
भोपाल को चाहिए अर्जुन सिंह से जवाब
हजारों लोगो के इस कातिल को हवालात में नहीं रखा गया बल्कि गेस्ट हाउस में वातानुकूलित और शानदार माहौल में वह आराम करता रहा। सिर्फ 25 हजार रुपए की जमानत पर उसे छोड़ दिया गया जबकि उस समय तक उस पर धारा 304 ही लगी थी जिसमें उम्र कैद तक का प्रावधान हैं। ऐसे मामलों में आसानी से ज़मानत नहीं मिलती। सवाल यही हेै कि अर्जुन सिंह के पास दिल्ली से जो $फोन आया था वह किसका था?
सुप्रिया रॉय
वीरप्पा मोइली चाहे जितने वीरोचित बयान देते रहे मगर सच यही है कि वारेन एंडरसन को भारत नहीं लाया जाएगा। एंडरसन अगर भारत आ गया तो सबसे पहले तो यही पोल खुलेगी कि भोपाल में ज़मानत मिलने के बाद उसे अमेरिका जाने कैसे दिया गया? अमेरिका सरकार तो पहले ही इनकार कर चुकी है और कह चुकी है, कि एंडरसन एक सम्मानित अमेरिकी नागरिक हैं और उन्हें प्रत्यर्पित नहीं किया जा सकता।
कहानी में एक नया मोड़ आया है और यह मोड़ एक सवाल है। इस सवाल का जवाब सि$र्फ कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह दे सकते हैं, जो गैस हादसे के समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। खुलासा किया गया है कि अर्जुन सिंह एक सभा को संबोधित कर रहे थे और तभी मंच के पास मुख्यमंत्री के लिए लगाए गए $फोन पर दिल्ली से एक $फोन आया और इसके तीन घंटे के भीतर एंडरसन को रिहा करने के आदेश भी दे दिए गए, और उसे दिल्ली पहुंचाने के लिए एक विशेष विमान का इंतज़ाम भी कर दिया गया।
भोपाल में भी 7 से 11 दिसंबर 1984 तक एंडरसन सि$र्फ तकनीकी रूप से गिरफ़्तार था। हज़ारों लोगों के इस $कातिल को हवालात में नहीं रखा गया, बल्कि गेस्ट हाउस में वातानुकूलित और शानदार माहौल में वह आराम करता रहा। सि$र्फ 25 हज़ार रुपए की ज़मानत पर उसे छोड़ दिया गया, जबकि उस समय तक उस पर धारा 304 ही लगी थी, जिसमें उम्र कैद तक का प्रावधान हैं। ऐसे मामलों में आसानी से ज़मानत नहीं मिलती। सवाल यही है कि अर्जुन सिंह के पास दिल्ली से जो $फोन आया था वह किसका था? शायद अर्जुन सिंह अपनी जो आत्मकथा लिख रहे हैं, उसमें इस सवाल का जवाब भी मिल जाए।
भोपाल में हुई 25 हज़ार मौतों और लाखों लोगों की जि़ंदगी को नरक बनाने का असली गुनहगार वारेन एंडरसन गैस त्रासदी के केस में सरकार की मेहरबानी से बचा था। इस केस की जांच करने वाले सीबीआई अ$फसर ने $खुद ये खुलासा किया है कि सरकार नहीं चाहती थी कि सीबीआई एंडरसन पर शिकंजा कसे। इसके लिए बाकायदा उन्हें चि_ी लिखकर निर्देशित किया गया था।
सीबीआई के तात्कालीन ज्वाइंट डायरेक्टर बी आर लाल के मुताबिक विदेश मंत्रालय की तर$फ से उन्हें चि_ी मिली थी, जिसमें कहा गया था कि वारेन एंडरसन को भारत लाने की कोशिशों पर ज़ोर न दिया जाए। लाल ने बताया कि विदेश मंत्रालय ने अपनी चि_ी में ये नहीं लिखा था कि वारेन एंडरसन पर मेहरबानी क्यों की जा रही है। लाल ने आरोप लगाया कि बड़ी मछलियों के $िखला$फ सीबीआई कार्रवाई नहीं कर पाती है। अप्रैल 1994 से जुलाई 1995 के बीच बीआर लाल भोपाल गैस कांड मामले के मुख्य जांच अधिकारी थे। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने ये दबाव मानने से इनकार किया तो कुछ दिन बाद ही उनका तबादला कर दिया गया और उसके बाद क्या हुआ उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं है। 