंत्रीमण्डल से बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब लालू यादव अर्श से उतरकर फ़र्श पर गए हैं। कल तक कांग्रेस की कालर पकड़कर धमकाने वाले लालू यादव आज कांग्रेस के साथ बातचीत करने की स्थिति तक में नहीं रह गए हैं, यह सब राजा दिग्विजय सिंह की नीतियों का पुण्य प्रताप ही माना जा सकता है। हाल ही में बिहार विधानसभा चुनावों के जो सर्वे सामने रहे हैं, उससे साफ़ होने लगा है कि इस बार भी लालू प्रसाद यादव का चमत्कार चलने नहीं वाला है। एक सर्वेक्षण के अनुसार इस बार जो परिदृश्य सामने रहा है, उसमें चौंकाने वाले नतीजे ही सामने रहे हैं। सभी सर्वेक्षणों को मिला लिया जाए तो जो स्थिति बनती है, उसके अनुसार इस बार जनता दल यूनाईटेड और भारतीय जनता पार्टी की जुगलबंदी वापस लौट सकती है। बिहार की 243 सीटों में से जदयू और भाजपा की सरकार को पिछले बार की 143 के मुकाबले 27 सीटें ज्य़ादा मिल सकती हैं। इसका आंकड़ा 170 को पार करने की उम्मीद जताई जा रही है। दूसरे नंबर पर लालू यादव की राजद और राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी है, जिसे पिछली बार मिली 64 के मुकाबले 34 सीटें ही मिलने की उम्मीद है। कांग्रेस इस बार कुछ फ़ायदे में दिख रही है। कांग्रेस को इस बार 09 के स्थान पर 22 सीटें मिलने की आशा है। चौथे स्थान पर अन्य दलों के रहने की संभावना है। पिछली बार 13 के मुकाबले इस बार इसका आंकड़ा नौ तक सिमट सकता है। बसपा इस बार 04 के स्थान पर महज 02 सीट ही पा सकती है। निर्दलीयों की संख्या भी इस बार कम होने की उम्मीद है। पिछली मर्तबा निर्दलीय की संख्या 10 थी जो घटकर 06 हो सकती है। बिहार चुनाव 24 नवंबर को पूरे हो जाएंगे। सुरक्षा और निष्पक्षता को ध्यान में रखकर बिहार में चुनाव : चरणों में कराने का फ़ैसला लिया गया है। वैसे भी बिहार में धनबल और बाहूबल (मस्सल पावर) का ज़लज़ला सदा से ही रहा है। इस बार के चुनावों में राजद के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव बहुत ज्य़ादा अपसेट दिखे वे अपने ही कार्यकर्ताओं को गरियाते पाए गए। इससे साफ हो जाता है, कि लालू यादव को कांग्रेस विशेषकर राजा दिग्विजय सिंह ने इस कदर हलाकान कर रखा है, कि वे अपना आपा खोते जा रहे हैं। उधर सधी राजनीतिक पायदानों को चलते हुए राजा दिग्विजय सिंह द्वारा कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का आभा मण्डल बिहार में भी बिखेरने का प्रयास किया जा रहा है। नेशनल मीडिया को भी इसके लिए पूरी तरह मैनेज करने की तैयारी की जा रही है। कांग्रेस की नजर में भविष्य के प्रधानमंत्री राहुल गांधी की बिहार यात्राओं के कवरेज के लिए कांग्रेस ने पूरा पूरा सकारात्मक एंगल भी सुनियोजित कर लिया है, ताकि राहुल गांधी को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित किया जा सके। कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी ने भी बिहार को अब तक केंद्र सरकार द्वारा दी गई करोड़ों अरबों रूपयों की इमदाद के बारे में पूछकर थमे हुए पानी में कंकर मार दिया है, जिसकी प्रतिक्रिया बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। उधर बिहार मूल के मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष प्रभात झा ने कहा है कि बिहार को मिली केंद्रीय मदद कांग्रेस की बपौती नहीं, बिहार का हक था। लोगों का मानना है कि बिहार को अब तक पांच सालों में दी गई राशि का हिसाब किताब पूछने की ज़हमत कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी अब क्यों उठा रही हैं। क्या पिछले पांच सालों में उन्हें इस बारे में मालूमात करने की $फुर्सत नहीं मिली? अब, जब चुनाव सर पर हैं तब आना पाई से हिसाब किताब करने का क्या औचित्य? क्या यह पूछ परख राजनैतिक षडय़ंत्र का हिस्सा नहीं है? बिहार का पिछड़ापन किसी से छिपा नहीं है। बिहार में अब तक जंगलराज की स्थापना ही हुई है। पिछले पांच सालों में इस जंगल राज को पटरी पर लाने में नितीश कुमार की सरकार बहुत ज्य़ादा नहीं, पर कुछ हद तक तो कामयाब रही है। बिहार के लोगों को लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी के राज के कुशासन और नितीश कुमार के राज में सुशासन का अंतर अवश्य ही समझ में आया होगा। बिहार में जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति के अग्रणी नेता रहे शरद यादव, लालू प्रसाद यादव, नितीश कुमार, राम विलास पासवान, सुबोध कांत सहाय आदि ही एक मतेन नहीं हो पा रहे हों, तो किस पर दोषारोपण किया जाए। उधर महाराष्ट्र और दिल्ली में रोज़ी रोटी कमाने गए बिहार के बाशिंदों को दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित तो महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे और शिवसैनिकों के कोप का भाजन होना पड़ा। राज ठाकरे के फऱमान के आगे बिहार के बाशिंदे डरे सहमे रहे, किन्तु भारत गणराज्य में कांग्रेस नीत प्रदेश और केंद्र सरकार राज ठाकरे के आगे पूरी तरह बेबस नजऱ आई। तो प्रधानमंत्री, ही सोनिया गांधी और ही सूबे की सरकार ने राज ठाकरे की मुश्कें कसने का उपक्रम किया। कुल मिलाकर बिहार के लोगों के घाव रिसते रहे और कांग्रेस ने उनके घावों पर मरहम लगाने के बजाए चुप्पी साधकर नमक छिड़कने का ही काम किया। बिहार में जातिवाद बहुत अधिक हावी है। यहां ठाकुर, भूमिहार ब्राम्हण, लाला, कुर्मी आदि अनेक जातियों के बीच रार किसी से छिपी नहीं है। राजनैतिक दल भी जातिवाद को हवा देकर उसी जात के उम्मीदवार को मैदान में उतारती है, जिस जाति के लोगों का उस निर्वाचन क्षेत्र में आधिक्य होता है। बिहार तपोभूमि कही जाती रही है। यहां गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी की अनमोल वाणियां गुंजायमान होती रही हैं, विडम्बना ही कही जाएगी कि आज इन अनमोल वाणियों के बजाए लोगों के बीच _, गालियों, गोलियों की आवाज़ें गूंज रही हैं। दुख तो तब होता है जब सच्चाई सामने आती है कि देश पर आधी सदी से ज्य़ादा समय तक शासन करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस ने केंद्र में सत्ता की मलाई चखने की गऱज़ से बिहार को आताताईयों, सांप्रदायिक उन्माद फैलाने वाली जातिवाद की पोषक ताकतों के हवाले कर दिया। बिहार में कांग्रेस का ग्राफ भले ही चंद फीसदी उठता दिख रहा हो, किन्तु यह भी सच है कि बिहार में कांग्रेस का नामलेवा अब नहीं बचा है।
चुनाव के दरम्यान आरोप प्रत्यारोप नेताओं का पुराना शगल रहा है। युवराज राहुल गांधी, विदेश मूल की भारतीय बहू सोनिया गांधी आदि के आकर्षण और चुनावी धुन तरानों के बीच भीड़ तो इक_ की जा सकती है, किन्तु इस भीड़ को वोट में तब्दील करना बहुत ही दुष्कर काम है। सोनिया, राहुल या सुषमा स्वराज अपने उद्बोधनों में एकाध लाईन बिहारी में बोलकर तालियों की गडग़ड़ाहट तो बटोर सकतीं हैं, किन्तु यह वोट में तब्दील हो, यह बात मुश्किल ही लगती है। बिहार के लोग परिश्रमी होते हैं, समझदार होते हैं, वे जानते हैं कि रोज़ी रोटी के जुगाड़ में जब वे मुंबई दिल्ली जाते हैं तो उन्हें बिहारी कहकर बेईज्जत किया जाता है। उनके साथ मारपीट की जाती है। उन्हें जबरन धकियाकर भगाया जाता है, पर यह सब कुछ देखने सुनने के बाद भी राजनैतिक दल और उनके राजनेताओं के कानों में जूं तक नहीं रेंगती। चुनाव सर पर हैं, बिहार के लोगों का अपना आंकलन होगा, किसकी सरकार बने या बने, यह फ़ैसला बिहार की जनता को ही करना है, किन्तु राजनेताओं को चाहिए कि भारत के संविधान के अनुरूप देश की एकता अखण्डता बनी रहे, इस दिशा में अवश्य ही प्रयास करें, अन्यथा आने वाली पीढ़ी उन्हें शायद ही माफ कर पाए।


