कांग्रेस की प्रयोगशाला बने राजा दिग्विजय सिंह
भारतीय जनता पार्टी ने भी कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बयानों की तीखी निंदा करते हुए उन्हें देशद्रोही ताकतों के हाथों की कठपुतली बताया है। भाजपा ने कहा कि हिंदू, हिंदुत्व, भगवा और संघ परिवार को बदनाम कर कांग्रेस महासचिव एक वर्ग विशेष को खुश करना चाहते हैं, वे आगामी चुनावों में वोटों की तुष्टिकरण की नीति के चलते ही अर्नगल बयान दे रहे हैं।
हृ लिमटी खरे
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और राघोगढ़ के राजा दिग्विजय सिंह की ज़़ुबान फिसल रही है या वे किसी योजना के तहत ऐसी बयानबाज़ी पर उतर आए हैं, जैसी हर एक राजनीतिक दल में कुछ सड़कछाप नेता करते रहते हैं? वे अपने ही दल में किसी उकसाऊ राजनीति के शिकार तो नहीं हो रहे हैं? या वे कांग्रेस में ऊब गए हैं, जिसके बाद कोई नेता मैं नहीं तो तू नहीं की रणनीति पर उतर आता है? वे अपने ही दल में मुंह फेरकर हंसी के पात्र तो बन ही चुके हैं साथ ही वह उस हाशिये पर भी पहुंच चुके हैं जहां उनकी न हिंदुओं में उपयोगिता बची है और न ही कांग्रेस को उनकी कार्यशैली से मुसलमान वोटों का कोई लाभ मिलने वाला है। इन दोनों वर्गों में दिग्विजय सिंह की छटपटाहट भरी राजनीतिक चाल को आसानी से पकड़ लिया गया है, इसीलिए उनसे सवाल पूछा जा रहा है कि आ$िखर राजनीति में वे कहां खड़े हैं, और वे जो कर रहे हैं उसमें उनके लिए राजनीतिक संकट आने पर क्या कांग्रेस उनके साथ खड़ी रह पाएगी? यदि कांग्रेस का इतिहास उठाकर देखा जाए, तो इस प्रकार के अनेक नेता गुमनामी में जा चुके हैं। कांग्रेस ने पहले उनका भरपूर इस्तेमाल किया और जब उसकी लपटें कांग्रेस की तर$फ आर्इं तो अपने बचाव में कांग्रेस ने सबसे पहले उसी को उन लपटों के हवाले कर दिया, यानि न बांस रहा और न बांसुरी। कई दृष्टांत ऐसे हैं जो कांग्रेस की इस राजनीति को सहजता से स्थापित करते हैं। इसके शिकार कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह भी हो चुके हैं, किंतु वे एक कदम चलते थे तो बीस कदम आगे की सोच लेते थे। उन्होंने इसी राजनीतिक चतुराई से अपने को लंबे समय तक बचाए रखा, और जब उनकी उपयोगिता शून्य की ओर बढ़ी, तो अर्जुन सिंह को भी सड़क दिखा दी गई। वैसे भी अर्जुन सिंह की भी उपयोगिता उस समय $खतम हो गई थी, जब उनको बसपा के एक मामूली कार्यकर्ता ने लोकसभा चुनाव में उन्हें पराजित कर दिया था, इसमें यह अलग बात है कि वहीं के कांग्रेसियों ने भी उस बसपाई को जिताने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। दिग्विजय सिंह और अर्जुन सिंह की राजनीति में $फर्क इतना है कि काफी समय तक उनके हर बयान के साथ समूची कांग्रेस खड़ी दिखाई देती थी, किंतु दिग्विजय सिंह के साथ ऐसा होता नहीं दिख रहा है। अनेक आशंकाएं दिग्विजय सिंह पर मंडरा रही हैं,क्योंकि वे अपने बयानों के बाद अकेले ही नजऱ आ रहे हैं। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव बनने के बाद से वे लगातार विवादस्पद बयान देते और फिर उनसे पलटते आ रहे हैं?
