अब देखिए राजनीति का कॉमनवेल्थ गेमसब कुछ लुटा के होश में आए, तो क्या किया। दिन में चिराग़ जलाए, तो क्या किया।
अब जब सब कुछ लुट गया, तो होश में आ रहे हैं। अब डीडीए को ए.मार-एम.जी.एफ. के काम में खोट नजऱ आ रहा है। अपनी खाल बचाने को सारा ठीकरा कंपनी के सिर मढ़ दिया, पर आर्थिक मंदी के दौर में जब कंपनी ने हाथ पीछे खींच लिए, तो डीडीए ने अधिक कीमत देकर 333 फ़्लैट खऱीद लिए। ए.मार-एम.जी.एफ. को करीबन 700 करोड़ का बेलआउट पैकेज दिया गया। पर तब डीडीए ने कोई खोट नहीं बताया।
हृ संतोष कुमार
कॉमनवेल्थ घोटाले की कड़ी से कड़ी जुडऩे लगी है। पहले दिन बी.जे.पी. नेता सुधांशु मित्तल निशाने पर रहे, तो दूसरे दिन खेल गांव बनाने वाली कंपनी ए.मार-एम.जी.एफ. का खेल बिगड़ गया। डीडीए के पास जमां 183 करोड़ की बैंक गारंटी ज़ब्ती का नोटिस जारी हो गया। पर अभी तो सिफऱ् ठेका लेने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसा। यक्ष प्रश्न, ठेका देने वाले नौकरशाहों-नेताओं ने कितना खाया, इसकी परतें कब उधड़ेंगी? अब ठेकेदारों पर कार्रवाई में तेज़ी दिखाने से क्या होगा? ठेकेदार तो अपना टेंडर भरते हैं। यह तो देने वाले पर निर्भर, किस कंपनी को ठेका दें। सो सवाल है, ठेका देते वक्त नौकरशाहों-नेताओं ने होश क्यों गंवाया?
अब जब सब कुछ लुट गया, तो होश में आ रहे हैं। सो फिर वही सवाल- सब कुछ लुटा के होश में आए, तो क्या किया। दिन में चिराग़ जलाए, तो क्या किया। अब डीडीए को ए.मार-एम.जी.एफ. के काम में खोट नजऱ आ रहा है। अपनी खाल बचाने को सारा ठीकरा कंपनी के सिर मढ़ दिया, पर आर्थिक मंदी के दौर में जब कंपनी ने हाथ पीछे खींच लिए, तो डीडीए ने अधिक कीमत देकर 333 फ़्लैट खऱीद लिए। ए.मार-एम.जी.एफ. को करीबन 700 करोड़ का बेलआउट पैकेज दिया गया। पर तब डीडीए ने कोई खोट नहीं बताया। अब रपट में कह रही है, मंजूरी से अधिक फ्लैट बनाए गए। नक्शे में भी हेर-फेर कर, एरिया बदल दिया गया। पर डीडीए पर कौन भरोसा करे। दुनियां की भ्रष्ट संस्थाओं में भारत से अपनी डीडीए ही मुकाबले में टिक पाती है। डीडीए तो भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुकी है। सो जब कॉमनवेल्थ लूट में मौका मिला, तो दिल खोलकर कंपनी को सरकारी धन लुटाया। कंपनी से कमीशन लेकर अपनी जेब भरी। पर विडंबना देखिए, जो डीडीए $खुद संदेह के घेरे में है, वह दूसरी कंपनी पर आरोप लगा रही है। अब ऐसे में भ्रष्टाचार की जांच कैसे होगी, यह जांच करने वाले ही जानें। तीन महीने में जांच रपट सौंपे जाने का एलान तो हो गया। पर दबी ज़ुबान शीलावादी नौकरशाह कहते फिर रहे है- तीन महीने में जांच: कोई खालाजी का घर नहीं। कम से कम छह महीने तो लगेंगे ही। सो, कहीं ऐसा न हो, कॉमनवेल्थ की जांच बोफ़ोर्स घोटाले की तरह हो जाए। जहां घोटाले की रकम से कई गुना अधिक जांच में ख़र्च हो गए। बीजेपी ने तो मौजूदा जांच को पहले ही बेमतलब बता दिया है।
