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Friday, September 24, 2010







सुलझी हुई समस्या को उलझाने पर आमादा

आज जो लोग भी कश्मीर की समस्या निपटाने निकले है, सवाल पैदा होता है क्या उन्हें कश्मीर की समस्या का ओर-छोर भी पता है? क्या राहुल गांधी और उमर अब्दुल्ला की नयी पीढ़ी 1947 से 2010 के बीच कश्मीर में क्या हुआ है, उसकी प्रामाणिक जानकारी से लैस भी है? यदि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार कश्मीर की स्थिति को ठीक से समझ ही रही होती, तो क्या पिछले 6 वर्षों के शासनकाल में उसने एक सुलझ चुकी समस्या को उलझा लेने की मूर्खता की होती?
हृ प्रेम शुक्ल
कश्मीर के बिगड़ते हालात को सुधारने के लिए आज देश के गृहमंत्री पी.चिदंबरम के साथ सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल कश्मीर की यात्रा शुरू कर रहा है। इस दौरे को सफल बनाने के लिए कश्मीर के अलगाववादी नेता सैय्यद गिलानी और मीरवाईज़, उमर फ़ारूक समेत लगभग 30 कश्मीरी नेताओं को वार्ता के लिए आमंत्रित किया गया है। प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह हर शर्त पर कश्मीर में शांति चाहते हैं। कांग्रेस के प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री राहुल गांधी कश्मीर में बिगड़ते हालात के बावजूद अपने मित्रओमर अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री पद पर बनाए रखना चाहते हैं। कांग्रेस नेताओं की ओर से पिछले दरवाज़े से पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता महबूबा मुफ़्ती से कश्मीर में सत्ता परिवर्तन की चर्चा का पहला दौर पूरा किया जा चुका है। सरकार और मीडिया कश्मीर के अलगाववादियों के जिस आन्दोलन को शांतिपूर्ण और उनपर आत्मरक्षार्थ गोलीबारी करने वाले सुरक्षाबलों को कटघरे में खड़े कर रहे हैं, उन पर तथाकथित शांतिवादी अलगाववादियों के उकसावे पर हुए पथराव में 1600 से अधिक जवानों के सिर अब तक फूट चुके हैं। सेना के तीनों अंगों के प्रमुख सेना को कश्मीर में प्राप्त विशेष अधिकारों की कटौती के खि़लाफ़ चेतावनी जारी कर चुके हैं। देश के मुख्य विपक्षी गठबंधन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने सरकार को कश्मीर के मसले में पूर्ण सहयोग के बावजूद अलगाववादियों के वाकजाल में फंसने के प्रति सचेत किया है।
2004 में जब संप्रग की सरकार सत्ता में आई, उस समय जम्मू एवं कश्मीर में लगभग वही स्थिति आ चुकी थी जो 1996 में पंजाब की थी, यानी राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से विकास कार्य तेज़ करना था और जम्मू एवं कश्मीर पूरी तरह से भारतीय संघ में अपना हित देखता। अंतर्राष्ट्रीय शक्तियों के साथ हिन्दुस्तान उस समय अपनी आज़ादी के बाद सबसे बेहतरीन स्थिति में था। पाकिस्तान इतना उलझा हुआ था कि तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ नियंत्रण रेखा को दोनों देशों की अंतर्राष्ट्रीय सीमा बनने का प्रसताव लिए हिन्दुस्तानी हुक्मरानों के पीछे दौड़ रहे थे। चीन हस्तक्षेप से $खुद को बचाने में अपना हित मान रहा था। कश्मीर की समस्या को सुलझाने के लिए इससे उत्तम स्थिति हो ही नहीं सकती थी। इन 6 वर्षों में संप्रग सरकार ने क्या कूड़ा किया है। यह आप सहज समझ सकते हैं, कि जब पाकिस्तान बाढ़ की विभीषिका झेल रहा है, और किसी आतंकवादी गिरोह में कश्मीर में घुस कर सुरक्षाबलों से भिडऩे की ताकत नहीं बची है, तब आम कश्मीरी युवकों को भड़का कर सुरक्षाबलों के सिर फुड़वाये जा रहे हैं। चीन गिलगित और बालतिस्तान में लालसेना की खुली घुसपैठ करा रहा है, लेकिन हमारे सत्ता संस्थान में इतना कलेजा भी नहीं है कि उसके विरोध में एक शब्द भी बोल सके। 