मुंबई में ताज होटल के हमलावरों से मोर्चा लेते हुए शहीद हुए एटीएस ची$फ हेमंत करकरे का ही मामला लिया जाए। दिग्विजय सिंह का पहले कहना था कि करकरे ने उन्हें $फोन किया था, और कॉल रिकार्ड पेश करते वक्त $फरमा रहे हैं कि उन्होंने ही करकरे को पहले कॉल लगाई थी। आश्चर्य तो तब होता है जब उनका $फोन एटीएस के मुंबई स्थित मुख्यालय में शाम पांच बजकर 44 मिनट पर पहुंचता है, वह भी इंटरनेट पर एटीएस के पीबीएक्स नंबर पर। कॉल रिकार्ड बताता है कि इस नंबर पर 381 सेकेंड बात हुई है। सवाल उठता है कि जब उस दिन दोपहर को ही मुंबई में ताज होटल पर आतंकवादियों ने कब्जा जमा लिया था, तब क्या एटीएस ची$फ करकरे के पास आतंकियों से निपटने और रणनीति बनाते हुए इतना समय था कि वे मोबाइल या $फोन पर दिग्विजय सिंह से $खुद को हिंदूवादियों से मिलने वाली धमकियों का दुखड़ा रोएं? इसके अलावा दिग्विजय सिंह ख़्ाुद यह भी स्वीकार कर चुके हैं कि वे करकरे से कभी मिले भी नहीं थे, तब करकरे क्या पहली ही बातचीत में उनसे अपने मन की ऐसी बातें कह गए होंगे? दिग्विजय सिंह पहले तो कॉल रिकार्ड नहीं मिलने की बात कर रहे थे? उन्होंने कौन सी जादू की छड़ी से रिकार्ड तलब कर लिया?
इसके बाद उन्होंने महाराष्ट्र के गृह मंत्री आरआर पाटिल से माफी की मांग करने में भी देरी नहीं की। वे भूल गए कि इस मांग का असर कहां तक जाएगा। इसका एनसीपी और कांग्रेस के संबंधों पर तो कोई असर दिखाई नहीं दिया, अलबत्ता दिग्विजय सिंह ज़रूर अलग-थलग पड़ गए हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू के इस दावे में दम लगता है जिसमें उन्होंने कहा है कि कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को एक मिशन पर लगाया हुआ है जिसका मकसद भ्रष्टाचार से लोगों का ध्यान बांटना है। हिंदू आतंकवादियों वाले बयान से दिग्विजय सिंह क्या हिंदुस्तान के मुस्लिम समाज के हीरो बन गए हैं? देश-विदेश के किसी भी राजनेता ने या पाकिस्तान को छोड़कर किसी भी देश ने ऐसा बयान नहीं दिया। जैसाकि कुछ समय के पूर्व तक दिग्विजय सिंह की छवि कुछ और थी, क्योंकि उन जैसे नेताओं के व्यक्तित्व से ऐसे बयान और आरोप बिल्कुल भी मेल नहीं खाते हैं।
उल्लेखनीय है कि मुंबई आतंकी हमले के बाद शिवराज पाटिल को केंद्रीय गृहमंत्री की कुर्सी छोडऩी पड़ी थी। महाराष्ट्र में सियासत करने वाले अब्दुल रहमान अंतुले ने भी मुंबई हमले पर विवादस्पद बयान दिया था, जिससे कांग्रेस को अंतुले से किनारा करना पड़ा था। यदि आपको याद हो तो देश के बहुचर्चित शाहबानो तलाक मामले में इसी कांग्रेस ने राजीव गांधी मंत्रिमंडल में शामिल केंद्रीय मंत्री आरि$फ मोहम्मद $खान से पहले तो तलाक के $िखला$फ बयान दिलवा दिया, और जब इस पर तू$फान उठा तो कांग्रेस ने आरि$फमोहम्मद $खान के बयान से अपने को अलग कर लिया। यही नहीं केंद्रीय मंत्री आरि$फमोहम्मद $खान से इस्ती$फा ले लिया गया और शाहबानों मामले में सुप्रीम कोर्ट के $फैसले को संसद में संशोधन विधेयक के जरिए प्रभावहीन कर दिया गया। इस घटनाक्रम में आरि$फमोहम्मद $खान जैसा दिग्गज और योग्य लीडर निपट गया। वह दिन और आज का दिन है आरि$फमोहम्मद $खान देश तो छोडि़ए अपने राज्य उत्तर प्रदेश और अपने ही जि़ले बहराइच के राजनीतिक परिदृश्य से ही ओझल हो चुके हैं। कांग्रेस को इस बात का कोई पछतावा नहीं है कि उसने आरि$फमोहम्मद $खान को शाहबानो मामले में बलि का बकरा बनाया। कांग्रेस अब आरि$फमोहम्मद $खान का नाम भी लेने से डरती है, उन्हें कांग्रेस में वापस लेने की बात तो बहुत दूर है।
