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Friday, January 7, 2011





आरूषि मर्डर केस
रसू$ख का दबदबा या जाँच में कोताही

कुमार

राजेश तलवार जैसे नामचीन आदमी की चौदह वर्षीय बेटी आरुषि तलवार को करीब तीन साल पहले उसके ही घर में मौत के घाट उतार दिया गया। इस मासूम की हत्या के बारे में शुरू से ही पुलिस प्रशासन मीडिया से कुछ भी कहने से कन्नी काटता रहा, और अब सीबीआई ने भी अपर्याप्त साक्ष्यों का हवाला देते हुए क्लोज़र रिपोर्ट पेश कर दी है। हालांकि, अब तक मिले साक्ष्यों की रोशनी में देखा जाए, तो सा$फतौर पर तलवार दंपती शक और शुबहा के दायरे में नज़र आते हैं। फिर भी इन पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई न कर पुलिस और सीबीआई लीपापोती करती ही नज़र आती है। कहीं इन सबकी वजह अरुषि के पिता डॉ. राजेश तलवार का रसू$खदार होना तो नहीं है?
आरुषि तलवार नोएडा के जलवायु विहार स्थित अपने निवास पर संदिग्ध अवस्था में मृत पाई गई। उसके अगल ही दिन उसके 45 वर्षीय नौकर हेमराज की लाश छत से बरामद की गई। महीनों तक इस दोहरे हत्याकांड की खबरें अखबारों अैर पत्र-पत्रिकाओं की सुर्खियों में रहीं। शुरू से ही इस केस में पुलिस कु छ भी सा$फ-सा$फ बोलने से अचकचाती रही। उसके बाद इस मुद्दे को अखबारों और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के ज्य़ादा उछालने और तूल पकड़ते देखकर अरुषि और हेमराज के दोहरे हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने के लिए 1 जून, 2008 को जाँच सीबीआई को सौंपी गई। इसके बाद जनता को उम्मीद थी कि देर-सवेर ही सही, यह गुत्थी सुलझ ही जाएगी और कातिलों को उचित सजा मिल पाएगी, लेकिन इससे इतर हाल ही सीबीआई ने पर्याप्त सबूत न होने की बात कहकर इस मामले में क्लोज़र रिपोर्ट पेश की है। वहीं दूसरी तर$फ इस मामले में हत्या के शक में पकड़े गए नौकरों के वकील ने सीबीआई पर मानहानि का मुकद्दमा ठोंकने की बात कही है। इससे पहले कि आरुषि हत्याकांड अतीत के गर्त में समा जाए, आम जनता को भी इस मामले के बारे में साक्ष्यों की रोशनी में यह जानना उचित होगा कि आखिर इसकी सच्चाई क्या हो सकती है। सीबीआई निदेशक ए.पी. सिंह आरुषि हत्याकांड में अब तक मिले साक्ष्यों को अपर्याप्त मानते हैं, लेकिन कोर्ट चाहे तो इन्हीं साक्ष्यों के बूते राजेश तलवार के $िखलाफ आरोप तय यानी चार्जेज़ फ्ऱेम करते हुए ट्रायल शुरू कर सकती है। $िफलवक्त सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता के.टी.एस. तुलसी ने कहा है कि अदालत इस क्लोज़र रिपोर्ट पर कोई भी कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र है। हालांकि, इस केस में जांच से जुड़े सीबीआई के अधिकारियों का अब भी यही मानना है कि उनके जुटाए सुबूत तलवार दंपती को आरोपी बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
क्या कहती है सीबीआई की क्लोज़र रिपोर्ट
