
महंगाई पर शहीद होगी सरकार!
मनमोहन की छीछालेदर और परेशानी-पहले मनमोहन की शालीनता को दरकिनार कर उन्हें अब तक का सबसे अक्षम पी।एम. कहा गया, उन्हें सोनिया केइशारे पर चलने वाला कहा गया, $िफर पी.एम. को आदर्श हाउसिंग सोसाइटी स्कैम के नाम पर घेरा गया, तो २जी स्पैक्ट्रम मामले में भी उनकी $खूब किरकिरी हुई, उन्होंने आहत होकर पीएसी के समक्ष पेश होने की पेशकश की। और अब महंगाई के मुद्दे पर घिरने के बाद बैठक बुलाई तो उसमें कोई हल निकलने की जगह दो दिग्गज़ आपस में ही उलझ बैठे। इन सब से आहत होकर पीएम इस्ती$फे की पेशकश कर सकते हैं, सत्ता के गलियारों में इस बात की फुसफुसाहट होने लगी है। उनका इस्ती$फा देने और मध्यावधि चुनाव करवाने के पीछे कांग्रेस पार्टी के पास पर्याप्त कारण हैं। विश्लेषण कर रहे हैं- जैनेन्द्र कुमार जयपुर।
महंगाई डायन को काबू करने के लिए सरकार कभी चीनी के व्यापारियों के यहाँ छापे मारती है, तो कभी प्याज़ के आढ़तियों को सरकारी छापों का सामना करना पड़ता है। सरकार ने सब्सिडी पर भी प्याज़ देने की मुहिम छेड़ रखी है। इसके बावजूद सब्जि़यों, दालों, चीनी जैसे खाद्य पदार्थों के साथ ही डीज़ल-पेट्रोल के दामों में भी बेतहाशा वृद्धि हो रही है। महंगाई अब $गरीब की झोली से छिटक कर पूरे देश पर शिकंजा कस चुकी है। अब तक $गरीब जनता को खाने वाली यह डायन महंगाई, कहीं सरकार को ही न डस ले, इसी आशंका के चलते महंगाई पर काबू पाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सरकार की तीन दिवसीय बैठक १२ जनवरी को समाप्त हो गई। सरकार की मैराथन बैठक में महंगाई से पार पाने की कोई सूरत तो नहीं निकली, अलबत्ता प्रणब मुखर्जी और शरद पवार उलझ बैठे। यह बैठक कितनी महत्वपूर्ण थी, इस बात का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसमें विश्वप्रसिद्ध अर्थशास्त्री और देश के पीएम मनमोहन सिंह, गृह मंत्री पी.चिदंबरम, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, कृषि मंत्री शरद पवार, कैबिनेट सैक्रेट्री, ची$फ इकोनॉमिक एडवाइज़र सरीखे दिग्गज़ शामिल हुए। तीन दिनों तक दिमाग की सारी नसों को हिला देने वाली इस बैठक का नतीज़ा सि$फर रहा, या यूँ कहिए कि ढाक के तीन पात। पी.एम. की ओर से कहा गया कि महंगाई की वज़ह वैश्विक अर्थव्यवस्था है। यह बात भी निकल कर आई कि सरकार के पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं, कि वह घुमाए और महंगाई फुर्र से $गायब हो जाए। इतना ज़रूरी कहा गया कि मौसम की मार की वज़ह से $फसलों पर विपरीत असर पड़ा है जिसके चलसे खाद्य जिंसों की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, जो संभवतय: अगली $फसल आने के बाद काबू में आ जाएंगी।