वे यह जानते हुए भी कि यह कांग्रेस है, जिसमें डूब जाने वाले या डुबो दिए जाने वाले का पता नहीं चल पाया, ऐसी राजनीतिक गलतियां करते जा रहे हैं, जिनका कांग्रेस साथ देने वाली नहीं है। अर्जुन सिंह का मध्य प्रदेश की चुरहट लाटरी जांच ने भी हर वक्त पीछा किया है और जब भी अर्जुन सिंह थोड़ा तेज़ चले, तुरंत इस लाटरी की $फाइल खोल दी गई। अनेक बार चुरहट लाटरी कांड को अर्जुन सिंह के $िखला$फ इस्तेमाल किया गया है। यूं तो जैन हवाला मामले में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को अपनी सरकारी कुर्सियों से हाथ धोना पड़ा था, किंतु वह भ्रष्टाचार से संबंधित मामला था जिसमें सामूहिक रूप से नेताओं की बलि हुई थी, लेकिन दिग्विजय सिंह और आरि$फमोहम्मद $खान का मामला इनसे भिन्न है। इसमें एक नेता मुसलमानों की नजऱों में सदा के लिए गिराया गया और दूसरा नेता हिंदुओं की नजऱों में नाहक ही विलेन बन रहा है, जिसे मुसलमान भी गले लगाने को तैयार नहीं हो सकते, क्योंकि वे समझते हैं कि दिग्विजय सिंह ने हेमंत करकरे या हिंदू संगठनों को लेकर ज़हरीले बयानों का क्या मकसद है।
इस तरह की राजनीति में पडऩे का $खामियाज़ा कांग्रेस भी बुरी तरह भुगत चुकी है तब भी दिग्विजय सिंह ने सबक नहीं लिया। पूरा देश जानता है कि अयोध्या में राम जन्म स्थान के विवादित स्थल पर पहले तो राजीव गांधी ने शिलान्यास करा दिया, जिससे देश का हिंदु रातों-रात हिंदू समाज भाजपा से किनारा कर कांग्रेस की तर$फ जा खड़ा हुआ, और मुसलमानों में इसे लेकर हुए विवाद से डरकर शिलान्यास रूकवा दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि शिलान्यास कराने से मुसलमान कांग्रेस से भाग गए और शिलान्यास रूकवाने से जो हिंदू समाज कांग्रेस की ओर झुका था, वह भी भाग गया। कांग्रेस को दोनों में कोई नहीं मिला। कांग्रेस ने इसका असर अपने लोकसभा चुनाव पर भी देखा। इसके बाद कांग्रेस अब दूसरे दलों की मोहताज बनकर रह गई है। आज भी मुसलमान अयोध्या मामले के लिए शिलान्यास को ही जिम्मेदार मानते हैं, जोकि राजीव गांधी ने कराया था। कांग्रेस के ये वो $फैसले हैं जिनसे कांग्रेस ने अपना ही बंटाधार किया है। राजनीतिक विशलेषणकर्ता कह रहे हैं कि दिग्विजय सिंह, आरि$फमोहम्मद $खान की तरह ही कांग्रेस की एक प्रयोगशाला बन रहे हैं, जो आने वाले समय में न घर के होंगे और न घाट के।
भारतीय जनता पार्टी ने भी कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के बयानों की तीखी निंदा करते हुए उन्हें देशद्रोही ताकतों के हाथों की कठपुतली बताया है। भाजपा ने कहा कि हिंदू, हिंदुत्व, भगवा और संघ परिवार को बदनाम कर कांग्रेस महासचिव एक वर्ग विशेष को खुश करना चाहते हैं, वे आगामी चुनावों में वोटों की तुष्टिकरण की नीति के चलते ही अर्नगल बयान दे रहे हैं। भाजपा ने दिग्विजय सिंह को एक चुका हुआ नेता बताते हुए कहा है कि गुजरात, विकास के मामले में केवल कांग्रेस शासित राज्यों से ही नहीं अपितु विदेशों में ही प्रतिष्ठा हासिल कर चुका है। गुजरात को बदनाम करने के लिए दिग्विजय सिंह की बेतुकी बात नज़रअंदाज़ करने की बात कहते हुए भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि उन्होंने बटाला हाउस कांड पर भी संदेह ज़ाहिर कर सुरक्षा बलों के मनोबल को तोडऩे का काम किया है।
