
तिरंगा फहराने पर बवाल ?
जिस तरह से भाजयुमो कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए उमर सरकार और केंद्र सरकार तत्परता दिखा रही हैं, और हर स्तर पर मुस्तैदी से कार्य कर रही हैं। अगर ऐसी ही मुस्तैदी और तत्परता के साथ उसने आतंकवादियों और अलगाववादियों को $खत्म करने के लिए मुहिम छेड़ी होती, तो शायद आज हिंदुस्तान के नक्शे से आतंकवाद का नापाक साया कब का छू-मंतर हो गया होता।
हृ जैनेन्द्र कुमार
देश को आज़ाद करने के लिए अपनी जान देने वाले देश के सच्चे सपूतों ने कभी सोचा नहीं होगा कि आज़ादी के बाद सरकारें राजनीतिक दांव-पेचों में इतना उलझ कर रह जाएंगी, कि उन्हें उचित और अनुचित में $फर्क करना भी नहीं आएगा। भारत में गणतंत्र दिवस पर झंडा फहराने के नाम पर दो पार्टियां आमने-सामने होंगी और दुनिया के सारे देश, भारत के नेताओं के इस विरोधाभासी और अजब चरित्र पर खिल्ली उड़ा रहे होंगे।भारत आज़ाद देश है और देश के हर व्यक्ति को २६ जनवरी और १५ अगस्त को ही नहीं बल्कि साल के सभी दिनों के दौरान देश के किसी भी हिस्से में राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार है, और इस पर राजनीति होती है, तो यह दो पार्टियों की राजनीति न रहकर भारत की सम्प्रभुता पर सवालिया निशान लगाने जैसा माना जाएगा।
कई बार ऐसा हुआ कि $फैशन के नाम पर राष्ट्रीय ध्वज- तिरंगे को डिज़ाइनर्स ने परिधान बना दिया और उसे पहन, इठलाती मॉडल रैम्प पर नज़र आईं। कई बार नामचीन लोगों ने देशप्रेम दिखाने के चक्कर में तिरंगे जैसा केक बनाया, काटा, खाया और मन गया जन्मदिन। ऐसी $खबरंे गाहे-बगाहे पढऩे को मिल जाती हैं। ऐसा करने वालों के विरुद्ध होता-जाता कुछ नहीं है। अबकी बार तिरंगे को लेकर जो बवाल शुरू हुआ, तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा। कुछ दिन पहले कुछ अलगाववादियों और तथाकथित गुमराह लोगों ने श्रीनगर के लाल चौक पर पाकिस्तान का झंडा फहराया। यह $खबर कुछ लोगों को लगी तो कुछ को नहीं, क्योंकि आमतौर पर ऐसी $खबरों को देशहित के नाम पर दबा दिया जाता है। लेकिन जिन लोगों ने ऐसा शर्मनाक कृत्य किया उनके $िखला$फ न तो जम्मू कश्मीर की सरकार ने और न ही केन्द्र सरकार ने कोई कार्रवाई की। भाजयुमो 26 जनवरी को उसी लाल चौक पर तिरंगा झंडा फहराने की तैयारी में लगी , इसके लिए भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर के नेतृत्व में कोलकाता से 12 जनवरी को तिरंगा यात्रा शुरू हुई थी। यह यात्रा 11 राज्यों से शांतिपूर्ण तरीके से गुज़र चुकी थी। देश के प्रिय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही अपील की है कि गणतंत्र दिवस को राजनीतिक $फायदा उठाने और विभाजनकारी एजेंडे को आगे बढ़ाने का मौका नहीं बनाया जाना चाहिए। हालांकि, अपील में मनमोहन ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा सा$फतौर पर भाजपा की ओर था, जिसके भाजयुमो का का$िफला श्रीनगर की ओर लगातार आगे बढ़ रहा था। उधर उमर सरकार ने भाजपा को चेतावनी दी है, कि वह लाल चौक पर तिरंगा फहराने की अपनी योजना पर आगे बढ़ी, तो सरकार बल प्रयोग करने पर मज़बूर होगी। इसके जवाब में भाजपा ने कहा है कि राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए भाजयुमो की राष्ट्रीय एकता यात्रा तय कार्यक्रम के अनुसार विधिवत