कारगिल के शहीदों को शानदार श्रद्धांजलि ?
कारगिल के नाम पर महाघोटाला

हृ सुप्रिया रॉय
नई दिल्ली/ मुम्बई। कारगिल में ऑपरेशन विजय के सफल होने के ग्यारह साल बाद कारगिल के शहीदों के नाम पर हुआ एक बहुत बड़ा घोटाला सामने आया है। ये घोटाला मुंबई से पकड़ में आया है, जहां सबसे महंगे इलाके दक्षिण मुंबई के कोलाबा में कारगिल के शहीदों के लिए एक मल्टी स्टोरी इमारत बनाई गई थी, ताकि उनका सम्मान किया जा सके, और उनके परिवारों को एक इज्ज़तदार जगह मिल सके। इस सोसायटी का नाम भी आदर्श कॉपोरेरिट हाउंसिंग सोसायटी रखा गया था। कांग्रेस के दो मुख्यमंत्रियों ने विशेष तौर पर ज़मीन आवंटित करने का ऐलान किया था और अनुमति दी थी और यह वह इलाका है जहां हज़ार वर्ग फ़ीट का घर पांच करोड़ रुपए में आता है। मुंबई के इस महंगे इलाके में कारगिल के शहीदों के सम्मान के लिए कोलाबा के सैनिक कॉम्पलेक्स से छह हज़ार चार सौ पचास वर्ग मीटर जमीन ली गई। वैसे इस जमीन का असली मालिक कौन है, इसको ले कर भी असली झगड़ा है। नौसेना और राज्य सरकार दोनों अपनी अपनी दावेदारी पेश करती हंै। मगर शहीदों के नाम पर यह ज़मीन आसानी से मिल गई और इसके बाद शर्मनाक घपला शुरू हुआ। आज 104 सदस्य इस सोसायटी के हैं, इसके सदस्यो में भूतपूर्व नगर निगम आयुक्त जयराज पाठक के बेटे कनिष्क खाद्य और दवा आयुक्त सीमा ब्यास जो भारत के वित्त सचिव प्रदीप ब्यास की पत्नी भी है, मुंबई के कलेक्टर इदेज कुंदन और शहरी विकास मंत्रालय के भूतपूर्व उप सचिव पीवी देशमुख शामिल थे। नेताओं ने भी शहीदों के नाम पर घास काटे। जिनके नाम सामने आए हैं उनमें कांग्रेस के विधायक कन्हाई लाल गिडवानी, एनसीपी के विधायक जितेंद्र अवहद, विधानसभा के भूतपूर्व अध्यक्ष बाब साहब कूपेकर, सुरेश प्रभु और एनसीपी के सांसद श्रीनिवास पाटिल शामिल हैं। बाज़ार भाव से बहुत कम यानी दस करोड़ रुपए में यह प्लॉट सोसायटी को मिल गया और इलाके के भूमि उपयोग के सारे नियम बदल दिए गए। रक्षा मंत्रालय जांच करवाने पर पाया गया कि एक $फ्लेट महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री अशोक चव्हान की सवर्गीय सास भगवती मोहनलाल शर्मा के नाम पर है। कारगिल के शहीदों को इससे शानदार श्रध्दांजलि क्या हो सकती थी? जिनमें भूतपूर्व नौ सेनाअध्यक्ष एडमिरल माधवेंद्र सिंह, भूतपूर्व उर्जा मंत्री और शिवसेना के सांसद सुरेश प्रभु, एक भूतपूर्व पर्यावरण मंत्री, कई सांसद और कई बड़े अफ़सर हंै, जिन्होंने कारगिल की लड़ाई सिफऱ् टीवी पर देखी होगी। सबके पास अपने अपने तर्क हैं और नौसेना और मुंबई महानगर क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण ने इस इमारत को अपनी अंतिम अनुमति दे दी है। पिछले छह वर्षों में सोसायटी की कमेटी वाले कारगिल के नाम पर वे सारी अनुमतियां ले गए, जिन्हें पैसा खिला कर भी बिल्डरों को कम से कम दस साल लग जाते हैं। सोसायटी को अनुमति विलास राव देशमुख और सुशील कुमार शिंदे दोनों ने दी थी।

