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Saturday, July 24, 2010





क्या हाईजैक हो गई थी उत्तरबंगा एक्सप्रेस

हृ पुष्यमित्र
बीरभूम के सैंथिया स्टेशन पर वनांचल एक्सप्रेस में उत्तरबंगा एक्सप्रेस की टक्कर क्या महज एक एक्सीडेंट है या फिर इसके पीछे कोई षणयंत्र है? दुर्घटना के बाद अगर आप परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर नजर दौड़ाएं तो बिना किसी सरकारी जांच पड़ताल के यह आशंका उभरने लगती है कि क्या ट्रेन को हाईजैक कर लिया गया था?
क्योंकि अगर ऐसा नहीं था तो इसके इतर इस हादसे की एक ही वजह हो सकती है और वह यह कि ट्रेन का ड्राइवर और दोनों सहायक ड्राइवर या तो एक साथ सो गये हों, नशा खुरानी के शिकार हो गये हों या पीकर टुन्न हों। फिलहाल एक साथ इतने सारी संभावनाएं नहीं हो सकती। शुरूआती स्तर पर अगर हम तथ्यों पर नजऱ डालें तो इस दुर्घटना के पीछे छिपा षडयंत्र साफ़ तौर पर सामने आने लगता है। अब आइये जरा रेलवे से मिले तथ्यों के आधार पर इस खबर को परखा जाये-
८ उत्तरबंगा एक्सप्रेस को होम सिग्नल नहीं था, इसके बावजूद ट्रेन प्लेटफ़ार्म पर आ गई।
८ जब उत्तरबंगा एक्सप्रेस प्लेटफ़ार्म पर पहुंची तो उसकी स्पीड 90 किमी प्रतिघंटा थी, जबकि स्टेशन परिसर में उसकी स्पीड 30 किमी प्रति घंटा से अधिक नहीं होनी चाहिये थी।
८ हादसे में चालक दल के तीनों सदस्य मारे गये।
८ हादसा सामने देख ड्राइवर ने इमरजेंसी ब्रेक नहीं लगाए।
८ ट्रेन का ड्राइवर ए कैटिगरी वाला एक्सपीरियंस्ड स्टाफ था।
८ जब ट्रेन अंदर आ गई तो लाउडस्पीकर से ड्राइवर को चेतावनी भी दी गई थी।
क्या इन तथ्यों के बाद इस घटना को हादसा माना जा सकता है? ऐसे में इस तथ्य को लेकर कोई संदेह नहीं बचता है कि यह घटना किसी संभवत: किसी चरमपंथी दल ने चालकों को किडनैप कर जानबूझ कर कराई ताकि ममता बंगाल की कुर्सी पर काबिज नहीं हो सके। यह नब्बे लोगों की लाश और 150 लोगों के जख्म पर रची गई एक घिनौनी साजिश है। तो आइए इससे पहले कि सैंथिया का सच जमींदोज हो जाए, तफ़्तीश करते हैं कि आखिर इस घटना के पीछे किसका हाथ हो सकता है। सबसे पहले इस आंकड़े पर गौर करें- 15 महीने में 11 हादसे 250 मरे। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में आंकड़े अक्सर बड़े सशक्त हथियार साबित होते हैं। उन्हें अक्सर अंतिम सत्य मान लिया जाता है। लेकिन अगर इन्हीं आंकड़ों को दूसरी निगाह से देखा जाये तो नतीजे बदले हुए भी नजर आ सकते हैं। जैसे इन्हीं आंकड़ों पर गौर करें। 15 महीने में 11 हादसे 250 मरे के बदले अगर यह कहा जाये कि दो महीने में बंगाल में दो रेल हादसे 200 से अधिक मरे तो इसका अर्थ कुछ अलग भी हो सकता है।
13 हादसों में 50 लोग मरे जो बंगाल में नहीं हुए और दो हादसे में 200 से अधिक लोग मरे जो बंगाल में हुए। उनमें से एक ज्ञानेश्वरी हादसा विशुद्ध रूप से अतिवादी गतिविधि का नतीजा थीं। गौर करें मैं यहां माओवादी शब्द का इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं, क्योंकि पीसीपीए और उसके मुखिया बापी महतो माओवादी नहीं हैं। माओवादियों ने खुद इस तथ्य से इनकार किया है। इस घटना के बाद माओवादियों ने बापी महतो को किडनेप कर लिया था और उसे संभवत: पुलिस हिरासत में जाकर यह कबूल करने के लिये कहा गया कि वह बताये ज्ञानेश्वरी हादसा माओवादियों की गतिविधि नहीं है ताकि उनकी छवि से यह बदनुमा दाग हट सके कि माओवादी आम लोगों के खून से होली खेलते हैं।
