राजा का बज गया
हृ संजय तिवारी
बुधवार 2 $फरवरी को जब पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा सीबीआई द्वारा पूछताछ के लिए सीबीआई मुख्यालय पहुंचे तो उन्हें भले ही आशंका रही हो, या न रही हो, लेकिन मीडिया के एक खित्ते ने आशंका ज़ाहिर कर दी थी, कि आज राजा की गिर$फ्तारी हो सकती है। मीडिया में जिन लोगों ने इस खबर को लीक किया था, उनके सीबीआई में अपने सूत्र होंगे ,जिनके हवाले से उन्होंने यह आशंका ज़ाहिर की थी। लेकिन इस लीक हुई $खबर का एक संदेश यह भी है, कि राजा की गिर$फ्तारी का रंगमंच पहले ही तैयार किया जा चुका था। इसीलिए पार्टी स्तर पर गठित शिवराज पाटिल ने अपनी रिपोर्ट में भी जब राजा को दोषी करार दिया, तो ह्वील चेयर पर बैठे बैठे एक बार फिर करुणानिधि दिल्ली पहुंच गये, और प्रधानमंत्री तथा सोनिया गांधी से मिलकर राज्य में होनेवाले चुनावों के लिए सीटों के तालमेल की बात करने लगे।
करुणानिधि ने सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से क्या बात की होगी, अब राजा की गिरफ्तारी के बाद स्पष्ट हो गया है। याद करिए श्रीलंका में प्रभाकरण की मौत को, ऐसा कहा जाता है कि उस पूरे अभियान को भारत सरकार ने परोक्ष रूप से मदद की थी। फिर भी सोनिया गांधी से मेल मुलाकात के बाद करुणानिधि ने मंत्रीपद पर समझौता कर लिया था. आज राजा की गिर$फ्तारी से पहले भी दिल्ली दरबार में पहुंचकर करुणानिधि ने सहमति पत्र पर मौन हस्ताक्षर कर दिया था, इसमें कोई दो राय नहीं। करुणानिधि राज्य में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लडऩे में अपना $फायदा देख रहे हैं। राज्य में डीएमके और एआईडीएमके के बीच सीधी लड़ाई में पलड़ा उसी का भारी होगा, जिसके पाले में कांग्रेस बैठेगी। ऐसे में अगर कांग्रेस का साथ छूटता है, तो डीएमके को राजनीतिक नुकसान होने की पूरी आशंका है. इसलिए राजा की बलि लेकर डीएमके प्रमुख करुणानिधि ने ह्वील चेयर पर बैठे बैठे एक और मुख्यमंत्रित्व काल के लिए अपनी योजना को अंजाम दे दिया। लोकतंत्र के सबसे बड़े संचार घोटाले को अंजाम देनेवाले ए राजा को लेकर न केवल केन्द्र सरकार सांसत में है, बल्कि सीबीआई की भी सुप्रीम कोर्ट में शामत आई हुई है। सुप्रीम कोर्ट में सुब्रमण्यम स्वामी ने जनहित याचिका के ज़रिए इस मामले को सार्वजनिक कर रखा है। सुप्रीम कोर्ट के सामने सीबीआई ने वादा किया है, कि वह संचार घोटाले में 31 मार्च तक सारी जांच पड़ताल पूरी कर लेगी। कोई भी गिर$फ्तारी करने के 60 दिन के भीतर सीबीआई को चार्जशीट तैयार करना होता है। अगर 60 दिन के भीतर सीबीआई चार्जशीट तैयार नहीं कर पाती है, तो ऐसी स्थिति में आरोपी को ज़मानत मिलने का पूरा हक बनता है। अब सीबीआई के पास सुप्रीम कोर्ट में वादे के अनुसार करीब साठ दिन ही बचे हैं। ऐसे में वह ए राजा की गिर$फ्तारी में और अधिक देर नहीं कर सकती थी। इस बीच सोमवार को शिवराज पाटिल समिति ने भी अपनी रिपोर्ट संचार मंत्री कपिल सिब्बल को सौंप दी थी। ऐसा समझा जाता है कि न्यायमूर्ति शिवराज पाटिल ने भी संचार मंत्री ए राजा सहित सिद्धार्थ बेहुरिया और आर के चंदोलिया को दोषी माना है। संचार मंत्री को सौंपी गयी रिपोर्ट के बाद इतना तो सा$फ हो गया कि सरकार के स्तर पर अब सीबीआई के सामने कोई रोक टोक नहीं लगाई जाएगी। इसका कारण सिर्फ प्रशासनिक या फिर भ्रष्टाचार से लडऩे की इच्छाशक्ति ही नहीं ,बल्कि राजनीतिक मजबूरियां भी हैं।