क्रिकेट वल्र्डकप की चपेट में हमारे नौनिहाल
हृ जैनेन्द्र कुमार
क्रिकेट दुनियाभर में का$फी लोकप्रिय खेल बन गया है। इसी के चलते क्रिकेट प्रेमियों को हर चार वर्षों के अंतराल पर होने वाले वल्र्ड कप क्रिकेट के मैचों को देखने का बेसब्री से इंतज़ार रहता है। भारत की बात करें तो यहाँ क्रिकेट एक महोत्सव की तरह है, एक संस्कृति की तरह है, एक उन्माद की तरह है, एक पैशन की तरह है। भारत में हर खास और आम के लिए, हर उम्र के लोगों के लिए क्रिकेट राष्ट्रीय शगल सरीखा है। क्रिकेट की लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है, कि एक बार शास्त्रीय गायन के आधार स्तंभ माने जाने वाले पं.भीमसेन जोशी ने सचिन को देखा तो अपने को रोक नहीं सके। वे लपक कर सचिन के पास पहुंचे और बाल सुलभ उत्सुकता के साथ कहा, मैं पंडित भीमसेन जोशी...आपका बहुत बड़ा $फैन हूँ। ऐसे में क्रिकेट वल्र्ड कप इंडिया में होने वाला है। वल्र्ड कप क्रिकेट १९ फरवरी से २ अप्रैल तक चलेगा। ज़ाहिर है ऐसे में हर भारतीय, $खासकर युवा और किशोर वर्ग वल्र्ड कप क्रिकेट के मैचों को देखने और उसका आनंद लेना चाहेगा। क्रिकेट वल्र्डकप की चपेट में...
यहाँ $गौर करने की बात यह है कि यही वक्त १०वीं और १२वीं के स्टूडेंट्स के लिए सालाना परीक्षाओं का भी होता है। बड़ी कक्षाओं में पढऩे वाले विद्यार्थी इसी समय सालाना परीक्षाओं के साथ ही नेट, स्लेट जैसी करिअर को तय करने वाली परीक्षाओं की भी तैयारी करते हैं। ऐसे में भारतीय छात्रों के सामने वल्र्ड कप मैच का आनंद बनाम करिअर, एग्ज़ाम की तैयारी का संकट खड़ा हो जाएगा। विद्यार्थी चाहकर भी परीक्षाओं की तैयारी एकाग्रचित्त होकर नहीं कर पाएंगे, उनका मन तो वल्र्ड कप क्रिकेट के मैचों में ही लगा रहेगा। कई विद्यार्थी परीक्षा की तैयारी के दौरान बीच-बीच में क्रिकेट मैच की हाईलाट्स देखने से $खुद को नहीं रोक पाएंगे। परीक्षा का पर्चा देने के बाद आते समय सहपाठियों से कौनसा सवाल किया ? और कौनसा नहीं? जैसी चर्चा के साथ ही मैच में किस बैट्समैन ने सैंचुरी, हा$फ सैंचुरी लगाई, कौन मैन ऑ$फ द मैच रहा, कौन चौकों और छक्कों के लिए लाइमलाइट में रहा? जैसी बातें भी होंगी। इसका विपरीत असर छात्रों के परीक्षा परिणामों पर पड़ेगा। प्रतियोगी परीक्षाएं देने वाले भी क्रिकेट मैनिया का शिकार हो प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे। इससे इनकार नहीं किया जा सकता। वल्र्ड कप क्रिकेट के कर्ता-धर्ताओं को इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि वल्र्ड कप के मैच ऐसे समय पर करवाए जाएँ जब विद्यार्थियों की सालाना परीक्षाएँ न हों। उचित तो यह होगा कि वल्र्ड कप क्रिकेट का समय निर्धारित करने के लिए सभी देशों के क्रिकेट बोर्ड और इंटरनेशनल क्रिकेट बोर्ड मिलकर ऐसी गाइडलाइंस तैयार करें, जिसके अनुसार सभी देशों में विद्यार्थियों की तिमाही, छमाही या सालाना परीक्षाओं के दौरान क्रिकेट का वल्र्ड कप तो दूर कोई भी टूर्नामेंट आयोजित न किया जाए। $फुटबॉल और अन्य खेलों के लिए भी इसी तरह की गाइडलाइंस जारी की जानी चाहिए, जिससे विद्यार्थियों के सामने खेल बनाम करिअर का संकट खड़ा न हो।
