योग 'गुरुÓ राजनीति में है 'गुरु-घंटालÓ
कुल मिलाकर देखा जाए तो योग की दुनिया के दिग्गज गुरु स्वामी रामदेव राजनेताओं से गच्चा खा ही बैठे। उन्हें राजनीति में आना है तो उनका स्वागत है, लेकिन उन्हें इससे पहले राजनीति के खेल को समझने के लिए किसी राजनीतिक गुरु की शरण लेकर राजनीति की एबीसीडी से शुरू करना होगा, तब जाकर उनकी मांगें और राजनीति में नाम कमाने का उनका सपना साकार हो सकेगा। बहरहाल गलतियां दोनो ओर से की गई हैं किसी एक पक्ष पर ही सारा दोष मढ़ देना सही नहीं है। हां, लोकतांत्रिक देश का नागरिक होने के नाते इतना ज़रूर कहना होगा कि 4 जून के दोषियों को कठोर से कठोर सज़ा दी जाए ताकि फिर से मानवता को शर्मसार करने की कोई दुर्घटना न हो। रामदेव को भी यह समझना होगा कि जनता जिसके साथ होती है, सत्ता उसी के हाथ में सौंपती है, इसके लिए अभी उन्हें राजनीति के दांव-पेंच को सीखने के साथ ही इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसी निडरता से काम लेना होगा। राजनीति में मुसीबत से भागने वाला नहीं, बल्कि मुसीबत का सामना करते करते प्राण-गंवाने वाले को ही सच्चा नेता माना जाता है। एक वाक्य में कहें तो, योग गुरू राजनीति में गुरु-घंटाल ही साबित हुए हैं। हृ जैनेन्द्र कुमार
$िफलवक्त योग गुरु बाबा रामदेव के सत्याग्रह के दौरान यानी 4 जून 2011 की देर रात को दिल्ली पुलिस की कार्रवाई देशभर में बहस का विषय बन गई है। जितने मुंह उतनी बातें, केन्द्र सरकार बाबा रामदेव को $गलत बताती है तो बाबा रामदेव केन्द्र सरकार को वादा $िखला$फी का दोषी मानते हैं। कुल मिलाकर पूरा देश दो धड़ों में बंटा नज़र आता है एक बाबा रामदेव के साथ है तो दूसरा केन्द्र सरकार के साथ, लेकिन सिलसिलेवार दोनों पक्षों पर नज़र डालें तो एक अलग ही तस्वीर नजर आती है केन्द्र सरकार और बाबा रामदेव दोनों ने ही $गल्तियां की हैं, कोई भी दूध का धुला हुआ नहीं है। सभी पक्षों पर नज़र डालती खोज परक रपट:-
योग गुरु बाबा रामदेव की ओर से की गई गलतियां
पहली- भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की ओर से 1 जून 2011 से 20 दिन तक के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में 5,000 लोगों की मौजूदगी में योग शिविर चलाने की अनुमति ली गई थी, लेकिन इससे इतर 3 जून की मध्यरात्रि तक ही रामलीला मैदान में 25,000 से ज्यादा लोग रामलीला मैदान में आ गए थे और 4 जून की बात करें तो यह संख्या लगभग 50,000 के करीब तक पहुंच गई थी। बाबा राम देव की ओर से की गई पहली चूक यह थी कि जब उन्हें इस बात का अंदाजा था कि देशभर में उनके लाखों भक्त-समर्थक हैं फिर क्यों उनके संरक्षण में चल रहे ट्रस्ट की ओर से महज 5,000 आदमियों के लिए अनुमति ली गई, क्या वे सरकार को धोखा देने के पक्ष में थे, क्या उनकी नीयत में खोट था।
दूसरी- $खास बात यह है कि भ्रष्टाचार व विदेशों में जमा भारतीयों के कालेधन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर उसे वापस देश में लाने। विदेशी भाषा में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों को भारतीय भाषाओं में पढ़ाने व भ्रष्टाचारियों को फांसी की सज़ा देने का प्रावधान किए जाने जैसी मांगों को लेकर सत्याग्रह करने का जब बाबा रामदेव पहले से ही ऐलान कर चुके थे, तब उनके ट्रस्ट ने दिल्ली के रामलीला मैदान पर सत्याग्रह करने की अनुमति लेने के बजाय, योग शिविर चलाए जाने की अनुमति क्यों ली? यह भी लाख टके का सवाल है जब आप सच्चाई की राह पर हैं और न्याय के लिए लड़ रहे हैं तो ऐसी लड़ाई डंके की चोट पर सा$फ नीयत से लडऩे के बजाय चोरी-छिपे या छल-कपट के सहारे लडऩे की कोशिश क्यों की गई?