अब महज दो माह के अंदर सैंथिया में यह भीषण हादसा हुआ है। पाठकों की जानकारी बढ़ाने के उद्देश्य से यह सूचना दे दूं कि सैंथिया ममता बनर्जी का ननिहाल है। जाहिर सी बात है एक ओर इस हादसे ने बंगाल चुनाव से ऐन पहले ममता बनर्जी की छवि पर करारा प्रहार किया है, वहीं उसके दिल पर भी चोट की गई है क्योंकि सैंथिया को लेकर उनके मन में गहरा लगाव है। वनांचल एक्सप्रेस का रूट सैंथिया होकर उन्हीं के प्रभाव में करवाया गया था।


कितना कारगर होगा मुलायम का मा$फीनामा
हृ दिनेश शाक्य
जैसे तलाक देने के लिये तलाक को तीन बार बोला जाता है, बिल्कुल इसी अंदाज़ में सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने कल्याण सिंह से अपने संबंधों को लेकर मा$फी मांग कर मुसलमानों को रिझाने के लिये फिर से ट्रांपकार्ड फेंका है। अब देखना है कि मुलायम का यह ट्रांपकार्ड क्या ह$की$कत मे मुसलमानों को रिझाने में कामयाब होगा।
लोकसभा चुनाव से ऐन पहले भाजपा को देश में शीर्ष पर ले जाने में अहम भूमिका अदा करने वाले कल्याण सिंह से दोस्ती के कारण खफ़़ा हुये मुसलमानों को फिर से समाजवादी पार्टी में वापसी के लिए सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों से जहां माफ़ी मांगी, वहीं कल्याण सिंह और दूसरे अन्य नेताओं ने इसे मुलायम की अवसरवादिता करार देकर मुलायम की इस माफ़ी को मुसलमानों को गुमराह करने वाला करार दिया है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव की छवि कभी देश मे मुल्ला मुलायम वाली रही है, लेकिन अयोध्या में छह दिसम्बर 1992 की घटना के आरोपी और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से दोस्ती के बाद श्री यादव से उनके परम्परागत मतदाता रहे मुसलमानों ने कन्नी काट ली थी। 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में सपा को कल्याण की दोस्ती की वजह से करारी हार का सामना करना पड़ा था । हालात इतने $खराब रहे हंै कि फिऱोज़ाबाद लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मुलायम की पुत्र बधू डिम्पल यादव तक चुनाव हार गयी थी। विधानसभा उपचुनाव में भी मुलायम पार्टी को लगातार हार झेलनी पड़ रही थी। इतना ही नहीं, मुस्लिम प्रत्याशी होने के बावजूद डुमरियागंज विधानसभा सीट के उपचुनाव में सपा चौथे नम्बर पर खिसक कर दूसरे दलों के मुकाबले चारों खाने चित्त हो गयी। इन परिणामों से परेशान मुलायम सिंह यादव ने मुसलमान मतदाताओं को फिर से अपनी पार्टी में वापसी के लिए मुसलमानों से सार्वजनिक रुप से माफ़ी मांगी और वादा किया कि भविष्य में मस्जिद गिराने के जि़म्मेदार लोगों से कभी भी हाथ नहीं मिलाऊंगा। कल्याण सिंह से राजनीतिक गठबंधन की वजह से मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक ज़मीन ही खिसकती जा रही थी और इसी वजह से मुलायम समेत उनकी पूरी पार्टी के लोग इससे विचलित नजऱ आ रहे थे। कभी मुलायम के हनुमान रहे सपा से निष्कासित अमर सिंह ने भी राज्य के पूर्वी क्षेत्र में सक्रिय पीसपार्टी जैसे दलों से हाथ मिलाकर मुलायम सिंह यादव की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। माना जा रहा है कि इस सबसे निबटने और विधानसभा के 2012 में प्रस्तावित चुनाव को देखते हुए मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों से माफ़ी मांग कर, दूर की कौड़ी खेली है। हालांकि माफ़ीनामे के पत्र में उन्होंने एक बार भी कल्याण सिंह का नाम नहीं लिया है।
मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों के नाम जारी अपने बयान में कहा है-मेरा जीवन साम्प्रदायिक शक्तियों के विरद्ध संघर्ष करने की खुली किताब रहा है। मैंने सदैव साम्प्रदायिक ताकतों को नाकाम करने में पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य निभाया है। सन 1990 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुये अपने संवैधानिक दायित्व का पालन करते हुए मैंने बाबरी मस्जिद को बचाने का काम किया। अपने बयान में मुलायम ने छह दिसम्बर 1992 को उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार रहते हुये बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामलें में मस्जिद गिराने के जि़म्मेदार तत्कालीन मुख्यमंत्री को एक दिन के कारावास की सज़ा भी दी। उन्होंने कहा कि 2009 लोकसभा चुनाव में साम्प्रदायिक शक्तियों की सरकार को केन्द्र में सत्तारूढ़ होने से रोकने में उन्हें कुछ ग़लत तत्वों को साथ लेना पड़ा जिससे भ्रमित होकर सभी धर्मनिरपेक्ष विशेषकर मुसलमान भाईयों को मानसिक कष्ट हुआ और उनकी भावनाओं को ठेस पहुंची। उन्होंने कहा मैं इसे अपनी ग़लती स्वीकार करता हूं और इसलिए मस्जिद गिराने के जि़म्मेदार लोगों को भविष्य में कभी साथ ना लेने की सार्वजनिक घोषणा भी कर चुका हूं। मैं इस घटना के लिए देश के सभी विशेषकर अपने मुसलमान भाइयों से माफ़ी मांगता हूं और उन्हें आश्वस्त करना चाहता हूं कि भविष्य में उनके हितों को सर्वोपरि मानते हुए उनके सम्मान की रक्षा के लिए पूरी निष्ठा से कार्य करता रहूंगा। बार बार मुसलमानोंं से माफ़ी मांग चुके मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर से मुसलमानों से किस इरादे से माफ़ी मांगी है, यह तो साफ़ तौर पर समझ नहीं आ रहा है, लेकिन अनुमान लगाया जा रहा है कि कांग्रेस की ओर जा रहे मुसलमान मतदाताओं को रोकने के लिये मुलायम ने जो माफ़ी मांगी है, अब वो कितनी कारगर होती है, यह देखने वाली बात होगी।
मुलायम ने लिखा है कि मेरा जीवन साम्प्रदायिक शक्तियों के विरद्ध संघर्ष करने की खुली किताब रहा है। मैंने सदैव साम्प्रदायिक ताकतों को नाकाम करने में पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य निभाया है। वर्ष 1990 में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री रहते हुये अपने संवैधानिक दायित्व का पालन करते हुए मैंने बाबरी मस्जिद को बचाने का काम किया। अपने बयान में श्री यादव ने छह दिसम्बर 1992 को उत्तर प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की सरकार रहते हुये बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामलें में मस्जिद गिराने के जि़म्मेदार तत्कालीन मुख्यमंत्री को दोषी मानते हुये अदालत उठने तक की सज़ा भी दी। उन्होंने कहा कि गत लोकसभा चुनाव में साम्प्रदायिक शक्तियों की सरकार को केन्द्र में सत्तारूढ़ होने से रोकने में उन्हें कुछ ग़लत तत्वों को साथ लेना पड़ा जिससे भ्रमित होकर सभी धर्मनिरपेक्ष विशेषकर मुसलमान भाईयों को मानसिक कष्ट हुआ और उनकी भावनाओं को ठेस पहुंची। उन्होंने कहा मैं इसे अपनी ग़लती स्वीकार करता हूं और इसलिए मस्जिद गिराने के जि़म्मेदार लोगों को भविष्य में कभी साथ ना लेने की सार्वजनिक घोषणा भी कर चुका हूं। मैं इस घटना के लिए देश के सभी विशेषकर अपने मुसलमान भाइयों से माफ़ी मांगता हूं और उन्हें आश्वस्त करना चाहता हूं कि भविष्य में उनके हितों को सर्वोपरि मानते हुए उनके सम्मान की रक्षा के लिए पूरी निष्ठा से कार्य करता रहूंगा।