ऐसे तु$गलकी $फरमान क्यों-
वल्र्ड कप क्रिकेट में खेलने वाले खिलाड़ी वल्र्ड कप की आयोजक कंपनियों की प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के विज्ञापन नहीं कर सकते। इस $फरमान को न मानने वाले खिलाडिय़ों को वल्र्ड कप से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। यह नियम वल्र्ड कप के दौरान ही लागू होगा। अब सवाल यह उठता है कि जो क्रिकेटर किसी भी कंपनी का विज्ञापन करने का १ साल का या ५ साल का या किसी निश्चित अवधि का अनुबंध कर चुके है, और अनुबंध का समय वल्र्ड कप क्रिकेट से पहले $खत्म नहीं होता है, और वह कंपनी वल्र्ड कप का आयोजन करने वाली किसी कंपनी की प्रतिद्वंद्वी या विरोधी कंपनी है, तो विज्ञापन करने के लिए अनुबंधित खिलाड़ी संबंधित कंपनी का अनुबंध तोड़ कर अपनी सा$ख पर बट्टा लगा लें, या फिर अपनी सा$ख को बचाने के लिए वल्र्ड कप क्रिकेट से बाहर हो जाएं। इस नियम को खिलाडिय़ों की समस्या के नज़रिये से देखा जाए तो यह न तो उचित है और न ही इस नियम को व्यावहारिक कहा जा सकता है।
इस नियम को एक और परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए- मसलन मान लीजिए सहारा कंपनी ने खेलों और खिलाडिय़ों के विकास के लिए का$फी कुछ किया है, अमूमन ज्य़ादातर यह क्रिकेट के मामले में टीम इंडिया की स्पॉन्सर कंपनी रही है। इसने पिछले वल्र्ड कप के दौरान अपने विज्ञापन से का$फी पैसा कमाया और ईमादारी से टैक्स भी भरा। इससे देश की कंपनी को $फायदा होने के साथ ही देश को भी $फायदा ही हुआ और खेल और खिलाडिय़ों को भी पैसे के साथ ही प्रोत्साहन भी मिला। इसके साथ ही किसी वल्र्ड कप में खिलाडिय़ों ने उस की आयोजक न रही किसी भारतीय कंपनी के विज्ञापन का वल्र्ड कप के दौरान प्रचार किया और इससे संबंधित कंपनी का मुना$फा कई गुना बढ़ा, तो राजस्व के रूप में सरकार को भी तो $फायदा ही हुआ। इससे संबंधित खेल और खिलाडिय़ों को $फायदा ही हुआ। ऐसे में क्रिकेट के वल्र्ड कप के दौरान उक्त नियम लागू करने से खिलाडिय़ों के साथ ही देश की आय पर भी विपरीत असर पड़ेगा।
खिलाडिय़ों के लिए वल्र्ड कप के दौरान पत्नी और प्रेमिका को ले जाने पर रोक-
जब कोई खिलाड़ी बेहतर क्रिकेट खेलता है, तो चाहता है कि उसका परिवार भी उसे ऐसा करते हुए देखे, इससे जहाँ खिलाड़ी को हौसला मिलता है, वहीं खिलाडिय़ों के बच्चे भी बेहतरीन खेलने के लिए प्रोत्साहित होते हैं। इस बात से किसी को गुरेज़ नहीं होगा कि खेल के दौरान $खासकर वल्र्ड कप जैसे हर खिलाड़ी के करिअर और सा$ख से जुड़े मौके के दौरान बेहतर से बेहतर खिलाड़ी अगर किसी मैच में अच्छा नहीं कर पाता तो वह तनाव और दबाव का शिकार हो ही जाता है। इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए पत्नी या प्रेमिका से बेहतर साथी और कोई हो ही नहीं सकता। ऐसे मुश्किल वक्त में अगर पति से पत्नी दूर होगी, तो संबंधित खिलाड़ी की क्रिकेट पर विपरीत असर पडऩे की आशंका कई गुना बढ़ जाएगी। इससे एक और समस्या होगी-अगर खिलाड़ी पत्नी को नहीं ले जाते और उनके बच्चे अपने पापा को ग्राउंड में बेहतर क्रिकेट खेलते हुए देखना चाहते हैं, तो खिलाड़ी उन्हें अपने साथ ले तो जाएंगे, लेकिन उनका ध्यान बच्चों को संभालने और बेहतर क्रिकेट खेलने के बीच संतुलन बनाने का ही रह जाएगा।
