
स्वयंभू बाबा रामदेव उ$र्फ रामकिशन यादव
हृ लिमटी खरे
इक्कीसवीं सदी में स्वयंभू योग गुरू बनकर उभरे रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने बीमारियों के सटीक इलाज के लिए योग को ही सर्वोपरि बताते हैं। आरंभ में तो लोग इनकी ओर आकर्षित नहीं हुए किन्तु कालांतर में कुछ चुनिंदा धार्मिक चैनल्स के स्लाट $खरीदकर बाबा रामदेव ने लोगों को इसका आदी बना दिया। इसके बाद रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव का जादू सर चढ़कर बोलने लगा। लेकिन योग के इस विस्तार की आड़ में बाबा रामदेव ने दवाओं का लंबा चौड़ा कारोबार खड़ा कर लिया है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि छोटे से जि़ले में बाबा रामदेव की दवाओं की फ्रेंचाईज़ी लेने के लिए आठ लाख रूपयों की दवाएं एक साथ $खरीदनी होती है, जिसमें आठ से बारह $फीसदी ही कमीशन मिलता है।
रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव को जैसे ही लोकप्रियता मिलना आरंभ हुई उन्होंने कसम खाई कि जब तक देश के हर आदमी को वे निरोग न कर देंगे तब तक देश की धरा के बाहर कदम न रखेंगे। बाबा को उनके अनुयाईयों ने समझाया कि आ$िखर क्या कह गए बाबा। न कभी ऐसा वक्त आएगा और न ही बाबा विदेशी वादियों की सैर कर पाएंगे। फिर अचानक बाबा ने विदेश की ओर रू$ख कर लिया। इसके बाद बाबा के लग्गू भग्गुओं ने उन्हें राजनीति का ककहरा पढ़ाना आरंभ किया। बाबा ने सियासतदानों की कालर ही खीचना आरंभ कर दिया। बाबा ने एक और बयान सियासी हवा में उछाला कि विदेशों में जमा काले धन को भारत लाने वे सड़कों पर उतरेंगे। समय बीतता गया और दो साल पूरे होने को हैं, देश की सड़कें आज भी रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव का इंतज़ार कर रही हैं।
रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव के इस कदम से कांग्रेस में बौखलाहट बढ़ गई है। इसका कारण यह है कि वर्तमान में काला धन ही कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के लिए गले की फांस बना हुआ है। कांग्रेस के इक्कीसवीं सदी के चाणक्य एवं महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव के $िखला$फ मोर्चा संभाल लिया है, अब तय मान लीजिए कि बाबा रामदेव की लोकप्रियता का ग्रा$फ तेज़ी से नीचे आना सुनिश्चित ही है। दिग्गी राजा ने बाबा रामदेव से पूछा है कि वे पता कर लें, कि कहीं उन्हें चंदा देने वाले ने तो काला धन उन्हें नहीं दिया है।उधर रामकिशन यादव उर्फ बाबा रामदेव ने दिग्गी राजा के आरोपों के बाद तलवार पजाते हुए कहा है कि उन्होंने अपने ट्रस्ट को मिलने वाले धन का हिसाब आना पाई से सरकार को दे दिया है अब समय है कांग्रेस का कांग्रेस को चाहिए कि वह भी अपने से जुड़े सारे ट्रस्ट के हिसाब किताब को सरकार को दे दे। राजा दिग्विजय सिंह के तीर कहां जाकर किसे और कितने समय बाद घायल करते हैं इस बात के बारे में इस नश्वर दुनिया में सिर्फ और सिर्फ एक ही आदमी जानता है और वह है $खुद राजा दिग्विजय सिंह। $गौरतलब होगा कि 2008 में रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने $खुद ही स्वीकार किया था, कि उनका सालाना करोबार एक लाख करोड़ रूपयों का होने वाला है। बाबा रामदेव ने स्वीकारा था कि पतांजली योग के साम्राज्य में अप्रत्याशित तौर पर बढ़ोत्तरी दर्ज की गई थी। इसकी शाखाएं ब्रिटेन, अमेरिका, थाईलेण्ड, नेपाल, उत्तर और दक्षिण अफ्रीका, दुबई आदि में खुल चुकीं हैं।
उत्तराखण्ड में कनखल के दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट से आरंभ हुई रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव की छोटी सी दुकान आज लाखों करोड़ रूपयों की हो चुकी है। $गौरतलब है कि 2003 में बाबा रामदेव और उनके सखा आचार्य बाल कृष्ण इसी ट्रस्ट के तीन कमरों में मरीज़ों का उपचार किया करते थे। यक्ष प्रश्न तो यह है कि रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव के हाथों में आ$िखर कौन सा जादुई जिन्न आ गया, जिसे रगड़कर महज़ आठ सालों में ही उन्होंने कई सौ करोड़ का साम्राज्य स्थापित कर लिया है?