Friday, October 22, 2010

अब देखिए राजनीति का कॉमनवेल्थ गेम
सब कुछ लुटा के होश में आए, तो क्या किया। दिन में चिराग़ जलाए, तो क्या किया।
अब जब सब कुछ लुट गया, तो होश में आ रहे हैं। अब डीडीए को ए.मार-एम.जी.एफ. के काम में खोट नजऱ आ रहा है। अपनी खाल बचाने को सारा ठीकरा कंपनी के सिर मढ़ दिया, पर आर्थिक मंदी के दौर में जब कंपनी ने हाथ पीछे खींच लिए, तो डीडीए ने अधिक कीमत देकर 333 फ़्लैट खऱीद लिए। ए.मार-एम.जी.एफ. को करीबन 700 करोड़ का बेलआउट पैकेज दिया गया। पर तब डीडीए ने कोई खोट नहीं बताया।
हृ संतोष कुमार
कॉमनवेल्थ घोटाले की कड़ी से कड़ी जुडऩे लगी है। पहले दिन बी.जे.पी. नेता सुधांशु मित्तल निशाने पर रहे, तो दूसरे दिन खेल गांव बनाने वाली कंपनी ए.मार-एम.जी.एफ. का खेल बिगड़ गया। डीडीए के पास जमां 183 करोड़ की बैंक गारंटी ज़ब्ती का नोटिस जारी हो गया। पर अभी तो सिफऱ् ठेका लेने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसा। यक्ष प्रश्न, ठेका देने वाले नौकरशाहों-नेताओं ने कितना खाया, इसकी परतें कब उधड़ेंगी? अब ठेकेदारों पर कार्रवाई में तेज़ी दिखाने से क्या होगा? ठेकेदार तो अपना टेंडर भरते हैं। यह तो देने वाले पर निर्भर, किस कंपनी को ठेका दें। सो सवाल है, ठेका देते वक्त नौकरशाहों-नेताओं ने होश क्यों गंवाया?
अब जब सब कुछ लुट गया, तो होश में आ रहे हैं। सो फिर वही सवाल- सब कुछ लुटा के होश में आए, तो क्या किया। दिन में चिराग़ जलाए, तो क्या किया। अब डीडीए को ए.मार-एम.जी.एफ. के काम में खोट नजऱ आ रहा है। अपनी खाल बचाने को सारा ठीकरा कंपनी के सिर मढ़ दिया, पर आर्थिक मंदी के दौर में जब कंपनी ने हाथ पीछे खींच लिए, तो डीडीए ने अधिक कीमत देकर 333 फ़्लैट खऱीद लिए। ए.मार-एम.जी.एफ. को करीबन 700 करोड़ का बेलआउट पैकेज दिया गया। पर तब डीडीए ने कोई खोट नहीं बताया। अब रपट में कह रही है, मंजूरी से अधिक फ्लैट बनाए गए। नक्शे में भी हेर-फेर कर, एरिया बदल दिया गया। पर डीडीए पर कौन भरोसा करे। दुनियां की भ्रष्ट संस्थाओं में भारत से अपनी डीडीए ही मुकाबले में टिक पाती है। डीडीए तो भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी है। सो जब कॉमनवेल्थ लूट में मौका मिला, तो दिल खोलकर कंपनी को सरकारी धन लुटाया। कंपनी से कमीशन लेकर अपनी जेब भरी। पर विडंबना देखिए, जो डीडीए $खुद संदेह के घेरे में है, वह दूसरी कंपनी पर आरोप लगा रही है। अब ऐसे में भ्रष्टाचार की जांच कैसे होगी, यह जांच करने वाले ही जानें। तीन महीने में जांच रपट सौंपे जाने का एलान तो हो गया। पर दबी ज़ुबान शीलावादी नौकरशाह कहते फिर रहे है- तीन महीने में जांच: कोई खालाजी का घर नहीं। कम से कम छह महीने तो लगेंगे ही। सो, कहीं ऐसा न हो, कॉमनवेल्थ की जांच बोफ़ोर्स घोटाले की तरह हो जाए। जहां घोटाले की रकम से कई गुना अधिक जांच में ख़र्च हो गए। बीजेपी ने तो मौजूदा जांच को पहले ही बेमतलब बता दिया है।
नितिन गडकरी के बाद बुधवार अक्टूबर को प्रकाश जावडेकर बोले- जब मौजूदा सीएजी-सीवीसी जांच में सरकारी महकमों पर सहयोग न करने का आरोप लगा रहे हैं, तो पूर्व सीएजी भला क्या जांच कर लेंगे? जांच की आंच सचमुच बड़ी मछलियों तक पहुंचेगी, उम्मीद कम है। शायद कांग्रेस भी बखूबी समझ रही है, सो फि़लहाल शुरुआती तेवर से तो दिखाने को ताबड़तोड़ कार्रवाई हो रही है। बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय ने आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट को तलब कर लिया। लगे हाथ सुरेश कलमाड़ी से भी पूछताछ का सुर्रा छोड़ दिया गया। अब कांग्रेस किसे बलि का बकरा बनाएगी, यह बाद की बात है। पर सुधांशु मित्तल ने तो मोर्चा खोल दिया है। मंगलवार अक्टूबर 19 को इन्कम टैक्स-सीबीआई के छापे पड़े। दिन भर मित्तल ही सुर्खियों में रहे। सो बुधवार को मित्तल सफ़ाई देने आ गए। उनने छापेमारी को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया। अब मित्तल से कांग्रेस राजनीतिक बदला लेगी, ऐसी मित्तल की राजनीतिक हैसियत नहीं। अगर मित्तल अपनी ही पार्टी बीजेपी के लिए ऐसा कह रहे हैं, तो माना जा सकता है। मित्तल को लेकर तो बीजेपी में लोकसभा चुनाव के वक्त ज़बर्दस्त सिर-फुटव्वल हो चुकी है। यों बीजेपी भी मित्तल को अपना सगा मानने से इनकार कर रही है ताकि घोटाले की जांच में मित्तल फंसे, तो आसानी से दूरी बना सके। पर जऱा मित्तल की सफ़ाई भी सुनिए। बोले- जहां 77 हज़ार करोड़ का घोटाला, वहां 29 लाख की क्या बिसात? बकौल मित्तल, उनकी कंपनी को सिफऱ् 29 लाख का ठेका मिला तो वह कॉमनवेल्थ घोटाले के चोरों के सरताज कैसे हो गए। यों तो मित्तल की बात में दम है। पर घोटाला 77 हज़ार करोड़ का हो या 29 लाख का। घोटाला तो घोटाला ही होता है, सो मित्तल की ईमानदार सफ़ाई में बेईमानी की ज़बर्दस्त बू आ रही है। करीब-करीब ऐसी ही ईमानदार सफ़ाई शीला सरकार, कलमाड़ी एंड कंपनी, डीडीए आदि-आदि सभी दे रहे। पर ईमानदार सफ़ाई में बेईमानी $खुद-ब-$खुद जगज़ाहिर हो रही है, सो भ्रष्टाचार के मामले में चोर-चोर मौसेरे भाई। अब एक-दूसरे के खि़लाफ़ गाली-गलौज पर उतर आए है। अब जिसका नाम उछल रहा है, वही खीझ रहा है। मंगलवार को गडकरी ने पीएम पर निशाना साधा। तो आरोपों का जवाब देने की बजाए कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी पर्सनल हो गए। कांग्रेस खिसियानी बिल्ली की तरह गडकरी पर लपकी। प्रवक्ता ने गडकरी को बिगड़ैल बच्चा बताया। मज़ाक बनाते हुए बोले- बीजेपी की पूरी प्रेस कांफ्रेंस का निचोड़ यही- खोदा पहाड़, निकला गडकरी। सो बुधवार को तो बीजेपी आग-बबूला दिखी। प्रकाश जावडेकर ने चेतावनी दे दी। शीशे के घर में रहने वाले दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते। बोले- कांग्रेस नेता भाषा में संयम बरतें, वरना वैसी भाषा का इस्तेमाल करना हमें भी आता है। उन ने कांग्रेस को इशारा भी कर दिया, अगर बीजेपी के अध्यक्ष को गाली देना बंद नहीं किया। तो यह न भूलें, कांग्रेस के पास भी अध्यक्ष है। हम भी सोनिया पर फूल नहीं बरसाएंगे। यानी सोनिया गांधी के खि़लाफ़ पर्सनल टिप्पणी की धमकी दे दी। सो भ्रष्टाचार की जांच का क्या हश्र होगा, पता नहीं। पर अब गाली-गलौज का कॉमनवेल्थ शुरू मानिए।

मित्तल पर क्यों मेहरबान हुए कलमाड़ी?
कांग्रेसी सुरेश कलमाड़ी को आखिऱ सुधांशु मित्तल इतने पसंद क्यों आये कि उन्होंने करीब आठ सौ करोड़ रूपये के ठेके दिलाने में उनकी मदद की? भ्रष्टाचार की जांच में सुधांशु मित्तल का नाम आया तो भाजपाई भी बगलें झांकने लगे. लेकिन बहुत कम लोगों को याद है कि सुरेश कलमाड़ी अपने ऊपर किये गये अहसानों की कीमत अदा कर रहे थे। असल में 1998 में जब सुरेश कलमाड़ी कांग्रेस में किनारे कर दिये गये थे, तब भाजपा की ओर उन्होंने रुख किया था। असल में 1998 में महाराष्ट्र में शरद पवार ने उनका टिकट काट दिया था, जिसके बाद वे भाजपा और शिवसेना के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पुणे से चुनाव मैदान में उतरे थे। वे चुनाव जीत गये थे, जिसके बाद वे प्रमोद महाजन के काफ़ी करीब आ गये थे। प्रमोद महाजन के करीबी का ही परिणाम था कि एनडीए सरकार में भी कलमाड़ी रसमलाई खाते रहे। उन्हीं दिनों उनका सुधांशु मित्तल से भी नज़दीकी रिश्ता बना। हालांकि उस वक्त कलमाड़ी ने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को शपथपत्र लिखकर दिया था कि वे कभी कांग्रेस में नहीं जाएंगे लेकिन राजनीति में कोई शपथ होती नहीं। 2004 और अब 2009 का चुनाव उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लड़ा और विजयी हुए। लेकिन कलमाड़ी प्रमोद महाजन के साथ अपने पुराने रिश्तों को नहीं भूले। यही कारण है कि कॉमनवेल्थ खेलों में जब पैसे आवंटित करने की बारी आयी, तो सुधांशु मित्तल पर जमकर उपकार कर दिया। जहां तक सोनिया गांधी से दूरी का सवाल है, तो सुरेश कलमाड़ी पिछले दस सालों से दस जनपथ से दूर ही हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में भी सोनिया गांधी ने उनके धुर राजनीतिक विरोधी विलासराव देशमुख को आगे बढ़ाया है।