बढ़ती अर्थव्यवस्थ्ज्ञा, घटते किसान
हृ जैनेन्द्र कुमार
मध्य प्रदेश की बात करें या महाराष्ट्र की, वहां किसानों की आत्महत्या करने की $खबरें आएदिन देश के किसी न किसी अ$खबार में प्रकाशित होती ही रहती हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसा देश के सि$र्फ दो ही राज्यों में हो रहा है, सच तो यह है कि पूरे देश में किसानों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। सच तो यह है कि तकनीक और अर्थव्यवस्था के जटिल गणित के बीच किसानों की अनदेखी लगातार होती रही है और अब स्थिति इतनी $खराब हो चुकी है कि किसानों का आत्महत्या करना आम बात होती जा रही है। किसानों के देश में, कृषि प्रधान देश में अगर ऐसा हो रहा है तो इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है। बम्पर आवक के बावजूद विदेशी निर्यात पर रोक लगा दी जाती है, जबकि इससे इतर १७ हजार करोड़ रुपए का अनाज खुले में सड़ता रहता है। दूसरी ओर लचर प्रशासन के बावजूद भारत दुनिया की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन गया है। ऊंची विकास दर, गतिशीलता और युवाशक्ति के बूते जल्दी वैश्विक आकांक्षाओं से भरे भारतीय उन लोगों से आगे निकल जाएंगे, जो स्वयं को किसी न किसी परिस्थिति का शिकार मानते हैं। सच तो यह है कि उदारीकरण की अर्थव्यवस्था के चलते बढ़ते औद्योगीकरण के काल में काम-धंधा करने वाले लोगों की आय में इजाफा हुआ है, लेकिन आज भी किसान $गरीबी की चक्की में पिसने को मज़बूर है। किसानों की बेहाली की जड़ में जाएं तो सामने आता है कि उन्हें उपज का उचित दाम नहीं दिया जाता।
किसान को मामूली रकम देकर बड़े आढ़तिए उसकी उपज $खरीद लेते हैं, उनसे छोटे आढ़तिये खरीदारी करते हैं, जहां से फुटकर विक्रेता खरीदी करते हैं। इस तरह किसान की उपज आम आदमी के हाथों में आते आते कई दलालों के बीच से गुजरती है और हर दलाल उससे मोटा मुना$फा बनाता है। यही तबका वक्त वेवक्त कालाबाज़ारी को भी अंजाम देता है। यही वर्ग अपने हित साधने के लिए, अपने $फायदे के कानून-कायदे बनवाने के लिए दबे-छिपे राजनीतिक दलों को पैसा पहुंचाता है। इस तरह राजनीतिज्ञों और दलालों के गठबंधन का तंत्र चलता है। इस तंत्र में किसानों के हितों की पूर्णतया अनदेखी की जाती है।
कैसे बढ़ती हैं कीमतें
किसान अपनी उपज बड़े आढ़तियों को बेचता है, उससे छोटे आढ़तिए फसल खरीदते हैं और उनसे फुटकर दुकानदार खरीदारी करते हैं। ये लोग हर स्तर पर फसल का भाड़ा, फसल बिक्री के दौरान फसल में होने वाले अनुमानित $खराबे की राशि, अपना मुनाफा और इसके अलावा $गैर-हिसाबी उगाही करने वालों को दी जाने वाली राशि को क्रेता से वसूलते हैं। ऐसे में किसान द्वारा एक रुपए प्रतिकिलो बेची गई वस्तु ग्राहक को अनुमानत १० रुपए किलो मिलती है, जबकि कई वस्तुओं में यह राशि इससे भी ज्य़ादा हो सकती है। मसलन मान लें किसान अपनी मटर की उपज को बड़े या थोक आढ़तियों को एक से डेढ़ रुपए प्रतिकिलो के हिसाब से