2004 में हमारा देश अफग़ानिस्तान में हस्तक्षेप करने की स्थिति में आ गया था, अब स्थिति यह है कि अमेरिका $खुद हिन्दुस्तान को अफग़ानिस्तान से दूर रखने की बात कर रहा है। शक है कि अमेरिका का ओबामा प्रशासन अफग़ानिस्तान की समस्या को सुलझाने के लिए तालिबान और पाकिस्तान से कश्मीर का सौदा कर सकता है। कश्मीर का भूत अचानक जाग गया है, और पूरा देश तनावग्रस्त है। हमारी मीडिया का ही एक बड़ा वर्ग ऐसा प्राचारित करता है, जैसे सचमुच कश्मीर में हिन्दुस्तान अतिक्रमणकारी हो और पाकिस्तान न्याय के पक्ष में खड़ा हो। कश्मीर जानेवाले क्या जानते हैं।
1.1947 में पार्लियामेंट द्वारा पारित स्वाधीनता अधिनियम के प्रावधान के तहत जम्मू एवं कश्मीर राज्य भारत को दिया गया था।
2. भारतीय नेताओं ने ब्रिटिश सरकार और मोहम्मद अली जिन्ना को सुझाव दिया था कि भारत की रियासतों को अपने राज्य की जनता की इच्छा अनुसार,अपनी भावी स्थिति का निर्णय लेने दें; तथा इस बारे में नवाब, निज़ाम तथा महाराजा की रूचि/सुझावों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उस समय पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल मोहमाद अली जिन्ना ने ही अंग्रेज़ों के बलबूते यह आग्रह किया कि जनता नहीं, बल्कि राजाओं को अपने राज्य के भविष्य का निर्णय लेना चाहिए। जिन्ना की यह इच्छा थी कि भोपाल, हैदराबाद तथा जूनागढ़ जैसे राज्यों के शासक तथा राजस्थान के रजवाड़ों के मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी वाले क्षेत्र या तो स्वतंत्र हो जायेंगे या फिर पाकिस्तान में शामिल हो जायेंगे। उनका अनुमान था कि यदि रजवाड़ों को स्वतंत्र रहना है या पाकिस्तान में शामिल होना है तो इससे भारत का भौगोलिक क्षेत्र कम हो जाएगा तथा इसकी राजनीतिक पहचान भी टुकड़ों में बँट जायेगी।
3. जिन्ना को यह आशा थी कि कश्मीर राज्य जिसमें भी विशेष कर घाटी का मुस्लिम बहुमत महाराजा हरी सिंह के खि़लाफ़ विद्रोह कर देगा, जिससे कश्मीर या तो स्वतंत्र हो जाएगा या फिर पाकिस्तान में शामिल हो जाएगा।
4. जब जिन्ना की अपेक्षा पूरी नहीं हुयी, तब अक्टूबर 1947 में जम्मू एवं कश्मीर में पाकिस्तान ने कबायलियों की आड़ में सेना की घुसपैठ करा दी। भारत ने इस हमले को आंशिक रूप से कुचल दिया।
5.सन 1948 में भारत संयुक्त राष्ट्र में इस आशा के साथ गया था, कि अंतर्राष्ट्रीय संगठन पाकिस्तानी कब्ज़े वाले कश्मीर को ख़ाली करवा देगा। पार्लियामेंट में पारित स्वाधीनता अधिनयम के तहत कश्मीर के महाराजा द्वारा भारत में कश्मीर के विलय को लेकर पाकिस्तान द्वारा खड़ी की गयी बाधाओं को दूर कर देगा।
6.भारत ने संयुक्त राष्ट्र में कुछ शर्तों के साथ कश्मीर में जनमत संग्रह की अनुमति दी थी. उसमे सर्वाधिक महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि पहले पाकिस्तान को कश्मीर से अपनी सेनायें हटानी पड़ेंगी. उसे जनमत संग्रह के पूर्व जम्मू एवं कश्मीर को पूरी तरह से ख़ाली करना पड़ेगा। जो लोग भी कश्मीर में भारत द्वारा जनमत संग्रह के लिए संयुक्त राष्ट्र में किये गए वादे की बात करते हैं वे कृपया बताएं कि पाकिस्तानी कब्ज़े वाले कश्मीर में पिछले 63 वर्षों में जिस तरह आबादी में बड़े पैमाने की घुसपैठ कराई गयी है, उसे 1947 वाली स्थिति में वे कैसे ले जायेंगे?