डी कंपनी के पड़ोसी हैं शिवराज!
हृ देव श्रीमाली
डॉन दाऊद इब्राहीम का सबसे सगा माने जाने वाला साथी इकबाल मिर्ची भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पड़ोस में रहता है। अंग्रेज़ों के ज़माने के इस बंगले पर सरकार ने कब्ज़ा कर लिया है, लेकिन नीलामी में भी इसे खऱीदने का साहस कोई नहीं कर पा रहा। अंडरवल्र्ड डॉन दाऊद के गुर्गे इकबाल मेमन उफऱ् मिर्ची के श्यामला हिल्स स्थित बंगले (अंग्रेजऩ के बंगले) को केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क (सेंट्रल एक्साइज़) के स्टाफ़ क्वार्टर बनाने का प्रस्ताव केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड में अटका हुआ है। सेंट्रल एक्साइज़ ने प्रस्ताव की स्वीकृति के लिए फिर कवायद शुरू कर दी है। यह वही बंगला है, जहां 1999 में मुंबई में गुलशन कुमार की हत्या कर फऱार आरोपी अब्दुल्ला उफऱ् अनिल शर्मा की लाश मिली थी। सेंट्रल एक्साइज़ ने बंगले की नीलामी की भी कोशिश की, लेकिन अंडरवल्र्ड की नजर के कारण कोई हि मत नहीं जुटा पाया। मुख्यमंत्री निवास के पास बना यह बंगला अब्दुल्ला की हत्या के बाद ही सुर्खियों में आया था। अब्दुल्ला के साथियों ने विवाद के चलते उसकी हत्या करवा दी थी। इस बंगले को लोग भूत बंगले के नाम से भी जानते हैं। यहां आज भी सन्नाटा पसरा है। उसके अंदर गंदगी के अलावा और कुछ नहीं है। दरवाज़े टूट चुके हैं और दीवारों पर यहां-वहां धूल जमी है। यह बंगला फि़लहाल सेंट्रल एक्साइज़ के कब्ज़े में है। इसे बेचने के लिए वर्ष 2007 में नीलामी की प्रक्रिया भी शुरू की गई थी। दो बार बंगले को नीलाम करने की कोशिश की गई, जो नाकाम रही। इसके बाद सेंट्रल एक्साइज़ ने इस बंगले को तोड़कर उसकी जगह सेंट्रल एक्साइज़ कमिश्नर और उसके ऊपर के अधिकारियों के लिए आवास बनाने का प्रस्ताव केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड को भेजा था। सालभर बाद भी प्रस्ताव को मंज़ूरी नहीं मिलने के बाद अब सेंट्रल एक्साइज़ विभाग का स्थानीय कार्यालय प्रस्ताव की स्वीकृति के लिए फिर से प्रयासों में जुट गया है। विभाग के एक अधिकारी ने बताया, कि इस बारे में बोर्ड को फिर से पत्र लिखा जा रहा है।


Friday, October 15, 2010




छत्तीसगढ़ में नहीं हैं सुरक्षित मज़दूर

आए दिन हो रही दुर्घटनाओं की एक वजह यदि कार्य के दौरान लापरवाही है, तो दूसरी बड़ी वजह औद्योगिक सुरक्षा अधिनियम में निहित शर्तों का पालन नहीं करना है। ज़ाहिर है,
दुर्घटनाओं के लिए यदि प्रबंधन जि़म्मेदार है, तो राज्य शासन का श्रम विभाग भी कम जि़म्मेदार नहीं। हृ दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ की राजधानी के औद्योगिक क्षेत्र में एक सप्ताह के भीतर दूसरी दुर्घटना यह प्रमाणित करने के लिए काफ़ी है कि औद्योगिक सुरक्षा के प्रति लापरवाही का कोई ओर-छोर नहीं है, और सुरक्षा का कामकाज केवल कागज़़ों पर चल रहा है। यह गहन चिंता का विषय है कि रायपुर, रायगढ़ एवं कोरबा के औद्योगिक संयंत्रों में आए दिन कोई न कोई दुर्घटना होते रहती है, जिसमें या तो श्रमिकों की जान जाती है या वे घायल होकर स्थायी अपंगता के शिकार होते हैं। रायपुर के निकट सरोरा के महेन्द्रा स्ट्रिप्स में 28 सितंबर को फर्ऩेस में हुए विस्फोट में 18 श्रमिक बुरी तरह झुलस गए थे, जिनमें से तीन की मौत उपचार के दौरान हो गयी। झुलसे हुए शेष मज़दूर अभी भी जि़ंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। इसी दिन कोरबा की स्वस्तिक कोल वाशरी में कन्वेयर बेल्ट में फंसने से एक श्रमिक की मौत हो गई थी। इस दुर्घटना के सिर्फ 10 दिन के भीतर सिलतरा के कार्पोरेट एलायज़ (राजेन्द्र स्टील्स) में फिर हादसा हुआ। यहां फर्नेस की कूलिंग पाइप लाइन में लीकेज से जो गर्म भाप निकली उसमें 4 मज़दूर बुरी तरह झुलस गए जिनमें दो की हालत नाज़ुक है। 6 अक्टूबर को कोरबा स्थित बालको के एल्यूमिना प्लांट में भी दुर्घटना हुई। बालको संयंत्र की इस इकाई में फर्ऩेस ब्लाक में दरवाज़ा लगाने का काम चल रहा था। लगभग 10 टन का यह इस्पाती दरवाज़ा एकाएक गिर पड़ा, जिसके नीचे तीन मज़दूर दब गए, जिनमें एक की मौत हो गई। इन दुर्घटनाओं से समझा जा सकता है कि सुरक्षा के मामले में किस कदर लापरवाही बरती जा रही है। औद्योगिक संयंत्रों में श्रमिकों एवं कार्यरत कर्मचारियों की सुरक्षा का दायित्व मूलत: प्रबंधन पर है, जो सुरक्षा उपायों को दोयम दर्जे पर रखता है। यानी करोड़ों के संयंत्रों में श्रमिकों की सुरक्षा प्रबंधन की प्राथमिक सूची में नहीं है। आए दिन हो रही दुर्घटनाओं की एक वजह यदि कार्य के दौरान लापरवाही है, तो दूसरी बड़ी वजह औद्योगिक सुरक्षा अधिनियम में निहित शर्तों का पालन नहीं करना है। ज़ाहिर है, दुर्घटनाओं के लिए यदि प्रबंधन जि़म्मेदार है तो राज्य शासन का श्रम विभाग भी कम जि़म्मेदार नहीं। इस विभाग के अंतर्गत स्वास्थ्य एवं सुरक्षा इकाई से पूछा जा सकता है कि क्या कारख़ाना निरीक्षक एवं अन्य अधिकारी नियमित रूप से कारखानों का निरीक्षण करते हैं? क्या वे सुरक्षा के उपलब्ध साधनों की पड़ताल करते हैं तथा क्या प्रबंधन काम को ठेके में देने मात्र से जवाबदेही से बरी हो सकता है? आमतौर पर सिविल वर्क ठेके में दिए जाते हैं, तथा ठेकेदार के मज़दूर कार्य करते हंै। औद्योगिक दुर्घटनाओं में मरने वाले अधिकांश ठेका श्रमिक ही होते हैं। बालको चिमनी हादसे में मृत 42 श्रमिक चीनी कम्पनी सेपको के मज़दूर थे। ठेका प्रथा से कारख़ानेदारों को बच निकलने का मौका मिलता है। दुर्घटनाओं की स्थिति में सीधे तौर पर उन पर कोई आंच नहीं आती। मृतकों के परिजनों को मुआवज़ा देकर प्रबंधन छुट्टी पा लेता है तथा कानून के फंदे से तिकड़में भिड़ाकर बचा रहता है। रायपुर उरला स्थित गोदावरी इस्पात संयंत्र में 2008 में घटित दुर्घटना में 8 श्रमिक मारे गए हैं। श्रम न्यायालय में मामला पेश हुआ और सिफऱ् मैनेजर को सज़ा सुनाई गयी वह भी सिफऱ् 3 महीने की। बालको चिमनी हादसे की न्यायिक जांच अभी पूरी नहीं हुई है, लेकिन मारे गए श्रमिकों के परिजन अभी भी रोजगार के लिए भटक रहे हैं। महेन्द्रा स्ट्रिप्स में हुए हादसे में 3 श्रमिकों के मरने के बाद पुलिस ने धाराएं बदली हैं, तथा अब संयंत्र के प्रबंधक व संचालक के खि़लाफ़ भादवि की धारा 304 ए के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज किया है। पुलिस जांच का क्या निष्कर्ष निकलेगा, कहना मुश्किल है, लेकिन प्राय: यह देखने में आया है जैसे-जैसे समय बीतता है, मामलों में लीपापोती शुरू हो जाती है, तथ्य छिपाए जाते हैं, ख़ानापूर्ति के लिए बलि के बकरे तैयार किए जाते हैं और जाहिर सी बात है, रिश्वतखोरी जमकर चलती है। छत्तीसगढ़ के एक दशक में ऐसा कोई उदाहरण सामने नहीं आया है, जिसमें कम्पनी के मालिकों को सज़ा हुई हो, जबकि बीते दस सालों में अनेक छोटी बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाएं घट चुकी हैं। दुर्घटनाओं के संदर्भ में यह तर्क दिया जाता है, कि वे रोकी नहीं जा सकतीं, क्योंकि भूल करना मानवीय स्वभाव है। यदि इस तर्क को सही भी मान लें, तो भी यदि पर्याप्त सतर्कता बरती जाए और सुरक्षा के समुचित बंदोबस्त हों तो दुर्घटनाएं कम तो हो ही सकती हैं। क्या राज्य का श्रम मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा संचालनालय अपनी जि़म्मेदारी का निर्वहन करता है? क्या प्रदेश के श्रम मंत्री चंद्रशेखर साहू कारख़ानों का औचक निरीक्षण करने कभी समय निकाल पाए? क्या उन्होंने श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए कम्पनियों पर वांछित दबाव बनाया? क्या प्रदेश के उद्योग मंत्री राजेश मूणत न्यायोचित तरीके से अपनी जि़म्मेदारी निभा पा रहे हैं? क्या राजधानी में भयानक औद्योगिक वायु प्रदूषण रोकने में उन्हें कामयाबी मिल पाई? यह ठीक है कि राज्य में कोई औद्योगिक अशांति नहीं है, लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि श्रमिकों के वाजिब हितों की भी रक्षा न की जाए। श्रमिकों की जानें जाती हैं, परिवार बेघर और बेसहारा होते हंै, इनकी रक्षा कौन करेगा? इनके लिए उचित मुआवज़े के साथ-साथ स्थायी रोजग़ार की व्यवस्था क्यों नहीं होती? यह कम्पनी और लोकप्रिय सरकार की जि़म्मेदारी होनी चाहिए, जिससे उन्होंने मुंह मोड़ रखा है। दस दिन के भीतर चार औद्योगिक दुर्घटनाएं शासन के लिए चिंता का सबब होना चाहिए। अब यह देखना बेहद ज़रूरी है कि रायपुर, कोरबा, रायगढ़ एवं छत्तीसगढ़ के अन्यत्र स्थानों में चल रहे संयंत्रों में रखरखाव पर ध्यान दिया जा रहा है अथवा नहीं। कौन से ऐसे उद्योग हंै जहां इसके अभाव में हादसे हो सकते हैं। यदि सरकार कड़ाई बरते तो व्यवस्थाएं सुधर सकती हैं। महेन्द्रा स्ट्रिप्स में फर्ऩेस फटने से दुर्घटना हुई, जबकि कार्पोरेट एलायज़ में पाइप लीकेज दुर्घटना का कारण बना। यदि इन संयंत्रों में रखरखाव ठीक रहता, तो ये दुर्घटनाएं हरगिज़ नहीं होतीं। बहरहाल मुख्यमंत्री रमन सिंह ने घायलों की पूछपरख की। वे उन्हें देखने अस्पताल गए। इलाज का सारा ख़र्च महेन्द्रा स्ट्रिप्स के मालिकों को उठाने के निर्देश दिए। उन्होंने संवेदनशीलता दिखाई है, और इससे उम्मीद बंधती है कि वे कुछ ऐसे स्थायी बंदोबस्त करेंगे जिससे राज्य में उद्योगों के विकास के साथ श्रमिकों की सुरक्षा एवं हितों की भी रक्षा हो सकेगी।




