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Friday, April 23, 2010





बीपीएल को भूलकर सरकार खेल रही है आईपीएल

दुर्भाग्य है कि एक तरफ जहां महंगाई से जूझ रही जनता भरपेज भोजन के लिए तरस रही है, हमारे नेता चाहे वो विपक्ष में बैठे हों या सत्तापक्ष में, सभी संसद का बेशकीमती वक्त आईपीएल के खेल में बर्बाद कर रहे हैं। दरअसल आईपीएल इस समय सबसे हॉट मुद्दा है, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में छाया हुआ है, ऐसे में सारे नेता आईपीएल पर बोलकर मीडिया में कवरेज बटोरना चाहते हैं, फिर बीपीएल से अभी क्या मिलेगा? अभी चुनाव भी पास नहीं हैं फिर $गरीब के लिए बोलने से क्या फायदा...
संजय तिवारी
साल 2007 में खेल शुरू होता है जी समूह के सुभाष चन्द्रा द्वारा आईसीएल बनाने से। सुभाष चंद्रा अपना खेल चैनल लेकर आनेवाले थे। मामला अटक गया। बीसीसीआई के दांव से सुभाष चंद्रा पट$खनी खा गये। उन्हें क्रिकेट मैचों के प्रसारण अधिकार $खरीदने ही नहीं दिये गये। मामला कोर्ट कचहरी तक गया, लेकिन बात नहीं बनी। ऐसे ही वक्त में उन्होंने घरेलू क्रिकेट की टीमों के लिए इंडियन क्रिकेट लीग बना दी।
क्रिकेटरों के $खरीद $फरोख्त का पहला प्रयोग सुभाष चंद्रा ने ही किया था। फिर क्या था। मानों ललित मोदी को पंख लग गये। बीसीसीआई के बंद बक्से में पड़ा घरेलू क्रिकेट का जिन्न बाहर निकल आया, और 2007 में ही आईपीएल का गठन हो गया। जो खेल सुभाष चंद्रा खेलना चाहते थे उसे खेलना शुरु किया ललित मोदी ने। सुभाष चंद्रा $खुद टीमों को खरीद रहे थे। ललित मोदी ने खेल खिलाड़ी और असली खिलाडिय़ों का ऐसा $खाका खींचा कि सितंबर 2007 में क्रिकेट की पहली नीलामी के मौके पर बड़े-बड़े व्यावसायिक घराने टीम $खरीदने के लिए आ खड़े हुए। मुकेश अंबानी जैसे संजीदे व्यापारी पत्नी के क्रिकेट मोह में खिंचे चले आये, तो रंगीले माल्या भी बोली लगाने पहुंचे। पहले ही दौर की नीलामी के बीसीसीआई ने 4500 करोड़ रुपये कमाए। बीसीसीआई के बाज़ीगर जो अभी तक घरेलू क्रिकेट के रणजी ट्राफी में अटके हुए थे उनके सामने खेल का ऐसा चटकदार रंग उभर आया था, जो परंपरागत क्रिकेट को पानी पानी कर रहा था। पहले ही दौर में जिन छह टीमों को नीलाम किया गया था, उसके लिए सबसे बड़ी बोली लगाई थी मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी ने। उन्होंने मुंबई इंडियन्स के लिए 11 खिलाडिय़ों को $खरीदने के लिए 383 करोड़ रुपये अदा किये थे। तीन साल पहले जो सबसे बड़ी रकम थी तीन साल बाद उस रकम की कोई कीमत ही नहीं बची। इस साल आईपीएल की जिन दो टीमों को इस लीग में शामिल किया गया, उनमें से एक टीम कोच्चि को 1702 करोड़ रुपये में $खरीदा गया। सहाराश्री ने भी पुणे की टीम गठित करने के लिए 1533 करोड़ रुपये खर्च कर दिये।
खेल के पीछे छिपा खेल शबाब पर आ गया था। अपने पहले सीज़न में कम वस्त्रधारी लड़कियों के कारण नैतिक आलोचना के शिकार बने आईपीएल के तीसरे सीज़न आते आते खेल बड़े खिलाडिय़ों के चंगुल में चला गया। आईपीएल में ऐसा क्या $खास था जो रणजी ट्रा$फी में नहीं था? आप कहेंगे कि रणजी ट्राफ़ी में ऐसा था ही क्या, जो आईपीएल में नहीं है? क्रिकेट खिलाडिय़ों के लिए भरपूर पैसा, क्रिकेट के प्रायोजकों को भरपूर दर्शक, टीम के $खरीदारों को हार जीत की हर अवस्था में मुनाफे़ की गारंटी, बीसीसीआई की मोटी कमाई, प्रसारण का अधिकार पाये लोगों की भरपूर गोद भराई, आईपीएल सबको सबकुछ तो दे रहा है। फिर आ$िखर ऐसा क्या हुआ कि आईपीएल असली खिलाडिय़ों के आंख की किरकिरी बन गया। कारण ढूंढने के लिए दूर नहीं जाना है। कारण आईपीएल के गठन में ही छिपे हुए हैं।