महंगाई के मुद्दे पर सरकार के हाथ खड़े करने के बाद अब मध्यावधि चुनावों की तलवार लटकती नज़र आने लगी है। प्याज़ के कीमतें एक बार $िफर से चढ़ी हैं। भारतीय राजनीति इस बात की गवाह है कि महंगाई पहले भी सरकार को सत्ता से उतार चुकी है। अब ऐसा हो तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हालात ऐसा ही इशारा करते हैं। मनमोहन की छीछालेदर और परेशानी-पहले मनमोहन की शालीनता को दरकिनार कर उन्हें अब तक का सबसे अक्षम पी.एम. कहा गया, उन्हें सोनिया के इशारे पर चलने वाला कहा गया, $िफर पी.एम. को आदर्श हाउसिंग सोसाइटी स्कैम के नाम पर घेरा गया, तो २जी स्पैक्ट्रम मामले में भी उनकी $खूब किरकिरी हुई, उन्होंने आहत होकर पीएसी के समक्ष पेश होने की पेशकश की। और अब महंगाई के मुद्दे पर घिरने के बाद बैठक बुलाई तो उसमें कोई हल निकलने की जगह दो दिग्गज़ आपस में ही उलझ बैठे। इन सब से आहत होकर पीएम इस्ती$फे की पेशकश कर सकते हैं, सत्ता के गलियारों में इस बात की फुसफुसाहट होने लगी है। उनका इस्ती$फा देने और मध्यावधि चुनाव करवाने के पीछे कांग्रेस पार्टी के पास पर्याप्त कारण हैं। अगर मनमोहन स्ती$फा देते हैं तो मनमोहन की मिस्टर क्लीन की छवि बरकरार रहेगी और लोगों की सहानुभूति का उनके साथ ही कांग्रेस को भी निश्चित ही $फायदा मिलेगा। दूसरा राहुल को प्रधानमंत्री के तौर पर का$फी समय से प्रोजेक्ट किया जा रहा है। पार्टी के आलाकमान की यह इच्छा मध्यावधि चुनाव से पूरी हो जाएगी। राहुल गाँधी, सचिन पायलट जैसे युवा नेता होने से देश का युवाओं का आधार कांग्रेस की ओर हो सकता है। कांग्रेस ने अपनी सरकार के मंत्रियों का नाम घोटाले में आने के बाद तत्काल उनपर कार्रवाई की और उन्हें पद से हटा दिया। इनमें शशि थरूर, कलमाडी, ए.राजा जैसे मंत्री शामिल हैं और उनपर कार्रवाई जारी है। कांग्रेस ने सरकार को पाक सा$फ बनाने का अभियान चला रखा है और दागियों को हटाने की मुहिम तेज़ कर दी है। प्याज़ के मुद्दे ने बीजेपी को सत्ता से उतार दिया था तो कांग्रेस ने प्याज़ के कीमतें बढ़ते ही उसके कीमतों पर नियंत्रण के लिए सस्ती दर पर प्याज़ उपलब्ध करवाने का सिलसिला शुरू करने के साथ ही प्याज के, चीनी के जमा$खोरों के यहाँ छापे की कार्रवाई कर इस बात का संकेत दिया, उसे जनता की $िफक्र है। इसका $फायदा भी कांग्रेस के खाते में ही जाएगा। लखनऊ में हाल ही एक विद्यार्थी के महंगाई पर पूछे सवाल के जवाब में राहुल गाँधी ने कहा -महंगाई कम न होने की वजह गठबंधन की सरकार के दल हैं, उनका इशारा राकांपा के सुप्रीमो शरद पवार की ओर था। यह जग ज़ाहिर है कि पवार शुरू से ही महत्वाकांक्षी रहे हैं, उन्हें जब इस बात का अहसास हुआ कि अनुभवी होने के बाद भी कांग्रेस में रहते उन्हें पीएम की कुर्सी नहीं मिल सकती, क्योंकि इसके उत्तराधिकारी के रूप में पार्टी और देश की जनता राहुल को देख रही है, तो उन्होंने कांग्रेस से अलग पार्टी बनाई। और जोड़-तोड़ की राजनीति में लग गए। ऐसे में राहुल के जवाब से पवार के भड़कने की पूरी आशंका है। बीजेपी जिस बिहार में सफलता का राग अलापते $िफलवक्त नहीं अघा रही है। दरअसरल, वह जीत बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने जैसी ही है। बिहार में बीजेपी की जीत नहीं हुई बल्कि कमज़ोर विपक्ष और कांग्रेस की राजद के लालू यादव से करीबी ही कांग्रेस को ले डूबी। बीजेपी की बात करें तो उसे मध्यावधि चुनाव में $फायदे के बजाय नुकसान ही ज्य़ादा होगा, इसकी भी पर्याप्त वजहें हैं। पहली और सबसे $खास वजह तो यही है कि पार्टी में कोई भी ऐसा कद्दावर नेता नहीं है जिसे बतौर पी.एम. और पार्टी के चेहरे के रूप में पेश किया जा सके। ऐसे में पार्टी के सभी सदस्यों का ज्य़ादा समय तक एक ही दिशा में चलना $िफलवक्त तो संभव नहीं लगता। पार्टी का एक सदस्य कुछ कहता है, तो दूसरा कुछ। जेपीसी की माँग पर जब बीजेपी ने कांग्रेस को घेरा तो मनमोहन की पीएसी के समक्ष पेश होने की गुज़ारिश पर पीएसी प्रमुख और बीजेपी के आला नेता मुरली मनोहर जोशी ने मौन साध लिया, जिससे यह कयास लगाए जा रहे थे, कि यह संवभतया उनकी मौन चुप्पी उनकी सहमति हो सकती है और इससे पूरी बीजेपी में खलबली मच गई थी। ऐसे अंतरविरोधों से जूझती बीजेपी चुनाव में कुछ $खास कर पाएगी, इसकी संवाभना कम ही नज़र आती है। एक दमदार वजह यह भी है कि बीजेपी की कथनी और करनी में का$फी अंतर है, यह बीजेपी ने जता दिया है और जनता इस बात को अच्छे से समझ गई है, ऐसे में उनका पक्ष कांग्रेस की ओर ही रहेगा इसमें कोई दोराय नहीं हो सकती। बीजेपी कांग्रेस को तो भ्रष्टाचार और महंगाई के मुद्दों पर कांग्रेस को घेरती रही, लेकिन जब बीजेपी की सरकार थी तो उसने प्याज़ के दाम घटाने के लिए क्या किया? यह किसी से छिपा नहीं है। जहां तक भ्रष्टाचार की बात है तो उसका दामन $खुद ही दा$गदार है तो वह किस मुंह से दूसरे को सा$फ रहने की सीख दे सकती है? येदियुरप्पा को उसने $फौरी फायदे के चलते अब तक नहीं हटाया है और न ही आगे उसे हटाने की उसकी नीयत नज़र आती है। एक तरह से येदियुरप्पा बीजेपी की गल$फांस बन गए हैं। येदियुरप्पा का जनाधार मज़बूत है। वे जनसंघ जमाने से ही पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। वे दक्षिण भारतीय राज्य में मुख्यमंत्री बनने वाले भाजपा के पहले नेता हैं। उनका रिकॉर्ड का$फी अच्छा है और वे कर्नाटक में का$फी लोकप्रिय भी हैं। $खासकर लिंगायत समुदाय के जनप्रिय नेता हैं और कर्नाटक की २० प्रतिशत आबादी लिंगायत समुदाय से है। येदियुरप्पा से इस्ती$फा लेने पर वे अलग से पार्टी बना सकते हैं, और बीजेपी के मुकाबले भी खड़े हो सकते हैं। ज़ाहिर है ऐसे में बीजेपी के हाथ से कर्नाटक का गढ़ चला जाएगा। दूरदृष्टि से भी बीजेपी को इससे दक्षिण भारत में पैर जमाने के सभी रास्ते लगभग बंद हो जाएंगे। इस सब को देखते हुए बीजेपी ने कोई कार्रवाई नहीं की है। इसके बावजूद बीजेपी को यह नहीं भूलना चाहिए कि चुनाव में यही मुद्दा उछाल-उछाल कर कांगे्रसी और दूसरे दल पार्टी