सीबीआई की नज़र में तलवार दंपती को बेकुसूर ठहराने वाले तथ्य हैं

क्लोज़र रिपोर्ट के अनुसार राजेश के कपड़ों में सिर्फ आरुषि के खून के धब्बे मिले हैं, हेमराज के नहीं। नूपुर के कपड़ों पर भी किसी तरह के $खून के धब्बे नहीं मिले। गोल्$फ क्लब पर खून नहीं मिला और दूसरा धारदार हथियार बरामद नहीं किया जा सका है। शराब की बोतल पर मिले अंगुलियों के निशानों की पहचान नहीं हो सकी। हेमराज के $खून के धब्बे आरुषि के बिस्तर पर नहीं मिले। नूपुर पर हुए नार्को टैस्ट बेनतीजा निकले। दोहरे हत्याकांड का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। हत्यारों के खून से सने कपड़े और जिस कपड़े से $खून सा$फ किया गया, वे बरामद नहीं किए जा सके।
क्या है आरुषि और हेमराज की हत्या की गुत्थी की कहानी सीबीआई की क्लोज़र रिपोर्ट के नज़रिये से
क्लोज़र रिपोर्ट के अनुसार 15 मई 2008 की रात 9:30 बजे डॉ. राजेश तलवार अपने घर पहँचे थे। कुछ देर बाद कोरियर वाला आया, उसने हेमराज को पैकेट दिया, जिसमें डिजिटल कैमरा था, जो डॉ. तलवार ने आरुषि को जन्मदिन 24 मई के दिन देने के लिए मँगवाया था। हालाँकि, तलवार दम्पती ने उसी वक्त आरुषि के कमरे में जाकर उसे कैमरा दिया। आरुषि ने कैमरे से अपने माता-पिता की तस्वीरें खींचीं। उसके बाद दोनों अपने कमरे में आ गए। रात 11:00 बजे नूपुर आरुषि के कमरे में गई और इंटरनेट का राइटर ऑन किया। राजेश ने 11:57 बजे इंटरनेट ऑन किया और रात 12:08 तक उसका उपयोग किया। इस दौरान रात 12:00बजे आरुषि के मित्र अमोल ने लैंडलाइन से $फोन किया, जो राजेश के कमरे में था, उसे किसी ने नहीं उठाया। 16 मई 2008 की सुबह 6:00 बजे नौकरानी भारती ने कॉलबैल बजाई तो रोज़ाना की तरह हेमराज ने दरवाजा नहीं खोला, बल्कि नूपुर ने हेमराज के कमरे से चाबी लेकर दरवाज़ा खोलने की कोशिश की और असफल रहने पर दरवाज़ा बाहर से बंद होने की बात कह बालकनी से चाबियां भारती को दीं। दरवाज़ा खोलकर अंदर आने पर तलवार दंपती ने रोते हुए भारती से कहा, देखो... हेमराज क्या करके गया है? भारती ने देखा तो वहाँ आरुषि की लाश स$फेद चादर से ढंकी थी।
तत्काल दोस्तों और संबंधियों को बुलाया और पुलिस को सूचना सवा घंटे बाद दी गई, जिसमें बताया गया कि हेमराज हत्या करके भाग गया है। इसी दौरान राजेश के मित्र डॉ.राजीव और डॉ.रोहित कोचर भी वहाँ आए, उन्हें टैरेस के दरवाज़े पर खून के धब्बे दिखे, जिन्हें सा$फ करने की कोशिश की गई। पुलिस ने भी निशान देखने के बाद दरवाजा खुलवाना चाहा, लेकिन राजेश ने अनसुनी कर यही कहा कि पुलिस को इन सब बातों में वक्त ज़ाया करने के बजाय हेमराज को ढँूढऩा चाहिए। दोपहर 3:00बजे आरुषि की बॉडी को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया। इसके बाद फर्श और कमरे की दीवारें जल्दबाजी में सा$फ की गईं। सीबीआई की रिपोर्ट के अनुसार 16 मई से ही राजेश के भाई दिनेश उनके दोस्त डॉ.