
सतह पर उभरा सत्ता संघर्ष
कांग्रेस के शिखर पर सत्ता संघर्ष चरम पर है। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने माओवाद के $िखला$फ छेड़े गये संघर्ष पर अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और गृहमंत्री पी चिदम्बरम के $िखला$फ बयानबाज़ी करके उस सत्ता संघर्ष को सतह पर ला दिया है। दिग्विजय सिंह ने चिदम्बरम के $िखला$फ आदिवासी सरोकारों के बरअक्स ही बयान दिया हो, ऐसा नहीं है। उनके बयान के पीछे कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की मंशा सा$फ दिखाई दे रही है।
रामबहादुर राय
दंतेवाड़ा में 76 जवानों की निर्मम हत्या करने के बाद भी माओवादी संघर्ष को जायज ठहराने के लिए दिग्विजय सिंह ने जो कोशिश की है उसके पीछे की राजनीति बहुत साफ तो बिल्कुल नहीं है। मध्य प्रदेश से दिल्ली आने के बाद दिग्विजय सिंह 10 साल का सत्ता वनवास भोग रहे हैं। वे घोषित तौर पर सि$र्फ पार्टी का काम कर रहे हैं और उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी को स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं। राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू बन जाने के बाद उनका एजेण्डा बहुत साफ है। एक ओर जहां वे राहुल का मानवीय और सत्ता निर्मोही की छवि उभारना चाहते हैं वहीं दूसरी ओर उनके गुट की कोशिश राहुल गांधी को सत्ता के शीर्ष पर स्थापित करने की भी है। अपने पिता की तर्ज पर राहुल गांधी ने राजनीति में कदम रखते ही अपनी एक मंडली का गठन कर लिया है। यह मंडली उनकी सलाहकार भी है और मार्गदर्शक भी. इसी मंडली के लोग चाहते हैं कि वर्तमान यूपीए सरकार में ही राहुल गांधी सत्ता के शीर्ष पर विराजमान हो जाएं।
दूसरी बार यूपीए के सत्ता में आने के बाद जिस तरह से सरकार अंदर से डांवाडोल है उससे कांग्रेस के दिग्गजों को भी शुरू में ही यह डर सताने लगा है कि अगली बार आना शायद अब संभव नहीं है। अभी तक की रणनीति यह थी कि राहुल गांधी संभवत: 2014 में बतौर प्रधानमंत्री प्रस्तुत किये जाते लेकिन जिस तरह से विभिन्न मुद्दों पर केन्द्रीय सरकार जनता की नजरों में नकारा साबित हो रही है उससे यह डर अस्वाभाविक भी नहीं है। ऐसे में राहुल गांधी की मंडली के निशाने पर सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी है। लेकिन इसमें एक बड़ी दिक्कत है। दिक्कत यह है कि हमारे प्रधानमंत्री को अमेरिका का प्रश्रय प्राप्त है। मनमोहन सिंह पर सीधे हमला बोलना राहुल गांधी की मंडली के लिए संभव नहीं है। इसमें कई दिक्कते हैं। मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की पसंद है इससे बड़ा सत्य यह है कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री की कुर्सी का जितना सम्मान करती हैं उससे अधिक वे उस कुर्सी से डरती भी हैं। नारायणदत्त तिवारी और अर्जुन सिंह इसके गवाह हैं कि कैसे वादा करके भी सोनिया गाँधी उनकी रैली में नहीं आयी थी क्योंकि उस वक्त के प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहराव ने उन्हें वहां जाने से मना कर दिया था। इसके बाद भी सोनिया गांधी प्रधानमंत्री की कुर्सी के खिलाफ कुछ भी करने या बोलने से बचती रही हैं। इसलिए वे इस विचार को