महंगाई
रोटियां सेक रहे हैं विपक्षी नेता
जी.डी.गोयल
नई दिल्ली। महंगाई आसमान छू रही है। आदमी की रोज़मर्रा जरूरतों की चीज़े इतनी मंहगी होती जा रही हैं, कि उसका जीना मुश्किल होता जा रहा है। दाल, चीनी, तेल, सब्ज़ी पैट्रोल, डीज़ल, सब की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, यह महंगाई कहां जाकर रूकेगी, इसका कोई अंदाज़ा नहीं लगा पा रहा है। सरकार तो एक तरह से इस पर काबू पाने केमामले में घुटने टेक ही चुकी है, और भारत का आम आदमी अब पूरी तरह से जमा$खोरों की गिरफत में आ चुका है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि इन मुना$फा $खोरों औैर सरकार के बीच कोई गठबंधन सा चल रहा है। पहले सरकार के मंत्री षशद पवार बयान देते हैं, कि चीनी के दाम बढ़ सकते हैं, और उसके दो दिन के बाद ही बाज़ार में चीनी के दाम बढ़ जाते हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाते समय ही पुन: शरद पवार ने बयान दिया है, कि उत्तर भारत में दूध की भारी कमी है, इसलिए दूध के दाम बढ़ सकते हैं और हमारा पूरा यकीन है कि जब तक यह $खबर अ$खबार में छपेगी, दूध के दाम वाकई बढ़ चुके होंगे। इघर पवार जी यह बयान देते हैं, कि किसान को अपनी $फसल की पूरी रकम भी नहीं मिली है, उधार खाद्यान के दाम आसमान छू रहे हैं, अत: यह बात तो सा$फ है कि अनाज और दालें उगाने वाला $गरीब किसान भी पिस रहा है, और उसे खाने वाले आम आदमी भी, तो सारा मुना$फा उन व्यापारियों की तिजोरियों में जा रहा है, जो सरकार की मिली भगत से जनता को लूट रहे हैं। अर्थशास्त्र का सिद्धांत कहता है कि किसी भी देश में महंगाई तब बढ़ती है जब उस देश के आदमी की आय बढ़ती है, लेकिन भारत में उस सिद्धांत के ठीक विपरीत हो रहा है। यहां आदमी की आमदनी कम हो रही है और चीज़ों के दाम बढ़ रहे हैं। प्रजातंत्र में जब सत्तारूढ़ राजनेता जनता के हितों के विरूद्ध काम करते हैं, तब विपक्षी दल उस पर रोक लगाने का काम करते हैं। लेकिन भारत में विपक्षी दल संसद और विधानसभाओं में अपने अधिकारों का प्रयोग करके इस पर रोक लगाने का काम करने के बजाय आज महंगाई की इस आग पर अपनी रोटियां सेकने मेें लग गए हैं। उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी की कोशिश में लगे मुलायम सिंह ने महंगाई के $िखला$फ हाल ही में ज़बरदस्त प्रदर्शन किया, लेकिन उनके प्रदर्शन में महंगाई के लिए जि़म्मेदार केद्र की कांग्रेस की सरकार नहीं थी। बल्कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती निशाने पर थी। अगर मुलायम सिंह को लगता है कि महंगाई के लिए सरकार ही जि़म्मेदार है तो उन्हें सबसे पहले कें्रद सरकार से अपना समर्थन वापस लेना चाहिए था। या सड़कों पर भीड़ जमा करने के बजाय अपने कार्य कर्ताओं की ताकत उन मुना$फा $खोर व्यापारियों को बेनकाब करने में लगानी चाहिए थी।