नितिन गडकरी के बाद बुधवार अक्टूबर को प्रकाश जावडेकर बोले- जब मौजूदा सीएजी-सीवीसी जांच में सरकारी महकमों पर सहयोग न करने का आरोप लगा रहे हैं, तो पूर्व सीएजी भला क्या जांच कर लेंगे? जांच की आंच सचमुच बड़ी मछलियों तक पहुंचेगी, उम्मीद कम है। शायद कांग्रेस भी बखूबी समझ रही है, सो फि़लहाल शुरुआती तेवर से तो दिखाने को ताबड़तोड़ कार्रवाई हो रही है। बुधवार को प्रवर्तन निदेशालय ने आयोजन समिति के महासचिव ललित भनोट को तलब कर लिया। लगे हाथ सुरेश कलमाड़ी से भी पूछताछ का सुर्रा छोड़ दिया गया। अब कांग्रेस किसे बलि का बकरा बनाएगी, यह बाद की बात है। पर सुधांशु मित्तल ने तो मोर्चा खोल दिया है। मंगलवार अक्टूबर 19 को इन्कम टैक्स-सीबीआई के छापे पड़े। दिन भर मित्तल ही सुर्खियों में रहे। सो बुधवार को मित्तल सफ़ाई देने आ गए। उनने छापेमारी को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया। अब मित्तल से कांग्रेस राजनीतिक बदला लेगी, ऐसी मित्तल की राजनीतिक हैसियत नहीं। अगर मित्तल अपनी ही पार्टी बीजेपी के लिए ऐसा कह रहे हैं, तो माना जा सकता है। मित्तल को लेकर तो बीजेपी में लोकसभा चुनाव के वक्त ज़बर्दस्त सिर-फुटव्वल हो चुकी है। यों बीजेपी भी मित्तल को अपना सगा मानने से इनकार कर रही है ताकि घोटाले की जांच में मित्तल फंसे, तो आसानी से दूरी बना सके। पर जऱा मित्तल की सफ़ाई भी सुनिए। बोले- जहां 77 हज़ार करोड़ का घोटाला, वहां 29 लाख की क्या बिसात? बकौल मित्तल, उनकी कंपनी को सिफऱ् 29 लाख का ठेका मिला तो वह कॉमनवेल्थ घोटाले के चोरों के सरताज कैसे हो गए। यों तो मित्तल की बात में दम है। पर घोटाला 77 हज़ार करोड़ का हो या 29 लाख का। घोटाला तो घोटाला ही होता है, सो मित्तल की ईमानदार सफ़ाई में बेईमानी की ज़बर्दस्त बू आ रही है। करीब-करीब ऐसी ही ईमानदार सफ़ाई शीला सरकार, कलमाड़ी एंड कंपनी, डीडीए आदि-आदि सभी दे रहे। पर ईमानदार सफ़ाई में बेईमानी $खुद-ब-$खुद जगज़ाहिर हो रही है, सो भ्रष्टाचार के मामले में चोर-चोर मौसेरे भाई। अब एक-दूसरे के खि़लाफ़ गाली-गलौज पर उतर आए है। अब जिसका नाम उछल रहा है, वही खीझ रहा है। मंगलवार को गडकरी ने पीएम पर निशाना साधा। तो आरोपों का जवाब देने की बजाए कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी पर्सनल हो गए। कांग्रेस खिसियानी बिल्ली की तरह गडकरी पर लपकी। प्रवक्ता ने गडकरी को बिगड़ैल बच्चा बताया। मज़ाक बनाते हुए बोले- बीजेपी की पूरी प्रेस कांफ्रेंस का निचोड़ यही- खोदा पहाड़, निकला गडकरी। सो बुधवार को तो बीजेपी आग-बबूला दिखी। प्रकाश जावडेकर ने चेतावनी दे दी। शीशे के घर में रहने वाले दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते। बोले- कांग्रेस नेता भाषा में संयम बरतें, वरना वैसी भाषा का इस्तेमाल करना हमें भी आता है। उन ने कांग्रेस को इशारा भी कर दिया, अगर बीजेपी के अध्यक्ष को गाली देना बंद नहीं किया। तो यह न भूलें, कांग्रेस के पास भी अध्यक्ष है। हम भी सोनिया पर फूल नहीं बरसाएंगे। यानी सोनिया गांधी के खि़लाफ़ पर्सनल टिप्पणी की धमकी दे दी। सो भ्रष्टाचार की जांच का क्या हश्र होगा, पता नहीं। पर अब गाली-गलौज का कॉमनवेल्थ शुरू मानिए।
मित्तल पर क्यों मेहरबान हुए कलमाड़ी?