सीधे तौर पर समर्थन नहीं दे रही हैं कि बीच रास्ते से मनमोहन सिंह को दूर बैठा दिया जाए और सत्ता राहुल गांधी के नेतृत्व में चले। लेकिन सोनिया के इस सम्मानजनक डर के अलावा एक बड़ा कारण अमेरिका का भारतीय प्रशासन में हस्तक्षेप है। भारत में जो नक्सल विरोधी अभियान है वह पर्दे के सामने दिखने वाला प्रहसन है। पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि अमेरिका के दबाव में भारत सरकार ने एक डिपार्टमेन्ट की स्थापना की है जिसका नाम है परफार्मेन्स मैनेजमेन्ट डिपार्टमेन्ट। यह डिपार्टमेन्ट अमेरिका के इशारे पर बनाया गया है और इसके मुखिया एक अमेरिका भक्त सज्जन प्रजापति त्रिवेदी बनाये गये हैं। प्रजापति त्रिवेदी हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे हैं और विश्व बैंक के सलाहकार भी रह चुके हैं। जिस डिपार्टमेन्ट को चुपचाप स्थापित किया गया है उसका काम भी बड़ा अनोखा है। वह भारतीय नौकरशाही के कामकाज की समीक्षा करेगी और उनके कार्यस्तर को सुधारेगी। उन्हें बताएगी कि विदेशी निवेश इत्यादि मसलों पर किस प्रकार से निर्णय लिया जाता है। जाहिर है, अमेरिका भारत में अमेरिकी कंपनियों के हित सुरक्षित करने के लिए भारतीय नौकरशाही को नये सिरे से अपने घेरे में ले रहा है। और इस काम के लिए उसे मनमोहन सिंह का पूरा समर्थन प्राप्त है। ऐसे में अगर राहुल गांधी और उनकी कांग्रेसी मंडली मनमोहन सिंह को सीधे हटाने की कोशिश भी करे तो कामयाब नहीं हो सकती. अव्वल तो माता सोनिया का समर्थन ही नहीं मिलेगा और फिर अमेरिका मनमोहन सिंह के खिलाफ किसी ऐसी कार्रवाई को सिरे नहीं चढऩे देगा जो उन्हें अस्थिर करता हो। ऐसे में सिर्फ चिदम्बरम ही बचते हैं जिसे राहुल गांधी की मंडली निशाना बनाकर सरकार को इस अमेरिकी गुप्त साम्राज्यवाद से बचाने की कोशिश कर सकती है और अपने लिए सत्ता का रास्ता साफ कर सकती है। अमेरिकी कंपनियों का पैसा सबसे अधिक जिन क्षेत्रों में लग रहा है उसमें माइनिंग और मिनरल्स की खोज भी शामिल है। फिर आधारभूत ढांचे के विकास के लिए भी आदिवासी और ग्रामीण इलाकों का इस्तेमाल करना अनिवार्य है। ऐसे में चिदम्बरम के इस अभियान को परोक्ष रूप से कंपनियों का पूरा समर्थन प्राप्त है। अगर उनके इस अभियान को कमजोर कर दिया जाता है तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कमजोर होते हैं। भले ही चिदम्बरम को राष्ट्रवादी और वामपंथी दलों का समर्थन मिल रहा हो लेकिन खुद कांग्रेस में राहुल गांधी के समर्थक उनके ऊपर हमला बोलकर एक तीर से दो निशाने साध रहे हैं। कांग्रेस की इस कोटरी को कांग्रेस विश्वस्त व्यवसायी मुकेश अंबानी का भी समर्थन प्राप्त है। मुकेश अंबानी जानते हैं कि सरकार में चिदम्बरम अकेले ऐसी बड़ी शख्सियत हैं जो छोटे भाई अनिल अंबानी को संरक्षण देते हैं। अगर चिदम्बरम कमजोर होते हैं तो मुकेश अंबानी अपने आप मजबूत हो जाते हैं अनिल अंबानी को मिल रहा समर्थन समाप्त हो जाता है। इसलिए भले ही दंतेवाड़ा की घटना के बाद अन्य दल चिदम्बरम का समर्थन कर रहे हों लेकिन खुद कांग्रेस में कुछ लोग उन्हें अपदस्थ करने के लिए पूरी तरह से सक्रिय हो गये हैं। ये वही लोग हैं जो चिदम्बरम के बहाने मनमोहन सिंह को अपना निशाना बना रहे हैं। भले ही एक बार इस्तीफा देकर चिदम्बरम ने विरोधियों के हथियार को भोथरा कर दिया हो लेकिन कांग्रेस के चरम पर चल रहा सत्ता संघर्ष फिलहाल रुकने वाला नहीं है। दिग्विजय सिंह का ताजा बयान इसी का संकेत है।
