
बुंदेलखंड: विकास कम, राजनीति ज़्यादा
आज कल बुंदेलखंड सुर्खियों में है। सुर्खियों में इसलिए है क्योंकि बुंदेलखंड के विकास की बातें कम, इस पर राजनीति ज़्यादा हो रही है। कैसी राजनीति हो रही है, इस पर प्रकाश डालने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि आ$िखर बुंदेलखंड है क्या चीज़ और इसका भौगोलिक और आर्थिक महत्व क्या है। बुंदेलखंड को भारत का दिल कहा जाता है। दरअसल बुंदेलखंड कुछ हिस्सा उत्तर प्रदेश और इसका एक बड़ा हिस्सा मध्यप्रदेश में। पन्ना में हीरे की खानें, खजुराहों के मंदिर, महोबा का पान, चित्रकूट के घने जंगल, ओरछा के महल और केन, बेतवा और चंबल जैसी नदियां इस इलाके की धरोहर हैं। वेद व्यास, तुलसीदास, आल्हा-ऊदल, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर मैथिलीशरण गुप्त और हॉकी के जादूगर या भगवान, मेजर ध्यानचंद तक कितनी ही श$िख्सयतों की जन्मस्थली यही क्षेत्र है। सभी मायनों में अनूठा ये इलाका आर्थिक मामलों में बेहद ही पिछड़ा हुआ है।
मौजूदा समय में करीब 5 करोड़ की जनसंख्या वाले इस इलाके को अलग राज्य बनाने की मांग लगभग 5 दशकों से चली आ रही है। इस अलग राज्य में यूपी के झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, महोबा, बांदा, चित्रकूट और मध्यप्रदेश के दतिया, टीकमगढ़, छत्तरपुर, पन्ना, दमोह और सागर जिलों को शामिल करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा कई बार मध्यप्रदेश के मुरैना, शिवपूरी, भिंड, ग्वालियर, शिवपुर, गुना और अशोकनगर को भी शामिल करने की मांग उठती रही है।
बात हो रही थी बुंदेलखंड सुर्खियों में रहने की। दरअसल कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के एजेंडे में बुंदेलखंड के विकास का एजेंडा का$फी समय से रहा है। इसी के मद्देनज़र उन्होंने पिछले साल का दौरा करने के बाद इस क्षेत्र के लिए विशेष आर्थिक पैकेज की मांग की थी। इस क्षेत्र के विकास के लिए ही पिछले महीने राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री से मिलकर बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण बनाने की मांग की। फिर क्या था यूपी और मध्यप्रदेश के सत्तारूढ़ दलों को राहुल का प्रस्ताव नागवार गुज़रा। उत्तरप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार है। ज़ाहिर सी बात है कि यहां राजनीति के न$फा-नुकसान की बात तो आनी ही थी, इसलिए इनके प्रतिनिधियों ने लोक सभा में हंगामा मचाया और कहा कि केन्द्र सरकार संघीय ढांचे से छेड़छाड़ कर रही है। यहां राहुल ने बुंदेलखंड के विकास की बात तो सोची, लेकिन इनके पीछे भी दूरगामी राजनीतिक रणनीति है। रणनीति इसलिए भी की कांग्रेस का जनाधार इन दोनों राज्यों में बहुत ही कम है। हालांकि गत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को थोड़ी उम्मीद दोनों राज्यों से बढ़ी है। इसलिए कांगेस एक दूरगामी रणनीति पर आगे बढ़ रही है।
$गौरतलब है कि यूपी की मुख्यमंत्री मायावती ने बुंदेलखंड के सर्वांगीण विकास के लिए केन्द्र सरकार से 9 हज़ार करोड़ रूपए की मांग की थी, लेकिन केन्द्र सरकार ने नहीं दिया। जहां तक मध्यप्रदेश की सरकार का प्रश्न है तो दो साल पहले ही बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण बना चुकी है, लेकिन केन्द्र सरकार इसको आर्थिक मदद देने के बजाय, नया प्राधिकरण बनाने की बात कर रही है, जो दोनों राज्यों के सत्तारूढ़ दलों को नागवार गुज़र रही है। हो भी क्यों नहीं आखिर वोट बैंक का सवाल है भाई। जब बुंदेलखंड का विकास हो ही जाएगा तो फिर ये मुद्दा ही मर जाएगा। इसलिए सभी लोग, चाहे किसी भी पार्टी का क्यों न हो वे नहीं चाहते हैं कि बुंदेलखंड का विकास हो। बुंदेलखंड पर कुछ हो तो राजनीति और सिर्फ राजनीति। विकास की बातें कम राजनीति ज़्यादा। जब तक राजनीतिज्ञों में इच्छाशक्ति नहीं होगी, तब तक इस खंड मतलब बुंदेलखंड का विकास संभव नहीं है।
