
मंगलौर हादसे की घिनौनी हरकत
संजय तिवारी
मंगलौर में हवाई दुर्घटना से सात दिन पहले 15 मई को नागरिक उड्डयमंत्री प्रफुल्ल पटेल उसी हवाई पट्टी का उद्घाटन करने गये, जिस पर उतरकर एयर इंडिया एक्सप्रेस का विमान 158 लोगों की कब्रगाह बन गया। इस मौके पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा, कानून मंत्री वीरप्पा मोइली और कांग्रेसी नेता आस्कर $फर्नांडीज़ भी मौजूद थे।
अपने उद्घाटन भाषण में प्रफुल्ल पटेल ने बहुत ही प्रफुल्लित होकर बताया था कि अभी हम तकनीकि रूप से इसे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा इसलिए नहीं कह सकते, क्योंकि उसके लिए 9000 $फीट का रनवे चाहिए, जो कि अभी नहीं है। मंगलौर का जो नया रनवे है वह 8000 $फीट का है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का दर्जा इसे नहीं दिया जा सकता। भले ही तकनीकि रूप से इसे अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का दर्जा न दिया जा सका हो, लेकिन व्यावहारिक रूप से यहां से अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का संचालन शुरू किया जा चुका था। अब जबकि दुबई से आये आईएक्स 812 विमान हादसे में 158 लोग काल कलवित हो गये, तो वही प्रफुल्ल पटेल दोबारा दुर्घटनास्थल पर पहुंचते हैं और उन आरोपों का खण्डन कर देते हैं कि रनवे की लंबाई कम है। दुर्घटना के कारणों को जानने के लिए अब पटेल कह रहे हैं कि विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद ही दुर्घटना के कारणों का पता चल सकेगा।
लेकिन प्रफुल्ल पटेल भी जानते ही होंगे की दुर्घटना की असल वजह रनवे की लंबाई ही है। जो बोइंग 747-800 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ है उसको टेक-आ$फ और लैण्डिंग करने के लिए 8000 से 8300 (2,400-2,500 मी) $फीट का रनवे चाहिए। यानी पहली बड़ी चूक यह कि जिस विमान को न्यूनतम आठ हज़ार $फीट का रनवे चाहिए ही उसको उस रनवे पर उतारा जा रहा था, जिसकी कुल लंबाई ही 8000 $फीट थी। ऐसे किसी विमान को उतारने के लिए वह रनवे नाकाप$फी था क्योंकि अंतरराष्ट्रीय विमान परिचालन मानकों के अनुसार विमान को उतारने के लिए न्यूनतम जितनी जगह चाहिए उससे 300 मीटर आगे और 300 मीटर पीछे रनवे स्पेश चाहिए ताकि आपात स्थितियों में विमान को संभाला जा सके। लेकिन मंगलौर में रनवे की कुल लंबाई ही इतनी नहीं थी, कि बोइंग की नियमावली के अनुसार उस विमान को उस एयरोपोर्ट पर उतारा जा सके। फिर भी यह किया गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि 158 लोगों की जान चली गयी।
अब सवाल यह है कि जांच में दोषी किसे ठहराया जाएगा? एक लिहाज़ से देखें तो इस दुर्घटना के लिए न केवल नागरिक उड्डयन मंत्रालय जि़म्मेदार है, बल्कि उससे जुड़े हुए वे समस्त विभाग उत्तरदायी हैं, जो जांच की नौटंकी कर रहे हैं। मंगलौर को ज़बर्दस्ती बिना तैयारी के इंटरनेशनल एयरपोर्ट के रूप में इस्तेमाल करने की जो जल्दबाज़ी की गयी उसकी कीमत 158 लोगों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी है।
इस मसले पर तत्काल न सि$र्फ नागरिक उड्डयन मंत्री को इस्ती$फा देना चाहिए बल्कि एयरपोर्ट अथारिटी के मुखिया को भी ब$र्खास्त कर दिया जाना चाहिए। जांच उसके बाद शुरू होनी चाहिए। अभी तक जो पड़ताल सामने आ रही है, उससे सा$फ हो रहा है कि सुबह के वक्त विमान उतरते वक्त अपने निर्धारित लैण्डिंग स्पेस से 2000 $फीट आगे जाकर ज़मीन को छूता है। अब जिस विमान को रोकने के लिए 8300 $फीट लंबा रनवे चाहिए उसके 2000 $फीट की दूरी कम हो गयी। अब विमान को 6000 $फीट में ही रोकना था। पायलट ने इसी 6000 $फीट में विमान को रोकने