आसान नहीं कसाब को फांसी पर लटकाना
मुंबई में 26 नवंबर 2008में हुए आतंकवादी हमले के लिए पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब को गुरुवार 6 मई को फांसी की सज़ा सुनाई गई। कसाब अगर हाई कोर्ट में अपील नहीं भी करता है, तो भी उसकी सज़ा की पुष्टि बॉम्बे हाई कोर्ट से करानी होगी। वैसे, कसाब से पहले ही फांसी देने के लिए तो देश की कई जेलों में बंद 308 अपराधी पहले से ही मृत्युदंड का इंतज़ार कर रहे हैं। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कम से कम 256 मामले ऐसे हैं जिनको निचली अदालतों के $फैसले के समर्थन का इंतज़ार है। वहीं दूसरी तर$फ कुल 52 लोगों ने राष्ट्रपति के समक्ष मौत की सज़ा के $िखला$फ क्षमा याचना की अपील की है। यदि कसाब हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने का $फैसला करता है और सज़ा फांसी की ही रहने की सूरत में राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल करता है तो वह उस कतार में खड़ा हो सकता है, जिसमें संसद पर हमले का आरोपी अ$फज़ल गुरु खड़ा है और जिसका नंबर 27 वां है।
कसाब से पहले मोहम्मद अ$फज़ल गुरु को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी। अ$फज़ल गुरु को संसद पर हुए आतंकवादी हमले में मौत की सज़ा सुनाई गई थी। मौत की सज़ा के $िखला$फ अ$फज़ल गुरु ने राष्ट्रपति के सामने क्षमा याचना की है।
अंडरवल्र्ड डॉन टाइगर मेनन के भाई याकूब मेनन को मौत की सज़ा सुनाई गई थी। वर्ष 2006 में मुंबई की आतंकवाद निरोधी विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सज़ा को सुप्रीम कोर्ट के $फैसले का इंतज़ार है।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने एक सवाल के जवाब में दिसंबर 2009 में लोकसभा में बताया, 31 दिसंबर 2007 तक देश के विभिन्न जेलों में बंद 308 कैदी मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे हैं। इनमें से 52 लोगों ने राष्ट्रपति के समक्ष मृत्युदंड के $िखला$फ क्षमा याचना की अपील की है।
हर दिन उजागर हो रही हंै नरेगा में अनियमितताएं अनूप सक्सेना राजगढ़। देश में स्वर्ण जयंती स्वरोज़गार योजना की विफलता की बात स्वयं वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा स्वीकार करने के बाद जल्द ही महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना भी इस असफलता की श्रेणी में शुमार हो सकती है। कारण, हज़ारों करोड़ रूपयों का ब$गैर नियोजन के इधर से उधर पहुंचना और निरीक्षण के लिये खड़े किये गये अधिकारियों का नोटों की चकाचौंध में अपने कर्तव्यों से भटक जाना है।
राजगढ़ जि़ले में पूर्व कलेक्टर शिवानंद दुबे के समय मनरेगा के कार्यों में अनियमितताओं को जैसे पंख लग गये। कार्यों के कराने के लिये उत्तरदायी उपयंत्री सहायक यंत्री आदि ने ग्रामों के सरपंचों व सचिवों को भी भ्रष्टाचार के जोड़ बाकी गुणा भाग इस तरह से समझाये कि तीन वर्षों में कई सरपंच सचिव आलीशान भवनों गाडिय़ों व सैंकड़ों बीघा ज़मीनों के मालिक बन गये। आधे अधूरे गुणवत्ताहीन निर्माण कार्यों को पूर्ण दर्शाकर सत्यापन करवा कर पूर्णता प्रमाण पत्र जारी करवाना उपयोगिता प्रमाण पत्र जारी करवाना निर्माण ऐजेंसियों का प्रिय कार्य बन गया है।
