
मिटा डालो..........खाप पंचायतों के $खौ$फ को
हृ जैनेन्द्र कुमार
कहने को तो भारत में संविधान लागू है, विधि का शासन है और कानून के समक्ष राष्ट्रपति से लेकर आम आदमी तक सब बराबर हैं, लेकिन खाप पंचायत भारत की कानूनी छवि को चुनौति देती नज़र आती हैं। देश के कुछ $खास हिस्सों में रहने वालों के ज़ेहन में सि$र्फ खाफ का $खौ$फ होता है, क्योंकि उनके लिए जि़ंदगी और मौत दोनों खाप पंचायतें ही तय करती हैं। कानून, प्रशासन, पुलिस व्यवस्थाएं वहां लुंज-पुंज और बेचारी नजर आती हैं। इस्लामी मज़हब के मसीहा आएदिन बे सिर-पैर के $फतवे जारी करते रहते हैं, कुछ इन्हीं की तजऱ् पर ही खाप पंचायतें भी काम करती नज़र आती हैं।
मसलन हाल ही खाप पंचायतों ने लड़कियों के जींस पहनने पर पाबंदी लगा दी है। अगर एक ही गोत्र के लड़का-लड़की शादी कर लें और उस शादी में उनके परिजनों की मजऱ्ी हो तो भी खाप पंचायतें उन्हें न केवल भाई-बहन घोषित कर देती हैं, बल्कि अमुक दंपती को भाई-बहन की तरह ही रहने के लिए मजबूर भी किया जाता है, और खाप के ऐसे $फैसले का उल्लंघन करने पर कभी उन्हें जात बाहर कर दिया जाता है, और कभी इतने पर भी संतोष न कर उनके ही परिजनों पर इतना दबाव डाला जाता है, कि इज्ज़त के नाम पर वे अपने ही बेटे-बेटी या भाई-बहन का बेरहमी से कत्ल कर देते हैं, और ऐसा करने में शान समझी जाती है। इसे आमतौर पर ऑनर किलिंग यानी इज्ज़त के लिए की गई हत्या के रूप में जाना जाता है और खाप पंचायतों के सर्वेसर्वा ऐसा करने वालों की पीठ थपथपाते नहीं थकते। इसी तरह अगर शादी करने वाले अलग-अलग जातियों से होते हैं-$खासकर उनमें से एक पक्ष अगर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का होता है तब तो उस प्रेमी जोड़े को विवाह करने से पहले मारना ही खाप पंचायत की नाक का सवाल बन जाता है और अमूमन ऐसे जोड़ों को बेरहमी और बर्बरता से सार्वजनिक तौर पर मार दिया जाता है, ताकि दूसरे युवा भी उनकी मौत से सबक ले सकें, और कोई ऊंची जाति वाला किसी नीची जाति वाले या नीची जाति वाला किसी ऊंची जाति वाले से प्रेम करने की हिमाकत ना करे। सदियों से ऐसा होता आ रहा है और आगे भी इसके थमने के कोई आसार नज़र नहीं आते। हालांकि, जब कभी भी ऑनर किलिंग के मामले होते हैं-मीडिया तूल ज़रूर देता है, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया लाइव कवरेज दिखाता है, तो प्रिंट मीडिया भी ऑनर किलिंग पर खोजपरक रपट लिखता है, लेकिन इसके बावजूद होता-जाता कुछ नहीं है। आज तक कभी भी खाप पंचायतों के अलंबरदारों और ऑनर किलिंग के दोषियों को सज़ा नहीं दी जा सकी है।
इसके पीछे दलील यही दी जाती है कि सबूतों और साक्ष्यों के अभाव में दोषी बच निकलने में कामयाब होते हैं, लेकिन इससे इतर सच्चाई यह है कि खाप पंचायत के $खौ$फ पर नकेल कसने के लिए न तो सरकारी मशीनरी प्रभावी कदम उठाने में रुचि लेती है, न ही समाज के रसू$खदार ऑनर किलिंग को बुराई के रूप में देखते हैं। यहां तक कि मीडिया का भी एक $खास तबका खाप के मामले में मौन साधना ही ज़्यादा बेहतरी समझता है।