के लिए ब्रेक लगाया। दबाव से विमान का टायर फट गया और विमान बेकाबू होकर रडार टावर से टकराया और एयरपोर्ट की चारदीवारी तोड़ते हुए खाईं में जा गिरा। खाई में गिरने के साथ ही विमान में एक ज़बर्दस्त विस्फोट हुआ। विमान दो हिस्सों में टूट गया। इसके बाद नब्बे मीटर के दायरे में बिखरे विमान के मलबों से सि$र्फ लाशें निकालने का काम बच गया। आधी लाशों की शिनाख्त हो पायी और आधी लाशें इतनी बुरी तरह जली हुई है, कि उनकी शिनाख़्त करना मुश्किल है। इसलिए उनके डीएनए परीक्षण से उनकी पहचान की जाएगी।
अब सवाल यह है कि क्या इस हादसे को महज़ एक दुर्घटना मानकर भूल जाना चाहिए और मृतकों के प्रति संवेदना प्रकट करके प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की तरह अपने दिल का बोझ हल्का कर लेना चाहिए, या फिर इस दुर्घटना के तह में जाने की ज़रूरत है? मंगलौर में जो हादसा हुआ है वह दो वजहों से भूल जाने लायक तो बिल्कुल नहीं है। इसमें सबसे बड़ी वजह है कि यह दुर्घटना सीधे तौर पर मानवीय चूक और सरकारी मनमानी का परिणाम है। और दूसरा, इस एयरपोर्ट का शुरू से विरोध हो रहा था, इसके $िखला$फ आंदोलन चल रहे थे और एक स्थानीय पर्यावरण संस्था ने हर मोर्चे पर इस एयरपोर्ट को खतरनाक बताया था, लेकिन न सि$र्फ सरकारी मशीनरी ने उस संस्था की बात नहीं सुनी, बल्कि उसके द्वारा की जनहित याचिकाओं पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने इसलिए सुनवाई नहीं की, क्योंकि उड्डयन विभाग से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं ने हाईकोर्ट के सामने $गलत जानकारियां प्रस्तुत करके जनहित याचिका को $खारिज करने पर मजबूर कर दिया था।
इस ग्रुप का मुख्य आरोप यही था कि माजपे में जो रनवे बनाया जा रहा है वह कहीं से भी सुरक्षित नहीं है। इसका मुख्य कारण कि यह इलाका तीन ओर से घाटियों से घिरा है, जिसमें घना जंगल है। इन्वायरमेन्ट सपोर्ट ग्रुप के संयोजक लियो ए$फ सल्दान्हा का त$र्क था कि अगर पुरानी हवाई पट्टी को ही अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार विस्तारित कर दिया जाए, तो नया रनवे बनाने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन भारत सरकार के एयरपोर्ट माडर्नाइज़ेशन प्रोग्राम के तहत मंगलौर एयरपोर्ट के लिए 150 करोड़ रूपये निर्धारित किये गये थे। इसके अलावा विभिन्न सड़कों और अन्य सुविधाओं को विकसित करने के लिए कर्नाटक सरकार 200 करोड़ रूपया खर्च करनेवाली थी। जब 350 करोड़ का व्यापार सामने दिख रहा हो, तो तकनीकि और अच्छे बुरे के बारे में सोचता कौन है। सल्दान्हा एयरपोर्ट अथारिटी के अधिकारियों से मिले, हाइकोर्ट में दो बार जनहित याचिका लगाई, लेकिन लगभग सात साल के विरोध के बावजूद 2004 में इस हवाई पट्टी का काम शुरू हुआ और मई 2006 में यह हवाई पट्टी बनकर तैयार हो गयी, जिसका औपचारिक उद्घाटन चार साल बाद प्रफुल्ल पटेल ने 15 मई को किया। सात साल सल्दान्हा ने जो विरोध किया वह कितना सही था इसका अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि इस हवाई पट्टी के अंतराष्ट्रीय परिचानल के लिए खुलने के सातवें दिन ही यह हादसा हो गया।