जारी रहेगी। वहाँ के अलगाववादियों ने २६ जनवरी को ही श्रीनगर के लाल चौक पर भाजयुमो कार्यकर्ताओं के रैली निकालने और राष्ट्रीय ध्वज फहराने पर जवाबी रैली निकालने और काले झंडे फहराने की घोषणा की थी। भाजयुमो के कार्यकर्ताओं को लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोकने के लिए उमर सरकार और केन्द्र सरकार ने पूरी ताकत झोंक दी। श्रीनगर जाने वाले कार्यकर्ताओं की ट्रेनों को धोखे से वापस किया गया, तो कहीं बिना वजह रद्द किया गया। जम्मू-कश्मीर की सीमाएं सील कर दी गर्इं। और यह सब हुआ भारत के नागरिकों को श्रीनगर स्थित लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से रोकने के लिए।... और इसके पीछे की वजह सरकार यह बता रही है, कि ऐसा करने से देश की शांति को $खतरा है, हिंसा हो सकती है। आ$िखर २६ जनवरी गुज़र गई, केंद्र और जम्मू कश्मीर की सरकारों ने मिलकर भाजपा और भाजयुमो को लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहराने दिया।
आज अलगाववादी ताकतों के डर से सरकार भाजयुमो के कार्यकर्ताओं को लाल चौक में झंडा फहराने से रोकना चाहती है। ऐसा करने से अलगाववादी ताकतों का हौसला बुलंद होगा और इस बात को मानने से किसी को गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि अगर सरकार का रवैया यही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब देश के हर कोने से अलगाववादी ताकतें अपनी आवाज़ बुलंद करेंगी तब...तब सरकार क्या करेगी? क्या देश में राष्ट्रीय ध्वज फहराना ही बंद कर देगी? केंद्र और जम्मू कश्मीर की सरकार का कर्तव्य तो यह बनता है, कि वह लालचौक पर पाकिस्तान का झंडा फहराने वालों पर देशद्रोह का मुकदमा चलाती और उन्हें सरेआम मौत के घाट उतार देती, ताकि भाविष्य में फिर कोई भारत की अस्मिता और अखंडता के साथ ऐसा भद्दा खिलवाड़ करने की हिम्मत नहीं करता। अब भी सरकार का यह दायित्व बनता है, कि यदि अलगाववादी २६ जनवरी को भाजयुमो की रैली के बाद जवाबी रैली निकालते हैं, और काले झंडे दिखाते हैं, या किसी प्रकार की हिंसा की कोशिश करते हैं, तो उन्हें देशद्रोही कारार देकर उन्हें मृत्युदंड दिया जाना चाहिए, जिससे भारत को खंड-खंड करने की साजि़श रचने वालों और इस देश की संप्रभुता को चुनौति देने का सपना देखने वालों को सबक सिखाया जा सके। लाल चौक पर झंडा फहराने की कार्रवाई को कांग्रेस पार्टी की हार और भाजपा की जीत मानने के नज़रिए से देखना $गलत है। यह दो पार्टीयों के बीच का विरोध नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की अस्मिता का सवाल है। यह मुद्दा है देश की अखंडता और संप्रभुता का, और इससे किसी भी कीमत पर समझौता करना उचित नहीं ठहराया जा सकता। जिस तरह से भाजयुमो कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए उमर सरकार और केंद्र सरकार तत्परता दिखा रही हैं, और हर स्तर पर मुस्तैदी से कार्य कर रही हैं। अगर ऐसी ही मुस्तैदी और तत्परता के साथ उसने आतंकवादियों और अलगाववादियों को $खत्म करने के लिए मुहिम छेड़ी होती, तो शायद आज हिंदुस्तान के नक्शे से आतंकवाद का नापाक साया कब का छू-मंतर हो गया होता।
गणतंत्र का उत्सव पर्व
हृ संजय तिवारी
