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Friday, July 30, 2010


फंदे में शाह, संकट में मोदी
विधि का विधान देखिए कि जो पुलिस महकमा जिस गृहमंत्री को सलाम करते नहीं थकता था, उसी महकमे को उसे सलाख़ों के पीछे पहुंचाना पड़ा... उषा चांदना
सोहराबुद्दीन और कौसरबी की $फजऱ्ी मुठभेड़ अब मोदी के गले की ऐसी हड्डी बन चुकी है, जो भाजपा को ना निगलते बन रही है, और न उगलते, क्योंकि इसी $फजऱ्ी मुठभेड़ को मोदी ने आतंकवाद करार देकर मौत के सौदागर का नाम कमाया था, और उसी नाम की बदनामी के भरोसे 2007 का विधानसभा का चुनाव लड़ा था। लेकिन कितने ताज्जुब की बात है कि बाद मे गुजरात सरकार ने ही सुप्रीम कोर्ट में इसे $फजऱ्ी मुठभेड़ करार दिया। अमित शाह की गिरफ़्तारी से सवाल इस बात का भी उठ रहा है, कि मोदी के राज्य में सही मायने में आतंकवाद की परिभाषा क्या है ?
भाजपा कह रही है कि उसने बड़े मकसद के लिए अमित शाह का मुद्दा छोड़ दिया है। अपने बड़े मकसद के लिए भले ही शीर्ष स्तर पर बैठे नेताओं ने गुजरात के भूतपूर्व गृहमंत्री अमित शाह का मुद्दा छोड़ दिया हो, लेकिन सीबीआई के शिकंजे में फंसे अमित शाह की पूछताछ से सच्चाई की परतें जिस तरह से एक एक कर उभरकर सामने आ रही हंै, उससे गुजरात राज्य के सामने एक सवाल यह आकर खड़ा हो गया है, कि क्या सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर के $खूनी छीटे मोदीत्व पर भी पड़ेंगे? पूछताछ के दौरान कहीं अमित शाह उस कहावत को चरितार्थ तो नहीं करेंगे कि सनम हम तो डूबेंगे, लेकिन तुम्हें भी ले डूबेंगे? देश में यह ऐसा पहला ऐतिहासिक मामला है, जब किसी राज्य के गृहमंत्री पर हत्या, हफ़्ता उगाहने जैसे संगीन आरोप लगाए गए हैं, और उस मंत्री पर जिसके गॉड$फादर $खुद मोदी हैं। अमित शाह की गिरफ़्तारी से क्या मोदी की उल्टी गिनती शुरू हो सकती है? क्या इस मामले से राज्य की राजनीति के समीकरण बदलेंगे?
विधि का विधान देखिए कि जो पुलिस महकमा जिस गृहमंत्री को सलाम करते नहीं थकता था, उसी महकमे को उसे सलाख़ों के पीछे पहुंचाना पड़ा। 2002 में प्रदेश में गोरधन झड़पिया के त्यागपत्र देने के बाद उन्हें यह विभाग सौंपा गया था। 2007 में अहमदाबाद के सर$खेज़ विधानसभा से वे चुनाव जीते थे, और गृहमंत्री का स्वतंत्र कार्यभार संभाला था। पूरे कार्यकाल के दौरान अमित शाह प्रदेश के गृहमंत्री होने की बजाय नरेन्द्र मोदी के सबसे विश्वस्त मंत्री के बतौर काम करते रहे। भाजपा में रहे बा$गी नेता अब यह भी कहने लगे हैं, कि अमित शाह ने जितने काम किए वह अपने लिए कम, मोदी के लिए ही ज्य़ादा किए, वह चाहे सहकारी बैंक हों या क्रिकेट का मैदान। गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर मोदी को और $खुद को उपाध्यक्ष पद पर आसीन अमित शाह पर डुबाए गए माधोपुरा सहकारी बैंक में उन पर वैसे भी 2.5 करोड़ की रिश्वत लेने का आरोप है।
राज्य में अमित शाह का प्रभुत्व कितना था, इसका अंदाज़ इसी से लग सकता है कि जब भी कैबिनेट की मीटिंग में किसी विभाग को लेकर महत्वपूर्ण कमेटी बनाई जाती थी, तो केबिनेट में चार महत्वपूर्ण मंत्री होने के बावजूद भी राज्यमंत्री होते हुए भी अमित शाह 100 कमेटियों में से 90 कमेटियों में शामिल होते थे। अमित शाह जिस कैबिनेट मीटिंग को सम्बोधित करते थे, सब जानते थे कि यह गृहमंत्री अमित शाह नहीं मोदी बोल रहे हैं, लेकिन सीबीआई के फँदे में फंसने के बाद अब पुराने भाजपाई रहे शामिल सुनील ओझा का कहते हंै कि भाजपा अब भारतीय जनता पार्टी नहीं रही क्रिमिनल पार्टी हो गई है। वे कहते हैं कि भाजपा अब कैडर बेस्ड पार्टी नहीं रही। सभी महत्वपूर्ण $फैसले गान्धीनगर में होते हैं। गुजरात में संघ के जितने महत्वपूर्ण शाखा किसान संघ थीं, उसको मोदी ने तोड़ दिया। गुजरात में विहिप और बजरंग दल को निष्किय कर दिया, लेकिन इस मामले में मोदी की उल्टी गिनती ज़रुर शुरू होगी।
सच्चाई की परतों में मोदी का एक ऐसा सच भी सामने आया है, जो मोदी को भारी पड़ सकता है। वह है संजय जोशी सीडी कांड। सीबीआई की जांच के दौरान पुलिस विभाग के पीआई बालमुकुन्द चौबे ने जांच में बताया है, कि संजय जोशी की सीडी एटीएस ने ही बनाई थी। सवाल इस बात का है कि क्या इन सब मुद्दों को लेकर भाजपा के $िखला$फ ब$गावत होगी? कांग्रेस के वरिष्ट नेता अर्जुन मोडवडिय़ा का कहना है कि यह कहना असम्भव है। क्योंकि गुजरात में मोदी का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। लेकिन गुजरात में साइड ट्रेक किए गए नेता कहते हैं, कि पार्टी अगर झारखंड जैसी भूल करती है, तो पार्टी का वही हश्र होगा। लेकिन सवाल इस बात का भी उठ खड़ा हुआ है कि सोहराबुद्दीन मामले में सज़ा भोग रहे जब आईपीएस अधिकारियों को ज़मानत नहीं मिली, तो अमित शाह को कैसे मिलेगी, भले ही राम जेठमलानी जितनी कोशिश कर लें। मोदी को मालूम था कि सोहराबुद्दीन का केस उनके गले की हड्डी बना हुआ है, इसीलिए उन्होंने ही रामजेठमलानी को राज्यसभा का सदस्य बनाया। अब देखना यह है कि न्यायिक प्रक्रिया के चलते क्या आने वाले दिनों में मोदी की उल्टी गिनती शुरु होती है या मोदी बेदा$ग साबित होते है ?