सुशील चौधरी और रिटायर्ड डीएसपी के.के.गौतम आपस में सम्पर्क में थे। डॉ.चौधरी ने तब गौतम को बताया कि डॉ.दिनेश चाहते हैं कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में रेप का जि़क्र न हो। हत्या के बाद $फोन $गायब था, जो नोएडा के सदरपुरा में करीब 15 दिन बाद मिला, लेकिन उसकी मैमोरी किसी ने हटा दी थी। डॉ. राजेश की डाइनिंग टेबल पर मिली शराब की बोतल पर आरुषि और हेमराज के $खून के निशान थे। पोस्टमार्टम शुरू होने से पहले डॉ.दिनेश ने पोस्टमार्टम करने वाले डॉ.डोहरे की बात एम्स के फॉरेन्सिक विभाग के हैड डॉ.डोगरा से करवाई थी।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार आरुषि और हेमराज दोनों की हत्या रात 12:00 से 1:00 के बीच की गई थी। दो तरह के हथियारों का प्रयोग किया गया, पहले भारी हथियार से मारा गया और फिर गला काटा गया। दोनों की हत्या में काम आए हथियार एक ही थे। डॉ. राजेश के घर से मिले गोल्$फ क्लब नंबर पर पाँच का डाइमेंशन आरुषि और हेमराज के सिर पर लगी चोट से डाइमेंशन से मेल खाता है। हेमराज के कमरे में 1 जून 2008को ली गई फोटो में एक ही क्लब दिख रहा है। सीबीआई ने तलवार से दूसरे क्लब के बारे में तफ़्तीश की तो वे संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए। हत्या के सालभर बाद राजेश ने कहा घर की स$फाई के दौरान क्लब मिला, लेकिन सालभर तक उन्होंने क्लब मिलने की बात सीबीआई को नहीं बताई। आरुषि और हेमराज के गले को किसी तेज धार वाले शस्त्र से काटा गया, वो भी सर्जिकल प्रीसीसीजन के साथ, ऐसा ऑपरेशन की टे्रनिंग लेने वाला व्यक्ति ही कर सकता है और राजेश सर्जिकल ट्रेनिंग ले चुके हैं।
रिपोर्ट से उठे सवाल जो आम आदमी को सोचने पर मजबूर करते हैं
1.हत्या के बाद लाश को हत्यारा स$फेद चादर से क्यों ढंकेगा? 2.$खून के धब्बों को किसने सा$फ करने की कोशिश की? 3.आरुषि के कमरे को किसके कहने पर और क्यों धोया गया? 4डॉ.दिनेश पोस्टमार्टम में रेप का जि़क्र न हो, ऐसा क्यों चाहते थे? 5.मोबाइल की मैमोरी किसने और क्यों हटाई? 6.डॉ.सुनील डोहरे की बात एम्स के $फॉरेन्सिक विभाग के हैड डॉ.डोगरा से करवाने के पीछे डॉ. दिनेश का क्या मकसद था? 7.स्टिक मिलने के बाद भी तलवार ने यह बात सीबीआई को सालभर बाद क्यों बताई? 8.दरवाज़े पर $खून के निशान होने के बाद भी दरवाज़े की चाबी देने में डॉ. राजेश के आनाकानी करने की क्या वजह थी? 9.हत्या में हत्यारे ने सर्जिकल प्रीसीसीजन का ही उपयोग क्यों और कैसे किया? 10.टैरेस के दरवाजे पर आमतौर पर ताला नहीं लगाया जाता, फिर उस दिन ताला क्यों लगाया गया था? 11.पुलिस को तुरंत सूचना देने के बजाय करीब सवा घंटे देर से क्यों दी गई? यह सब जानने के बाद शायद ही कोई आदमी इन साक्ष्यों को अपर्याप्त माने फि र सीबीआई ने इन्हें अपर्याप्त मानते हुए क्लोज़र रिपोर्ट क्यों पेश की? यही अब आम जनता के मन को मथ रहा है। देखना है कि क्या कोर्ट इस केस को शुरू कर आरुषि के हत्यारे को सज़ा दिलवाएगी या यह मामला भी जांच, कोर्ट और कानूनी पेचीदगियों के भँवर में फंस कर दम तोड़ देगा।