रेड्डी बंधुओं की ताकत का असली राज़

अंशू सिंह

नई दिल्ली।
कर्नाटक के राजनैतिक नाटक का अंत चाहे जो होता, लेकिन अब कर्नाटक में सबसे ज्य़ादा ताकतवर और सबसे रईस नेता परिवारों में से एक रेड्डी परिवार को पता लग गया है, कि भाजपा का विश्वास उन्होंने फिर जीत लिया है और इस विश्वास के सहारे वे कभी भी विश्वासघात कर सकते हैं। मुंहबोली बहन और भाजपा की प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज भी उनके साथ हैं। रेड्डी बंधुओं ने जो तरक्की की है, उसका कोई जवाब नही। साइकिलों से चलते चलते अब अपने हवाई जहाज़ और हैलीकॉप्टर उड़ाने वाले इस रेड्डी परिवार ने ज़मीन से पैसा निकाला है, और भाजपा जैसी चाल, चरित्र और चिंतन वाली पार्टी ने उन्हें ऐसा करते रहने में मदद दी है। येदुरप्पा की सरकार बचने की हालत में भाजपा को सबसे पहले रेड्डी बंधुओं, जिनमें से दो मंत्री भी हैं, को ठिकाने लगाने की व्यवस्था करनी पड़ेगी। जिन रेड्डी बंधुओं की आड़ में कर्नाटक में अक्सर राजनीतिक भूचाल आ जाता है, वे दरअसल एक मामूली सिपाही के बेटे हैं। पर आज उनकी तूती बोलती है। तीनों भाई राजनीति में हैं। दो करुणाकर और जनार्दन रेड्डी कर्नाटक सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। रेड्डी बंधुओं ने कई स्रोतों से पैसे बनाए। 1990 के दशक में चिट फंड के ज़रिए उन्होंने ज़बरदस्त कमाई की। पर उन पर रुपयों की असली बरसात खनन के कारोबार में उतरने के बाद से हुई। 50 लाख रुपये लगा कर वे इस कारोबार में उतरे। उसके बाद यह रकम दिन दूनी, रात चौगुनी होने लगी। मानो, ओबलापुरम खदान से वे अयस्क नहीं, पैसा ही निकाल रहे हैं। एक समय था, जब बेल्लारी के इस रेड्डी भाइयों की कोई पहचान नहीं थी। पर आज पूरा कर्नाटक इन्हें अरबपति खदान मालिक के रूप में जानता है। दौलत और शोहरत के साथ-साथ रेड्डी बंधुओं के साथ विवाद भी जुड़ते गए। उन पर अवैध खनन के आरोप लगे। ओबलापुरम खान की सीमा को लेकर भी विवाद उठा। कहा गया कि वे आंध्र प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र में भी अवैध रूप से खनन कर रहे हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और उन्हें खनन पर पाबंदी भी झेलनी पड़ी। जब सुषमा बेलारी से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खि़लाफ़ लोकसभा चुनाव लड़ी थीं, तभी उनसे रेड्डी बंधुओं का रिश्ता मज़बूत हुआ था। रेड्डी भाइयों की कर्नाटक की राजनीति में भी अच्छी हैसियत है। कुछ महीने पहले उन्होंने राज्य की येद्दयुरप्पा सरकार के वजूद पर ही ख़तरा पैदा कर दिया था। तब मुख्यमंत्री को उनकी मांगें माननी पड़ी थीं। में जनार्दन रेड्डी ने सार्वजनिक रूप से बताया था कि उनकी और उनकी पत्नी की करोड़ का एक हेलीकॉप्टर, चार करोड़ की एक डीलक्स बस और पांच करोड़ रुपये करोड़ रुपये था। हालांकि चुनाव के लिए नामांकन पत्र भरते समय दिए गए करोड़ रुपये बताई है। रेड्डी बंधुओं ने खनिज शोधन के लिए ब्रम्हाणी स्टील नाम से एक कंपनी बनाई, जिसके लिए उन्होंने किसी से एक भी पैसा नहीं लिया था।

