

भ्रष्टाचार के कंधों पर सवार हो कर चल रहा है नक्सलवाद
आज़ादी से पहले भारत में नक्सलवाद का कहीं नामों निशान नहीं था। पूरे भारत की तरह अन्य क्षेत्रों के आदिवासियों ने भी अंग्रेज़ों के िखलाफ देश की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और कुर्बानियां दीं, लेकिन आज़ादी के बाद जब हमारी अपनी सरकार बनी और उसके अधिकारियों की नियुक्ति इन क्षेत्रों में हुई तो उन्होंने इन वन वासियों के भोलेपन का नाजायज़ $फायदा उठाना प्रारम्भ किया और उनका हर प्रकार का शोषण करना शुरू कर दिया। उसको रोकने के लिए तब ना कोई नेता आया और ना कोई सरकार। ऐसी हालत में उनके बीच नक़्सलवादी आये और उन्होंने उनके हाथों में बंदूक थमा दी। भले ही उससे भ्रष्टाचार और दमन ना रूका हो, लेकिन उनमें बदला लेनेकी ताकत और आदत तो पनप ही गई, जो आज इन इलाकों में नक़्सलवाद के पनपने का प्रमुख कारण बनी है। अब इतनी देर हो चुकी है, कि शायद अब बात से काम नहीं चल पायेगा, अब
तो आवश्यक है एक तेज़ कार्यवाही की जो इनकी धर पकड़ कर दे और ये हथियार डालने को मजबूर हो जायें, लेकिन उसके साथ ही साथ यह भी ज़रूरी है कि इन इलाकों से सरकारी कर्मचारियों के दमन और भ्रटाचार को जड़ से समाप्त कर आदिवासियों के दिलों में सरकार और कानून के प्रति विश्वास जमें और वे माओवादियों के भड़कावे में आने से बचें।सुरक्षा में छेद ही छेद
हृ जी. डी. गोयल नई दिल्ली। छ: अप्रैल को छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में माओवादियों ने केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस $फोर्स के 76 जवानों को जंगल में घेर कर मार डाला। $फोर्स की इस बटालियन को एक अपने ही एजेंट के ज़रिए $खबर दी गई कि पास के जंगलों में भारी तादाद में नक़्सलवादी मौजूद हैं। इस $खबर पर विश्वास करके अ$फसरों ने अपने जवानों को जंगल में भेज दिया। $गलत $खबर के आधार पर गए जवान उधर जंगल में नक़्सलवादियों को तलाश करते रहे, उधर नक़्सलवादी उनके वापस लौटने के रास्ते में सुरंगें बिछाते रहे। माओवादियों ने ठीक महाभारत की तरह सीआरपीए$फ के जवानों के लिए चक्रव्यूह की रचना की थी और कमज़ोर सूचना तंत्र के शिकार वे जवान उनके चक्रव्यूह में फंस कर अपनी जान गवां बैठे। अब सरकार परंपरागत तरीके से एक बार फिर नक़्सलवादियों से निपटने का दावा कर रही है। जबकि आतंकवादियों और नक़्सलवादियों के द्वारा आये दिन होने वाली ऐसी घटनायें इस बात का सबूत हैं कि वातानुकूलित कमरों में बनाई जाने वाली हमारी सुरक्षा योजनाओं में ऐसे सैंकड़ों छेद हैं, जिनका लाभ उठा कर अपनी योजनायें पूरी कर लेते हैं, और सराकार बाद में लकीर पीटने का काम करती रहती है। जहां तक नक़्सलवाद का प्रश्न है, इससे प्रभावित राज्यों और केन्द्र में अलग-अलग पार्टियों की सरकार होने के कारण उनकी नीतियों और कार्यप्रणालियों में हमेशा टकराव बना रहता है। आये दिन बातें तो उनके $िखला$फ संयुक्त अभियान चलाने की, की जातीं हैं, लेकिन काम अपने-अपने ढंग से किए जाते हैं। एक तर$फ जहां केन्द्र सरकार इनका सख़्ती से दमन करना चाहती है, वहीं वोट की राजनीति के लिए कई मुख्यमंत्री इनसे सहयोग लेना और उनसे समझौता करने की कोशिश में लगे रहते हैं, जिनमें प्रमुख नाम छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का लिया जा सकता है।