ऐसा ही एक प्रकरण जीरापुर जनपद पंचायत क्षेत्र की ग्राम पंचायत खेड़ी में देखने में आया। हां ग्राम के मुख्य पहुंच मार्ग को नाले से सुरक्षित रख कर मार्ग को पानी के कटाव से बचाने के लिये मनरेगा के अंतर्गत 5.00 लाख की लागत से बाड़ नियंत्रण दीवार का निर्माण मई 2009 में कराया इस दीवार के मूल्यांकनकर्ता अधिकारी उपयंत्री एल.के.झरवडे तथा सत्यापनकर्ता अधिकारी सहायक यंत्री अरविंद श्रीवास्तव थे। मार्ग को नाले से बचाने के लिये बनी यह दीवार इतने हल्के स्तर की बनायी गयी कि गत वर्ष बारिश का पहला हमला भी नहीं झेल सकी, और आधी से अधिक दीवार नष्ट हो गयी। गिर गयी दीवार के पत्थरों को ग्रामीण उठा ले गये। हाल ही में नये कलेक्टर श्री लोकेश जाटव की पदस्थापना के बाद तथा युवा आई.ए.एस. श्री जाटव की भ्रष्टाचार को सख्ती से कुचल देने की गर्जना के बाद जीरापुर के इस बाड़ नियंत्रण दीवार के निर्माण में की गयी गंभीर अनियमितता के मामले में समूचा प्रशासन गंभीर नज़र आने लगा है, और जनपद पंचायत जीरापुर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से पांच दिवस में जांच प्रतिवेदन जि़ला पंचायत के सी.ई.ओ. श्री रणदा द्वारा मांगा गया है। देखना है कि भ्रष्टाचार के इस प्रमाणित मामले में नये कलेक्टर के पदस्थ होने के बाद किस तरह की कार्यवाही दोषी अधिकारियों पर कब तक होती है।
कांग्रेस के शिखर पर सत्ता संघर्ष चरम पर है। कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह ने माओवाद के $िखला$फ छेड़े गये संघर्ष पर अपनी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और गृहमंत्री पी चिदम्बरम के $िखला$फ बयानबाज़ी करके उस सत्ता संघर्ष को सतह पर ला दिया है। दिग्विजय सिंह ने चिदम्बरम के $िखला$फ आदिवासी सरोकारों के बरअक्स ही बयान दिया हो, ऐसा नहीं है। उनके बयान के पीछे कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की मंशा सा$फ दिखाई दे रही है।
रामबहादुर राय
दंतेवाड़ा में 76 जवानों की निर्मम हत्या करने के बाद भी माओवादी संघर्ष को जायज ठहराने के लिए दिग्विजय सिंह ने जो कोशिश की है उसके पीछे की राजनीति बहुत साफ तो बिल्कुल नहीं है। मध्य प्रदेश से दिल्ली आने के बाद दिग्विजय सिंह 10 साल का सत्ता वनवास भोग रहे हैं। वे घोषित तौर पर सि$र्फ पार्टी का काम कर रहे हैं और उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी को स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं। राहुल गांधी के अघोषित राजनैतिक गुरू बन जाने के बाद उनका एजेण्डा बहुत साफ है। एक ओर जहां वे राहुल का मानवीय और सत्ता निर्मोही की छवि उभारना चाहते हैं वहीं दूसरी ओर उनके गुट की कोशिश राहुल गांधी को सत्ता के शीर्ष पर स्थापित करने की भी है। अपने पिता की तर्ज पर राहुल गांधी ने राजनीति में कदम रखते ही अपनी एक मंडली का गठन कर लिया है। यह मंडली उनकी सलाहकार भी है और मार्गदर्शक भी. इसी मंडली के लोग चाहते हैं कि वर्तमान यूपीए सरकार में ही राहुल गांधी सत्ता के शीर्ष पर विराजमान हो जाएं।