जो मौैके का $फायदा उठा कर जनता को लूटने मेें लग गए हैं। यही बात भारतीय जनता पार्टी पर भी लागू होती है। मुलायम सिंह के बजाए उन केे पास तो ऐसी ताकत भी है कि वे बड़े हिस्से मेें महंगाई पैदा करने वाले मुना$फा $खोरों पर अंकुश लगा सकें। मध्यप्रदेश, उत्तराखण्ड, बिहार, पंजाब और गुजरात जैसे कई बड़े राज्यों में उनकी सरकारें कायम हैं। लेकिन उन राज्यों में भी महंगाई आसमान छू रही है। ये वे राज्य हैं जो हर आम ज़रूरत के सामान का उत्पादन करते हंै और केवल पैट्रोल डीज़ल जैसी चीज़ों को छोड़ कर किसी भी चीज़ के लिए केन्द्र पर निर्भर नहीं, फिर वे अपने राज्य में महंगाई क्यों नहीं रोक पा रही हैं। सा$फ बात यह है कि ये सरकारें भी इस समय जनता के बजाय मुना$फा $खोरों का ही साथ दे रही हैं। क्यों कि अभी चुनाव दूर हैं और कुर्सी पर बैठी हर पार्टी की सरकार यह चाहती है कि इन मुनाफा$खोरों से मिली भगत करके जनता को जिनता लूटा जा सके लूट लें। यह बात किसी से छुपी नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी मूल तह: व्यापारियों की पार्टी कही जाती है। फिर उनसे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि इस वक्त जब व्यापारियों कोजनता को लूटने का मौका मिला है, उनका साथ न दे।
सचाई तो यह है भारत के विपक्षी नेता महंगाई की बात का $फायदा उठा कर दौनोंहाथों से लडडू ख रहे हैं। एक तरफ तो वे और उनकी राज्यों में बैठी सरकारें व्यापारियां का साथ देकर धन कमाने में जुटी हैं। दूसरी तर$फ उनके आडवाणी और गडकरी जैसे नेता महंगाई के विरूद्ध आवाज़ उठाने की नौटंकी कर मीडिया के माध्यम सेजनता को यह दिखा कर कि वे इस दुख: की घड़ी में उसके साथ हैं, आने वाले चुनावों के लिए अपना वोट बेंक तैयार करने में जुटे हैं।
वरना अगर उनमें वाकई जनता के प्रति कोई वफादारी होती तो इस समय वे कोई ऐसा आंदोलन खड़ा कर सकते थे, जिसके सामने मुना$फ$खोर चपारियों और उनकी मदद करने वाली सरकार दोनों को ही घुटने टेकने पड़ जाते। जब महात्मा गंाधी जैसा नेता जन आंदोलन के सहारे विदेशी हुक्मरानों को झुकाने में कामयाब हो सकता है, तो ये लोग जो आज जनता को लूट रहे हैं, तो अपने ही बीच के मुठठी भर व्यापारी हैं जो किसी भी ईमानदारी से चलाये जाने वाले जन आंदोलन के सामने कितनी देर रूक सकते हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि आज हमाम के नंगे इन नेताओं में से कौन ऐसा है, जो इस काम को अंजाम दे।
भय काहूं को देत नहिं, नहिं भय मानत..
