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Friday, October 8, 2010




राहुल बाबा की नज़र में जैसे सिमी वैसे ही आरएसएस

राहुल गांधी ने नया सुर्रा छोड़ दिया है। प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिमी और आरएसएस को एक ही तराज़ू में तोल दिया। दो दिन पहले मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में राहुल ने कांग्रेस में आने वाले लोगों से बेहिचक कह दिया था। आरएसएस और सिमी की विचारधारा छोड़कर आने वालों को ही कांगेस में जगह मिलेगी।
हृ संतोष कुमार
बुधवार अक्टूबर 6 को भोपाल में जब राहुल के बयान का मतलब पूछा गया तो राहुल ने कह दिया- आरएसएस और सिमी दोनों ही कट्टरवादी संगठन। वैचारिक कट्टरता की दृष्टि से इनमें कोई फर्क नहीं। यानी राहुल बाबा की नजर में जैसा सिमी, वैसा ही आरएसएस। पर सवाल, अगर आरएसएस को सिमी जैसा मान रहे राहुल। तो मनमोहन-चिदंबरम से कहकर बैन क्यों नहीं लगवाते? सिमी पर बैन यूपीए के पिछले टर्म में ही बढ़ाया गया। अब अचानक ऐसा क्या हो गया, जो राहुल ने संघ को सिमी के बराबर खड़ा कर दिया? अयोध्या फैसले के बाद संघ ने जो संयमित रुख अपनाया, खुद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह कायल हो गए। फिर राहुल के बयान का क्या मकसद? क्या यह जानबूझ कर उकसाने की कोशिश नहीं? सो राहुल के बयान पर बीजेपी ने पलटवार किया। प्रकाश जावड़ेकर बोले- मानसिक संतुलन खो चुके हैं राहुल। कांग्रेस लोकसभा चुनाव के बाद के उपचुनावों में लगातार हार रही। सो हताशा में राहुल अंट-शंट बयान दे रहे। बीजेपी ने राहुल को अपरिपक्व और उद्दंड तक करार दे दिया। पर सिर्फ बीजेपी नहीं, जिस संघ को राहुल ने सिमी जैसा बताया, उसके प्रवक्ता राम माधव ने भाषाई मर्यादा को लांघ पलटवार किया। राम माधव बोले- राहुल को राजनीति की लंबी पारी खेलनी। सो सिर्फ इटली-कोलंबिया को समझने से काम नहीं चलेगा। भारतीय समाज को भी समझना पड़ेगा। बयानबाजी से पहले इतिहास पढ़ लेना चाहिए और समाज में रचे-बसे संघ और उसके क्रियाकलापों को भी समझ लेना चाहिए। पर बीजेपी-संघ ने कड़ा जवाब दिया। तो कांग्रेस तिलमिला गई। राहुल को नसीहत देने की हिम्मत किसी कांग्रेसी में नहीं, सो किसी का नाम लिए बिना जनार्दन द्विवेदी बोले- किसी व्यक्ति के बारे में टिप्पणी नहीं, पर सभी राजनीतिक संगठनों को अपने विरोधियों के प्रति भाषा में सभ्यता का ख्याल रखना चाहिए। पर अपने राजनीतिबाजों को आखिर क्या हो गया? क्या राजनीतिक चक्की के आटे में सद्भावना, शिष्टाचार या मर्यादा नहीं पाई जाती? किसी को आरएसएस-सिमी में फर्क नजर नहीं आता। तो मुलायम को अपना वोट बैंक दिख रहा। विहिप को मंदिर के लिए पूरी पंचकोसी चाहिए। तो अयोध्या मामले को निजी विवाद बता कपिल सिब्बल सरकार को बीच में न पडऩे की सलाह दे रहे। पर कोई पूछे, गर अयोध्या विवाद निजी, तो क्या शाहबानो प्रकरण सरकारी था? जिसके लिए संसद ने कानून बना सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया। क्या यही राजनीति की मर्यादा?


कर्नाटक में फिर शुरू किटकिट कर्नाटक में बीजेपी का नाटक फिर शुरू हो गया। दक्षिण भारत में पहली बार किला $फतह किया पर कुनबे में ऐसी कलह मची, दो साल में ही किले की चारदीवारी दरकने लगी।
हृ संतोष कुमार
अब बीजेपी के डेढ़ दर्जन एमएलए बगावत पर उतर आए हैं। इन बगावती विधायकों ने गवर्नर को चि_ी लिख समर्थन वापसी का एलान कर दिया है तो येदुरप्पा ने भी चार असंतुष्ट मंत्रियों को फौरन केबिनेट से बर्खास्त कर दिया है।
बाकी एमएलए को अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी। कर्नाटक की खींचतान कई दफा दिल्ली दरबार तक पहुंच चुकी। यानी कर्नाटक में बीजेपी की सरकार जनता नहीं, अपनों के संकट सुलझाने में ही उलझी हुई। सो विपक्ष भी भला मौका क्यों गंवाता। देवगौड़ा-कांग्रेस ने मोर्चा खोला। तो मौजूदा गवर्नर हंसराज भारद्वाज अति सक्रिय हो गए। अबके उन ने विधानसभा का सत्र चालू होने के बावजूद सीएम को बहुमत साबित करने के लिए बारह अक्टूबर तक का समय दे दिया। बीजेपी के नाराज 15 एमएलए और पांच समर्थक निर्दलीय एमएलए ने गवर्नर को चि_ी लिखकर समर्थन वापसी का एलान कर दिया। सो कानून की बारीकी से वाकिफ हंसराज भारद्वाज ने कानून को किनारे रख राजनीतिक एजंडा चल दिया।
यों हंसराज भारद्वाज कोई पहली बार इतने सक्रिय नहीं। इससे पहले अवैध खनन के मामले में राष्ट्रपति से लेकर पीएम तक अपनी रपट बिन मांगे भेज चुके। मर्यादा लांघ सीएम को बेमतलब नसीहत तक दे चुके। जब गवर्नर ने यहां तक कह दिया था, अगर वह सीएम होते, तो रेड्डी बंधुओं को केबिनेट से फौरन बाहर करते। अब कोई गवर्नर ऐसी भाषा का इस्तेमाल करे तो उसे संविधान का पहरुआ कहा जाए या किसी पार्टी का, यह आप ही तय करिए। वैसे 11 अक्टूबर को मुख्यमंत्री महोदय सरकार के बहुमत का परीक्षण करेंगे, इसलिए कर्नाटक की किट किट अभी कुछ दिन तक चलती रहेगी।