तलवार पर तेज़ धार हथियार से हमला करके सबक सिखानेवाला युवक उत्सव शर्मा अब पुलिस हिरासत में है। बेटे को लेकर चिंतित बाप की गुहार है, कि वह मानसिक रूप से संतुलित नहीं है, इसलिए उसके साथ कोई बुरा बर्ताव न किया जाए। केएल शर्मा को डर है कि पुलिस उसके बेटे को हत्या के प्रयास में नामज़द कर सकती है। ऐसा हुआ तो उनके बेटे की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। उत्सव शर्मा बनारस के हैं। बिल्कुल ही नौजवान है। 20-22 की उम्र है। व्यवस्था से व्यथित उत्सव शर्मा न्याय और अन्याय के बीच उस पतली रेखा को पार कर गये हैं, जिसे हमारे गणतंत्र ने पिछले साठ सालों में भरसक मोटा करने का काम किया है। इस लिहाज़ से देखें तो उनके बाप की अपील सही नज़र आती है कि उत्सव शर्मा का मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है। अगर वे मानसिक रूप से संतुलित होते तो निश्चित रूप से सबकुछ बर्दाश्त करके बहस करते रहते। गणतंत्र के बासठवें साल की पूर्व संध्या पर जब महामहीम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने देश को संबोधित किया और देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर चिंता जताई तो उत्सव शर्मा पुलिस के हत्थे चढ़ चुका था। अभी भी वह पुलिस की हिरासत में है। कानून की दवाई खा खा कर बीमार हो चुके इस देश में अब किसी से भी उत्सव के बारे में पूछेंगे तो वह यही कहेगा कि कानून को अपना काम करना चाहिएद्ध। यह उत्सव उस देश में पैदा हो गया है, जिसकी लगभग आधी आबादी 25 साल से नीचे है। यह आधी आबादी कई तलों पर बंटी हुई है। बड़ी संख्या गांवों में है ,जो शहर आने को आतुर है। गांव इतने गये गुजरे हो गये हैं ,कि वे हमारे नौजवानों को थामें नहीं रख सकते। जिन परंपरागत उद्योगों और व्यवस्थाओं में ग्रामीण भारत जीवन पाता था उन्हें पूरी तरह से उजाड़ दिया गया है। ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था और समाज व्यवस्था ऐसे भ्रंस पर आ खड़ी हुई है कि नवप्रभात दूर दूर तक दिखाई नहीं देता। जैसे उद्योग में उत्पादन की लघु इकाई अनायास साबित कर दी गयी वैसे ही समाज व्यवस्था के लघु स्वरूप गांव को इतना अस्तित्वहीन बना दिया गया है कि उन्हें अपने होने की कोई ज़रूरत समझ में नहीं आ रही है। भविष्य का भारत शहरों में बसेगा। भविष्य के इस भारत में कई चरण और तल होंगे जिसमें टायर वन टायर टू के सिटीज़ तो हो सकते है,ं लेकिन स्वतंत्र अस्तित्व वाली ग्रामीण इकाई ा़त्म हो जाएगी. फिर नौजवान शहर न आयें तो जाएं कहां? हिन्दुस्तान टाइम्स ने गणतंत्र दिवस के पावन मौके पर सीएनएन-आईबीएन के साथ मिलकर एक सर्वे किया है. सर्वे नौजवानों पर ही केन्द्रित है। सर्वे उभरते भारत के उन नौजवानों पर केन्द्रित है जो शहर के मंहगे और पथरीले घरों में पैदा हुए हैं और उनकी सारी सोच कैरियर प्वाइंट आ$फ व्यू से ही निर्धारित होती है। किताबों के बोझ को पीठ पर लादे स्कूल के रास्ते जवानी की दहलीज़ पर पहुंचे इन नौजवानों का उत्सव शर्मा जैसा बिल्कुल ही नहीं है, जो न्याय अन्याय की मोटी रेखा को पतला करने के लिए आठ सौ हजार किलोमीटर की यात्रा करके दिल्ली पहुंच जाता है, और किसी राजेश तलवार या फिर एसपीएस राठौर के दा$गदार चेहरे का नकाब अपनी चाकू से उतार देता है। वह जान से तो नहीं मारता लेकिन इन दोनों के चेहरे पर उसने वह घाव ज़रूर दे दिया है कि वे जब भी आइना देखेंगे तो उन्हें अपने किये गये पाप की याद ज़रूर आयेगी। हिन्दुस्तान टाइम्स जिन नौजवानों का सर्वे हमें पढ़ा रहा है वे नौजवान $खुश रहना चाहते हैं। निश्चित रूप से उनकी $खुशी पैसे के रास्ते आती है। यह नौजवानों का वह वर्ग है जिसका दायरा व्यापक है। वह ग्लोबल गिरमिटिया है और सेवा करने दुनिया के किसी भी कोने में जा सकता है। ठीक वैसे ही जैसे गांव से उठा नौजवान गांव से उठकर किसी भी शहर में जा सकता है।
