राजनीतिक एनकाउण्टर की आहट
राजकुमार की हत्या के विरोध में आयोजित रैली में स्वामी अग्निवेश और ममता बनर्जी क्या, देश में अब एनकाउण्टर के नाम पर राजनीतिक हत्याकाण्ड का दौर शुरू हो गया है? पिछले एक डेढ़ साल में हुई राजनीतिक हत्याओं पर नजऱ दौड़ाएं, तो यह सवाल बिल्कुल ही बेकार नजऱ नहीं आता। अभी हाल में ही मध्य प्रदेश पुलिस ने भिंड युवक जि़ला कांग्रेस के पद पर कार्यरत अमजद ख़ान को एनकाउण्टर में मार गिराया, जिस पर मध्य प्रदेश विधानसभा के उपनेता चौधरी राकेश सिंह और मध्य प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष डॉ. गोविन्द सिंह नें भिंड पुलिस के ऊपर आरोप लगाया है, कि भिंड पुलिस नें 22 अगस्त को एक मुठभेड़ दिखाकर अमजद ख़ान की हत्या कर दी।
चौधरी राकेश सिंह और डॉ गोविन्द सिंह इसे फज़ऱ्ी मुठभेड़ बता रहे हैं, और मामले की सीबीआई से जाँच कराने की मांग कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि अमजद ख़ान भिंड जि़ला युवक कांग्रेस के सचिव के आलावा पूर्व सैनिक भी था और भारत के तरफ़ से कारगिल युद्ध में उसने भाग भी लिया था। अमजद ख़ान की पत्नी यास्मिन मध्य प्रदेश महिला कांग्रेस की सक्रिय कार्यकर्ता है। मध्य प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में दखल देते हुए अपने स्तर पर जाँच कराने की बात कही है।
दूसरी तरफ़ ममता बनर्जी नें कोलकाता में तृणमूल छात्र परिषद की स्थापना दिवस पर ज्ञानेश्वरी रेल हादसे के आरोपी उमाकांत महतो की पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में मौत पर सवाल खड़ा करते हुए कहा है, कि उमाकांत महतो को साजि़श के तहत पुलिस द्वारा फज़ऱ्ी मुठभेड़ में मार दिया गया। ममता का कहना है कि पुलिस मुठभेड़ का बहाना बनाकर ज्ञानेश्वरी रेल हादसे के आरोपियों की हत्या कर रही है। ममता ने यह भी कहा है कि जंगमहल में माओवादियों के नाम पर माकपा हिंसा कर रहे हंै। ज्ञानेश्वरी रेल हादसे में उमाकांत महतो से कई सबूत मिलने की उम्मीद थी, क्योंकि हादसे को लेकर उमाकांत महतो नें माकपा के स्थानीय नेताओं पर उंगली उठाई थी। इससे भयभीत माकपा नेताओं के इशारे पर पुलिस नें फज़ऱ्ी मुठभेड़ में उमाकांत को मार डाला और मुठभेड़ का रूप दे दिया।
सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश नें नक्सली नेता चेरूकूरी राजकुमार उफऱ् आज़ाद और उत्तरांचल के पत्रकार हेमराज पाण्डेय की मौत की न्यायिक जाँच कराने की मांग की है। स्वामी अग्निवेश के आलावा अनेक बुद्धिजीवियों, सामाजिक संगठनों और पत्रकारों नें पुलिस के मुठभेड़ के दावे को ग़लत बताया है। ममता बनर्जी ने इसे $खून (कत्ल) करार दिया है, तो पश्चिम बंगाल के वामपंथी सरकार में मंत्री क्षिति गोश्वामी ने आज़ाद और हेमराज पाण्डेय के मौत की जाँच की मांग की है। आन्ध्र प्रदेश पुलिस एआईबी पर आरोप है कि वह नागपुर स्थित महाराष्ट पुलिस के एंटी नक़्सल आपरेशन के अधिकारियों को बिना जानकारी दिए नागपुर में घुसी और नागपुर से माओवादी नेता आज़ाद और पत्रकार हेमराज का अपहरण कर वर्धा, चंद्रपुर और गडचिरोली होते हुए आन्ध्र प्रदेश स्थित अदिलाबाद के जंगलों में ले गये। आरोप यह भी है कि रास्ते में कहीं उन दोनों की हत्या कर, उनके शव को अदिलाबाद के जंगल में फेंक दिया था।
