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Friday, May 14, 2010


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महाघोटाले का महाराजा

सुरेश चिपलूणकर
2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में दिल्ली के एक अ$खबार और एक पत्रिका में कवर स्टोरी बनने के बाद मीडिया ने लगभग पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। मीडिया इस भ्रष्टाचार पर जानबूझकर रिपोर्ट नहीं कर रहा है, लेकिन सुरेश चिपलूणकर इस मामले की खोजबीन कर रहे हैं। यहां प्रस्तुत है उनकी खोजबीन का पहला हिस्सा:-
इस टूजी महाघोटाले को समझने के लिए पहले तिथियों में इस घटनाक्रम को समझ लेते हैं।
16 मई 2007 को राजा बाबू को प्रधानमंत्री ने कैबिनेट में दूरसंचार मंत्रालय दिया।
(2009 में फिऱ से यह मंत्रालय हथियाने के लिये नीरा राडिया, राजा बाबू और करुणानिधि की पुत्री कनिमोझि के बीच जो बातचीत हुई उसकी फ़ोन टैप की गई थी, उस बातचीत का कुछ हिस्सा आगे पेश किया जायेगा)
- 28 अगस्त 2007 को (दूरसंचार नियामक प्राधिकरण) ने बाज़ार भाव पर विभिन्न स्पेक्ट्रमों के लाइसेंस जारी करने हेतु दिशानिर्देश जारी किये, ताकि निविदा ठेका लेने वाली कम्पनियाँ बढ़चढ़कर भाव लगायें और सरकार को अच्छा खासा राजस्व मिल सके।
- 28 अगस्त 2007 को ही राजा बाबू ने ट्राई की सिफ़ारिशों को ख़ारिज कर दिया, और कह दिया कि लाइसेंस की प्रक्रिया जून 2001 की नीति (पहले आओ, पहले पाओ) के अनुसार तय की जायेंगी (ध्यान देने योग्य बात यह है कि 2001 में भारत में मोबाइलधारक सिफऱ् 40 लाख थे, जबकि 2007 में थे पैंतीस करोड़। (यानी राजा बाबू केन्द्र सरकार को चूना लगाने के लिये, कम मोबाइल संख्या वाली शर्तों पर काम करवाना चाहते थे।)
- 20-25 सितम्बर 2007 को राजा ने यूनिटेक, लूप, डाटाकॉम तथा स्वान नामक कम्पनियों को लाइसेंस आवेदन देने को कह दिया (इन चारों कम्पनियों में नीरा राडिया तथा राजा बाबू की फर्ज़ी कम्पनियाँ भी जुड़ी हैं), जबकि यूनिटेक तथा स्वान कम्पनियों को मोबाइल सेवा सम्बन्धी कोई भी अनुभव नहीं था, फिर भी इन्हें इतना बड़ा ठेका देने की योजना बना ली गई।
- दिसम्बर 2007 में दूरसंचार मंत्रालय के दो वरिष्ठ अधिकारी (जो इस डाट की नीति को बदलने का विरोध कर रहे थे, उसमें से एक ने इस्तीफ़ा दे दिया व दूसरा रिटायर हो गया), इसी प्रकार राजा द्वारा गस्वानग कम्पनी का पक्ष लेने वाले दो अधिकारियों का ट्रांसफऱ कर दिया गया। इसके बाद राजा बाबू और नीरा राडिया का रास्ता साफ़ हो गया।
- 1-10 जनवरी 2008: राजा बाबू पहले पर्यावरण मंत्रालय में थे, वहाँ से वे अपने विश्वासपात्र सचिव सिद्धार्थ बेहुरा को दूरसंचार मंत्रालय में ले आये, फिऱ कानून मंत्रालय को ठेंगा दिखाते हुए डाट ऊपर बताई गई चारों कम्पनियों को दस दिन के भीतर नौ लाइसेंस बाँट दिये। 22 अप्रैल 2008 को ही राजा बाबू के विश्वासपात्र सेक्रेटरी सिद्धार्थ बेहुरा ने लाइसेंस नियमों में संशोध करके एक्यूजीशन (अधिग्रहण) की जगह मर्जर (विलय) शब्द करवा दिया, ताकि यूनिटेक अथवा अन्य सभी कम्पनियाँ तीन साल तक कोई शेयर नहीं बेच सकेंगी वाली शर्त अपने-आप, कानूनी रूप से हट गई।