गुरुबचन सिंह
बग्गा 'सोचÓ
$खबरयार भोपाल/आगरा
आज वर्ष 2010 में ऐसा प्रतीत ही नहीं होता। लगता है, जैसे कल की ही बात हो, जब $खबरयार का सम्पादन प्रकाशन प्रारंभ किया गया। बचपन से साहित्यिक रूचियों के वलवले, फिर वर्षों तक विभिन्न सरकारी विभागों में कार्य करते करते, लिखने पढऩे की आदत सी पड़ गई, जब तत्कालीन मित्रों, जगत पाठक एवं अरुण पाराशर ने ठंडी राख तले 6 वीं दबी रूचियों को उघाड़ा और समाचार पत्र प्रकाशन हेतु उकसाया, तो वर्ष 1980 के गणतंत्र दिवस से $खबरयार का सम्पादन, प्रकाशन प्रारंभ हो गया। इसमें कोई दो राय नहीं कि $खबरयार के अनवृत प्रकाशन के दौरान गत 30 वर्षों में अनेकों बार हमें ठोकरें लगीं, गिरे, पड़े, उठे, फिर गिरे और फिर उठकर आगे चल पड़े। अनेकों बार शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक व कानूनी प्रताडऩाओं का शिकार भी बनना पड़ा, मगर मेरा निशाना हमेशा एक ही और केवल एक ही, 'मछली की आंखÓ रहा। बार बार गिरना व उठकर फिर चल देना और आगे बढ़ जाना, हमारी एक नियती सी बन गई है, क्योंकि यह हमारा मानना है:-
'गिरते हैं शाहसवार ही मैदाने जंग में
वह ति$िफल क्या चलेंगे जो घुटनों बल चलें।Ó
बचपन के दिनों में देखे व भोगे देश के बंटवारे समय के भयंकर $खूनी नज़ारों और हालात को कभी न भुला सका। शायद यही कारण रहा कि वर्तमान समय में समाज में आम इंसानों, मज़दूरों, किसानों की हो रही हिन्दुस्तानी शासक जमातों के हाथों दुर्दशा को देखते सुनते ही, उन पर रहम आने लगता है, और इसीलिये उनके बारे में $खबरयार के माध्यम से मामले को उठाकर सरकार एवं सक्षम अधिकारियों तक पहुंचाना अपना कर्तव्य समझने लगा। ऐसे मामलों को जनता की अदालत में प्रस्तुत करके, उन पीडि़तों हेतु न्याय हित में माहौल निर्मित करने में हमें प्रसन्नता मिलती है। और तब तो हमें अपार $खुशी व राहत महसूस होने लगती है, जब $खबरयार में उठाये गये ऐस मामलों में पीडि़तों को न्याय के साथ राहत व मुआवज़े मिलते हैं। यह सब करते हुये हमें कई बार प्रभावित एजेंसियों, व्यक्तियों, संस्थानों, अधिकारियों व माननीय मंत्री गणों के कोपभाजन का शिकार भी हो कर, आर्थिक व अन्य पक्षों से हानि उठानी पड़ती है, या किन्हीं अन्य उलझनों का सामना भी करना पड़ता है। मगर इस प्रोजैक्ट को मैं अकेला ही सफल नहीं बना सकता, इसीलिये पत्रकारिता में निपुण्य वरिष्ठ जनों के मार्गदर्शन में कुछ स्थानीय सहयोगियों का भी पूर्ण सहयोग मुझे हमेशा मिलता रहता है। इसी के साथ-साथ भोपाल से बाहर विभिन्न राज्यों के विभिन्न नगरों, कस्बों में कुछ साथियों का जाल सा बिछ गया है, जो निरंतर इस काम में मेरा हाथ बंटाते हैं। वर्तमान में इस जाल का फैलाव मध्यप्रदेश के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों, छत्तीसगढ़ व उत्तरप्रदेश में प्रगति पर है। वर्तमान हालात में $खबरयार जैसे छोटे अ$खबारों पर भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे दैंतों के कारण संकट के घटाघोर बादल छा रहे हैं। कुप्रभावों के इस गहरे और विशाल सागर से चारों ओर घिरे हुये नज़र आते हैं, परंतु ईश्वर की कृपा, लगन व बुलंद इरादों के सहारे, मेहनत व मुकद्दर के बल पर मुझे पूरा भरोसा है, कि यह अ$खबार $खबरयार इस सही पथ पर सदैव अग्रसर रहेगा, क्योंकि शुभ कर्मों हेतु हम न परिश्रम करने से डरते हैं और न उनके कुप्रभावों से भयभीत हैं, और न ही किसी को भयभीत करने का इरादा रखते हैं।
कौन कहता है कि आसमां छिद नहीं सकता?
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो!