मुलायम सिंह यादव के माफ़ीनामे से तिलमिलाये पूर्व मुख्यमंत्री और अयोध्या में छह दिसम्बर 1992 की घटना के आरोपी कल्याण सिंह ने समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम के मुसलमानों से माफ़ी मांगने को हताशा भरा कदम बताते हुए कहा है कि यदि माफ़ी ही मांगनी है तो उन्हें पिछड़ों से मांगनी चाहिए। कल्याण सिंह बंहद तल्ख शब्दों में कहते है कि मुलायम ने हिन्दुओं की भावनाओं को हमेशा आघात पहुंचाया है और हमेशा तुष्टिकरण की राजनीति की है। उन्होंने कहा कि मुलायम से हाथ मिलाते समय उनके समर्थकों ने उन्हें आगाह किया था कि वह धोखेबाज़ हैं। फऱेब उनकी फि़तरत है, लेकिन अपने सरल स्वभाव के कारण पिछड़ों की लडाई लडऩे के लिए उन्हें समर्थन दिया गया। श्री सिंह का कहना था कि श्री यादव ने केवल उनसे ही नहीं बल्कि करोड़ों पिछड़ों के साथ विश्वासघात किया है। वास्तव में उन्हें पिछड़ों को धोखा देने के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए । मुलायम सिंह यादव और कल्याण सिंह के बीच दोस्ती का ख़मियाज़ा सबसे ज्य़ादा मुलायम सिंह यादव को ही भुगतना पड़ा है। कल्याण सिंह कभी भारतीय जनता पार्टी के शिखर पुरूष राजनेता हुआ करते थे, लेकिन वक्त की मार ने कल्याण सिंह को शून्य पर लाकर खड़ा कर दिया। संसदीय चुनाव से पूर्व कल्याण सिंह का सहयोग अचानक समाजवादी पार्टी ने लेने की घोषणा से राजनैतिक हलकों में खलबली मचा दी, ख़ासकर मुस्लिम तबके में कल्याण सिंह की मुलायम सिंह से करीबी के चलते नाराजग़ी देखी गई। इतना ही नहीं समाजवादी पार्टी के किले को ढहने में सपा मुखिया द्वारा की गई धुर विरोधी कल्याण सिंह की दोस्ती भी कयामत ढहा गई। सब जानते हैं कि कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि विवादित स्थल को ढहा दिया गया, जिसकी हिन्दुओं के मुकाबले मुसलमानों को ख़ासी टीस हुई और मुसलमानों का $गुस्सा सातवें आसमान पर था। मुसलमान कल्याण सिंह को बाबरी मस्जिद का हत्यारा करार देते हैं, ऐसे नारे बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद लगाने वाले मुसलमान इस बात को कैसे बर्दाश्त कर लेते कि मुसलमानों के हितों की बात करने वाले मुलायम सिंह यादव कल्याण सिंह को गले मिलते हुये कैसे देख लेते? कल्याण सिंह से दूरी बनाने की कोशिश में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के बाद उनकी पार्टी के दूसरे सांसद भी उन पर विभीषण कह कर उगुंली उठाने लगे हैं। रामपुर की सपा सांसद जयाप्रदा ने मुलायम सिंह यादव की हां में हां मिलाते हुये कल्याण सिंह को विभीषण करार दे डाला है। संसदीय चुनाव से पहले भाजपा और लोधी वोट को अपनी ओर खींचने के इरादे से सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कल्याण सिंह को अपने दल में कथित तौर पर शामिल कर लिया और उनके बेटे राजवीर को सपा का राष्ट्रीय महासचिव बना कर वोट पर कब्ज़ा करने की कोशिश की, लेकिन नाकायाब रहे.