25 साल बाद भोपाल गैस त्रासदी का $फैसला आया और 7 आरोपियों को दो-दो साल की सज़ा भी सुना दी गई लेकिन इस त्रासदी का असली गुनहगार वॉरेन एंडरसन अब भी कानून के हाथ से दूर ऐशोआराम की जि़ंदगी व्यतीत कर रहा है। भोपाल गैस केस फाइल में वॉरेन एंडरसन भगोड़ा है और 18 साल से $फरार है। उसके $िखला$फ गिरफ्तारी के वारंट निकले लेकिन उसे कानून के शिकंजे में नहीं जकड़ा जा सका। वो न्यूयॉर्क के लांग आईलैंड के एक लक्ज़री घर में चैन की सांस ले रहा है। जिस शख़्स की जानबूझकर की गई लापरवाही ने 25 हज़ार लोगों की जान ले ली। जिसके चलते लाखों लोग आज भी त्रासदी का दंश झेल रहे हैं उसके गोल्$फक्लब की सालाना $फीस गैस पीडि़तों को दिए गए औसत मुआवज़े का चार गुना है। वॉरेन एंडरसन को 1984 में ही मध्य प्रदेश पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया था लेकिन उसे तुरंत ज़मानत मिल गई और वो भारत से अपने प्राइवेट विमान से उडऩछू हो गया। उसके बाद से आज तक उसे गिरफ़्तार करने के लिए न ही सीबीआई और न ही भारत सरकार ने ज़रा सी भी ईमानदार कोशिश की। सीबीआई और इंटरपोल के मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में होने के बावजूद भारतीय और अमेरिकी एजेंसियां निष्क्रिय रहीं। अमेरिकी जांच एजेंसियों ने कहा कि उन्हें एंडरसन का पता नहीं मिल रहा और भारत सरकार ने एंडरसन के प्रत्यर्पण की कोई कोशिश इस डर से नहीं की कि इससे भारत में अमेरिकी निवेश और व्यापार पर असर पड़ेगा। यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन और सीईओ होने के नाते वॉरेन एंडरसन को 1982 में ही पता चल गया था कि भोपाल प्लांट में एक-दो नहीं 30 $खामियां हैं। ऐसी ही खामियां अमेरिका के यूनियन कार्बाइड प्लांट में भी थीं लेकिन एंडरसन ने भोपाल प्लांट को नज़रअंदाज़ करते हुए सि$र्फ अमेरिका में मौजूद प्लांट की $खामियों को ठीक किया। सा$फ था एंडरसन ने जानबूझकर ऐसा किया। ऐसे मुजरिम को भारत सरकार, भारत तक नहीं ला सकी। वो खुला घूम रहा है और शायद घूमता रहेगा।
विशेष टिप्पणी
अखबारी समाचारों की अनदेखी
केन्द्र सरकार ने व म.प्र. शासन द्वारा यह माना गया कि ज़हरीली गैस लीकेज में किसी व्यक्ति की $गलती का नतीजा नहीं था। इसी तरह भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए.एम. अहमदी ने भी यह मानते हुए कि इस भयंकर प्रलयकारी हादसे के जि़म्मेदार व्यक्तियों को यह बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि ऐसा हादसा हो सकता है और इतनी जानें जा सकती हैं। 13 सितंबर 1996 में इसीलिये उन्होंने पूर्व में लगाई गई धारा 304 को बदल कर प्रकरण में धारा 304 ए कर दी, जिसके तहत अभियुक्तों को अधिकतम 2 वर्ष की सज़ा दी गई। बड़े $खेद का विषय है कि न सरकारें और न ही माननीय अदालतें अ$खबारों व संचार माध्यमों में प्रकाशित की गई ऐसी $खबरों पर संजीदगी से विचार करती हैं, जिससे इस प्रकार के भावी $खतरों से सावधानी बरती जा सके। इस विनाशकारी 2 दिसंबर 1984 के हादसे से का$फी पहले अ$खबारों में इस $खतरे की चेतावनी दी जाती रही। उदाहरण के तौर पर निम्नलिखित $खबरों में इस हादसे की चेतावनी देते हुये सावधान किया गया था, मगर प्रशासन में से किसी ने भी ध्यान नहीं दिया:-