इस मामले का और सा$फ करने के लिए तिथिवार जानकारी दी जा रही है, जिससे पाठकों को इस जटिल घटनाक्रम को समझने में आसानी होगी-

16 मई, 2008
आरुषि तलवार नोएडा के जलवायु विहार स्थित अपने निवास पर संदिग्ध अवस्था में मृत पाई गई। हत्या का शक 45 वर्षीय नौकर हेमराज पर। हेमराज लापता।
17 मई, 2008
हेमराज की लाश छत से बरामद।
23 मई, 2008
दोहरे मर्डर केस में डॉ. राजेश तलवार गिरफ़्तार।
1 जून, 2008
जाँच सीबीआई को सौंपी गई।
11 जून, 2008
डॉ. तलवार के कम्पाउंडर कृष्णा का नार्को टैस्ट और दो दिन बाद उसकी गिरफ़्तारी।
20 जून, 2008
डॉ. राजेश तलवार का लाई डिटैक्टर टैस्ट।
27 जून, 2008
डॉ. तलवार की बिज़नेस पार्टनर डॉ. अनीता दुर्रानी का नौकर राजकुमार गिरफ्तार।
11 जुलाई, 2008
पड़ोसी का नौकर विजय मंडल गिरफ़्तार। डॉ. तलवार को क्लीन चिट दी गई।
21 जुलाई 2008
नेपाली नागरिक कृष्णा थापा और राजकुमार के समर्थन में जुटे नेपाली।
अक्टूबर 2008
पोस्टमार्टम से जुड़े डॉक्यूमैंट्स डिस्ट्रिक्ट हॉस्पीटल से $गायब।
4 सितम्बर, 2009
सबूतों से छेड़छाड़ के मामले की जाँच शुरू। हैदराबाद के डीएनए $िफंगरप्रिंटिंग एंड डाइग्नोस्टिक सैंटर ने आरुषि के कौमार्य के सैम्पल यह कह कर लौटा दिए कि वो उसके नहीं हैं।
5 जनवरी, 2010
सीबीआई ने तलवार दंपती के नार्को टैस्ट की इजाज़त माँगी, कोर्ट ने इजाज़त दी, अभी तक परिणाम घोषित नहीं किए गए।
29 दिसंबर, 2010
सीबीआई ने मामला बंद करने का निर्णय लिया, तीनों नौकरों को क्लीन चिट दी। डॉ. तलवार एकमात्र संदिग्ध।
3 जनवरी, 2011
क्लोज़र रिपोर्ट पर $गाजि़याबाद की विशेष अदालत ने सीबीआई को आड़े हाथों लेते हुए पूछा कि उन्हें इस मामले को $फाइल करने की इतनी जल्दबाज़ी क्यों है?
7 जनवरी, 2011
मामले की अगली सुनवाई।


'लोहड़ी का पर्व
लोकेश कुमार
भारती
हर साल 13 जनवरी को भारत के उत्तरी राज्यों में बड़ी धूमधाम से 'लोहड़ीÓ का पर्व मनाया जाता है। सभी संस्कृतियों को अपनाने वाली दिल्ली ने लोहड़ी को भी दिल से अपनाया है। राजधानी में पंजाबी संस्कृति का खासा प्रभाव है तो लोहड़ी का उत्साह तो नज़र आना ही है।
यूं तो लोहड़ी का सीधा संबंध किसानों से है, पर इसमें हर वर्ग के लोग हिस्सा लेते हैं। किसान लोहड़ी को रबी $फसल पकने की $खुशी में मनाते हैं। झूमने, नाचने-गाने का मौका होता है ये। पंजाब के किसानों के बीच यह पर्व विशेष उत्साह से मनाया जाता है, तो देशभर के पंजाबियों में भी कम उत्साह नहीं होता। लोहड़ी में लोग सर्वशक्तिमान ईश्वर से अच्छी खेतीबाड़ी होने की कामना करते हैं। पंजाब में गेहूं की $फसल अक्टूबर में बोई जाती है और मार्च-अप्रैल में काटी जाती है। मध्य जनवरी तक यह पता चल जाता है, कि $फसल कैसी होगी? हकीकत यह है कि गेहूं की कटाई तक लोग लोहड़ी को सेलिब्रेट करते हैं। पंजाब में लोहड़ी के दिन की समाप्ति सरसों के साग, मक्के की रोटी और रौ (ईख के रस और चावल से बनी) की $खीर के साथ होती है।