संसदीय चुनाव के नतीजे आने के बाद साफ़ हो गया कि कल्याण के शामिल होने का कोई फ़ायदा सपा को हासिल नहीं हुआ दूसरे सपा का परंपरागत मुसलमान मत सपा से दूरी बना गया। सपा को कल्याण से एक फ़ायदा ज़रूर हुआ कि सपा को एक संसदीय सीट ज़रूर बढ़ गई। असल में कल्याण सिंह ने एटा जि़ले से लोकसभा सीट के लिये निर्दलीय किस्मत आज़माई जिसमें सपा ने कल्याण का दिल से सर्मथन किया और अपना कोई भी प्रत्याशी कल्याण सिंह के मुकाबले खड़ा नहीं किया। मुलायम सिंह यादव सोच रहे थे कि भाजपा से अलग हट चुके कल्याण का बाबरी विध्वंस वाला चेहरा मुसलमान भूल गया होगा लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। कल्याण की मुलायम से नजदीकी मुसलमानों को शूल की तरह से चुभ गई। और नतीजा संसदीय चुनाव के बाद उप चुनाव में सपा को भुगतने को मिल गया है। भले ही कहा गया हो सपा से मुसलमान और लोध अभी कटा नहीं है लेकिन हककीत में सपा से मुसलमान और लोध तो कटा ही दूसरी और कई जातियों ने भी सपा से दूरी बना ली। सबसे ज्य़ादा दुख तो मुलायम को अपनी बहू के हारने पर हुआ क्यों की फिऱोज़ाबाद सीट के समीकरण के अनुसार वहां पर लोधी, यादव और मुसलमानों के बाहुल्यता को देखते हुये ही डिंपल यादव को सपा ने चुनाव मैदान में उतार था। लेकिन चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया कि सपा को उसका परंपरागत वोट मिला ही नहीं है। ऐसा ही कुछ मुलायम के गृह नगर इटावा की भी सीट पर हुआ जहां सपा के कब्जे वाली सीट बसपा के हाथों में जा पहुंची, इस सीट पर भी लोधी और मुसलमान निर्णायक भूमिका में है। जिसने सपा के बजाये बसपा में वोट देना जरूरी समझा।
इटावा में जहां पर कल्याण का जादू चलने की उम्मीद की गई थी और वे मतदान केंद्र लोधी प्रभाव वाले थे वहां पर सपा को मुहं की खानी पड़ी। इनमें नमला छंद में बसपा को 192 और सपा को 146, जसोहन बगिया में बसपा को 675 और सपा को 234, सकौआ में बसपा को 233 और सपा को 96, जैनपुर नागर में बसपा को 455 और सपा को 134, दतावली में बसपा को 386 और सपा को 233, खादर में बसपा को 533 और सपा को 24,बमनपुर में बसपा को 204 और सपा को 12,सुदंरपुर में बसपा को 501 और सपा को 106,कुनैरा में बसपा को 538 और सपा को 350,डूंगरी में बसपा को 576 और सपा को 60,विचारपुरा में बसपा को 367 और सपा को 157,सरायदयानत में बसपा को 545 और सपा को 90,नगलाउदय में बसपा को 207 और सपा को 23,काधंनी में बसपा को 514 और सपा को 74,पूठनसकरौली में बसपा को 494 और सपा को 67,हरदासपुर में बसपा को 537 और सपा को 26,रूरा में बसपा को 311 और सपा को 47,लुहन्ना में बसपा को 717 और सपा को 132,कुरट मे बसपा को 408 और सपा को 15,फूफई में बसपा को 441 और सपा को 97,बीलमपुरा में बसपा को 395 और सपा को 31,कल्याणपुर में बसपा को 377 और सपा को 73,सूखाताल में बसपा को 981 और सपा को 200,नेवरपुर में बसपा को 262 और सपा को 9, इसके अलावा अनगिनत ना जाने कितने ऐसे मतदान केंद्र हंै जहां पर कल्याण सिंह का कोई असर नहीं हुआ। फिर भी मुलामय सिंह को ऐसा क्यों लगा कि कल्याण सिंह के कारण मुसलमान सपा से दूर हो रहे हैं, यह तो वे ही जाने. लेकिन कल्याण सिंह को खलनायक साबित करके प्रदेशभर में घटते मुस्लिम जनाधार को बढ़ाने की उनकी कोशिश साफ दिख रही है।

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