कुछ ही दिन पहले जब केन्द्र सरकार ने नक़्सलवद प्रभावित राज्यों के मुख्य मंत्रियों की बैठक बुलाई थी तब झारखंड के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन और बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने हिस्सा नहीं लिया था। हालांकि कहने को तो छत्तीसगढ़ में सीआरपीए$फ और राज्य पुलिस नक़्सलवादियों के $िखला$फ मिल कर अभियान चला रही हैं, लेकिन छ: अप्रैल को जो कार्यवाही हुई, उसकी कोई जानकारी तक राज्य की पुलिस को नहीं थी। अगर यह कार्यवाही राज्य पुलिस के साथ मिल कर की गई होती, तो यकीनन इस क्षेत्र से अनजान सीआरपीए$फ के जवान इस तरह नक़्सलवादियों के शिकार नहीं बन पाते। नक़्सलवादियों के $िखला$फ कार्यवाही करने की कमज़ोर राजनैतिक इच्छा शक्ति ने ही आज इन राज्यों में नक़्सलियों को इतना बढ़ावा दिया है, कि आज वे हज़ारों की तादाद में एकत्र होकर सीआरपीए$फ की एक सशस्त्र बटालियन का स$फाया करने का कारनामा कर सकी है।
इस हमले में नक़्सलवादियों ने जिन हथियारों का प्रयोग किया है, वे चीन से भेजे गए थे, जो इस बात का संकेत है कि स्थानीय असंतुष्टों को मदद करके चीन अब तिब्बत और नेपाल की तरह भारत के इन हिस्सों में भी माओवाद का ज़हर फैला कर भारत की अखंडता को नुकसान पहुंचाने की चाल चल रहा है, और अगर इसी तरह हमारे नेता आपसी राजनैतिक हितों को भुला कर इस समस्या का निदान करने में सफल नहीं हो पाये, तो इन देशों की चीनी ड्रेगन एक दिन भारत के इन हिस्सों में भी अपने पंजे जमा कर बैठ जाएगा।
नरेगा के कार्यों में भारी अनियमितताएं
अनूप सक्सेना राजगढ़। केन्द्र सरकार द्वारा महत्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार योजना में गठित नौ सदस्यों की समिति में स्थान पाये राजगढ़ सांसद नारायण सिंह आमलाबे ने मनरेगा में जि़ले में व्यापक भ्रष्टाचार की जांच कर निर्माण कार्यों का निरीक्षण कर राजगढ़ जनपद की भियापुरा ग्राम पंचायत से आरंभ कर समूची भाजपा को झकझोर के रख दिया है और जि़ला कार्यक्रम समन्वयक के रूप में कलेक्टर तथा अतिरिक्त जि़ला कार्यक्रम समन्वयक के रूप में जि़ला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी की पेशानी पर सलवटों की संख्या बढ़ा दी है। जि़ले की राजनीति में ग्राम पंचायत भियापुरा वरिष्ठ भाजपा नेता रामनारायण शर्मा के प्रभाव में विगत 20 वर्षों से रही है, और इस नाते मनरेगा में 1,26,56,466 रूपये मनरेगा में 31/12/2009 तक व्यय किये जा चुके हैं, जो राजगढ़ जनपद पंचायत क्षेत्र में ग्राम पंचायत झझाडपुर माचलपुर एवं बगा पंचायत के बाद $खर्च की गयी सबसे बड़ी धनराशि है। सांसद द्वारा अपने निरीक्षण का आरंभ ग्राम लहरचा (पंचायत भियापुरा) से किया गया। यहां शासकीय दस्तावेज़ों में दर्ज मनरेगा के तहत निर्मित 