डॉ मुरली मनोहर जोशी की पीएसी को भरपूर प्रश्रय देने के बाद भी विपक्ष के जेपीसी मांग कम नहीं हुई। विपक्ष के हमले के मध्य में सीधे तौर पर प्रधानमंत्री और कांग्रेस है। ए राजा के इस्तीफे के बाद सीबीआई जांच और फिर अब गिर$फ्तारी से एक बार फिर कांग्रेस की कोशिश है, कि सि$र्फ राजा की बलि लेकर स्पेक्ट्रम घोटाले की आंच को ठंडा कर दिया जाए. लेकिन नवंबर 2007 में ए राजा ने प्रधानमंत्री को जो पत्र लिखा है उसमें भी इस बात का उल्लेख है कि वे जो भी कर रहे हैं,उसमें कई केन्द्रीय मंत्रियों की सहमति और अनुमति शामिल है। सहमति और अनुमति देनेवाले इन मंत्रियों में प्रणव मुखर्जी और गुलाम नबी आज़ाद के नामों का जिक्र है। कांग्रेस कभी नहीं चाहेगी कि यह मामला और तूल पकड़े तथा उसके अन्य मंत्रियों के नाम भी इस घोटाले के साथ जुड़े। ऐसे में राजनीतिक प्रबंधकों के लिए सबसे अधिक मु$फीद सौदा यही था, कि करुणानिधि को विश्वास में लेकर राजा पर सीबीआई की कार्रवाई होने दी जाए। इससे जहां केन्द्र सरकार को यह कहने का मौका मिल जाएगा कि वह भ्रष्टाचार से लडऩे के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है, वहीं आगामी बजट सत्र को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार को मौका मिल जाएगा। यह समझना हमारी भूल होगी कि भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए राजा की गिर$फ्तारी की गयी है या फिर सीबीआई कोई ऐसी स्वायत्त जांच एजंसी है जो काम करने के लिए इस कदर स्वतंत्र है कि अपनी जांच के दौरान वह किसी ऐसे पूर्व संचार मंत्री को भी गिर$फ्तार कर ले जिसकी पार्टी के सपोर्ट से सरकार चल रही है। सीबीआई के कई पूर्व डायरेक्टर भी यह मानते हैं कि सीबीआई के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप होता ही है।
फिर भी पूर्व संचार मंत्री राजा की गिर$फ्तारी से न तो कांग्रेस को कोई $खास $फायदा होनेवाला है, न भाजपा को। कांग्रेस भले ही यह दावा कर रही हो कि उसके शासनकाल में ही यह संभव हुआ है, कि उसने सीबीआई को खुलकर काम करने दिया, जिसके कारण कानून अपने अंजाम तक पहुंच सका है ,लेकिन भाजपा ने पलटवार करते हुए सा$फ कर दिया है कि राजा तो पकड़ में आये हैं, बारातियों को क्यों छोड़ रहे हो? यानी आगामी बजट सत्र में भी स्पेक्ट्रम घोटाले की गूंज कमज़ोर भले पड़ जाए, दबने वाली बिल्कुल नहीं है।
उन्हें भी पकड़ो जिन्होंने राजा को बनाया करप्शन किंग
हृ आवेश तिवारी
राजा गिर$फ्तार हो गए ,संभावनाएं पहले से थी,मगर वो लोग अब भी बचे हुए हैं,जिन्होंने राजा को किंग आ$फ करप्शन बनाया। अगर गहराई से देखा जाए तो राजा भ्रष्टाचार के इस ब्रेन गेम में सिर्फ और सि$र्फ एक मोहरा थे, वो मोहरा जिसने अंधाधुंध पैसे कमाने के लालच में दिमा$ग का इस्तेमाल करना बंद कर दिया था ,वो मोहरा जिसका इस्तेमाल देश के उद्योगपतियों, मीडिया और कार्पोरेट जगत के दलालों ने अपनी झोली भरने के लिए किया और जब मामले खुला तो पहले गर्दन भी राजा की पकड़ी गयी।
मगर बरखा दत्त और बीर संघवी जैसे पत्रकारों एवं टेलीकाम कंपनियों के उन मालिकानों से अभी तक पूछताछ किये जाने को लेकर कोई चर्चा भी नहीं हो रही जिन्होंने राजा को संचार मंत्री बनाने के लिए सारी हदें पार कर दी। राजा की गिरफ्तारी भारतीय लोकतंत्र के नस - नस में समाये भ्रष्टाचार की अमर बेल को को उखाड़ फेंकने का काम नहीं कर सकती, इस पूरे मामले में ईमानदार कार्यवाही तभी मानी जाएगी, जब उनको भी सज़ा मिले, जिन्होंने इस महाघोटाले को अंजाम देने के लिए राजा की ताजपोशी का मार्ग