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Friday, August 20, 2010




भाजपा ने किया नरेन्द्र मोदी के बदले संसदीय सौदा

कृष्णमोहन सिंह
नई दिल्ली। क्या भारतीय जनता पार्टी ने परमाणु जि़म्मेदारी विधेयक के सवाल पर वास्तव में केंद्र सरकार से कोई समझौता किया है? जिस तरह रातों रात भाजपा ने रुख़ बदला है, उससे शक होने लगा है। शक की पहली वजह यह है, कि एक तरफ़ भाजपा का रवैया बदला, तो दूसरी ओर सीबीआई अचानक नरेंद्र मोदी के प्रति मेहरबान नजऱ आने लगी है। और अब तो सीबीआई ने साफ़ कह दिया है, कि उसके पास सोहराबुद्दीन फज़ऱ्ी मुठभेड़ के मामले में कम से कम नरेंद्र मोदी के खि़लाफ़ कोई सबूत नहीं है। यूपीए अध्यक्ष सोनिया की मनमोहनी सरकार अमेरिका व उसकी लाबी वाले देशों को लाभ पहुंचाने वाली परमाणु दायित्व बिल को संसद के इसी मानसून सत्र में पास कराने के लिए हर तरह का उपक्रम कर रही है। क्योंकि उसको अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा को भारत में आगवानी का तोहफ़ा देना है। यह तभी संभव है जब ओबामा के आने के पहले ही, बिल पास हो जाय। ओबामा के स्वागत में मनमोहन सरकार ने संसद का शीतकालीन सत्र समय से पहले ही बुलाने का लगभग निर्णय तो कर लिया है।
सो उसके पहले इस मानसून सत्र में ही परमाणु दायित्व बिल पास कराने की जी जान से कोशिश हो रही है। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेसी मैनेजरो़ ने इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद हर तरह से प्रयास शुरू कर दिया है। सूत्रों का कहना है कि इससे संबंधित मंत्रालय के स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट पर सरकार बहुत ग़ौर नहीं करेगी। वैसे भी जो कमेटी के चेयरमैन हैं, वह कांग्रेसी हैं और कहा जा रहा है, कि इस मामले में वह कांग्रेस की ही लाइन लेने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार भाजपा की आडवाणी मंडली से कांग्रेसी संकटमोचक व मैनेजरों ने बात की है। अभी आगे भी बात होनी है। कहा जाता है कि सौदेबाज़ी चल रही है। सूत्रों का कहना है कि भाजपा में परमाणु समझौते का सबसे बड़े विरोधी अरूण शौरी थे, उनको लालकृष्ण आडवाणी ने कपट से किनारे लगा दिया, फिर से राज्यसभा सांसद नहीं बनवाने दिया। क्योंकि अरूण शौरी ही थे जिन्होंने