वर्तमान मे रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव के पतंजलि योग ग्राम का रकबा दस बीस बीघा नहीं वरन आठ सौ बीघा है, जहां हर प्रकार की सुविधाओं के साथ $फाईव स्टार संस्कृति वाला पंचकर्म सेंटर शोभायमान है। इतना ही नहीं यहां अत्याधुनिक शहर की स्थापना भी की गई है। इसके कनखल में ही अलावा सर्वप्रिय विहार कालोनी में तीन बड़ी अट्टालिकाएं हैं, जिनमें इनके रिश्तेदार निवास करते हैं, और गोदामों की जगह भी यहीं बनाई गई है।
धंधे में रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव किसी पर विश्वास नहीं करते हैं। उन्होंने अपने परिवार के लोगों को ही प्रशासनिक पदों पर बिठा रखा है अपने साम्राज्य में। कनखल में दिव्य योग ट्रस्ट मंदिर में दस बीघे में बाबा के भाई रामभरत का प्रशासनिक कार्यालय और गोदाम स्थापित है। इसके अलावा पतंजलि की अन्य इकाईयों में पतंजली आयुर्वेद लिमिटेड का साम्राज्य हरिद्वार में फैला हुआ है। यहां हरिद्वार के पुराने औद्योगिक क्षेत्र में बी 38 और ए 1 में दो कारखाने हैं, जिनमें ढाई सौ से ज्य़ादा आयुर्वेदिक उत्पाद बनाए जाते हैं। इन दोनों का सालाना कारोबार कितने अरब का है पता नहीं। इसके अलावा पतंजलि $फूड और हर्बल पार्क के लिए रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने यहीं पचास एकड़ का रकबा $खरीद रखा है। इसमें दस इकाईयां अभी चालू हैं, बाकी आरंभ होने की बाट जोह रहीं हैं। कहते हैं इस पूरी इकाई का प्रारंभिक निवेश ढाई सौ करोड़ रूपयों से ज्य़ादा है।
गायों के लिए रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने पतंजलि गोशाला की स्थापना भी की है। बाबा के गायों के बाड़े में पांच सौ से भी अधिक गायें शोभा बढ़ा रही हैं, जिनमें से विदेशी नस्लों की गायों की तादाद बहुतायत में बताई जाती है। बाबा ने गायों के लिए सैकड़ों बीघा ज़मीन रख छोड़ी है। बाबा की संपत्ति में हिमाचल प्रदेश के सोलन का नाम भी जुड़ जाता है। कहते हैं रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने पिछले साल स्काटलैण्ड में एक द्व़ीप भी $खरीद लिया है।
पतंजली नर्सरी और कारखाने की स्थापना दिल्ली राजमार्ग पर दो सौ बीघा ज़मीन में की गई है। यहां औषधीय पुष्पों और पौधों की खेती की जाती है। यहां नर्सरी के साथ ही साथ च्यवनप्राश और साबुन बनाने का कारखाना स्थापति है। दिल्ली राजमार्ग पर ही रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने पतंजली योगपीठ चरण एक में अत्याधुनिक चिकित्सालय, विशाल देखने योग्य भव्य भवन और पतंजली विश्विद्यालय की प्रस्तावना देखते ही बनती है। यह पूरा इलाका डेढ़ सौ एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है। इसी के दूसरे चरण में साढ़े चार सौ एकड़ भूमि को आरक्षित रखा गया है। इसमें दस हज़ार लोगो को एक साथ ठहराने और योग करने की अत्याधुनिक सुविधा की व्यवस्था की गई है। यहां भवन देखते ही बनता है , और तो और अत्याधुनिक अनुसंधान केंद्र भी यहां पर है।
रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव अब घिरते नज़र आ रहे हैं। धर्मार्थ काम की आड़ में बाबा रामदेव ने जो झाड़ काटे हैं, वे अब कांग्रेस की नज़रों में गडऩे लगे हैं। कल तक मलाई खाने वाले बाबा को अब कांग्रेस के प्रबंधक ज़मीन चटवाकर ही मानेंगे, क्योंकि बाबा ने काले धन की बात को फैलाकर उसकी दुखती रग पर हाथ रख ही दिया है। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बयान के बाद अब आयकर विभाग ने भी अपनी नज़रें तिरछी करना आरंभ कर दिया है। यह सच है कि रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव आयकर विवरणिका दाखिल करते हैं, किन्तु धर्मार्थ संस्था को दर्शाकर बाबा करोड़ों रूपयों के आयकर जमा करने से $खुद को बचाते फिर रहे हैं। $गौरतलब होगा कि रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव के शिविर में शामिल होने और आर्युवेदिक दवाओं को $खरीदने के लिए आम आदमी को $खासी रकम चुकानी पड़ती है। इतना ही नहीं रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव की संस्था विदेशों से भी मोटा चंदा काट रही है।
लोगों की धारणा बन चुकी है कि रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव अब $गरीबों के लिए काम करने के बजाए राजवैद्य बन चुके हैं जिनके पास पहुंचना $गरीब $गुरबों के बस की बात नहीं रही। बाबा अब अमीरों के हाथों का खिलौना बन चुके हैं। वैसे भी किसी धर्मार्थ संस्था के सर्वेसर्वा का महज़ आठ सालों में जीरो से हीरो बनना और जनसेवा का काम करने वाली संस्था के पास इतनी कम अवधि में लाखों करोड़ रूपयों की संपत्ति का होना अपने आप में एक अजूबे से कम नहीं माना जा सकता है। वैसे भी रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव का विवादों से बड़ा पुराना और गहरा नाता है। बाबा ने 2003 में अपना काम आरंभ किया और 2005 में ही दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट के मातहत कर्मचारियों में से 113 कर्मचारियों ने न्यूनतम मज़दूरी मिलने का मामला सार्वजनिक किया था। इसके बाद 2006 में वाम नेता सीपीआईएम की वृंदा करात ने रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव के ऊपर यह आरोप लगाकर सनसनी फैला दी थी, कि दिव्य योग मंदिर में बनने वाली दवाओं में मनुष्य और जनवरों की हड्डियों का प्रयोग किया जाता है। बाद में उत्ताखण्ड सरकार की क्लीन चिट के बाद मामला शांत हो पाया था।
रामकिशन यादव उ$र्फ बाबा रामदेव ने न्यायालयों को भी आड़े हाथों लेने से गुरेज़ नहीं किया। जुलाई 2009 में जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिक सेक्स को जायज़ ठहराया था तब बाबा ने इसका कड़ा विरोध दर्ज कराया था। बाबा ने चुनिंदा ब्रांड के कोल्ड ड्रिंक्स के $िखला$फ सार्वजनिक तौर पर अभियान छेड़ रखा है। इतना ही नहीं बाबा के द्वारा कैंसर और एड्स जैसी बीमारी के योग से इलाज के मामले में भी बाबा पर सवाल उठे, जिनका जवाब बाबा ने आज तक नहीं दिया है। अब ऊंट पहाड़ के नीचे आ चुका है। बाबा रामदेव अब सियासी गोदे (अखाड़े) में उतरे हैं। बाबा को सपने में उम्मीद नहीं होगी कि उनकी पहली भिड़ंत ही दिग्विजय सिंह जैसे घाघ पहलवान से हो जाएगी। या तो बाबा चारों $खाने चित्त मिलेंगे, या फिर दस जनपथ (सोनिया गांधी का सरकारी आवास) में पूंछ हिलाते नज़र आएंगे।
