कानून के डंडे से खुन्नस का खेल
हृ जैनेन्द्र
भोपाल। भोपाल शहर की पहचान बन चुके मिनाल मॉल को इतने बड़े पैमाने पर कार्रवाई करके आनन-फानन में तोडऩे से बिल्डर्स, राजनीतिक हलकों और बुद्धिजीवियों के साथ ही आम जनता के ज़ेहन को भी एक ही सवाल मथ रहा है, कि आ$िखर पिछले 25 सालों से शहर की छाती पर शान से खड़े मिनाल मॉल के अवैध होने की सुध सरकार को अब जाकर ही क्यों आई? इसी सवाल के सटीक जवाब को खोजती और इस पूरे प्रकरण के सभी पहलुओं पर गहराई से प्रकाशमान करती खोजपरक रपट।
भोपाल की पहचान बन चुकी भेल क्षेत्र के जेके रोड और अयोध्या बाईपास के मध्य स्थित मिनाल रेज़ीडेंसी (जो अब मिलान मॉल के नाम से जानी जाती है) को सरकार ने अवैध करार देते हुए, दो दिन तक ध्वस्तीकरण कार्रवाई की। इस दौरान मिनाल की सभी 125 दुकानों को मटियामेट कर दिया गया। हालांकि, $िफलवक्त मिनाल स्थित मकानों को नहीं तोड़ा गया है। असली मसला यह है कि गोविंदपुरा के तहसीलदार मुकुल गुप्ता ने मिनाल मॉल का सीमांकन किया था, जिसमें 140 एकड़ भूमि पर अवैध कब्ज़ा पाया गया था। इसके बाद अवैध अतिक्रमण को हटाने की मुहिम शुरू की गई। मिनाल रेजीडेंसी/ मॉल की विशालता और भव्यता का इस बात से सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इसे ध्वस्त करने के लिए 104 किलो बारूद, 10 जेसीबी, 20 डंपर के साथ ही पुलिस, नगर निगम और विद्युत विभाग के करीब 500 लोगों की मदद ली गई और इस कार्रवाई को अंजाम देने में 6 और 7 मई 2011 के दो दिन लगे। इसके अलावा सरकार ने सा$फ कर दिया है, कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में आया $खर्चा बिल्डर से वसूला जाएगा। यह $खर्चा अनुमानित 25 लाख आंका जा रहा है। सरकार ने अवैध अतिक्रमण को ध्वस्त किया, यह तो स्वागत योग्य बात है, लेकिन मिनाल को बने लगभग 25 साल पूरे होने के बाद ही अचानक से प्रशासन नींद से जागा और आनन-फानन में कार्रवाई कर दी गई। सरकार का यह रवैया कई सवाल पैदा करता है।
आ$िखर इन सरकारों ने क्या किया...
सबसे पहले इस बात पर ज़रा $गौर कर लिया जाए कि मिनाल के 25 सालों के दौरान राज्य में सत्ता किस-किस के हाथ में रही। मौजूदा भाजपा सरकार पिछले 10 सालों से मध्य प्रदेश की कमान संभाले बैठी है, सबसे पहले लगभग एक साल तक भाजपा की स्टार नेत्री उमा भारती मु यमंत्री के पद को सुशोभित करती रहीं। उनके किसी विवाद में फंसने पर उन्हें हटा कर पार्टी ने सरकार की बागडोर बाबूलाल गौर के हाथ में थमा दी, लेकिन वे सरकार को ज़्यादा दिन तक काबू में रहीं रख पाए। नतीजा शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बना दिया गया, जो कि वर्तमान में भी सत्ता पर काबिज़ हैं। इससे पहले की बात करें तो लगभग एक दशक तक मध्यप्रदेश पर कांग्रेस पार्टी के दिग्विजय सिंह ने बतौर मुख्यमंत्री शासन किया। उससे भी पहले इतिहास के पन्नों को पलटें तो सामने आता है कि भाजपा के सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री