के चेहरे पर कालिख मलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। ऐसे में पार्टी की राष्ट्रीय छवि तो धूमिल होगी ही, अगर उसका सूपड़ा-सा$फ ही हो जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। अब देखना यह है कि राजनीति की बिसात पर राज करने वाले नेताओं की ओर से मध्यावधि चुनाव का शंखनाद कब और कैसे होता है। जनता को इसी का इंतज़ार है, क्योंकि वह भ्रष्टाचार और महंगाई के दलदल में $फंसे देश की सरकार को चुनाव के ज़रिए फिर से अपने मत की शक्ति दिखाने को बेताब है।
किसान पुत्र, किसानों की सुध लो
बड़े शर्म की बात है कि किसान पुत्र के प्रदेश में किसानों द्वारा उन्हें अपना जीवन निर्रथक सा लग रहा है और वे थोक में आत्महत्यायें किये जा रहे हैं। इसी एक माह के दौरान सात किसानों द्वारा आत्म हत्यायें की गई हैं, और करीब इतने ही किसानों ने कीटनाशक व अन्य ज़हरीली वस्तुओं का सेवन कर, $खुद कुशी करने का दुस्साहस किया है।
भोपाल। प्रदेश के किसान पुत्र शिवराजसिंह के हाथों में प्रदेश की कमान है। उसकी अपनी पार्टी भा.ज.पा. का वर्चस्व हासिल है। विपक्षी दल इतने दुर्बल हैं कि व्यवस्था में कहीं भी द$खल देने का न अधिकार रखते हैं, न उनकी कुव्वत है। ऐसे में इन के राज में किसान, जो सर्दी, गर्मी, बरसात, जाड़ा, आन्धी, तू$फान, के सारे संकट झेल कर अन्न व अन्य खाद्य पदार्थ उपजा कर, हम सब का पेट पालते हैं, वही दुखी हैं। दुख की भी कोई हद होती है। दुख जब हद से बढ़ जाता है और कहीं से कोई सहारा नहीं सूझता, तभी दुखी व्यक्ति अपना जीवन निरर्थक जान कर, आत्यहत्या की सोचता है। बड़े शर्म की बात है कि किसान पुत्र के प्रदेश में किसानों द्वारा उन्हें अपना जीवन निर्रथक सा लग रहा है और वे थोक में आत्महत्यायें किये जा रहे हैं। इसी एक माह के दौरान सात किसानों द्वारा आत्म हत्यायें की गई हैं, और करीब इतने ही किसानों ने कीटनाशक व अन्य ज़हरीली वस्तुओं का सेवन कर, $खुद कुशी करने का दुस्साहस किया है।
अभी कुछ ही दिन पूर्व प्रदेश के करीब एक लाख किसानों का जमावड़ा भोपाल में हुआ जब उन्हेंने ट्रैक्टर ट्रालियां , तम्बू कनातें, कम्बल राशन आदि सहित 3 दिनों तक यह डेरा डाले रखा और उन के नेताओं से चर्चा कर उन्हें आश्वासनों की घुटी देकर वापिस अपने अपने घरों को भेज दिया गया। क्या माननीय मुख्यमंत्री जी किसानों के बीच में से हैं, उनके दुख दर्द को समझते हैं या आंख कान आदि बन्द कर जानते हुये भी अनजान का सा अभिनय कर रहे हैं। एक ओर तो ''वोट बटोरÓÓ दौड़ लगाने में मस्त, कन्याओं के शादी विवाह करवा रहे हैं एवं इसी प्रकार की और अनेक योजनायें चलाये जा रहे हैं, दूसरी ओर घर परिवार समाज की जड़ अन्नदाता किसान की अनदेखी कर के उन्हें $खुद कुशी हेतु मज़बूर किया जा रहा है। न असली अच्छे खाद,बीज, कीटनाशक आदि उपलब्ध कराये जा रहे हैं, और न ही मौसम की मार के समय कोई तहत दी जा रही