बेचता है। ये आढ़तिये उसी मटर को दो या तीन रुपए प्रति किलो के हिसाब से हाथोंहाथ दूसरे सब्ज़ी विक्रेताओं को बेच देते हैं। अगले चरण में से विक्रेता उसी मटर को पांच से सात रुपए प्रतिकिलो में फुटकर विक्रताओं को बेचता है। ये फुटकर विक्रता उसी मटर को २० रुपए प्रतिकिलो में उपभोक्ता को बेच देते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में ऊपर बताई गई वस्तु के खराबे, उसके भाड़े, गैर-हिसाबी वसूली की भरपाई और विक्रेता का स्वयं का $फायदा शामिल होता है। यह प्रक्रिया नकदी $फसलों यानी सब्जियों, फलों में ही नहीं होती खाद्यान्न जिंसों में बेचान के दौरान भी लागू होती है। यहां तक कि अपैरल इंडस्ट्री और दूसरी इंडस्ट्रीज़ में भी यही नियम लागू होता है। हां, यहां इतना जरूर होता है कि वैट के नाम पर सरकार की जेब में जाने वाले पैसे का भी भार उपभोक्ता पर ही पड़ता है। अगर सरकार एक ऐसा व्यापार तंत्र विकसित करे, जिसमें किसान या इंडस्ट्रीज अपनी $फसल / उत्पाद सीधे उपभोक्ता को बेचें तो किसान को तो भारी मुना$फा मिलेगा ही उपभोक्ता की जेब पर पडऩे वाला भार भी चमत्कारिक रूप से घट जाएगा।
कैसे बदलेगी व्यापार तंत्र की सूरत-सीरत
सरकार को चाहिए कि वह पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत किसानों को बाज़ार उपलब्ध करवाए। इसमें सरकार खाद्य पदार्थों के भ्ंाडारण के लिए उच्च तकनीक से युक्त कोल्ड स्टोरेज, शो-रूम्स और दुकानों का निर्माण करे। इन कोल्ड स्टोरेज, शो-रूम्स और दुकानों पर मैनेजर से लेकर सबसे निचले स्तर तक किसानों के शिक्षित बच्चों को ही लगाया जाए। ऐसा होने से किसान अपनी $फसल सीधे उपभोक्ताओं को बेच पाएंगे और मुनाफाखोर दलालों का अंत होगा। इससे किसानों को अपनी मेहनत से तैयार की $फसल का उचित दाम मिल पाएगा और उपभोक्ताओं को भी कम कीमत पर खाद्य सामग्री मिलेगी। कोल्ड स्टोरेज, शोरूम्स और दुकानों के रख-रखाव में आने वाले $खर्च यानी मेंटीनेंस चार्ज को घटाकर शेष मुनाफा उपज से संबंधित किसान को दिया जाए। ऐसा करना संभव है, क्योंकि रिलायंश फ्रेश जैसी कंपनियां सब्जि़यों को सीधे किसान से लेकर बेचने लगी हैं। अगर ऐसे स्टोर्स पर बिकने वाले फल-सब्जि़यों के दामों और खुले बाज़ार में बिकने वाली फल-सब्जि़यों की कीमतों का अध्ययन किया जाए तो सामने आता है कि कीमतें लगभग बराबर ही होती हैं और क्वालिटी के मामले में स्टोर्स पर बिकने वाला समान ज्यादा बेहतर होता है। इसमें से कंपनी अपने स्टोर के रख-रखाव, विज्ञापन पर होने वाले $खर्च और स्टा$फ की सैलरी भी निकालती है और मुना$फा भी कमाती ही है। अगर रिलायंस जैसी निजी कंपनी ऐसा कर सकती है तो सरकार अगर चाहे तो किसानों का बाजार, किसानों के लिए बाज़ार क्यों नहीं खड़ा कर सकती। अगर ऐसा होता है तो तय है कि $गरीबी में जीवन यापन करने वाले किसानों की दशा तो सुधरेगी ही, साथ ही किसानों की आत्महत्या का सिलसिला भी रुक जाएगा। अब देखना यह है कि क्या अर्थशास्त्र के जटिल गणित और आंकड़ों में उलझी सरकार सि$र्फ का$गजी कार्रवाई और बौद्धिक जुगाली ही करती रहेगी या किसानों की दशा सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने का साहस भी करेगी।

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