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Friday, August 6, 2010




मध्य प्रदेश में सरकार किसकी है?

हृ आलोक तोमर
मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी में अब बहुत $खतरनाक दरारें पड़ गई हैं। दरअसल भाजपा जिन जिन राज्यों में राज कर रही है, उनमें शायद मध्य प्रदेश ही ऐसा होगा, जहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह राजनैतिक स्वायत्ता में ज़रूरत से कुछ ज्य़ादा ही विश्वास करने लगे हैं। उनके लिए संघ परिवार का तो फिर भी कुछ महत्व है मगर पार्टी को उनकी राय में उनके इशारों पर चलना चाहिए। सरकार के मुखिया तो वे हैं ही।
भाजपा के महासचिव और मध्य प्रदेश के प्रभारी अनंत कुमार रतलाम में शिवराज सिंह से खुलेआम कह कर गए थे, कि जितने भी दागी मंत्री हैं उन्हें किनारे लगाओ। खुद शिवराज सिंह सहित लोकायुक्त के दरबार में आठ मंत्रियों के $िखला$फ भ्रष्टाचार, अनाचार और दुराचार की शिकायतें दर्ज हंै। इन पर जांच के बाद जो भी $फैसला आए, दा$ग तो लग ही गया है। मगर शिवराज सिंह चौहान ने एक भी मंत्री के $िखला$फ कार्रवाई करना तो दूर, सवाल तक नहीं पूछा। हो सकता है कि वे अपने आप से भी सवाल पूछने से डर रहे हों। अटल बिहारी वाजपेयी की बहन के बेटे अनूप मिश्रा को चरित्र प्रमाण पत्र देने का साहस शायद किसी में नहीं हो। ग्वालियर जि़ले में ज़मीन को ले कर हुए गोली कांड में पहले उनकी कुर्सी गई और अब उनके बेटे और भतीजे के $िखला$फ वारंट भी निकल गए। ज़ाहिर है कि शिवराज सिंह मध्य प्रदेश में अटल परंपरा का नाश करने पर तुले हुए हैं और इसके लिए अनूप मिश्रा $खुद कम जि़म्मेदार नहीं हैं। गङ्ढा अनूप ने खोदा था और अटल जी की प्रतिमा को उसमें द$फन शिवराज ने कर दिया।
मध्य प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष के तौर पर प्रभात झा का आना एक और बड़ी लहर थी। मध्य प्रदेश भाजपा के समुद्र में यह एक ऐसा ज्वर था, जिससे अब तक पार्टी निपट नहीं पा रही है। प्रभात झा को कांग्रेस के दिग्विजय सिंह से भी पहले भाजपा के नेता ही याद दिला रहे थे, कि प्रभात झा मध्य प्रदेश के नहीं, बिहार के हैं। उनको प्रदेश का अध्यक्ष नहीं बनाना चाहिए। उस हिसाब से चंदन मित्रा बंगाल के हैं, सुषमा स्वराज हरियाणा की हैं और लाल कृष्ण आडवाणी पाकिस्तान में पैदा हुए थे, और उन्हें मध्य प्रदेश से राज्यसभा में क्यों भेजा गया? मगर प्रभात झा भी मध्य प्रदेश भाजपा में असहयोग के शिकार हंै। वे सि$र्फ दस्तखत कर रहे हैं और पार्टी के पदाधिकारियों के नाम दूसरे लोग चुन रहे हैं। वरना ऐसा नहीं होता, कि जिस भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष पद पर शिवराज सिंह $खुद रह चुके हैं, उस पर एक ऐसा विधायक मनोनीत कर दिया जाता, जिसके $िखला$फ चोरी, मारपीट और ठगी के मामले दर्ज हंै। अब या तो भाजपा दा$ग निरपेक्ष हो गई है, या फिर प्रभात झा ने शिवराज सिंह के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। प्रभात झा ने शुरूआत बहुत धमाके से की थी, आदर्शों के कुछ मानक बनाए थे और यह भी ऐलान किया था, कि वे पैंसठ साल की उम्र के बाद सक्रिय राजनीति में नहीं रहेंगे। इस हिसाब से दस बारह साल प्रभात झा के पास बचते हैं।