देश में नौजवानों के इन दो प्रकार के अलावा एक तीसरा प्रकार भी है जो राजनीतिक या सामाजिक रूप से सक्रिय है। चेन्ज की ख़्वाइश मन में लिए नौजवानों का एक बड़ा वर्ग गांव और शहर दोनों जगह है। लेकिन आज का मीडिया या व्यवस्था उस नौजवान की ओर नहीं देखना चाहती। उत्सव शर्मा नौजवानों की ऐसे ही वर्ग से आता है जिसे देश के संघीय ढांचे में पूरा विश्वास है और जो चाहते हैं एक नेशन के रूप में भारत सशक्त स्टेट बने। ये नौजवान हिन्दुस्तान टाइम्स के सर्वे वाले नौजवानों की तरह बहुत $खुश तो बिल्कुल ही नहीं है। वे नाराज हैं। उन्हें लगता है उनके आस पास सबकुछ ठीक नहीं हो रहा है। इसलिए वे जहां मौका मिलता है ठीक करने निकल पड़ते हैं। जवानी का यह स्वरूप पिछले दौर में जेलों तक जाकर क्रांति को अंजाम दिया करता था। विश्वविद्यालयों की राजनीति के रास्ते अपने आप को आगे लाता था और देश की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में अपने आपको स्थापित करता था। लेकिन कारपोरेट होते भारत में नौजवानों का जो कारपोरेट वर्ग पैदा हुआ उसने उस नौजवान को अर्थहीन साबित करने का काम किया है उनके सामने यक्ष प्रश्न पैदा कर दिया है कि अगर मेरा कैरियर है तो फिर तुम अपने कैरियर की चिंता क्यों नहीं करते? और आज के शहरी भारत में देश प्रेम, व्यवस्था के $िखला$फ लड़ाई या फिर कुशासन के $िखला$फ बेचैनी भरी कार्रवाई कैरियर तो क्या काम भी नहीं हो सकता।
साठ साल के बुढ़ाते गणतंत्र पर यहां के पचास प्रतिशत नौजवान हर प्रकार से बोझ साबित हो रहे हैं। इस बोझ से अगर कोई उत्सव शर्मा जैसी चिंगारी निकलती है तो उसे मानसिक रूप से बीमार बता दिया जाता है। हो सकता है उत्सव और उसके परिवार वाले कानून के कहर से बचने के लिए यह रास्ता अख़्ितयार कर रहे हों लेकिन इस देश के राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने उत्सव शर्मा के बारे एक शब्द भी क्यों नहीं बोला? जो लोग व्यवस्था से चिंतित है ,और राजनीतिक भ्रष्टाचार से आजिज आ चुके हैं उत्सव शर्मा ने उनकी चिंता दूर करने का रास्ता दिखा दिया है। उत्सव शर्मा को न तो अनुराग ठाकुर होने की तमन्ना है और न ही वे राहुल गांधी होना चाहेंगे। उत्सव इस देश के उस नौजवान का प्रतिनिधित्व करता है जो सीधे न्याय करने में यकीन रखते हैं। जिन्हें बौद्धिक जुगाली और कर्म के परिणाम की चिंता नहीं है। कोई शीलू या फिर कोई उत्सव शर्मा उभरेंगे तो यही व्यवस्था उन्हें दोषी बनाकर $खारिज करने का काम करेगी। लेकिन आप $खुद सोचिए ऐसे उत्सवों का अगर पर्व ही शुरू हो गया तो? न्याय का यह रास्ता व्यवस्था के लिए भले ही चिंता का विषय हो लेकिन साठ साल की नाकामी के बाद और कोई रास्ता बचा भी नहीं है। इस गणतंत्र पर उत्सव पर्व के आगे न अनुराग ठाकुर की तिरंगा यात्रा में दम नज़र आ रहा है और न राजपथ के सरकारी आयोजन आकर्षित कर पाये। सारे आयोजन फीके नज़र आये। आप क्या सोचते हैं?