3,36,956 रूपये की सड़क मौके पर नदारद दिखी। इस गुम सड़क के लिये वहां मौजूद अधिकारियों द्वारा दिये गये जवाब अत्यन्त हास्यास्पद रहे। अधिकारियों के मुताबिक मनरेगा द्वारा निर्मित यह सड़कलोक निर्माण विभाग द्वारा बनायी गयी। सड़क के अंदर दब गयी ऐसा ही दृश्य ग्राम पाटरीकला में लगभग 8 लाख की लागत से मनरेगा के तहत बनी (का$गज़ों मे तैयार) सड़कों में दिखायी दिया। इन सड़कों को भौतिक सत्यापन इसलिये नहीं हो सका कि प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना तथा लोक निर्माण विभाग की सड़कें मनरेगा के कार्यों के ऊपर बनायी जाना दिखा कर अधिकारियों ने अपना उल्ला झाड़ लिया। रोज़गार की गारंटी दिलाने वाली यह योजना अधिकांश ग्रामीणों के जाबकार्ड खाली मिलने से अपने वास्तविक ज़मीनी धरातल पर मूल उद्देश्यों की पूर्ति में नाकाम दिखी। ग्राम लहरचा में ही इकसठ जाबकार्ड खाली मिले।
भियापुरा ग्राम पंचायत में जनपद पंचायत राजगढ़ की ओर से लम्बे समय तक उपयंत्री ए.के. जैन (अभिषेक कुमार जैन) मनरेगा के गुणवत्ताहीन आधे अधूरे कहीं कहीं तो सि$र्फ मस्टर रोल व का$गज़ों पर कार्यों को पूर्ण दर्शाकर कार्यों का मूल्यांकन मेज़रमेंट बुक में करते रहे। वहीं इस भ्रष्टाचार को प्रश्रय में नरेगा के एस.डी.ओ. अखिलेश श्रीवास्तव द्वारा भ्रष्टाचार को पल्लवित पोषित करने के उद्देश्य से किये जाते रहे। निर्माण कार्यों में (भियापुरा ग्राम पंचायत) इस प्रकार के प्रमाणिक खुले रूप में भ्रष्टाचार के आदी रहे अभिषेक जैन तथा अखिलेश श्रीवास्तव के विरूद्ध सांसद श्री नारायण सिंह आमलाबे कब तक किस स्तर की कार्यवाही करवा पाते हैं, इस पर दोनों ही दलों के राजनीतिज्ञों, प्रशासनिक अमले की नज़रें लगी हैं। जि़ले के राजनेतिक विश्लेषकों का मानना है, कि कुछ माह पूर्व ग्राम बापची मे नरेगा के तहत ठेकेदार द्वारा किये मनमाने कार्यों के बाद सांसद की सहमति के बाद भी कलेक्टर जो नरेगा के जि़ला कार्यक्रम समन्वयक भी हैं, के द्वारा उक्त अनियमित भुगतान को रोका जाकर उक्त ग्राम बापची का कार्य निरस्त कर दिया था। इस पर सांसद महोदय कलेक्टर से नाराज़ थे।
वहीं विधायक हेमराज कल्पोनी अपनी कुछ सि$फारिशों को जि़ला पंचायत सी.ई.ओ. जो नरेगा के अतिरिक्त जि़ला कार्यक्रम समन्वयक भी है के द्वारा अस्वीकार करने से रूष्ट थे। विधायक एवं सांसद द्वारा नरेगा के सबसे अधिक प्रमाणित स्तर के भ्रष्टाचार के मामले ग्राम पंचायत भियापुरा में तलाश करके जि़ला कार्यक्रम अधिकारी के रूप में कलेक्टर श्री शिवानंद दुबे की उलझने बढ़ा दी गई हैं। पूर्व में भाजपा के सांसद लक्ष्मण सिंह द्वारा भी कालीपीठ क्षेत्र में नरेगा के कार्यों में 6 रू. व 8 रू. मज़दूरी दिये जाने की शिकायत मुख्यमंत्री से कर अधिकारियों के निरंकुश रवैये पर प्रश्न चिन्ह लगाने के बाद भी तथा मुख्यमंत्री के निर्देश पर जि़ले के प्रभारी मंत्री द्वारा कलेक्टर को मौके पर जाकर दोषी अधिकारियों के विरूद्ध सख़्त कार्यवाही के निर्देश देने के बाद भी किसी भी प्रकार की कोई भी कार्यवाही किसी भी स्तर के अधिकारी या सरपंच पर नहीं हो सकी थी। परंतु इस बार सांसद श्री आमलाबे नरेगा की केन्द्र द्वारा बनायी गयी नौ सदस्यों की समिति के सदस्य हैं, इसलिये भियापुरा के लाखों रूपये के $फजऱ्ी कार्यों के मूल्यांकन कर्ता अधिकारी उपयंत्री ए.के.जैन तथा इन निर्माण कार्यों के सत्यापन कर्ता अधिकारी अखिलेश श्रीवास्तव पर कार्यवाही का दबाव बढ़ता जायेगा।