बोन $फायर
लोहड़ी में अगर 'बोन $फायरÓ न हो, तो बात अधूरी रह जाती है। शाम ढलते ही सूखी लकडिय़ां इक_ी की जाती हैं। धीरे-धीरे लोग अपने दोस्तों और सगे-संबंधियों के साथ वहां जमा होने लगते हैं। जब भीड़ जमा हो जाती है, तो लकडिय़ों में अग्नि जलाकर लोहड़ी का माहौल बनाया जाता है। फिर शुरू होता है नाचने-गाने का दौर, जो कहीं-कहीं तो पूरी रात चलता है। ढोल की थाप पर थिरकते पांव, हाथों में हाथ डाले नए-पुराने जीवनसाथी, रेवड़ी और मूंगफली की मनपसंद महक जो समां बांधते हैं, उसकी तुलना वाकई कहीं नहीं है। यही अग्नि लोहड़ी में आस्था का पक्ष भी जोड़ती है। अग्नि में प्रसाद चढ़ाने के लिए लोग कई तरह की चीज़ें लाते हैं, जैसे- पॉपकॉर्न, मूंगफली, रेवड़ी, गजक और मिठाई। आमतौर पर आग के चारों ओर तीन बार घूमने की प्रथा है। इस तरह अग्नि को नमन करते हुए किसान अच्छी $फसल की कामना करते हैं, तो बाकी लोग नई $खुशियों की। बाद में सभी लोग मिलकर-बांटकर प्रसाद खाते हैं।
नए का स्वागत
लोहड़ी को नए के स्वागत के रूप में भी मनाया जाता है। जीवन में नई $खुशियां पाकर कौन खुश नहीं होता? सभी के जीवन में कभी न कभी ये $खुशियां ज़रूर आती हैं। फिर चाहे, नन्हें मेहमान का जन्म हो या नई दुल्हन का घर आना।
लोहड़ी, और जाड़े की धमाचौकड़ी
नए के स्वागत में पंजाबी घरों में समारोह सा होता है। मोहल्ले-बस्ती के युवक-युवतियां उन घरों में जाकर बधाई मुबारक देते हैं और लोहड़ी की सौ$गात स्वयं मांग कर लेते हैं और $खुशियों के गीत गाते हैं। पेश हैं उनमें से चंद गीतों के नमूने:- सुंदर मुन्द्रिया ..हो तेरा कौन विचारा ..हो दुल्ला भट्टी वल्ला ..हो दुल्ले ने घी विअहियी ..हो सेर शकर पाई ..हो कुड़ी दे बोजे पाई ..हो शाल्लू कौन समेटे ..हो चाचा गाली देसे ..हो चाचे चूरी कुटी ..हो ज़मिन्दारण लुटी ..हो ज़मिन्दारा सिदाये ..हो गिन -गिन पोले लाई ..हो इक पोला रह गया ..हो सिपाही फड़ के लै गया ..हो आखो मुंडाओ ताना .. मक्की दा दाना .. आना लै के जाना



सवा सौ साल की कांग्रेस का ८३ वां महाधिवेशन
नए आत्म विश्वास की बानगी

बुराड़ी में सम्पन्न कांग्रेस के महाअधिवेशन में बहुत दिनों बाद पूरी पार्टी आत्मविश्वास से सराबोर दिखी। कार्यकर्ताओं का अनुशासन हो या अधिवेशन की व्यवस्थाएं। नेताओं के तेवर हों या पार्टी के राजनैतिक प्रस्ताव। वर्तमान पर पार्टी का राजनैतिक स्टैण्ड हो या भविष्य की रणनीति। कांग्रेस पूरे अधिवेशन में कहीं भी भ्रमित नज़र नहीं आई। मीडिया के कांग्रेस विरोधी खोजी भी पूरे महाअधिवेशन में सुरा$ग नहीं ढूंढ पाए। इस महाअधिवेशन ने पूरी मज़बूती के साथ भविष्य की राजनीति के संकेत भी दे दिए हैं।