वाइब्रेंट गुजरात को रोकने के लिए लाल चौक का पाखंड
हृ संजीव पांडेय
पिछले तीन दिनों से भाजपा के तिरंगा अभियान ने देश में गर्मी ला दी थी। एकबारगी भाजपा के नेताओं ने महसूस करा दिया था, कि लाल चौक भारत के कब्ज़े में नहीं, पाकिस्तान के कब्ज़े में है। भाजपा का पाखंड और कांग्रेस के उदंड ने मीडिया को एक जोरदार मसला दे दिया था। तीन दिन तक $खूब कहानी चली, पर कहानी का पटाक्षेप साधारण तरीके से हो गया। न तो इस कहानी को भारी जनसमर्थन मिला, न कोई बड़ा हादसा हुआ, जो कांग्रेस और भाजपा के नेता चाहते थे।
घमंडियों और पाखंडियों के बीच पिछले छ महीनें से चल रही जंग समाप्त हो गई। जो लाभ भाजपा लेना चाहती थी, वो ले नहीं पायी। माधोपुर के पास भी भाजपा को कोई भारी जनसमर्थन नहीं मिला। लोगों को यह महसूस हो गया था, कि यह राष्ट्रभक्ति नहीं, बल्कि राजनीतिक फायदे को लेकर निकाली गई एक यात्रा थी, जिसके तार भाजपा की आतंरिक सत्ता संघर्ष से जुड़ा हुआ है। 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के नेताओं में नेतृत्व के जंग की एक तैयारी भर की यह यात्रा थी, जिसमें लाल चौक और तिरंगा का उपयोग किया गया। हाशिए पर गए नेताओं को भी एक बार लाइम लाइट में आने का मौका मिला। और तो और राहुल गांधी की तरह ही मुंह में चांदी के चम्मच लिए अनुराग ठाकुर को भी आज से दस साल बाद भाजपा में स्थापित करने की योजना को अंजाम दिया गया। हालांकि उस समय तक इन पाखंडियों का क्या होगा, यह पता नहीं।
जब भाजपा के युवा विंग ने तिरंगा यात्रा कोलकाता से शुरू की थी तो कोई बहुत ज्य़ादा उत्साह इस देश के लोगों के बीच नहीं था। भाजपा की इस तरह की यात्राओं का खेल लोग समझ चुके हैं और उनके इस पाखंड से लोग ऊब गए हैं। कोई भी भाजपा का नेता अपने आप को स्थापित करने के लिए कोई न कोई यात्रा निकालता है
इस यात्रा के पीछे एक राजनीतिक सोच होती है कि एल.के. आडवाणी की रथ यात्रा की तरह ही स्थापित होने में उन्हें मदद मिलेगी। लेकिन अब देश की जनता इस तरह की यात्राओं में कोई दिलचस्पी नहीं ले रही है। लेकिन भाजपा के नेता कहां मानने वाले थे। घमंडी कांग्रेसियों की मूर्खता ने पाखंडियों की भाजपा को अच्छा मौका दे दिया। पंजाब पहुंचते-पहुंचते भाजपा ने इस यात्रा को गर्मा दिया। मौके के इंतज़्ार में भाजपा के तीन मैनेजर शामिल थे। नीरा राडिया टेप में आरोपों को झेल रहे अनंत कुमार, बिहार में नरेंद्र मोदी का रास्ता रोकने वाले अरुण जेतली और 2014 में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार बनने की ख़्वाहिश रखने वाली सुष्मा स्वराज चार्टर प्लेन से जम्मू पहुंच गई। $गरीब देश की जनता को इंटरनेट पर ट्विट कर पल-पल की जानकारी सुष्मा स्वराज दे रही थी। उन्हें नहीं पता था कि उनके भाजपा के अस्सी प्रतिशत कार्यकर्ताओं को इंटरनेट का इस्तेमाल करना नहीं आता है। मीडिया के कुछ लोग जो भाजपा के $खास मेहरबानी से चलते है, तीनों नेताओं को हीरो बनाने में लग गए। जम्मू पुलिस ने इन्हें धकेल कर पंजाब में छोड़ दिया। वहां पर फिर आगे की रैली हुई। अरुण जेतली ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को $खूब याद किया। लेकिन उपर बैठे श्यामा प्रसाद मुखर्जी को पता था कि उनका नाम लेने वाले इन ढोंगियों को कश्मीर और लाल चौक से कोई प्यार नहीं है। ये तो सत्ता के खेल में यह कर रहे है। नहीं तो अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में ये लाल चौक पर झंडा फहराने ज़रूर आते। और तो और राजनाथ सिंह को एकाएक बापू याद आ गए। जब उन्होंने अपने प्रबल विरोधी अरूण जेतली और सुष्मा स्वराज को यात्रा का सारा $फायदा लेते देखा, तो एकाएक भाजपा विचारधारा के घोर विरोधी महात्मा गांधी के शरण में पहुंच गए। राजघाट पर गांधी की समाधि के आगे धरना दे दिया। पूरी तरह से गांधी के सिद्वांत पर सत्याग्रह शुरू कर दिया और भूख हड़ताल शुरू कर दी। यह था भाजपा के शीर्ष नेताओं का सत्ता का खेल। उतर प्रदेश में भाजपा को हाशिए पर ले जाने वाले राजनाथ सिंह एका-एक गांधीवादी हो गए। क्योंकि पार्टी में हाशिए पर जाने के बाद दुबारा स्थापित होने की कोशिश कर रहे हंै। अब इसमें महात्मा गांधी से ज्य़ादा बड़ा सहयोगी उन्हें और कौन मिल सकता था। क्योंकि गांधी तो विरोधियों को भी दिल से लगाकर उन्हें स्थापित करते थे।
ये सारा खेल भाजपा के आंतरिक संघर्ष को दिखा रहा है। नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव को कुंद करने के लिए भाजपा के कछ मैनेजरों ने इस यात्रा को गर्म कर दिया। ये तीनों नेता एकाएक राष्ट्रीय पटल पर आने के खेल में शामिल हो गए है। किसी भी तरह से नरेंद्र मोदी का प्रभाव कम हो और ये 2014 के चुनाव में भाजपा को लीड करे, यही अरुण जेतली और सुष्मा स्वराज का लक्ष्य है। भाजपा का यह खेल अभी नहीं एक साल पहले शुरू हो चुका है। बिहार चुनावों में नरेंद्र मोदी को रोकने की साजि़श भाजपा के बाहर से नहीं भाजपा के अंदर से हुई थी। इस खेल में अरूण जेतली और सुषमा शामिल थे। ज़मीनी आधार से विहीन दोनों नेता मोदी के प्रशासनिक क्षमता की सफलता से डर गए हंै। कारपोरेट दुनिया का समर्थन, गुजरात के विकास ने कांग्रेस से ज्य़ादा भाजपा नेताओं को डरा दिया है। क्योंकि मोदी ने अपने चाल-चरित्र और चेहरा को बदलने की कोशिश की है। लाल चौक पर कभी मुरली मनोहर जोशी के साथ झंडा फहराने वाले नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय नेता बनने के लिए अपने दंगाई चरित्र को विकासवादी चरित्र में बदलने में लगे है। देवबंद के कुलपति $गुलाम मोहम्मद वस्तानवी के नरेंद्र मोदी के संबंध में दिए गए एक ब्यान को इसी दिशा में देखा जा रहा है। मुसलमानों के आतंरिक दबाव में आए वस्तावनवी ने अपने पहले ब्यान में मोदी को क्लीन चिट देकर उनके विकास का गुणगाण किया था। निश्चित तौर पर इस ब्यान ने कांग्रेस से ज्य़ादा भाजपा के मैनेजर रूपी नेताओं को चिंता में डाल दिया था। अरूण जेतली और सुषमा स्वराज को तिरंगा के बहाने जो $फायदा मिलना था, वो नहीं मिला। उन्होंने पूरी कोशिश की कि लाल चौक को पाकिस्तान में दिखाया जाए। उन्होंने पूरी कोशिश की उमर अब्दुल्ला को आसिफ अली ज़रदारी और युसूफ रज़ा गिलानी का एजेंट ठहराया जाए। लेकिन देश