(1) पत्रकार श्री राजकुमार केसवानी द्वारा साप्ताहिक 'रपटÓ में दिसंबर 1982 में इस ओर ध्यानाकर्षण किया गया। (2) साप्ताहिक '$खबरयारÓ में 04 मई 1984 को हमने भी इस ओर ध्यान आकर्षित किया था। (3) श्री राजकुमार केसवानी द्वारा पुन: जून 1984 में 'जनसत्ताÓ के माध्यम से ध्यानाकर्षण किया गया। गुरूबचन सिंह 'सोचÓ
सज़ा देनी है तो संविधान बदलो
हर्षवर्धन त्रिपाठी
भोपाल गैस त्रासदी पर $फैसले का विरोध करते आंदोलनकारी हज़ारों बेगुनाहों को मौत की नींद सुला देने वाले मामले पर आ$िखरकार 25 साल बाद भोपाल की सीजेएम कोर्ट ने $फैसला सुना ही दिया। पंद्रह हज़ार से ज्य़ादा लोग भोपाल की यूनियन कार्बाइड से निकली ज़हरीली गैस से मारे गए। जबकि, अभी भी कम से कम से कम छे लाख लोग ऐसे हैं जिनके भीतर यूनियन कार्बाइड से निकली ज़हरीली गैस अभी भी समाई है। और, इसके बुरे असर से सांस की बीमारी से लेकर कैंसर तक की बीमारी के शिकार ये लोग हो रहे हैं। लेकिन, 2 दिसंबर 1984 की रात हुए दुनिया के इस सबसे बड़े औद्योगिक हादसे की सुनवाई के बाद जब $फैसला आया तो, इसमें धारा 304 ्र लगाई गई, यानी ऐसी धारा जिसमें अधिकतम दो साल तक की सज़ा हो सकती है।
और तो और दोषी पाए सभी लोगों को निजी मुचलके पर ज़मानत पर भी छोड़ दिया गया। ये असाधारण मसला था लेकिन, इसकी पूरी जांच और सुनवाई भारतीय संविधान के उन कमज़ोर कडिय़ों का इस्तेमाल करके की गई कि ये एक साधारण लापरवाही भर का मामला बनकर रह गया। और, कमाल तो ये है कि उस समय यूनियन कार्बाइड के सीईओ रहे वॉरेन एंडरसन को आज भी दोषी नहीं बताया गया। जबकि, वो इसी मामले में करीब दो दशकों से भारत में भगोड़ा घोषित है। इसलिए ज़रूरी ये है कि भोपाल गैस त्रासदी जैसी असाधारण परिस्थितियों के लिए भारतीय संविधान में नए सिरे से बदलाव किया जाए।
मामला सि$र्फ भोपाल गैस त्रासदी का ही नहीं है। सच्चाई तो ये है कि ऐसे सभी असाधारण मसलों से निपटने में भारतीय संविधान और भारतीय दंड संहिता की बाबा-आदम के ज़माने की धाराएं, प्रावधान नाका$फी हैं। फिर चाहे वो भोपाल गैस त्रासदी हो या फिर देश पर हमला करने वाले अ$फज़ल गुरु की या कसाब की फांसी हो। एक ज़माने में संघ परिवार और उनके अनुषांगिक संगठनों ने ऐसे ही असाधारण मामलों पर संविधान में बदलाव की बात बड़े ज़ोर-शोर से उठाई थी लेकिन, पता नहीं क्यों जब बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार आई तो, कोई ठोस $फैसला नहीं लिया जा सका। शायद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े विचार परिवार की ये बड़ी कमी साबित हुई है, कि वो अच्छे मुद्दों को भी उठाकर उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा पाते। जिसकी वजह से उस विशेष मुद्दे की वजह से संघ परिवार से जुडऩे वाले लोग फिर उसकी बातों से सहमत होते हुए भी उससे जुडऩे में मुश्किल महसूस करते हैं।
आ$िखर भोपाल गैस त्रासदी हो, अ$फज़ल गुरु का संसद पर हमले में शामिल होना हो या फिर कसाब का मुंबई में गोलियां बरसाना, सब देश पर हमला ही तो हुआ ना। फिर देश पर हमले जैसे असाधारण मामले पर कार्रवाई की प्रक्रिया सामान्य चोरी चकारी करने वाले, किसी की हत्या करने किसी फैक्ट्री में थोड़ी लापरवाही जैसी घटनाओं जैसी कैसे हो सकती है। तर्क ये आता है कि मामला भोपाल गैस त्रासदी का हो या अ$फजल गुरु की फांसी का—हमारे संविधान में दोषियों को उचित और समय पर दंड देने की सारी व्यवस्था है लेकिन, राजनीतिक, कूटनीतिक दबाव मुश्किल करते हैं।