कांग्रेसी सुरेश कलमाड़ी को आखिऱ सुधांशु मित्तल इतने पसंद क्यों आये कि उन्होंने करीब आठ सौ करोड़ रूपये के ठेके दिलाने में उनकी मदद की? भ्रष्टाचार की जांच में सुधांशु मित्तल का नाम आया तो भाजपाई भी बगलें झांकने लगे. लेकिन बहुत कम लोगों को याद है कि सुरेश कलमाड़ी अपने ऊपर किये गये अहसानों की कीमत अदा कर रहे थे। असल में 1998 में जब सुरेश कलमाड़ी कांग्रेस में किनारे कर दिये गये थे, तब भाजपा की ओर उन्होंने रुख किया था। असल में 1998 में महाराष्ट्र में शरद पवार ने उनका टिकट काट दिया था, जिसके बाद वे भाजपा और शिवसेना के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पुणे से चुनाव मैदान में उतरे थे। वे चुनाव जीत गये थे, जिसके बाद वे प्रमोद महाजन के काफ़ी करीब आ गये थे। प्रमोद महाजन के करीबी का ही परिणाम था कि एनडीए सरकार में भी कलमाड़ी रसमलाई खाते रहे। उन्हीं दिनों उनका सुधांशु मित्तल से भी नज़दीकी रिश्ता बना। हालांकि उस वक्त कलमाड़ी ने शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को शपथपत्र लिखकर दिया था कि वे कभी कांग्रेस में नहीं जाएंगे लेकिन राजनीति में कोई शपथ होती नहीं। 2004 और अब 2009 का चुनाव उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लड़ा और विजयी हुए। लेकिन कलमाड़ी प्रमोद महाजन के साथ अपने पुराने रिश्तों को नहीं भूले। यही कारण है कि कॉमनवेल्थ खेलों में जब पैसे आवंटित करने की बारी आयी, तो सुधांशु मित्तल पर जमकर उपकार कर दिया। जहां तक सोनिया गांधी से दूरी का सवाल है, तो सुरेश कलमाड़ी पिछले दस सालों से दस जनपथ से दूर ही हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में भी सोनिया गांधी ने उनके धुर राजनीतिक विरोधी विलासराव देशमुख को आगे बढ़ाया है।
डी कंपनी के पड़ोसी हैं शिवराज!
हृ देव श्रीमाली
डॉन दाऊद इब्राहीम का सबसे सगा माने जाने वाला साथी इकबाल मिर्ची भोपाल में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पड़ोस में रहता है। अंग्रेज़ों के ज़माने के इस बंगले पर सरकार ने कब्ज़ा कर लिया है, लेकिन नीलामी में भी इसे खऱीदने का साहस कोई नहीं कर पा रहा। अंडरवल्र्ड डॉन दाऊद के गुर्गे इकबाल मेमन उफऱ् मिर्ची के श्यामला हिल्स स्थित बंगले (अंग्रेजऩ के बंगले) को केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क (सेंट्रल एक्साइज़) के स्टाफ़ क्वार्टर बनाने का प्रस्ताव केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड में अटका हुआ है। सेंट्रल एक्साइज़ ने प्रस्ताव की स्वीकृति के लिए फिर कवायद शुरू कर दी है। यह वही बंगला है, जहां 1999 में मुंबई में गुलशन कुमार की हत्या कर फऱार आरोपी अब्दुल्ला उफऱ् अनिल शर्मा की लाश मिली थी। सेंट्रल एक्साइज़ ने बंगले की नीलामी की भी कोशिश की, लेकिन अंडरवल्र्ड की नजर के कारण कोई हि मत नहीं जुटा पाया। मुख्यमंत्री निवास के पास बना यह बंगला अब्दुल्ला की हत्या के बाद ही सुर्खियों में आया था। अब्दुल्ला के साथियों ने विवाद के चलते उसकी हत्या करवा दी थी। इस बंगले को लोग भूत बंगले के नाम से भी जानते हैं। यहां आज भी सन्नाटा पसरा है। उसके अंदर गंदगी के अलावा और कुछ नहीं है। दरवाज़े टूट चुके हैं और दीवारों पर यहां-वहां धूल जमी है। यह बंगला फि़लहाल सेंट्रल एक्साइज़ के कब्ज़े में है। इसे बेचने के लिए वर्ष 2007 में नीलामी की प्रक्रिया भी शुरू की गई थी। दो बार बंगले को नीलाम करने की कोशिश की गई, जो नाकाम रही। इसके बाद सेंट्रल एक्साइज़ ने इस बंगले को तोड़कर उसकी जगह सेंट्रल एक्साइज़ कमिश्नर और उसके ऊपर के अधिकारियों के लिए आवास बनाने का प्रस्ताव केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड को भेजा था। सालभर बाद भी प्रस्ताव को मंज़ूरी नहीं मिलने के बाद अब सेंट्रल एक्साइज़ विभाग का स्थानीय कार्यालय प्रस्ताव की स्वीकृति के लिए फिर से प्रयासों में जुट गया है। विभाग के एक अधिकारी ने बताया, कि इस बारे में बोर्ड को फिर से पत्र लिखा जा रहा है।

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