की जनता इस सच्चाई को जानती है। कश्मीर में भारतीय सेना है, केंद्रीय पुलिस भी है। इनके कैंपों में भारतीय तिरंगा फहरा रहा है। देश की जनता इसे समझती है। फिर भाजपा के पाखंड को भी देश की जनता जानती है। इसलिए इस बार भाजपा के ये मैनेजर $फेल हो गए। हां भाजपा में वंशवाद की परंपरा को शुरू करने वाले नेताओं को आगे स्थापित होने के रास्ते खुल गए। कांग्रेस के वंशवाद का विरोध करने वाले भाजपाई अब अपनी पार्टी में वंशवाद की परंपरा को बो उन्हें स्थापित करने में लग गए है। चांदी का चम्मच मुंह में लिए अनुराग ठाकुर, जिन्होंने कहीं भी भाजपा में संगठन स्तर पर जि़ंदगी में संघर्ष नहीं किया, अब भाजपा के अग्रिम पंक्ति में स्थापित होने में सफल हो गए। उनके पास वो सारे संसाधन हंै, जो आम भाजपा के कार्यकर्ताओं के पास नहीं है। उनके पास करोड़ों रुपये हैं, उनके पिता जी मुख्यमंत्री है। यानि कि स्थापित होने के लिए जो दो ज़रूरी गुण भाजपा में चाहिए, वो अनुराग ठाकुर के पास हंै। फिर वे क्रिकेट की राजनीति करते रहे हंै। इसलिए क्रिकेट की राजनीति करने वाले अरूण जेतली भी उन्हें $खूब मदद कर रहे है। भाजपा के वर्तमान मैनेजरों ने यह तय करना शुरू कर दिया है, कि दस साल बाद भाजपा पर कौन से मैनेजरों का कब्ज़ा होगा। कुल मिलाकर आप कह सकते हंै मैनेजर संस्कृति के लोग तिरंगा के बहाने देश की जनता को बेवकू$फ बनाकर अपनी मज़बूती कर रहे हैं। तिरंगा से जो भाजपा की आतंरिक राजनीति नज़र आ रही है, वो आने वाले दिनों में और तेज़ होगी। मोदी के वाइब्रेंट गुजरात का मुकाबला दिल्ली के भाजपा नेताओं के पाखंडी राष्ट्रवाद ही दे सकता है। बेचारे नीतिन गडकरी को कुछ नहीं समझ में आ रहा क्या करें। वे दाव तो हर जगह खेल रहे हैं। लेकिन उन्हें समझ में नहीं आ रहा है। हर जगह अपना गुट बनाने के चक्कर में हैं। लेकिन उनके प्यादे मार खाते हंै। बिहार में सुशील मोदी को मारने के लिए जब सीपी ठाकुर को खड़ा किया तो सीपी ठाकुर की छोटी से लालच ने गडकरी की सारी योजना पर पानी फेर दिया। अब कुछ राज्यों में उनका और प्रयास चल रहा है। पर समझ में नहीं आता है, कैसे अपने प्रयासों को वे सफल करे। उधर संघ भी अब गडकरी से का$फी नाउम्मीद हो चुका है। व्यवसायी गडकरी संघ के काम भी नहीं आ रहे हंै। लेकिन इनसे अलग एल.के. आडवाणी अपने खेल में लगे हैं। एलके आडवाणी अभी भी अपने आप को पीएम इन वेटिंग मानते हंै। उन्हें उम्मीद है कि मध्याविधि चुनाव होंगे। फिर प्रधानमंत्री के उम्मीदवार तो वही होंगे। इसलिए वे चुप बैठ अपना खेल कर रहे हंै। लेकिन उनकी चिंता भी नरेंद्र मोदी है। कुछ दिन पहले आडवाणी से मिल नरेंद्र मोदी ने चेतावनी वाले अंदाज़ में कुछ कड़े शब्द उन्हें कहे हैं। नरेंद्र भाई ने आडवाणी को चेतावनी वाले लहजे में कह दिया है, कि वे अपने मैनेजरों से उनके $िखला$फ साजि़श न करवाएं, नहीं तो आने वाले दिनों में वे भी अपना खेल खेलने से बाज़ नहीं आएंगे। कुल मिलाकर संघर्ष तो अब वाइब्रेंट गुजरात से ही है। तिरंगा को तो इन पाखंडियों ने तार-तार कर दिया, अपने हितों के लिए।

No comments:
Post a Comment