दूसरी बार यूपीए के सत्ता में आने के बाद जिस तरह से सरकार अंदर से डांवाडोल है उससे कांग्रेस के दिग्गजों को भी शुरू में ही यह डर सताने लगा है कि अगली बार आना शायद अब संभव नहीं है। अभी तक की रणनीति यह थी कि राहुल गांधी संभवत: 2014 में बतौर प्रधानमंत्री प्रस्तुत किये जाते लेकिन जिस तरह से विभिन्न मुद्दों पर केन्द्रीय सरकार जनता की नजरों में नकारा साबित हो रही है उससे यह डर अस्वाभाविक भी नहीं है। ऐसे में राहुल गांधी की मंडली के निशाने पर सीधे प्रधानमंत्री की कुर्सी है। लेकिन इसमें एक बड़ी दिक्कत है। दिक्कत यह है कि हमारे प्रधानमंत्री को अमेरिका का प्रश्रय प्राप्त है। मनमोहन सिंह पर सीधे हमला बोलना राहुल गांधी की मंडली के लिए संभव नहीं है। इसमें कई दिक्कते हैं। मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की पसंद है इससे बड़ा सत्य यह है कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री की कुर्सी का जितना सम्मान करती हैं उससे अधिक वे उस कुर्सी से डरती भी हैं। नारायणदत्त तिवारी और अर्जुन सिंह इसके गवाह हैं कि कैसे वादा करके भी सोनिया गाँधी उनकी रैली में नहीं आयी थी क्योंकि उस वक्त के प्रधानमंत्री पी वी नरसिंहराव ने उन्हें वहां जाने से मना कर दिया था। इसके बाद भी सोनिया गांधी प्रधानमंत्री की कुर्सी के खिलाफ कुछ भी करने या बोलने से बचती रही हैं। इसलिए वे इस विचार को सीधे तौर पर समर्थन नहीं दे रही हैं कि बीच रास्ते से मनमोहन सिंह को दूर बैठा दिया जाए और सत्ता राहुल गांधी के नेतृत्व में चले। लेकिन सोनिया के इस सम्मानजनक डर के अलावा एक बड़ा कारण अमेरिका का भारतीय प्रशासन में हस्तक्षेप है। भारत में जो नक्सल विरोधी अभियान है वह पर्दे के सामने दिखने वाला प्रहसन है। पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि अमेरिका के दबाव में भारत सरकार ने एक डिपार्टमेन्ट की स्थापना की है जिसका नाम है परफार्मेन्स मैनेजमेन्ट डिपार्टमेन्ट। यह डिपार्टमेन्ट अमेरिका के इशारे पर बनाया गया है और इसके मुखिया एक अमेरिका भक्त सज्जन प्रजापति त्रिवेदी बनाये गये हैं। प्रजापति त्रिवेदी हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे हैं और विश्व बैंक के सलाहकार भी रह चुके हैं। जिस डिपार्टमेन्ट को चुपचाप स्थापित किया गया है उसका काम भी बड़ा अनोखा है। वह भारतीय नौकरशाही के कामकाज की समीक्षा करेगी और उनके कार्यस्तर को सुधारेगी। उन्हें बताएगी कि विदेशी निवेश इत्यादि मसलों पर किस प्रकार से निर्णय लिया जाता है। जाहिर है, अमेरिका भारत में अमेरिकी कंपनियों के हित सुरक्षित करने के लिए भारतीय नौकरशाही को नये सिरे से अपने घेरे में ले रहा है। और इस काम के लिए उसे मनमोहन सिंह का पूरा समर्थन प्राप्त है। ऐसे में अगर राहुल गांधी और उनकी कांग्रेसी मंडली मनमोहन सिंह को सीधे हटाने की कोशिश भी करे तो कामयाब नहीं हो सकती. अव्वल तो माता सोनिया का समर्थन ही नहीं मिलेगा और फिर अमेरिका मनमोहन सिंह के खिलाफ किसी ऐसी कार्रवाई को सिरे नहीं चढऩे देगा जो उन्हें अस्थिर करता हो। ऐसे में सिर्फ चिदम्बरम ही बचते हैं जिसे राहुल गांधी की मंडली निशाना बनाकर सरकार को इस अमेरिकी गुप्त साम्राज्यवाद से बचाने की कोशिश कर सकती है और अपने लिए सत्ता का रास्ता साफ कर सकती है। अमेरिकी कंपनियों का पैसा सबसे अधिक जिन क्षेत्रों में लग रहा है उसमें माइनिंग और मिनरल्स की खोज भी शामिल है। फिर आधारभूत ढांचे के विकास के लिए भी आदिवासी और ग्रामीण इलाकों का इस्तेमाल करना अनिवार्य है। ऐसे में चिदम्बरम के इस अभियान को परोक्ष रूप से कंपनियों का पूरा समर्थन प्राप्त है। अगर उनके इस अभियान को कमजोर कर दिया जाता है तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी कमजोर होते हैं। भले ही चिदम्बरम को राष्ट्रवादी और वामपंथी दलों का समर्थन मिल रहा हो लेकिन खुद कांग्रेस में राहुल गांधी के समर्थक उनके ऊपर हमला बोलकर एक तीर से दो निशाने साध रहे हैं। कांग्रेस की इस कोटरी को कांग्रेस विश्वस्त व्यवसायी मुकेश अंबानी का भी समर्थन प्राप्त है। मुकेश अंबानी जानते हैं कि सरकार में चिदम्बरम अकेले ऐसी बड़ी शख्सियत हैं जो छोटे भाई अनिल अंबानी को संरक्षण देते हैं। अगर चिदम्बरम कमजोर होते हैं तो मुकेश अंबानी अपने आप मजबूत हो जाते हैं अनिल अंबानी को मिल रहा समर्थन समाप्त हो जाता है। इसलिए भले ही दंतेवाड़ा की घटना के बाद अन्य दल चिदम्बरम का समर्थन कर रहे हों लेकिन खुद कांग्रेस में कुछ लोग उन्हें अपदस्थ करने के लिए पूरी तरह से सक्रिय हो गये हैं। ये वही लोग हैं जो चिदम्बरम के बहाने मनमोहन सिंह को अपना निशाना बना रहे हैं। भले ही एक बार इस्तीफा देकर चिदम्बरम ने विरोधियों के हथियार को भोथरा कर दिया हो लेकिन कांग्रेस के चरम पर चल रहा सत्ता संघर्ष फिलहाल रुकने वाला नहीं है। दिग्विजय सिंह का ताजा बयान इसी का संकेत है।
आसान नहीं कसाब को फांसी पर लटकाना
मुंबई में 26 नवंबर 2008में हुए आतंकवादी हमले के लिए पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल आमिर कसाब को गुरुवार 6 मई को फांसी की सज़ा सुनाई गई। कसाब अगर हाई कोर्ट में अपील नहीं भी करता है, तो भी उसकी सज़ा की पुष्टि बॉम्बे हाई कोर्ट से करानी होगी। वैसे, कसाब से पहले ही फांसी देने के लिए तो देश की कई जेलों में बंद 308 अपराधी पहले से ही मृत्युदंड का इंतज़ार कर रहे हैं। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में कम से कम 256 मामले ऐसे हैं जिनको निचली अदालतों के $फैसले के समर्थन का इंतज़ार है। वहीं दूसरी तर$फ कुल 52 लोगों ने राष्ट्रपति के समक्ष मौत की सज़ा के $िखला$फ क्षमा याचना की अपील की है। यदि कसाब हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने का $फैसला करता है और सज़ा फांसी की ही रहने की सूरत में राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल करता है तो वह उस कतार में खड़ा हो सकता है, जिसमें संसद पर हमले का आरोपी अ$फज़ल गुरु खड़ा है और जिसका नंबर 27 वां है।
कसाब से पहले मोहम्मद अ$फज़ल गुरु को फांसी की सज़ा सुनाई गई थी। अ$फज़ल गुरु को संसद पर हुए आतंकवादी हमले में मौत की सज़ा सुनाई गई थी। मौत की सज़ा के $िखला$फ अ$फज़ल गुरु ने राष्ट्रपति के सामने क्षमा याचना की है।