इसकी कई वजहें हैं-पहली, खाप पंचायतों के क्षेत्र में काम करने वाले पुलिसक र्मियों, पुलिस के आला अधिकारियों और प्रशासनिक अधिकारियों में से ज़्यादातर स्थानीय जाति-समाज से संबंधित लोग ही होते हैं, ऐसे में वे खाप पंचायतों पर नकेल कसने के बजाय उन्हें मूक समर्थन देने में ही $खुद की भलाई समझते हैं। दूसरी बात उनकी सोच भी ऐसी ही होती है, कि वे स्वाभाविक तौर पर खाप को $गलत नहीं समझते। तीसरी, खाप क्षेत्रों में स्थानातंरित होकर आए प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी संख्याबल में कम होने के कारण खाप की मनमानी को मूक दर्शक बने देखते रहते हैं। अगर कोई अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर खाप पंचायतों के अमानुषिक $फैसलों और बर्बर कृत्यों को अपने स्तर पर रोकने की कोशिश करता है तो या तो उसका तबादला कर दिया जाता है, या उसे भी डरा-धमका कर चुप करा दिया जाता है। चौथी और सबसे अहम वजह यह है कि खाप पंचायत आमतौर पर जाति पंचायतें होती हैं। कई बार तो खाप पंचायत इतनी बड़ी होती हैं कि उसमें तीस-चालीस गांव या जहां तक उस अमुक जाति के लोग होते हैं वहां तक एक ही खाप पंचायत के हुक्म की बिना सोचे-समझे तामील की जाती है। ऐसे में खाप पंचायतों को $खुश रखकर राजनेता अपना वोट बैंक बढ़ाने की कोशिशों में लग रहते हैं। कोई भी राजनेता या राजनीतिक पार्टी खाप पंचायतों की मु$खाल$फत कर एक बड़े वोट बैंक को अपने हाथ से निकलने नहीं देना चाहती। ऐसे में कभी प्रत्यक्ष रूप से तो बहुधा परोक्ष रूप से राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं का वरद हस्त खाप पंचायत के सर्वेसर्वाओं पर रहता है। ऐसे में इस बात का सवाल ही नहीं उठता कि समय के साथ खाप पंचायतें कमज़ोर हों या ऑनर किलिंग के मामलों में कमी आए। सच तो यह है कि भारतीय समाज शुरू से ही जातियों-उपजातियों और गोत्रों में बंटा रहा है, ऐसे में भारतीय राजनीति भी जातिगत राजनीति के संरक्षण में ही पल्लवित-पुष्पित होती रही है। इस तरह पहले राजनीति वोट की राजनीति में तब्दील होती है, फिर जातीय राजनीति के रूप में बदल जाती है, और सबसे निचले स्तर तक उतरते उतरते यही राजनीति खाप राजनीति या खाप पंचायत का रूप धारण कर लेती है। ऐसे में राजनीति खाप के $खौ$फ को दिनों दिन और मज़बूत ही कर रही है, बजाय उसे कमज़ोर करने के।
खाप पंचायत के बारे में कुछ तथ्य
खाप पंचायतों का अस्तित्व मुख्यत: पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वी राजस्थान, हरियाणा और तमिलनाडु में है। तमिलनाडु में खाप पंचायतों को कट्टा पंचायत के नाम से जाना जाता है। ये पंचायतें अपने आदेश मनवाने के लिए ऑनर किलिंग, हुक्का-पानी बंद करना, गांव/समाज/जात/बिरादरी से निकालने और लेने-देने पर रोक लगाने का काम करती हैं। इनकी कोई वैधानिक स्थिति नहीं है, अत: खाप पंचायतें पूर्णत: अवैधानिक हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दिखाई उम्मीद की किरण
