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Saturday, May 28, 2011






आखिर कौन है दोषी? बोर्ड, खिलाड़ी या सिस्टम

हृ जैनेन्द्र कुमार

आईपीएल-४ के दिग्गज खिलाड़ी महेन्द्र सिंह धोनी, सचिन तेन्दुलकर, जहीर $खान, वीरेन्द्र सहवाग के वेस्टइंडीज़ दौरे पर न जाने से देशभर में एक बहस छिड़ गई है, कि क्या अब खिलाड़ी सि$र्फ पैसे के लिए खेलते हैं, और जब देश के लिए खेलने की बारी आती है तो विश्राम के नाम पर बैकफुट पर चले जाते हैं। किरण मोरे ने कहा है कि वल्र्डकप के दौरान गौतम गंभीर के चोट आने के बाद वे आईपीएल-४ और वेस्टइंडीज़ में नहीं खेलना चाहते थे, लेकिन बोर्ड के दबाव में गंभीर आईपीएल-४ में खेलने को राजी हुए थे। और अब बोर्ड ने गंभीर को ही वेस्टइंडीज़ दौरे की चुनी गई टीम का कप्तान भी बना दिया। ऐसा बोर्ड ने क्यों किया? यह भी महत्वपूर्ण सवाल है। अब जब कि गौतम गंभीर की चोट ज़्यादा गंभीर हो गई है, तो बीसीसीआई ने चोरी और सीना ज़ोरी की तर्ज पर गंभीर से स$ख्त नाराज़ी जताई है, और कहा है, कि गंभीर अपनी चोट छिपाकर आईपीएल में लगातार क्यों खेलते रहे, जबकि गंभीर ने कहा है कि कोलकाता नाइट राइडर्स के टीम प्रबंधन ने उनकी चोट के गंभीर होने की जानकारी नहीं दी, और उन्हें लागातार आईपीएल मैचों में खिलाते रहे। आखिर क्या है वर्तमान क्रिकेट, क्रिकेटर्स और बोर्ड की सच्चाई इसी की पड़ताल करती रिपोर्ट।
इसी साल धोनी की कप्तानी में टीम इंडिया ने वल्र्ड कप जीत कर इतिहास रचा है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। इसके $खत्म होने के कुछ ही दिनों बाद ८ अप्रैल २०११ से आईपीएल-४ की शुरुआत हो गई। आईपीएल का आ$िखरी और $फाइनल मैच २८ मई २००१ को खेला जाएगा और इसी के साथ आईपीएल का समापन होगा। इसके बाद ४ जून से शुरू होने वाले वेस्टडंडीज़ दौरे के लिए टीम की घोषणा कर दी गई है। टीम इंडिया के क प्तान भरोसेमंद बैट्समैन माने जाने वाले गौतम गंभीर होंगे। इस दौरे के लिए उप कप्तान सुरेश रैना को बनाया गया है। इसके अलावा टीम में पार्थिव पटेल, विराट कोहली, युवराज सिंह, एस. बद्रीनाथ, रोहित शर्मा, हरभजन सिंह, आर. अश्विन, प्रवीण कु मार, ईशांत शर्मा, मुनाफ पटेल, विनय कुमार, यूसुफ पठान, अमित मिश्रा और वर्धिमान शाह को शामिल किया गया है। सचिन तेन्दुलकर, महेन्द्र सिंह धोनी और ज़हीर खान को आराम दिया गया है, जबकि वीरेंद्र सहवाग अनफिट होने की वजह से वेस्ट इंडीज़ दौरे पर नहीं जा सकेंगे। टीम इंडिया एक ट्वंटी-ट्वंटी मैच और पांच एक दिवसीय मैच वेस्टइंडीज़ की टीम के $िखला$फ उनके ही मैदानों पर खेलेगी। हालांकि, अब वेस्टइंडीज़ जाने वाली भारतीय टीम के कप्तान गौतम गंभीर का चोट के कारण इस दौरे पर जाना संदिग्ध हो गया है। आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स की कप्तानी संभाल रहे गंभीर ने रविवार, २२ मई को मंबई इंडियंस से मैच के दौरान कंधे में दर्द की शिकायत की थी। मंगलवार २४ मई को उनका एमआरआई स्कैन किया गया, जिससे उनके दाएं कंधे में चोट के गंभीर होने का पता लगा है। गंंभीर को यह चोट वल्र्डकप फाइनल के दौरान लगी थी। उस मैच में गंभीर ने ९७ रन बनाए थे। आईपीएल में भी मुंबई इंडियंस के विरुद्ध खेलते हुए फील्डिंग के दौरान उनके कंधे में ज़ोर का झटका लगा था, जिसे बाद उन्हें कराहते हुए देखा गया था। हालांकि, वे इसके बाद भी मुंबई इंडियंस के विरुद्ध एक और मैच खेले। इस मामले में शाहरु$ख $खान और कोलकाता नाइट राइडर्स टीम प्रबंधन से गौतम गंभीर नाराज़ हैं। गंभीर का कहना है कि टीम प्रबंधन ने उन्हें कंधे की चोट गहराने की जानकारी नहीं दी और वे लगातार १५ मैच खेलते रहे। बीसीसीआई के सचिव एन.श्रीनिवासन की मानें तो कोलकाता नाइट राइडर्स के $िफजि़यो एंड्यू लीपस ने बोर्ड को लिखित जानकारी दी है, कि गंभीर के लिए कम से कम छह सप्ताह का आराम ज़रूरी है। इस मामले में चयन समिति के दो पूर्व अध्यक्षों की राय भी $काबिले $गौर है। किरण मोरे कहते हैं, कि लगातार खेलने के बजाय गंभीर कुछ मैचों में आराम करते तो चोट नहीं गहराती। वे इंडीज़ दौरे पर जाना नहीं चाहते थे, और न ही आईपीएल में खेलना चाहते थे। बोर्ड के दबाव में राजी हुए थे। दिलीप वेंगसरकर का कहना है कि यदि गौतम की चोट गंभीर होती तो वे आईपीएल-४ में ३५० से ज़्यादा रन कैसे बनाते। बाद में दर्द ज़्यादा बढ़ा तब गंभीर परेशान हुए। वैसे इस मामले में कार्रवाई की संभावना नहीं है। इससे इतर आईपीएल-४ में गंभीर ११ करोड़ रुपए में बिके थे। गंभीर ने चोट के बावजूद टीम के सभी १५ मैचों में हिस्सा लिया और ३७८ रन बनाए। बीसीसीआई इस बात से भी स$ख्त नाराज़ हैं, कि गंभीर की चोट के बारे में नाइटराइडर्स प्रबंधन ने उन्हें अंधेरे में रखा और जोखिम के बावजूद लगातार मैच खिलाता रहा। टीम इंडिया के सलामी बल्लेबाज वीरेन्द्र सहवाग भी $िफलहाल कंधे की चोट से उबर नहीं पाए हैं। उनके कंधे की इसी महीने की शुरुआत में लंदन में सर्जरी की गई थी। हालांकि, इस सबके बावजूद भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) की राष्ट्रीय चयन समिति के अध्यक्ष कृष्णामचारी श्रीकांत ने विश्वास जताया है कि टीम इंडिया ४ जून, २०११ से शुरू होने वाले वेस्टइंडीज़ दौरे में शानदार प्रदर्शन करेगी। हालांकि, उन्होंने गौतम गंभीर के खेलने के सवाल पर चुप्पी साध ली। सारे मामले पर नज़र डालने के बाद कुछ बातें सोचने पर मजबूर करती हैं।
पहली- वल्र्ड कप, फिर आईपीएल-४ और अब वेस्टइंडीज दौरा-आ$िखर क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ी भी तो हाड़मास के बने इंसान ही हैं। उन्हें भी थकान होती है, उन्हें भी चोट लगती है, उन्हें भी आराम की ज़रूरत होती है, फिर क्यों बीसीसीआई लगातार क्रिकेटर्स से ये उम्मीद करती है, कि वे सबकुछ भुलाकर बस क्रिकेट ही खेलते रहें।
दूसरी- वल्र्डकप खेलने के दौरान जब गंभीर के कंधे में चोट लग गई थी और वे आईपीएल-४, वेस्टइंडीज़ दौरे में खेलने के इच्छुक नहीं थे, फिर क्यों बीसीसीआई ने न सि$र्फ आईपीएल-४ में खेलने का गौतम गंभीर पर दबाव डाला, बल्कि उन्हें वेस्टइंडीज़ दौरे में टीम इंडिया का कप्तान बनाकर सारी जि़म्मेदारी उन्हीं के कंधों पर डाल दी। क्या बीसीसीआई पर भी आईपीएल टीमों के मालिकों जो कि रसू$खदार भी हैं, का दबाव था, इसलिए उसने ऐसा किया और कहीं यह बात सामने न आ जाए इसलिए वेस्टइंडीज़ दौरे में कप्तानी की जि़म्मेदारी गौतम गंभीर को सौंपी।
तीसरी- धोनी, सचिन और ज़हीर खान जब बिलकुल फिट हैं और आईपीएल-४ में उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया है तो उन्हें बीसीसीआई ने वेस्टइंडीज़ दौरे की टीम में शामिल क्यों नहीं किया और क्यों उन्हें विश्राम दिया गया?