लेकिन भाजपा के महारथी तो प्रभात झा को यह दस बारह साल देने को भी तैयार नहीं हैं। $खास तौर पर दा$गी विधायकों को मुख्यमंत्री निवास से कह दिया गया है, कि जाओ और संगठन से अपने चाल चलन का प्रमाण पत्र ले कर आओ। अब प्रभात झा भाजपा के हवलदार बन गए हैं, जो हर विधायक के कर्मकांड की जांच कर के उसे चरित्र प्रमाण पत्र देने पर बाध्य होंगे और इस चक्कर में अपने दुश्मनोंं की सूची और बढ़ा बैठेंगे। इसके अलावा प्रभात झा ने अपने लिए कम मुसीबतें खड़ी नहीं की हैं। पता नहीं कि झोंक में उन्होंने अर्ध सैनिक और सुरक्षा बलों के जवानों को डकैत और तस्कर कह डाला। कम से कम आरोप तो यही है। कांग्रेस में भाजपा के सबसे अच्छे मित्रों में से एक और मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता की ओर से प्रभात झा के $िखला$फ बाकायदा राजद्रोह का मामला दर्ज हो गया है। इस मामले में आरोप बनते हैं या नहीं इसके लिए 16 अगस्त की तारीख तय की गई है। यह सबको पता था, कि मध्य प्रदेश पुलिस, मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष के $िखला$फ इतना गंभीर मामला दर्ज नहीं करेगी, इसलिए भोपाल जि़ला न्यायालय के ज़रिए अपील की गई। प्रभात झा ने बाद में अपना बयान बदल कर सुरक्षा बलों के प्रति सम्मान ज़ाहिर किया था, मगर भोपाल के हबीबगंज थाने में भी उनके $िखला$फ ए$फआईआर दर्ज हो चुकी है। कांग्रेस के प्रवक्ता जेपी धनोपिया ने पुलिस और अदालत से कहा है कि प्रभात झा ने राष्ट्रीय भावना को ठेस पहुंचाई है, और लोकतंत्र द्वारा स्थापित सरकार के प्रति अविश्वास पैदा करने की कोशिश की है। पता नहीं प्रभात झा को बिना मांगे यह प्रमाण पत्र देने की ज़रूरत कहां से पड़ गई? प्रभात झा मुख्मयंत्री शिवराज सिंह के सबसे विश्वासपात्र माने जाने वाले, नरेंद्र सिंह तोमर के उत्तराधिकारी यानी प्रदेश अध्यक्ष बने हैं, और यह भी किसी से छिपा नहीं है कि नरेंद्र सिंह तोमर और प्रभात झा के बीच भी कोई बहुत घनिष्ठ और विश्वास के रिश्ते नहीं रह गए हैं। इसका एक प्रमाण तो यही है कि जब भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी का गठन हो रहा था, तो नरेंद्र सिंह तोमर ने प्रभात झा को एक भी नाम सुझाने से इनकार कर दिया था, और प्रभात झा ने भी जो पदाधिकारी नियुक्त किए, वे आम तौर पर ऐसे माने जाते हैं, जो तोमर के प्रिय पात्रों में नहीं रहे। हार कर नरेंद्र सिंह तोमर भी कहने लगे हैं, कि उन्होंने पार्टी के नए अध्यक्ष को उनके काम में कोई बाधा नहीं पहुंचाने का $फैसला किया है। मगर बात घूम फिर कर वहीं आती है, कि मध्य प्रदेश में अगर कोई लोकतांत्रिक विधि से स्थापित सरकार हैं, तो उसके लिए योग्य पात्रों की क्या इतनी कमी पड़ गई है, कि शिवराज सिंह चौहान को अपने मंत्रिमंडल में दा$गी मंत्री रखना ज़रूरी है। ऐसे मुख्यमंत्री का क्या $फायदा जिसे मंत्रिमंडल की बैठक में उसके मंत्री पूछने लगें कि आ$िखर आपके न्याय का पैमाना क्या है? मध्य प्रदेश के निर्वाचित सांसदों से भी राज्य सरकार का रिश्ता ऐसा है, कि सांसद निधि के पैसे चंूकि जि़ला कलेक्टर को वितरित करने होते हैं, इसलिए $खास तौर पर भाजपा के सांसद अपने मतदाताओं और चुनाव क्षेत्र के नागरिकों से गालियां खाते रहते हंै। शिवराज सिंह की सरकार ने यूनियन कार्बाइड के $फैसले के वक्त सबसे पहले कमेटी बनाई थी, और न्याय की परंपरा का पालन कर के भोपाल के लोगों का हक दिलवा कर रहेंगे। इस मामले में आगे क्या हुआ, यह तो सि$र्फ सरकार को मालूम होगा।

राजनीतिक मौन में राजमाता
हृ पुष्यमित्र
ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर डेविड कैमरन अपने पहले भारतीय दौरे पर आये हुए थे। उनके कार्यक्रमों की सूची में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी से मुलाकात का कार्यक्रम भी दर्ज था। मगर अ$फसोस भारतीय सत्ता के इन दोनों संविधानेतर महाशक्तियों ने अंतिम समय में कैमरन से मिलने से शिष्टता पूर्वक इनकार कर दिया। सोनिया ने जहां अपनी नासाज़ तबीयत का बहाना बनाया, वहीं राहुल एक दिन पहले अचानक कैमरन के ही मुल्क ब्रिटेन की यात्रा पर निकल गये। आ$िखर ऐसा क्यों हुआ ? अभी हाल में महंगाई को लेकर भारतीय