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Saturday, May 29, 2010




मंगलौर हादसे की घिनौनी हरकत


संजय तिवारी
मंगलौर में हवाई दुर्घटना से सात दिन पहले 15 मई को नागरिक उड्डयमंत्री प्रफुल्ल पटेल उसी हवाई पट्टी का उद्घाटन करने गये, जिस पर उतरकर एयर इंडिया एक्सप्रेस का विमान 158 लोगों की कब्रगाह बन गया। इस मौके पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा, कानून मंत्री वीरप्पा मोइली और कांग्रेसी नेता आस्कर $फर्नांडीज़ भी मौजूद थे।
अपने उद्घाटन भाषण में प्रफुल्ल पटेल ने बहुत ही प्रफुल्लित होकर बताया था कि अभी हम तकनीकि रूप से इसे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा इसलिए नहीं कह सकते, क्योंकि उसके लिए 9000 $फीट का रनवे चाहिए, जो कि अभी नहीं है। मंगलौर का जो नया रनवे है वह 8000 $फीट का है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का दर्जा इसे नहीं दिया जा सकता। भले ही तकनीकि रूप से इसे अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का दर्जा न दिया जा सका हो, लेकिन व्यावहारिक रूप से यहां से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का संचालन शुरू किया जा चुका था। अब जबकि दुबई से आये आईएक्स 812 विमान हादसे में 158 लोग काल कलवित हो गये, तो वही प्रफुल्ल पटेल दोबारा दुर्घटनास्थल पर पहुंचते हैं और उन आरोपों का खण्डन कर देते हैं कि रनवे की लंबाई कम है। दुर्घटना के कारणों को जानने के लिए अब पटेल कह रहे हैं कि विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद ही दुर्घटना के कारणों का पता चल सकेगा।
लेकिन प्रफुल्ल पटेल भी जानते ही होंगे की दुर्घटना की असल वजह रनवे की लंबाई ही है। जो बोइंग 747-800 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ है उसको टेक-आ$फ और लैण्डिंग करने के लिए 8000 से 8300 (2,400-2,500 मी) $फीट का रनवे चाहिए। यानी पहली बड़ी चूक यह कि जिस विमान को न्यूनतम आठ हज़ार $फीट का रनवे चाहिए ही उसको उस रनवे पर उतारा जा रहा था, जिसकी कुल लंबाई ही 8000 $फीट थी। ऐसे किसी विमान को उतारने के लिए वह रनवे नाकाप$फी था क्योंकि अंतरराष्ट्रीय विमान परिचालन मानकों के अनुसार विमान को उतारने के लिए न्यूनतम जितनी जगह चाहिए उससे 300 मीटर आगे और 300 मीटर पीछे रनवे स्पेश चाहिए ताकि आपात स्थितियों में विमान को संभाला जा सके। लेकिन मंगलौर में रनवे की कुल लंबाई ही इतनी नहीं थी, कि बोइंग की नियमावली के अनुसार उस विमान को उस एयरोपोर्ट पर उतारा जा सके। फिर भी यह किया गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि 158 लोगों की जान चली गयी।
अब सवाल यह है कि जांच में दोषी किसे ठहराया जाएगा? एक लिहाज़ से देखें तो इस दुर्घटना के लिए न केवल नागरिक उड्डयन मंत्रालय जि़म्मेदार है, बल्कि उससे जुड़े हुए वे समस्त विभाग उत्तरदायी हैं, जो जांच की नौटंकी कर रहे हैं। मंगलौर को ज़बर्दस्ती बिना तैयारी के इंटरनेशनल एयरपोर्ट के रूप में इस्तेमाल करने की जो जल्दबाज़ी की गयी उसकी कीमत 158 लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है।
इस मसले पर तत्काल न सि$र्फ नागरिक उड्डयन मंत्री को इस्ती$फा देना चाहिए बल्कि एयरपोर्ट अथारिटी के मुखिया को भी ब$र्खास्त कर दिया जाना चाहिए। जांच उसके बाद शुरू होनी चाहिए। अभी तक जो पड़ताल सामने आ रही है, उससे सा$फ हो रहा है कि सुबह के वक्त विमान उतरते वक्त अपने निर्धारित लैण्डिंग स्पेस से 2000 $फीट आगे जाकर ज़मीन को छूता है। अब जिस विमान को रोकने के लिए 8300 $फीट लंबा रनवे चाहिए उसके 2000 $फीट की दूरी कम हो गयी। अब विमान को 6000 $फीट में ही रोकना था। पायलट ने इसी 6000 $फीट में विमान को रोकने के लिए ब्रेक लगाया। दबाव से विमान का टायर फट गया और विमान बेकाबू होकर रडार टावर से टकराया और एयरपोर्ट की चारदीवारी तोड़ते हुए खाईं में जा गिरा। खाई में गिरने के साथ ही विमान में एक ज़बर्दस्त विस्फोट हुआ। विमान दो हिस्सों में टूट गया। इसके बाद नब्बे मीटर के दायरे में बिखरे विमान के मलबों से सि$र्फ लाशें निकालने का काम बच गया। आधी लाशों की शिनाख्त हो पायी और आधी लाशें इतनी बुरी तरह जली हुई है, कि उनकी शिनाख़्त करना मुश्किल है। इसलिए उनके डीएनए परीक्षण से उनकी पहचान की जाएगी।
अब सवाल यह है कि क्या इस हादसे को महज़ एक दुर्घटना मानकर भूल जाना चाहिए और मृतकों के प्रति संवेदना प्रकट करके प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की तरह अपने दिल का बोझ हल्का कर लेना चाहिए, या फिर इस दुर्घटना के तह में जाने की ज़रूरत है? मंगलौर में जो हादसा हुआ है वह दो वजहों से भूल जाने लायक तो बिल्कुल नहीं है। इसमें सबसे बड़ी वजह है कि यह दुर्घटना सीधे तौर पर मानवीय चूक और सरकारी मनमानी का परिणाम है। और दूसरा, इस एयरपोर्ट का शुरू से विरोध हो रहा था, इसके $िखला$फ आंदोलन चल रहे थे और एक स्थानीय पर्यावरण संस्था ने हर मोर्चे पर इस एयरपोर्ट को खतरनाक बताया था, लेकिन न सि$र्फ सरकारी मशीनरी ने उस संस्था की बात नहीं सुनी, बल्कि उसके द्वारा की जनहित याचिकाओं पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने इसलिए सुनवाई नहीं की, क्योंकि उड्डयन विभाग से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं ने हाईकोर्ट के सामने $गलत जानकारियां प्रस्तुत करके जनहित याचिका को $खारिज करने पर मजबूर कर दिया था।
