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Friday, July 9, 2010





सत्ता का द्वार खोलने के लिए करते हैं बंद
महाबंद के आव्हान से आमजन परेशान
हृ चन्द्रशेखर सिंह
महंगाई के $िखला$फ महाबंद रचकर समूचे विपक्ष ने जो एकजुटता दिखाई है, वो कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकती थी, यदि इस महाआयोजन में आम जनता ने भी भागीदारी की होती। पर महंगाई जैसे आमजन से जुड़े मुद्दे पर विपक्ष ने महज़ राजनीति की है, और अपने-अपने क्षेत्र में अपनी ताकत दिखा कर लोगों को बंद करने के लिए मजबूर किया है।
बंद कितना सफल रहा? सवाल ये नहीं है। सवाल ये है कि बंद से क्या महंगाई कम हो पाएगी। हमारी सर्व स मानित सुप्रीम कोर्ट तक ने बंद को $गैर ज़रूरी कहा हुआ है। एक तरह से इस तरह के आमजन की जि़ंदगी को प्रभावित, परेशान करने वाले कृत्यों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई हुई है। फिर क्यों यह महाबंद आयोजित किया गया? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अंग्रेज़ों को भारत से भगाने के लिए कभी बंद का सहारा क्यों नहीं लिया। विपक्ष को इस बंद का मनन करना चाहिए। दरअसल बंद एक सामूहिक जि़ ोदारी है और इससे का$फी सारे लोगों को परेशानी झेलनी पड़ सकती है। बंद यदि सांकेतिक हो, बिना किसी दबाव में किया जाएं तो ठीक है, परंतु आज इस तरह के बंद चाहता कौन है सिवाय इन राजनेताओं के, जिनके पेट इतने भरे हुए हैं, कि यदि ये चार दिन भी भूखे पेट रहें, तो भी इन पर $फर्क नहीं पड़ेगा?
लेकिन भूखे पेट रहना पड़ता है आम आदमी को। दरअसल का$फी सारे आमजन रोज़ मज़दूरी करते हैं तब कहीं जाकर उन्हें शाम का निवाला नसीब होता है। पर बंद उन्हें उनसे उस दिन का रोज़गार छीन लेता है। भूखे पेट करवटें बदलकर रात गुज़ारनी पड़ती है, इन लोगों को।
विपक्ष ने कभी सोचा है कि इस तरह के जबरन किए बंद से कितने लोगों को किचन बंद रखना पड़ा?
बंद आम जनता पसंद नहीं करती है। रोज़ किराने की दुकान, पान की गुमटी से लेकर चौराहे पर छतरी के नीचे जूते गांठ रहे मोची तक को सुबह से शाम तक ग्राहक का इंतज़ार कर कुछ पैसों की कमाई का आसरा होता है। ऐसे में कौन अपनी दुकान बंद रखना चाहेगा। पर गुंडई, राजनीतिज्ञों के डंडे के भय से सबको अपना शटर गिराना पड़ता है। रिक्शे वाला सवारियां लेकर जा रहा है, तो उसमें से सवारियां उतार ली जाती हैं। रिक्शेवाले को दो-चार थप्पड़ जड़ दिये, तो बड़ी बात नहीं। रेलवे स्टेशनों, बस स्टैण्डों पर परेशान होते यात्रियों की तस्वीरें बंद के अगले दिन अ$खबारों छपती हैं, तो उनमें उन स$फर करने वालों के चेहरे पर दर्द स्पष्ट देखा जा सकता है। किसी का कोई प्रिय दूर मर गया है, या किसी प्रियजन के यहां कोई शादी है, पर बेचारा नहीं जा सकता, क्योंकि यदि बस चली तो बंद असफल नहीं हो जाएगा? फिर हमारे विपक्षी भला बंद को क्यों असफल होने देंगे? बस यदि चलेगी तो फंूक दी जाएगी।
विपक्ष ने 6 जुलाई को अपनी ता$कत दि ााई। अकेले मु बई में 155 बसों में तोडफ़ोड़ कर दी। कई उड़ानें प्रभावित हुईं। करोड़ों रूपये की चपत लगा दी, एक ही दिन में। इस सारे नुकसान की भरपाई कौन करेगा। क्या हमेशा की तरह फिर सारा बोझ आम आदमी पर नहीं आएगा?
इस सारी कवायद के बाद विपक्ष इस मु$गालते में आ गया है, कि वो संसद में केन्द्र सरकार को पटकनी देने में कामयाब हो जाएगा। किंतु सड़क पर दिखी गुंडई एकजुटता, सदन में कितना दम दिखा पाएगी, ये आने वाला वक्त ही बताएगा।

2 comments:

  1. sir yah lokatantr hai , janta to janta hi hai aise is desh me janardan bhi hai chalta hai chalata rahega ki kyoki daktr maikale ki santan sikshit hokar jawan ho chuki hai aur unhe desh se kya matalab ?, priwar se kya matalab? , samaj se kya matalb ?bs unhe to lutane, khane ,pine, mauj- masti ke liye not chahiye not kaise aayega unhe pata hai janta to hamare desh ki kamdhenu gaay hai minya bhaai bhi lute aur bhi sikandar jaise hamlawar bhi aakar lute , angrej bhi lute aur ab loktantr lut raha hai .
    arganikbhagyoday.blogspot.com

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