स्वामी अग्निवेश एवं अन्य को इस बात को लेकर गहरी चिंता एवं क्षोभ है क्योंकि गृहमंत्री पी. चिदंबरम तीन माह पहले स्वामी अग्निवेश को नक्सलियों के साथ शांतिवार्ता में मध्यस्थता के लिए बुलाया था स्वामी अग्निवेश का यह भी कहना है कि उनके कहने पर आज़ाद वार्ता के लिए कदम बढ़ाते हुए शांतिवार्ता की तिथि निर्धारित करने जा ही रहा था, कि आंध्र पुलिस द्वारा उसकी हत्या कर दी गयी। उसके साथ एक पत्रकार हेमराज पाण्डेय की भी हत्या कर दी गयी। अग्निवेश के अनुसार इन हत्याओं से उनके द्वारा बनायी जा रही शांतिवार्ता की योजना को गहरा धक्का लगा।
इसके आलावा अन्य चर्चित मामले इसरत जहां, सोहराबुद्दीन शेख़, दिल्ली का बटला हाऊस के अलावा सामने आया जो पुलिस की कार्यशैली और देश के कानून पर सवाल खड़े करता है। यह एक ऐसे पुलिस मुठभेड़ की कहानी हंै, जिसमें एक ही व्यक्ति के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस दो अलग-अलग जगह पर दो बार मुठभेड़ करती है। दोनों जगह नौशाद नाम का वह व्यक्ति मारा जाता है। एक जगह है ग़ाजिय़ाबाद और दूसरा मेरठ। दोनों जि़ला पुलिस के दस्तावेज़ कह रहे है कि असली को हमने मारा। पुलिस मेनुअल के मुताबिक अपराधी को पकडऩे के लिए अगर बहुत ज़रूरी हो तो कमर के नीचे गोली मारी जानी चाहिए, लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दें तो लगभग सभी मुठभेड़ों में पुलिस गोली अपराधी के छाती या सिर पर मारी जाती है. आमने-सामने की मुठभेड़ में पुलिस का बाल बांका भी नहीं होता और अपराधी हर बार मारा जाता है।
फज़ऱ्ी मुठभेड़ के मामले पर अगर गौर करें तो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) में आयी शिकायतों में उत्तर प्रदेश का स्थान सबसे ऊपर है। अक्टूबर 1993 अक्टूबर 2009 के दौरान उत्तर प्रदेश से फज़ऱ्ी मुठभेड़ की 716 शिकायतें एनएचआरसी को मिलीं। बिहार 79 शिकायतों के साथ दूसरे नंबर पर रहा। आंध्र प्रदेश 73, महाराष्ट्र 61, असम 11, गुजरात 20, हरियाणा 18, कर्नाटक 10, मध्य प्रेदश 36, मणिपुर 18, पंजाब 31, राजस्थान 11, तिमलनाडू 24, त्रिपुरा 4, पश्चिम बंगाल 8, अंडमान निकोवार 1, दिल्ली 22, छत्तीसगढ़ 6, झारखंड 21 और उत्तराखंड से 29 शिकायतें दर्ज की गयीं। एनएचआरसी में पहुंची फज़ऱ्ी मुठभेड़ की शिकायतों के मद्देनजर पूरे देश में 1993-2009 के बीच 1999 मामले दर्ज किए गए। क्या आपको लगता है कि पुलिस मुठभेड़ की आड़ में ये सभी हत्यायें स्वयं के आउट आफ़ टर्न प्रमोशन के लिए कर रही है ? यकीनन। कुछ मामले अपवाद हो सकते है। किंतु आधिसंख्य मामलों के लिए यह कहा जा सकता है कि एक हत्यायें पुलिस सत्ताधीशों के इशारे पर कर रही है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में एक मज़बूत कानून व्यवस्था होते हुए भी मानवाधिकारों का हनन करने वाले इन्हीं सत्ताधारियों द्वारा बचाया जाता है। कानून के अनुसार किसी व्यक्ति की हत्या को आपराधिक दंड संहिता (सी. पी.