रहे। सब जानते हैं कि मिनाल मॉल के निर्माण की बात आजकल की बात नहीं है। मिनाल मॉल के निर्माण के दौरान तत्कालीन सरकार ने सत्ता का दमखम क्यों नहीं दिखाया, तब किस तरह इतने बड़े पैनाने पर अवैध इमारत खड़ी करने दी गई। तब क्यों कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए एक बड़े बिल्डर को इतने बड़े पैमाने पर निर्माण करने की इजाजत दे ही गई, छूट दी गई। क्या तब राज्य सरकार के इमारत निर्माण से संबंधित नियम-कायदे वर्तमान में लागू नियम-कायदों से अलग थे? इसका दो टूक उत्तर है, नहीं। ज़ाहिर है यह सब उस समय की सरकारों, नौकरशाहों और रसू$खदारों की मिलीभगत से ही हुआ होगा। तब सरकार की नींद क्यों नहीं टूटी? उस समय अवैध को वैध करार देकर किन नेताओं, आला अ$फसरों ने मिनाल निर्माण की $फाइलों पर सही के हस्ताक्षर करते हुए बेरोक-टोक मिनाल मॉल को बनाने की इजाज़त दी थी। अगर यह मान भी लिया जाए कि उस समय की राज्य सरकार की मदद से ही अवैध निर्माण करवाया गया था, तो मौजूदा शिवराज सिंह चौहान की भाजपा नीत सरकार को लभगभ 10 साल होने को आए, पर उसे भी मिनाल के अवैध कब्ज़े की $खबर अब लगी, और फिर यकायक 6 मई 2011 को ऐसी कौन-सी आ$फत गले आ पड़ी या ऐसा कौन-सा भूचाल आ गया कि सरकार ने आनन-फानन ही मध्य प्रदेश $खासकर भोपाल की पहचान बन चुके मिनाल मॉल के बड़े हिस्से को देखते ही देखते ज़मींदोज़ कर दिया और दूसरे दिन भी इसी काम के लिए उसने एड़ी से लेकर चोटी तक का ज़ोर लगा दिया।
कहीं ये रंजिश की खुन्नस तो नहीं...
$गौरतलब है, कि मिनाल मॉल राज बिल्डर्स द्वारा निर्मित है। राज ग्रुप प्रदेश का प्रमुख बिल्डर ग्रुप है। इसी राज ग्रुप ने मीडिया में भी पैठ बनाई हुई है। राज एक्सप्रेस मध्यप्रदेश के प्रमुख दैनिक अ$खबारों में से एक माना जाता है। यह राज ग्रुप की ही मिल्कियत है। राज टीवी के नाम से केबल चैनल में भी ग्रुप का अच्छा-$खासा दखल है। राज एक्सप्रेस के संपादक पद पर जब से रवींद्र जैन आए हैं, $खासतौर से तभी से यह अ$खबार $खास तेवर अपनाए हुए है। पिछले एक साल की बात करें, तो अ$खबार ने कई बड़े नेताओं की मुखर होकर मु$खाल$फत की। राज एक्सप्रेस की कई $खबरों ने सत्तारूढ़ नेताओं, मंत्रियों, अधिकारियों के काले चिट्ठे जनता के सामने खोल के रख दिए। राज ग्रुप की ओर से बतौर बिल्डर चाहे जैसे निर्माण करवाए गए हों, लेकिन उसके अ$खबार राज एक्सप्रेस ने तो पत्रकारिता के मानदंडों को न केवल पूरा किया, बल्कि उसमें प्रकाशित $खबरों से साफ हो जाता है, कि वह पत्रकारिता के सिद्धांतों पर पूरी तरह से खरा उतरा। राज एक्सप्रेस के संपादक रवींद्र जैन कितना भी लिखें, लेकिन अगर अ$खबार के मालिक की सहमति न हो तो सरकार की पोल खोलती सटीक $खबरों का प्रकाशित होना संभव नहीं होता। इस नज़रिये से देखा जाए तो, न केवल संपादक रवींद्र जैन बल्कि राज ग्रुप की ओर से भी समाज से गंदगी को सा$फ करने की मुहिम चलाई गई, और भ्रष्टाचारियों पर शिंकजा कसने की पुरज़ोर कोशिश की गई। सूत्रों का तो यही कहना है कि अ$खबार की यही दमदारी रसू$खदारों को रास नहीं आई और इसका $खामियाजा मिनाल मॉल को उठाना पड़ा। इस तरह सरकार की ओर से उठाया गया यह कदम पूरी तरह रंजिशभरा लगता है। और करोड़ों के निमार्ण कार्यों को ज़मीन चटाकर खुन्नस निकाली गई।