लंबे इंतज़ार के बाद आ$िखर १९ अप्रैल, १९११को खाप पंचायतों को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध ठहराया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण $फैसले में खाप पंचायतों को अवैध करार देते हुए उन्हें स$ख्ती से बंद करने के कहा है। कोर्ट ने ऑनर किलिंग को बर्बर और शर्मनाक बताया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इसकी आड़ में होने वाली ज़्यादतियों को रोकने में विफल प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को निलंबित किया जाए। जस्टिस मर्कंडेय काटजू और ज्ञानसुध मिश्रा की बैंच ने एक $फैसले में ये सख्त टिप्पणियां कीं। बैंच ने कहा कि उसने हाल ही के सालों में खाप पंचायतों (तमिलनाडु में कट्टा पंचायतों) के बारे में सुना है। ये विभिन्न जाति व धर्मों के विवाहित या विवाह की इच्छा रखने वाले युवक-युवतियों के $िखला$फ ऑनर किलिंग या अन्य ज़्यादतियों को बढ़वा देती हैं। ये लोगों की निजी जि़ंदगी में दखल देती हैं। बर्बर हत्या के बारे में बैंच के अनुसार-हमारा मानना है कि यह पूरी तरह से अवैध हैं। इसे तत्काल बंद करवाया जाना चाहिए । ऑनर किलिंग में कुछ भी सम्मानजनक नहीं है। हकीकत में यह बर्बर तथा शर्मनाक हत्या है। कोर्ट ने कड़े उपाय करने पर भी ज़ोर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खाप पंचायतों की ज़्यादतियों को रोकने के लिए प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों को कड़े उपाय करने चाहिए। यदि ऐसी कोई घटना होती है तो इसके लिए जि़म्मेदार लोगों के $िखला$फ $फौजदारी प्रक्रिया शुरू की जाए। राज्य सरकार को संबंधित जि़ले के मजिस्ट्रेट/कलैक्टर और एसएसपी/एसपी जैस अन्य अधिकारियों को निलंबित करने और चार्जशीट दायर करने के आदेश दिए जाएं। बैंच ने यह भी कहा कि यदि पूर्व सूचना के बावजूद अधिकारी ऐसी घटनाओं को रोक नहीं पाते हैं, तो सरकार को उनके $िखला$फ विभागीय कार्यवाही करनी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इस फैसले की प्रति सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेश के प्रमुख सचिवों, गृह सचिवों, डीजीपी व अन्य बड़े अधिकारियों को भेजी जाएं।
इसके बिना खाप का $खौ$फ नहीं होगा कम
सुप्रीम कोर्ट ने जो $फैसला सुनाया और पहल की वह प्रशंसनीय है, लेकिन इतिहास गवाह है कि कानून बनाने या लिखत-पढ़त की कानूनी रोक-बांध से कभी भी देश की रूढिग़त कुपंरपराओं पर लगाम नहीं लगाई जा सकी है। कानून आमतौर पर बुद्धिजीवियों की वैचारिक जुगाली, विधानसभा और लोकसभा में बहस और किताबों की शोभा बढ़ाने तक ही सिमट कर रह जाते हैं। किसी भी बड़े बदलाव के लिए और $खासतौर से शताब्दियों से समाज में गहरे पैठी खाप पंचायतों सरीखी मज़बूत कुपंरपराओं को जड़मूल से नष्ट करने के लिए पूरे देश को एकजुट होकर प्रयास करने होंगे, तभी देश के माथे से खाप रूपी कलंक को धोना संभव हो पाएगा।
पहली बात- देश में तमाम समाज सेवी, जिनमें अन्ना हज़ारे, अरुणा रॉय जैसी नामचीन श$िख्सयतों का भी शुमार होता है। सभी समाज सेवियों को चाहिए कि वे एकजुट होकर खाप पंचायतों को समूल उखाड़ फेंकने के लिए अपनी अपनी सामथ्र्यानुसार देशभर में आंदोलन चलाएं और सभी को खाप पंचायतों की करतूतों से वाकि$फ कराने के साथ ही खाप पंचायतों की मु$खाल$फत करने के लिए जन साधारण को जागरूक करें। अगर सभी समाज सेवी अपनी पूरी सामथ्र्य से खाप पंचायतों के अस्तित्व को $खत्म करने का बीड़ा उठा लें और देशव्यापी आंदोलन चलाते हुए साधारण और युवा शक्ति को अपने साथ मिला लें, तो कोई सवाल ही नहीं उठता कि खाप के $खौ$फ से आम जनता को निजात नहीं मिले।