है। आर्थिक सहायता या सहयोग की तो बात ही क्या करें। बेचारे निजी अथवा बैंकों के कजऱ्ों के बोझ तले दबे परेशान किस से शिकायत करें या गुज़ारिश करें। गिनाने को तो ढेर सारी योजनायें बनाई गई, हैं और उन योजनाओं की आड़ में आप श्री मान जी के चमचे, लगुए भगुए सब चट कर जाते हैं, और किसान को मिलता है, तो केवल आप जैसे नेताओं का आश्वासन अथवा द$फ्तरों के चक्कर। किसान पुत्र मुखिया के रहते उनकी टीम के मंत्री इस दुर्दशा का जि़म्मेदार स्वंय किसानोंं को ही बता रहे हैं, और उनके कारिन्दे इन आत्महत्याओं को किसानों के आर्थिक कारणों को न मान कर पारिवारिक कारण बता रहे हैं। आप के ही $खैमे से इन घटनाओं और $खबरों को मीडिया की साजि़श बताया जा रहा है। इस से भी और शर्म की बात क्या हो सकती है, कि सही तस्वीर व आयना दिखाने वाले को ही सूरदास बताया जा रहा है। किसान पुत्र के प्रदेश में ही उस की टीम के सारे मंत्रियों के पास अच्छे से अच्छी और बढिय़ा कारें आदि गाडिय़ोंं के मौजूद रहते 22-22 लाख की और नई गाडिय़ों की व्यवस्था की जा रही है। सारे विधायकों मंत्रियों के वेतन भक्तों में इज़ा$फा कर $गरीब किसान जनता पर हर तरह का टैक्सों का बोझ लाद दिया गया है। $गरीब किसान को कुएं लगाने चलाने हेतु कई प्रकार के पापड़ बेल कर कजऱ् उठा कर भी अधिकारियों दलालों को दलाली यदि नहीं दी जाती, तो सैंकड़ों चक्कर लगाने के बाद भी कजऱ् की सुविधा नहीं मिल पाती। इसी लिये हे प्रदेश के मुखिया, किसान पुत्र, किसी प्रकार भी अन्य योजनाओं पर भले ही कुछ समय हेतु विराम लगाना पड़े, मौसम की मार व सरकारी कारिन्दों की $िफटकार खाये दुख दर्द से कराह रहे प्रदेश के इन अन्नदाताओं की सुध लो। उनके लिये अच्छे खाद, बीज, आर्थिक सहायता, बिजली, पानी व पशुओं हेतु चारा एवं चिकित्सा आदि शीघ्र उपलब्ध कराओ, तभी आपका यह प्रदेश स्वर्णिम प्रदेश बनने का सपना पूरा कर पायेगा।
हंसाएगी यमला पगला दीवाना: बॉबी
पिता धर्मेन्द्र के साथ देओल बंधुओं की $िफल्म यमला पगला दीवाना के प्रति दर्शकों की दीवानगी अभी से दिख रही है। पहले प्रोमो से ही पाजि़टिव रेस्पांस मिल रहे हैं। सनी और धर्मेन्द्र ने म्यूजि़क रिलीज़ के समय कहा भी कि लोग ट्रेलर देखकर ही ऐसी तारी$फ कर रहे हैं, मानो हमारी फिल्म हिट हो गई है। ख़ैर, $िफल्म का बॉक्स ऑ$िफस रिजल्ट तो $िफल्म रिलीज़ के बाद पता चलेगा।
़ यमला पगला दीवाना को लेकर आपकी पहली राय क्या है?
ह्न सालों के बाद ऐसी $िफल्म की है, जिसे लेकर पूरा विश्वास बना हुआ है। यह लोगों को हंसाएगी। दर्शकों के रिएक्शन भी हमारे विश्वास के समान मजबूत और पाजिटिव हैं। कॉमेडी मुश्किल काम है। आजकल कॉमेडी $िफल्में ज्य़ादा बन रही हैं, लेकिन $गौर करेंगे कि उनमें कॉमेडी कम होती है और लती$फेबाज़ी ज्य़ादा रहती है। हमारी $िफल्म किसी का मज़ाक नहीं उड़ाती।
़ लेकिन प्रोमो में तो आप सनी और धरम जी का मज़ाक उड़ाते हैं?
