
छत्तीसगढ़ में नहीं हैं सुरक्षित मज़दूर
आए दिन हो रही दुर्घटनाओं की एक वजह यदि कार्य के दौरान लापरवाही है, तो दूसरी बड़ी वजह औद्योगिक सुरक्षा अधिनियम में निहित शर्तों का पालन नहीं करना है। ज़ाहिर है, दुर्घटनाओं के लिए यदि प्रबंधन जि़म्मेदार है, तो राज्य शासन का श्रम विभाग भी कम जि़म्मेदार नहीं। हृ दिवाकर मुक्तिबोध
छत्तीसगढ़ की राजधानी के औद्योगिक क्षेत्र में एक सप्ताह के भीतर दूसरी दुर्घटना यह प्रमाणित करने के लिए काफ़ी है कि औद्योगिक सुरक्षा के प्रति लापरवाही का कोई ओर-छोर नहीं है, और सुरक्षा का कामकाज केवल कागज़़ों पर चल रहा है। यह गहन चिंता का विषय है कि रायपुर, रायगढ़ एवं कोरबा के औद्योगिक संयंत्रों में आए दिन कोई न कोई दुर्घटना होते रहती है, जिसमें या तो श्रमिकों की जान जाती है या वे घायल होकर स्थायी अपंगता के शिकार होते हैं। रायपुर के निकट सरोरा के महेन्द्रा स्ट्रिप्स में 28 सितंबर को फर्ऩेस में हुए विस्फोट में 18 श्रमिक बुरी तरह झुलस गए थे, जिनमें से तीन की मौत उपचार के दौरान हो गयी। झुलसे हुए शेष मज़दूर अभी भी जि़ंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। इसी दिन कोरबा की स्वस्तिक कोल वाशरी में कन्वेयर बेल्ट में फंसने से एक श्रमिक की मौत हो गई थी। इस दुर्घटना के सिर्फ 10 दिन के भीतर सिलतरा के कार्पोरेट एलायज़ (राजेन्द्र स्टील्स) में फिर हादसा हुआ। यहां फर्नेस की कूलिंग पाइप लाइन में लीकेज से जो गर्म भाप निकली उसमें 4 मज़दूर बुरी तरह झुलस गए जिनमें दो की हालत नाज़ुक है। 6 अक्टूबर को कोरबा स्थित बालको के एल्यूमिना प्लांट में भी दुर्घटना हुई। बालको संयंत्र की इस इकाई में फर्ऩेस ब्लाक में दरवाज़ा लगाने का काम चल रहा था। लगभग 10 टन का यह इस्पाती दरवाज़ा एकाएक गिर पड़ा, जिसके नीचे तीन मज़दूर दब गए, जिनमें एक की मौत हो गई। इन दुर्घटनाओं से समझा जा सकता है कि सुरक्षा के मामले में किस कदर लापरवाही बरती जा रही है। औद्योगिक संयंत्रों में श्रमिकों एवं कार्यरत कर्मचारियों की सुरक्षा का दायित्व मूलत: प्रबंधन पर है, जो सुरक्षा उपायों को दोयम दर्जे पर रखता है। यानी करोड़ों के संयंत्रों में श्रमिकों की सुरक्षा प्रबंधन की प्राथमिक सूची में नहीं है। आए दिन हो रही दुर्घटनाओं की एक वजह यदि कार्य के दौरान लापरवाही है, तो दूसरी बड़ी वजह औद्योगिक सुरक्षा अधिनियम में निहित शर्तों का पालन नहीं करना है। ज़ाहिर है, दुर्घटनाओं के लिए यदि प्रबंधन जि़म्मेदार है तो राज्य शासन का श्रम विभाग भी कम जि़म्मेदार नहीं। इस विभाग के अंतर्गत स्वास्थ्य एवं सुरक्षा इकाई से पूछा जा सकता है कि क्या कारख़ाना निरीक्षक एवं अन्य अधिकारी नियमित रूप से कारखानों का निरीक्षण करते हैं? क्या वे सुरक्षा के उपलब्ध साधनों की पड़ताल करते हैं तथा क्या प्रबंधन काम को ठेके में देने मात्र से जवाबदेही से बरी हो सकता है? आमतौर पर सिविल वर्क ठेके में दिए जाते हैं, तथा ठेकेदार के मज़दूर कार्य करते हंै। औद्योगिक दुर्घटनाओं में मरने वाले अधिकांश ठेका श्रमिक ही होते हैं। बालको चिमनी हादसे में मृत 42 श्रमिक चीनी कम्पनी सेपको के मज़दूर थे। ठेका प्रथा से कारख़ानेदारों को बच निकलने का मौका मिलता है। दुर्घटनाओं की स्थिति में सीधे तौर पर उन पर कोई आंच नहीं आती। मृतकों के परिजनों को मुआवज़ा देकर प्रबंधन छुट्टी पा लेता है तथा