असल खेल शुरू हो गया है। ललित मोदी ने जिस क्रिकेट को पैसे का कारोबार बनाकर परोसा था, वही कारोबार अब उनके गले की हड्डी बन गया है। अति सब जगह वर्जित है, और ललित मोदी शायद यह भूल गये कि चोरी से कोकीन रखने के आरोप में दो साल जेल काट लेना आसान है, एक अरब लोगों के साथ धोखाधड़ी करके सा$फ बच निकलना मुश्किल होता है। देश के समस्त खेलों को $खत्म करके स्थापित हुए क्रिकेट को यह आईपीएल खा जाएगा। देखते जाइये, ललित मोदी ने क्रिकेट की जड़ में पूंजी का म_ा डाल दिया है। वह अपना काम ज़रूर करेगा। आईपीएल के गठन की सबसे पहली और बड़ी भूल यह थी कि इस खेल में सबकुछ होते हुए भी कुछ नहीं है। मसलन, आईपीएल के तहत टीमों के गठन के लिए सात चार की व्यवस्था की गयी है। यानी, सात खिलाड़ी भारत के होंगे जबकि चार खिलाड़ी विदेशों से लाए जाएंगे, यानी एक ही देश का एक खिलाड़ी अगर बैटिंग कर रहा है तो दूसरा खिलाड़ी बालिंग करता है। एक प्रदेश का एक खिलाड़ी इस टीम से खेल रहा होता है तो दूसरा उस ओर से. भारतीय टीम के खिलाड़ी तो मानों पंचूरण की तरह पूरे आईपीएल में बंट गये हैं। अब तक क्रिकेट के दर्शक जिस टीम भावना के वशीभूत होकर क्रिकेट देखते थे वह टीम भावना विधिवत काट पीटकर फेंक दी गयी, लेकिन भारती दर्शक क्रिकेट के नाम पर अगर दीवार पर तीन लाइनें खीचकर स्पंट बना सकते हैं खेल के इस स्वरूप को भी स्वीकार कर लेने में कोई हर्जा नहीं है। पहले साल आईपीएल के शोर में इस खेल की सभी खामियां दब गयीं लेकिन इसके अगले ही साल विवादों ने डेरा जमाना शुरू कर दिया। लेकिन आईपीएल के कमिश्नर ललित मोदी की योजनाएं कहीं से कमज़ोर नहीं हो रही थीं। छह से आठ और भविष्य दस टीमों का भरा पुरा क्रिकेट परिवार बन चुका आईपीएल बतौर क्रिकेट इतना बड़ा कन्$फ्यूज़न है कि दर्शक अपने आप को शायद इसके साथ पूरी तरह से जोड़ नहीं पाता है। इस साल जितने भी मैच हुए हैं उसमें अधिकांश मैचों को न तो टीवी पर मनमा$िफक टीआरपी मिली है, और न ही स्टेडियम में दर्शक. आईपीएल के अंतरविरोध दिखने शुरू हो गये थे।
लेकिन केवल मैदान के अंतर्विरोध ही उभरकर सामने नहीं आ रहे थे। मैदान के बाहर असल खिलाडिय़ों के मुना$फे की मानसिकता और अहम का टकराव इसके पतनशील होने का बड़ा कारण साबित हुआ। ललित मोदी ने सगर्व घोषणा की थी, इस साल आईपीएल 22000 करोड़ रुपये का कारोबार हो चुका है। टीमों की कमाई के इतर बीसीसीआई को अकेले वर्तमान साल में ही कोई साढ़े चार से पांच हज़ार करोड़ कमाई की उम्मीद थी। यह कमाई सि$र्फ खेलों से है। टीमों की $खरीद बिक्री से नहीं। लेकिन इसी बीच अति मुनाफे की मानसिकता आड़े आ गयी। कोच्चि टीम में रुचि रखने के आरोपी शशि थरूर आईपीएल के लपेटे में आ गये। अपने उच्च संपर्कों और अति महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व के शिकार ललित मोदी ने शशि थरूर से अपनी निजी खुन्नस निकालने के लिए $खबर लीक करवाई कि कोच्चि टीम में जो खरीदार हैं उसमें सुनंदा नामक मालकिन के पास 70 करोड़ के स्वीट शेयर हैं। यह $खबर न बनती अगर सुनंदा का नाम शशि थरूर से न जोड़ा जाता। अब तो शशि थरूर पर बन आयी। वे यह इंकार कैसे कर देंगे कि वे सुनंदा को नहीं जानते और सुनंदा यह इंकार कैसे कर दें कि उन्होंने टीम में स्वीट शेयर हासिल नहीं किये हैं? फिर वे सारे प्रमोटर कौन हैं जो