तीसरी- सरकार ने जब 4 जून को रामलीला मैदान का जायज़ा लिया तो पाया कि वहां 5,000 से दस गुना ज़्यादा नागरिक एकत्र हैं और योग शिविर की अनुमति लेकर सत्याग्रह चलया जा रहा है। सरकार ने यह भी महसूस किया कि अगले दिन यानी 5 जून 2011 को उनके साथ प्रसिद्ध गाँधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे भी अपने समर्थकों के साथ शामिल हो सकते हैं, तब हालात हर हाल में काबू से बाहर हो जाएंगे और उसे किसी तरह से भी काबू कर पाना संभव नहीं होगा, तब तुरंत प्रभाव से प्रशासन की ओर से 4 जून की देर रात को ही ट्रस्ट को दी गई अनुमति रद्द कर दी गई। जब अनुमति रद्द करने के पत्र को लेकर सरकार के कारिंदे बाबा रामदेव के पास पहुंचे और उन्हें वह पत्र देना चाहा, तो बाबा और उनके समर्थकों ने पत्र लेने से इंकार कर दिया, इतना ही नहीं उन्होंने सरकार को ललकारते हुए कहा, कि हम किसी की नहीं सुनने वाले, सरकार से जो हो सके वह कर ले। जब सरकार ने भारत स्वाभिमान ट्रस्ट को योग शिविर के लिए अनुमति पत्र दिया तब तो उसने झट से ले लिया और अनुमति रद्द पत्र देना चाहा तो उसका सुर बदला नजर आया। क्या यह व्यवहार किसी सच्चे सत्याग्रही और उसके समर्थकों अथवा बाबा रामदेव और उनके अनुयायियों की गरिमा के अनुकूल था। कदाचित नहीं, बल्कि यही ऐसा कदम था जिसने सरकार को इस बात के लिए न केवल उकसाया, बल्कि मजबूर कर दिया कि वह सरकार और प्रशासन के आदेश को ठेंगा दिखाने वाली अभद्र जनता को काबू करने के लिए कठोर कदम उठाए।
चौथी- जब दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी बाबा रामदेव को गिर$फ्तार करने गए तो उन्होंने भीड़ को शांत रहने की बात तो कही लेकिन उन्होंने महात्मा गाँधी सरीखे सत्याग्रही की भाँति शांतिपूर्ण तरीके से गिर$फ्तारी देने के बजाय छद्म रूप धर पुलिस प्रशासन को चकमा देने की कोशिश की। वे मंच से देखते ही देखते कूद गए और भीड़ में घंटों छिपे रहे। करीब तीन घंटे तक रात में बाबा के समर्थकों को लगा कि बाबा को पुलिस ने गिर$फ्तार कर लिया है और वह उनके योग गुरु को किसी भी प्रकार की हानि पहुंचा सकती है, जबकि दूसरी तरफ पुलिस की पकड़ से बाबा रामदेव बाहर थे, पुलिस समझ गई थी कि लोग $गलत समझ रहे हैं और उन्हें लग रहा है कि पुलिस ने बाबा को पकड़ लिया है और वह उनके समर्थकों से झूठ बोल रही हैं। इस $गलतफहमी के कारण ही बाबा के कुछ समर्थक भाव आवेश में आकर पत्थर फेंकने लगे। फिर जैसा कि होता है एक हल्की सी आक्रोश की चिंगारी देखते ही देखते हिंसक बेकाबू भीड़ में तब्दील हो गई। आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि करीब आधा लाख लोग महज़ डेढ़ हज़ार पुलिसकर्मियों पर पत्थर बरसाने लगें तो हालात कैसे होंगे। यह वह स्थिति थी जिसमें मजबूरन हालात काबू में करने के लिए न चाहते हुए भी पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा। पचास हज़ार लोगों की आक्रोशित भीड़ के मुकाबले डेढ़ हज़ार पुलिसकर्मी क्या हैसियत रखते हैं, यह सहज ही समझा जा सकता है इसलिए हालात काबू करने के लिए सीआपीए$फ के जवान और रैपिड एक्शन $फोर्स के जवानों को भी रामलीला मैदान पर बुलाना पड़ा। तब करीब तीन घंटे लाठीचार्ज के बाद बेकाबू भीड़ को नियंत्रित किया गया। इस दौरान सैकड़ों बेगुनाह घायल हुए, तो हज़ारों को मामूली चोटें आईं। घायलों को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। यह