भारत की अनेकता में एकता का सबूत पेश करते साईकिल सवार अमनदीप सिंह
हृ गुरूबचन सिंह सोच
भोपाल। आज़ाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री आदरणीय पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ''भारत की खोजÓÓ में लिखा था कि हमारा भारत एक महान देश है, जहां विभिन्न प्रकार की जातियां, विभिन्न स्थानों के निवासियों की विभिन्न भाषायें, उनके विभिन्न प्रकार के रीतिरिवाज, तीज त्यौहार हंै, परन्तु फिर भी वे एक हैं। यही है अनेकता में एकता। बाल अवस्था में उस समय हम इस अनेकता में एकता का भाव अर्थ नहीं समझ पाते थे, मगर अब साक्षात प्रमाण पाकर हमें पता लगा कि हमारे इस भारत देश का सीना इतना विशाल है, जो इस में अनेकानेक विभिन्नताओं को समेटे हुये है, परन्तु यह सब एक ही सूत्र में मणी मनकों की भांति पिरोये हुये हैं। श्रीमान पाठकों की सेवा में इस एकता में अनेकता और अनेकता में एकता का प्रमाण प्रस्तुत करते हुये एक ऐसी शख़्सीयत को पेश किया जा रहा है, जो अपनी मिसाल वह $खुद ही है। वह है अमन शान्ति साईकिल यात्री अमनदीप सिंह। अमनदीप सिंह का जन्म 13/08/1960 को बैंगलोर के निकट ग्राम सिकतिरूपल्ली में श्रीराम रैड्डी के घर हुआ जो हिन्दू तैलुगू हैं। वालदैन ने उसका नाम महादेव रैड्डी रखा और वह कन्नड़ में ही दसवीं जमात तक पढ़ पाये। जागरूक धार्मिक विचारों के महादेव को सुसंगत मिल जाने पर वह 13/04/1975 बैसाखी पर्व पर $खालसा सज कर $खालसा पंथ में शामिल हो गया। उसके परिवार वालों को यह अच्छा न लगा, जिस से वह घर परिवार को छोड़ कर बाहिर रहने लगा और उस ने पंजाबी और गुरूवाणी का अध्ययन कर लिया। वह अपने गांव नगर छोड़ पंजाब चला गया और वहां श्री आनन्दपुर साहिब में जा कर रहने लगा। उसने सिक्ख मिश्नरी कालेज से फिर (पंजाबी में) दसवीं पास की और अकाल अकादमी से 3 वर्षीय कोर्स कर के लैक्चरार बन गया। वहीं पर जांलधर जि़ले के ग्राम ''ग्रांवांÓÓ की एक पंजाबी मूल की सिक्ख परिवार की लड़की रणजीत कौर से उसका आनन्द कारज सम्पन्न हुआ। रणजीत कौर बी.ए.पास है।
वर्ष 1993 में वे बैंगलोर चले गये और वह दोनों पति पत्नि गुरूनानक मिशन, लाल बाग, सिद्धपुरम बैंगलोर में अध्यापन कार्य करने लगे। $खास बात यह कि तेलुगू मूल का अमनदीप सिंह वहां प्राईमरी क्लासों के बच्चों को पंजाबी पढ़ाता है ,और पंजाबी मूल की रणजीत कौर मिडिल स्कूल के बच्चों को कन्नड़ पढ़ाती है। कालान्तर में अमन दीप सिंह के वालदैन और भाईयों ने अपने $खून को पहचान लिया और अपने मु$गालते को जान लिया 1 उन्हों ने न केवल उससे मुलाकात की बल्कि उसको परिवार की सम्पत्ति में से का$फी कुछ दिया और ज़मीन आदि दे कर साधन सम्पन्न बना दिया। अमनदीप सिंह के 2 बच्चे हंै, एक, बेटा है जो चिकित्सा शिक्षा गृहण कर रहा है, और दूसरी, बेटी जो पढ़ाई समाप्त करने उपरान्त उसकी शादी कर दी गर्ह