7. इसके उलटे हिन्दुस्थान के जम्मू एवं कश्मीर में भारतीय संविधान की धरा 370 के प्रावधान के चलते 63 वर्षों में आबादी में केवल यही परिवर्तन हुआ है कि 1990 में घाटी से लाखों की हिन्दू पंडितों की आबादी को निर्वासित कर दिया गया है. पाकिस्तानी प्रश्रय के कारण कश्मीर में जिस तरह का इस्लामी अतिवाद फैलाया गया है उससे अनावश्यक हिन्दुस्थान विरोधी माहौल बना है। यदि कश्मीर में आत्मनिर्णय की बात करनी है तो पहले पाक कब्ज़े वाले कश्मीर को खाली कराया जाना चाहिए। 1947 में उस इलाके में जो मूल निवासी बसे थे उसकी शिनाख़्त की जानी चाहिए और उनके वंशजों को दशक-दो दशक भारत में विलीन किया जाए,उसके बाद कश्मीर को भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत स्वायत्तता देने के प्रस्ताव पर विचार किया जा सकता है।
8. हमारे सत्ताधीशों के भ्रामक व्यवहार के चलते ही कश्मीर यह प्रचारित करने में कामयाब रहा है कि हिन्दुस्थान के साथ संबंधों के सामान्यीकरण में सबसे बड़ी बाधा कश्मीर है। तमाम अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दे पर विफल होने के बाद पाकिस्तान 3 बार हिन्दुस्थान से युद्ध कर चुका है। इन युद्धों में भी पराजय के बाद पाकिस्तान हिन्दुस्थान को छलने में कामयाब हुआ है। 1965-66 के युद्ध में पराजय के बाद जब सोवियत संघ की मध्यस्थता से पाकिस्तानी राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब और हिंदुस्तानी प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के बीच ताशकंद समझौता हुआ था, तो उसमें स्पष्ट तौर पर यह प्रावधान किया गया था, कि दोनों देश अब एक दूसरे के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। मतलब साफ़ था, कि कश्मीर विवाद का हल मान लिया गया था। 1971-72 के युद्ध में पाकिस्तान पर निर्णायक विजय के बाद भी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के परामर्शदाताओं की आपसी रंजिश ने शिमला समझौते में कश्मीर को विवादास्पद क्षेत्र मानने की ग़लती कर ली। 1971 -72 में ऐसा मौक़ा आया था जब पाकिस्तान अपने कब्ज़े वाले कश्मीर से भी हटने के लिए तैयार हो जाता। शिमला वार्ता के दौरान इंदिरा गांधी के एक सलाहकार डी.पी.धर युद्धबंदी पाकिस्तानी सैनिकों को रिहा करने और पाकिस्तानी क्षेत्र से कब्ज़ा हटाने के लिए यह शर्त पेश कर रहे थे, कि पाकिस्तान ज मू एवं कश्मीर पर हिन्दुस्तान का पूर्ण अधिकार स्वीकार ले. ज़ुल्फि़कार अली भुट्टो उस समय इतने दबाव में थे कि उनके पास इस शर्त को मानने के आलावा कोई विकल्प नहीं था. लेकिन इंदिरा गांधी के दूसरे प्रमुख सलाहकार पी.एन हक्सर ने इंदिरा गांधी को भ्रमित कर दिया कि युद्धबंदियों की रिहाई को अधिक समय तक रोके रखना भारत को भारी पड़ सकता है। उनका दूसरा तर्क था कि यदि पाकिस्तान के क्षेत्रों को हिंदुस्तानी सेनाओं ने ख़ाली नहीं किया, तो दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ जाएगा और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय हिन्दुस्तान के खि़लाफ़ निर्णय लेने को मजबूर हो जायेंगे। इंदिरा गांधी पर डी.पी.धर की तुलना में पी.एन.हक्सर का प्रभाव अधिक पड़ा। शिमला समझौते में ज़ुल्फि़कार अली भुट्टो ने कश्मीर को विवादास्पद मुद्दे के तौर पर उल्लेख कराने में सफलता प्राप्त कर ली। प्रख्यात कानूनविद राम जेठमलानी कहते हैं कि ज़ुल्फि़कार अली भुट्टो कानून के ज्ञाता थे, सो बड़ी ही चतुराई से उन्होंने ताशकंद समझौते में जिस मुद्दे को ख़त्म मान लिया गया था, उस कश्मीर मुद्दे को शिमला समझौते में शामिल करा लिया।
कुल मिला कर कश्मीर मुद्दा जितना उलझा नहीं है, उससे अधिक उसे हमारे राजनीतिज्ञों ने उलझा दिया है। सशस्त्र विशेषाधिकार अधिनियम के मुद्दे पर भी पूरे देश को दिग्भ्रमित किये जाने का प्रयास जारी है। ऐसी तस्वीर खड़ी की जा रही है, जैसे इस क़ानून के चलते ही कश्मीर में बखेड़ा खड़ा हो गया हो। इस अधिनियम पर पूर्वोत्तर राज्यों में भी समय-समय पर बखेड़ा खड़ा होता रहा है। पूर्वोत्तर में बखेड़े के मद्देनजऱ केंद्र ने इसकी समीक्षा के लिए न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी आयोग का गठन भी किया था।