ह्न ऐसा लगता है कि मैं उनका मज़ाक उड़ा रहा हूं। भैया की इमेज सभी को पता है। हमारा राइटर जस्सी है। उसने डायलॉग लिखे हैं। पहले लगा कि यह सही लगेगा कि नहीं.., फिर रियलाइज़ किया कि इस पर दर्शक हंसेंगे। बाद में उन्होंने टंकी वाला सीन भी करवा लिया मुझसे। शोले के उस सीन को आप री-क्रिएट नहीं कर सकते। $िफल्म में मेरा कैरेक्टर जैसा है, वह इस तरह की बात सोच सकता है। उसे लगता है कि टंकी पर चढ़ जाएगा तो बात बन जाएगी। भैया बोलते हैं कि कुछ नहीं हो सकता, जमाना बदल गया है। आजकल टंकी पर चढऩे से बात नहीं बनती।
़ यह $िफल्म पंजाब में शूट हुई है। आप सभी पंजाबी हैं। कैसा अनुभव रहा?
ह्न हम तीनों कभी इतने दिनों तक एक साथ पंजाब में नहीं रहे। हमलोग 45 दिनों तक वहां रहे। सर्दी और गर्मी में $िफल्म की शूटिंग चली। मां के मायके के पास हमलोग शूटिंग कर रहे थे। वहां से खाना आ जाता था। $खूब छक कर खाया हम सभी ने। वहां से वज़न बढ़ाकर लौटे।
़ आपके परिवार में स्नेह और आदर की अहमियत है। उसका $खयाल भी रखा जाता है, लेकिन इस $िफल्म में वे हदें टूट गई लगती हैं?
ह्न यह तो $िफल्म है। सभी जानते हैं, कि मैं भैया और पापा के सामने कैसे बिहेव करता हूं। मैं तो इस तरह से बातें भी नहीं करता। $िफल्म के लिए ज़रूरी था। यह कॉमेडी $िफल्म है, इसलिए मुझे डायलॉग बोलने या सीन करने में ज्य़ादा दिक्कत नहीं हुई।
़ पापा के साथ कॉमिक टाइमिंग मैच करने में भी चुनौती आई?
ह्न उनकी कॉमिक टाइमिंग लाजवाब है। सभी जानते हैं कि वे कॉमेडी $िफल्मों में कैसा कमाल करते हैं। हमने मैच करने की कोशिश की है, लेकिन पापा के साथ हमारी तुलना नहीं हो सकती। इस उम्र में भी उनका जोश देखते ही बनता है। आप के सामने एक अच्छा ऐक्टर हो, तो आप भी अच्छा करने लगते हैं।
़ क्या कहानी है $िफल्म की?
ह्न यह दो ठगों की $िफल्म है। मैं और पापा बाप-बेटे हैं। $िफल्म में भाई बिछड़ गया है। बड़ा भाई अपने छोटे भाई और पिता को खोजते हुए आया है। हम दोनों उसका $फायदा उठाते हैं। हमें लगता है कि हमारा दिमा$ग और इसकी ताकत साथ हो जाए तो हम दुनिया लूट लेंगे। उसी में कहानी बनारस से पंजाब पहुंचती है।
़ $िफल्म से दर्शकों की उम्मीदें ज्यादा हैं? क्या उनकी उम्मीदें पूरी होंगी?
ह्न ज़रूर होंगी। देखिए $िफल्म अच्छी बनी है, इसलिए प्रोमो इतने अच्छे बने हैं। प्रोमो हमने अलग से शूट नहीं किए हैं। जो भी लोग देख रहे हैं, वह $िफल्म में हैं। $िफल्म में सिचुएशन और कंफ्य़ूज़न है। ज़बरदस्त कॉमेडी है। अभी से मैं क्या बताऊं। जब लोग देखेंगे, तो पता चलेगा।
़ $िफल्म के निर्देशक समीर कार्णिक का साथ कैसा लगा?
ह्न अब उनसे दोस्ती हो गई है। उनके काम पर मुझे यकीन है।
़ इस $िफल्म की शुरूआत कैसे हुई?
ह्न भैया की पारखी नज़र ने राइटर जसविंदर में कुछ देखा। उन्होंने उसे समीर के पास भेजा। पहले तो समीर को लगा कि हमने किसी राइटर रिश्तेदार को कुछ करने के लिए भेज दिया है। बाद में वे जसविंदर के साथ बैठे तो कहानी बनती चली गई। यह $िफल्म दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करेगी। उनके लिए नए साल की अच्छी शुरुआत होगी।

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