है, और पंजाब में अपने ससुराली परिवार में रहती है। श्री गुरूनानक देव जी ने इस वन्दना, भ्रात्रिभाव, सद्चरित्र, सज्जनता, एकईश्वरवाद का सन्देश संसार में प्रचरित करने हेतु अपने जीवन में चार लम्बी यात्रायें (उदासीयां) की थी। अमनदीप सिंह जी उन के नकशे कदम पर चलने का प्रयास करते हुये गत 01-01-2008 को अपने घर से साईकिल पर निकले भारत भ्रमण हेतु। साईकिल पर पीछे छोटे तीन थैलों में अपना सामान, पहनने ओढऩे के वस्त्र, खाना बनाने हेतु ज़रूरी बर्तन स्टोव कुकर आदि, साईकिल मुरम्मत पंचर हवा हेतु सामान, सुरक्षा दृष्टि से कृपाण,पानी हेतु डोल बाल्टी आदि मिला कर 35 किल्लो वजन के साथ चल दिये। उनका जनता के नाम सन्देश है ''नशा मुक्त समाज का निर्माणÓÓ वह जहां भी जाते हैं, केवल 3 दिन रूकते हैं और वहां के स्कूलों के प्रबंधकों से मिल कर समय आदि तय कर के स्कूलों के बच्चों को सद्विचारों से अवगत करा कर सम्बाकू शराब आदि नशे की वस्तुओं से दूर रहने की शिक्षा देते हैं। अमनदीप सिंह अब तक करीब एक लाख किलो मीटर की यात्रा कर चुके हैं, जिस में उन्हें 4 साईकिल बदलने पड़े और 12 टायर $खराब हो चुके हैं, और 6 टयूबें बदलवानी पड़ी हैं। अब तक वह 24000 स्कूलों में अपने प्रवचन दे कर इसी विषय के इश्तहार बांट चुके हैं। यह अपने साईकिल यात्रा से भारत के विभिन्न नगरों कस्बों प्रान्तों में दौरा कर चुके हैं जिन में ये उल्लेखनीय हैं:-
केरल, तमिलनाडू, पांडिचेरी, करनाटक, गोवा, दमन दीव, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, आन्ध्राप्रदेश, मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, उत्तरखण्ड, उत्तरप्रदेश बिहार, झारखण्ड, ओड़ीसा, पश्चिमीबंगाल। इस लम्बे दौरे से वापिस जाते समय वह भोपाल में रूके हैं, और अब इन्दौर, ओंकारेश्वर, बुरहानपुर, हज़ूर साहिब (नान्देड़) के रास्ते वह वापिस बंैगलोर अपने घर जांएगे।
उनके बताने अनुसार वह हौटल पर खाना नहीं खाते और लाज आदि जगहों पर नहीं रूकते । वह मन्दिर गुरूद्वारा, सराय, धर्मशाला, या रेल्वे प्लेट$फार्म आदि जगहों पर रूक लेते हैं और मन्दिर गुरूद्वारा आदि स्थानों से गुरूका लंगार मिले तो छक कर पेट भर लेते हैं वरना स्वंय खाना बना कर ही खाते हैं। उनसे साक्षात्कार करने जब मैं गया, तो वह आडियो वीडियो पर गुरूवाणी के कीर्तन का आनंद लेते हुये, अपने लिये भोजन ही तैयार कर रहे थे।
श्रीअमनदीप सिंह जी को तमिल भाषा केवल बोलने व समझने का अभियास है, जबकि निम्रलिखत पांच भाषायें वह बोलना, समझना, लिखना ,पढऩा भी जानते हैं। इसी लिये वह हर कहीं किसी भी प्रदेश में जाकर स्कूली बच्चों को मु$खातिब हो कर उन्हें नशों की बुराईयां बताकर इनसे दूर रहने की सीख दे पाते हैं :-
कन्नड़, तेलगू, अंग्रेज़ी, पंजाबी, हिन्दी
एक $खास बात जो हमारे सामने आई, वह है कि वह किसी से किसी प्रकार का चन्दा, डोनेशन आदि नहीं लेते और ईश्वर के सहारे ही अपने मिशन पर आगे बढ़ते जा रहे हैं। ईश्वर की कृपा से ही इस मिशन की पवित्रता और इस के गुणों के ग्राहक उनकी ज़रूरतों को पूरा कर देते हैं।