Friday, October 8, 2010




राहुल बाबा की नज़र में जैसे सिमी वैसे ही आरएसएस

राहुल गांधी ने नया सुर्रा छोड़ दिया है। प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी और आरएसएस को एक ही तराज़ू में तोल दिया। दो दिन पहले मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में राहुल ने कांग्रेस में आने वाले लोगों से बेहिचक कह दिया था। आरएसएस और सिमी की विचारधारा छोड़कर आने वालों को ही कांगेस में जगह मिलेगी।
हृ संतोष कुमार
बुधवार अक्टूबर 6 को भोपाल में जब राहुल के बयान का मतलब पूछा गया तो राहुल ने कह दिया- आरएसएस और सिमी दोनों ही कट्टरवादी संगठन। वैचारिक कट्टरता की दृष्टि से इनमें कोई फर्क नहीं। यानी राहुल बाबा की नजर में जैसा सिमी, वैसा ही आरएसएस। पर सवाल, अगर आरएसएस को सिमी जैसा मान रहे राहुल। तो मनमोहन-चिदंबरम से कहकर बैन क्यों नहीं लगवाते? सिमी पर बैन यूपीए के पिछले टर्म में ही बढ़ाया गया। अब अचानक ऐसा क्या हो गया, जो राहुल ने संघ को सिमी के बराबर खड़ा कर दिया? अयोध्या फैसले के बाद संघ ने जो संयमित रुख अपनाया, खुद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह कायल हो गए। फिर राहुल के बयान का क्या मकसद? क्या यह जानबूझ कर उकसाने की कोशिश नहीं? सो राहुल के बयान पर बीजेपी ने पलटवार किया। प्रकाश जावड़ेकर बोले- मानसिक संतुलन खो चुके हैं राहुल। कांग्रेस लोकसभा चुनाव के बाद के उपचुनावों में लगातार हार रही। सो हताशा में राहुल अंट-शंट बयान दे रहे। बीजेपी ने राहुल को अपरिपक्व और उद्दंड तक करार दे दिया। पर सिर्फ बीजेपी नहीं, जिस संघ को राहुल ने सिमी जैसा बताया, उसके प्रवक्ता राम माधव ने भाषाई मर्यादा को लांघ पलटवार किया। राम माधव बोले- राहुल को राजनीति की लंबी पारी खेलनी। सो सिर्फ इटली-कोलंबिया को समझने से काम नहीं चलेगा। भारतीय समाज को भी समझना पड़ेगा। बयानबाजी से पहले इतिहास पढ़ लेना चाहिए और समाज में रचे-बसे संघ और उसके क्रियाकलापों को भी समझ लेना चाहिए। पर बीजेपी-संघ ने कड़ा जवाब दिया। तो कांग्रेस तिलमिला गई। राहुल को नसीहत देने की हिम्मत किसी कांग्रेसी में नहीं, सो किसी का नाम लिए बिना जनार्दन द्विवेदी बोले- किसी व्यक्ति के बारे में टिप्पणी नहीं, पर सभी राजनीतिक संगठनों को अपने विरोधियों के प्रति भाषा में सभ्यता का ख्याल रखना चाहिए। पर अपने राजनीतिबाजों को आखिर क्या हो गया? क्या राजनीतिक चक्की के आटे में सद्भावना, शिष्टाचार या मर्यादा नहीं पाई जाती? किसी को आरएसएस-सिमी में फर्क नजर नहीं आता। तो मुलायम को अपना वोट बैंक दिख रहा। विहिप को मंदिर के लिए पूरी पंचकोसी चाहिए। तो अयोध्या मामले को निजी विवाद बता कपिल सिब्बल सरकार को बीच में न पडऩे की सलाह दे रहे। पर कोई पूछे, गर अयोध्या विवाद निजी, तो क्या शाहबानो प्रकरण सरकारी था? जिसके लिए संसद ने कानून बना सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया। क्या यही राजनीति की मर्यादा?


कर्नाटक में फिर शुरू किटकिट कर्नाटक में बीजेपी का नाटक फिर शुरू हो गया। दक्षिण भारत में पहली बार किला $फतह किया पर कुनबे में ऐसी कलह मची, दो साल में ही किले की चारदीवारी दरकने लगी।
हृ संतोष कुमार
अब बीजेपी के डेढ़ दर्जन एमएलए बगावत पर उतर आए हैं। इन बगावती विधायकों ने गवर्नर को चि_ी लिख समर्थन वापसी का एलान कर दिया है तो येदुरप्पा ने भी चार असंतुष्ट मंत्रियों को फौरन केबिनेट से बर्खास्त कर दिया है।
बाकी एमएलए को अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी। कर्नाटक की खींचतान कई दफा दिल्ली दरबार तक पहुंच चुकी। यानी कर्नाटक में बीजेपी की सरकार जनता नहीं, अपनों के संकट सुलझाने में ही उलझी हुई। सो विपक्ष भी भला मौका क्यों गंवाता। देवगौड़ा-कांग्रेस ने मोर्चा खोला। तो मौजूदा गवर्नर हंसराज भारद्वाज अति सक्रिय हो गए। अबके उन ने विधानसभा का सत्र चालू होने के बावजूद सीएम को बहुमत साबित करने के लिए बारह अक्टूबर तक का समय दे दिया। बीजेपी के नाराज 15 एमएलए और पांच समर्थक निर्दलीय एमएलए ने गवर्नर को चि_ी लिखकर समर्थन वापसी का एलान कर दिया। सो कानून की बारीकी से वाकिफ हंसराज भारद्वाज ने कानून को किनारे रख राजनीतिक एजंडा चल दिया।
यों हंसराज भारद्वाज कोई पहली बार इतने सक्रिय नहीं। इससे पहले अवैध खनन के मामले में राष्ट्रपति से लेकर पीएम तक अपनी रपट बिन मांगे भेज चुके। मर्यादा लांघ सीएम को बेमतलब नसीहत तक दे चुके। जब गवर्नर ने यहां तक कह दिया था, अगर वह सीएम होते, तो रेड्डी बंधुओं को केबिनेट से फौरन बाहर करते। अब कोई गवर्नर ऐसी भाषा का इस्तेमाल करे तो उसे संविधान का पहरुआ कहा जाए या किसी पार्टी का, यह आप ही तय करिए। वैसे 11 अक्टूबर को मुख्यमंत्री महोदय सरकार के बहुमत का परीक्षण करेंगे, इसलिए कर्नाटक की किट किट अभी कुछ दिन तक चलती रहेगी।