दूसरी बात- अमतौर पर कोई भी अवैधानिक या अमानुषिक कृत्य होता है तो मानवाधिकर वाले चिल्ला-चिल्लाकर आसमान सिर पर उठा लेते हैं, लेकिन जब खाप पंचायतें ऑनर किलिंग को अंजाम देती हैं, तब ये मानवाधिकर वाले न जाने कहां घोड़े बेच कर सो जाते हैं। खाप पंचायतों की मु$खाल$फत के लिए मानवाधिकार आयोग को भी अपने स्तर पर पूरी ताकत झोंकनी होगी।
तीसरी बात- $िफल्मी हस्तियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाडिय़ों को चाहिए कि वे खाप पंचायतों को आमूल-चूल नष्ट करने के लिए प्रभावी कदम उठाएं। चूंकि $िफल्मी और खेल जगत की सैलेब्रिटीज़ को ही आज का युवा अपना आइडियल मानता है, ऐसे में अगर ये युवा शक्ति और अपने $फैंस से एकजुट हो खाप पंचायतों की मु$खाल$फत करने के लिए एकजुट हो आंदोलन चालने और खाप के ठेकेदारों को सबक सिखाने के लिए आह्वान करें तो निश्चित ही नतीजे सुखकारक होंगे।
चौथी बात- चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों को अपने वोट बैंक का लालच छोड़कर खाप पंचायत के नाम पर सरेआम बर्बरता से युवा प्रेमी-प्रेमिकाओं को जि़ंदा जलाने या किसी अन्य अमानुषिक तरीके से मासूम, निर्दोष प्रेमी जोड़ों की हत्या करने वालों या अन्य सामाजिक अथवा जातीय बंधन लगाने वाले खाप पंचायत के मुखियाओं/रसू$खदारों को उचित दंड देने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे, तब ही समाज को खाप रूपी नासूर से निजात मिलना संभव है।
पांचवीं बात- देश-दुनिया में बसे स्वदेसी धनकुबेरों को भी खाप पंचायतों पर लगाम लगाने के लिए आर्थिक मदद देने के साथ ही राजनीतिज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों पर खाप पंचायतों पर नकेल कसने के लिए दबाव बनाना होगा, क्योंकि राजनीति और राजनीतिज्ञों पर दबाव समूहों का प्रभावी असर होता है, और वे दबाव समूह की अनदेखी नहीं कर सकते।
महिला एवं बाल विकास विभाग में नियुक्तियों में मनमानी
परियोजना अधिकारियों एवं जि़ला कार्यक्रम अधिकारी की सांठगांठ से अपात्रों का चयन
हृ अनूप सक्सेना
राजगढ़। ग्राम पीपल्दी तहसील जीरापुर में आंगनवाड़ी केन्द्र पर सहायिका पद पर श्रीमति मंजू बाई पत्नि नारायण सिंह का नियुक्ति आदेश जो 5.4.2010 को परियोजना अधिकारी एकीकृत बाल विकास परियोजना जीरापुर द्वारा जारी किया गया था, उस आदेश के विरूद्ध धापूबाई पति रोशन सिंह द्वारा क्लेक्टर न्यायालय में प्रस्तुत अपील के दौरान पूर्व क्लेक्टर लोकेश जाटव ने परियोजना अधिकारी के विरूद्व गंभीर अनियमितताओं की पुष्टी कर विभागीय जांच संस्थित करने का आदेश दिया गया था। तत्कालीन कलेक्टर महोदय के स्थानांतरण के बाद क्लेक्टर न्यायालय का यह निर्णय महिला एवं बाल विकास विभाग के नीति निर्धारकों के लिये रद्दी का$गज़ से अधिक कुछ भी नहीं है और ज़ीरापुर के तत्कालीन परियोजना अधिकारी के विरूद्ध किसी भी प्रकार की कोई जांच अस्तित्व में नहीं आ सकी है। इस प्रकरण में अपीलार्थी धापूबाई द्वारा अधिवक्ता के माध्यम से क्लेक्टर न्यायालय में तर्क