शिव के राज में हर हाथ में हथियार
देश के हृदय प्रदेश को शांति का टापू माना जाता रहा है। मध्य प्रदेश के रहवासी इस बात पर गर्व किया करते हैं, कि उनके सूबे में आपराधिक गतिविधियां अन्य राज्यों की तुलना में का$फी कम रही हैं। यह अलहदा बात है कि पिछले कुछ सालों से शासन प्रशासन की अनदेखी के चलते हृदय प्रदेश भी सुरक्षित राज्यों की $फेहरिस्त से बाहर हो गया है। एक तर$फ तो शासन प्रशासन द्वारा मेले ठेले, शादी ब्याह, जलसों त्योहारों में शस्त्रों विशेषकर फायरिंग का उपयोग रोकने के लिए सख़्ती बरती जाती है, वहीं दूसरी ओर हृदय प्रदेश के निज़ाम शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली चाल चरित्र और चेहरे को मूल मंत्र मानकर चलने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार द्वारा ही सूबे में बंदूक और गोलियों की बिक्री बढ़ाने का तु$गलकी $फरमान सूबे की शांत $िफज़ा में ज़हर घोलने का काम कर रहा है। मध्य प्रदेश सरकार के गृह विभाग द्वारा मई 2010 में एक आदेश जारी कर सभी को चौंका दिया था। मज़े की बात तो यह है कि विपक्ष में सुसुप्तावस्था में बैठी कांग्रेस ने भी इसका विरोध करने की ज़हमत नहीं उठाई। मई में जारी इस आदेश का मज़मून कुछ इस तरह था कि प्रदेश के प्रत्येक लाईसेंसी हथियार विक्रेता को हर साल पच्चीस हथयार और ढाई हज़ार कारतूस बेचना अनिवार्य है, अन्यथा उसकी अनुज्ञा (लाईसेंस) का नवीनीकरण अगले साल नहीं किया जा सकेगा। एक तर$फ तो सरकार द्वारा हथियार की अनुज्ञा के नियम बेहद सख़्त बनाए गए हैं, जिससे हथियारों का लाईसेंस रसू$खदारों, पहुंच संपन्न, धनाड्य और राजनैतिक दम$खम वालों के घर की लौंडी बनकर रह गए हैं। आम ज़रूरतमंद को हथियार का लाईसेंस लेने में पसीने आ जाते हैं। प्रदेश की राजधानी भोपाल का ही उदहारण लिया जाए तो पिछले साल भोपाल में शस्त्रों के लिए 1916 आवेदन वैध पाए गए थे, जिसमें से 1603 लाईसेंस निरस्त कर दिए गए थे। बचे महज़ 313 नए शस्त्र लाईसेंस ही बनाए गए थे। भोपाल में असलाह की बिक्री के लिए सोलह दुकानों को लाईसेंस प्रदाय किया गया है। नए $फरमान के मुताबिक इन दुकानों को चार सैकड़ा बंदूकें और चालीस हज़ार कारतूस बेचना अनिवार्य है। इसके अलावा एक शस्त्र लाईसेंस पर साल भर में महज़ 25 कारतूस ही मिल सकते हैं। इस तरह 313 नए हथियारों के लाईसेंस पर सात हज़ार आठ सौ पच्चीस कारतूस ही चढ़ सकते हैं।
इन परिस्थितियों में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा शांति के टापू पर आग्नेय अस्त्रों का ज़$खीरा एकत्र करने के बेबुनियाद मार्ग प्रशस्त किए जा रहे हैं। इस तरह हथियार और कारतूस की बिक्री में प्रतिस्पर्धा पैदा करने की $गरज़ से लक्ष्य निर्धारित करना कहीं से भी तर्क संगत नहीं माना जा सकता है। प्रदेश सरकार का यह तर्क भी गले नहीं उतरता है कि इस तरह लक्ष्य निर्धारित करने से हथियार विक्रेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। साथ ही साथ आर्म्स डीलर की अनुज्ञा लेने वाले दुकानदार जो अपने प्रतिष्ठान बंद रखते हैं, वे भी अपनी दुकानें खोलकर हथियारों को बेचने में दिलचस्पी दिखाएंगे। शिवराज सिंह यह भूल गए, कि यह आदेश दूध मेवा प्रमोट करने के लिए नहीं, वरन् हथियारों का उपयोग करने को प्रोत्साहित करने के लिए है, जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।