संसद में विपक्षी सांसद ज़ोरदार हंगामा कर रहे हैं और संसद में सोनिया के बयान की मांग की जा रही है. मगर सोनिया उपलब्ध नहीं हैं। इससे पहले सीबीआई के राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर कांग्रेस पर आरोप लगाये गये, पर इन आरोपों का जवाब देने के सोनिया मीडिया के सामने नहीं आईं, या उन्होंने कोई बयान भी जारी नहीं किया. इसके पहले भोपाल गैस त्रासदी प्रकरण को लेकर बड़ा बवाल मचा। उनके स्वर्गीय पति पर गंभीर आरोप लगाये गये। आपरेशन ग्रीन हंट को लेकर पार्टी के अंतर्विरोध बाहर आये, नक्सलवाद के $िखला$फ सेना के इस्तेमाल पर दिग्विजय और चिदंबरम आमने-सामने हो गये। कामनवेल्थ को लेकर मणिशंकर अय्यर ने सरकार के $िखला$फ मोर्चा खोल दिया है। पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि के वक्त कांग्रेस संदेश के संपादक अनिल शास्त्री ने सोनिया से हस्तक्षेप की गुहार लगाई। मगर राजमाता सोनिया गांधी अंत:पुर से बाहर नहीं निकलीं। न ही उनके सुपुत्र कांग्रेस के तथाकथित युवराज राहुल गांधी ने कोई टिप्पणी की। भोपाल गैस त्रासदी के फैसले से ठीक पहले स्पेनिश लेखक ज़ैवियर मोरो अपनी किताब द रेड साड़ी के विवाद को लेकर भारत पहुंचे थे। सोनिया गांधी के जीवन पर केंद्रित इस पुस्तक में कई विवादास्पद मुद्दे टिप्पणियां थीं। मगर इस पुस्तक के $िखला$फभी दस जनपथ से कोई बयान जारी नहीं किया गया। दस जनपथ दो हाल-हाल तक भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता था, अब इक्के दुक्के कांग्रेसी अपना झगड़ा सुलझाने वहां पहुंच रहे हैं। जो वहां जाते भी हैं उन्हें कोई सटीक जवाब नहीं मिलता। आ$िखर भारतीय राजनीति के महत्वपूर्ण अंग और कांग्रेसी राजनीति के माई-बाप माने-जाने ये दोनों पुरोधा पिछले छह माह से कहां गुम हैं? क्या यह भारतीय राजनीति के लिये एक गंभीर सस्पेंस नहीं है ? आ$िखर इनके चुप्पी की वजह क्या है? थोड़ी देर के लिये मान लेते हैं कि यही सच होगा, मगर क्या इन हालातों में कांग्रेसी भी उन्हें इस तरह उपेक्षित छोड़ देंगे जैसा कि इन दिनों नज़र आ रहा है। यह ठीक है कि सोनिया-राहुल ने यूपीए-2 को कामकाज में दिलचस्पी कम कर दी है, मगर यूपीए-2 के पुरोधा जिन्हें मालूम है कि उन्होंने यह कुर्सी इन्हीं दो लोगों के बदौलत पाई है, क्यों इनकी खोज $खबर नहीं ले रहे? क्या मौजूदा सरकार के काम-काज से ज़ाहिर नहीं कि वे भी यह साबित करने की कोशिश में जुट गये हैं, कि कांग्रेस को इन दोनों दिग्गजों के बैशाखी की ज़रूरत नहीं। सारे $फैसले $खुद लिये जा रहे हैं। चाहे आपरेशन ग्रीन हंट हो, पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि का मसला हो, पाकिस्तान के बातचीत के बिंदू हों, या फिर मोदी से निपटने की स्ट्रैटजी। न तो किसी मसले पर उनसे सलाह ली जा रही है, और न ही उनके स्टैंड का ख्य़ाल रखा जा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि सोनिया ने $खुद को संविधानेतर शक्ति के संबोधन से मुक्त कराने और मनमोहन सिंह को असली किंग साबित करने के लिये एक और त्याग किया है। माना जा सकता है कि राजनीति में उनके आने का उद्देश्य कांग्रेस को भारतीय राजनीति के केंद्र में फिर से स्थापित करना भर था। अब चंूकि यह लक्ष्य हासिल किया जा चुका है, इसलिये वे चुपचाप बड़ी शालीनता से $खुद को कांग्रेस की सबसे शक्तिशाली कुर्सी से अलग कर रही हैं। क्या यह सच हो सकता है ? जैसे, यह जगज़ाहिर है कि माओवाद से निबटने और पेट्रोलियम पदार्थों का कीमतों को बाजार पर छोड़ देने के $फैसलों के मामले में दोनों उन $फैसलों के $िखला$फ होते जो सरकार ने लिये, मगर इसके बावजूद सरकार ने ऐसे $फैसले बेहिचक लिये। दिग्विजय, अनिल शास्त्री