हमारा कोहिनूर हमें वापस मिल पाएगा? सुप्रिया रॉय
भारत सरकार दुनिया के सबसे कीमती हीरे कोहिनूर को भारत वापस लाने की मुहिम में जुट गई है। भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने भी अब एक अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क बना कर ब्रिटिश राज के दौरान ले जाए गए कोहिनूर को वापस लाने के लिए पूरी दुनिया में अभियान छेडऩे का $फैसला किया है। इनमें उत्तर प्रदेश के सुल्तानगंज से लंदन ले जाकर संग्रहालय में रखी गौतम बुद्ध की मूर्ति भी है।
मगर असली $फोकस कोहिनूर पर है। यह हीरा जिसकी कीमत आज तक नहीं लगाई जा सकी, ब्रिटिश महारानी के मुकुट में जड़ा हुआ है। उधर बर्मिंघम में जहां बुद्ध की मूर्ति रखी हुई है, संग्रहालय की प्रमुख रीटा मैक्लीन ने कहा है कि अभी तक उन्हें इस बारे में कोई अनुरोध प्राप्त नहीं हुआ है और जब अनुरोध आएगा तब इस पर विचार किया जाएगा। इतिहासकारों के अनुसार कोहिनूर चार हज़ार साल पुराना हीरा है और सन 1300 में लिखे गए बाबरनामे में भी इसका वर्णन मिलता हैं।
बाबर को यह हीरा गुजरात या कर्नाटक में कहीं मिला था मगर कहानी यह भी है कि मई 1526 में बाबर ने आगरा में वहां के तत्कालीन शासक विक्रमादित्य से यह हीरा प्राप्त किया था। दो सौ साल तक इस हीरे का नाम बाबर का हीरा ही रहा। कोहिनूर का साठ साल का इतिहास का$फी $खूनी रहा है। इसके पहले भारतीय मालिक महाराजा दलीप सिंह थे जो महाराजा रंजीत सिंह के बेटे थे।
दलीप सिंह ब्रिटिश हुकुमत से पंजाब की लड़ाई हार गए थे और जब पंजाब का 29 मार्च 1849 को विलय किया गया, तो संधि मेंं यह भी लिखा गया कि कोहिनूर हीरा जिसे महाराजा रंजीत सिंह ने शाह शुजा उल मुल्क को हरा कर प्राप्त किया था। वह ब्रिटेन की महारानी को भेट किया जाता हैं। अंग्रेज़ अधिकारी सर जॉन लॉगिन कोहिनूर और तब काफी युवा रहे दलीप सिंह को इंग्लैंड ले कर चले गए। पंजाब के गर्वनर सर हेनरी लारेंस के भाई जॉन लारेंस भी उनके साथ गए थे।
कोहिनूर हीरा मुंबई से पानी के जहाज़ में गया और इसे एक मज़बूत लोहे के बक्से में रखा गया था। इस बक्से में क्या है इसकी जानकारी जहाज़ के कैप्टन तक को नहीं थी। यह जहाज़ जब मॉरीशस के पास पहुंचा तो जहाज़ पर हैज़ा फैल गया और मॉरीशस सरकार ने कहा कि जहाज़ वापस नहीं ले जाया गया तो उसे तोप से उड़ा दिया जाएगा। जहाज जब इंग्लैंड के प्लेमाउथ बंदरगाह के रास्ते में था तो बारह घंटे लंबे एक भयानक तू$फान से उसका सामना हुआ। प्लेमाउथ में सब उतर गए और सारा सामान भी उतार लिया गया, लेकिन कोहिनूर को पोट्र्समाउथ बंदरगाह ले जाया गया। ब्रिटेन में इस हीरे को तराशने में भी उस दौर आठ हज़ार पाउंड का खर्चा आया। 1853 में यह रानी के मुकुट में लगाया गया। 1947 में भी भारत सरकार ने कोहिनूर वापस करने की मांग की थी। मगर उस समय की उड़ीसा सरकार ने कहा था कि कोहिनूर असल में भगवान जगन्नाथ की संपत्ति है और महाराजा रंजीत सिंह की संपत्तियोंं की देख रेख करने वाले मेैनेजर ने कहा था कि यह राजपरिवार की संपत्ति हैं। पाकिस्तान और इरान ने भी इस पर दावा जताया था। कोहिनूर 213 साल मु$गल महाराजाओं के पास रहा।
66 साल अ$फगान सम्राटों के पास रहा और डेढ़ सौ साल से ब्रिटिश मुकुट का हिस्सा हैं। कोहिनूर की कहानी बहुत लंबी है। दुनिया के इस विश्वकीमती हीरे पर उड़ीसा या पंजाब के राजपरिवार का नहीं, भारत सरकार का हक है। यह पता नहीं कि ब्रिटेन पर कितना दबाव डालना पड़ेगा, कि यह हीरा हमें वापस मिल जाए।

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