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Monday, October 4, 2010

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रामलला की है रामजन्मभूमि

हृ संजय तिवारी
ऐतिहासिक फ़ैसला आ गया। शांति की अलोकप्रिय और अप्रासंगिक अपीलों और फ़ैसला रुकवाने की इक्का दुक्का कोशिशों के बीच आखिऱकार उस ऐतिहासिक विवाद में अदालत की मध्यम पायदान ने अपना फै़सला सुना दिया, जिसे सुनने के लिए साढ़े तीन बजे लगभग सारा देश ठहर गया था। नौ हज़ार पृष्ठों में पसरे फ़ैसले की एक एक लाइन-जहां रामलला विराजमान, वही जन्मस्थान।
यहां अदालत द्वारा जिस जन्मस्थान का जि़क्र किया गया है, उससे आशय रामजन्मभूमि से है, जहां अभी अस्थाई रूप से मंदिर है। इसी विवादित स्थल पर ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने दो-एक के बहुमत से इस बात पर अपनी मुहर लगा दी कि जहां रामलला विराजमान हैं, वहां विराजमान रहेंगे। जस्टिस अग्रवाल, जस्टिस धर्मवीर शर्मा और जस्टिस एस.यू.ख़ान की खण्डपीठ ने ऐतिहासिक फ़ैसला देते हुए देश को उस मझधार से पार कर दिया है, जहां चार सदियों से कमोबेश यह देश अटका हुआ था, लेकिन फ़ैसला एकदम से एकतरफ़ा भी नहीं है। अपने दस हजार पेज के फै़सले में उच्च न्यायालय ने संपूर्ण फ़ैसला क्या दिया है, लेकिन शाम के पांच बजे इस मुद्दे पर जिरह कर रहे वकीलों ने फ़ैसले की जो जानकारी दी उसका सार यही है कि जन्मस्थान रामलला का है, लेकिन सरकार द्वारा अधिग्रहित ज़मीन को तीन हिस्से में बांट दिया जाए, जिसमें से एक हिस्से पर मंदिर निर्माण हो, दूसरा हिस्सा मुसलमानों को दिया जाए और तीसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को दिया जाए. 2002 से शुरू हुई अदालती कार्यवाही में कुल 90 दिन सुनवाई हुई जिसमें चार प्रमुख मुकदमों में दलीलें पेश की गयीं। ये चार वाद थे- भगवान श्रीराम विराजमान बनाम राजेन्द्र सिंह, गोपाल सिंह विशारद बनाम ज़हूर अहमद, निर्मोही अखाड़ा बनाम बाबू प्रियदत्त राम व अन्य और सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ़ बोर्ड बनाम गोपाल विसारद व अन्य. इनमें से चौथे वाद को हाईकोर्ट ने ख़ारिज कर दिया जो सुन्नी वक्फ़ बोर्ड बनाम गोपाल सिंह विशारद का था। फ़ैसला बाकी तीन के संदर्भ में आया है। इन तीन वादों में भी मुख्य फ़ैसला भगवान श्रीरामचंद्र विराजमान बनाम राजेन्द्र सिंह से जुड़ा है, जिसके संदर्भ में उच्च न्यायालय ने कहा है कि रामलला जहां विराजमान हैं, वह उन्हीं का स्थान है।
पहले वाद के तहत जो मुख्य सवाल सामने रखे गये थे उसमें अदालत को यह निर्णय करना था कि क्या विवादित स्थल आस्था, विश्वास या परम्परा के अनुसार भगवान राम का जन्मस्थान है? यदि हां, तो इसका प्रभाव? महत्वपूर्ण फ़ैसला इसी एक बिंदु पर आया है. हाइकोर्ट ने आस्था, विश्वास और परंपरा तथा ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर पाया है कि जिस स्थान को लेकर विवाद है और जहां बाबरी मस्जिद निर्मित की गयी थी वह वास्तव में हिन्दुओं के पुरुषार्थ पुरुष रामचंद्र से ताल्लुक रखती है, जो धर्मग्रंथों और साक्ष्यों के अनुसार अयोध्या में ही पैदा हुए थे। अदालत के इस फै़सले से वाद संख्या तीन में उठाये गये सवाल का भी जवाब मिल जाता है, जिसमें इस बात पर निर्णय करना था, कि क्या विवादित संपत्ति मस्जिद है, जिसे बाबर द्वारा बनवाये जाने पर बाबरी मस्जिद कहा जाता है? ज़ाहिर है अदालत ने माना है कि इस विवादित संपत्ति को वर्तमान में मस्जिद नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसे बाबर ने ही मुसलमानों को वक्फ़ किया था, इसका कोई साक्ष्य सामने आया नहीं है. संभवत: इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ़ बोर्ड का दावा ही ख़ारिज कर दिया, क्योंकि सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बतौर वादी जो दावे किये थे वे बहुत ही कमज़ोर थे, और इस ऐतिहासिक विवाद में एक तरह से बचकाने दावे किये थे। सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को पंद्रह प्रमुख बिन्दुओं पर हाईकोर्ट के सामने अपना पक्ष रखना था, जिसमें कई कमज़ोर कडिय़ां हैं। सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को यह साबित करना था कि क्या 1949 तक वह विवादित भवन के कब्जे में रहा जहां से उसे बेदखल कर दिया गया? अगर बाबरी मस्जिद का वक्फ़ नहीं हुआ था , तो सुन्नी वक्फ़ बोर्ड किस आधार पर यह दावा कर सकता है कि संपत्ति उसकी है? फिर वह इस बात को भी नकार नहीं सकता था, कि विवादित स्थल पर हिन्दू एक ज़माने से पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। अगर 23 दिसंबर 1949 को विवादित परिसर में रामलला की मूर्ति और पूजा का सामान रख दिया गया था तो फिर उस भवन को मस्जिद कहने का क्या औचित्य बचता था? एक और महत्वपूर्ण बिन्दु पर सेन्ट्रल सुन्नी वक्फ़ बोर्ड को अपना पक्ष प्रस्तुत करना था वह यह कि क्या विवादित ढांचे में लगे खम्भों, जिन पर हिन्दू देवी देवताओं के चित्र अंकित हैं, के कारण विवादित भवन को मस्जिद की संज्ञा दी जा सकती है? और आखिरी बात यह कि जब वहां कोई ढांचा ही नहीं है, तो उसे बाबरी मस्जिद कैसे कहा जा सकता है? भावनात्मक रूप से वक्फ़ बोर्ड ने चाहे जो दलीलें दी हों, लेकिन कानून और शरीयत के दायरे में इन पेचीदे सवालों का संभवत: उनके पास कोई उत्तर नहीं रहा होगा। बहरहाल, लंबी कानूनी लड़ाई, घृणित राजनीति और दुखदायी सांप्रदायिक दुर्घटनाओं से गुजऱते हुए अयोध्या के विवादित परिसर पर हाईकोर्ट का फ़सला दोनों पक्षों के लिए संतोषजनक ही दिखाई दे रहा है। राममंदिर आंदोलन में हिन्दुओं की ओर से प्रतिनिधि संगठन होने का दावा करनेवाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इसका स्वागत किया है, तो शिवसेना ने भी फ़ैसले पर संतोष ज़ाहिर किया है। अन्य मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों ने अभी तक तो कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सेन्ट्रल सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के जफ़ऱयाब जिलानी ने कहा है कि वे सुप्रीम कोर्ट जाएंगे. हाईकोर्ट ने $खुद कहा है कि तीन महीने के भीतर इनमें से कोई भी पक्ष सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है। ऐसे में जिलानी कोई असहज बात नहीं कर रहे हैं। लेकिन सवाल अब यह है कि दोनों में से कोई भी पक्ष सर्वोच्च न्यायालय क्यों जाएगा ? अगर विवादित परिसर में एक हिस्सा मुस्लिम समुदाय को दे दिया गया है, तो क्या हिन्दू समुदाय आगे आकर इसे स्वीकार नहीं कर सकता? या फिर रामलला के जन्मस्थान को अगर न्यायालय ने स्वीकार कर लिया है तो क्या मुस्लिम समाज के प्रतिनिधि इस फै़सले को लागू करवाने के लिए आगे नहीं आ सकते? लेकिन ऐसा शायद ही हो, क्योंकि हिन्दुओं की राजनीति करनेवाले जिस धड़े को इसका लाभ नहीं मिला वे भी लड़ाई जारी रखने की बात करेंगे और वे भी जो मुस्लिम जमात की राजनीति का शौक रखते होंगे। अगर ये दोनों धड़े असफल हो गये तो मानिएगा कि फ़ैसला हो गया, नहीं तो देश को एक और लंबी कानूनी लड़ाई के लिए तैयार रहना होगा।


