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Saturday, January 1, 2011





राजनीति के ट्रेक पर गुर्जर आंदोलन

हृ राजीव शर्मा

जयपुर।
घटनाक्रम वर्ष 2007 से शुरू होता है। अब 2011 की आमद हो रही है। गुर्जर आरक्षण आन्दोलन के इस प्रकार 4 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। इन चार वर्षों में बात के लिए $खुद सरकार कभी पटरी पर नहीं आई है। हां, अब पहली बार ऐसा हुआ है। सरकार और गुर्जरों के बीच पहले दौर की बातचीत भले ही विफल हो गयी हो, लेकिन गुर्जर समाज का आरक्षण आन्दोलन प्रदेश में दोनों ही प्रमुख दलों के बीच की भी एक जंग है। भाजपा ने अपनी सरकार इसी के चलते गंवाई थी। अब वो चाहती है, कि कांग्रेस के साथ भी कुछ ऐसा ही हो। मगर कांग्रेस है, कि आन्दोलन को उससे बिल्कुल ही अलग तरीके से निपटना चाहती है।
प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आरोप लगा रहे हैं, कि आन्दोलन की असली कमान तो भाजपा के हाथ में है और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी तथा प्रदेश में भाजपा नेता वसुंधरा राजे ने संभाल रखी है। स्थानीय स्तर पर भी भाजपा कार्यकर्ता आंदोलन को उग्र कर रहे हैं। साफ है, अशोक गहलोत ने आरक्षण मांग रहे गुर्जर समाज को आम आदमी से अलग करने की कोशिश की है। वैसे भी सरकार के दो साल पूरे हो चुके हैं। राजनैतिक वातावरण प्रदेश में धीरे धीरे गरमाना शुरू होगा ही। आरक्षण आन्दोलन ने उसे समय से कुछ पहले ही सामने ला दिया है।
वर्ष 2007 के मई महीने में पाटौली के चक्का जाम से देशभर में गुर्जर आरक्षण आन्दोलन को एक शक्ल और पहचान मिली। 2010 और इससे पहले ही इसकी शक्ल तो वो नहीं रही जो आरंभ में थी। मगर पहचान के लिए ये अब शब्दों और घटनाओं का मोहताज नहीं रहा है। इसकी पहचान के साथ जब भी चर्चा होगी वसुंधरा राजे का नाम ज़रूर आयेगा। प्रदेश की मुख्यमंत्री जिनके कार्यकाल में ये आन्दोलन शुरू हुआ और उनकी सरकार को दूसरा अवसर न मिल पाने के पीछे के कारणों में इसे नकारा नहीं जा सकता। पाटौली आन्दोलन से उपजे गुर्जर मीणा विवाद के चलते भाजपा के तेज़ र्रार नेता डा. किरोड़ी मीणा उससे दूर हो गये। उन्होंने अपना दम खम दिखाया और रानी को दुबारा मौका मिलने ही नहीं दिया। उस समय आम आदमी तक का मानना था, कि किरोड़ी मीणा अगर भाजपा में होते तो रानी दुबारा प्रदेश की कमान ज़रूर संभाल पाती। रानी वसुंधरा के आस-पास आज भी आरक्षण आन्दोलन और उसकी घटनाएं ज़रूर बनी रहती होंगी। लोगों की मानें तो वसुंधरा एक बार फिर इसी आरक्षण आन्दोलन के चलते राजस्थान की कमान संभालने का स्वप्न देखती हैं। यही कारण है, कि वह आरक्षण आन्दोलन को लेकर अपनी सक्रियता को छुपा नहीं पाती हैं।
मई 2008 के पीलूपुरा पार्ट 1 के समय रानी बयाना तक तो आई, मगर रेल्वे ट्रेक पर नहीं गई। ये आन्दोलन 28 दिन चला। कर्नल ने अपने हर आन्दोलन में 'पटरी पर आये सरकारÓ का नारा लगाया है।
रानी बसुंधरा ने कभी $खुद या अपने प्रतिनिधि को घटना स्थल पर कभी नहीं भेजा। इसके विपरीत अशोक गहलोत ने पीलूपुरा पार्ट 2 में अपनी सरकार के प्रतिनिधि को रेल्वे ट्रेक पर भेज कर एक अलग प्रकार का संदेश देने की कोशिश की है। वैसे देखा जाये तो इस आन्दोलन को लेकर दोनों का नज़रिया अलग अलग सा$फ नजर आ रहा है। गहलोत शासन काल में अभी तक कोई जनहानि नहीं हुई हैं। वहीं वसुंधरा राजे के समय सैकड़ों जानें आन्दोलनों के दौरान चली गईं। गहलोत सरकार की ओर से कहीं भी आन्दोलन कारियों ने ज़ोर ज़बरदस्ती जैसा कुछ भी नहीं किया जा रहा है। इतना ही नहीं आन्दोलन स्थल के आस पास दूर-दूर तक कहीं पुलिस का नामों निशान नहीं है। रेल्वे ट्रेक की ओर बढ़ते गुर्जर समाज को पुलिस प्रशासन का बिल्कुल भी विरोध नहीं झेलना पड़ा।
20 दिसंबर 2010 से शुरू आन्दोलन में 25 दिसंबर को सरकार ने वार्ता की पेशकश आर भ की। आरम्भिक ना नुकर के बाद कर्नल बैंसला संवाद को राज़ी हो गये । कर्नल पर जनसमूह का दबाव है कि वो कहीं नहीं जाएंगे। बार बार कर्नल बैंसला के जाने और आन्दोलन समाप्ति की घोषणा से गुर्जर समाज आजिज़ आ चुका है। ऐसे में पहली मांग रेल्वे ट्रेक पर हो, बात ही रखी गई थी। इसे सरकार की सदास्यता कहें या कूटनीति का गहराई, कि उसने कर्नल बैंसला और आन्दोलनकारियों की पहली मांग बिना किसी घबराहट के मान ली है। इतना ज़रूर है कि सरकार के रेल्वे ट्रेक पर बातचीत के लिए आने के बाद आन्दोलनकारियों के बीच सरकार को लेकर नकारात्मक भावों में कमी आई है। 25 दिसंबर को अशोक गहलोत का पुतला फूंकने वाले गुर्जर युवक 26 को शांति से बातचीत को सुनते नज़र आये। कहीं भी माहौल में सरकार को लेकर कोई नाराज़गी का भाव नज़र नहीं आ रहा था।
संवाद की इस पहली शुरूआत में अभी कुछ भी निकल कर सामने नहीं आया है। लेकिन सकारात्मक दिशा में आगे बढऩे की उम्मीद सा$फ दिखाई दे रही है। रेल्वे ट्रेक पर पहुंचे प्रदेश के उच्च शिक्षा और उर्जा मंत्री डा. जितेन्द्र सिंह गुर्जर ने समाज को भरोसा दिलाया है कि वो दुबारा $खाली हाथ आपके पास नहीं आएंगे, और अगर ऐसा नहीं हो सका, तो अपना इस्ती$फा समाज के सामने रख देंगे।
भले ही पहले दौर की बातचीत निराशाजनक रही, लेकिन बातचीत की प्रक्रिया जल्द ही सकरात्मक दिशा में आगे बढ़कर किसी अंजाम तक पहुंचे, ऐसी आशा हर $खासोआम कर रहा है। लेकिन इतना ज़रूर है कि राजस्थान की राजनीति के दो दलों और सीधे शब्दों में कहें तो, अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे के बीच भी ये सीधा घमासान है। दोनों की बयानबाज़ी अपने शबाब पर है। दोनों के आन्दोलन को निपटने के तरीके को लेकर लोग चर्चा कर रहे है। ऐसे में आगे ये देखना दिलचस्प होगा कि दिसंबर 2008 में सरकार गंवा चुकी वसुंधरा 2013 में एक बार फिर से प्रदेश की कमान संभाल पाती हैं या नहीं। इतना ज़रूर है कि गुर्जर आरक्षण आन्दोलन 2013 के विधानसभा चुनावों में एक बार फिर से गूंजेगा। कौन इसके काल का ग्रास बनेगा और किसे इससे संजीवनी मिलेगी। ये सब तो काल के गाल में है। पर सरकार को रेल्वे ट्रेक पर भेजकर अशोक गहलोत ने एक नई शुरूआत ज़रूर कर दी है।