पार्टी की बैठक में परमाणु समझौते की तरफ़दारी कर रहे लालकृष्ण आडवाणी के सारे तर्कों को ध्वस्त करते हुए खुलकर विरोध किया था, और एक तरह से इस मामले में भी आडवाणी के दोहरे चरित्र को एक्सपोज़ कर दिया। परमाणु बिल तो जैसे-तैसे यूपीए-1 की मनमोहनी सरकार ने पास करा लिया। अब यूपीए-2 में परमाणु दायित्व बिल पास कराने के लिए सौदेबाज़ी शुरू हो गई है। भाजपा के कुछ नेताओं की 5 शर्तें हैं - (1) मनमोहन सरकार परमाणु दायित्व बिल में ही जोड़े कि परमाणु रियेक्टर लगाने का काम केवल सरकार व उसकी सम्पूर्ण प्रभूत्ववाली कम्पनियां करेंगी, किसी प्राइवेट कम्पनी को इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं दिया जायेगा। (2) दुर्घटना होने पर लोकलबाडी से हर्जा खर्चा का ब्यौरा लेकर उसके आधार पर हर्जाना देने, और वह भी 500 करोड़ रू. से कम में ही निपटा देने का जो बैरियर है उसे ख़त्म किया जाय।
(3) हर्जाने आदि की अतिअधिकतम सीमा 2000 करोड़ रू. वाला बैरियर ख़त्म किया जाय। (4) जोभी अमेरिकी या विदेशी कम्पनी परमामाणु रियेक्टर मशीन सप्लाई करे, परमाणु दुर्घटना होने पर उसको भी जि़म्मेदार बनाया जाय। (5)अमेरिका में जिस तरह नियम हंै कि कोई भी परमाणु रियेक्टर आधरित प्लांट स्थापित करने के पहले एक लाख करोड़ रू से अधिक का गारंटी बांड भरवाया जाता है, वही नियम भारत में भी लागू किया जाय, ताकि दुर्घटना होने पर कम्पनी के उस रकम से दुर्घटना के प्रभावितों को मुआवज़ा आदि दिया जा सके, पर्यावरण में हुए प्रदूषण को दूर करने का उपक्रम हो सके।
सूत्रों के मुताबिक अमेरिका व उसकी लाबी वाले देशों को $खुश करने के लिए किसी भी हद तक चले जाने वाले मनमोहन सिंह अमेरिकी दबाव में यह सब नहीं करेंगे। यानी भाजपा की ये शर्तें मनमोहन सरकार नहीं मानेगी। इसमें से एक- दो इधर उधर करके बिल पास करवा लेने की योजना है। सूत्रों का कहना है कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को सोहराबुद्दीन, कौसरबी व अन्य मामलों में सीबीआई से बचाने के लिए भाजपा के जो नेता रात दिन एक किये हुए हैं, उनके पुरोधा से कांग्रेसी संकटमोचकों की बात हो गई है। कहा जाता है कि इशारे-इशारे में सौदेबाज़ी की बात चल रही है-कांग्रेस मोदी को सीबीआई से बचाये तब बदले में भाजपा परमाणु दायित्व बिल पास करायेगी।