जननी सुरक्षा योजना के नाम पर लाखों रूपये बर्बाद

हृ अनूप सक्सेना
राजगढ़। जि़ले में स्वास्थ्य विभाग में बढ़ते भ्रष्टाचार के चलते जहां गर्भवती महिलाओं को जननी सुरक्षा योजना व जननी सुरक्षा एक्सप्रेस का लाभ स्वास्थ्य केन्द्रों तक पहुुंचने में नहीं मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर मंत्रालय के निर्देशों को नज़अंदाज़ कर जननी सुरक्षा एक्सप्रेस वाहनों में आवश्यक फेरबदल भी नहीं किये गये हैं और सोने पे सुहागा यह कि हर माह लाखों रूपयों का भुगतान $फजऱ्ी तौर पर इन जननी सुरक्षा एक्सप्रेस के मालिकों को प्रसूताओं को लाने ले जाने के नाम पर कर दिया जाता है। इस प्रकार की जा रही गंभीर वित्तीय अनिमितताओं को गोपनीय रख कर कार्यवाही से बचने के उद्देश्य से सूचना के अधिकार एवं वरिष्ठ अधिकारी के निर्देशों की भी खुली अवहेलना जि़ला चिकित्सालय में पदस्थ आर.सी.एच. एवं एन.आर.एच.एम. प्रभारी बृजमोहन दुबके द्वारा की जा रही है। जि़ले में अधिकांश वाहन (जननी एक्सप्रेस वाहन) अभी भी गैसकिट से चल रहे हैँ, जबकि शासन निर्देशानुसार ये वाहन डीज़ल से चलने चाहियें। अधिकांश वाहनों मे गर्भवती महिला की सुरक्षा व सुविधा की दृष्टि से पीछे की सीट लम्बी नहीं की गयी हैं। सुगमता हेतु सीटों की व्यवस्था नहीं है। फ़ोल्डिंग स्टेचर भी कई वाहनों में नहीं है। पीने के पानी व रोशनी की अतिरिक्त व्यवस्था कई वाहनों में नहीं है। कुछ वाहनों में डिसपोजि़बल दाईकिट भी नहीं मिले। अधिकांश वाहनों में लागबुकों का यात्रा का प्रमाणीकरण व यात्रा सत्यापन नहीं कराये गये। लागबुकों के सभी कालम भरकर नहीं रखे जा रहे हैं। अधिकांश जननी सुरक्षा एक्सप्रेस के वाहन चालकों के पास प्रसव योग्य महिलाओं की सूची जो नज़दीकी तिथि में होना थे, नहीं थी।
अधिकांश भुगतान पंजियों पर प्रमाणकरण एवं पृष्ठांकन नहीं करवाया गया है। कई स्थानों पर ब्लाक मेडिकल आ$िफसरों द्वारा भुगतान पंजी में महिलाओं को भुगतान किये जाने के आंकड़े उस माह के मासिक प्रतिवेदन में दिये आंकड़ों से मेल नहीं खाते। जि़ला चिकित्सालय में भर्ती गर्भवती महिलाएं द्रोपदी बाई पति रामलाल हरिजन, ग्राम हीरापुरा, रेशमबाई पति सुरेशमेर ग्राम चंदरपुरा शीलाबाई पति मुकेश हरिजन, ग्राम देहरीबामन, देव बाई, पति पंचूलाल हरिजन, ग्राम सरेड़ी मांगी बाई पति रमेश वर्मा, ग्राम जलासिला सभी अनुसूचित जाति की $गरीबी रेखा के नीचे निवास करने वाली महिलाओं ने जननी सुरक्षा एक्सपे्रस योजना की जानकारी न होने, लाभ न मिलने की बात कही। इन अति निर्धन ग्रामीण महिलाओं को शासन की इस अतिमहत्वपूर्ण योजना की जानकारी न होने से योजना के प्रभारी द्वारा योजना के क्रियान्वयन में गंभीर लापरवाही बरती जाने स्पष्ट होता है।
सूचना के अधिकार के तहत जननी सुरक्षा योजना, जननी सुरक्षा एक्सप्रेस की जानकारी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी श्री शर्मा से मांगे जाने पर उनके द्वारा आर.सी. एच. के प्रोजेक्ट आर्गेनाइज़र एवं जननी सुरक्षा योजना के प्रभारी बृजमोहन दुबके को शीघ्र जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिये थे। 19/8/2010 को पत्र क्रमांक 10121,10119 बृजमोहन दुबके को लिखकर तीन दिवस में चाही गयी जानकारी उपलब्ध कराने के विलंब के लिये जवाबदारी भुगताने के निर्देश मुख्य चिकित्सालय एवं स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा श्री दुबके द्वारा किये गये है। न ही अपने अधिकारी को उनके पत्र का जवाब दिया गया है और न ही मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराई गई है।

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