सबसे बड़ी बाबा रामदेव की ओर से की गई $गलती थी, कि वे महिला का सलवार सूट पहन कर दीवार के सहारे छिप कर बैठे रहे और उनके बुलावे पर अपना घर-परिवार छोड़कर आए उनके भक्त लाठियों से पिटते रहे, वहीं पुलिसकर्मी पत्थरों का सामना करते रहे। और यह सब हुआ $गलत$फहमी के कारण। अगर बाबा रामदेव चाहते तो इन सब हालात से बचा जा सकता था, जब भीड़ को यह गलत$फहमी हुई कि पुलिस ने बाबा को पकड़ लिया है, और पत्थरबाज़ी शुरू हुई, तभी वे सामने आ जाते, तो मामाला सा$फ हो जाता कि बाबा गिर$फ्तार नहीं हुए हैं, और वे शांति की अपील करते तो भीड़-जिसमें ज़्यादातर उनके भक्त ही थे शांत हो जाते और लाठी चार्ज की नौबत ही न आती। यह कहां की बाबागीरी है या सत्याग्रह है कि जिस बाबा पर यकीन कर अपने घर-परिवार को छोड़कर आए लोग पिटते रहे, वही बाबा महिला के कपड़ों में उनके आसपास ही छिपा रहा और हद तो तब हो गई जब तीन घंटे बाद मामला कुछ ठंडा पडऩे पर उन्होंने अपनी महिला साथियों के साथ पुलिस की आंख में धूल झोंककर भागने की कोशिश की, हालांकि वे इस कोशिश में नाकम रहे और दिल्ली पुलिस ने उन्हें गिर$फ्तार कर लिया। यह भी गौरतलब है कि पुलिस सबसे पहले बाबा के मंच पर गई थी, उसी समय बाबा गिरफ्तारी दे देते, तो किसी प्रकार की गलत$फहमी नहीं फैलती, न जनाक्रोश फैलता, न इतनी हिंसा का नंगा नाच होता। ईमानदारी से देखा जाए तो इस सब के लिए परोक्ष रूप से बाबा रामदेव स्वयं भी जि़म्मेदार हैं।
पांचवीं- बाबा रामदेव ने आरोप लगाया कि दिल्ली पुलिस रामलीला मैदान में उनकी हत्या करने और लाशें बिछाने के इरादे से आई थी, तब सवाल यह उठता है कि अगर वह इसी इरादे से आई थी और 4 जून को देर रात 2:00 से 4:00 बजे के बीच दिल्ली पुलिस, रैपिड एक्शन $फोर्स और सीआरपीएफ की संयुक्त कार्रवाई के दौरान उसने भीड़ पर पूरी तरह से काबू पा लिया था, तो उसने समर्थकों की लाशें क्यों नहीं बिछाईं और बाबा रामदेव को भी गिर$फ्तार कर लिया, तो उन्हें मारने के बजाय ससम्मान उनके हरिद्वार आश्रम में क्यों छोड़ आई? बाबा रामदेव का यह आरोप कि पुलिस उनको मारने के इरादे से आई थी, सरासर गलत और मिथ्यावचन हैं, क्योंकि बाबा रामदेव पब्लिक फिगर हैं, उनकी गिनती देश के हाई प्रो$फाइल योग गुरुओं में होती है, उनसे आम आदमी ही नहीं, नामी, रसूखदार, धनी और राजनेता तक आशीर्वाद लेने और योग के गुर सीखने जाते हैं, ऐसे में सरकार उन्हें किसी भी तरह की चोट पहुंचा कर क्यों अपने ही गले में घंटी बांधने का काम करेगी? यह बात गले नहीं उतरती।
छठी- बाबा रामदेव कहने को भ्रष्टाचार व विदेशों में जमा भारतीयों के कालेधन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर उसे वापस देश में लाने। विदेशी भाषा में पढ़ाए जाने वाले पाठ्यक्रमों को भारतीय भाषाओं में पढ़ाने व भ्रष्टाचारियों को फांसी की सज़ा देने का प्रावधान किए जाने जैसी गंभीर मांगों को लेकर सत्याग्रह कर रहे हैं, लेकिन वक्त-वेवक्त उनका मज़ाकिया अंदाज़ इस बात का परिचायक है, कि वे सही मायने में अभी इन मुद्दों और सत्याग्रह के प्रति न तो पूर्ण रूप से गंभीर हैं, न ही समर्पित।
सातवीं- सत्याग्रह के दौरान एक ही मंच से साध्वी ऋतम्भरा और अन्य साम्प्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर उन्होंने सत्याग्रह को रातनीति और साम्प्रदायिकता के रंग में रगने दिया, चाहिए तो था कि वे भी अन्ना हज़ारे की तरह किसी भी राजनीतिक या साम्प्रदायिक ताकत से हाथ मिलाने के बजाय अपने बूते और आम जनता के बूते अपनी मांगे मंगवाने के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ नज़र आते।