- 13 सितम्बर 2008 को राजा बाबू ने बीएसएनएल मैनेजमेंट बोर्ड को लतियाते हुए उसे गस्वानग कम्पनी के साथ गइंट्रा-सर्कल रोमिंग एग्रीमेण्टग करने को मजबूर कर दिया। (जब मंत्री जी कह रहे हों, तब बीएसएनएल बोर्ड की क्या औकात है?) - सितम्बर अक्टूबर 2008 : गऊपरग से हरी झण्डी मिलते ही, इन कम्पनियों ने कौड़ी के दामों में मिले हुए 2प्रतिशत स्पेक्ट्रम के लाइसेंस और अपने हिस्से के शेयर ताबड़तोड़ बेचना शुरु कर दिये- जैसे कि स्वान टेलीकॉम ने अपने 45प्रतिशत शेयर संयुक्त अरब अमीरात की कम्पनी इटीसलात को 4200 करोड़ में बेच दिये (जबकि स्वान को ये मिले थे 1537 करोड़ में) अर्थात जनवरी से सितम्बर सिफऱ् नौ माह में 2500 करोड़ का मुनाफ़ा, वह भी बगैऱ कोई काम-धाम किये हुए। अमीरात की कम्पनी इटीसलात ने यह भारी-भरकम निवेश मॉरीशस के बैंकों के माध्यम से किया (गौर करें कि मॉरीशस एक गटैक्स-स्वर्गग देश है और ललित मोदी ने भी अपने काले धंधे ऐसे ही देशों के अकाउंट में किये हैं और दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था ही भारत जैसे भ्रष्ट देशों से आये हुए काले पैसे पर चलती है) - यूनिटेक वायरलेस ने अपने 60प्रतिशत शेयर नॉर्वे की कम्पनी टेलनॉर को 6200 करोड़ में बेचे, जबकि यूनिटेक को यह मिले थे सिफऱ् 1661 करोड़ में। - टाटा टेलीसर्विसेज़ ने अपने 26त्न शेयर जापान की डोकोमो कम्पनी को 13230 करोड़ में बेच डाले। अर्थात राजा बाबू और नीरा राडिया की मिलीभगत से लाइसेंस हथियाने वाली लगभग सभी कम्पनियों ने अपने शेयरों के हिस्से 70,022 करोड़ में बेच दिये, जबकि इन्होंने सरकार के पास 10,772 करोड़ ही जमा करवाये थे। यानी कि राजा बाबू ने केन्द्र सरकार को लगभग 60,000 करोड़ का नुकसान करवा दिया (अब इसमें से राजा बाबू और नीरा को कितना हिस्सा मिला होगा, यह कोई बेवकूफ़ भी बता सकता है, तथा सरकार को जो 60,000 करोड़ का नुकसान हुआ, उससे कितने स्कूल-अस्पताल खोले जा सकते थे, यह भी बता सकता है)। - 15 नवम्बर 2008 को केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने राजा बाबू को नोटिस थमाया, सतर्कता आयोग ने इस महाघोटाले की पूरी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप दी और लोकतन्त्र की परम्परानुसार(?) राजा पर मुकदमा चलाने की अनुमति माँगी। - 21 अक्टूबर 2009 को (यानी लगभग एक साल बाद) सीबीआई ने इस घोटाले की पहली स्नढ्ढक्र लिखी। - 29 नवम्बर 2008, 31 अक्टूबर 2009, 8 मार्च 2010 तथा 13 मार्च 2010 को डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी ने प्रधानमंत्री को कैबिनेट से राजा को हटाने के लिये पत्र लिखे, लेकिन गभलेमानुषग(?) के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। - 19 मार्च 2010 को केन्द्र सरकार ने अपने पत्र में डॉ स्वामी को जवाब दिया कि राजा पर मुकदमा चलाने अथवा कैबिनेट से हटाने के सम्बन्ध में जल्दबाजी में कोई फ़ैसला नहीं लिया जायेगा, क्योंकि अभी जाँच चल रही है तथा सबूत एकत्रित किये जा रहे हैं। - 12 अप्रैल 2010 को डॉ स्वामी ने दिगी हाइकोर्ट में याचिका प्रस्तुत की। - 28 अप्रैल 2010 को राजा बाबू तथा नीरा राडिया के काले कारनामों से सनी फ़ोन टेप का पूरा चिठ्ठा (बड़े अफ़सरों और उद्योगपतियों के नाम वाला कुछ हिस्सा बचाकर) अखबार द पायनियर ने छाप दिया। अब विपक्ष माँग कर रहा है कि राजा को हटाओ, लेकिन कब्र में पैर लटकाये बैठे करुणानिधि, इस हालत में भी दिगी आये और सोनिया-मनमोहन को गधमकाग कर गये हैं कि राजा को हटाया तो ठीक नहीं होगाज्। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, राजा-करुणानिधि-कणिमोझी-नीरा राडिया जैसों को भारी-भरकम गकमीशनग और सेवा-शुल्क दिया गया, यह कमीशन स्विस बैंकों, मलेशिया, मॉरीशस, मकाऊ, आइसलैण्ड आदि टैक्स हेवन देशों की बैंकों के अलावा दूसरे तरीके से भी दिया जाता है आईये देखें कि नेताओं-अफ़सरों की ब्लैक मनी को व्हाइट कैसे बनाया जाता है - 17 सितम्बर 2008 को चेन्नई में एक कम्पनी खड़ी की जाती है, जिसका नाम है जेनेक्स एक्जि़म, जिसके डायरेक्टर होते हैं मोहम्मद हसन और अहमद शाकिर। इस नई-नवेली कम्पनी को गस्वानग की तरफ़ से दिसम्बर 2008 में अचानक 9.9 प्रतिशत (380 करोड़) के शेयर दे दिये जाते हैं, यानी दो कौड़ी की कम्पनी अचानक करोड़ों की मालिक बन जाती है, ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि स्वान कम्पनी के एक डायरेक्टर अहमद सैयद सलाहुद्दीन भी जेनेक्स के बोर्ड मेम्बर हैं, और सभी के सभी तमिलनाडु के लोग हैं। सलाहुद्दीन साहब भी दुबई के एक एनआरआई बिजनेसमैन हैं जो गस्टार समूह (स्टार हेल्थ इंश्योरेंस आदि) की कम्पनियाँ चलाते हैं। यह समूह कंस्ट्रक्शन बिजनेस में भी है, और जब राजा बाबू पर्यावरण मंत्री थे तब इस कम्पनी को तमिलनाडु में जमकर ठेके मिले थे। करुणानिधि और सलाहुद्दीन के चार दशक पुराने रिश्ते हैं और इसी की बदौलत स्टार हेल्थ इंश्योरेंस कम्पनी को तमिलनाडु के सरकारी कर्मचारियों के समूह बीमे का काम भी मिला हुआ है, और स्वान कम्पनी को जेनेक्स नामक गुमनाम कम्पनी से अचानक इतनी मोहब्बत हो गई कि उसने 380 करोड़ के शेयर उसके नाम कर दिये। अब ये तो कोई अंधा भी बता सकता है कि जेनेक्स कम्पनी असल में किसकी है। 29 मई 2009 को जब राजा बाबू को दोबारा मंत्री पद की शपथ लिये 2 दिन भी नहीं हुए थे, दिगी हाईकोर्ट के जस्टिस मुकुल मुदगल और वाल्मीकि मेहता ने एक जनहित याचिका की सुनवाई में कहा कि, 2 जी स्पेक्ट्रम लाइसेंस का आवंटन की पहले आओ पहले पाओग की नीति अजीब है, मानो ये कोई सिनेमा टिकिट बिक्री हो रही है? जनता के पैसे के दुरुपयोग और अमूल्य सार्वजनिक सम्पत्ति के दुरुपयोग का यह अनूठा मामला है, हम बेहद व्यथित हैं, लेकिन हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बावजूद गभलेमानुषग ने राजा को मंत्रिमण्डल से नहीं हटाया। इसी तरह 1 जुलाई 2009 को जस्टिस जीएस सिस्तानी ने डाट द्वारा लाइसेंस लेने की तिथि को खामख्वाह जल्दी बन्द कर दिये जाने की भी आलोचना की। यह जनहित याचिका दायर की थी, स्वान की प्रतिद्वंद्वी कम्पनी एस टेल ने। अब इस एस टेल को चुप करने और इसकी बाँह मरोडऩे के लिये 5 मार्च 2010 को दूरसंचार विभाग ने गृह मंत्रालय का हवाला देते हुए कहा कि एस टेल कम्पनी के कामकाज के तरीके से सुरक्षा चिताएं हैं। इसलिये एस टेल तीन राज्यों में अपनी मोबाइल सेवा बन्द कर दे, न तो कोई नोटिस, न ही कारण बताओ सूचना पत्र। इस कदम से हतप्रभ एस टेल कम्पनी ने कोर्ट में कह दिया कि उसे दूरसंचार विभाग की गपहले आओ पहले पाओग नीति पर कोई ऐतराज नहीं है, बाद में पता चला कि गृह मंत्रालय नएस टेल के विरुद्ध सुरक्षा सम्बन्धी ऐसे कोई गाइडलाइन जारी किये ही नहीं थे, लेकिन एस टेल कम्पनी को भी तो धंधा करना है, पानी (मोबाइल सेवा) में रहकर मगरमच्छ (ए राजा) से बैर कौन मोल ले?

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