अंडरवल्र्ड डॉन टाइगर मेनन के भाई याकूब मेनन को मौत की सज़ा सुनाई गई थी। वर्ष 2006 में मुंबई की आतंकवाद निरोधी विशेष अदालत द्वारा सुनाई गई मौत की सज़ा को सुप्रीम कोर्ट के $फैसले का इंतज़ार है।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने एक सवाल के जवाब में दिसंबर 2009 में लोकसभा में बताया, 31 दिसंबर 2007 तक देश के विभिन्न जेलों में बंद 308 कैदी मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे हैं। इनमें से 52 लोगों ने राष्ट्रपति के समक्ष मृत्युदंड के $िखला$फ क्षमा याचना की अपील की है।
हर दिन उजागर हो रही हंै नरेगा में अनियमितताएं अनूप सक्सेना राजगढ़। देश में स्वर्ण जयंती स्वरोज़गार योजना की विफलता की बात स्वयं वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा स्वीकार करने के बाद जल्द ही महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना भी इस असफलता की श्रेणी में शुमार हो सकती है। कारण, हज़ारों करोड़ रूपयों का ब$गैर नियोजन के इधर से उधर पहुंचना और निरीक्षण के लिये खड़े किये गये अधिकारियों का नोटों की चकाचौंध में अपने कर्तव्यों से भटक जाना है।
राजगढ़ जि़ले में पूर्व कलेक्टर शिवानंद दुबे के समय मनरेगा के कार्यों में अनियमितताओं को जैसे पंख लग गये। कार्यों के कराने के लिये उत्तरदायी उपयंत्री सहायक यंत्री आदि ने ग्रामों के सरपंचों व सचिवों को भी भ्रष्टाचार के जोड़ बाकी गुणा भाग इस तरह से समझाये कि तीन वर्षों में कई सरपंच सचिव आलीशान भवनों गाडिय़ों व सैंकड़ों बीघा ज़मीनों के मालिक बन गये। आधे अधूरे गुणवत्ताहीन निर्माण कार्यों को पूर्ण दर्शाकर सत्यापन करवा कर पूर्णता प्रमाण पत्र जारी करवाना उपयोगिता प्रमाण पत्र जारी करवाना निर्माण ऐजेंसियों का प्रिय कार्य बन गया है।
ऐसा ही एक प्रकरण जीरापुर जनपद पंचायत क्षेत्र की ग्राम पंचायत खेड़ी में देखने में आया। हां ग्राम के मुख्य पहुंच मार्ग को नाले से सुरक्षित रख कर मार्ग को पानी के कटाव से बचाने के लिये मनरेगा के अंतर्गत 5.00 लाख की लागत से बाड़ नियंत्रण दीवार का निर्माण मई 2009 में कराया इस दीवार के मूल्यांकनकर्ता अधिकारी उपयंत्री एल.के.झरवडे तथा सत्यापनकर्ता अधिकारी सहायक यंत्री अरविंद श्रीवास्तव थे। मार्ग को नाले से बचाने के लिये बनी यह दीवार इतने हल्के स्तर की बनायी गयी कि गत वर्ष बारिश का पहला हमला भी नहीं झेल सकी, और आधी से अधिक दीवार नष्ट हो गयी। गिर गयी दीवार के पत्थरों को ग्रामीण उठा ले गये। हाल ही में नये कलेक्टर श्री लोकेश जाटव की पदस्थापना के बाद तथा युवा आई.ए.एस. श्री जाटव की भ्रष्टाचार को सख्ती से कुचल देने की गर्जना के बाद जीरापुर के इस बाड़ नियंत्रण दीवार के निर्माण में की गयी गंभीर अनियमितता के मामले में समूचा प्रशासन गंभीर नज़र आने लगा है, और जनपद पंचायत जीरापुर के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से पांच दिवस में जांच प्रतिवेदन जि़ला पंचायत के सी.ई.ओ. श्री रणदा द्वारा मांगा गया है। देखना है कि भ्रष्टाचार के इस प्रमाणित मामले में नये कलेक्टर के पदस्थ होने के बाद किस तरह की कार्यवाही दोषी अधिकारियों पर कब तक होती है।

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