दिये गये, कि मंजूबाई कक्षा चौथी पास है। उसे नियुक्ति की पात्रता नहीं है, मंजूबाई का नाम ग्राम पीपल्दी की मतदाता सूची में भी नहीं है, न ही राशन कार्ड में नाम है। मंजूबाई समय की मांग की व निर्धारित समय तक कोर्ट के समक्ष लिखित में कुछ भी पेश नहीं कर सकी। क्लेक्टर न्यायलय ने माना कि ग्राम पीपल्दी की अंतिम सूची 18.7.2008 को जारी होने के बाद नियुक्ति आदेश 5.4.2010 को जारी किया गया। सूची जारी होने के बाद प्रकरण जि़ला स्तरीय आपति दावा निराकरण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाना था जो नहीं किया गया, अत्यन्त आपत्तिजनक है। अत: क्लेक्टर न्यायलय के निर्णय दि, 28.9.2010 में जि़ला स्तरीय आपति दावा निराकरण समिति के अनुमोदन के बिना नियुक्ति आदेश जारी करने के कारण संबंधित परियोजना अधिकारी एकीकृत बाल विकास परियोजना जीरापुर के विरूद्व विभागीय जांच अधिकारी तथा अनुविभागीय अधिकारी खिलचीपुर को प्रस्तुतकर्ता अधिकारी नियुक्ति किया था।
क्लेक्टर न्यायलय ने जि़ला कार्यक्रम अधिकारी महिला एवं बाल विकास ( तत्कालीन ) शेल श्रीवास्तव के कृत्य को भी गंभीर अनियमितता माना क्लेक्टर न्यायलय द्वारा मजंूबाई की नियुक्ति निरस्त करने के बाद विज्ञप्ति जारी कर नई नियुक्ति के आदेश दिये गये। विभागीय जांच की जानकारी लेने के लिये जब प्रभारी जि़ला महिला बाल विकास अधिकारी डिप्टी क्लेक्टर नीता राठौर को उनके मोबाइल क्र 0942481654 पर दिनांक16.5.2011 का दोपहर 12.48 पर प्रयास किया।
अपने कक्ष में बैठे रहने के बावजूद उनके द्वारा मोबाइल रिसीव नहीं किया गया। क्लेक्टर कार्यालय में नीता राठौर के पास विभागीय जांच का भी जि़म्मा है। समाज के चौथे स्तंभ से उनका दूरीयां बनाकर रखना महिला एवं बाल विकास विभाग जैसे राजगढ़ में बदनाम रहे विभाग को उनके द्वारा निष्पक्ष चलाये जाने पर प्रश्न चिन्ह निश्चित तौर पर लगता है।
ग्रम सेमलीकलां तहसील खिलचीपुर जि़ला राजगढ़ में म.प्र. शासन के निर्देशानुसार आंगनवाड़ी केन्द्र पर कार्यकर्ता पद पर संजू पति होकमचन्द्र मालवीय की नियुक्ति की गई। इसके विरूद्ध ज्योति पति महेन्द्र शर्मा द्वारा आपत्ति प्रस्तुत की गई कि संजू मालवीय का मूल निवासी $फजऱ्ी है, संजू मालवीय का पति राजस्थान पुलिस में आरक्षक होकर ग्राम जूलागढ़ जि़ला झालावाड़ मे रहते है व संजू पति होकमचन्द्र के पास दोनों स्थानों के राशनकार्ड हैं। जिला स्तरीय दावा आपत्ति एवं निराकरण समिति द्वारा जांच उपरांत संजू मालवीय के मूल अभिलेख चेक किये गये व सही पाये गये। 16.12.2000 को परियोजना अधिकारी एकीकृत बाल विकास परियोजना खिलचीपुर के आदेश क्रं. 664 से संजू मालवीय को नियुक्ति दी गई। इस नियुक्ति के विरूद्ध ज्योति शर्मा द्वारा कलेक्टर न्यायालय में अपील प्रस्तुत करने पर अपने वकील के माध्यम से होकमचन्द्र मालवीय को शासकीय कर्मचारी सिद्ध कर पदस्थापना झालावाड़ जि़ले में होना सिद्ध पाया गया। यह भी सिद्ध किया गया कि संजू लावीय का नाम बी.पी.एल सूची में नहीं है, फिर भी 10 अंक नियम विरूद्ध दिए गए हैं।
तत्कालीन कलेकटर लोकेश जाटव ने अपने निर्णय मे लिखा कि संजू मालवीय के द्वारा प्रस्तुत अभिलेखों से उसके ग्राम पंचायत सेमलीकला की स्थानीय निवासी होने की पुष्टी नहीं होती है।