चौथी- क्या बीसीसीआई ये समझती है, कि एक क्रिकेटर के लिए सबकुछ सि$र्फ क्रिकेट ही हो सकता है? क्या क्रिकेटर्स को समाज और अपने परिवार के प्रति अपनी जि ोदारियों को पूरा करने के लिए समय नहीं चाहिए? और अगर इन बातों से बीसीसीआई इत्तेफाक रखती तो क्यों वो लगातार क्रिकेटर्स से क्रिकेट खेलने की उम्मीद करती है और उन्हें क्रिकेट खेलने के लिए दबाव डालती है।
पांचवीं- गौतम गंभीर की चोट की गंभीरता को छिपाने वाले कोलकाता नाइट राइडर्स के टीम प्रबंधन और टीम के मालिक के विरुद्ध बीसीसीआई अब कोई स त कदम उठाएगी, जिससे कि गंभीर जैसी परेशानी का सामना किसी और खिलाड़ी को भविष्य में न करना पड़े।
छठी- अगर वेस्टइंडीज़ दौरे पर टीम इंडिया बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाती है, तो कौन जि़म्मेदार होगा। उन्हें लगातार क्रिकेट खिलाने वाली बीसीसीआई या टीम इंडिया और क्रिकेटर्स की थकान और चोटें।



शिवराज का साहस नीतीश की नेकनीयत
हृ शेष नारायण सिंह

शिवराज सिंह चौहान ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में यह बयान देकर चौंका दिया है कि देश के ऊपरी सदन को $खत्म कर दिया जाना चाहिए। शिवराज सिंह के इस बयान की भले ही कुछ लोग आलोचना करें, लेकिन शिवराज सिंह चौहान ने बहुत सटीक बात कही है। इसी तरह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधायक निधि को भंग करके बहुत साहसिक और ऐतिहासिक काम किया है। निश्चित रूप से इन राजनीतिज्ञों की यह समझ और पहल राजनीति को भ्रष्टाचार से उबारने में मदद करेगी। भ्रष्टाचार अपने देश के सामाजिक ताने बाने में बुरी तरह से घुस चुका है। घूस में की गयी चोरी को बाकायदा कमाई कहा जाता है। अंग्रेज़ों के दौर में संस्था का रूप हासिल करने वाली संस्कृति को आज़ादी के बाद नौकरशाही ने घूस की संस्कृति में बदल दिया। आज़ादी के संघर्ष में शामिल नेताओं के जाने के बाद जो नेता राजनीति में आये उनके लिए घूस एक मौलिक अधिकार की शक्ल ले चुका था। नेता जब घूस$खोर होगा तो अ$फसरों और सरकारी कर्मचारियों को घूसजीवी बनने से रोक पाना नामुमकिन है। घूस में मिली र$कम के बल पर लोग ऐशोआराम की जि़ंदगी बसर करते हैं, और कहीं चूँ नहीं होती। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में ऐसे लोग मुख्य सचिव बना दिए जाते हैं जिनको महाभ्रष्ट के रूप में मान्यता मिल चुकी होती है। नेताओं के बच्चों की शादियों में करोड़ों रूपये खर्च किये जाते हैं और कोई नहीं पूछता कि यह पैसा कहाँ से आया। अब तक भ्रष्टाचार वही माना जाता रहा है, जो पकड़ लिया जाय और मुक़दमा कायम हो जाए। आम तौर पर इन मुक़दमों में अभियुक्त बच ही निकलता है।
भ्रष्टाचार के कारणों की जांच नहीं की जाती, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस दिशा में पहला क़दम उठा लिया है। उन्होंने बिहार स्पेशल कोर्ट्स एक्ट 2010 के तहत अफसरों की उन संपत्तियों को ज़ब्त करना शुरू कर दिया है, जो घूस की कमाई से खरीदी गयी हैं। इस मामले में पहला शिकार पकड़ा भी जा चुका है और उसकी 44 लाख रूपये की संपत्ति सरकारी कब्ज़े में ली जा चुकी है। ज़ाहिर है कि अगर अफसरों में यह डर समा गया कि घूस से बनायी गई संपत्ति बाद में भी