इस ग्रुप का मुख्य आरोप यही था कि माजपे में जो रनवे बनाया जा रहा है वह कहीं से भी सुरक्षित नहीं है। इसका मुख्य कारण कि यह इलाका तीन ओर से घाटियों से घिरा है, जिसमें घना जंगल है। इन्वायरमेन्ट सपोर्ट ग्रुप के संयोजक लियो ए$फ सल्दान्हा का त$र्क था कि अगर पुरानी हवाई पट्टी को ही अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार विस्तारित कर दिया जाए, तो नया रनवे बनाने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन भारत सरकार के एयरपोर्ट माडर्नाइज़ेशन प्रोग्राम के तहत मंगलौर एयरपोर्ट के लिए 150 करोड़ रूपये निर्धारित किये गये थे। इसके अलावा विभिन्न सड़कों और अन्य सुविधाओं को विकसित करने के लिए कर्नाटक सरकार 200 करोड़ रूपया खर्च करनेवाली थी। जब 350 करोड़ का व्यापार सामने दिख रहा हो, तो तकनीकि और अच्छे बुरे के बारे में सोचता कौन है। सल्दान्हा एयरपोर्ट अथारिटी के अधिकारियों से मिले, हाइकोर्ट में दो बार जनहित याचिका लगाई, लेकिन लगभग सात साल के विरोध के बावजूद 2004 में इस हवाई पट्टी का काम शुरू हुआ और मई 2006 में यह हवाई पट्टी बनकर तैयार हो गयी, जिसका औपचारिक उद्घाटन चार साल बाद प्रफुल्ल पटेल ने 15 मई को किया। सात साल सल्दान्हा ने जो विरोध किया वह कितना सही था इसका अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि इस हवाई पट्टी के अंतराष्ट्रीय परिचानल के लिए खुलने के सातवें दिन ही यह हादसा हो गया।
मंगलौर विमान हादसे के जांच के आदेश जारी हो चुके हैं। जांचकर्ताओं को ब्लैक बाक्स मिल गया है और वे यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि आ$िखर क्या कारण है कि विमान 2000 $फीट आगे खिसकर उतरा। लेकिन इस जांच पड़ताल से क्या यह साबित हो पायेगा कि रनवे बनाया ही इसलिए गया, क्योंकि इसके पीछे भ्रष्टाचारियों की एक बड़ी लॉबी काम कर रही थी। दुर्घटना के बाद जारी अपनी प्रेस विज्ञप्ति में सल्दान्हा कहते हैं-गहवाई पट्टी बनाने के लिए व्यावहारिक तो छोडि़ए सि$र्फ आधिकारिक खानापूर्ति के लिए एक $िफज़बिलिटी रिपोर्ट तैयार कर दी गयी थी। जो रिपोर्ट तैयार की गयी वह गाड़ी के आगे बैल जोतने जैसी थी। सा$फ था कि सि$र्फ खानापर्ति की गयी। उस वक्त जब सल्हान्हा ने एयरपोर्ट अथारिटी के अधिकारियों से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि नया रनवे पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ही बनाया जा रहा है। सल्दान्हा का कहना है कि न केवल बाजपे में किसी और स्थान पर यह हवाई पट्टी बनायी जा सकती थी, बल्कि मंगलौर और उडीपी के बीच पाडुबिदरी में प्रस्तावित हवाई पट्टी को सुरक्षित तरीके से बनाया जा सकता था। लेकिन उस वक्त न तो केन्द्रीय विभागों ने इस समूह की आपत्तियों पर ध्यान दिया, न ही कर्नाटक सरकार ने और हाईकोर्ट ने भी इन विभागों और मंत्रालयों की दलीलों को ही मान्य किया। उल्टे कर्नाटक सरकार और स्थानीय मंगलौर चैम्बर्स आ$फ कामर्स एण्ड इंडस्ट्री ने इसी रनवे के लिए ज़ोरदार लाबिंग की।
अब सवाल यह है कि क्या इस दुर्घटना के बाद भी इस रनवे का इस्तेमाल किया जाएगा, या फिर इसे हमेशा के लिए छोड़ दिया जाएगा? सल्दान्हा की आपत्तियों के मद्देनज़र तो यह रनवे विस्तारित कर दिये जाने के बाद भी विमानों के उडऩे उतरने के लिए सुरक्षित नहीं है। क्या जांच में उन तथ्यों को शामिल किया जाएगा जिसके चलते इस हादसे की पृष्ठभूमि तैयार की गयी। भारत में बढ़ते घरेलू और अंतरराष्ट्रीय विमानन उद्योग को देखते हुए भारत सरकार 4000 करोड़ रूपये की एक योजना पर काम कर रही है, जिसके तहत देश के कुछ प्रमुख हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। अगर यह आधुनिकीकरण मंगलौर की ही तजऱ् पर किया जा रहा है, तो भविष्य में कुछ और हादसों के लिए हमें तैयार रहना होगा।



आज़ादी से 60 साल बाद भी नहीं हो पाया सड़क का डामरीकरण
अशोक तिवारी मझौली (सीधी)। भारत को स्वतंत्र हुए लगभग 62 साल हो गये। लेकिन प्रदेश में शायद ही ऐसी कोई सड़क है, जिसमें मुख्य आवाजाही बाधित न बनी हो। लेकिन सीधी जि़ले की मझौली तहसील मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम मड़वास जोकि सीधी जि़ला मुख्यालय जाने के प्रमुख मार्गों में से एक है, सैंकड़ों ग्राम जुड़ते हंै, लेकिन आज तक इसका डामरीकरण नहीं हो सका। इससे जुडऩे वाले ग्राम देवई, कोगा, खदौरा, सिंगरौला, सिस्तैली, जोगी पढ़ाड़ी, चदोलडोल आदि गांव के लोग अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