इस संबंध में दावाआपत्ति निराकरण समिति के निर्णय का अवलोकन किया गया उल्लेखित है, कि संजू पति होकमचन्द्र का चयन नियमानुसार नहीं है। प्रकरण में पुन: जांच की जाये।
मूल प्रकरण में पृष्ठ 69 में जि़ला स्तरीय आपत्ति द्वारा निराकरण समिति के निर्णय उपरांत पृथक हेण्ड राईटिंग में लिखा गया, कि 5.12.2009 की बैठक में जांच उपरांत संजू पति होकमचन्द्र के मूल अभिलेख चेक किये गये, सही पाये गये। संजू मालवीय का नियुक्ति आदेश जारी करें। इस पर जि़ला कार्यक्रम अधिकारी शैल् श्रीवास्तव के हस्ताक्षर है कलेक्टर न्यायालय ने माना कि जि़ला स्तरीय आपत्ति दावा निराकरण समिति द्वारा पारित निर्णय के पालन मे मात्र जि़ला कार्यक्रम अधिकारी म.बा.वि. द्वारा ही मनमाने तरीके से जांच की गई इसकी पुष्टी जिलाचयन समिति से नही कराई गई नियुक्ति आदेश भी जारी कर दिया कलेक्टर द्वारा जि़ला कार्यक्रम अधिकारी म.बा.वि. (तत्कालन) शैल श्रीवास्तव के विरूद्ध प्रमुख सचिव महिला एवं बाल विकास विभाग म.प्र. शासन को पत्र क्र/मबावि/प्ब्क्ै/2010/3229 दिनांक 28.09.2010 लिखकर यथोचित कार्यवाही करने का अनुरोध किया तथा खिलचीपुर के तत्कालीन परियोजना अधिकारी एकीकृत बाल विकास परियेाजना के .सी. तिवारी को पत्र क्रं./मबावि/प्ब्क्ै/2010/3223 दिनांक 28.09.2010 के द्वारा कारण बताओ सूचना पत्र जारी कर जवाब मांग गया।
कलेक्टर न्यायालय के आदेश के बाद ज्योति शर्मा को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता नियुक्त कर दिया, परन्तु परियोजना अधिकारी एवं जि़ला कार्यक्रम अधिकारी के विरूद्ध जि़ला स्तर से लेकर शासन स्तर तक कोई कार्यवाही नहीं हो सकी।
लाल किला ध्वस्त कांग्रेस का हाथ मज़बूत
हाल ही में हुए पांच राज्यों के चुनावों के परिणामों पर नजर डालें तो सा$फ हो जाता है कि मतदात ने इस बार पैसा, जाति, शराब को दरकिनार कर काम करने वालों को सिरआँखों पर बिठाया है, वहीं आमजन के विरोध में काम करने वालों और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे दा$गी नेताओं का स$फाया करने में दिलचस्पी लेकर यह सा$फ कर दिया है कि आज भी लोकतंत्र में लोक के हाथ में ही तंत्र की कमान है। सबसे बड़ा चमत्कार तो पश्चिम बंगाल में हुआ है। वहाँ ३४ साल से राज्य पर कब्ज़ा जमाए वाम सरकार को राज्य की जनता ने सिरे से $खारिज कर सादगी पसंद और हर समय जनसेवा में लीन रहने वालीं ममता बनर्जी के सिर पर विजय का ताज रख दिया है। वहीं असम में सा$फ छवि वाले और काम करने के लिए ख्यात कांग्रेस के नेता तरुण गोगई को जिताकर उन्हें हैट्रिक लगाने का मौका दिया है। केरल में कांटे की टक्कर के बावजूद कांग्रेस ने बाज़ी मार ली है। तमिलनाडु की बात करें तो इस बार २ जी घोटाला करुणानिधि के लिए भारी पड़ा है, और जनता ने डीएमके को अंगूठा दिखाते हुए जयललिता को जीत का तोह$फा दिया है, जबकि पुडुचेरी में कांग्रेस की सत्ता को जनता ने उखाड़ फेंका है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भारी फेरबदल के क्या कारण रहे और जनता ने किसे, क्यों जिताया, इसी पर पेश है विश्लेषणात्मक टिप्पणी।