देश की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी पार्टी ने अपना 125 साल का स$फर पूरा किया। इस मौके पर पार्टी का महाधिवेशन भी आयोजित किया गया। नई दिल्ली में आयोजित इस तीन दिन के महाधिवेशन में कांग्रेस ने अपने सवा सौ साल के इतिहास का जश्न तो मनाया ही, साथ ही उसने यह भी सिद्ध कर दिया कि वह देश की सबसे अनुशासित पार्टियों में शामिल है।
इस महाअधिवेशन में पार्टी की तैयारी देखने लायक थी। एक तर$फपार्टी के पुराने वरिष्ठ नेताओं और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को याद किया गया, वहीं वर्तमान राजनीति की चुनौतियों और भावी रणनीति पर पार्टी के स्टैण्ड की स्पष्ट घोषणा भी की गई। पूरे समेलन में कांग्रेस न तो विभाजित और दिशाविहीन नज़र आई, और न ही दिग्भ्रमित। अगर परिदृश्य को देखकर समीक्षा करें तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ताओं ने एक परिपक्व पार्टी के रूप में ही अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्वहन किया। पूरे अधिवेशन के दौरान कहीं कोई असमंजस या विवाद की स्थिति नहीं नज़र आई।
एक के बाद एक घोटालों के आरोप झेलने के बाद महाअधिवेशन में कांग्रेस पूरी तरह से आक्रामक नज़र आई। सोनिया गांधी ने पूरे आत्मविश्वास के साथ न केवल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राहुल गांधी का बचाव किया, बल्कि भाजपा सहित विरोधी दलों को आड़े हाथों भी लिया। अधिवेशन का सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव था- कार्यकारिणी का कार्यकाल बढ़ाकर पांच साल करना। इस प्रस्ताव के बाद अब पार्टी को बार-बार बेमतलब संगठनिक कसरत नहीं करनी पड़ेगी और संगठन में स्थायित्व नज़र आएगा। तो दूसरी ओर महाअधिवेशन के दौरान कांग्रेस के तेवर ऐसे थे, जैसे पार्टी ज़रूरत पडऩे पर आम चुनावों का सामना करने के लिए तैयार है, कांग्रेस के इन तेवरों को देखकर विपक्षी पार्टियों को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा, कि अधिकांश सांसद अभी मध्यावधि चुनाव के पक्ष में नहीं हंै।
वहीं दूसरी ओर महाअधिवेशन में बार-बार यह प्रतिध्वनित हुआ कि पार्टी राहुल गांधी की ताजपोशी करने के लिए न केवल तैयार है, बल्कि आतुर भी है, लेकिन राहुल गांधी खुद ताजपोशी के लिए जल्दबाज़ी नहीं चाहते। वे $खुद किसी अच्छे अवसर के तलाश में हंै। इसके चलते यह भी संभव है संगठन और सरकार में राहुल गांधी को महत्वपूर्ण पद दिया जाए और संगठन में राहुल की टीम को जगह देकर पार्टी में युवाओं की हिस्सेदारी बढ़ाई जाए। असल में पार्टी में पीढ़ी परिवर्तन का दौर शुरू हो चुका है और प्रणव मुखर्जी से लेकर दिग्विजय सिंह तक इस सत्य को खुलेआम स्वीकार कर चुके हैं।