15 साल से जनपद अध्यक्ष
मज़े की बात यह है कि मडवास से कांग्रेस के प्रमुख नेता के पास हमेशा मझौली जनपद की बागडोर रही। विशाखा जायसवाल, साबिर खान स्वयं राजा मडवास जो जि़ला मुख्यालय को जोडऩे का प्रमुख मार्ग है, उस रोड का डामरीकरण तक नहीं करवा सके।
ये नेता स्वयं उबड़ खाबड़ मार्ग पर चलते हैं, लेकिन पता नहीं इस रोड को क्यों नहीं बनवाना चाहते हैं। इसके पीछे इनकी मंशा समझ में नहीं आती।
विधायक ने भी नहीं दिया ध्यान
नव निर्वाचित धौहनी विधानसभा के विधायक कुंवर सिंह जिनरो स्वयं भी इसी मार्ग से आना जाना पड़ता है वे स्वयं गड्डों वाली रोड में चल रहे हैं, लेकिन उन्होंने इस रोड को बनवाने में इच्छा शक्ति नहीं दिखाई।
मुख्यमंत्री से की मांग
मझौली मड़वास के ग्रामवासियों ने प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री, लोक निर्माण मंत्री क्षेत्रीय सांसद से मझौली मड़वास रोड के डामरीकरण की मांग की है, जिससे कि मझौली मड़वास कुसमी ब्लाक के इस आदिवासी अंचल का विकास हो सके और वर्षों से उपेक्षित आदिवासी भी स्वर्मिण मध्यप्रदेश के सहयोगी बन सकें।

Monday, May 24, 2010


दिगिव्जय सिंह पीएम इन वेटिंग
लिमटी खरे
नई दिल्ली। सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस में आने वाले दो वर्षों में नेतृत्व परिवर्तन का रोडमेप तैयार होने लगा है। देश पर आधी सदी से ज्य़ादा शासन करने वाली कांग्रेस में इन दिनों भविष्य में सत्ता की मलाई खाने की गलाकाट स्पर्धा मची हुई है। कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग जहां अब सत्ता और शक्ति के शीर्ष केंद्र 10 जनपथ (श्रीमति सोनिया गांधी का सरकारी आवास) को 12 तु$गलक लेन (राहुल गांधी का सरकारी आवास) ले जाना चाह रहा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के कुछ प्रबंधक चाह रहे हैं, कि 2014 में होने वाले आम चुनावों में भी राहुल गांधी को बतौर प्रधानमंत्री न प्रोजेक्ट किया जाए। इस रोड मेप में 2012 को बहुत ही अहम माना जा रहा है। 10 जनपथ के सूत्रों का कहना है कि 2014 में संपन्न होने वाले आम चुनावों में वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह को पार्टी का नेतृत्व नहीं करने देने के मसले पर सोनिया गांधी ने अपनी मुहर लगा दी है। सोनिया के इस तरह के संकेत के साथ ही कांग्रेस के अंदर अब 2012 के सन् को महात्वपूर्ण माना जाने लगा है। 2012 में देश के महामहिम राष्ट्रपति का चुनाव होना है। कांग्रेस के प्रबंधकों का एक धड़ा इस प्रयास में लगा हुआ है कि वज़ीरे आज़म डॉ. मनमोहन सिंह को या तो राष्ट्रपति बना दिया जाए, या फिर उन्हें स्वास्थ्य कारणों से घर ही बिठा दिया जाए। कांग्रेस के प्रबंधकों ने सोनिया गांधी को यह मशविरा भी दे दिया है, कि अगर 2014 में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत लाने में कामयाब न हो सकी, तो राहुल गांधी को पार्टी का नेतृत्व नहीं करना चाहिए। इन परिस्थितियों में भगवान राम के स्थान पर जिस तरह भरत ने खड़ांउं रखकर राज किया था, उसी तरह खड़ांउं प्रधानमंत्री की दरकार होगी। 2012 में 7, रेसकोर्स रोड (भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री का सरकारी आवास) को आशियाना बनाने की इच्छाएं अब कांग्रेस के अनेक नेताओं के मन मस्तिष्क में कुलाचें भरने लगी हैं। इस दौड़ में प्रणव मुखर्जी, पलनिअप्पम चिदम्बरम, सुशील कुमार शिंदे के नाम सामने आ रहे हैं।
कांग्रेस की इंटरनल केमिस्ट्री को अच्छी तरह समझने वालों की नज़रें इन सारे नेताओं के बजाए इक्कीसवीं सदी में कांग्रेस के अघोषित चाणक्य राजा दिग्विजय सिंह पर आकर टिक गईं हैं। मध्य प्रदेश में दस साल तक निष्कंटक राज करने वाले राजा दिग्विजय सिंह ने संयुक्त मध्य प्रदेश में तत्कालीन क्षत्रप विद्याचरण शुक्ल, श्यामा चरण शुक्ल, अजीत जोगी, माधव राव सिंधिया, कुंवर अर्जुन सिंह और कमल नाथ जैसे धाकड़ और धुरंधर नेताओं को जिस कदर धूल चटाई थी, वह बात अभी लोगों की स्मृति से विस्मृत नहीं हुई है।
राजा दिग्विजय सिंह ने गांधी परिवार को वर्तमान में जिस तरह से भरोसे में लेकर नक्सलवाद के मसले पर वर्तमान गृह मंत्री पलनिअप्पम चिदम्बरम पर हमले किए हैं, उसे राजा की प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की सीढ़ी के तौर पर देखा जा रहा है। राजा के कदम ताल देखकर लगने लगा है कि वे राजपूत नेताओं को लामबंद करने के साथ ही साथ अपनी ठाकुर की छवि को उकेर कर उदारवादी नेताओं का समर्थन भी हासिल करने का जतन कर रहे हैं। चिदम्बरम पर एक ज़हर बुझा तीर दागकर हाल ही में राजा दिग्विजय सिंह ने कहा था कि पलनिअप्पम चिदम्बरम अगर प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं तो उन्हें और अधिक उदार बनने की दरकार होगी। वैसे कांग्रेस की नज़र में देश के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू तथा कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी को राह दिखाने के लिए एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ में लालटेन लेकर चलने वाले राजा दिग्विजय सिंह एक बात शायद भूल रहे हैं कि कांग्रेस की परंपरा कुछ उलट ही रही है। नेहरू गांधी परिवार की मंशा से इतर जब भी किसी कांग्रेसी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी को देखा है, उसे राजनैतिक बियावान में सन्यासी जीवन बिताने बलात ढकेल दिया जाता रहा है।