राम के कारण फिर सांसत में भाजपा
राम जेठमलानी एक बार फिर भाजपा के लिए धर्मसंकट का कारण बन गये हैं। भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद राम जेठमलानी ने कहा है, कि जहां तक निजी तौर पर वे समझते हैं, विनायक सेन पर राजद्रोह का केस नहीं बनता है, और विनायक सेन की पैरवी उनके लिए सम्मान की बात होगी।
एक निजी टीवी चैनल से बात करते हुए जेठमलानी ने यह भी कहा, कि बीजेपी नेता होने के बावजूद बिनायक सेन की पैरवी से हितों का कोई टकराव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि, इस मामले में उनके विचार बीजेपी की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज से अलग हैं। राम जेठमलानी पहले भी बिनायक सेन की ज़मानत का केस सुप्रीम कोर्ट में लड़ चुके हैं। उधर, बीजेपी नेता सुषमा स्वराज ने बिनायक सेन के बारे में ट्विटर पर लिखा है, कि राज्य के $िखला$फ हिंसात्मक रवैया, निर्दोष पुलिसवालों और मासूम लोगों का नरसंहार और हिंसा निश्चित रूप से राजद्रोह है।
राम जेठमलानी के इस बयान के बाद, भाजपा ने से$फ साइड लेते हुए कहा है, कि राम जेठमलानी एक पेशेवर वकील हैं, और अगर वे ऐसा करते हैं, तो इससे पार्टी विचारधारा का कुछ लेना देना नहीं है। पार्टी प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी का कहना है, कि जेठमलानी एक वकील हैं, और अपने विवेक के अनुसार कोई भी केस लेने के लिए स्वतंत्र हैं।

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