महाअधिवेशन के दौरान सोनिया गांधी ने कार्यकर्ताओं को पर्याप्त महत्व दिया और पार्टी नेताओं को लताड़ते हुए उन्हें निर्देश भी दिए कि वे आम कार्यकर्ताओं से मिलकर उनके साथ संवाद रखे और कार्यकर्ताओं के कार्यों को प्राथमिकता दें। सोनिया के इस आह्वान से भी पार्टी कार्यकर्ताओं में नए उत्साह का संचार हुआ है। महाअधिवेशन में स्वयं राहुल गांधी भी ज्य़ादा आत्मविश्वास से भरे नज़र आए और ज्य़ादा परिवक्त होकर उभरे हैं। हालांकि उन पर संगठन और सरकार में शामिल होने का दबाव है, लेकिन वे दिल्ली में टिकने की बजाय देशभर में घूम-घूमकर पार्टी को मजबूत करने की ज्यादा रुचि ले रहे हैं। अभी भी उनका लक्ष्य $िफलहाल उत्तरप्रदेश सहित अन्य राज्यों में पार्टी को मज़बूत कर वापस दो दशक पुरानी $फार्म में लाना है।
महाअधिवेशन में कांग्रेस ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि एकला चलो की नीति पर ही ध्यान केंद्रित करेगी और जहां वह अच्छी स्थिति में है, वहां किसी क्षेत्रीय दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी। इस तरह पार्टी ने दबाव की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दलों को संकेत दे दिए हैं कि वे अपना रास्ता स्वयं चुन लें।
महाअधिवेशन का सबसे नाटकीय मोड़ वह था, जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा की कि वे जेसीपी के स्थान पर जांच समिति के सामने उपस्थिति होने को तैयार हैं। इस घोषणा के निहितार्थ चौंकाने वाले थे। वह एक तर$फकांग्रेस जेसीपी की मांग को लगातार खारिज करती रही। इस मुद्दे पर तीन हफ़्ते तक संसद नहीं चली। कांग्रेस ने संसद नहीं चलने के लिए विपक्ष की हठधर्मिता को जिम्मेदार ठहराया। ऐसा लगा कि पूरी पार्टी सरकार और प्रधानमंत्री के बचाव में एकजुट है और वह किसी भी कीमत पर जेसीपी नहीं बनने देगी, चाहे सरकार को गिराकर मध्यावधि चुनावों की नौबत ही क्यों न आ जाए।
लेकिन महाअधिवेशन के दौरान मनमोहन सिंह की नई पेशकश ने सबको चौंका दिया। अगर वे एक समिति से जांच कराने को तैयार हैं तो दूसरी समिति से इनकार क्यों है? वैसे मनमोहन सिंह की ईमानदारी और निष्ठा पर किसी को भी संदेह नहीं है, परन्तु लोकतंत्र में हर उठा हुआ सवाल, जवाब तो मांगता ही है। मनमोहनसिंह की यह पेशकश कुछ ऐसी है, जैसे वे अप्रत्यक्ष रूप से प्रधानमत्री पद से रूखसत होने की पेशकश कर रहे हों। क्योंकि समिति की जांच के बहाने ही वे प्रधानमंत्री पद छोडऩे की पेशकश करके राहुल गांधी के लिए रास्ता सा$फ करने के लिए तैयार हैं । पर स्वयं राहुल अभी मन से तैयार नहीं हैं। और दूसरी ओर मनमोहन सिंह को अचानक बिना किसी बहाने के प्रधानमंत्री पद से विदा नहीं किया जा सकता। कांग्रेस की यह कशमकश महाअधिवेशन में सा$फ नज़र आई। युवा पीढ़ी और बुजुर्ग पीढ़ी के साथ टकराव तो नज़र नहीं आया, पर कसमसाहट स्पष्ट थी और इसके निहितार्थ भी। पार्टी अब युवाओं को प्रतिनिधित्व देने तथा राहुल की ताजपोशी कर पीढ़ी परिवर्तन के लिए पूरी तरह तैयार है, पर अब इन्तज़ार है, तो बस अनुकूल समय का।

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