फ़जऱ्ी किसान के्रेडिट कार्ड से लाखों का $गबन

हृ घनश्याम नामदेव
मुलताई (बैतूल) कृषक टंटी अंतराम नरवारे निवासी ग्राम देवडोंगरी तह. मुलताई को 10 मई 2010 को महाराष्ट्र बैंक मुलताई का नोटिस मिला, जिसमें लिखा था 3 लाख 16 हज़ार भरने की चेतावनी थी, अन्यथा कानूनी कार्यवाही की जावेगी। कृषक नोटिस पढ़कर अवाक रह गया, क्योंकि न तो उसने कर्ज़ लिया, न ही कभी बैंक गया। कृषक के नाती राजेन्द्र नरवरे द्वारा सूचना के अधिकार के तहत लम्बे संघर्ष के पश्चात जानकारी प्राप्त की, एवं अनुविभागीय अधिकारी राजस्व मुलताई को शिकायत की, जिसमें शाखा प्रबंधक रामप्रसाद अरोरा पैनल अधिवक्ता ज़मानतदार को आरोपी बनाकर भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 409, 120 में अपराध पंजीबद्ध करने की शिकायत की। सूचना के अधिकार के अवलोकन में पाया गया कि टंटी नरवरे की उम्र 85 वर्ष है। प्रकरण में 45 वर्ष के $फजऱ्ी व्यक्ति की $फोटो लगी है। वास्तव में टंटी निरक्षर होने से अंगूठा लगाता है, जबकि प्रकरण में $फजऱ्ी हस्ताक्षर हैं। बैंक में बही भी $फजऱ्ी लगी है। ज़मानतदार रामलाल $फजऱ्ी है। ग्राम देवडोंगरी में इस नाम का कोई व्यक्ति नहीं है। राशन कार्ड, निर्वाचन कार्ड, बैंक पैनल के वकील की सर्च रिपोर्ट, शपथ पत्र में अनेक त्रुटियां हैं। शाखा प्रबंधक की विजि़टिंग रिपोर्ट भी $फजऱ्ी है। बैंक ऑ$फ महाराष्ट्र शाखा मुलताई का यह कोई पहला प्रकरण नहीं है, शाखा प्रबंधक व वकील पैनल $फजऱ्ी प्रकरण बनाकर बैंक व शासन को करोड़ों का चूना लगा रहे हैं। किसानों के प्रत्येक प्रकरण में बीस प्रतिशत कमीशन लिया जाता है। बैंक से लोन दिलवाने के लिए दलालों का गिरोह सक्रिय है। यदि कोई जांच एजेंसी से करवाई जाए तो, मुलताई, साईखेड़ा मोरखा, राय आमला, ससुन्द्रा, डहुआ में ऐसे सैंकड़ों प्रकरणों की जानकारी उच्चअधिकारियों को भी है। पर कोई कार्यवाही करना नहीं चाहते, क्योंकि इससे शाखा प्रबंधकों, दलालों व वकीलों को जेल की हवा खाना पड़ सकती है। कजऱ् वसूली न होने पर डूबत खाते में राशि डाल दी जाती है। दलालों, वकीलों, शाखा प्रबंधकों के दबाव में शिकायत करने से किसान परहेज करते हैं। बैंक एजेंसी पर केन्द्र सरकार का नियंत्रण नहीं रहने से बैंकों से करोड़ों रूपया का भ्रष्टाचार हो रहा है। इसी प्रकार का मामला कुछ वर्ष पहले स्टेट बैंक ऑ$फ इंडिया शाखा मुलताई में भी आया था, लेेकिन भ्रष्ट तत्वों को बचाने के लिए मामला र$फा-द$फा कर दिया गया। इसी प्रकार सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में एक एकड़ ज़मीन को $फजऱ्ी तरीके से 13 एकड़ बना दिया एवं ट्रेक्टर के लिए ऋण प्रकरण बना दिया गया, लेकिन उसकी रिपोर्ट तक नहीं हुई।

Monday, October 4, 2010

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रामलला की है रामजन्मभूमि

हृ संजय तिवारी
ऐतिहासिक फ़ैसला आ गया। शांति की अलोकप्रिय और अप्रासंगिक अपीलों और फ़ैसला रुकवाने की इक्का दुक्का कोशिशों के बीच आखिऱकार उस ऐतिहासिक विवाद में अदालत की मध्यम पायदान ने अपना फै़सला सुना दिया, जिसे सुनने के लिए साढ़े तीन बजे लगभग सारा देश ठहर गया था। नौ हज़ार पृष्ठों में पसरे फ़ैसले की एक एक लाइन-जहां रामलला विराजमान, वही जन्मस्थान।
यहां अदालत द्वारा जिस जन्मस्थान का जि़क्र किया गया है, उससे आशय रामजन्मभूमि से है, जहां अभी अस्थाई रूप से मंदिर है। इसी विवादित स्थल पर ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने दो-एक के बहुमत से इस बात पर अपनी मुहर लगा दी कि जहां रामलला विराजमान हैं, वहां विराजमान रहेंगे। जस्टिस अग्रवाल, जस्टिस धर्मवीर शर्मा और जस्टिस एस.यू.ख़ान की खण्डपीठ ने ऐतिहासिक फ़ैसला देते हुए देश को उस मझधार से पार कर दिया है, जहां चार सदियों से कमोबेश यह देश अटका हुआ था, लेकिन फ़ैसला एकदम से एकतरफ़ा भी नहीं है। अपने दस हजार पेज के फै़सले में उच्च न्यायालय ने संपूर्ण फ़ैसला क्या दिया है, लेकिन शाम के पांच बजे इस मुद्दे पर जिरह कर रहे वकीलों ने फ़ैसले की जो जानकारी दी उसका सार यही है कि जन्मस्थान रामलला का है, लेकिन सरकार द्वारा अधिग्रहित ज़मीन को तीन हिस्से में बांट दिया जाए, जिसमें से एक हिस्से पर मंदिर निर्माण हो, दूसरा हिस्सा मुसलमानों को दिया जाए और तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को दिया जाए. 2002 से शुरू हुई अदालती कार्यवाही में कुल 90 दिन सुनवाई हुई जिसमें चार प्रमुख मुकदमों में दलीलें पेश की गयीं। ये चार वाद थे- भगवान श्रीराम विराजमान बनाम राजेन्द्र सिंह, गोपाल सिंह विशारद बनाम ज़हूर अहमद, निर्मोही अखाड़ा बनाम बाबू प्रियदत्त राम व अन्य और सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ़ बोर्ड बनाम गोपाल विसारद व अन्य. इनमें से चौथे वाद को हाईकोर्ट ने ख़ारिज कर दिया जो सुन्नी वक्फ़ बोर्ड बनाम गोपाल सिंह विशारद का था। फ़ैसला बाकी तीन के संदर्भ में आया है। इन तीन वादों में भी मुख्य फ़ैसला भगवान श्रीरामचंद्र विराजमान बनाम राजेन्द्र सिंह से जुड़ा है, जिसके संदर्भ में उच्च न्यायालय ने कहा है कि रामलला जहां विराजमान हैं, वह उन्हीं का स्थान है।
पहले वाद के तहत जो मुख्य सवाल सामने रखे गये थे उसमें अदालत को यह निर्णय करना था कि क्या विवादित स्थल आस्था, विश्वास या परम्परा के अनुसार भगवान राम का जन्मस्थान है? यदि हां, तो इसका प्रभाव? महत्वपूर्ण फ़ैसला इसी एक बिंदु पर आया है. हाइकोर्ट ने आस्था, विश्वास और परंपरा तथा ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर पाया है कि जिस स्थान को लेकर विवाद है और जहां बाबरी मस्जिद निर्मित की गयी थी वह वास्तव में हिन्दुओं के पुरुषार्थ पुरुष रामचंद्र से ताल्लुक रखती है, जो धर्मग्रंथों और साक्ष्यों के अनुसार अयोध्या में ही पैदा हुए थे। अदालत के इस फै़सले से वाद संख्या तीन में उठाये गये सवाल का भी जवाब मिल जाता है, जिसमें इस बात पर निर्णय करना था, कि क्या विवादित संपत्ति मस्जिद है, जिसे बाबर द्वारा बनवाये जाने पर बाबरी मस्जिद कहा जाता है? ज़ाहिर है अदालत ने माना है कि इस विवादित संपत्ति को वर्तमान में मस्जिद नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसे बाबर ने ही मुसलमानों को वक्फ़ किया था, इसका कोई साक्ष्य सामने आया नहीं है. संभवत: इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ़ बोर्ड का दावा ही ख़ारिज कर दिया, क्योंकि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बतौर वादी जो दावे किये थे वे बहुत ही कमज़ोर थे, और इस ऐतिहासिक विवाद में एक तरह से बचकाने दावे किये थे। सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को पंद्रह प्रमुख बिन्दुओं पर हाईकोर्ट के सामने अपना पक्ष रखना था, जिसमें कई कमज़ोर कडिय़ां हैं। सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को यह साबित करना था कि क्या 1949 तक वह विवादित भवन के कब्जे में रहा जहां से उसे बेदखल कर दिया गया? अगर बाबरी मस्जिद का वक्फ़ नहीं हुआ था , तो सुन्नी वक्फ़ बोर्ड किस आधार पर यह दावा कर सकता है कि संपत्ति उसकी है? फिर वह इस बात को भी नकार नहीं सकता था, कि विवादित स्थल पर हिन्दू एक ज़माने से पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। अगर 23 दिसंबर 1949 को विवादित परिसर में रामलला की मूर्ति और पूजा का सामान रख दिया गया था तो फिर उस भवन को मस्जिद कहने का क्या औचित्य बचता था? एक और महत्वपूर्ण बिन्दु पर सेन्ट्रल सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को अपना पक्ष प्रस्तुत करना था वह यह कि क्या विवादित ढांचे में लगे खम्भों, जिन पर हिन्दू देवी देवताओं के चित्र अंकित हैं, के कारण विवादित भवन को मस्जिद की संज्ञा दी जा सकती है? और आखिरी बात यह कि जब वहां कोई ढांचा ही नहीं है, तो उसे बाबरी मस्जिद कैसे कहा जा सकता है? भावनात्मक रूप से वक्फ़ बोर्ड ने चाहे जो दलीलें दी हों, लेकिन कानून और शरीयत के दायरे में इन पेचीदे सवालों का संभवत: उनके पास कोई उत्तर नहीं रहा होगा। बहरहाल, लंबी कानूनी लड़ाई, घृणित राजनीति और दुखदायी सांप्रदायिक दुर्घटनाओं से गुजऱते हुए अयोध्या के विवादित परिसर पर हाईकोर्ट का फ़सला दोनों पक्षों के लिए संतोषजनक ही दिखाई दे रहा है। राममंदिर आंदोलन में हिन्दुओं की ओर से प्रतिनिधि संगठन होने का दावा करनेवाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इसका स्वागत किया है, तो शिवसेना ने भी फ़ैसले पर संतोष ज़ाहिर किया है। अन्य मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों ने अभी तक तो कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सेन्ट्रल सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के जफ़ऱयाब जिलानी ने कहा है कि वे सुप्रीम कोर्ट जाएंगे. हाईकोर्ट ने $खुद कहा है कि तीन महीने के भीतर इनमें से कोई भी पक्ष सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है। ऐसे में जिलानी कोई असहज बात नहीं कर रहे हैं। लेकिन सवाल अब यह है कि दोनों में से कोई भी पक्ष सर्वोच्च न्यायालय क्यों जाएगा ? अगर विवादित परिसर में एक हिस्सा मुस्लिम समुदाय को दे दिया गया है, तो क्या हिन्दू समुदाय आगे आकर इसे स्वीकार नहीं कर सकता? या फिर रामलला के जन्मस्थान को अगर न्यायालय ने स्वीकार कर लिया है तो क्या मुस्लिम समाज के प्रतिनिधि इस फै़सले को लागू करवाने के लिए आगे नहीं आ सकते? लेकिन ऐसा शायद ही हो, क्योंकि हिन्दुओं की राजनीति करनेवाले जिस धड़े को इसका लाभ नहीं मिला वे भी लड़ाई जारी रखने की बात करेंगे और वे भी जो मुस्लिम जमात की राजनीति का शौक रखते होंगे। अगर ये दोनों धड़े असफल हो गये तो मानिएगा कि फ़ैसला हो गया, नहीं तो देश को एक और लंबी कानूनी लड़ाई के लिए तैयार रहना होगा।