राजा दिग्विजय सिंह को इसके लिए कांग्रेस का बहुत पुराना नहीं बल्कि सत्तर के दशक के उपरांत का इतिहास ही पलटाना होगा। बाबू जगजीवन राम से बरास्ता हेमवती नंदन बहुगुणा, नारायणदत्त तिवारी और कुंवर अर्जुन सिंह के मन की बातें सामने आने और मंशा स्पष्ट होने के उपरांत, उनके साथ कांग्रेस ने किस कदर अछूत के मानिंद व्यवहार किया है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। कल तक कुंवर अर्जुन सिंह के दिखाए पथ पर चलने वाली कांग्रेस ने आज उन्हें दूध की मख्खी के मानिंद निकालकर बाहर फेंक दिया है।




देख तेरे प्रदेश की हालत क्या हो गयी चौहान, कदम-कदम पर नारी का यहां होता अपमान
अश्लील विज्ञापनों पर शिव का तीसरा नेत्र खुलना ज़रूरी
अनूप सक्सेना
राजगढ़। मध्यप्रदेश एक कृषि प्रधान प्रदेश है, यहां अधिकांश जनता गांवों में निवास करती है। यहां की जनता न केवल अशिक्षित है, अपितु निर्धन भी है। यही कारण है कि गांवों में अधिकांश रोगों का इलाज देवी-देवताओं के यहां झाड़ेफूंकों, ताबीज़ों, मंत्रों, टोने टोटके से कराने में विश्वास रखते हैं। दुख की बात यह है कि बढ़ते अंधविश्वास के चलते, मध्यम स्तर के शहरों में पढ़े लिखे तबके का भी कुछ प्रतिशत वर्ग भी इन पूर्वाग्रहों से जुड़ गया है, और इनका प्रतिशत वर्ग भी बढ़ रहा है। इसका $खामियज़ा जन साधारण को विशेष कर नारी को औषधि और चमत्कारी उपचारों के बढ़ते विज्ञापनों, इन्द्री वर्धक यंत्रों की अश्लील भाषा, को पढऩे देखने व शर्मिंदा होते रहने के रूप में चुकाना पढ़ रहा है। अपने अंधविश्वास के चलते रोगी इस प्रकार के अश्लील भ्रामक विज्ञापनों की आड़ लेकर रोगमुक्त होने के स्थान पर अधिक संकट में पड़ जाते हैं, या उनकी अकाल मृत्यु हो जाती है।
इस प्रकार की समास्याएं बढऩे के पीछे औषधि और चमत्कारिक उपचार (आक्षेपणीय विज्ञापन) अधिनियम 1954 का शन: शन: निष्प्रभावी होते जाना है। यह अधिनियम ऐसे $खतरनाक विज्ञापनों को नियंत्रित करने के लिये संवैधानिक प्रावधानों के तहत अस्तित्व में लाया गया था। इसमें शब्द चमत्कारिक उपचार के अंतरर्गत तिलिस्म मंत्र या अन्य किसी प्रकार का ताबिज़ जो चमत्कारिक शक्तियां रखने या मनुष्य के किसी रोग के निदान, रोग मुक्ति, शमन या निवारण के लिये अथवा मनुष्य के शरीर के किसी कार्बनिक कृत्य या संरचना पर किसी तरह से असार या प्रभाव डालने को अभिकथित हो, शामिल हैं।
उक्त अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत कतिपय औषधियों एवं चमत्कारिक उपचारों के विज्ञापनों को प्रतिसेछित किया गया है।
1. महिलाओं के गर्भपात संबंधी विज्ञापन।
2. महिलाओं के गर्भाधान संबंधी विज्ञापन।
3. सहवास सुख में अभिवृद्धि करने वाले विज्ञापन।
4. स्त्रियों के मासिक धर्म की अनियमितताओं को ठीक करने वाले विज्ञापन।
इसी प्रकार धारा 4 में औषधियों और चमत्कारिक उपचारों के बारे मे भ्रम पैदा करने वाले विज्ञापनों को भी प्रतिसेछित किया गया है। इसके अंतर्गत किसी भी औषधि के बारे में मिथ्या भ्रम पैदा करना, मिथ्या क्लेम करना शामिल हो गया है। धारा 5 में इसी प्रकार चमत्कारिक विज्ञपनों (उपचार संबंधी) को प्रतिबंधित किया गया है।
धारा 6 में ऐसे विज्ञापनों के आयात निर्यात को भी निषेधित किया गया है। अधिनियम की धारा 7 अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहा धारा दण्ड और शास्तियों को प्रावधानित करती है। इसके अतंर्गत प्रथम बार दोष सिद्धि पर 6 माह की अवधि के कारावास अथवा जुर्माने अथवा दोनों से दण्डित किये जाने का प्रावधान है। यदि कोई दोषी व्यक्ति ऐसे अपराध की पुनरावृत्ति करता है तो उसके लिये एक वर्ष तक की अवधि के लिये कारवास अथवा जुर्माने का अथवा दोनों से दण्डित किये जाने का प्रावधान है, तथा ऐसे अपराधों को संज्ञेय अपराध माना गया है। इस प्रकार यह अधिनियम औषधियों एवं चमत्कारिक उपचारों के आक्षेपणीय विज्ञपानों का निवारण करने वाली एक महत्वपूर्ण विधि है। नारी के सम्मान स्वाभिमान को सर्वोपरि महत्व प्रदान करते हुये प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को चाहिये कि इस औषधि एवं चमत्कारिक उपचार अधिनियम (आक्षेपणीय विज्ञापन) 1954 के तहत कुकरमुत्तों की तरह उग रहे लिंग वर्धक यंत्रों, सहवास सुख में वृद्धि करने वाले विज्ञापनों, नारी देह की मसाज करने तथा हज़ारों रूपयों की दैनिक कमाई का न्यौता देते विज्ञापनों को सख़्ती से बंद कराये, तथा इसके लिये जवाबदेह व्यक्तियों को अधिनियम के प्रावधानों के तहत दण्डित कराये।

Friday, May 14, 2010