हृ जी.डी.गोयल
राष्ट्रीय अध्यक्ष,
इण्टरनेशनल मीडिया $फाऊंडेशन, नई दिल्ली
एक ज़माना था जब अखबार निकालना एक मिशन था। अगर लिखने वाले की $कलम में दम होता था, तो जनता अ$खबार भी $खरीदती थी और अ$खवार निकालने वाले की इज्ज़त भी करती थी। अ$खबार जनता की आवाज़ कहे जाते थे और उनमें ज़ुल्म और अत्याचार के $िखला$फ लडऩे की वो ताकत थी कि कहा गया कि ,''ना तोप निकालो न तलवार निकालो, जब ज़ुल्म मुकाबिल हो तो अ$खबार निकालोÓÓ। लेकिन वक्त के साथ अ$खबारों का दौर भी बदला। जनता और पाठक का रूझान तो वही रहा, लेकिन अ$खबार निकालने वाले व्यापारी आ गए, या व्यापारी बन गए। उन्होंने अ$खबार की इस ताकत को अपना हथियार बना लिया। सर से कफन बांध कर अन्याय के $िखला$फ आवाज़ उठाने वाले अ$खवारों का चलन खत्म होने लगा। कोयला, शराब मा$िफया और बेईमान धंधे बाज अ$खबार निकालने लगे, जिनका इरादा अन्याय के $िखला$फ आवाज़ उठाने के बजाए अपने व्यवसायक प्रतिद्वंदियों को कमज़ोर करना और उनके $िखला$फ कार्यवाही करने वाले अधिकारियों को भयभीत करना, तथा राजनीति में अपना दबदबा पैदा करके अपने काले कारोबार की तरक्की करना था। नतीजा यह हुआ, कि अ$खबारों में से मिशनरी की भावना समाप्त होती गई, और व्यवसायकता हावी होती गई। लेकिन इस दौर में भी कुछ अ$खबार और उन्हें निकालने वाले लोग अपने उसूलों पर चलते रहे, और उन्हें सफलता भी मिली। धीरे ही सही, उन्हें अपनी ईमानदार अ$खबार-नवीसी का सिला भी मिला, और सम्मान भी। $खबरयार ऐसा ही अ$खबार है, जिसके चलाने वाले सरदार गुरूवन सिंह सोच जो बिना किसी चाटुकारिता और भय के पिछले तीस साल से इस अ$खबार को चला रहे हैं। इस बीच अपनी बेबाकी को लेकर उन्हें कितनेे ही संकट क्यों न झेलने पड़े, वे अपनी निष्ठा से नहीं डिगे। उनकी इस मेहनत का सिला भी उनको मिला है, आज $खबरयार अपने रंगीन कलेवर में देश के कई प्रांतों में लोकप्रिय है, और उसकी मांग निरंतर बढ़ रही है। आज जबकि कलम के धनी उन पत्रकारों को इस बात का मलाल है, कि जब वे अन्याय के $िखला$फ लिखते हैं, या किसी बईमान को बेनकाब करते हैं, तो अ$खबार मालिक उनकी बात छापने को तैयार नहीं होते हैं, क्योंकि उससे उन्हेें अपने व्यवसायिक हितों पर आंच आती नज़र आती है। उनके लिए ख़बरयार एक सशक्त मंच साबित हो रहा है। आज जब पूरे भारत में भ्रष्टाचार का घोर अंधेरा व्याप्त है, $खबरयार उसे चीर कर राह दिखाने वाले अ$खबार साबित हो रहा है। मेरी सम्पूर्ण शुभ कामनाएं $खबरयार परिवार के साथ है, ईश्वर गुरूबचन सिंह बग्गा 'सोचÓ को उम्रदराज़ करे, ताकि वे अरसे तक इस मशाल को जला कर अवाम की रहबरी करते रहें।
खबरों से खबरदार करता 'खबरयार
हृ रामभुवन सिंह कुशवाह
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, एनयूजे(आई)