प्रशस्त किया था। इस पूरे घोटाले ने एक बात तो साबित कर ही दी है कि देश में बिना मीडिया के सहयोग के किसी भी बड़े घोटाले को सरंजाम दिया जाना संभव नहीं है, ये बात दीगर है कि बेहद कमजोर आत्मबल वाली सरकार और पैसा कमाने के लिए नंगई पर उतर चुके कार्पोरेट अ$खबारों और चैनलों के लिए मीडिया के इन चौधरियों के $िखला$फ हल्ला बोलना बेहद कठिन है। अपनी करतूतों को ,अपने काम का हिस्सा बताने वाली बेशर्म बरखा दत्त के लिए राजा की गिरफ्तारी क्या एक सामान्य $खबर की तरह ही होगी ?क्या उनकी आँखों में आधी रात के वो मंज़र फिर से कौंधे होंगे, जब वो नीरा से राजा की ताजपोशी के लिए निश्चिंत रहने की बात कह रही थी। क्या वीर संघवी को अपने लिखे वो शब्द याद आये होंगे जब उन्होंने नीरा से कहा था कि जैसा तुमने कहा मैंने वैसा ही लिखा था न? शायद नहीं। इसकी वजह भी है बरखा दत्त और वीर संघवी समेत इस घोटाले की प्रस्तावना लिखने वाले मीडिया कर्मी और कार्पोरेट जगत के मठाधीश ये जानते थे कि इस लड़ाई में राजा अकेले भले पड़ जाए लेकिन वो अकेले नहीं पड़ेंगे, क्यूंकि उनके पीछे उस बड़े समूह की ताकत जुडी है जो देश में राजनेताओं और राजनैतिक दलों का भविष्य बनाने - बिगाडऩे का मुगालता पाल रखे हैं। राजा मंत्री थे, पद के दुरुपयोग का मामला उन पर ठोंक दिया गया ,निस्संदेह कांग्रेस इस एक कदम पर अपना सीना चौड़ा कर के कह सकेगी कि लीजिये हमने अपने ही मंत्री के $िखला$फ कार्यवाही कर दिया, लेकिन हमने क्या किया ?आज भी बरखा दत्त एनडीटीवी से जुड़ी हैं। कार्यक्रम प्रस्तुत कर रही है, ट्वीटिंग कर रही हैं और राजदीप सरदेसाई सरीखे अपने प्रसंशकों के साथ (अब इनमें बिना रीढ़ का हिंदी $िफल्म उद्योग भी शामिल है) आत्मसुख का बोध कर रही हैं। टेलीकाम घोटाले में मीडिया, महाजनों और माननीयों के गठजोड़ का जो चौंका देने वाला सच सामने आया था, उसका आदि और अंत यहीं नहीं होता ,संचार मंत्रालय आज ही नहीं लम्बे समय से आर्थिक अपराध का केंद्र बना रहा है ,लेकिन ऐसे छोटे बड़े घोटालों की $फेहरिस्त का$फी लम्बी है जो अभी तक सामने नहीं आये हैं और अगर आये भी हैं तो उनमे मीडिया की भूमिका के बारे में सोचा भी नहीं जाता ,लेकिन अब हमें अपनी आँखों पर बंधी पट्टी खोलनी होगी ,मीडिया भी मीडिया के ज़ेरे-$गौर होनी चाहिए, राजा की गिर$फ्तारी इस बात का प्रतीक है, कि चाहते न चाहते हुए भी राजनीति में $गलतियों की कोई माफ़ी नहीं होती ,सज़ा छोटी हो या बड़ी मिलती ज़रुर है। ठीक यही सिद्धांत पत्रकारिता पर भी लागू होता है ,हम लाख कोशिश करके भी अपने दा$गदार दामन को सा$फ नहीं कर सकते। वो बरखा जो एक व्यक्ति द्वारा बरखा दत्त डाट काम नामक वेबसाईट का रजिस्ट्रेशन कराने पर उसे अदालत में खिंच लेती है ,वही बरखा किसी गाँव कस्बे के आम पत्रकार के द्वारा गरियाये जाने पर भी होंठ सिले रखने को मजबूर है, वो वीर संघवी जिन्हें सुनना भी युवाओं के लिए फ$ख्र्र की बात होती थी, उनका जि़क्र छिड़ते ही आवाज़ आती है "मारो दलाल है सा..। स्पेक्ट्रम घोटालों के आरोपियों के $िखला$फ कार्यवाही देश में भ्रष्टाचार के उन्मूलन की प्रक्रिया का हिस्सा तभी बन सकती है ,जब हम उनको भी कानून के दरवाज़े पर ला खड़ा करें, जिनकी वजह से राजा जैसा धूर्त सिंहासन पर जा बैठा ,जनता के मन में $गुस्सा जितना राजा के $िखला$फ है,उससे ज्य़ादा इन कार्पोरेट पत्रकारों के $िखला$फ भी हैं, ये सच हमें जान लेना चाहिए।

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