यदि वाकई मध्यप्रदेश सरकार अतिक्रमण हटाने के मामले में गंभीर है, और राज एक्सप्रेस समाचार पत्र में छपी $खबरों के बाद सत्ता में बैठे रसू$खदारों के काले चिट्ठे खुलने के बाद सत्ताधारी सरकार की ओर से मिनाल मॉल को ध्वस्त करना उसकी ओर से बौखलाहट भरा कदम नहीं है, तो उसे शहर के दूसरे अवैध निर्माणों को भी तुरंत प्रभाव से ध्वस्त करना चाहिए। शहर में अन्य कई बिल्डर्स ने भी पैर पसारे हुए हैं, और अगर सरकार ईमानदारी से सभी बिल्डर्स द्वारा कराए गए निर्माण कार्यों की ईमानदारी से जाँच करवाए, तो ज़्यादातर में उसे $खामियां मिल जाएंगी। ऐसे में उसे सि$र्फ मिनाल मॉल को तोड़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री करने के बजाय, पूरे शहर और, यहां तक कि पूरे मध्य प्रदेश में अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने के लिए मुहिम छेडऩी चाहिए। जबकि मध्य प्रदेश सरकार ज़ोर-शोर से मिनाल मॉल के एक बड़े हिस्से को ध्वस्त करने के बाद शांत नज़र आ रही है, इससे तो आम आदमी के ज़ेहन में यही शंका ज़ाहिर होती है कि सरकार की मंशा मिनाल मामले में सा$फ नहीं है।
सा$फगोई उन्हें रास न आई
राज एक्सप्रेस के सम्पादक पत्रकार रविन्द्र जैन के द्वारा स्वस्थ पत्रकारिता के साथ-साथ भारत माता के सच्चे सपूत होने का $फजऱ् अदा करते हुए, भ्रष्टों द्वारा देश व जनता की लूट करने वालों को जनता व सरकार के समक्ष नंगा किया जाता रहा। यदि उनके द्वारा जनता के सामने लाए गए भ्रष्ट कार्यों की जांच करवा कर उसमें सुधारात्मक कार्यवाहियां की जातीं तो प्रदेश की जनता को कुछ राहत की सांस मिलती। मगर स्वर्णिम मध्यप्रदेश का नारा देने वाले प्रदेश में गले-गले तक भ्रष्टाचार के गटर में डूबे मंत्री व अधिकारियों को यह रास नहीं आया।
'राज एक्सप्रेसÓ में घटित इस कांड ने एक बार फिर साबित कर दिया, कि पत्रकारिता का संस्थान यदि किसी पत्रकारिता के पवित्र पेशे से जुड़े व्यक्ति के स्वामित्व में है, तो वही सही व स्वतंत्रता से 'पत्रकारिता के गदाÓ से भ्रष्टाचार रूपी राक्षसों का संहार कर सकता है, मगर अ$फसोस कि अब हमारे देश में स्वस्थ पत्रकारिता से जुड़े कलमकारों का टोटा होता जा रहा है, और बहुधा आर्थिक कारणों से कालोनाईज़र, ठेकेदार, डाक्टर, जौहरी, व्यापारी आदि व्यक्तियों ने पत्रकारिता/माध्यम के संस्थानों को अपने-अपने पेशों की सुरक्षात्मक ढाल के रूप में उपयोग किया जा रहा है। सरकारी अधिकारी व मंत्री आदि भी उनके इन कार्यों में मददगार साबित हो रहे हैं। पत्रकारिता क्षेत्र में लद गए वह ज़माने, जब महात्मा गांधी, मालवीया