...और अब कामनवेल्थ कोठे

आलोक तोमर

नई दिल्ली।
ये कामनवेल्थ का एक ऐसा पाप है, जिसके लिए आप सुरेश कलमाडी गिरोह को कसूरवार नहीं ठहरा सकते कॉमनवेल। गेम्स की आड़ में मानव तस्कर जमकर चांदी काट रहे हैं। कॉमनवेल्थ गेम में काम दिलाने के नाम पर दूरदराज़ के गांवों से लड़कियों को लाकर उन्हें बेचने का धंधा तेज़ी से बढ़ा है। कॉमनवेल्थ गेम्स में नौकरी पाने की लालच में लड़कियां तस्करों की जाल में फंसकर दिल्ली के कोठे पर पहुंच रही हैं। तस्कर गैंग की शिकार हुई लड़की पूजा (बदला हुआ नाम) की आप बीती दिल दहला कर रख देने वाली है। पश्चिम बंगाल की रहने वाली पूजा लड़कियों की तस्करी करने वाले गैंग की शिकार हो गई। वही गैंग जो दिल्ली में होने वाले महाखेलों में काम दिलाने का झांसा देकर भोली-भाली गऱीब लड़कियों को अंधेरी गलियों में धकेल रहा है। दरअसल पूजा की एक सहेली मानव तस्कर गिरोह की सदस्य है। उसने पूजा को महाखेल में काम दिलाने के साथ-साथ दिल्ली घुमाने का लालच दिया। अपनी सहेली की बातों में आकर पूजा ट्रेन में बैठ गई। उसके मुताबिक ट्रेन में उसे कुछ खाने के लिए दिया गया। खाने के बाद उसे गहरी नींद आ गई। जब आंख खुली तो वह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर थी। दिल्ली में उसे एक आंटी के पास रख दिया गया। आंटी यानी जीबी रोड के एक कोठे की मालकिन। पूजा को बेच दिया गया था। पूजा की किस्मत अच्छी थी। एक कस्टमर ने उसकी दास्तान सुनी और उससे उसके घर का फ़ोन नंबर लेकर उसके घर ख़बर कर दी। घर वाले दिल्ली पहुंचे और एक ग़ैर-सरकारी संगठन की मदद से उसे छुड़ा लिया गया।
पूजा को कोठे की कैद से बेशक छुड़ा लिया गया। मगर पूजा की तरह ना जाने कितनी लड़कियों को दिल्ली में कॉमनवेल्थ में काम दिलाने या फिर खेल में लगने वाले मेला घुमाने के नाम पर दिल्ली लाया गया है, औऱ इनमें से कई अभी भी कैद हैं।
मालूम हो कि दिल्ली के तीन रेलवे स्टेशनों से पिछले दो महीनों में पुलिस ने पूजा जैसी सौ से ज्य़ादा लड़कियों को दलालों के चंगुल से छुड़ाया है। इनमें ज्य़ादतर गऱीब नाबालिग़ लड़कियां हैं, जिन्हें कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान काम दिलाने का झांसा देकर दलालों ने अपने जाल में फंसाया। दिल्ली पुलिस के ही आंकड़े बताते हैं, कि पिछले सात महीनों में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से 35, पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से 23 और निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर करीब 1 दर्जन लड़कियां मुक्त कराई जा चुकी हैं।
दिल्ली पुलिस के मुताबिक तस्करी के शिकार बच्चों को बचाने के लिए दिल्ली के हरेक थाने में जुवेनायल अफ़सर हैं। छुड़ाए गए बच्चों के पुर्नवास के लिए भी पुलिस कोशिश करती है। मगर इस बात को दिल्ली पुलिस भी मानती है कि इन बच्चों को दिल्ली काम के बहाने ही लाया गया। लेकिन राजधानी आने पर ज्य़ादातर लड़कियों से वो काम कराया जाता है, जो शायद कभी उसने सपने में भी न सोचा था।
हाल ही में दिल्ली पुलिस ने दो लोगों को गिरफ़्तार कर 14 लड़कियों को मुक्त कराया था। जांच में ये पता लगा था, कि इन लड़कियों को काम दिलाने के नाम पर ही दिल्ली लाया जा रहा था। गिरफ़्तार आरोपी दिल्ली में प्लेसमेंट एजेंसी चलाता था। ऐसी लड़कियों की लिस्ट लंबी चौड़ी है।
दरअसल दिल्ली में कामनवेल्थ गेम की दस्तक ने मानव तस्करी का नया बहाना दे दिया। कई संगठित गिरोहों ने इस गेम की तैयारी कई महीनें पहले शुरू कर दी। झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, असम और छतीसगढ़ की गऱीब लड़कियां इनके निशाने पर रहीं और गिरोह के एजेंट सक्रिय हो गए। इन एजेंटों ने गेम में कई तरह के काम दिलाने की बात इन जगहों पर फैलाई और फिर गऱीब मां-बाप की ममता को बेचने की गहरी साजि़श पर अमल करना शुरू कर दिया। तस्करी के इस तरीके के ज़रिए वो जम कर चांदी काटने लगे।
नाबालिग़ लड़कियों की तस्करी कोई नई बात नहीं, मगर कॉमनवेल्थ गेम के नाम पर इस समय की जा रही तस्करी ने पुलिस और ग़ैर सरकारी संगठनों की नींद उड़ा दी है, क्योंकि इनका मानना है कि तस्करों के चंगुल से छुड़ाई गई लड़कियों की संख्या से दस गुणा ज्य़ादा संख्या उन लड़कियों की है, जिन्हें काम दिलाने के नाम पर दिल्ली लाया गया, और अब वो लापता हैं।

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