फ़जऱ्ी किसान के्रेडिट कार्ड से लाखों का $गबन

हृ घनश्याम नामदेव
मुलताई (बैतूल) कृषक टंटी अंतराम नरवारे निवासी ग्राम देवडोंगरी तह. मुलताई को 10 मई 2010 को महाराष्ट्र बैंक मुलताई का नोटिस मिला, जिसमें लिखा था 3 लाख 16 हज़ार भरने की चेतावनी थी, अन्यथा कानूनी कार्यवाही की जावेगी। कृषक नोटिस पढ़कर अवाक रह गया, क्योंकि न तो उसने कर्ज़ लिया, न ही कभी बैंक गया। कृषक के नाती राजेन्द्र नरवरे द्वारा सूचना के अधिकार के तहत लम्बे संघर्ष के पश्चात जानकारी प्राप्त की, एवं अनुविभागीय अधिकारी राजस्व मुलताई को शिकायत की, जिसमें शाखा प्रबंधक रामप्रसाद अरोरा पैनल अधिवक्ता ज़मानतदार को आरोपी बनाकर भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 409, 120 में अपराध पंजीबद्ध करने की शिकायत की। सूचना के अधिकार के अवलोकन में पाया गया कि टंटी नरवरे की उम्र 85 वर्ष है। प्रकरण में 45 वर्ष के $फजऱ्ी व्यक्ति की $फोटो लगी है। वास्तव में टंटी निरक्षर होने से अंगूठा लगाता है, जबकि प्रकरण में $फजऱ्ी हस्ताक्षर हैं। बैंक में बही भी $फजऱ्ी लगी है। ज़मानतदार रामलाल $फजऱ्ी है। ग्राम देवडोंगरी में इस नाम का कोई व्यक्ति नहीं है। राशन कार्ड, निर्वाचन कार्ड, बैंक पैनल के वकील की सर्च रिपोर्ट, शपथ पत्र में अनेक त्रुटियां हैं। शाखा प्रबंधक की विजि़टिंग रिपोर्ट भी $फजऱ्ी है। बैंक ऑ$फ महाराष्ट्र शाखा मुलताई का यह कोई पहला प्रकरण नहीं है, शाखा प्रबंधक व वकील पैनल $फजऱ्ी प्रकरण बनाकर बैंक व शासन को करोड़ों का चूना लगा रहे हैं। किसानों के प्रत्येक प्रकरण में बीस प्रतिशत कमीशन लिया जाता है। बैंक से लोन दिलवाने के लिए दलालों का गिरोह सक्रिय है। यदि कोई जांच एजेंसी से करवाई जाए तो, मुलताई, साईखेड़ा मोरखा, राय आमला, ससुन्द्रा, डहुआ में ऐसे सैंकड़ों प्रकरणों की जानकारी उच्चअधिकारियों को भी है। पर कोई कार्यवाही करना नहीं चाहते, क्योंकि इससे शाखा प्रबंधकों, दलालों व वकीलों को जेल की हवा खाना पड़ सकती है। कजऱ् वसूली न होने पर डूबत खाते में राशि डाल दी जाती है। दलालों, वकीलों, शाखा प्रबंधकों के दबाव में शिकायत करने से किसान परहेज करते हैं। बैंक एजेंसी पर केन्द्र सरकार का नियंत्रण नहीं रहने से बैंकों से करोड़ों रूपया का भ्रष्टाचार हो रहा है। इसी प्रकार का मामला कुछ वर्ष पहले स्टेट बैंक ऑ$फ इंडिया शाखा मुलताई में भी आया था, लेेकिन भ्रष्ट तत्वों को बचाने के लिए मामला र$फा-द$फा कर दिया गया। इसी प्रकार सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में एक एकड़ ज़मीन को $फजऱ्ी तरीके से 13 एकड़ बना दिया एवं ट्रेक्टर के लिए ऋण प्रकरण बना दिया गया, लेकिन उसकी रिपोर्ट तक नहीं हुई।

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