जी, लाला लाजपतराय, भगत सिंह, माखनलाल, सुभाष बोस ने अपने विचारों को अपनी-अपनी लेखनी के माध्यम से सदियों से दासता की बेडिय़ों से जकड़ी भारत की जनता में जागृति पैदा करके स्वतंत्रता देवी के दर्शन कराए। अब भारत मां के सपूत अन्ना हज़ारे ने दानव भ्रष्टाचार से भिडऩे का मन बना लिया है। देश के प्राय: सभी वर्गों के लाखों-करोड़ों लोग उनके साथ हो लिए हैं। यदि रविन्द्र जैन जैसे चंद और कलम के धनी उनका साथ देकर देश में से भ्रष्टाचार की गंदगी को निकाल फेंकने हेतु कमर कस लें, तो केवल एक दो दशकों के अंदर ही पूरे भारत की जनता को वास्तविक आज़ादी मिल जाएगी, और आम जनता हर तरह से राहत महसूस करने लगेगी।
हृ सम्पादक, $खबरयार
अरुण सहलोत ने रविन्द्र जैन को हटाया
राज एक्सप्रेस में मध्य प्रदेश सरकार के $िखला$फ सरकार की $गलत नीतियों के $िखला$फ $खबरें लिखने की कीमत संपादक रविन्द्र जैन को चुकानी पड़ गई है। सरकार की आंख की किरकिरी बन चुके रविन्द्र जैन पर दबाव बनवाने के लिए सरकार ने पहले राज एक्सप्रेस के मालिक और सीएमडी अरुण सहलोत के शापिंग मॉल को निशाना बनाया। इसके बाद दबाव में आए अरुण सहलोत ने संपादक रविन्द्र जैन को अखबार से एक झटके में अलग कर, अपनी हताशा का परिचय भी दे दिया।
राज एक्सप्रेस के भोपाल, ग्वालियर, इंदौर और जबलपुर एडिशनों के पेज नम्बर तीन पर एक $खबर छापकर रविन्द्र जैन को पद का दुरुपयोग करने के कारण तत्काल प्रभाव से हटाए जाने की जानकारी राज ग्रुप के सीएमडी अरुण सहलोत के हवाले से दी गई है। इससे सा$फ है कि सरकार की $गलत नीतियों के $िखला$फ संपादक की बलि लाला जी ने ले ली है। मध्य प्रदेश सरकार भी अपने मिशन में कामयाब दिख रही है, जो एंटी $खबरें छपने से रविन्द्र जैन से बुरी तरह नाराज़ व आहत नज़र आती थी।
माना जा रहा है कि अरुण सहलोत मॉल गिरने के बाद बुरी तरह बौखलाए और घबराए हुए हैं। रविन्द्र जैन के संपादकत्व में $खबरों की ताप से मध्य प्रदेश सरकार बुरी तरह झुलसी हुई थी। इसी के चलते मॉल को निशाना बनाया गया। सरकार के $िखला$फ आग उगलने वाले संपादकों-पत्रकारों को निपटाने का लंबा इतिहास रहा है। कहा जा रहा है कि मॉल तोड़े जाने से घबराए अरुण सहलोत ने भी सरकार के इशारे पर रविन्द्र जैन की बलि चढ़ा दिया है।
$फजऱ्ी चिकित्सक गांवों में खुलेआम करते इलाज
ठ्ठ रोज़ाना सैंकड़ों मरीज़ों की जान से हो रहा खिलवाड़ ठ्ठ आयुक्त स्वास्थ्य विभाग के आदेशों की मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थय अधिकारी द्वारा खुली अव्हेलना
हृ अनूप सक्सेना