भारतीय पत्रकारिता इन दिनों विवादों के बियाबान में कहीं भटकती नज़र आ रही है। उस पर तमाम तरह के आरोप मढ़े जा रहे हैं, और हैरानी का विषय तो यह है, कि उस पर वे लोग अंगुलियां उठा रहे हैं, जिनका पूरा शरीर ही विवादों के कीचड़ में फसा हुआ है। सरकार के समुचित संरक्षण के अभाव में पत्रकारिता पंूजीपतियों और भ्रष्ट राजनेताओं को क्रीतदासी बनती नज़र आ रही है। जिस पत्रकारिता को लोकतंत्र का 'वाच डागÓ कहा जाता है, वही पत्रकारिता अब 'बार्क डॉगÓ बनकर पंूजीपतियों के दरवाज़े पर बंधी, उनके हितों की रखवाली कर रही है। हमारे कई स्वनाम धन्य पत्रकार भले ही लाखों रूपये की पगार लेकर बड़ी बड़ी गोष्ठियों में पत्रकारिता की दुर्दशा पर आंसू बहाते न थकते हों, वे यह भूल जाते हैं, कि विवशता की स्वर्ण ज़ंजीरों में बंधकर वे जाने अनजाने ऐेसे लोगों के पक्षधर बन गये हैं, जिनसे लोकतंत्र को सबसे बड़ा $खतरा है। दुर्भाग्य से आज आम पाठक भी विज्ञापनों से लदे बहुपृष्ठीय अ$खबारों को ही अ$खबार मानता है और सरकार उन अ$खबारों को ही विज्ञापन देने को मजबूर है, जिनका प्रसारण लाखों में बताया जा रहा हो। जबकि सब जानते हंै कि लोकतंत्र न तो लच्छेदार भाषणों से पुष्ट होगा, और न अलंकारिक भाषा शैली की $खबरों से। लोकतंत्र को सत्य की साधना से ही मज़बूत बनाया जा सकता है। मध्यप्रदेश के कितने लोग यह जानते हैं कि भोपाल से एक ऐसा साप्ताहिक पिछले तीस साल से निकल रहा है, जिसे न तो सरकारी विज्ञापन की ज़रूरत है और न पंूजीपतियों के सरंक्षण की, जिसने पूरे प्रदेश में संवाददाताओं की एक ऐसी टीम खड़ी की है, जो मिलकर अ$खबार चलाती है। आजकल तो उस साप्ताहिक के कुछ पृष्ठ रंगीन भी होते हैं। सोलह पृष्ठों का यह अ$खबार तीन दशक से अनवरत् प्रकाशित हो रहा है, जो न कभी रूका है न थका है और न झुका है।
मैं जि़क्र कर रहा हंू साप्ताहिक $खबरयार का, जिसके संपादक हैं वरिष्ठ पत्रकार श्री गुरूबचन सिंह बग्गा 'सोचÓ । श्री 'सोचÓ को आपातकाल में मीसा में निरूद्ध किया गया था। वे सन् 1980 से लगातार '$खबरयारÓ का प्रकाशन कर रहे हैं। एक छोटे से कमरे में कुछ सहयोगियों को साथ में लेकर, इतना उम्दा साप्ताहिक निकालते हैं, कि हम सबको आश्चर्य होता है। पूरे 16 पृष्ठ $खबरों से भरे होते हैं, और पूरे प्रदेश के छोटे से छोटे कस्बों से पत्रकार उन्हें $खबर भेजते हैं। उनकी $खबरों में भ्रष्टाचार पर तीखा प्रहार होता है। व्यवस्था पर उनकी और उनके संवाददाताओं की सतर्क निगाहें होती हैं। '$खबरयारÓकी यारी केवल और केवल $खबरों से ही होती है और $खबरों से ही लोगों को $खबरदार करता है। $खबरों के मामले में $खबरयार न तो भाजपा को छोड़ता है, और न कांग्रेस को। श्री सोच न साम्यवादी हैं, और न समाजवादी । वे तो शुद्ध पत्रकार हैं। व्यवहार से अत्यंत विनम्र, अत्यंत सहज, सरल और अंदर से ज़माने का दर्द समेटे हुए $गरीबों के सच्चे हमदर्द। काश! सभी पत्रकार उन जैसे होते। मैं $खबरयार के 31 वें वर्ष के प्रवेश पर हार्दिक बधाई देते हुए, श्री सोच और उनसे जुड़े तमाम पत्रकार साथियों को एक सा$फ सुथरे साप्ताहिक के लिए साधुवाद देता हंू।