इसी तर्क पर ये और ज़रूरी हो जाता है कि असाधारण मामलों के लिए संविधान और न्याय प्रक्रिया में ऐसे बदलाव किए जाएं कि सीबीआई, राजनेताओं, सरकारों को भी उसे लटकाने का मौका न मिल सके। अभी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अ$फजल गुरु की फांसी की $फाइल लटकाने के मामले में किरकिरी झेल रहीं थीं। उस पर उन्होंने इस देरी के लिए तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटील के दबाव का इशारा करके इस बदलाव की ज़रूरत को और सही साबित किया है। सोचिए कि अगर संविधान समीक्षा एक बार हो गई होती और असाधारण मामलों में तुरंत दंड का प्रावधान होता तो, ऐसी जाने कितनी विसंगतियों से बचा जा सकता था। क्योंकि, गाड़ी की ट्यूब में भी 4-6 पंचर हो जाने के बाद ट्यूब बदलना ज़रूरी ही हो जाता है लेकिन, देश को चलाने वाले भारतीय संविधान में तो, जाने कितने पंचर होने के बाद भी पंचर बनाकर (छोटे-मोटे बदलाव करके) ही काम चलाया जा रहा है। अब लगभग हर दूसरे चौथे न्यायालयों से निकलने वाले आदेश संविधान की कई बातों को आज की प्रासंगिकता के लिहाज़ से सही नहीं पाते हैं। बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें भारतीय संविधान आज की परिस्थितियों के लिहाज़ से समय पर न्याय की प्रक्रिया में मददगार नहीं बनता है। आतंकवाद जैसी देश की सबसे बड़ी समस्या से निपटने के लिए तो, संविधान में अलग से कोई प्रावधान ही नहीं है। ये तो कसाब की फांसी सज़ा के बाद ये राज खुला कि अ$फज़ल गुरु की क्षमादान याचिका अभी तक राष्ट्रपति के पास पहुंची ही नहीं है। अभी तक $फाइल दिल्ली सरकार से लौटकर केंद्रीय गृह मंत्रालय पहुंची ही नहीं है। ये कांग्रेसी तरीका हो सकता है किसी भी मसले को टालमटोल करने का। लेकिन, दरअसल किसी भी अभियुक्त को फांसी की सज़ा और फांसी होने के बीच संविधान में जो व्यवस्था है वो, इस तरह की देरी का बहाना देती है। दरअसल, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 में इस बात की कोई समय सीमा तय ही नहीं की गई है कि राष्ट्रपति को कब तक किसी क्षमादान याचिका पर $फैसला लेना है वो, चाहे तो, दशकों तक उसे लटका सकता है। अ$फज़ल गुरु के मामले में तो, राष्ट्रपति के पास $फाइल पहुंचने से पहले ही लगभग एक दशक होने जा रहे हैं। आप ही देखिए कि आ$िखर किसी अभियुक्त को फांसी की सज़ा सुनाए जाने पर उसे फांसी के तख़्ते तक पहुंचाने की प्रक्रिया क्या है? सेशन कोर्ट या फिर स्पेशल कोर्ट अगर किसी को फांसी की सज़ा सुनाती है तो, उस $फैसले पर मुहर लगाने के लिए संबंधित हाईकोर्ट के पास भेजना होता है। अगर हाईकोर्ट भी फांसी की सज़ा सुना देता है तो, अभियुक्त के पास सर्वोच्च न्यायालय में अपील का मौका होता है। सर्वोच्च न्यायालय भी अगर अभियुक्त की फांसी की सज़ा बरकरार रखता है तो, अभियुक्त के पास आ$िखरी विकल्प बचता है कि वो, राष्ट्रपति से अभयदान मांगे। राष्ट्रपति के पास अभयदान के लिए की जाने वाली अपील राष्ट्रपति के पास जाने से पहले गृह मंत्रालय की जांच के लिए भेजी