पश्चिम बंगाल की बात करें तो माकपा सरकार को किसानों की ज़मीनों का अधिग्रहण कर किसानों की अनदेखी करने और बिज़नेस टायकून्स से हाथ मिलाने का $खमियाज़ा भुगतना पड़ा है। वहीं सादा साड़ी वाली नीली हवाई चप्पल पहने हर समय आम आदमी के हित में सरकार के विरोध और आमजन के समर्थन में खड़ी हो जाने वालीं ममता दीदी जनता को अपनी-सी लगी हैं। इसी का नतीजा है कि इस बार ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने दमदारी से जीत दर्ज करवाते हुए करीब साढ़े तीन दशक से सत्ता पर काबिज़ माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार को न केवल हराया, बल्कि उसकी पार्टी के सभी दिग्गजों को चारों खाने चित कर दिया है। पश्चिम बंगाल में अभी तक रहे मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य अपनी जाधवपुर सीट तक नहीं बचा पाए, उन्हें तृणमूल के मनीष गुप्ता ने १६,००० के बड़े अंतर से हरा शर्मसार कर दिया, वहीं बर्धवान से उद्योग मंत्री निरुपम सेन को तृणमूल के रवि रंजन चट्टोपाध्याय ने पटखनी देते हुए ३६,४३८ मतों से करारी शिकस्त दी। माकपा नेता और राज्य के वित्त मंत्री असीम दासगुप्ता को तृणमूल के अमित मित्रा के हाथों करहादा सीट पर २६,१५४ मतों से हार का मुंह देखना पड़ा। शहरी विकास मंत्री अशोक भट्टाचार्य को सिलीगुड़ी सीट पर तृणमूल के रुद्र नारायण भट्टाचार्य ने ३६,१०० मतों से पट$खनी दी। माकपा के स्टार नेता गौतम देव को दमदम सीट से ब्रत्या बसु ने ३१,४९७ मतों से पराजित किया। माकपा के कद्दावर नेता कांति गांगुली रायदीघी सीट नहीं बचा सके, उन्हें तृणमूल के देवाश्री गांगुली ने हराया। इसके अलावा देबेश दास, आनंदी साहू, क्षीती गोस्वामी, सुदर्शन राय चौधरी और रंजीत खुंडू जैसे दिग्गजों ने भी तृणमूल की ''बोदलाब की बोयारÓÓ के सामने घुटने टेक दिए। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल में लाल किला पूरी तरह से ढह गया है। पिछली बार सन २००६ के विस चुनाव से तुलना करने पर सा$फ हो जाता है कि तृणमूल कांग्रेस को इस बार१५४ सीटों का अतिरिक्त $फायदा मिला है, कांग्रेस के पाले में भी २१ सीटों का इज़ा$फा हुआ है, जबकि १३६ सीटों का नुकसान माकपा को झेलना पड़ा है, सहयोगी भी ३१ सीटों के घाटे में हैं, अन्य को भी ८ सीटें गंवानी पड़ी हैं।
इस तरह इस बार माकपा का सूपड़ा सा$फ हो गया है, वहीं तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस $फायदे में रही हैं। तमिलनाडु में कांग्रेस को दा$गी द्रमुक का साथ देने का भरपूर $खमियाज़ा भुगतना पड़ा। द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन को महज़ ३१ सीटें मिलीं, वहीं अन्नाद्रमुक को १४६ सीटों पर जनता ने जिताया। जनता जानती है कि करुणानिधि और जयललिता में से कोई भी दूध का धुला हुआ नहीं है, दोनों के ही दामन दा$गदार हैं, लेकिन वर्तमान हालात में करुणानिधि की पार्टी के ए.