आठवीं- अन्ना हज़ारे ने बाबा रामदेव को सत्याग्रह शुरू करने से पहले ही आगाह किया था कि वे केन्द्र सरकार के नेताओं से सावधान रहें, लेकिन उन्होंने अन्ना हजारे की बात पर ध्यान नहीं दिया, और कांग्रेस सरकार के चार दिग्गज मंत्रियों के कहे-सुने में आकर पत्र लिख दिया और बाद में उन्हें पछतावे के सिवाय कुछ नहीं मिला। आम आदमी भी यह जानता है कि अगर एक तर$फ अन्ना हज़ारे सरीखा समाजसेवी हो और दूसरी ओर सरकार के घाघ मंत्री तो किस पर यकीन किया जाए, लेकिन बाबा रामदेव तो आम आदमी से भी अनाड़ी निकले और आ$िखरकार राजनीति के भंवर में फंस ही गए।
नवीं- बाबा रामदेव ने महिला के कपड़े पहनने पर सफाई दी कि शिवाजी ने भी औरंगजेब से बचने के लिए ऐसा किया था, लेकिन वैसे हालात 4 जून की रात को नहीं थे और वे अपने ही वेश में रहते तब भी उनकी जान को किसी तरह का कोई $खतरा नहीं था, उनके 4 जून की रात को किए गए व्यवहार से साफ हो जाता है कि भले ही वे योग की दुनिया के बेताज बादशाह हों, लेकिन राजनीति में वे सि$फर ही हैं।
दसवीं- बाबा रामदेव ने बार-बार आरोप लगाया कि सारी कार्रवाई के पीछे सोनिया गाँधी का हाथ है, मनमोहन सिंह का हाथ है। उन्होंने यह भी कहा कि सोनिया गाँधी विदेशी मूल की होकर राजनीति में हो सकती हैं, तो वे क्यों नहीं हो सकते। सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के मुद्दे को तूल देना बाबा को शोभा नहीं देता, क्योंकि अगर बाबा पूरी दुनिया के भक्तों से भेंट-चढ़ावा ले सकते हैं, तो उन्हें एक विदेशी से इस कदर परहेज़ क्यों है।
ग्यारहवीं- 7 जून को देर रात एक टीवी न्यूज़ चैनल के हवाले से बाबा रामदेव ने कहा कि वह दिल्ली सरकार को मा$फ करते हैं। सवाल उठता है कि जो सरकार महज़ चार दिन पहले जिस बाबा रामदेव और उनके समर्थकों की खून की प्यासी थी, उसे बाबा रामदेव ने इतनी आसानी से मा$फ कैसे कर दिया।
कांग्रेस सरकार की ओर से की गई गलतियां
पहली- सरकार की इस मामले में सबसे ज़्यादा भद्द इसी वजह से पिटी है कि उसने आधी रात को शांतिप्रिय ढंग से अनशन करने की मंशा से आए बाबा और उनके समर्थकों को डरा-धमका कर भगा दिया।
दूसरी- बाबा रामदेव के मंच से $गायब होने के बाद भीड़ जब नेतृत्वविहीन हो गई तो उसपर लाठीचार्ज करने की क्या तुक है। कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि महिलाओं के कपड़े फाड़ कर और लघुशंका के लिए गई महिलाओं को महिला शौचालय से खींच-खींच कर बाहर लाया गया। ऐसा कर दिल्ली पुलिस किस तरह की वीरता दिखाना चाहती थी।
तीसरी- जब सत्याग्रह में आए समर्थक हाथ जोड़ रहे थे, तब पुलिस को लाठियां भांजने या उन्हें डराने-धमकाने की क्या मजबूरी आ पड़ी।
चौथी- इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के लोगों के कैमरे क्यों बंद करवाए गए और न मानने पर उनके भी हाथ-पैर तोडऩे की धमकी क्यों दी गई। मीडियाकर्मियों से दुव्र्यवहार क्यों किया गया? मीडिया कर्मियों के कैमरे बंद क्यों करवाए गए, क्या पुलिसकर्मी, रैपिड एक्शन $फोर्स और सीआरपीए$फ के जवान कुछ ऐसा कर रहे थे जो मानवता को शर्मसार करने वाला था, बर्बर था, अमानुषिक था, जिसके दिखाए जाने पर जनता भड़क सकती थी, या सरकार के नुमांइदों की पोल खुलने का डर था।