कॉमनवेल्थ स्टेडियमों में कंडोम क्यों बंटेंगे ? आलोक तोमर नई दिल्ली। कांग्रेसी सांसद मणिशंकर अय्यर ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा है, कि खेल पंडाल में कंडोम बांटने वाली 150 मशीनों का क्या काम है। उन्होंने इन मशीनों के लगाए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा, कि ये मशीनें किस लिए लगाई जा रही हैं। उन्होंने सवाल किया कि आखिर कॉमनवेल्थ गेम में लोग कौन-सा खेल खेलने आ रहे है?
अय्यर ने कहा कि प्राथमिकता क्या है, एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का खेल का आयोजन करना, या बेहतर खेल सुविधाएं मुहैया कराना? यह विकृत प्राथमिकता है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रमंडल खेलों को बढ़ाचढ़ा कर पेश करना घिनौना है। भारत में बड़ी संख्या में युवाओं की आबादी होने के बावजूद देश खेल संपन्न राष्ट्र नहीं बन सका है। अगर हम 30,000 करोड़ रुपये राष्ट्रमंडल खेलों पर खर्च करने के बदले बेहतर खेल सुविधाएं मुहैया कराने में लगाए जाते, तो भारत पांच वर्षों में चीन की स्थिति में आ सकता था। अय्यर ने सरकार पर हमला करते हुए कहा कि जहां सरकार को भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़तों के लिए 1,500 करोड़ रुपये का मुआवजा घोषित करने में 25 साल लग गए, वहीं सरकार ने खेल के लिए कलमाड़ी को झट से 1,620 करोड़ रुपये दे दिए हैं। खेल गांव और पूरी दिल्ली में 3 से 14 अक्टूबर के आयोजन के लिए कंडोम की मशीनें लगाए जाने की आलोचना की। उन्होंने कहा कि मैं इन दिनों हो रही बारिश से बहुत $खुश हूं। इसकी पहली वजह यह है कि बारिश खेती के लिए अच्छी है। दूसरी बात यह कि इससे राष्ट्रमंडल खेलों का बेड़ा $गर्क हो जाएगा।
यूपीए की पिछली सरकार में मंत्री रहे अय्यर ने कहा कि अगर राष्ट्रमंडल खेल सफल हुए तो ये लोग एशियाई खेल और अन्य दूसरे खेल भी आयोजित करेंगे। इसलिए इस खेल का बेड़ा $गर्क हो जाए तो मुझे $खुशी होगी। दूसरी ओर कलमाडी ने अय्यर को राष्ट्रविरोधी करार दिया। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अगर अय्यर खेल मंत्री बने रह गए होते, तो भारत कभी भी खेल का आयोजन नहीं कर पाता। कलमाड़ी $खुद कांग्रेसी नेता हैं। कलमाड़ी ने जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के उद्घाटन के मौके पर कहा कि खेल इसलिए संभव हो पा रहे हैं, क्योंकि एम.एस.गिल खेल मंत्री हैं। वहीं बीजेपी ने कहा है कि वह खेल संबंधी परियोजनाओं के निर्माण कार्य में हो रही देरी के मुद्दे को संसद में उठाएंगी।

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