इस आदेश के बाद अपने प्रतिष्ठान का आर्म्स डीलर लाईसेंस जि़ंदा रखने के लिए दुकानदार एक दूसरे के उपभोक्ताओं के नाम से $फजऱ्ी तरीके से कारतूस उसी तजऱ् पर बेचेंगे जिस तरह मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों के लक्ष्य को पूरा करने के लिए मोबाईल रिटेलर करता है। गौरतलब है कि मोबाईल की सिम के निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के लिए मोबाईल का छोटा रिटेलर $फजऱ्ी नामों से सिम $खुद ही खरीदकर लक्ष्य पूरा कर देता है। इसमें सिम खरीदी के लिए निर्धारित प्रपत्र और वेरी$िफकेशन भी नहीं हो पाता है। इसी तरह जीवन बीमा के निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के लिए भी एजेंट या विकास अधिकारी द्वारा छोटे छोटे बीमे $फजऱ्ी नामों से कर दिए जाते हैं, ताकि एजेंट की एजेंसी को बचाए जा रखा सके।
वैसे भी आम आदमी अपने घरों में आग्नेय शस्त्रों का रखना उचित नहीं मानता है, क्योंकि शांति के टापू में इन अस्त्रों का क्या काम। यह अलहदा बात है कि धनाड्य और पहुंच संपन्न लोग अपने रसूख को जतलाने के लिए छतों पर बैठकर फुल से दुनाली सा$फ कर समूचे मोहल्ले में अपना ज़लज़ला कायम रखना चाहते हैं। अब जिस भी नागरिक के घर पर उसे चौबीसों घंटे हथियार के दीदार होंगे, उसे देखकर उसका मन हिंसक होना लाजि़मी है। जिस तरह किसी को अगर बार बार मदिरा के इर्द गिर्द घुमाया जाए तो वह मदिरा का $गुलाम हो जाता है, इसी तरह हथियारों को देखकर हिंसा के बढऩे की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है। वैसे भी हिंसक वीडियो गेम्स और सीआईडी जैसे सीरियल्स ने बच्चों के कोमल मन में बंदूक और हिंसा को स्थान दे ही दिया है। अगर शिवराज सिंह सरकार इस निर्णय पर अटल रहेगी, तो वह हिंसा को ही बढ़ाने के मार्ग प्रशस्त करेगी।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि आग्नेय अस्त्रों का उपयोग हमेशा से देश की रक्षा के लिए निर्धारित लोगों के द्वारा ही किया जाता रहा है। रसू$खदारों के घरों में हथियार शोभा की वस्तु हुआ करते रहे हैं। इसके अलावा डकैत, बदमाश, जरायम पेशा लोगों द्वारा अवैध तरीके से हथियार रखे जाते रहे हैं। मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार के इस तरह के तु$गलकी $फरमान के बाद मध्य प्रदेश के हर जि़ले, कस्बे में हथियारों से निकलने वाली गोलियां और शोर सुनाई दे तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आश्चर्य तो तब होता है जब सूबे में विपक्ष में बैठी कांग्रेस भी इस तरह के संवेदनशील मसले पर चुप्पी साध लेती है। मतलब सा$फ है कि कांग्रेस भी भाजपा के मध्य प्रदेश को बिहार बनाने के मिशन में अपना मौन समर्थन दे रही है।

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