सी) की धारा 46 के अनुसार यदि तर्क संगत नहीं ठहरया जा सके, तो संबंधित अधिकारी को मानव हत्या का दोषी माना जाएगा। किंतु क्या अमजद ख़ान, उमाकांत महतों, चेरूकूरी राजकुमार उफऱ् आज़ाद तथा पत्रकार हेमराज पाण्डेय की पुलिस मुठभेड़ बताकर की गयी हत्याओं की पड़ताल अगर सोहराबुद्दीन फज़ऱ्ी मुठभेड़ की तरह की जाय, तो यकीन मानिए इन सभी मामलों में लिप्त सत्ताधारी अमित शाह के चेहरे से नकाब हट सकता है।
फ़ जऱ्ी और झोलाछाप डॉक्टरों का कारोबार हृ मनीष मडाहर खरगोन। खरगोन जि़ले में पिछले कई वर्षो से $फजऱ्ी व झोलाछाप डाक्टरों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में मनमाने ढंग से इलाज के नाम पर गरीब व भोलेभाले ग्रामीणों को सरे आम लुटा जा रहा है। जि़ले में $फजऱ्ी व झोलाछाप डॉक्टर मरीज़ों की जिदंगी बर्बाद करने पर तुले है बिना किसी डिग्री और आयुर्वेद की आड़ में एलोपैथिक इलाज करने वाले डॉक्टर धड़ल्ले से दवाइयों बेच कर अपनी जेब भर रहे हैं ।
अंधिकांश जगहों पर बाहर से आये हुए डॉक्टर हैं, जिनका खरगोन के कई बड़े प्राईवेट अस्पतालों एवं शासकीय अस्पतालों से तार जुड़े हैं, और कमीशन के लालच में ये उन मरीज़ों को यहां रे$फर करते हंै। ऐसा नहीं कि खरगोन के आला दर्जे के अधिकरियों को इस बात की भनक नहीं है। यह सब उनकी मेहरबानियों का ही अंजाम है, क्यों कि इस सबके बदले उन्हें हर महीने मोटा सा कमीशन जो मिल रहा है। पिछले दिनों कलेक्टर महोदय श्री केदार शर्मा जी ने आदेश जारी किया था, कि जि़ले के सभी $फजऱ्ी व झोलाछाप डॉक्टर खोजे जायें और उनके खि़लाफ़ कार्यवाही की जाये। परन्तु उन अधिकारियों को कलेक्टर महोदय के आदेश के बावजूद एक भी झोलाछाप डॉक्टर व उनका चिकित्सालय नहीं मिला। जबकि जि़ले के हर गांव, कस्बे, गलियों में 8 से 10 डॉक्टर बेख़ौफ़ अपना कार्य कर रहे हंै। कई डाक्टरों ने तो अपने डिस्पेन्सरी में मेडिकल दुकान भी खोल रखी है, जो बाज़ार से उचे व मनमाने दोमों पर दवाईयां बेच रहे हंै। परेशान व ग्रामीण जायें तो जायें कहां। बाज़ार में मिलने वाली ग्लुकोज़ की बाटल 20 से 25 रू. की वही उस मरीज़ को 150 से 200 रू. में चढ़ाते हंै और कई बार तो हाईडोस व ग़लत दवाईयों के कारण मरीज़ों की मौत तक हो जाती है।
गलत इलाज से किसी मरीज़ की मौत होने पर वे प्रशासन को इसकी जानकारी भी नहीं होने देते। इन मुद्रों की जांच की सख़्त कार्यवाई होना चाहिए, ताकि क्षेत्र की जनता के साथ रिवलवाड़ न हो और संबंधित विभाग इस ओर ध्यान देकर ऐसे झोलाछाप डॉक्टरों(यमराजों) से मरीज़ों की जि़दंगी बचाकर उन्हें एक नया जीवन प्रदान करे।

आपने लेख "राजनैतिक एनकाउंटर की आहट" को ३५वे अंक में शामिल किया देख कर अच्छा लगा. किन्तु लेख के साथ लेखक का नाम न डालना दु:खद है.
ReplyDeleteराजेश सिंह
संपादक, नागरिक विकल्प
मुंबई