देखना यह है कि कलेक्टर शिवानंद दुबे इन भियापुरा के कार्यों में दोषी साबित अधिकारियों पर कार्यवाही कर जि़ले में सत्तारूढ़ दल की नाराज़ी मोल लेते हैं या पूर्व सांसद लक्ष्मण सिंह के दौरे की तरह सांसद नारायण सिंह का यह नरेगा के कार्यों को निरीक्षण महज़ रस्म अदायगी सिद्ध होता है। दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने भी उपयंत्री ए.के.जैन द्वारा जिन कांग्रेस समर्थित सरपंचों की ग्राम पंचायतों में मूल्यांकन किया है व जनपद में एस.डी.ओ. नरेगा अखिलेश श्रीवास्तव से सत्यापन कराया है उन ग्राम पंचायतों के कार्यों की भी जांच कराने की मांग की है, जो जि़ला कार्यक्रम अधिकारी श्री शिवानंद दुबे के लिये परेशानी का कारण भी हो सकता है।
वैसाखी जालियाँवाला बा$ग आज़ादी के परवानों का $कत्लेआम
जालियाँवाला बा$ग हत्याकांड भारत के पंजाब प्रान्त के अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर के निकट जलियाँवाला बाग में 13 अप्रैल 1919 (बैसाखी के दिन) हुआ था। रौलेट एक्ट का विरोध करने के लिए एक सभा हो रही थी जिसमें जनरल ओ. डायर नामक एक अंग्रेज़ ऑ$िफसर ने अकारण उस सभा में उपस्थित भीड़ पर गोलियाँ चलवा दीं जिसमें 1000 से अधिक व्यक्ति मरे और 2000 से अधिक घायल हुए। 13 अप्रैल 1919 को डॉ. सत्यपाल और सै$फुद्दीन किचलू की गिरफ़्तारी तथा रोलेट एक्ट के विरोध में अमृतसर के जलियाँवाला बा$ग में लोगों ने एक सभा रखी, जिसमें उधमसिंह लोगों को पानी पिलाने का काम कर रहे थे। इस सभा से तिलमिलाए पंजाब के तत्कालीन गवर्नर माइकल ओ डायर ने अपने ही उपनाम वाले जनरल डायर को आदेश दिया कि वह भारतीयों को सबक सिखा दे। इस पर जनरल डायर ने 90 सैनिकों को लेकर जलियाँवाला बा$ग को चारों ओर से घेर लिया और मशीनगनों से अंधाधुँध गोलीबारी कर दी, जिसमें सैकड़ों भारतीय मारे गए। जान बचाने के लिए बहुत से लोगों ने पार्क में मौजूद कुएं में छलांग लगा दी। बा$ग में लगी पट्टिका पर लिखा है कि 120 शव तो सि$र्फ कुए से ही मिले। आधिकारिक रूप से मरने वालों की संख्या 379 बताई गई जबकि पंडित मदन मोहन मालवीय के अनुसार कम से कम 1300 लोग मारे गए। स्वामी श्रद्धानंद के अनुसार मरने वालों की संख्या 1500 से अधिक थी, जबकि अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से अधिक थी। इस हत्याकाण्ड के विरोध में रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने इस हत्याकाण्ड के विरोध में सर की उपाधि लौटा दी और उधमसिंह ने लन्दन जाकर पिस्तौल की गोली से जनरल डायर को भून दिया और इस हत्या काण्ड का बदला लिया।

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