एक दूसरे को नहीं जानते, लेकिन आईपीएल की सबसे महंगी टीम मिल जुलकर $खरीद लेते हैं? उन सभी लोगों के बीच केन्द्र के रूप में कौन कार्य कर रहा है? ललित मोदी ने शशि थरूर को संकट में डाल दिया था। लेकिन थरूर भी भला क्यों चुप रहते? कांग्रेस के निशाने पर ललित मोदी पहले से ही बने रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण उनका भाजपा नेता वसुंधरा राजे से नज़दीक रिश्ता भी है। कांग्रेस के राजीव भाई इस वक्त बीसीसीआई में कांग्रेसी प्रतिनिधि और प्रवक्ता हैं। वे शायद ही कभी चाहें कि भाजपा के करीबी ललित मोदी बीसीसीआई में प्रभावी हों। लेकिन दूसरी ओर शरद पवार हैं जो देश के $गरीबों से अधिक चिंता बीसीसीआई के अमीरों की करते हैं। वैसे भी अब वे क्रिकेट की अंतरराष्ट्रीय संस्था के अध्यक्ष हो चुके हैं। इसलिए अपने देश की संस्था के स्वाभाविक संरक्षक तो वे हो ही जाते हैं। मामला दोनों ही ओर से उलझता चला गया। बात छापेमारी और जांच पड़ताल तक चली गयी है। इधर भाजपाई शशि थरूर को निशाना बना रहे हैं, कि वे इस्ती$फा दें तो उधर कांग्रेसी ललित मोदी को निशाना बनाकर उन्हें सा$फ कर देना चाहते हैं। अ$फवाहें हैं कि ललित मोदी पर बीसीसीआई का मज़बूत शिकंजा कस दिया जाए। ललित मोदी भी कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं। अगले दो साल तक उन्हें उनके पद से हटाने का मतलब है आईपीएल को ही भंग कर देना। इसलिए कमज़ोर करने की रणनीति पर ही काम हो रहा है। छापेमारी इसी रणनीति का अहम हिस्सा है। वैसे भी आईपीएल में जितना अनाप शनाप पैसा लगने की खबरें उड़ रही हैं उससे एक बात तो साफ है कि ललित मोदी का दामन बेदाग तो बिल्कुल नहीं होगा। और हमारे देश का आयकर विभाग जब अपने पर उतर आता है तो क्या करता है यह आप हर्षद मेहता को याद करके अंदाज़ा लगा सकते हैं। इसलिए ललित मोदी तो कायदे से नपेंगे इसमें कोई शक नहीं है। लेकिन शांत तो शायद वे भी नहीं बैठेंगे।


फिर चालू हुआ गरीबों के लिए अतिक्रमण
बालाघाट। अतिक्रमण शब्द जहां आता है वहां पर लोगों की सोच बन जाती है कि यह कार्यवाही सिर्फ़ छोटे लोगों की दुकानों या $$गरीबों के घर गिराने के लिए यह कार्यवाही की जा रही है। नगर में फिर से प्रारंभ हुए अतिक्रमण के इस कार्य में फिर से यही देखने में आ रहा है। पुलिस लाईन के समीप जो छोटे लोग छोटा-मोटा व्यवसाय कर अपना जीवन-यापन कर रहे थे बुल्डोज़र द्वारा उनकी झोपडिय़ां, ठेले तोड़ दिए गए, जिसके चलते इन लोगों में आक्रोश व्याप्त है। इन्हें अपने रोज़ी रोटी की चिंता होने लगी है, कि अब हम अपना परिवार कैसे चलाएंगे। आ$िखर इस अतिक्रमण अभियान में शासन एवं प्रशासन बड़े व्यापारियों एवं बड़े लोगों की बिल्डिंगों तक क्यों नहीं पहुंच पाते। क्यों इस अतिक्रमण में इन पर कार्यवाही नहीं होती। सड़कों के व्यस्ततम मार्ग पर इनके व्यापार एवं भवन खड़े हैं जिससे आवागमन में सभी लोगों को परेशानी होती है। इस जगह पर से सबसे पहले अतिक्रमण प्रारंभ किया जाए एवं एक बार पूरे दमखम से इस अतिक्रमण को शासन एवं प्रशासन चलाए एवं दोबारा इतना सुस्त न हो जाए कि फिर इस जगह पर अतिक्रमण हो जाए। इस बात का मौका दोबारा न दिया जाए कि बार-बार यही कार्यवाही सि$र्फ दिखावे के लिए चलती रहे एवं निष्पक्ष अपना कार्य करते हुए शासन एवं प्रशासन बिना छोटे एवं बड़े का भेदभाव करते हुए अपना कार्य करे, न कि सि$र्फ $$गरीबों के लिए अभियान चलाया जाए।

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