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महाघोटाले का महाराजा

सुरेश चिपलूणकर
2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में दिल्ली के एक अ$खबार और एक पत्रिका में कवर स्टोरी बनने के बाद मीडिया ने लगभग पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। मीडिया इस भ्रष्टाचार पर जानबूझकर रिपोर्ट नहीं कर रहा है, लेकिन सुरेश चिपलूणकर इस मामले की खोजबीन कर रहे हैं। यहां प्रस्तुत है उनकी खोजबीन का पहला हिस्सा:-
इस टूजी महाघोटाले को समझने के लिए पहले तिथियों में इस घटनाक्रम को समझ लेते हैं।
16 मई 2007 को राजा बाबू को प्रधानमंत्री ने कैबिनेट में दूरसंचार मंत्रालय दिया।
(2009 में फिऱ से यह मंत्रालय हथियाने के लिये नीरा राडिया, राजा बाबू और करुणानिधि की पुत्री कनिमोझि के बीच जो बातचीत हुई उसकी फ़ोन टैप की गई थी, उस बातचीत का कुछ हिस्सा आगे पेश किया जायेगा)
- 28 अगस्त 2007 को (दूरसंचार नियामक प्राधिकरण) ने बाज़ार भाव पर विभिन्न स्पेक्ट्रमों के लाइसेंस जारी करने हेतु दिशानिर्देश जारी किये, ताकि निविदा ठेका लेने वाली कम्पनियाँ बढ़चढ़कर भाव लगायें और सरकार को अच्छा खासा राजस्व मिल सके।
- 28 अगस्त 2007 को ही राजा बाबू ने ट्राई की सिफ़ारिशों को ख़ारिज कर दिया, और कह दिया कि लाइसेंस की प्रक्रिया जून 2001 की नीति (पहले आओ, पहले पाओ) के अनुसार तय की जायेंगी (ध्यान देने योग्य बात यह है कि 2001 में भारत में मोबाइलधारक सिफऱ् 40 लाख थे, जबकि 2007 में थे पैंतीस करोड़। (यानी राजा बाबू केन्द्र सरकार को चूना लगाने के लिये, कम मोबाइल संख्या वाली शर्तों पर काम करवाना चाहते थे।)
- 20-25 सितम्बर 2007 को राजा ने यूनिटेक, लूप, डाटाकॉम तथा स्वान नामक कम्पनियों को लाइसेंस आवेदन देने को कह दिया (इन चारों कम्पनियों में नीरा राडिया तथा राजा बाबू की फर्ज़ी कम्पनियाँ भी जुड़ी हैं), जबकि यूनिटेक तथा स्वान कम्पनियों को मोबाइल सेवा सम्बन्धी कोई भी अनुभव नहीं था, फिर भी इन्हें इतना बड़ा ठेका देने की योजना बना ली गई।
- दिसम्बर 2007 में दूरसंचार मंत्रालय के दो वरिष्ठ अधिकारी (जो इस डाट की नीति को बदलने का विरोध कर रहे थे, उसमें से एक ने इस्तीफ़ा दे दिया व दूसरा रिटायर हो गया), इसी प्रकार राजा द्वारा गस्वानग कम्पनी का पक्ष लेने वाले दो अधिकारियों का ट्रांसफऱ कर दिया गया। इसके बाद राजा बाबू और नीरा राडिया का रास्ता साफ़ हो गया।
- 1-10 जनवरी 2008: राजा बाबू पहले पर्यावरण मंत्रालय में थे, वहाँ से वे अपने विश्वासपात्र सचिव सिद्धार्थ बेहुरा को दूरसंचार मंत्रालय में ले आये, फिऱ कानून मंत्रालय को ठेंगा दिखाते हुए डाट ऊपर बताई गई चारों कम्पनियों को दस दिन के भीतर नौ लाइसेंस बाँट दिये। 22 अप्रैल 2008 को ही राजा बाबू के विश्वासपात्र सेक्रेटरी सिद्धार्थ बेहुरा ने लाइसेंस नियमों में संशोध करके एक्यूजीशन (अधिग्रहण) की जगह मर्जर (विलय) शब्द करवा दिया, ताकि यूनिटेक अथवा अन्य सभी कम्पनियाँ तीन साल तक कोई शेयर नहीं बेच सकेंगी वाली शर्त अपने-आप, कानूनी रूप से हट गई।
- 13 सितम्बर 2008 को राजा बाबू ने बीएसएनएल मैनेजमेंट बोर्ड को लतियाते हुए उसे गस्वानग कम्पनी के साथ गइंट्रा-सर्कल रोमिंग एग्रीमेण्टग करने को मजबूर कर दिया। (जब मंत्री जी कह रहे हों, तब बीएसएनएल बोर्ड की क्या औकात है?) - सितम्बर अक्टूबर 2008 : गऊपरग से हरी झण्डी मिलते ही, इन कम्पनियों ने कौड़ी के दामों में मिले हुए 2प्रतिशत स्पेक्ट्रम के लाइसेंस और अपने हिस्से के शेयर ताबड़तोड़ बेचना शुरु कर दिये- जैसे कि स्वान टेलीकॉम ने अपने 45प्रतिशत शेयर संयुक्त अरब अमीरात की कम्पनी इटीसलात को 4200 करोड़ में बेच दिये (जबकि स्वान को ये मिले थे 1537 करोड़ में) अर्थात जनवरी से सितम्बर सिफऱ् नौ माह में 2500 करोड़ का मुनाफ़ा, वह भी बगैऱ कोई काम-धाम किये हुए। अमीरात की कम्पनी इटीसलात ने यह भारी-भरकम निवेश मॉरीशस के बैंकों के माध्यम से किया (गौर करें कि मॉरीशस एक गटैक्स-स्वर्गग देश है और ललित मोदी ने भी अपने काले धंधे ऐसे ही देशों के अकाउंट में किये हैं और दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था ही भारत जैसे भ्रष्ट देशों से आये हुए काले पैसे पर चलती है) - यूनिटेक वायरलेस ने अपने 60प्रतिशत शेयर नॉर्वे की कम्पनी टेलनॉर को 6200 करोड़ में बेचे, जबकि यूनिटेक को यह मिले थे सिफऱ् 1661 करोड़ में। - टाटा टेलीसर्विसेज़ ने अपने 26त्न शेयर जापान की डोकोमो कम्पनी को 13230 करोड़ में बेच डाले। अर्थात राजा बाबू और नीरा राडिया की मिलीभगत से लाइसेंस हथियाने वाली लगभग सभी कम्पनियों ने अपने शेयरों के हिस्से 70,022 करोड़ में बेच दिये, जबकि इन्होंने सरकार के पास 10,772 करोड़ ही जमा करवाये थे। यानी कि राजा बाबू ने केन्द्र सरकार को लगभग 60,000 करोड़ का नुकसान करवा दिया (अब इसमें से राजा बाबू और नीरा को कितना हिस्सा मिला होगा, यह कोई बेवकूफ़ भी बता सकता है, तथा सरकार को जो 60,000 करोड़ का नुकसान