राजा का २ जी घोटाले में लिप्त होना, यहां तक कि उनकी बेटी कनिमोझी और उनकी पत्नी का नाम भी इस घोटाले में आने के बाद से जनता के पास करुणानिधि की द्रमुक को हराने के सिवाय और कोई चारा नहीं था, इसका $फायदा जयललिता की अन्नाद्रमुक को मिला है। सही मायनों में यह जयललिता की जीत न होकर, करुणानिधि की हार है। भले ही जयललिता को स्पष्ट बहुमत मिल गया हो, लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि जनता भ्रष्ट नेताओं को सबक ज़रूर सिखाती है। ऐसे में जयललिता को सोच-समझकर राज्य को चलाना होगा, न कि बदले की राजनीति से प्रेरित होकर। कुल मिलाकर एआईडीएमके को ८९ सीटों का $फायदा हुआ है, जबकि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी डीएमके को ७३ सीटें गंवानी पड़ीं, वहीं कांग्रेस के हाथ से भी २९ सीटें निकल गई हैं। अन्य पार्टियों को १३ सीटों का फायदा हुआ है।
केरल में कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतान्त्रिक मोर्चा (यूडीए$फ) ने १४० विस सीटों में से ७२ पर जीत दर्ज करवाते हुए माकपा नीत वाम लोकतान्त्रिक मोर्चा (एडीएफ) को सत्ता से बेदखल कर दिया है।
हालांकि, कांटे की टक्कर में एलडीए$फ ने ६८ सीटों पर कब्ज़ा जमाने में कामयाबी हासिल की। केरल में कांग्रेस १४ सीटों के $फायदे में है, वहीं कांग्रेस के सहयोगियों को १७ सीटों का लाभ मिला है, माकपा को १६ और अन्य पार्टियों को १५ सीटें गंवानी पड़ी हैं।
असम में ७६ सीटें जीतते हुए कांग्रेस ने राज्य में तीसरी बार भी अपना विजयी रथ जारी रखने में कामयाबी हासिल की है। प्रतिद्वंद्वी अगप को निर्णायक पटखनी देने वाले तरुण गोगोई की जीत के पीछे कई कारण हैं।
अलगाववादी संगठन उल्फा को वार्ता के लिए तैयार करने और दिवालिया स्थिति तक पहुंच चुके असम को फिर से पटरी पर लाने वाले मुख्यमंत्री तरुण गोगोई प्रशासकीय क्षमता और राजनीतिक बुद्धिमत्ता के अलावा अपनी सौम्य मुस्कान, बेबाकी और स्वच्छ छवि के लिए भी मशहूर हैं। असम में कांग्रेस के खाते में २५ अतिरिक्त सीटें आई हैं, एजीपी को १४ और अन्य पार्टियों को ११ सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है।
पुडुचेरी में कुल ३० विस सीटों में से २० पर अन्नाद्रमुक और सहयोगी विजयी रहे हैं। यहाँ कुल ३० विस सीटों में से एआईएनआरसी १५ सीटों के $फायदे में हैं, एआईडीएमके को २ सीटों का $फायदा हुआ है। कांग्रेस को ३ और अन्य पार्टियों को ७ सीटों की हानि हुई है।
कांग्रेस की स्थिति
इस विस चुनावों में कांग्रेस की स्थिति मज़बूत हुई है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को २१ सीटों का, केरल में १४ सीटों का, असम में सबसे ज़्यादा २५ सीटों का $फायदा हुआ है। हालांकि, करुणानिधि प्रेम उसे तमिलनाडु में भारी पड़ा और वहां कांग्रेस को २९ सीटों से हाथ धोना पड़ा। पुडुचेरी में भी उसे ३ सीटों का घाटा हुआ है। २००९ की तुलना में अब कांग्रेस ज़्यादा मज़बूत स्थिति में है। कांग्रेस या कांग्रेस नीत सरकारें पहले की अपेक्षा अब भारत के ज़्यादा राज्यों पर शासन करती नज़र आती हैं। अगर भविष्य में मनमोहन सरकार, कलमाडी, ए राजा की तरह ही अपनी पार्टी या अपने सहयोगी पार्टियों के दा$िगयों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने का सिलसिला जारी रखती है, तो उसकी स्थिति आने वाले चुनावों में और भी मज़बूत होने के आसार नज़र आते हैं।

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