पांचवां- बाबा रामदेव के दिल्ली पहुंचने पर सरकारी प्रोटोकॉल की अनदेखी करते हुए एक नहीं चार चार कैबिनेट मंत्री उनकी अगुवानी के लिए गए। उन्हें इतना वेटेज क्यों दिया गया। क्या इस सबके पीछे बाबा रामदेव को प्रसन्न कर सत्याग्रह न करने के लिए उन्हें मनाना था। इसी के तहत बाबा रामदेव और चारों कैबिनेट मंत्रियों की ओर से कई बार चर्चाओं के दौर चले और जब बात नहीं बनी, तो जैसा कि कहा जा रहा है, कपिल सिब्बल ने बदले की कार्रवाई का मन बना लिया। जिस बाबा रामदेव के स्वागत में चार कैबिनेट मंत्रियों ने पलक-पांवड़े बिछाए, बात बिगडऩे पर उन्हीं बाबा और उनके समर्थकों को सरकार की ताकत दिखाने में सरकार ने देर नहीं की। देर रात को ही योग शिविर की अनुमति रद्द कर दी गई, और कानून के डंडे निरीह लोगों पर बरसाए गए। महिला, बच्चों, बीमारों और वृद्धों तक को नहीं छोड़ा गया।
छठी- बाबा रामदेव के सत्याग्रह से पहले ही सरकार के वरिष्ठ मंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा कि बाबा ठग है। इसके पास काला धन है। अगर ऐसा ही था तो सरकार ने अब तक ऐसे (अपराधी) के $िखला$फ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। ऐसे बाबा के स्वागत के लिए सरकार ने चार वरिष्ठ मंत्रियों को क्यों भेजा गया?
सातवीं- सत्याग्रह से पहले दिग्विजय सिंह ने कहा था कि हम बाबा रामदेव से डरते नहीं हैं, इसीलिए हमने उन्हें गिर$फ्तार नहीं किया है। अगर हम बाबा रामदेव की ताकत से डरते तो कब का उन्हें पकड़ कर बंद कर दिया होता, फिर 4 जून को क्या सरकार बाबा रामदेव से डर गई थी कि उन्हें गिर$फ्तार करने के लिए रामलीला मैदान पहुंच गई। और फिर देखते ही देखते इतना डरी कि पुलिसकर्मियों से साथ ही उसे सीआपीएफ और आरएएफ को भी बुलाना पड़ा। आंसू गैस के गोले दागने पड़े। लाठी चार्ज करना पड़ा।
आठवीं- कुछ महीने पहले ही हुए गुर्जर आंदोलन के दौरान आरक्षण की मांग को लेकर ट्रेन की पटरियों पर कब्ज़ा कर लिया गया, सड़क मार्ग अवरुद्ध कर दिए गए, लाखों लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा, करोड़ों रुपए की सार्वजनिक सम्पत्ति का नुकसान किया गया। सैकड़ों व्यापारियों को रोज़ाना लाखों-करोड़ों का नुकसान सहना पड़ा। एक पुलिस चौकी तक आग के हवाले कर दी गई। इतना सब होने के बाद भी इसी कांग्रेस सरकार ने आंदोलनकारियों के $िखला$फ कोई कठोर कदम नहीं उठाया। इसके उलट बाबा रामदेव और उनके समर्थकों के दिल्ली के रामलीला मैदान पर शांतिपूर्ण सत्याग्रह करने से किसी को कोई परेशानी नहीं हुई। आम जनता की बात की जाए तो उसे परेशानी तो दूर वह तो इस बात से $खुश थी, कि कोई तो है जो अन्ना हज़ारे के बाद भ्रटाचार के खात्मे, काले धन को देश में लाने के बारे में गंभीर है, और न्याय के लिए लड़ रहा है। इससे बावजूद कांग्रेस सरकार और दिल्ली पुलिस की ओर से आपतकाल सरीखी कार्रवाई की गई। इतनी स$ख्त कार्रवाई की गई और आम जनता से इतनी बर्बरता से पुलिस प्रशासन पेश आया कि सुप्रीम कोर्ट को जवाब तलब करना पड़ा है। यह दिखाता है कि कांग्रेस भी दोहरे मापदंड और पूर्वग्रह की शिकार है।
नवीं- सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मनमोहन सिंह ने कहा कि सरकार के पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था, क्या प्रधानमंत्रीजी आम आदमी को यह बताने का कष्ट करेंगे कि आ$िखर ऐसा उनकी क्या मजबूरी थी, कि उनके पास और कोई रास्ता ही नहीं रहा।