हुआ, उससे कितने स्कूल-अस्पताल खोले जा सकते थे, यह भी बता सकता है)। - 15 नवम्बर 2008 को केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने राजा बाबू को नोटिस थमाया, सतर्कता आयोग ने इस महाघोटाले की पूरी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप दी और लोकतन्त्र की परम्परानुसार(?) राजा पर मुकदमा चलाने की अनुमति माँगी। - 21 अक्टूबर 2009 को (यानी लगभग एक साल बाद) सीबीआई ने इस घोटाले की पहली स्नढ्ढक्र लिखी। - 29 नवम्बर 2008, 31 अक्टूबर 2009, 8 मार्च 2010 तथा 13 मार्च 2010 को डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी ने प्रधानमंत्री को कैबिनेट से राजा को हटाने के लिये पत्र लिखे, लेकिन गभलेमानुषग(?) के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। - 19 मार्च 2010 को केन्द्र सरकार ने अपने पत्र में डॉ स्वामी को जवाब दिया कि राजा पर मुकदमा चलाने अथवा कैबिनेट से हटाने के सम्बन्ध में जल्दबाजी में कोई फ़ैसला नहीं लिया जायेगा, क्योंकि अभी जाँच चल रही है तथा सबूत एकत्रित किये जा रहे हैं। - 12 अप्रैल 2010 को डॉ स्वामी ने दिगी हाइकोर्ट में याचिका प्रस्तुत की। - 28 अप्रैल 2010 को राजा बाबू तथा नीरा राडिया के काले कारनामों से सनी फ़ोन टेप का पूरा चिठ्ठा (बड़े अफ़सरों और उद्योगपतियों के नाम वाला कुछ हिस्सा बचाकर) अखबार द पायनियर ने छाप दिया। अब विपक्ष माँग कर रहा है कि राजा को हटाओ, लेकिन कब्र में पैर लटकाये बैठे करुणानिधि, इस हालत में भी दिगी आये और सोनिया-मनमोहन को गधमकाग कर गये हैं कि राजा को हटाया तो ठीक नहीं होगाज्। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, राजा-करुणानिधि-कणिमोझी-नीरा राडिया जैसों को भारी-भरकम गकमीशनग और सेवा-शुल्क दिया गया, यह कमीशन स्विस बैंकों, मलेशिया, मॉरीशस, मकाऊ, आइसलैण्ड आदि टैक्स हेवन देशों की बैंकों के अलावा दूसरे तरीके से भी दिया जाता है आईये देखें कि नेताओं-अफ़सरों की ब्लैक मनी को व्हाइट कैसे बनाया जाता है - 17 सितम्बर 2008 को चेन्नई में एक कम्पनी खड़ी की जाती है, जिसका नाम है जेनेक्स एक्जि़म, जिसके डायरेक्टर होते हैं मोहम्मद हसन और अहमद शाकिर। इस नई-नवेली कम्पनी को गस्वानग की तरफ़ से दिसम्बर 2008 में अचानक 9.9 प्रतिशत (380 करोड़) के शेयर दे दिये जाते हैं, यानी दो कौड़ी की कम्पनी अचानक करोड़ों की मालिक बन जाती है, ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि स्वान कम्पनी के एक डायरेक्टर अहमद सैयद सलाहुद्दीन भी जेनेक्स के बोर्ड मेम्बर हैं, और सभी के सभी तमिलनाडु के लोग हैं। सलाहुद्दीन साहब भी दुबई के एक एनआरआई बिजनेसमैन हैं जो गस्टार समूह (स्टार हेल्थ इंश्योरेंस आदि) की कम्पनियाँ चलाते हैं। यह समूह कंस्ट्रक्शन बिजनेस में भी है, और जब राजा बाबू पर्यावरण मंत्री थे तब इस कम्पनी को तमिलनाडु में जमकर ठेके मिले थे। करुणानिधि और सलाहुद्दीन के चार दशक पुराने रिश्ते हैं और इसी की बदौलत स्टार हेल्थ इंश्योरेंस कम्पनी को तमिलनाडु के सरकारी कर्मचारियों के समूह बीमे का काम भी मिला हुआ है, और स्वान कम्पनी को जेनेक्स नामक गुमनाम कम्पनी से अचानक इतनी मोहब्बत हो गई कि उसने 380 करोड़ के शेयर उसके नाम कर दिये। अब ये तो कोई अंधा भी बता सकता है कि जेनेक्स कम्पनी असल में किसकी है। 29 मई 2009 को जब राजा बाबू को दोबारा मंत्री पद की शपथ लिये 2 दिन भी नहीं हुए थे, दिगी हाईकोर्ट के जस्टिस मुकुल मुदगल और वाल्मीकि मेहता ने एक जनहित याचिका की सुनवाई में कहा कि, 2 जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस का आवंटन की पहले आओ पहले पाओग की नीति अजीब है, मानो ये कोई सिनेमा टिकिट बिक्री हो रही है? जनता के पैसे के दुरुपयोग और अमूल्य सार्वजनिक सम्पत्ति के दुरुपयोग का यह अनूठा मामला है, हम बेहद व्यथित हैं, लेकिन हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बावजूद गभलेमानुषग ने राजा को मंत्रिमण्डल से नहीं हटाया। इसी तरह 1 जुलाई 2009 को जस्टिस जीएस सिस्तानी ने डाट द्वारा लाइसेंस लेने की तिथि को खामख्वाह जल्दी बन्द कर दिये जाने की भी आलोचना की। यह जनहित याचिका दायर की थी, स्वान की प्रतिद्वंद्वी कम्पनी एस टेल ने। अब इस एस टेल को चुप करने और इसकी बाँह मरोडऩे के लिये 5 मार्च 2010 को दूरसंचार विभाग ने गृह मंत्रालय का हवाला देते हुए कहा कि एस टेल कम्पनी के कामकाज के तरीके से सुरक्षा चिताएं हैं। इसलिये एस टेल तीन राज्यों में अपनी मोबाइल सेवा बन्द कर दे, न तो कोई नोटिस, न ही कारण बताओ सूचना पत्र। इस कदम से हतप्रभ एस टेल कम्पनी ने कोर्ट में कह दिया कि उसे दूरसंचार विभाग की गपहले आओ पहले पाओग नीति पर कोई ऐतराज नहीं है, बाद में पता चला कि गृह मंत्रालय नएस टेल के विरुद्ध सुरक्षा सम्बन्धी ऐसे कोई गाइडलाइन जारी किये ही नहीं थे, लेकिन एस टेल कम्पनी को भी तो धंधा करना है, पानी (मोबाइल सेवा) में रहकर मगरमच्छ (ए राजा) से बैर कौन मोल ले?