कानून के फंदे से तिकड़में भिड़ाकर बचा रहता है। रायपुर उरला स्थित गोदावरी इस्पात संयंत्र में 2008 में घटित दुर्घटना में 8 श्रमिक मारे गए हैं। श्रम न्यायालय में मामला पेश हुआ और सिफऱ् मैनेजर को सज़ा सुनाई गयी वह भी सिफऱ् 3 महीने की। बालको चिमनी हादसे की न्यायिक जांच अभी पूरी नहीं हुई है, लेकिन मारे गए श्रमिकों के परिजन अभी भी रोजगार के लिए भटक रहे हैं। महेन्द्रा स्ट्रिप्स में हुए हादसे में 3 श्रमिकों के मरने के बाद पुलिस ने धाराएं बदली हैं, तथा अब संयंत्र के प्रबंधक व संचालक के खि़लाफ़ भादवि की धारा 304 ए के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज किया है। पुलिस जांच का क्या निष्कर्ष निकलेगा, कहना मुश्किल है, लेकिन प्राय: यह देखने में आया है जैसे-जैसे समय बीतता है, मामलों में लीपापोती शुरू हो जाती है, तथ्य छिपाए जाते हैं, ख़ानापूर्ति के लिए बलि के बकरे तैयार किए जाते हैं और जाहिर सी बात है, रिश्वतखोरी जमकर चलती है। छत्तीसगढ़ के एक दशक में ऐसा कोई उदाहरण सामने नहीं आया है, जिसमें कम्पनी के मालिकों को सज़ा हुई हो, जबकि बीते दस सालों में अनेक छोटी बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाएं घट चुकी हैं। दुर्घटनाओं के संदर्भ में यह तर्क दिया जाता है, कि वे रोकी नहीं जा सकतीं, क्योंकि भूल करना मानवीय स्वभाव है। यदि इस तर्क को सही भी मान लें, तो भी यदि पर्याप्त सतर्कता बरती जाए और सुरक्षा के समुचित बंदोबस्त हों तो दुर्घटनाएं कम तो हो ही सकती हैं। क्या राज्य का श्रम मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा संचालनालय अपनी जि़म्मेदारी का निर्वहन करता है? क्या प्रदेश के श्रम मंत्री चंद्रशेखर साहू कारख़ानों का औचक निरीक्षण करने कभी समय निकाल पाए? क्या उन्होंने श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए कम्पनियों पर वांछित दबाव बनाया? क्या प्रदेश के उद्योग मंत्री राजेश मूणत न्यायोचित तरीके से अपनी जि़म्मेदारी निभा पा रहे हैं? क्या राजधानी में भयानक औद्योगिक वायु प्रदूषण रोकने में उन्हें कामयाबी मिल पाई? यह ठीक है कि राज्य में कोई औद्योगिक अशांति नहीं है, लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि श्रमिकों के वाजिब हितों की भी रक्षा न की जाए। श्रमिकों की जानें जाती हैं, परिवार बेघर और बेसहारा होते हंै, इनकी रक्षा कौन करेगा? इनके लिए उचित मुआवज़े के साथ-साथ स्थायी रोजग़ार की व्यवस्था क्यों नहीं होती? यह कम्पनी और लोकप्रिय सरकार की जि़म्मेदारी होनी चाहिए, जिससे उन्होंने मुंह मोड़ रखा है। दस दिन के भीतर चार औद्योगिक दुर्घटनाएं शासन के लिए चिंता का सबब होना चाहिए। अब यह देखना बेहद ज़रूरी है कि रायपुर, कोरबा, रायगढ़ एवं छत्तीसगढ़ के अन्यत्र स्थानों में चल रहे संयंत्रों में रखरखाव पर ध्यान दिया जा रहा है अथवा नहीं। कौन से ऐसे उद्योग हंै जहां इसके अभाव में हादसे हो सकते हैं। यदि सरकार कड़ाई बरते तो व्यवस्थाएं सुधर सकती हैं। महेन्द्रा स्ट्रिप्स में फर्ऩेस फटने से दुर्घटना हुई, जबकि कार्पोरेट एलायज़ में पाइप लीकेज दुर्घटना का कारण बना। यदि इन संयंत्रों में रखरखाव ठीक रहता, तो ये दुर्घटनाएं हरगिज़ नहीं होतीं। बहरहाल मुख्यमंत्री रमन सिंह ने घायलों की पूछपरख की। वे उन्हें देखने अस्पताल गए। इलाज का सारा ख़र्च महेन्द्रा स्ट्रिप्स के मालिकों को उठाने के निर्देश दिए। उन्होंने संवेदनशीलता दिखाई है, और इससे उम्मीद बंधती है कि वे कुछ ऐसे स्थायी बंदोबस्त करेंगे जिससे राज्य में उद्योगों के विकास के साथ श्रमिकों की सुरक्षा एवं हितों की भी रक्षा हो सकेगी।