जननी सुरक्षा योजना के नाम पर लाखों रूपये बर्बाद

हृ अनूप सक्सेना
राजगढ़। जि़ले में स्वास्थ्य विभाग में बढ़ते भ्रष्टाचार के चलते जहां गर्भवती महिलाओं को जननी सुरक्षा योजना व जननी सुरक्षा एक्सप्रेस का लाभ स्वास्थ्य केन्द्रों तक पहुुंचने में नहीं मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर मंत्रालय के निर्देशों को नज़अंदाज़ कर जननी सुरक्षा एक्सप्रेस वाहनों में आवश्यक फेरबदल भी नहीं किये गये हैं और सोने पे सुहागा यह कि हर माह लाखों रूपयों का भुगतान $फजऱ्ी तौर पर इन जननी सुरक्षा एक्सप्रेस के मालिकों को प्रसूताओं को लाने ले जाने के नाम पर कर दिया जाता है। इस प्रकार की जा रही गंभीर वित्तीय अनिमितताओं को गोपनीय रख कर कार्यवाही से बचने के उद्देश्य से सूचना के अधिकार एवं वरिष्ठ अधिकारी के निर्देशों की भी खुली अवहेलना जि़ला चिकित्सालय में पदस्थ आर.सी.एच. एवं एन.आर.एच.एम. प्रभारी बृजमोहन दुबके द्वारा की जा रही है। जि़ले में अधिकांश वाहन (जननी एक्सप्रेस वाहन) अभी भी गैसकिट से चल रहे हैँ, जबकि शासन निर्देशानुसार ये वाहन डीज़ल से चलने चाहियें। अधिकांश वाहनों मे गर्भवती महिला की सुरक्षा व सुविधा की दृष्टि से पीछे की सीट लम्बी नहीं की गयी हैं। सुगमता हेतु सीटों की व्यवस्था नहीं है। फ़ोल्डिंग स्टेचर भी कई वाहनों में नहीं है। पीने के पानी व रोशनी की अतिरिक्त व्यवस्था कई वाहनों में नहीं है। कुछ वाहनों में डिसपोजि़बल दाईकिट भी नहीं मिले। अधिकांश वाहनों में लागबुकों का यात्रा का प्रमाणीकरण व यात्रा सत्यापन नहीं कराये गये। लागबुकों के सभी कालम भरकर नहीं रखे जा रहे हैं। अधिकांश जननी सुरक्षा एक्सप्रेस के वाहन चालकों के पास प्रसव योग्य महिलाओं की सूची जो नज़दीकी तिथि में होना थे, नहीं थी।
अधिकांश भुगतान पंजियों पर प्रमाणकरण एवं पृष्ठांकन नहीं करवाया गया है। कई स्थानों पर ब्लाक मेडिकल आ$िफसरों द्वारा भुगतान पंजी में महिलाओं को भुगतान किये जाने के आंकड़े उस माह के मासिक प्रतिवेदन में दिये आंकड़ों से मेल नहीं खाते। जि़ला चिकित्सालय में भर्ती गर्भवती महिलाएं द्रोपदी बाई पति रामलाल हरिजन, ग्राम हीरापुरा, रेशमबाई पति सुरेशमेर ग्राम चंदरपुरा शीलाबाई पति मुकेश हरिजन, ग्राम देहरीबामन, देव बाई, पति पंचूलाल हरिजन, ग्राम सरेड़ी मांगी बाई पति रमेश वर्मा, ग्राम जलासिला सभी अनुसूचित जाति की $गरीबी रेखा के नीचे निवास करने वाली महिलाओं ने जननी सुरक्षा एक्सपे्रस योजना की जानकारी न होने, लाभ न मिलने की बात कही। इन अति निर्धन ग्रामीण महिलाओं को शासन की इस अतिमहत्वपूर्ण योजना की जानकारी न होने से योजना के प्रभारी द्वारा योजना के क्रियान्वयन में गंभीर लापरवाही बरती जाने स्पष्ट होता है।
सूचना के अधिकार के तहत जननी सुरक्षा योजना, जननी सुरक्षा एक्सप्रेस की जानकारी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी श्री शर्मा से मांगे जाने पर उनके द्वारा आर.सी. एच. के प्रोजेक्ट आर्गेनाइज़र एवं जननी सुरक्षा योजना के प्रभारी बृजमोहन दुबके को शीघ्र जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिये थे। 19/8/2010 को पत्र क्रमांक 10121,10119 बृजमोहन दुबके को लिखकर तीन दिवस में चाही गयी जानकारी उपलब्ध कराने के विलंब के लिये जवाबदारी भुगताने के निर्देश मुख्य चिकित्सालय एवं स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा श्री दुबके द्वारा किये गये है। न ही अपने अधिकारी को उनके पत्र का जवाब दिया गया है और न ही मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई गई है।

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