Saturday, May 8, 2010


सतह पर उभरा सत्ता संघर्ष
कांग्रेस के शिखर पर सत्ता संघर्ष चरम पर है। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने माओवाद के $िखला$फ छेड़े गये संघर्ष पर अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और गृहमंत्री पी चिदम्बरम के $िखला$फ बयानबाज़ी करके उस सत्ता संघर्ष को सतह पर ला दिया है। दिग्विजय सिंह ने चिदम्बरम के $िखला$फ आदिवासी सरोकारों के बरअक्स ही बयान दिया हो, ऐसा नहीं है। उनके बयान के पीछे कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की मंशा सा$फ दिखाई दे रही है।
रामबहादुर राय
दंतेवाड़ा में 76 जवानों की निर्मम हत्या करने के बाद भी माओवादी संघर्ष को जायज ठहराने के लिए दिग्विजय सिंह ने जो कोशिश की है उसके पीछे की राजनीति बहुत साफ तो बिल्कुल नहीं है। मध्य प्रदेश से दिल्ली आने के बाद दिग्विजय सिंह 10 साल का सत्ता वनवास भोग रहे हैं। वे घोषित तौर पर सि$र्फ पार्टी का काम कर रहे हैं और उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी को स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं। राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू बन जाने के बाद उनका एजेण्डा बहुत साफ है। एक ओर जहां वे राहुल का मानवीय और सत्ता निर्मोही की छवि उभारना चाहते हैं वहीं दूसरी ओर उनके गुट की कोशिश राहुल गांधी को सत्ता के शीर्ष पर स्थापित करने की भी है। अपने पिता की तर्ज पर राहुल गांधी ने राजनीति में कदम रखते ही अपनी एक मंडली का गठन कर लिया है। यह मंडली उनकी सलाहकार भी है और मार्गदर्शक भी. इसी मंडली के लोग चाहते हैं कि वर्तमान यूपीए सरकार में ही राहुल गांधी सत्ता के शीर्ष पर विराजमान हो जाएं।
दूसरी बार यूपीए के सत्ता में आने के बाद जिस तरह से सरकार अंदर से डांवाडोल है उससे कांग्रेस के दिग्गजों को भी शुरू में ही यह डर सताने लगा है कि अगली बार आना शायद अब संभव नहीं है। अभी तक की रणनीति यह थी कि राहुल गांधी संभवत: 2014 में बतौर प्रधानमंत्री प्रस्तुत किये जाते लेकिन जिस तरह से विभिन्न मुद्दों पर केन्द्रीय सरकार जनता की नजरों में नकारा साबित हो रही है उससे यह डर अस्वाभाविक भी नहीं है। ऐसे में राहुल गांधी की मंडली के निशाने पर सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी है। लेकिन इसमें एक बड़ी दिक्कत है। दिक्कत यह है कि हमारे प्रधानमंत्री को अमेरिका का प्रश्रय प्राप्त है। मनमोहन सिंह पर सीधे हमला बोलना राहुल गांधी की मंडली के लिए संभव नहीं है। इसमें कई दिक्कते हैं। मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की पसंद है इससे बड़ा सत्य यह है कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री की कुर्सी का जितना सम्मान करती हैं उससे अधिक वे उस कुर्सी से डरती भी हैं। नारायणदत्त तिवारी और अर्जुन सिंह इसके गवाह हैं कि कैसे वादा करके भी सोनिया गाँधी उनकी रैली में नहीं आयी थी क्योंकि उस वक्त के प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहराव ने उन्हें वहां जाने से मना कर दिया था। इसके बाद भी सोनिया गांधी प्रधानमंत्री की कुर्सी के खिलाफ कुछ भी करने या बोलने से बचती रही हैं। इसलिए वे इस विचार को सीधे तौर पर समर्थन नहीं दे रही हैं कि बीच रास्ते से मनमोहन सिंह को दूर बैठा दिया जाए और सत्ता राहुल गांधी के नेतृत्व में चले। लेकिन सोनिया के इस सम्मानजनक डर के अलावा एक बड़ा कारण अमेरिका का भारतीय प्रशासन में हस्तक्षेप है। भारत में जो नक्सल विरोधी अभियान है वह पर्दे के सामने दिखने वाला प्रहसन है। पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि अमेरिका के दबाव में भारत सरकार ने एक डिपार्टमेन्ट की स्थापना की है जिसका नाम है परफार्मेन्स मैनेजमेन्ट डिपार्टमेन्ट। यह डिपार्टमेन्ट अमेरिका के इशारे पर बनाया गया है और इसके मुखिया एक अमेरिका भक्त सज्जन प्रजापति त्रिवेदी बनाये गये हैं। प्रजापति त्रिवेदी हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे हैं और विश्व बैंक के सलाहकार भी रह चुके हैं। जिस डिपार्टमेन्ट को चुपचाप स्थापित किया गया है उसका काम भी बड़ा अनोखा है। वह भारतीय नौकरशाही के कामकाज की समीक्षा करेगी और उनके कार्यस्तर को सुधारेगी। उन्हें बताएगी कि विदेशी निवेश इत्यादि मसलों पर किस प्रकार से निर्णय लिया जाता है। जाहिर है, अमेरिका भारत में अमेरिकी कंपनियों के हित सुरक्षित करने के लिए भारतीय नौकरशाही को नये सिरे से अपने घेरे में ले रहा है। और इस काम के लिए उसे मनमोहन सिंह का पूरा समर्थन प्राप्त है। ऐसे में अगर राहुल गांधी और उनकी कांग्रेसी मंडली मनमोहन सिंह को सीधे हटाने की कोशिश भी करे तो कामयाब नहीं हो सकती. अव्वल तो माता सोनिया का समर्थन ही नहीं मिलेगा और फिर अमेरिका मनमोहन सिंह के खिलाफ किसी ऐसी कार्रवाई को सिरे नहीं चढऩे देगा जो उन्हें अस्थिर करता हो। ऐसे में सिर्फ चिदम्बरम ही बचते हैं जिसे राहुल गांधी की मंडली निशाना बनाकर सरकार को इस अमेरिकी गुप्त साम्राज्यवाद से बचाने की कोशिश कर सकती है और अपने लिए सत्ता का रास्ता साफ कर सकती है। अमेरिकी कंपनियों का पैसा सबसे अधिक जिन क्षेत्रों में लग रहा है उसमें माइनिंग और मिनरल्स की खोज भी शामिल है। फिर आधारभूत ढांचे के विकास के लिए भी आदिवासी और ग्रामीण इलाकों का इस्तेमाल करना अनिवार्य है। ऐसे में चिदम्बरम के इस अभियान को परोक्ष रूप से कंपनियों का पूरा समर्थन प्राप्त है। अगर उनके इस अभियान को कमजोर कर दिया जाता है तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कमजोर होते हैं। भले ही चिदम्बरम को राष्ट्रवादी और वामपंथी दलों का समर्थन मिल रहा हो लेकिन खुद