राजगढ़। तत्कालीन आयुक्त लोक स्वास्थय एवं परिवार कल्याण विभाग अलका उपाध्याय द्वारा आदेश क्र ए$फ 292/1044 दि, 25.2.2008 जारी कर $फजऱ्ी चिकित्सकों झोलाछाप डाक्टरों, मध्यप्रदेश में चिकित्सा व्यव्साय कर रहे अन्य पंजीकृत चिकित्सकों के विरूद्व कार्यवाही के निर्देश दिये थे। आदेश में $खुलासा किया गया था, कि ऐसे चिकित्सक ऐलौपेथी पद्धति की औषधियां रोगियों को दे रहे हैं, ऐसे कई प्रकरण सामने आये हैं, जहां अपात्र $फजऱ्ी चिकित्सकों द्वारा $गलत इंजेक्शन देने से रोगियों को एब्सेस गेंगरीन आदि रोग हो गया, तथा कई प्रकरणों में रोगी की मृत्यु तक हां गयी। मध्यप्रदेश रजिस्ट्रीकरण तथा अनुज्ञापन अधिनियम 1973 की धारा 3 के अनुसार नर्सिंग होम निजी चिकित्सालय परामर्श केन्द्र औषधालय प्रयोगशाला एक्सरे डेटल क्लीनिक उक्त एक्ट के अन्तरगत रजिस्ट्रीकरण अनुज्ञप्ति के बिना नहीं खोले जा सकते हैं, न ही चलाये जा सकते हैं। उक्त धारा 3 का उल्लंघन करने पर जुर्माने तथा 3 माह तक के कठोर कारावास का प्रावधान है। ऐलोपैथी चिकित्सा पद्वति में केवल वे ही चिकित्सा व्यवसाय हेतु पात्र हैं, जो मेडीकल काउन्सिल आ$फ इंडिया एक्ट 1956 की धारा 15 (1) में उल्लेखित अर्हता धारी होकर मध्यप्रदेश मेडिकल काउन्सिल एक्ट 1987 के अन्तरगत पंजीकृत हो, अपात्र व अपंजीकृत व्यक्तियों द्वारा ऐलोपैथी चिकित्सा पद्वति में चिकित्सा व्यवसाय करने पर मध्यप्रदेेश मेडीकल काउन्सिल एक्ट 1987 धारा 24 के अन्तरगत 3 वर्ष तक के कठोर करावास एवं 5,000 रूपय तक जुर्माना का प्रावधान है, तथा अभिदान डाक्टर का उपयोग केवल मान्य चिकित्सक पद्वतियों में रजिस्टर्ड मेडीकल प्रेक्टिशनर ही कर सकते हैं। अपात्र व्यक्ति द्वारा उक्त अभिदान का उपयोग चिकित्सा शिक्षा संस्था नियंत्रण अधीनियम 1973 की धारा 8,(2) के अन्तरागत 3 वर्ष कारावास या रूपए 50,000 जुर्माने या दोनों से दण्डनीय रखा गया है। आयुक्त द्वारा जारी इस आदेश के बाद क्लेक्टर राजगढ़ की टीप दि, 29,8,2009 जारी होने के पालन में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थय अधिकारी द्वारा जारी आदेंश क्र/पंजी/ नर्सिगहोम / एक्ट 1997 /2009 दि, 3.9.2009 द्वारा $फजऱ्ी चिकित्सकों पर जांच व कार्यवाही किये जाने हेतू जि़ला स्तरीय समिति अपर राजगढ़ उप पुलिस अधीक्षक राजगढ़ तथा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थय अधिकारी को शामिल कर बनायी गयी अधिकारी पुलिस तथा खण्ड स्तर पर अनुविभागीय अधिकारी राजस्व अनुविभागीय अधिकारी पुलिस तथा खण्ड चिकित्सा अधिकारी के दल बनाये गये थे। तथा $फजऱ्ी चिकित्सकों के विरूद्व कार्यवाही कर कार्यवाही से अवगत कराने के निर्देश दिये गये थे। जि़ले में 300 से अधिक $फजऱ्ी झोला छाप चिकित्सकों के विरूद्व न तो जि़ला स्तर नहीं खण्ड स्तर पर बनाये गये जांच दल किसी भी प्रकार की कोई कार्यवाही का साहस दिखा सके हैं।
इनका कहना
जि़ले में झोला छाप $फजऱ्ी चिकित्सकों की पहुंच बहुत उपर तक है। नरसिंहगढ़ में एक अवैध क्लीनिक पर कार्यवाही के प्रयास किये, तो विधायक से लेकर स्वास्थय मंत्री तक के सि$फारिशी $फोन आ गये, इन $फजऱ्ी चिकित्सकों पर कार्यवाही कर कौन बुराई मोल लेगा।
डा.सी.डी. शर्मा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थय अधिकारी राजगढ

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