सरकारी कब्ज़े में आ जायेगी तो घूस के प्रति मोह कम होगा। अगर उत्तर प्रदेश में भी इसी तरह का काम शुरू हो जाए तो भ्रष्टाचार पर निर्णायक काबू पाने की दिशा में कदम उठाया जा सकता है। नीतीश कुमार ने दूसरा अहम काम भी किया है। उन्होंने विधायकों को मिलने वाली उस र$कम को भी रद्द करने का फैसला कर लिया है, जो विधायक निधि के नाम पर क्षेत्र के विकास के लिए दी जाती है। इसी रक़म से विधायक लोग अपने चेलों को पालते हैं, विधायक निधि से कमीशन लेते हैं, और भ्रष्टाचार का माहौल बनाते हैं। उसी निधि से अफसर भी अपना हिस्सा लेते हैं और सरकारी पैसे को पूरी तरह से नंबर दो का बना देते हैं। कुछ सम्मानजनक अपवाद भी हैं।
एक उदाहरण तो अरुण शौरी का ही है। उत्तर प्रदेश से राज्यसभा का सदस्य बनने के बाद उन्होंने सरकार से अनुमति मांग कर अपनी सांसद निधि को आईआईटी कानपुर में एक महत्वपूर्ण प्रयोगशाला बनाने के लिए दे दिया। 6 साल के कार्यकाल में उन्हें 12 करोड़ रूपये मिलने थे, कुछ सरकारी मदद लेकर एक संस्था की स्थापना हो गयी लेकिन इस तरह के उदाहरण बहुत कम हैं।
ज़्यादातर लोग तो विकास निधि को अपनी नंबर दो की कमाई ही मानते है। इसकी उत्पत्ति भी बहुत ही अजीब तरीके से हुई थी। सांसदों को अपने साथ रखने के चक्कर में भ्रष्ट प्रधान मंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने सांसद निधि को शुरू किया था। बाद में विधायकों के लिए भी राज्य सरकारों ने व्यवस्था कर दी। अब तो भ्रष्टाचार का माहौल बनाने में इसी निधि का सबसे अहम योगदान है। बिहार में इस घूस की जननी को ख़त्म करने की शुरुआत हुई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बाकी देश में भी यह उदाहरण लागू किया जायेगा। एक अन्य मुख्यमंत्री ने भी भ्रष्टाचार की जड़ों में म_ा डालने की एक आइडिया का जि़क्र किया है।
भोपाल में चुनाव सुधारों के लिए आयोजित एक बैठक में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, शिवराज सिंह ने बहुत बुनियादी बात कही। उन्होंने कहा कि संसद का जो ऊपरी सदन है, वह भ्रष्टाचार के लिए आजकल बहुत बड़ी खाद का काम करने लगा है। देखा गया है कि राज्य सभा में अब वे सारे लोग पंहुच रहे हैं जो पैसा देकर टिकट लेते हैं और विधायकों को पैसा देकर उनकी वोट खरीदते हैं। शराब के व्यापारी, सत्ता के दलाल, अन्य बे-ईमानी का काम करने वाले लोग राज्य सभा में पंहुच रहे हैं, और ऐलानियाँ ऐसा काम कर रहे हैं, जो किसी भी कीमत पर सही नहीं है।
आम आदमी के विरोध में जो भी नीतियाँ बन रही हैं, यह लोग उसे समर्थन दे रहे हैं। शिवराज सिंह ने कहा कि राज्य सभा को ही ख़त्म कर देना चाहिए। लोकसभा जनहित और राष्ट्र हित के सभी $फैसले लेने के लिए सक्षम है। ज़ाहिर है कि यह विचार मौलिक परिवर्तन की बात करता है, और भ्रष्टाचार के प्रमुख कारणों को दबा देने की ताक़त रखता है।
इस बात में दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए राजनीतिक पहल के लिए ज़रूरत है और निहित स्वार्थ वाले उसका पूरी तरह से विरोध करेगें। लेकिन अगर भ्रष्टाचार पर सही तरीके से हमला किया गया, तो देश के विकास को बहुत बड़ी शक्ति मिल जायेगी।

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