कांग्रेस में राहुल गांधी के समर्थक उनके ऊपर हमला बोलकर एक तीर से दो निशाने साध रहे हैं। कांग्रेस की इस कोटरी को कांग्रेस विश्वस्त व्यवसायी मुकेश अंबानी का भी समर्थन प्राप्त है। मुकेश अंबानी जानते हैं कि सरकार में चिदम्बरम अकेले ऐसी बड़ी शख्सियत हैं जो छोटे भाई अनिल अंबानी को संरक्षण देते हैं। अगर चिदम्बरम कमजोर होते हैं तो मुकेश अंबानी अपने आप मजबूत हो जाते हैं अनिल अंबानी को मिल रहा समर्थन समाप्त हो जाता है। इसलिए भले ही दंतेवाड़ा की घटना के बाद अन्य दल चिदम्बरम का समर्थन कर रहे हों लेकिन खुद कांग्रेस में कुछ लोग उन्हें अपदस्थ करने के लिए पूरी तरह से सक्रिय हो गये हैं। ये वही लोग हैं जो चिदम्बरम के बहाने मनमोहन सिंह को अपना निशाना बना रहे हैं। भले ही एक बार इस्तीफा देकर चिदम्बरम ने विरोधियों के हथियार को भोथरा कर दिया हो लेकिन कांग्रेस के चरम पर चल रहा सत्ता संघर्ष फिलहाल रुकने वाला नहीं है। दिग्विजय सिंह का ताजा बयान इसी का संकेत है।


आसान नहीं कसाब को फांसी पर लटकाना
मुंबई में 26 नवंबर 2008में हुए आतंकवादी हमले के लिए पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब को गुरुवार 6 मई को फांसी की सज़ा सुनाई गई। कसाब अगर हाई कोर्ट में अपील नहीं भी करता है, तो भी उसकी सज़ा की पुष्टि बॉम्बे हाई कोर्ट से करानी होगी। वैसे, कसाब से पहले ही फांसी देने के लिए तो देश की कई जेलों में बंद 308 अपराधी पहले से ही मृत्युदंड का इंतज़ार कर रहे हैं। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कम से कम 256 मामले ऐसे हैं जिनको निचली अदालतों के $फैसले के समर्थन का इंतज़ार है। वहीं दूसरी तर$फ कुल 52 लोगों ने राष्ट्रपति के समक्ष मौत की सज़ा के $िखला$फ क्षमा याचना की अपील की है। यदि कसाब हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने का $फैसला करता है और सज़ा फांसी की ही रहने की सूरत में राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल करता है तो वह उस कतार में खड़ा हो सकता है, जिसमें संसद पर हमले का आरोपी अ$फज़ल गुरु खड़ा है और जिसका नंबर 27 वां है।
कसाब से पहले मोहम्मद अ$फज़ल गुरु को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी। अ$फज़ल गुरु को संसद पर हुए आतंकवादी हमले में मौत की सज़ा सुनाई गई थी। मौत की सज़ा के $िखला$फ अ$फज़ल गुरु ने राष्ट्रपति के सामने क्षमा याचना की है।
अंडरवल्र्ड डॉन टाइगर मेनन के भाई याकूब मेनन को मौत की सज़ा सुनाई गई थी। वर्ष 2006 में मुंबई की आतंकवाद निरोधी विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सज़ा को सुप्रीम कोर्ट के $फैसले का इंतज़ार है।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने एक सवाल के जवाब में दिसंबर 2009 में लोकसभा में बताया, 31 दिसंबर 2007 तक देश के विभिन्न जेलों में बंद 308 कैदी मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे हैं। इनमें से 52 लोगों ने राष्ट्रपति के समक्ष मृत्युदंड के $िखला$फ क्षमा याचना की अपील की है।


हर दिन उजागर हो रही हंै नरेगा में अनियमितताएं
अनूप सक्सेना राजगढ़। देश में स्वर्ण जयंती स्वरोज़गार योजना की विफलता की बात स्वयं वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा स्वीकार करने के बाद जल्द ही महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना भी इस असफलता की श्रेणी में शुमार हो सकती है। कारण, हज़ारों करोड़ रूपयों का ब$गैर नियोजन के इधर से उधर पहुंचना और निरीक्षण के लिये खड़े किये गये अधिकारियों का नोटों की चकाचौंध में अपने कर्तव्यों से भटक जाना है।
राजगढ़ जि़ले में पूर्व कलेक्टर शिवानंद दुबे के समय मनरेगा के कार्यों में अनियमितताओं को जैसे पंख लग गये। कार्यों के कराने के लिये उत्तरदायी उपयंत्री सहायक यंत्री आदि ने ग्रामों के सरपंचों व सचिवों को भी भ्रष्टाचार के जोड़ बाकी गुणा भाग इस तरह से समझाये कि तीन वर्षों में कई सरपंच सचिव आलीशान भवनों गाडिय़ों व सैंकड़ों बीघा ज़मीनों के मालिक बन गये। आधे अधूरे गुणवत्ताहीन निर्माण कार्यों को पूर्ण दर्शाकर सत्यापन करवा कर पूर्णता प्रमाण पत्र जारी करवाना उपयोगिता प्रमाण पत्र जारी करवाना निर्माण ऐजेंसियों का प्रिय कार्य बन गया है।
ऐसा ही एक प्रकरण जीरापुर जनपद पंचायत क्षेत्र की ग्राम पंचायत खेड़ी में देखने में आया। हां ग्राम के मुख्य पहुंच मार्ग को नाले से सुरक्षित रख कर मार्ग को पानी के कटाव से बचाने के लिये मनरेगा के अंतर्गत 5.00 लाख की लागत से बाड़ नियंत्रण दीवार का निर्माण मई 2009 में कराया इस दीवार के मूल्यांकनकर्ता अधिकारी उपयंत्री एल.के.झरवडे तथा सत्यापनकर्ता अधिकारी सहायक यंत्री अरविंद श्रीवास्तव थे। मार्ग को नाले से बचाने के लिये बनी यह दीवार इतने हल्के स्तर की बनायी गयी कि गत वर्ष बारिश का पहला हमला भी नहीं झेल सकी, और आधी से अधिक दीवार नष्ट हो गयी। गिर गयी दीवार के पत्थरों को ग्रामीण उठा ले गये। हाल ही में नये कलेक्टर श्री लोकेश जाटव की पदस्थापना के बाद तथा युवा आई.ए.एस. श्री जाटव की भ्रष्टाचार को सख्ती से कुचल देने की गर्जना के बाद जीरापुर के इस बाड़ नियंत्रण दीवार के निर्माण में की गयी गंभीर अनियमितता के मामले में समूचा प्रशासन गंभीर नज़र आने लगा है, और जनपद पंचायत जीरापुर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से पांच दिवस में जांच प्रतिवेदन जि़ला पंचायत के सी.ई.ओ. श्री रणदा द्वारा मांगा गया है। देखना है कि भ्रष्टाचार के इस प्रमाणित मामले में नये कलेक्टर के पदस्थ होने के बाद किस तरह की कार्यवाही दोषी अधिकारियों पर कब तक होती है।

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