कुल मिलाकर देखा जाए तो योग की दुनिया के दिग्गज गुरु स्वामी रामदेव राजनेताओं से गच्चा खा ही बैठे। उन्हें राजनीति में आना है तो उनका स्वागत है, लेकिन उन्हें इससे पहले राजनीति के खेल को समझने के लिए किसी राजनीतिक गुरु की शरण लेकर राजनीति की एबीसीडी से शुरू करना होगा, तब जाकर उनकी मांगें और राजनीति में नाम कमाने का उनका सपना साकार हो सकेगा। बहरहाल गलतियां दोनो ओर से की गई हैं किसी एक पक्ष पर ही सार दोष मढ़ देना सही नहीं है। हां, लोकतांत्रिक देश का नागरिक होने के नाते इतना ज़रूर कहना होगा कि 4 जून के दोषियों को कठोर से कठोर सज़ा दी जाए ताकि फिर से मानवता को शर्मसार करने की कोई दुर्घटना न हो। रामदेव को भी यह समझना होगा कि जनता जिसके साथ होती है, सत्ता उसी के हाथ में सौंपती है, इसके लिए अभी उन्हें राजनीति के दांव-पेंच को सीखने के साथ ही इंदिरा गांधी और राजीव गांधी जैसी निडरता से काम लेना होगा। राजनीति में मुसीबत से भागने वाला नहीं, बल्कि मुसीबत का सामना करते करते प्राण-गंवाने वाले को ही सच्चा नेता माना जाता है। एक वाक्य में कहें तो, योग गुरू राजनीति में गुरु-घंटाल ही साबित हुए।
उमा भारती का वनवास $खत्म
उत्तर प्रदेश में करेंगीं पार्टी को मजबूत
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की बीजेपी में वापसी हो गई है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने आज इस संबंध में घोषणा की। भारती 2005 में पार्टी से बाहर हो गई थीं। उन्हें उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी अध्यक्ष ने साफ कर दिया कि उनका कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश रहेगा और वे लखनऊ में अधिकांश समय देंगीं।
भारती ने कर्नाटक के हुबली के ईदगाह मैदान पर तिरंगा फहराने के एक आंदोलन में हिस्सा लिया था और उसी मुद्दे पर उनके $िखला$फ गिर$फ्तारी वारंट निकला था। वे उस समय मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री थीं, और वारंट के कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देना पड़ा था। पार्टी ने वरिष्ठ नेता बाबूलाल गौर को कमान सौंप दी थी।
इसके बाद पार्टी और उमा के बीच मतभेद बढ़ते गए और अंतत: पार्टी ने उमा को बाहर का रास्ता दिखा दिया।उसके बाद उमा भारती ने भारतीय जनशक्ति पार्टी बनाई लेकिन उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिली। अब वे फिर पार्टी में वापस आ गई हैं।
पार्टी अध्यक्ष गडकरी ने कहा कि उमा भारती ने पार्टी में शामिल होने की इच्छा जताई और इसके बाद उन्होंने पार्टी नेताओं से चर्चा की। भारती की संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पार्टी छोडऩे के पहले उमा के सुषमा स्वराज से विवाद पर उन्होंने कहा कि वह इतिहास है। उन्होंने सा$फ किया कि मध्य प्रदेश के नेताओं सहित सभी बड़े नेताओं से उनकी चर्चा हुई है और इसी के बाद यह निर्णय लिया गया।
उमा भारती ने कहा कि वे पिछले पांच साल भूलना चाहती हैं। वे उत्तर प्रदेश के अलावा गंगा नदी को साफ करने के भी अभियान में हिस्सा लेंगीं। उन्होंने कहा कि बीजेपी से अलग होकर भी उन्होंने विचारों से कभी भी समझौता नहीं किया।
इसी बीच भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि बीती बातें भूलकर, आगे की सुध लें। उमाजी का महत्व है तभी पार्टी ने उन्हें वापस लिया है। वे उन्हें घर जाकर बधाई देंगे।