प्रभुकृपा और निरंतर साधना का प्रतिफल : $खबरयार
हृ ओमप्रकाश कुंद्रा
संपादक सैन्ट्रल न्यूज़ एंड फीचर्स,भोपाल
भोपाल से विगत अनेक वर्षों से प्रकाशित $खबरयार (साप्ताहिक) के तपस्वी सम्पादक श्री गुरुबचन सिंह बग्गा 'सोचÓ से समाज के सभी वर्ग सुपरिचित हंै। व्यक्ति और पत्रकार दोनों रूपों में ही वे अत्यंत लोकप्रिय हैं। उन्होंने वाहे गुरु की कृपा और अपनी निरंतर साधना के बलबूते ही अपने पत्र का प्रचार-प्रसार न केवल मध्यप्रदेश के पिछड़े अंचलों में किया, अपितु उसे उत्तर प्रदेश में भी ले गए। इसके फलस्वरूप आगरा से भी $खबरयार नियमित रूप से प्रकाशित हो रहा है। अहिन्दी भाषी गुरुबचन सिंह ने गुरू ग्रंथ साहिब में समविष्ट भक्तों की वाणी को पृथक-पृथक पुस्तक-पुस्तिकाओं के रूप में प्रकाशित करने का दु:साहसपूर्ण संकल्प लिया था । उसमें से उन्होंने कबीर वाणी को 'न काहू से बैरÓ शीर्षकतले अत्यंत सुंदर रूप देने में यश भी प्राप्त किया, परंतु चतुर्दिक असहयोग के कारण उनका संकल्प अधूरा ही रह गया। उनकी उक्त प्रस्तुति अत्यंत सराहनीय रही, परंतु लेखकों/पत्रकारों का सही मूल्यांकन सरकार अथवा समाज द्वारा न होने से कितने बड़े-बड़े काम अथवा रचनाएं अपूर्ण रह जाती हैं, उसकी यह दुखद बानगी है। श्री गुरुबचन सिंह की $खबरयार के नियमित प्रकाशन रूपी साधना की वंदना करते हुए प्रभुचरणों में कामना है कि उन्हें अपनी साधना में यशस्वी बनाएं।
$खबरयार: इतिहास रचती जीवटता
हृ शब्बीर $कादरी
नेचरटुडे के सम्पादक, भोपाल
समकालीन पत्रकारिता के दौर में जबकि प्रेस का अधिग्रहण मीडिया ने कर लिया है, अ$खबार और उससे जुड़े सरोकारों को जि़ंदा रखना किसी भी चमत्कार से कम नहीं है। $खासतौर से ऐसे परिवेश में जबकि बड़ी पंूजी की मुठ्ठी में पत्रकारिता का पूरा तंत्र $कैद हो, तब छोटे या मंझोले अ$खबार ज्य़ादा दूरी का स$फर या तो तय ही नहीं कर पाते, या फिर दिशा और लक्ष्य से भटककर गुमनामी में डूब जाते हैं। इस परिवेश में यह तथ्य और अधिक विस्मित करता है, कि राजधानी के अ$खबार '$खबरयारÓ ने प्रकाशन के तीन दशक पूरे कर लिये हैं, या यंू कहें त्याग, तपस्या, धैर्य और कठिन परिश्रम की तीस साला सज़ा इस पेशे के माध्यम से अब तक भोगी जा चुकी है। प्रेस को लोकतंत्र का प्रहरी कहा गया है। प्रहरी का यही दायित्व किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को