जाती है। संविधान में इस बात का कोई उल्लेख नहीं है कि राष्ट्रपति को कितने दिन में क्षमादान याचिका पर $फैसला लेना है। अब केंद्रीय गृह मंत्रालय उस राज्य से मामले की संपूर्ण जांच के लिए सारी जानकारी मांगता है। राज्य सरकार मामले की सारी जानकारी जुटाकर गृह मंत्रालय को भेजता है। गृह मंत्रालय सारे मामले की जांच करके उसे राष्ट्रपति सचिवालय भेज देता है। राष्ट्रपति सचिवालय आ$िखर में फाइल राष्ट्रपति के पास $फैसले के लिए भेजता है। अब ये व्यवस्था सामान्य फांसी की सज़ा पाए व्यक्ति के लिए, तो फिर भी ठीक कही जा सकती है लेकिन, देश पर हमला करने वाले आतंकवादियों के मामले में भी यही व्यवस्था भारतीय संविधान का मखौल उड़ाती दिखती है। विशेष अदालत के ज़रिए सुनवाई होने और अब तक की सबसे तेज़ सुनवाई होने पर भी कसाब को विशेष अदालत से फांसी की सज़ा मिलने में डेढ़ साल से ज्य़ादा लग गए जबकि, ये पहली प्रक्रिया है। आतंकवादियों को जेल में रखने और उनकी सुनवाई पर हम भारतीयों की गाढ़ी कमाई का जो, पैसा जाता है उस पर तो, बहस की गुंजाइश ही नहीं दिखती। कभी-कभार किसी चर्चा में उड़ते-उड़ते ये बात भले सामने आ जाती है। भोपाल गैस त्रासदी और आतंकवादी घटनाओं जैसी असाधारण घटनाओं के बाद इस बात की सख़्त ज़रूरत है कि भारतीय संविधान की समीक्षा करके एक बार नए सिरे से आज की ज़रूरतों के लिहाज़ से संविधान लिखा जाए। हमारी चुनौती हेडली जैसे आतंकवादी भी बन रहे हैं जो, अमेरिका में पल-बढ़कर भारत के $िखला$फ आतंकवादी साजि़श सोचते-करते हैं और वॉरेन एंडरसन जैसे विदेशी सीईओ भी जिनकी एक लापरवाही हज़ारों लोगों की जान ले लेती है और आने वाली कई पीढिय़ों की नसों में ज़हर भर देती है। इन असाधारण परिस्थितियों में पुराने संविधान, कानून के सहारे लड़ाई वैसी ही जैसे, पुलिस को ज़ंग लगी थ्री नॉट थ्री की बंदूक लेकर ए.के. 47 और दूसरे अत्याधुनिक हथियारों से लैस आतंकवादियों से लडऩे भेज दिया जाए।
सरकार द्वारा अग्रिम कार्रवाई
इस नर-संहार के 25 वर्षों की लम्बी अवधि के बाद भी आयुक्त को एक दम सज़ा दिये जाने से सर्वत्र रोष को देखते हुये म.प्र. के माननीय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने प्रेस के समक्ष बयान देते हुये कहा कि संविधान एवं न्याय प्रक्रिया में ज़रूरी संशोधन शीघ्र किये जाने चाहियें, ताकि पीडि़तों को शीघ्र न्याय मिले व घोर अपराधियों को भरपूर सज़ा मिल सके। पीडि़त व्यक्तियों के पुनर्वास व इलाज आदि की जि़म्मेदारी केन्द्र सरकार की है, जबकि राज्य सरकार करोड़ों रूपये इस मद में $खर्च करती आ रही है। केन्द्र सरकार और अधिक राशि देने का प्रावधान करे और यहां के जल और वायु को ज़हरीली फिज़ाओं और प्रदूषण से बचाया जा सके।
म.प्र. शासन द्वारा श्री विवेक तनखा के नेतृत्व में 5 कानूनविदों की एक समिति का गठन कर मामले का पुनरीक्षण किया जा रहा है, जो शीघ्र ही अपनी रपट पेश करेगी। तत्पश्चात अदालत में आगे की कार्यवाही की जावेगी।
केन्द्र सरकार द्वारा केन्द्रीय मंत्रियों का एक समूह गृहमंत्री पी.चिदम्बरम् की अध्यक्षता में गठित किया गया है, जो मामले की शुरू से अब तक की परिस्थितियों की समीक्षा करके अपनी रपट सरकार को पेश करेगा।

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