मंगलौर विमान हादसे के जांच के आदेश जारी हो चुके हैं। जांचकर्ताओं को ब्लैक बाक्स मिल गया है और वे यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि आ$िखर क्या कारण है कि विमान 2000 $फीट आगे खिसकर उतरा। लेकिन इस जांच पड़ताल से क्या यह साबित हो पायेगा कि रनवे बनाया ही इसलिए गया, क्योंकि इसके पीछे भ्रष्टाचारियों की एक बड़ी लॉबी काम कर रही थी। दुर्घटना के बाद जारी अपनी प्रेस विज्ञप्ति में सल्दान्हा कहते हैं-गहवाई पट्टी बनाने के लिए व्यावहारिक तो छोडि़ए सि$र्फ आधिकारिक खानापूर्ति के लिए एक $िफज़बिलिटी रिपोर्ट तैयार कर दी गयी थी। जो रिपोर्ट तैयार की गयी वह गाड़ी के आगे बैल जोतने जैसी थी। सा$फ था कि सि$र्फ खानापर्ति की गयी। उस वक्त जब सल्हान्हा ने एयरपोर्ट अथारिटी के अधिकारियों से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि नया रनवे पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ही बनाया जा रहा है। सल्दान्हा का कहना है कि न केवल बाजपे में किसी और स्थान पर यह हवाई पट्टी बनायी जा सकती थी, बल्कि मंगलौर और उडीपी के बीच पाडुबिदरी में प्रस्तावित हवाई पट्टी को सुरक्षित तरीके से बनाया जा सकता था। लेकिन उस वक्त न तो केन्द्रीय विभागों ने इस समूह की आपत्तियों पर ध्यान दिया, न ही कर्नाटक सरकार ने और हाईकोर्ट ने भी इन विभागों और मंत्रालयों की दलीलों को ही मान्य किया। उल्टे कर्नाटक सरकार और स्थानीय मंगलौर चैम्बर्स आ$फ कामर्स एण्ड इंडस्ट्री ने इसी रनवे के लिए ज़ोरदार लाबिंग की।
अब सवाल यह है कि क्या इस दुर्घटना के बाद भी इस रनवे का इस्तेमाल किया जाएगा, या फिर इसे हमेशा के लिए छोड़ दिया जाएगा? सल्दान्हा की आपत्तियों के मद्देनज़र तो यह रनवे विस्तारित कर दिये जाने के बाद भी विमानों के उडऩे उतरने के लिए सुरक्षित नहीं है। क्या जांच में उन तथ्यों को शामिल किया जाएगा जिसके चलते इस हादसे की पृष्ठभूमि तैयार की गयी। भारत में बढ़ते घरेलू और अंतरराष्ट्रीय विमानन उद्योग को देखते हुए भारत सरकार 4000 करोड़ रूपये की एक योजना पर काम कर रही है, जिसके तहत देश के कुछ प्रमुख हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। अगर यह आधुनिकीकरण मंगलौर की ही तजऱ् पर किया जा रहा है, तो भविष्य में कुछ और हादसों के लिए हमें तैयार रहना होगा।
आज़ादी से 60 साल बाद भी नहीं हो पाया सड़क का डामरीकरण
अशोक तिवारी मझौली (सीधी)। भारत को स्वतंत्र हुए लगभग 62 साल हो गये। लेकिन प्रदेश में शायद ही ऐसी कोई सड़क है, जिसमें मुख्य आवाजाही बाधित न बनी हो। लेकिन सीधी जि़ले की मझौली तहसील मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम मड़वास जोकि सीधी जि़ला मुख्यालय जाने के प्रमुख मार्गों में से एक है, सैंकड़ों ग्राम जुड़ते हंै, लेकिन आज तक इसका डामरीकरण नहीं हो सका। इससे जुडऩे वाले ग्राम देवई, कोगा, खदौरा, सिंगरौला, सिस्तैली, जोगी पढ़ाड़ी, चदोलडोल आदि गांव के लोग अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
15 साल से जनपद अध्यक्ष
मज़े की बात यह है कि मडवास से कांग्रेस के प्रमुख नेता के पास हमेशा मझौली जनपद की बागडोर रही। विशाखा जायसवाल, साबिर खान स्वयं राजा मडवास जो जि़ला मुख्यालय को जोडऩे का प्रमुख मार्ग है, उस रोड का डामरीकरण तक नहीं करवा सके।
ये नेता स्वयं उबड़ खाबड़ मार्ग पर चलते हैं, लेकिन पता नहीं इस रोड को क्यों नहीं बनवाना चाहते हैं। इसके पीछे इनकी मंशा समझ में नहीं आती।
विधायक ने भी नहीं दिया ध्यान
नव निर्वाचित धौहनी विधानसभा के विधायक कुंवर सिंह जिनरो स्वयं भी इसी मार्ग से आना जाना पड़ता है वे स्वयं गड्डों वाली रोड में चल रहे हैं, लेकिन उन्होंने इस रोड को बनवाने में इच्छा शक्ति नहीं दिखाई।
मुख्यमंत्री से की मांग
मझौली मड़वास के ग्रामवासियों ने प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री, लोक निर्माण मंत्री क्षेत्रीय सांसद से मझौली मड़वास रोड के डामरीकरण की मांग की है, जिससे कि मझौली मड़वास कुसमी ब्लाक के इस आदिवासी अंचल का विकास हो सके और वर्षों से उपेक्षित आदिवासी भी स्वर्मिण मध्यप्रदेश के सहयोगी बन सकें।