जीवन रेड्डी आयोग ने पाया कि जहां पर भी उक्त अधिनियम लागू थे, वहाँ सेना की बजाय उत्पातियों की मौत पुलिस बल के हाथों हुयी हैं। सेना को तो अनायास ही बदनाम किया जाता रहा है। कश्मीर पर किसी भी प्रकार का मानस बनाने के पहले ज़मीनी सच्चाईयों को समझना ज़रूरी है।


राजीव- सोनिया को मिलाने वाले चाल्र्स एंटनी नहीं रहे
हृ सुप्रिया रॉय
सोनिया गांधी और राजीव गांधी को लंदन में पहली बार मिलवाने वाले चार्ल्स एंटनी की मौत हो गई है। वे बहुत दिनों से बीमार थे और पिछले कुछ समय से अंधे हो गए थे। मगर चार्ल्स एंटनी अपने पीछे बहुत सारी कहानियां छोड़ गए हैं। सबसे पहले तो उनका परिचय। एंटनी कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के पास रेस्टोरेंट चलाते थे और 1965 में सोनिया मियानो नाम की छात्रा उनके यहां कुछ खाने आई थी। इस छात्रा की पसंदीदा सीट खिड़की के पास थी जो घिरी हुई थी और वहां काफी भीड़ थी। एंटनी ने सोनिया मियानो को जो सीट सबसे कम भरी हुई थी यानी जिस पर सिर्फ एक छात्र बैठा हुआ था, उस पर बिठाया। सामने बैठे हुए छात्र का नाम राजीव गांधी था। सोनिया गांधी ने बाद में अपनी किताब में लिखा भी है, कि राजीव गांधी की आंखों में झांकते ही उन दोनों में प्यार हो गया था। एंटनी भी यह कहानी मरते दम तक अपने परिवार वालों और दोस्तों को सुनाते रहे। एंटनी के भाई ने पत्रकारों से कहा है, कि वे राजीव और सोनिया को बहुत चिढ़ाया करते थे। जब सोनिया गांधी राजनीति में आई और 2004 में यूपीए की पहली सरकार बनी, तो एंटनी ने अपने पास पड़ोस में चॉकलेट बांट कर इसका जश्न मनाया था। जन्म से ग्रीक नागरिक एंटनी ने बहुत बाद में सन 2006 में सोनिया गांधी को एक पत्र भी लिखा था, जिस पर सात रेसकोर्स रोड का पता था, मगर यह पत्र सोनिया तक पहुंच गया था। डाकिए का काम मनमोहन सिंह ने किया था। लेकिन सोनिया और राजीव को मिलवाने वाले एंटनी का सबसे कमाल का कारनामा कुछ और ही था। राजीव गांधी 1984 में जब प्रधानमंत्री बने, तो एंटनी दिल्ली के जहाज़ में बैठे और राजीव और सोनिया से मिलने भारत आ गए। उन्हें हवाई अड्डे पर ही धर लिया गया, क्योंकि उनके पासपोर्ट पर भारत का वीजा नहीं लगा था। शायद एंटनी ने सोचा था कि जब वे देश के प्रधानमंत्री को इतने करीब से जानते हैं, तो भारत में कौन रोकेगा? मगर नियमों के तहत उन्हें हिरासत में ले लिया गया, और नियमों के तहत ही एक फ़ोन करने की इजाज़त दी गई। एंटनी ने प्रधानमंत्री निवास फ़ोन किया और सिफऱ् संदेश छोड़ा कि प्रधानमंत्री को बता दिया जाए कि वे दिल्ली हवाई अड्डे पर हिरासत में हैं। आधे घंटे के भीतर छह एंबेसडर कारें, गुलदस्तों और कोका कोला की केम से भरी पेटी के साथ एंटनी के पास पहुंच गई थी और विदेश और गृह मंत्रालय के अधिकारी $खुद वीजा की मुहर लगाने हवाई अड्डे पर पहुंचे थे।
भारत में एंटनी ने जो दिन बिताए उनमें वे अंडमान निकोबार भी गए और दिल्ली की गलियों में घूमे। आगरा का ताजमहल तो ख़ैर उन्होंने देखा ही। आखिरी दिन एंटनी ने काफ़ी कष्ट में गुज़ारे। आंखों की रोशनी वापस लाने के लिए वे हर महीने एक इंजेक्शन आंखों में लगवाते थे, मगर रोशनी नहीं आई, तो नहीं आई। एंटनी ने अपने भाई को बताया था कि सोनिया लंच टाइम में आई थी, और राजीव गांधी 11 नंबर की मेज़ पर कुछ दोस्तों के साथ बैठे थे। राजीव गांधी के दोस्त ताहिर जहांगीर भी इसके गवाह थे और एंटनी के अनुसार सोनिया के मेज पर बैठते ही राजीव गांधी सिफऱ् उन्हें देखते ही रहे। एंटनी के पास तो उस फि़ल्म के दो बंटे हुए टिकट भी रखे हुए हैं जो राजीव और सोनिया ने साथ साथ देखी थी। यह फि़ल्म थी सत्यजीत रे की पाथेर पांचाली।

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