इस क्षेत्र की ओर आकर्षित करता है और वही व्यक्ति इस क्षेत्र में दीर्घकाल तक अपनी प्रतिष्ठा और मौजूदगी आदर-सत्कार के साथ बनाए रखता है, जो इस कर्म के धर्म से समझौता नहीं करता। क्योंकि मैं सरदार साहब को पिछले अनेक वर्षों से जानता हंू, इसलिए बेहिचक कह सकता हंू, गुरुबचन सिंह बग्गा 'सोचÓ जी ने भी कर्म के धर्म से समझौता नहीं किया, तभी तो प्रदेश के कोने-कोने में उन्हें और उनके अ$खबार को सभी आदर के साथ शिरोधार्य करते हैं। जब भी उनसे मिलने उनके कार्यालयीन सह आवास पर गया हंंू, ढेरों का$गज़ों के बीच अपनी तपस्वी टीम के साथ उन्हें लिखते-पढ़ते ही पाया है। उनके अ$खबार की विशेषता है कि प्रदेश भर में फैले उनके संवाददाता विकास की हर गतिविधि पर ही नज़र नहीं रखते , यह भी देखते हैं, कि समाज पर उसका क्या असर हो रहा है। दूसरे शब्दों में गुरुबचन सिंह जी लोकतंत्र के प्रहरी की भूमिका इस माध्यम से ब$खूबी निभा रहे हैं। मेरी इस अतिश्योक्ति को कोई भी , कभी भी, $खबरयार पढ़कर जांच सकता है, क्योंकि हर बार का अ$खबार एकदम ताज़ा $खबरों और रिपोर्ट पर आधारित होता है।
$खबरयार की अनेक $खूबियों में से एक यह भी है, कि इसमें अश्लीलता का कहीं जि़क्र नहीं है। विज्ञापन का आंकलन कर हैसियत का पता लगाने वाले खोजी तत्व भी यह ठोंक-बजा कर तसल्ली कर सकते हैं, कि $खबरयार ने तीस साल का यह कड़ा स$फर किस तरह पूरा किया होगा। विज्ञापन के बिना अ$खबार निकालना या कम विज्ञापन के सहारे अ$खबार निकालना, ऊपर से परिजनों की ना-नुकुर सहकर अ$खबार निकालना, किस हिम्मत और जी-दारी का काम है, यह कोई सरदार साहब से पूछे। इस अवसर पर मैं $खबरयार के गुरुबचन सिंह बग्गा 'सोचÓ जी को उनकी उत्कृष्ट टीम और परिवार को और उन सभी को जो उनके इस मिशन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं, सेल्यूट करता हंू। सच मानिये तीस साला रूपी यह जीवटता इतिहास के एक अंश का निर्माण तो करती है। मैं चाह कर भी $खबरयार परिवार की कोई कमी नहीं ढंढ़ पा रहा हंूद्व मैं चाहुंगा कि इस अवसर पर सरदार साहब का सार्वजनिक सम्मान भी हो, और अ$खबार के निरंतर प्रकाशन का संकल्प भी लिया जाए। तीस साल पहले रौपा गया '$खबरयारÓ रूपी यह पौधा आज वृक्ष तो ज़रूर बना है, पर जिस संघर्ष और साहस के साथ यह काम अंजाम को पहुंचाया गया है, उसकी तारी$फ $गैरज़रूरी नहीं है। इस मुबारक मौके पर सरदार साहब को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं। पूरे सूबे को और उसके समाज को एकदम सा$फ-सुथरा और ताज़ा अ$खबार '$खबरयारÓ का हमेशा इंतज़ार रहेगा।
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Friday, January 22, 2010
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