रेड्डी बंधुओं की ताकत का असली राज़
अंशू सिंह
नई दिल्ली। कर्नाटक के राजनैतिक नाटक का अंत चाहे जो होता, लेकिन अब कर्नाटक में सबसे ज्य़ादा ताकतवर और सबसे रईस नेता परिवारों में से एक रेड्डी परिवार को पता लग गया है, कि भाजपा का विश्वास उन्होंने फिर जीत लिया है और इस विश्वास के सहारे वे कभी भी विश्वासघात कर सकते हैं। मुंहबोली बहन और भाजपा की प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज भी उनके साथ हैं। रेड्डी बंधुओं ने जो तरक्की की है, उसका कोई जवाब नही। साइकिलों से चलते चलते अब अपने हवाई जहाज़ और हैलीकॉप्टर उड़ाने वाले इस रेड्डी परिवार ने ज़मीन से पैसा निकाला है, और भाजपा जैसी चाल, चरित्र और चिंतन वाली पार्टी ने उन्हें ऐसा करते रहने में मदद दी है। येदुरप्पा की सरकार बचने की हालत में भाजपा को सबसे पहले रेड्डी बंधुओं, जिनमें से दो मंत्री भी हैं, को ठिकाने लगाने की व्यवस्था करनी पड़ेगी। जिन रेड्डी बंधुओं की आड़ में कर्नाटक में अक्सर राजनीतिक भूचाल आ जाता है, वे दरअसल एक मामूली सिपाही के बेटे हैं। पर आज उनकी तूती बोलती है। तीनों भाई राजनीति में हैं। दो करुणाकर और जनार्दन रेड्डी कर्नाटक सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। रेड्डी बंधुओं ने कई स्रोतों से पैसे बनाए। 1990 के दशक में चिट फंड के ज़रिए उन्होंने ज़बरदस्त कमाई की। पर उन पर रुपयों की असली बरसात खनन के कारोबार में उतरने के बाद से हुई। 50 लाख रुपये लगा कर वे इस कारोबार में उतरे। उसके बाद यह रकम दिन दूनी, रात चौगुनी होने लगी। मानो, ओबलापुरम खदान से वे अयस्क नहीं, पैसा ही निकाल रहे हैं। एक समय था, जब बेल्लारी के इस रेड्डी भाइयों की कोई पहचान नहीं थी। पर आज पूरा कर्नाटक इन्हें अरबपति खदान मालिक के रूप में जानता है। दौलत और शोहरत के साथ-साथ रेड्डी बंधुओं के साथ विवाद भी जुड़ते गए। उन पर अवैध खनन के आरोप लगे। ओबलापुरम खान की सीमा को लेकर भी विवाद उठा। कहा गया कि वे आंध्र प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र में भी अवैध रूप से खनन कर रहे हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और उन्हें खनन पर पाबंदी भी झेलनी पड़ी। जब सुषमा बेलारी से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खि़लाफ़ लोकसभा चुनाव लड़ी थीं, तभी उनसे रेड्डी बंधुओं का रिश्ता मज़बूत हुआ था। रेड्डी भाइयों की कर्नाटक की राजनीति में भी अच्छी हैसियत है। कुछ महीने पहले उन्होंने राज्य की येद्दयुरप्पा सरकार के वजूद पर ही ख़तरा पैदा कर दिया था। तब मुख्यमंत्री को उनकी मांगें माननी पड़ी थीं। में जनार्दन रेड्डी ने सार्वजनिक रूप से बताया था कि उनकी और उनकी पत्नी की करोड़ का एक हेलीकॉप्टर, चार करोड़ की एक डीलक्स बस और पांच करोड़ रुपये करोड़ रुपये था। हालांकि चुनाव के लिए नामांकन पत्र भरते समय दिए गए करोड़ रुपये बताई है। रेड्डी बंधुओं ने खनिज शोधन के लिए ब्रम्हाणी स्टील नाम से एक कंपनी बनाई, जिसके लिए उन्होंने किसी से एक भी पैसा नहीं लिया था।

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