उन्होंने बताया कि पार्टी ने सबकी सहमति से निर्णय लिया है, मुझसे भी बात की गई थी। उनसे पूछा गया कि क्या पार्टी अब भी 2013 का विधानसभा चुनाव उन्हीं के नेतृत्व में लड़ेगी, शिवराज ने कहा कि मुझे पार्टी जो काम देती है, मैं वो करता हूं।
यूपी के महाभारत में उमा की एंट्री
तेज़ तर्रार महिला नेता उमा भारती की भारतीय जनता पार्टी में वापसी हो गई। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मंगलवार 14 जून को इसका औपचारिक ऐलान किया। उन्हें उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा गया है। इसके साथ ही यह तय हो गया कि उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभी चुनाव में उमा भारती भाजपा की स्टार प्रचारक होंगी।
प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए नितिन गडकरी ने कहा कि उमा भारती पार्टी की तेज़ तर्रार नेता रही हैं। उन्होंने इच्छा जताई थी कि मेरी श्रद्धा इस पार्टी के साथ है और मैं दोबारा से पार्टी के लिए काम करना चाहती हूं। उनकी इस इच्छा का सम्मान करते हुए हमने उन्हें पार्टी में दोबारा लेने का फैसला किया है। नितिन गडकरी ने कहा कि उत्तर प्रदेश उनका कर्मक्षेत्र होगा और वह राज्य में मुख्य रूप से प्रचार का काम करेंगी। उन्होंने कहा कि पार्टी में आने से पहले ही वह हमारी पवित्र नदी गंगा बचाओ आंदोलन में शिरकत कर रही हैं। हमारी पार्टी की देश की सांस्कृतिक विरासत की रक्षा में पूरा विश्वास रहा है, और हमारी पार्टी इसके लिए उनके साथ लड़ेगी। पत्रकारों को संबोधित करते हुए उमा भारती ने कहा कि मेरे राजनीतिक जीवन की शुरुआत ही इस पार्टी से हुई। 15-20 सालों तक इस पार्टी में जुड़े रहने के बाद कुछ अप्रिय घटनाओं के कारण मैं पिछले पांच-छह सालों तक पार्टी से अलग रही, लेकिन इस दौरान भी मेरी विचारधारा पार्टी के साथ ही रही। उन्होंने कहा कि मुझे लगा कि अगर मुझे देश के लिए कुछ करना है, तो इसी पार्टी में रहकर कर सकती हूं। उन्होंने पार्टी में अपनी वापसी पर प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए कहा कि मेरी कोशिश रहेगी कि मैं पार्टी की सेवा तन्मयता से कर सकूं। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश गांवों का एवं राम का राज्य है। वहां राम राज्य लाने के लिए मैं पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलकर काम करूंगी। उन्होंने पार्टी के अधिकारियों और अध्यक्ष गडकरी को धन्यवाद दिया।
गौरतलब है कि उमा भारती ने सोमवार को इस बाबत संकेत दिए थे। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा था कि देश को ईमानदार नेता की ज़रूरत है और मैं ईमानदार हूं। राजनीति उनका कर्मक्षेत्र है।
उल्लेखनीय है कि नवंबर 2004 को भाजपा मुख्यालय में एक मीटिंग के दौरान उमा भारती ने ब$गावती तेवर दिखाते हुए लालकृष्ण आडवाणी पर खुला हमला बोल किया था, जिसके बाद 2005 में उन्हें भाजपा से निष्कासित कर दिया गया था। उमा भारती पिछले का$फी समय से उत्तर प्रदेश में गंगा बचाओ आंदोलन में शिरकत कर रही हैं। इस बात के कयास पहले से ही लगाए जा रहे थे कि उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी उमा भारती की पार्टी में वापसी का ऐलान कर देगी।

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