और मणिशंकर अय्यर जैसे नेता संभवत: यही सोचकर अपनी ही सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े कर रहे हैं, कि उन्हें सोनिया और राहुल का समर्थन मिलेगा। मगर सरकार बड़ी बेरहमी से इन्हें $खामोश करने के तरीके तलाश रही है। इसका अर्थ कहीं यह तो नहीं कि कांग्रेस दो धड़ों में बंट गयी है। मौजूदा सरकार में जि़म्मेदार पदों पर काबिज़ कांग्रेसी हर हाल में सोनिया-राहुल जैसे वट वृक्षों की छाया से निकल कर अपना अस्तित्व साबित करने में जुट गयी है। हालांकि अगर वाकई ऐसा हो रहा है और कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार की छत्र-छाया से निकल कर आत्म निर्भर होने की कोशिश में है, तो इसे सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिये, मगर यहां परिस्थितियां थोड़ी अलग है। कांग्रेसी सोनिया-राहुल की छत्र-छाया से इसलिये बाहर नहीं निकल रहे, कि वे आत्मनिर्भर होना चाहते हैं, बल्कि इसलिये यह कदम उठा रहे हैं, क्योंकि उन्हें कई जनविरोधी $फैसले लेने हैं, जो वे सोनिया-राहुल के प्रभाव में रहते हुए नहीं ले सकते। चिदंबरम को खनिज संपन्न पूर्वी भारत को माओवादियों के कब्जे से मुक्त कराकर टाटा और जिंदल को सौंपना है. इस काम के लिये ज़रूरत हुई तो वे इन इलाकों में बमबारी तक करवाने में नहीं हिचकेंगे, और उन्हें मालूम है कि सोनिया या राहुल से उन्हें इस मसले पर समर्थन मिलने वाला नहीं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को बाज़ार की ताकतों को खुश करने के लिये कई ऐसे $फैसले लेने हैं जो जनता में त्राहिमाम मचा सकते हैं. मनमोहन-मोंटक की अर्थशास्त्री जोड़ी का लक्ष्य वर्ल्ड बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश जैसी संस्थाओं की नीतियों को भारत में लागू करना है। दोनों इन्हीं बैंकों के पूर्व कर्मी रह चुके हैं। वैसे यूपीए-2 पर वर्ल्ड बैंक, एशियन डेवलपमेंट बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश के पूर्व कर्मियों का ही कब्ज़ा है। सरकार ने जनोन्मुखी वाम दलों से पहले ही पीछा छुड़ा लिया है। अब वे अपनी पार्टी की जनोन्मुखी ताकतों को साइड करने में जुटे हैं, ताकि बाज़ारोन्मुखी $फैसले लेने में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो। कहा यह भी जा रहा है कि सरकार को ऐसा शेप अमेरिकी प्रभाव में दिया जा रहा ताकि भारत सरकार पूरी तरह अमेरिकी पि_ू की तरह काम करे।
लेकिन सबकुछ इतना आसान नहीं...
मगर जो कुछ भी करने की कोशिश की जा रही है वह इतना आसान नहीं। सोनिया गांधी न तो महात्मा गांधी है, जिन्होंने आज़ादी के बाद नेहरू-पटेल द्वारा साइड-लाइन किये जाने की बात चुप-चाप सह ली, और साबित कर दिया कि उन्होंने सत्ता भोगने के लिये आज़ादी की लड़ाई नहीं लड़ी थी। सोनिया गांधी भारतीय राजनीति का वह किरदार है, जिसने लगभग डूब चुकी कांग्रेस को ऐसी राजनीतिक शक्ति में तब्दील कर दिया जो आज अजेय लगने लगी है। अगर वह इस पार्टी के लिये ऐसा करिश्मा कर सकती है, तो अपने पुत्र के राजनीतिक कैरियर के लिये जनता का रुख़ फिर से मोड़ सकती है। इसकी शुरुआत इसी महीने हो सकती है, जब उन्हें इस बार लगातार तीसरे टर्म के लिये सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने जाने की कोशिश हो। संसद के मानसून सत्र के बाद यह कार्रवाई होगी। बहुत संभव है कि सोनिया इस मौके पर $खुद ही अध्यक्ष पद स्वीकार न करे और किसी और का नाम आगे बढ़ाने की मांग कर दे। त्याग की राजनीति की माहिर खिलाड़ी सोनिया के इस कदम से पार्टी में जो उथल-पुथल मचेगी उससे मनमोहन-चिदंबरम कंपनी किस तरह निबटती है, यह देखने वाला अनुभव होगा।

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